श्रीगणेशाय नमः।
महाभारत — खण्ड २ — पृष्ठ 2241–2250
महाभारत — खण्ड २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 2241–2250
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योऽसौ त्वां कामसम्मत्तो दुर्लभामवमन्यते ॥ ५० ॥
सुदेष्णाने कहा – सुन्दर लटोंवाली सुन्दरी! यदि तुम्हारी सम्मति हो, तो मैं कीचकको मरवा डालूँ; जो कामसे उन्मत्त होकर तुझ जैसी दुर्लभ देवीका अपमान कर रहा है ॥ ५० ॥
सैरन्ध्र्युवाच
अन्ये चैनं वधिष्यन्ति येषामागः करोति सः ।
मन्ये चैवाद्य सुव्यक्तं यमलोकं गमिष्यति ॥ ५१ ॥
सैरन्ध्री बोली - महारानी! उसे दूसरे ही लोग मार डालेंगे, जिनका कि अपराध वह कर रहा है । मैं तो समझती हूँ, अब वह निश्चय ही यमलोककी यात्रा करेगा ॥ ५१ ॥
( भ्रातुः प्रयच्छ त्वरिता जीवश्राद्धं त्वमद्य वै ।
सुदृष्टं कुरु वै चैनं नासून् मन्ये धरिष्यति ॥
रानी! आज तुम अपने भाईके लिये शीघ्र ही जीवित श्राद्ध कर लो । उसके लिये आवश्यक दान दे लो । साथ ही उसे आँख भरकर अच्छी तरह देख लो । मेरा विश्वास है कि अब उसके प्राण नहीं रहेंगे ।
तेषां हि मम भर्तृणां पञ्चानां धर्मचारिणाम् ।
एक दुर्धर्षणोऽत्यर्थं बले चाप्रतिमो भुवि ॥
निर्मनुष्यमिमं लोकं कुर्यात् क्रुद्धो निशामिमाम् ।
न च संक्रुध्यते तावद् गन्धर्वः कामरूपधृक् ॥
मेरे पाँच धर्मात्मा पतियोंमेंसे एक अत्यन्त दुःसह एवं अमर्षशील वीर हैं । भूतलपर बलमें उनकी समानता करनेवाला दूसरा कोई नहीं है । वे कुपित होनेपर इस रातमें ही इस संसारको मनुष्योंसे शून्य कर सकते हैं । परंतु इच्छानुसार रूप धारण करनेवाले वे गन्धर्व न जाने क्यों अभीतक क्रोध नहीं कर रहे हैं । वैशम्पायन उवाच
सुदेष्णामेवमुक्त्वा तु सैरन्ध्री दुःखमोहिता ।
कीचकस्य वधार्थाय व्रतदीक्षामुपागमत् ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं -जनमेजय! रानी सुदेष्णासे ऐसा कहकर दुःखसे मोहित हुई सैरन्ध्रीने कीचकके वधके लिये व्रतकी दीक्षा ग्रहण की ।
अभ्यर्थिता च नारीभिर्मानिता च सुदेष्णया ।
न च स्नाति न चाश्नाति न पांसून् परिमार्जति ॥
दूसरी स्त्रियोंने उससे बहुत प्रार्थना की । रानी सुदेष्णाने भी उसे बहुत मनाया; तथापि न
वह स्नान करती, न भोजन करती और न अपने शरीरकी धूल ही झाड़ती थी ।
रुधिरक्लिन्नवदना बभूव रुदितेक्षणा ॥
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तां तथा शोकसंतप्तां दृष्ट्वा प्ररुदितां स्त्रियः ।
कीचकस्य वधं सर्वा मनोभिश्च शशंसिरे ॥
उसका मुँह रक्तसे भींगा हुआ था, आँखोंमें रुलाईके आँसू भरे हुए थे । उसे इस प्रकार शोकसे संतप्त होकर रोती देख सब स्त्रियाँ मन- ही -मन कीचकके वधकी इच्छा करने लगीं । जनमेजय उवाच
अहो दुःखतरं प्राप्ता कीचकेन पदा हता ।
प्रतिव्रता महाभागा द्रौपदी योषितां वरा ॥
