श्रीगणेशाय नमः।

महाभारत — खण्ड २ — पृष्ठ 2151–2160

महाभारत — खण्ड २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 2151–2160

पृष्ठ 2151

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येन वीरः कुरुक्षेत्रमभ्यरक्षत् परंतपः ।

अमुञ्चद् धनुषस्तस्य ज्यामक्षय्यां युधिष्ठिरः ॥ २० ॥

परंतप वीर युधिष्ठिरने जिसके द्वारा समूचे कुरुक्षेत्रकी रक्षा की थी, उस धनुषकी अक्षय डोरीको उन्होंने भी उतार दिया ॥ २० ॥

पाञ्चालान् येन संग्रामे भीमसेनोऽजयत् प्रभुः ।

प्रत्यषेधद् बहूनेकः सपत्नांश्चैव दिग्जये ॥ २१ ॥

निशम्य यस्य विस्फारं व्यद्रवन्त रणात् परे ।

पर्वतस्येव दीर्णस्य विस्फोटमशनेरिव ॥ २२ ॥

सैन्धवं येन राजानं पर्यामुषितवानथ ।

ज्यापाशं धनुषस्तस्य भीमसेनोऽवतारयत् ॥ २३ ॥

भीमसेनने जिसके द्वारा पांचाल वीरोंपर विजय पायी थी, दिग्विजयके समय उन्होंने अकेले ही जिसकी सहायतासे बहुतेरे शत्रुओंको परास्त किया था, वज्रके फटने और पर्वतके विदीर्ण होनेके समान जिसका भयंकर टंकार सुनकर कितने ही शत्रु युद्ध छोड़कर भाग खड़े हुए तथा जिसके सहयोगसे उन्होंने सिन्धुराज जयद्रथको परास्त किया था, अपने उसी धनुषकी प्रत्यंचा भीमसेनने भी उतार दिया ॥ २१–२३ ॥

अजयत् पश्चिमामाशां धनुषा येन पाण्डवः ।

माद्रीपुत्रो महाबाहुस्ताम्रास्यो मितभाषिता ॥ २४ ॥

तस्य मौर्वीमपाकर्षच्छूरः संक्रन्दनो युधि ।

कुले नास्ति समो रूपे यस्येति नकुलः स्मृतः ॥ २५ ॥

जिनका मुख ताँबेके समान लाल था, जो बहुत कम बोलते थे, उन महाबाहु माद्रीनन्दन नकुलने दिग्विजयके समय जिस धनुषकी सहायतासे पश्चिम दिशापर विजय प्राप्त की थी, समूचे कुरुकुलमें जिनके समान दूसरा कोई रूपवान् न होनेके कारण जिन्हें नकुल कहा जाता था, जो युद्धमें शत्रुओंको रुलानेवाले शूर- वीर थे; उन वीरवर नकुलने भी अपने पूर्वोक्त धनुषकी प्रत्यंचा उतार दी ॥ २४-२५ ॥

दक्षिणां दक्षिणाचारो दिशं येनाजयत् प्रभुः ।

अपज्यमकरोद् वीरः सहदेवस्तदायुधम् ॥ २६ ॥

शास्त्रानुकूल तथा उदार आचार- विचारवाले शक्तिशाली वीर सहदेवने भी जिसकी सहायतासे दक्षिण दिशाको जीता था, उस धनुषकी डोरी उतार दी ॥ २६ ॥

खड्गांश्च दीप्तान् दीर्घाश्च कलापांश्च महाधनान् ।

विपाठान् क्षुरधारांश्च धनुर्भिर्निदधुः सह ॥ २७ ॥

धनुषोंके साथ- साथ पाण्डवोंने बड़े - बड़े एवं चमकीले खड्ग, बहुमूल्य तूणीर, छुरेके समान तीखी धारवाले क्षुरधार और विपाठ नामक बाण भी रख दिये ॥ वैशम्पायन उवाच

पृष्ठ 2152

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अथान्वशासन्नकुलं कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः ।

