श्रीगणेशाय नमः।

महाभारत — खण्ड २ — पृष्ठ 2161–2170

महाभारत — खण्ड २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 2161–2170

पृष्ठ 2161

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सुरक्तमाञ्जिष्ठवराम्बरः शिखी पवित्रपाणिर्ददृशे तदद्भुतम् ॥ वे कमण्डलु और पगड़ी धारण किये त्रिदण्डधारी तरुण ब्राह्मण बन गये । उनके शरीरपर मँजीठके रंगके सुन्दर लाल वस्त्र शोभा पाने लगे तथा मस्तकपर शिखा दिखायी देने लगी । वे हाथमें कुश लिये अद्भुत रूपमें दृष्टिगोचर होने लगे । तथैव तेषामपि धर्मचारिणां यथेप्सिता ह्याभरणाम्बरस्रजः । क्षणेन राजन्नभवन्महात्मनां प्रशस्तधर्माग्रयफलाभिकाङ्क्षिणाम् ॥ ) राजन्! इसी प्रकार उत्तम धर्मके श्रेष्ठ फलकी अभिलाषा रखनेवाले उन सभी धर्मचारी महात्मा पाण्डवोंको क्षणभरमें उनके अभीष्ट वेशके अनुरूप वस्त्र, आभूषण और माला आदि वस्तुएँ प्राप्त हो गयीं । ततो विराटं प्रथमं युधिष्ठिरो

राजा सभायामुपविष्टमाव्रजत् ।

वैदूर्यरूपान् प्रतिमुच्य काञ्चना- नक्षान् स कक्षे परिगृह्य वाससा ॥ १ ॥

तदनन्तर वैदूर्यके समान हरी, सुवर्णके समान पीली ( तथा लाल और काली ) चौसरकी गोटियोंसहित पासोंको कपड़ेमें बाँधकर बगलमें दबाये हुए राजा युधिष्ठिर सबसे पहले

राजाके दरबारमें गये । उस समय राजा विराट सभामें बैठे थे ॥ १ ॥

नराधिपो राष्ट्रपतिं यशस्विनं महायशाः कौरववंशवर्धनः । महानुभावो नरराजसत्कृतो दुरासदस्तीक्ष्णविषो यथोरगः ॥ २ ॥

बलेन रूपेण नरर्षभो महा- नपूर्वरूपेण यथामरस्तथा ।

महाभ्रजालैरिव संवृतो रवि- र्यथानलो भस्मवृतश्च वीर्यवान् ॥ ३ ॥

वे बड़े यशस्वी और मत्स्यराष्ट्रके अधिपति थे । राजा युधिष्ठिर भी महान् यशस्वी, कौरववंशकी मर्यादाको बढ़ानेवाले तथा महानुभाव ( अत्यन्त प्रभावशाली ) थे । सब राजे-महाराजे उनका सत्कार करते थे । तीखे विषवाले सर्पकी भाँति वे दुर्धर्ष थे । बल और रूपकी दृष्टिसे मनुष्योंमें सबसे श्रेष्ठ और महान् थे । अपने अपूर्व रूपके कारण वे देवताके समान जान पड़ते थे । महामेघमालाओंसे आवृत सूर्य तथा राखमें छिपी हुई अग्निके समान

उनका तेजस्वी रूप वेशभूषासे आच्छादित था । वे बड़े पराक्रमी थे ॥ २-३ ॥

पृष्ठ 2162

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तमापतन्तं प्रसमीक्ष्य पाण्डवं विराटराडिन्दुमिवाभ्रसंवृतम् । समागतं पूर्णशशिप्रभाननं महानुभावं न चिरेण दृष्टवान् ॥ ४ ॥

उनका मुख पूर्ण चन्द्रमाके समान प्रकाशित हो रहा था । बादलोंसे ढके हुए चन्द्रमाकी भाँति शोभायमान महानुभाव पाण्डुनन्दनको आते देख राजा विराटकी दृष्टि सहसा उनकी ओर आकृष्ट हो गयी । निकट आनेपर शीघ्र ही उन्होंने बड़े गौरसे उनकी ओर देखा ॥ ४ ॥