जनमेजय बोले- विप्रवर! संसारकी युवतियोंमें श्रेष्ठ एवं पतिव्रता महाभागा द्रौपदीको कीचकने लात मार दी, इससे वह महान् दुःखमें डूब गयी । अहो! यह कितने कष्टकी बात है ।
दुःशलां मानयन्ती या भर्तृणां भगिनीं शुभाम् ।
नाशपत् सिन्धुराजं तं बलात्कारेण वाहिता ॥
जिस समय सिन्धुराज जयद्रथने बलपूर्वक उसका अपहरण किया था, उस समय उसने अपने पतियोंकी बहिन दुःशलाका सम्मान करते हुए वह कष्ट सह लिया और शुभलक्षणा सिन्धुराजको शाप नहीं दिया ।
किमर्थं धर्षणं प्राप्ता कीचकेन दुरात्मना ।
नाशपत् तं महाभागा कृष्णा पादेन ताडिता ॥
परंतु जब दुरात्मा कीचकने उसका तिरस्कार किया और उसे लातसे मारा, उस समय महाभागा कृष्णाने उस दुष्टको शाप क्यों नहीं दे दिया?।
तेजोराशिरियं देवी धर्मज्ञा सत्यवादिनी ।
केशपक्षे परामृष्टा मर्षयिष्यत्यशक्तवत् ॥
नैतत् कारणमल्पं हि श्रोतुकामोऽस्मि सत्तम ।
कृष्णायास्तु परिक्लेशान्मनो मे दूयते भृशम् ॥
देवी द्रौपदी तेजकी राशि थी । वह धर्मज्ञा और सत्यवादिनी थी । उसके - जैसी तेजस्विनी स्त्री अपने केश पकड़ लिये जानेपर असमर्थकी भाँति चुपचाप सह लेगी, यह सम्भव नहीं है । यदि उसने सह लिया तो इसका कोई छोटा कारण नहीं होगा । साधुशिरोमणे! मैं वह कारण सुनना चाहता हूँ । कृष्णाके क्लेशकी बात सुनकर मेरा मन अत्यन्त व्यथित हो रहा है ।
कस्य वंशे समुद्भूतः स च दुर्ललितो मुने ।
बलोन्मत्तः कथं चासीच्छ्यालो मात्स्यस्य कीचकः ॥
मुने! मत्स्यराजका साला दुष्ट कीचक किसके कुलमें उत्पन्न हुआ था? और वह बलसे उन्मत्त क्यों हो गया था? ।
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वैशम्पायन उवाच
त्वदुक्तोऽयमनुप्रश्नः कुरूणां कीर्तिवर्धन ।
एतत् सर्वं तथा वक्ष्ये विस्तरेणैव पार्थिव ॥
वैशम्पायनजीने कहा – कुरुकुलकी कीर्ति बढ़ानेवाले नरेश! तुम्हारा उठाया हुआ यह प्रश्न ठीक है । मैं यह सब विस्तारपूर्वक बताऊँगा ।
ब्राह्मण्यां क्षत्रियाज्जातः सूतो भवति पार्थिव ।
प्रातिलोम्येन जातानां स ह्येको द्विज एव तु ॥
राजन्! क्षत्रिय पिता और ब्राह्मणी मातासे उत्पन्न हुआ बालक ' सूत' कहलाता है । प्रतिलोमसंकर जातियोंमें अकेली यह सूत जाति ही द्विज कही गयी है ।
रथकारमितीमं हि क्रियायुक्तं द्विजन्मनाम् ।
क्षत्रियादवरं वैश्याद् विशिष्टमिति चक्षते ॥
द्विजोचित कर्मोंसे युक्त उस सूतको ही रथकार भी कहते हैं । इसे क्षत्रियसे हीन और वैश्यसे श्रेष्ठ बताते हैं ।
सह सूतेन सम्बन्धः कृतपूर्वो नरेश्वरैः ।
तथापि तैर्महीपाल राजशब्दो न लभ्यते ॥
राजन्! पहलेके नरेशोंने सूतजातिके साथ भी वैवाहिक सम्बन्ध स्थापित किया है, परंतु उन्हें राजाकी उपाधि नहीं प्राप्त होती थी ।
तेषां तु सूतविषयः सूतानां नामतः कृतः ।
उपजीव्य च यत् क्षत्रं लब्धं सूतेन तत् पुरा ॥
उनके लिये सूतोंके नामसे सूतराज्य ही नियत कर दिया गया था । वह राज्य