आरुह्येमां शमीं वीर धनूंष्येतानि निक्षिप ॥ २८ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं - राजन्! तदनन्तर कुन्तीनन्दन युधिष्ठिरने नकुलको आज्ञा दी — -' वीर! तुम इस शमीपर चढ़कर ये धनुष आदि अस्त्र- शस्त्र रख दो ' ॥ २८ ॥

तामुपारुह्य नकुलो धनूंषि निदधे स्वयम् ।

यानि तस्यावकाशानि दिव्यरूपाण्यमन्यत ॥ २ ९ ॥

तब नकुलने उस वृक्षपर चढ़कर उसके खोंखलोंमें वे धनुष आदि आयुध स्वयं अपने हाथसे रखे । उसके जो खोखले थे, वे नकुलको दिव्यरूप जान पड़े ॥ २ ९ ॥

यत्र चापश्यत स वै तिरोवर्षाणि वर्षति ।

तत्र तानि दृढैः पाशैः सुगाढं पर्यबन्धत ॥ ३० ॥

क्योंकि उन्होंने देखा, वहाँ मेघ तिरछी वृष्टि करता है ( जिससे खोंखलोंमें पानी नहीं पड़ता) । उन्हींमें उन आयुधोंको रखकर मजबूत रस्सियोंसे उन्हें अच्छी तरह बाँध दिया ॥ ३० ॥

शरीरं च मृतस्यैकं समबध्नन्त पाण्डवाः ।

विवर्जयिष्यन्ति नरा दूरादेव शमीमिमाम् ॥ ३१ ॥

आबद्धं शवमत्रेति गन्धमाघ्राय पूतिकम् ।

पृष्ठ 2153

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अशीतिशतवर्षेयं माता न इति वादिनः ॥ ३२ ॥

कुलधर्मोऽयमस्माकं पूर्वैराचरितोऽपि वा ।

समासज्ज्याथ वृक्षेऽस्मिन्निति वै व्याहरन्ति ते ॥ ३३ ॥

आगोपालाविपालेभ्य आचक्षाणाः परंतपाः ।

आजग्मुर्नगराभ्याशं पार्थाः शत्रुनिबर्हणाः ॥ ३४ ॥

इसके बाद पाण्डवोंने एक मृतकका शव लाकर उस वृक्षकी शाखामें बाँध दिया । उसे बाँधनेका उद्देश्य यह था कि इसकी दुर्गन्ध नाकमें पड़ते ही लोग समझ लेंगे कि इसमें सड़ी लाश बँधी है; अतः दूरसे ही वे इस शमीवृक्षको त्याग देंगे । परंतप पाण्डव इस प्रकार उस शमीवृक्षपर शव बाँधकर उस वनमें गाय चरानेवाले - ग्वालों और भेड़ पालनेवाले गड़रियोंसे शव बाँधनेका कारण बताते हुए इस प्रकार कहते थे- ' यह एक सौ अस्सी वर्षकी हमारी माता है । हमारे कुलका यह धर्म है, इसलिये ऐसा किया है । हमारे पूर्वज भी ऐसा ही करते आये हैं । ’ * इस प्रकार शत्रुओंका संहार करनेवाले वे कुन्तीपुत्र नगरके निकट आ पहुँचे ॥ ३१–३४ ॥

जयो जयन्तो विजयो जयत्सेनो जयद्बलः ।

इति गुह्यानि नामानि चक्रे तेषां युधिष्ठिरः ॥ ३५ ॥

तब युधिष्ठिरने क्रमशः पाँचों भाइयोंके जय, जयन्त, विजय, जयत्सेन और जयद्बल— ये गुप्त नाम रखे ॥ ३५ ॥

ततो यथाप्रतिज्ञाभिः प्राविशन् नगरं महत् ।

अज्ञातचर्यां वत्स्यन्तो राष्ट्रे वर्षं त्रयोदशम् ॥ ३६ ॥

तत्पश्चात् उन्होंने अपनी प्रतिज्ञाके अनुसार तेरहवें वर्षका अज्ञातवास पूर्ण करनेके लिये मत्स्यराष्ट्रके उस विशाल नगरमें प्रवेश किया ॥ ३६ ॥