मन्त्रिद्विजान् सूतमुखान् विशस्तथा ये चापि केचित् परितः समासते । पप्रच्छ कोऽयं प्रथमं समेयिवान् नृपोपमोऽयं समवेक्षते सभाम् ॥ ५ ॥

मन्त्री, ब्राह्मण, सूत- मागध आदि, वैश्यगण तथा अन्य जो कोई भी सभासद् उनके दायें - बायें सब ओर बैठे थे, उन सबसे राजाने पूछा- ' ये कौन हैं? जो पहले - पहल यहाँ पधारे हैं? ये तो किसी राजाकी भाँति मेरी सभाको निहार रहे हैं ' ॥ ५ ॥

न तु द्विजोऽयं भविता नरोत्तमः पतिः पृथिव्या इति मे मनोगतम् । न चास्य दासो न रथो न कुञ्जरः समीपतो भ्राजति चायमिन्द्रवत् ॥ ६ ॥

इनका वेश तो ब्राह्मणका- सा है, किंतु ये ब्राह्मण नहीं हो सकते । ये नरश्रेष्ठ तो कहींके भूपति ही होंगे; ऐसा विचार मेरे मनमें उठ रहा है । परंतु इनके साथ दास, रथ और हाथी-घोड़े आदि कुछ भी नहीं हैं । फिर भी ये निकटसे इन्द्रके समान सुशोभित हो रहे हैं ॥ ६ ॥

शरीरलिङ्गैरुपसूचितो ह्ययं मूर्द्धाभिषिक्त इति मे मनोगतम् । समीपमायाति च मे गतव्यथो यथा गजस्तामरसीं मदोत्कटः ॥ ७ ॥

' इनके शरीरमें जो लक्षण दृष्टिगोचर हो रहे हैं, उनसे यह सूचित होता है कि ये मूर्द्धाभिषिक्त सम्राट् हैं । मेरे मनमें तो यही बात आती है । जैसे मतवाला हाथी बेखटके किसी कमलिनीके पास जाता हो, उसी प्रकार ये बिना किसी संकोचके - व्यथारहित होकर मेरी सभामें आ रहे हैं ' ॥ ७ ॥

वितर्कयन्तं तु नरर्षभस्तथा युधिष्ठिरोऽभ्येत्य विराटमब्रवीत् । सम्राड्विजानात्विह जीवनार्थिनं विनष्टसर्वस्वमुपागतं द्विजम् ॥ ८ ॥

पृष्ठ 2163

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इस प्रकार तर्क - वितर्कमें पड़े हुए राजा विराटके पास आकर नरश्रेष्ठ युधिष्ठिरने कहा -'महाराज! आपको विदित हो; मैं एक ब्राह्मण हूँ, मेरा सर्वस्व नष्ट हो गया है; अतः मैं आपके यहाँ जीवननिर्वाहके लिये आया हूँ ॥ ८ ॥

इहाहमिच्छामि तवानघान्तिके वस्तुं यथा कामचरस्तथा विभो । तमब्रवीत् स्वागतमित्यनन्तरं राजा प्रहृष्टः प्रतिसंगृहाण च ॥ ९ ॥

तं राजसिंहं प्रतिगृह्य राजा प्रीत्याऽऽत्मना चैनमिदं बभाषे । कामेन ताताभिवदाम्यहं त्वां कस्यासि राज्ञो विषयादिहागतः ॥ १० ॥