इति श्रीमहाभारते विराटपर्वणि पाण्डवप्रवेशपर्वणि पुरप्रवेशे अस्त्रसंस्थापने पञ्चमोऽध्यायः ॥ ५ ॥

इसप्रकार श्रीमहाभारत विराटपर्वके अन्तर्गत पाण्डवप्रवेशपर्वमें नगरप्रवेशके लिये अस्त्रस्थापनविषयक पाँचवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ५ ॥

पाण्डवलोग शव बँधी हुई शाखाकी ओर अँगुलीसे संकेत करके कहते थे—' यह हमारी माता है । ' वे अपने आयुधोंकी रक्षा करनेके कारण शमीको ही अपनी माता मानते थे और उसीकी ओर उनका वास्तविक संकेत था । शव-बन्धनके व्याजसे वे अस्त्र- संरक्षणको ही पूर्वजोंद्वारा आचरित कुलधर्म घोषित करते थे ।

पृष्ठ 2154

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षष्ठोऽध्यायः युधिष्ठिरद्वारा दुर्गादेवीकी स्तुति और देवीका प्रत्यक्ष प्रकट होकर उन्हें वर देना वैशम्पायन उवाच

विराटनगरं रम्यं गच्छमानो युधिष्ठिरः ।

अस्तुवन्मनसा देवीं दुर्गां त्रिभुवनेश्वरीम् ॥ १ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं - राजन्! विराटके रमणीय नगरमें प्रवेश करते समय महाराज युधिष्ठिरने मन- ही- मन त्रिभुवनकी अधीश्वरी दुर्गादेवीका इस प्रकार स्तवन किया— ॥ १ ॥

यशोदागर्भसम्भूतां नारायणवरप्रियाम् ।

नन्दगोपकुले जातां मङ्गल्यां कुलवर्धिनीम् ॥ २ ॥

कंसविद्रावणकरीमसुराणां क्षयंकरीम् ।

शिलातटविनिक्षिप्तामाकाशं प्रति गामिनीम् ॥ ३ ॥

वासुदेवस्य भगिनीं दिव्यमाल्यविभूषिताम् ।

दिव्याम्बरधरां देवीं खड्गखेटकधारिणीम् ॥ ४ ॥

‘ जो यशोदाके गर्भसे प्रकट हुई है, जो भगवान् नारायणको अत्यन्त प्रिय है, नन्दगोपके कुलमें जिसने अवतार लिया है, जो सबका मंगल करनेवाली तथा कुलको बढ़ानेवाली है, जो कंसको भयभीत करनेवाली और असुरोंका संहार करनेवाली है, कंसके द्वारा पत्थरकी शिलापर पटकी जानेपर जो आकाशमें उड़ गयी थी, जिसके अंग दिव्य गन्धमाला एवं आभूषणोंसे विभूषित हैं, जिसने दिव्य वस्त्र धारण कर रखा है, जो हाथोंमें ढाल और तलवार धारण करती है, वसुदेवनन्दन श्रीकृष्णकी भगिनी उस दुर्गादेवीका मैं चिन्तन करता हूँ ॥ २–४ ॥

भारावतरणे पुण्ये ये स्मरन्ति सदाशिवाम् ।

तान् वै तारयसे पापात् पङ्के गामिव दुर्बलाम् ॥ ५ ॥

‘ पृथ्वीका भार उतारनेवाली पुण्यमयी देवि! तुम सदा सबका कल्याण करनेवाली हो । जो लोग तुम्हारा स्मरण करते हैं, निश्चय ही तुम उन्हें पाप और उसके फलस्वरूप होनेवाले दुःखसे उबार लेती हो; ठीक उसी तरह, जैसे कोई पुरुष कीचड़में फँसी हुई दुर्बल गायका उद्धार कर देता है ' ॥ ५ ॥

स्तोतुं प्रचक्रमे भूयो विविधैः स्तोत्रसम्भवैः ।

आमन्त्र्य दर्शनाकाङ्क्षी राजा देवीं सहानुजः ॥ ६ ॥

नमोऽस्तु वरदे कृष्णे कुमारि ब्रह्मचारिणि ।

पृष्ठ 2155

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बालार्कसदृशाकारे पूर्णचन्द्रनिभानने ॥ ७ ॥