' अनघ! मैं यहाँ आपके समीप रहना चाहता हूँ । प्रभो! जैसी आपकी इच्छा होगी, उसी प्रकार सब कार्य करते हुए मैं यहाँ रहूँगा । ' युधिष्ठिरकी बात सुनकर राजा विराट बहुत प्रसन्न हुए और बोले — ‘ ब्रह्मन्! आपका स्वागत है । ' तदनन्तर उन्होंने राजाओंमें श्रेष्ठ युधिष्ठिरको सादर ग्रहण किया । ग्रहण करके राजा विराटने प्रसन्न मनसे उनसे इस प्रकार कहा — ‘ तात! मैं प्रेमपूर्वक आपसे पूछता हूँ, आप इस समय किस राजाके राज्यसे यहाँ आये हैं? ॥ ९ -१० ॥

पृष्ठ 2164

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गोत्रं च नामापि च शंस तत्त्वतः किं चापि शिल्पं तव विद्यते कृतम् ॥ ११ ॥

' अपने गोत्र और नाम भी ठीक -ठीक बताइये । साथ ही यह भी कहें कि आपने किस विद्या या कलामें कुशलता प्राप्त की है ॥ ११ ॥

युधिष्ठिरउवाच युधिष्ठिरस्यासमहं पुरा सखा वैयाघ्रपद्यः पुनरस्मि विप्रः । अक्षान् प्रयोक्तुं कुशलोऽस्मि देविनां कङ्केति नाम्नास्मि विराट विश्रुतः ॥ १२ ॥

युधिष्ठिरने कहा - महाराज विराट! मैं वैयाघ्रपद - गोत्रमें उत्पन्न हुआ ब्राह्मण हूँ । लोगोंमें ‘ कंक' नामसे मेरी प्रसिद्धि है । मैं पहले राजा युधिष्ठिरके साथ रहता था । वे मुझे अपना सखा मानते थे । मैं चौसर खेलनेवालोंके बीच पासे फेंकनेकी कलामें कुशल हूँ ॥ १२ ॥

विराट उवाच

पृष्ठ 2165

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ददामि ते हन्त वरं यमिच्छसि प्रशाधि मत्स्यान् वशगो ह्यहं तव । प्रियाश्च धूर्ता मम देविनः सदा भवांश्च देवोपम राज्यमर्हति ॥ १३ ॥

विराट बोले — ब्रह्मन्! मैं आपको वर देता हूँ, आप जो चाहें, माँग लें । समूचे मत्स्यदेशपर शासन करें । मैं आपके वशमें हूँ; क्योंकि द्यूतक्रीडामें निपुण, चतुर, चालाक

मनुष्य मुझे सदा प्रिय हैं । देवोपम ब्राह्मण! आप तो राज्य पानेके योग्य हैं ॥ १३ ॥

युधिष्ठिरउवाच प्राप्तो विवादः प्रथमं विशाम्पते न विद्यते कंचन मत्स्य हीनतः । न मे जितः कश्चन धारयेद् धनं व ममैषोऽस्तु तव प्रसादजः ॥ १४ ॥

युधिष्ठिरने कहा — मत्स्यराज! नरनाथ! मुझे किसी हीन वर्णके मनुष्यसे विवाद न करना पड़े, यह मैं पहला वर माँगता हूँ तथा मुझसे पराजित होनेवाला कोई भी मनुष्य हारे हुए धनको अपने पास न रखे ( मुझे दे दे ) । आपकी कृपासे यह दूसरा वर मुझे प्राप्त हो जाय, तो मैं रह सकता हूँ ॥ १४ ॥

विराट उवाच हन्यामवश्यं यदि तेऽप्रियं चरेत् प्रव्राजयेयं विषयाद् द्विजांस्तथा । शृण्वन्तु मे जानपदाः समागताः कङ्को यथाहं विषये प्रभुस्तथा ॥ १५ ॥

विराट बोले — ब्रह्मन्! यदि कोई ब्राह्मणेतर मनुष्य आपका अप्रिय करेगा तो उसे मैं निश्चय ही प्राण- दण्ड दूँगा । यदि ब्राह्मणोंने आपका अपराध किया तो उन्हें देशसे निकाल दूँगा । [ युधिष्ठिरसे ऐसा कहकर राजा विराट अन्य सभासदोंसे बोले - ] मेरे राज्यमें निवास करनेवाले और इस सभामें आये हुए लोगो! मेरी बात सुनो, जैसे मैं इस मत्स्यदेशका स्वामी हूँ, वैसे ही ये कंक भी हैं ॥ १५ ॥

समानयानो भवितासि मे सखा प्रभूतवस्त्रो बहुपानभोजनः । पश्येस्त्वमन्तश्च बहिश्च सर्वदा कृतं च ते द्वारमपावृतं मया ॥ १६ ॥

[ फिर वे युधिष्ठिरसे बोले- ] कंक! आजसे आप मेरे सखा हैं । जैसी सवारीमें मैं चलता हूँ, वैसी ही आपको भी मिलेगी । पहननेके वस्त्र और भोजन-पान आदिका प्रबन्ध भी

पृष्ठ 2166

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आपके लिये पर्याप्त मात्रामें रहेगा । बाहरके राज्य-कोश, उद्यान और सेना आदि तथा भीतरके धन-दारा आदिकी भी देख- भाल आप ही करें । मेरे आदेशसे आपके लिये राजमहलका द्वार सदा खुला रहेगा; आपसे कोई परदा नहीं रखा जायगा ॥ १६ ॥

ये त्वानुवादेऽयुरवृत्तिकर्शिता ब्रूयाश्च तेषां वचनेन मां सदा । दास्यामि सर्वं तदहं न संशयो न ते भयं विद्यति संनिधौ मम ॥ १७ ॥

जो लोग जीविकाके अभावमें कष्ट पा रहे हों और अनुवादके लिये अर्थात् पहलेके स्थायी तौरपर दिये हुए खेत और बगीचे आदिको पुनः उपयोगमें लानेके निमित्त नूतन राजाज्ञा प्राप्त करनेके लिये आपके पास आवें, उनके अनुरोधपूर्ण वचनसे आप सदा उनकी प्रार्थना मुझे सुना सकते हैं। विश्वास रखिये, आपके कथनानुसार उन याचकोंको मैं सब कुछ दूँगा; इसमें संशय नहीं है । आपको मेरे पास आने या कुछ कहने में भयभीत होनेकी आवश्यकता नहीं है ॥ १७ ॥

वैशम्पायन उवाच (एवं तु राज्ञः प्रथमः समागमो बभूव मात्स्यस्य युधिष्ठिरस्य च । विराटराजस्य हि तेन संगमो बभूव विष्णोरिव वज्रपाणिना ॥ वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! इस प्रकार वहाँ राजा युधिष्ठिर तथा मत्स्यनरेशकी प्रथम भेंट हुई । जैसे भगवान् विष्णुका वज्रधारी इन्द्रसे मिलन हुआ हो, उसी प्रकार विराटनरेशका राजा युधिष्ठिरके साथ समागम हुआ । तमासनस्थं प्रियरूपदर्शनं निरीक्षमाणो न ततर्प भूमिपः । सभां च तां प्रज्वलयन् युधिष्ठिरः श्रिया यथा शक्र इव त्रिविष्टपम् ॥ ) युधिष्ठिरके स्वरूपका दर्शन विराटराजको बहुत प्रिय लगा । जब वे आसनपर बैठ गये, तब राजा विराट उन्हें एकटक निहारने लगे । उनके दर्शनसे वे तृप्त ही नहीं होते थे । जैसे इन्द्र अपनी कान्तिसे स्वर्गकी शोभा बढ़ाते हैं, उसी प्रकार राजा युधिष्ठिर उस सभाको प्रकाशित कर रहे थे । एवं स लब्ध्वा तु वरं समागमं विराटराजेन नरर्षभस्तदा । उवास धीरः परमार्चितः सुखी

पृष्ठ 2167

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न चापि कश्चिच्चरितं बुबोध तत् ॥ १८ ॥