तत्पश्चात् भाइयोंसहित राजा युधिष्ठिरने देवीके दर्शनकी अभिलाषा रखकर नाना प्रकारके स्तुतिपरक नामोंद्वारा उन्हें सम्बोधित करके पुनः उनकी स्तुति प्रारम्भ की -' इच्छानुसार उत्तम वर देनेवाली देवि! तुम्हें नमस्कार है । सच्चिदानन्दमयी कृष्णे! तुम

कुमारी और ब्रह्मचारिणी हो । तुम्हारी अंगकान्ति प्रभातकालीन सूर्यके सदृश लाल है ।

तुम्हारा मुख पूर्णिमाके चन्द्रमाकी भाँति आह्लाद प्रदान करनेवाला है ॥ ६-७ ॥

चतुर्भुजे चतुर्वक्त्रे पीनश्रोणिपयोधरे ।

मयूरपिच्छवलये केयूराङ्गदधारिणि ।

भासि देवि यथा पद्मा नारायणपरिग्रहः ॥ ८ ॥

स्वरूपं ब्रह्मचर्यं च विशदं गगनेश्वरी ।

कृष्णच्छविसमा कृष्णा संकर्षणसमानना ॥ ९ ॥

‘ तुम चार भुजाओंसे सुशोभित विष्णुरूपा और चार मुखोंसे अलंकृत ब्रह्मस्वरूपा हो । तुम्हारे नितम्ब और उरोज पीन हैं । तुमने मोरपंखका कंगन धारण किया है तथा केयूर और अंगद पहन रखे हैं । देवि! भगवान् नारायणकी धर्मपत्नी लक्ष्मीजीके समान तुम्हारी शोभा हो रही है । आकाशमें विचरनेवाली देवि! तुम्हारा स्वरूप और ब्रह्मचर्य परम उज्ज्वल है । श्यामसुन्दर श्रीकृष्णकी छबिके समान तुम्हारी श्याम कान्ति है, इसीलिये तुम कृष्णा कहलाती हो । तुम्हारा मुख संकर्षणके समान है ॥

बिभ्रती विपुलौ बाहू शक्रध्वजसमुच्छ्रयौ ।

पात्री च पङ्कजी घण्टी स्त्रीविशुद्धा च या भुवि ॥ १० ॥

पाशं धनुर्महाचक्रं विविधान्यायुधानि च ।

कुण्डलाभ्यां सुपूर्णाभ्यां कर्णाभ्यां च विभूषिता ॥ ११ ॥

चन्द्रविस्पर्द्धिना देवि मुखेन त्वं विराजसे ।

मुकुटेन विचित्रेण केशबन्धेन शोभिना ॥ १२ ॥

भुजङ्गाभोगवासेन श्रोणिसूत्रेण राजता ।

विभ्राजसे चाबद्धेन भोगेनेवेह मन्दरः ॥ १३ ॥

‘ तुम ( वर और अभय मुद्रा धारण करनेवाली) ऊपर उठी हुई दो विशाल भुजाओंको इन्द्रकी ध्वजाके समान धारण करती हो । तुम्हारे तीसरे हाथमें पात्र, चौथेमें कमल और पाँचवेंमें घण्टा सुशोभित है । छठे हाथमें पाश, सातवेंमें धनुष तथा आठवेंमें महान् चक्र शोभा पाता है । ये ही तुम्हारे नाना प्रकारके आयुध हैं । इस पृथ्वीपर स्त्रीका जो विशुद्ध स्वरूप है, वह तुम्हीं हो । कुण्डलमण्डित कर्णयुगल तुम्हारे मुखमण्डलकी शोभा बढ़ाते हैं । देवि! तुम चन्द्रमासे होड़ लेनेवाले मुखसे सुशोभित होती हो । तुम्हारे मस्तकपर विचित्र मुकुट है । बँधे हुए केशोंकी वेणी साँपकी आकृतिके समान कुछ और ही शोभा दे रही है ।

पृष्ठ 2156

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यहाँ कमरमें बँधी हुई सुन्दर करधनीके द्वारा तुम्हारी ऐसी शोभा हो रही है, मानो नागसे लपेटा हुआ मन्दराचल हो ॥ १०–१३ ॥

ध्वजेन शिखिपिच्छानामुच्छ्रितेन विराजसे ।

कौमारं व्रतमास्थाय त्रिदिवं पावितं त्वया ॥ १४ ॥

‘ तुम्हारी मयूरपिच्छसे चिह्नित ध्वजा आकाशमें ऊँची फहरा रही है । उससे तुम्हारी शोभा और भी बढ़ गयी है । तुमने ब्रह्मचर्यव्रत धारण करके तीनों लोकोंको पवित्र कर दिया है ॥ १४ ॥

तेन त्वं स्तूयसे देवि त्रिदशैः पूज्यसेऽपि च ।

त्रैलोक्यरक्षणार्थाय महिषासुरनाशिनि ।

प्रसन्ना मे सुरश्रेष्ठे दयां कुरु शिवा भव ॥ १५ ॥

‘देवि! इसीलिये सम्पूर्ण देवता तुम्हारी स्तुति और पूजा भी करते हैं । तीनों लोकोंकी रक्षाके लिये महिषासुरका नाश करनेवाली देवेश्वरी! मुझपर प्रसन्न होकर दया करो । मेरे लिये कल्याणमयी हो जाओ ॥ १५ ॥

जया त्वं विजया चैव संग्रामे च जयप्रदा ।

ममापि विजयं देहि वरदा त्वं च साम्प्रतम् ॥ १६ ॥

' तुम जया और विजया हो । तुम्हीं संग्राममें विजय देनेवाली हो, अतः मुझे भी विजय दो । इस समय तुम मेरे लिये वरदायिनी हो जाओ ॥ १६ ॥

विन्ध्ये चैव नगश्रेष्ठे तव स्थानं हि शाश्वतम् ।

कालि कालि महाकालि खड्गखट्वाङ्गधारिणि ॥ १७ ॥

‘ पर्वतोंमें श्रेष्ठ विन्ध्याचलपर तुम्हारा सनातन निवासस्थान है । काली! काली!! महाकाली!!! तुम खड्ग और खट्वांग धारण करनेवाली हो ॥ १७ ॥

कृतानुयात्रा भूतैस्त्वं वरदा कामचारिणि ।

भारावतारे ये च त्वां संस्मरिष्यन्ति मानवाः ॥ १८ ॥

प्रणमन्ति च ये त्वां हि प्रभाते तु नरा भुवि ।

न तेषां दुर्लभं किंचित् पुत्रतो धनतोऽपि वा ॥ १ ९ ॥

‘जो प्राणी तुम्हारा अनुसरण करते हैं, उन्हें तुम मनोवाञ्छित वर देती हो । इच्छानुसार विचरनेवाली देवि! जो मनुष्य अपने ऊपर आये हुए संकटका भार उतारनेके लिये तुम्हारा स्मरण करते हैं तथा जो मानव प्रतिदिन प्रातः काल तुम्हें प्रणाम करते हैं, उनके लिये इस पृथ्वीपर पुत्र अथवा धन- धान्य आदि कुछ भी दुर्लभ नहीं हैं ॥ १८-१९ ॥

दुर्गात् तारयसे दुर्गे तत् त्वं दुर्गा स्मृता जनैः ।

कान्तारेष्ववसन्नानां मग्नानां च महार्णवे ॥ २० ॥

दस्युभिर्वा निरुद्धानां त्वं गतिः परमा नृणाम् ।

जलप्रतरणे चैव कान्तारेष्वटवीषु च ॥ २१ ॥

पृष्ठ 2157

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ये स्मरन्ति महादेवि न च सीदन्ति ते नराः ।