धीर स्वभाववाले नरश्रेष्ठ युधिष्ठिर उस समय राजा विराटके साथ इस प्रकार अच्छे

ढंगसे मिलकर और उनके द्वारा परम आदर- सत्कार पाकर वहाँ सुखपूर्वक रहने लगे ।

उनका वह चरित्र किसीको भी मालूम नहीं हुआ ॥ १८ ॥

इति श्रीमहाभारते विराटपर्वणि पाण्डवप्रवेशपर्वणि युधिष्ठिरप्रवेशो नाम सप्तमोऽध्यायः ॥ ७ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत विराटपर्वके अन्तर्गत पाण्डवप्रवेशपर्वमें युधिष्ठिरप्रवेशविषयक सातवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ७ ॥

( दाक्षिणात्य अधिक पाठके १२ श्लोक मिलाकर कुल ३० श्लोक हैं । )

पृष्ठ 2168

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अष्टमोऽध्यायः भीमसेनका राजा विराटकी सभामें प्रवेश और राजाके द्वारा आश्वासन पाना वैशम्पायन उवाच

अथापरो भीमबलः श्रियाज्वल- नुपाययौ सिंहविलासविक्रमः ।

खजां च दर्बी च करेण धारय- न्नसिं च कालाङ्गमकोशमव्रणम् ॥ १ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं -जनमेजय! तदनन्तर द्वितीय पाण्डव भयंकर बलशाली भीमसेन सिंहकी- सी मस्त चालसे चलते हुए राजाके दरबारमें आये । वे अपने सहज तेजसे प्रकाशित हो रहे थे । उन्होंने हाथमें मथानी, करछी और शाक काटनेके लिये एक काले रंगका तीखी धारवाला छुरा ले रखा था । उनका वह छुरा टूटा - फूटा न था और न उसके ऊपर कोई आवरण था ॥ १ ॥

स सूदरूपः परमेण वर्चसा

रविर्यथा लोकमिमं प्रकाशयन् ।

स कृष्णवासा गिरिराजसारवां- स्तं मत्स्यराजं समुपेत्य तस्थिवान् ॥ २ ।

वे यद्यपि रसोइयेके वेशमें थे, तो भी अपने उत्कृष्ट तेजसे इस लोकको प्रकाशित करनेवाले सूर्यदेवकी भाँति सुशोभित हो रहे थे । उनके वस्त्र काले थे और उनका शरीर

पर्वतराज मेरुके समान सुदृढ़ था । वे मत्स्यराज विराटके समीप आकर खड़े हो गये ॥ २ ॥

तं प्रेक्ष्य राजा रमयन्नुपागतं ततोऽब्रवीज्जानपदान् समागतान् । सिंहोन्नतांसोऽयमतीव रूपवान् प्रदृश्यते को नु नरर्षभो युवा ॥ ३ ॥

अपने पास आये हुए भीमसेनको देखकर उन्हें प्रसन्न करते हुए राजा विराट मत्स्य जनपदके निवासी समागत सभासदोंसे बोले – ' सिंहके समान ऊँचे कंधोंवाला और मनुष्योंमें श्रेष्ठ यह जो अत्यन्त रूपवान् युवक दिखायी दे रहा है; कौन है? ॥ ३ ॥

अदृष्टपूर्वः पुरुषो रविर्यथा वितर्कयन् नास्य लभामि निश्चयम् । तथास्य चित्तं ह्यपि संवितर्कयन्

पृष्ठ 2169

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नरर्षभस्यास्य न यामि तत्त्वतः ॥ ४ ॥

‘ आजसे पहले कभी इसका दर्शन नहीं हुआ है । यह वीर पुरुष सूर्यके समान तेजस्वी है । मैं बहुत सोच - विचारकर भी इसके विषयमें किसी निश्चयपर नहीं पहुँच पाता । यहाँ आनेमें इस श्रेष्ठ पुरुषका आन्तरिक अभिप्राय क्या है? इसपर भी मैंने बहुत तर्क - वितर्क किया है; परंतु किसी वास्तविक परिणामतक नहीं पहुँच पा रहा हूँ ॥ ४ ॥