त्वं कीर्तिः श्रीर्धृतिः सिद्धिर्होर्विद्या संततिर्मतिः ॥ २२ ॥

संध्या रात्रिः प्रभा निद्रा ज्योत्स्ना कान्तिः क्षमा दया ।

नृणां च बन्धनं मोहं पुत्रनाशं धनक्षयम् ॥ २३ ॥

व्याधिं मृत्युं भयं चैव पूजिता नाशयिष्यसि ।

सोऽहं राज्यात् परिभ्रष्टः शरणं त्वां प्रपन्नवान् ॥ २४ ॥

'दुर्गे! तुम दुःसह दुःखसे उद्धार करती हो, इसीलिये लोगोंके द्वारा दुर्गा कही जाती हो । जो दुर्गम वनमें कष्ट पा रहे हों, महासागरमें डूब रहे हों अथवा लुटेरोंके वशमें पड़ गये हों, उन सब मनुष्योंके लिये तुम्हीं परम गति हो- तुम्हीं उन्हें संकटसे मुक्त कर सकती हो । महादेवि! पानीमें तैरते समय, दुर्गम मार्गमें चलते समय और जंगलोंमें भटक जानेपर जो तुम्हारा स्मरण करते हैं, वे मनुष्य क्लेश नहीं पाते । तुम्हीं कीर्ति, श्री, धृति, सिद्धि, लज्जा, विद्या, संतति, मति, संध्या, रात्रि, प्रभा, निद्रा, ज्योत्स्ना, कान्ति, क्षमा और दया हो । तुम पूजित होनेपर मनुष्योंके बन्धन, मोह, पुत्रनाश और धननाशका संकट, व्याधि, मृत्यु और सम्पूर्ण भय नष्ट कर देती हो । मैं भी राज्यसे भ्रष्ट हूँ, इसलिये तुम्हारी शरणमें आया हूँ ॥

प्रणतश्च यथा मूर्ध्ना तव देवि सुरेश्वरि ।

त्राहि मां पद्मपत्राक्षि सत्ये सत्या भवस्व नः ॥ २५ ॥

‘ कमलदलके समान विशाल नेत्रोंवाली देवि! देवेश्वरि! मैं तुम्हारे चरणोंमें मस्तक रखकर प्रणाम करता हूँ। मेरी रक्षा करो । सत्ये! हमारे लिये वस्तुतः सत्यस्वरूपा बनो— अपनी महिमाको सत्य कर दिखाओ ॥

शरणं भव मे दुर्गे शरण्ये भक्तवत्सले ।

एवं स्तुता हि सा देवी दर्शयामास पाण्डवम् ॥ २६ ॥

उपगम्य तु राजानमिदं वचनमब्रवीत् । ‘ शरणागतोंकी रक्षा करनेवाली भक्तवत्सले दुर्गे! मुझे शरण दो । ' इस प्रकार स्तुति करनेपर देवी दुर्गाने पाण्डुनन्दन युधिष्ठिरको प्रत्यक्ष दर्शन दिया तथा राजाके पास आकर यह बात कही ॥ २६३ ॥

देव्युवाच शृणु राजन् महाबाहो मदीयं वचनं प्रभो ॥ २७ ॥

भविष्यत्यचिरादेव संग्रामे विजयस्तव ।

मम प्रसादान्निर्जित्य हत्वा कौरववाहिनीम् ॥ २८ ॥

राज्यं निष्कपटकं कृत्वा भोक्ष्यसे मेदिनीं पुनः ।

भ्रातृभिःसहितो राजन् प्रीतिं प्राप्स्यसि पुष्कलाम् ॥ २ ९ ॥

पृष्ठ 2158

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देवी बोली - महाबाहु राजा युधिष्ठिर! मेरी बात सुनो । समर्थ राजन्! शीघ्र ही तुम्हें संग्राममें विजय प्राप्त होगी । मेरे प्रसादसे कौरवसेनाको जीतकर उसका संहार करके तुम निष्कण्टक राज्य करोगे और पुनः इस पृथ्वीका सुख भोगोगे । राजन्! तुम्हें भाइयोंसहित पूर्ण प्रसन्नता प्राप्त होगी ॥ २७–२९ ॥

मत्प्रसादाच्च ते सौख्यमारोग्यं च भविष्यति ।

ये च संकीर्तयिष्यन्ति लोके विगतकल्मषाः ॥ ३० ॥

तेषां तुष्टा प्रदास्यामि राज्यमायुर्वपुः सुतम् ।

प्रवासे नगरे चापि संग्रामे शत्रुसंकटे ॥ ३१ ॥

अटव्यां दुर्गकान्तारे सागरे गहने गिरौ ।

ये स्मरिष्यन्ति मां राजन् यथाहं भवता स्मृता ॥ ३२ ॥

न तेषां दुर्लभं किंचिदस्मिँल्लोके भविष्यति ।

इदं स्तोत्रवरं भक्त्या शृणुयाद् वा पठेत वा ॥ ३३ ॥

तस्य सर्वाणि कार्याणि सिद्धिं यास्यन्ति पाण्डवाः ।

मत्प्रसादाच्च वः सर्वान् विराटनगरे स्थितान् ॥ ३४ ॥

न प्रज्ञास्यन्ति कुरवो नरा वा तन्निवासिनः ।

इत्युक्त्वा वरदा देवी युधिष्ठिरमरिंदमम् ।

रक्षां कृत्वा च पाण्डूनां तत्रैवान्तरधीयत ॥ ३५ ॥

मेरी कृपासे तुम्हें सुख और आरोग्य सुलभ होगा । लोकमें जो मनुष्य मेरा कीर्तन और स्तवन करेंगे, वे पापरहित होंगे और मैं संतुष्ट होकर उन्हें राज्य, बड़ी आयु, नीरोग शरीर और पुत्र प्रदान करूँगी । राजन्! जैसे तुमने मेरा स्मरण किया है, इसी प्रकार जो लोग परदेशमें रहते समय, नगरमें, युद्धमें, शत्रुओंद्वारा संकट प्राप्त होनेपर, घने जंगलोंमें, दुर्गम मार्गमें, समुद्रमें तथा गहन पर्वतपर भी मेरा स्मरण करेंगे, उनके लिये इस संसारमें कुछ भी दुर्लभ न होगा । पाण्डवो! जो इस उत्तम स्तोत्रको भक्तिभावसे सुनेगा या पढ़ेगा, उसके सम्पूर्ण कार्य सिद्ध हो जायँगे । मेरे कृपाप्रसादसे विराटनगरमें रहते समय तुम सब लोगोंको कौरवगण अथवा उस नगरके निवासी मनुष्य नहीं पहचान सकेंगे । शत्रुओंका दमन करनेवाले राजा युधिष्ठिरसे ऐसा कहकर वरदायिनी देवी दुर्गा पाण्डवोंकी रक्षाका भार ले वहीं अन्तर्धान हो गयी ॥ इति श्रीमहाभारते विराटपर्वणि पाण्डवप्रवेशपर्वणि दुर्गास्तवे षष्ठोऽध्यायः ॥ ६ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत विराटपर्वके अन्तर्गत पाण्डवप्रवेशपर्वमें दुर्गास्तोत्रविषयक छठा अध्याय पूराहुआ ॥ ६ ॥

पृष्ठ 2159

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सप्तमोऽध्यायः युधिष्ठिरका राजसभामें जाकर विराटसे मिलना और वहाँ आदरपूर्वक निवास पाना वैशम्पायन उवाच ( ततस्तु ते पुण्यतमां शिवां शुभां