दृष्ट्वैव चैनं तु विचारयाम्यहं गन्धर्वराजो यदि वा पुरंदरः । जीतकोऽयं मम दर्शने स्थितो यदीप्सितं तल्लभतां च मा चिरम् ॥ ५ ॥

‘ इसे देखकर ही मैं सोचने लगा हूँ कि यह गन्धर्वराज हैं या देवराज इन्द्र? मेरी दृष्टिके सामने खड़ा हुआ यह युवक कौन है, इसका पता लगाओ और यह जो कुछ पाना चाहता हो, वह सब इसे मिल जाना चाहिये; इसमें विलम्ब नहीं होना चाहिये ' ॥ ५ ॥

विराटवाक्येन च तेन चोदिता नरा विराटस्य सुशीघ्रगामिनः । उपेत्य कौन्तेयमथाब्रुवंस्तदा यथा स राजावदताच्युतानुजम् ६ ॥ राजा विराटके पूर्वोक्त आदेशसे प्रेरित हो दरबारीलोग शीघ्रतापूर्वक धर्मराज युधिष्ठिरके छोटे भाई कुन्तीपुत्र भीमसेनके समीप गये तथा राजाने जैसे कहा था, उसी प्रकार उनका परिचय पूछा ॥ ६ ॥

ततो विराटं समुपेत्य पाण्डव- स्त्वदीनरूपं वचनं महामनाः । उवाच सूदोऽस्मि नरेन्द्र बल्लवो भजस्व मां व्यञ्जनकारमुत्तमम् ॥ ७ ॥

तब महामना पाण्डुनन्दन भीम विराटके अत्यन्त निकट जाकर दीनतारहित वाणीमें बोले — ‘ नरेन्द्र! मैं रसोइया हूँ। मेरा नाम बल्लव है । मैं बहुत उत्तम व्यंजन बनाता हूँ । आप मुझे अपने यहाँ इस कार्यके लिये रख लीजिये' ॥ ७ ॥

विराट उवाच न सूदतां बल्लव श्रद्दधामि ते सहस्रनेत्रप्रतिमो विराजसे । श्रिया च रूपेण च विक्रमेण च प्रभाससे त्वं नृवरो नरेष्विव ॥ ८ ॥

पृष्ठ 2170

महाभारत — खण्ड २, पृष्ठ 2170 का मूल पृष्ठ
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विराट बोले — बल्लव! तुम रसोइये हो, इस बातपर मुझे विश्वास नहीं होता । तुम तो इन्द्रके समान तेजस्वी दिखायी देते हो। अपने अद्भुत रूप, दिव्य शोभा और महान् पराक्रमसे तुम मनुष्योंमें कोई श्रेष्ठ पुरुष अथवा राजा प्रतीत होते हो ॥ ८ ॥

भीम उवाच नरेन्द्र सूदः परिचारकोऽस्मि ते जानामि सूपान् प्रथमं च केवलान् । आस्वादिता ये नृपते पुराभवन् युधिष्ठिरेणापि नृपेण सर्वशः ॥ ९ ॥

भीमसेनने कहा — महाराज! मैं रसोई बनानेवाला आपका सेवक हूँ। मैं भाँति - भाँतिके व्यंजन बनाना जानता हूँ जिनका बनाना केवल मुझे ही ज्ञात है। मेरे बनाये हुए व्यंजन उत्तम श्रेणीके होते हैं । राजन्! पहले महाराज युधिष्ठिरने भी उन सब प्रकारके व्यंजनोंका आस्वादन किया है ॥ ९ ॥

बलेन तुल्यश्च न विद्यते मया नियुद्धशीलश्च सदैव पार्थिव । गजैश्च सिंहैश्च समेयिवानहं सदा करिष्यामि तवानघ प्रियम् ॥ १० ॥