महर्षिगन्धर्वनिषेवितोदकाम् ।

त्रिलोककान्तामवतीर्य जाह्नवी- मृषींश्च देवांश्च पितॄनतर्पयन् ॥

वैशम्पायनजी कहते है - राजन्! तदनन्तर पाण्डवोंने परम पवित्र, कल्याणमयी, मंगलस्वरूपा, त्रिभुवनकमनीया गंगामें, जिसके जलका महर्षि और गन्धर्वगण सदा सेवन करते हैं, उतरकर देवताओं, ऋषियों तथा पितरोंका तर्पण किया । वरप्रदानं ह्यनुचिन्त्य पार्थिवो हुताग्निहोत्रः कृतजप्यमङ्गलः । दिशं तथैन्द्रीमभितः प्रपेदिवान् कृताञ्जलिर्धर्ममुपाह्वयच्छनैः ॥ तत्पश्चात् राजा युधिष्ठिर अग्निहोत्र, जप और मंगलपाठ करके धर्मराजके दिये हुए वरदानका चिन्तन करते हुए पूर्व दिशाकी ओर चले और हाथ जोड़कर धीरे - धीरे धर्मराजका स्मरण करने लगे । युधिष्ठिर उवाच वरप्रदानं मम दत्तवान् पिता प्रसन्नचेता वरदः प्रजापतिः । लार्थिनो मे तृषितस्य सोदरा मया प्रयुक्ता विविशुर्जलाशयम् ॥ युधिष्ठिर बोले- मेरे पिता प्रजापति धर्म वरदायक देवता हैं । उन्होंने प्रसन्नचित्त होकर मुझे वर दिया है । मैंने प्याससे पीड़ित हो जलकी इच्छासे अपने भाइयोंको भेजा था । मेरी प्रेरणासे ही वे एक सरोवरमें उतरे । निपातिता यक्षवरेण ते वने महाहवे वज्रभृतेव दानवाः । मया च गत्वा वरदोऽभितोषितो विवक्षता प्रश्नसमुच्चयं गुरुः ॥

पृष्ठ 2160

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परंतु उस वनमें श्रेष्ठ यक्षके रूपमें आये हुए उन धर्मराजने मेरे भाइयोंको उसी प्रकार धराशायी कर दिया, जैसे वज्रधारी इन्द्र महान् संग्राममें दानवोंको मार गिराते हैं । तब मैंने वहाँ जाकर उनके प्रश्नोंका उत्तर दे उन वरदायक गुरुरूप पिताको संतुष्ट किया । स मे प्रसन्नो भगवान् वरं ददौ परिष्वजंश्चाह तथैव सौहृदात् । वृणीष्व यद् वाञ्छसि पाण्डुनन्दन स्थितोऽन्तरिक्षे वरदोऽस्मि पश्यताम् ॥ उस समय प्रसन्न हो भगवान् धर्मने बड़े स्नेहसे मुझे हृदयसे लगाया और वर देनेके लिये उद्यत हो मुझसे कहा — ‘ पाण्डुनन्दन! तुम जो कुछ चाहते हो, वह मुझसे माँग लो । मैं तुम्हें वर देनेके लिये आकाशमें खड़ा हूँ । मेरी ओर देखो । ' स वै मयोक्तो वरदः पिता प्रभुः सदैव मे धर्मरता मतिर्भवेत् । इमे च जीवन्तु ममानुजाः प्रभो वपुश्च रूपं च बलं तथाप्नुयुः ॥ तब मैंने अपने वरदायक पिता भगवान् धर्मराजसे कहा- ' प्रभो! मेरी बुद्धि सदा धर्ममें ही लगी रहे तथा ये मेरे छोटे भाई जीवित हो जायँ और पहले जैसा रूप, युवावस्था एवं बल प्राप्त कर लें । क्षमा च कीर्तिश्च यथेष्टतो भवेद् व्रतं च सत्यं च समाप्तिरेव च । वरो ममैषोऽस्तु यथानुकीर्तितो न तन्मृषा देववरो यदब्रवीत् ॥ ‘ हमलोगोंमें इच्छानुसार क्षमा और कीर्ति हो और हम अपने सत्यव्रतको पूर्ण कर लें; यही वर हमें प्राप्त होना चाहिये । ' जैसा कि मैंने बताया, वैसा ही वर उन्होंने दिया । देवेश्वर धर्मने जैसा कहा है, वह कभी मिथ्या नहीं हो सकता । वैशम्पायन उवाच

इत्येवमुक्त्वा धर्मात्मा धर्ममेवानुचिन्तयन् ।

तदैव तत्प्रसादेन रूपमेवाभजत् स्वकम् ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं - राजन्! ऐसा कहकर धर्मात्मा युधिष्ठिर उस समय धर्मका ही बार- बार चिन्तन करने लगे । तब धर्मदेवके प्रसादसे उन्होंने तत्काल अपने अभीष्ट स्वरूपको प्राप्त कर लिया । स वै द्विजातिस्तरुणस्त्रिदण्डधृक् कमण्डलूष्णीषधरोऽन्वजायत ।