सूतजातिके एक पुरुषने किसी क्षत्रियकी सेवा करके ही प्राप्त किया था ।
सूतानामधिपो राजा केकयो नाम विश्रुतः ॥
राजकन्यासमुद्भूतः सारथ्येऽनुपमोऽभवत् । सुप्रसिद्ध केकय नामक राजा सूतोंके ही अधिपति थे । उनका जन्म किसी
क्षत्रियकन्याके गर्भसे हुआ था । वे सारथिके कर्ममेंअनुपम थे ।
पुत्रास्तस्य कुरुश्रेष्ठ मालव्यां जज्ञिरे तदा ॥
तेषामतिबलो ज्येष्ठः कीचकः सर्वजित् प्रभो । कुरुश्रेष्ठ! उनके मालवीके गर्भसे कई पुत्र उत्पन्न हुए । प्रभो! उन पुत्रोंमें कीचक ही सबसे बड़ा था। वह अत्यन्त बलवान् और सर्वविजयी योद्धा था ।
द्वितीयायां तु मालव्यां चित्रा ह्यवरजाभवत् ।
तां सुदेष्णेति वै प्राहुर्विराटमहिषीं प्रियाम् ॥
राजा केकयकी दूसरी रानी भी मालवकन्या ही थी । उसके गर्भसे चित्रा नामवाली कन्या उत्पन्न हुई, जो समस्त कीचकबन्धुओंकी छोटी बहिन थी । उसीको सुदेष्णा भी कहते
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हैं । वही आगे चलकर महाराज विराटकी प्यारी पटरानी हुई ।
तां विराटस्य मात्स्यस्य केकयः प्रददौ मुदा ।
सुरथायां मृतायां तु कौसल्यां श्वेतमातरि ॥
विराटकी बड़ी रानी कोसलदेशकी राजकुमारी सुरथा, जो श्वेतकी जननी थी, उसकी मृत्यु हो जानेपर केकय- नरेशने अपनी कन्या सुदेष्णाका विवाह मत्स्यराज विराटके साथ
प्रसन्नतापूर्वक कर दिया ।
सुदेष्णां महिषीं लब्ध्वा राजा दुःखमपानुदत् ॥
उत्तरं चोत्तरां चैव विराटात् पृथिवीपते ।
सुदेष्णा सुषुवे देवी कैकेयी कुलवृद्धये ॥
सुदेष्णाको महारानीके रूपमें पाकर राजा विराटका दुःख दूर हो गया । जनमेजय! केकयकुमारी रानी सुदेष्णाने राजा विराटसे अपने कुलकी वृद्धिके लिये उत्तर और उत्तरा नामक दो संतानोंको उत्पन्न किया ।
मातृष्वसृसुतां राजन् कीचकस्तामनिन्दिताम् ।
सदा परिचरन् प्रीत्या विराटे न्यवसत् सुखी ॥
राजन्! कीचक अपनी मौसीकी बेटी सती-साध्वी सुदेष्णाकी प्रेमपूर्वक परिचर्या करता हुआ विराटके यहाँ सुखपूर्वक रहने लगा ।
भ्रातरस्तस्य विक्रान्ताः सर्वे च तमनुव्रताः ।
विराटस्यैव संहृष्टा बलं कोशं च वर्धयन् ॥
उसके सभी पराक्रमी भाई कीचकके ही प्रेमी भक्त थे; अतः वे भी विराटके ही बल और कोषको बढ़ाते हुए प्रसन्नतापूर्वक वहाँ रहने लगे ।
कालेया नाम दैतेयाः प्रायशो भुवि विश्रुताः ।
जज्ञिरे कीचका राजन् बाणो ज्येष्ठस्ततोऽभवत् ॥
स हि सर्वास्त्रसम्पन्नो बलवान् भीमविक्रमः । कीचको नष्टमर्यादो बभूव भयदो नृणाम् । राजन्! कालेय नामक दैत्य ही, जो प्रायः इस भूमण्डलमें विख्यात थे, कीचकोंके रूपमें उत्पन्न हुए थे । कालेयोंमें बाण सबसे बड़ा था । वही सम्पूर्ण अस्त्र- शस्त्रोंसे सम्पन्न, भयंकर पराक्रमी और महाबली कीचक हुआ, जो धर्मकी मर्यादाको तोड़ने और मनुष्योंके
भयको बढ़ानेवाला था ।
तं प्राप्य बलसम्मत्तं विराटः पृथिवीपतिः ॥
जिगाय सर्वांश्च रिपून् यथेन्द्रो दानवानिव । उस बलोन्मत्त कीचककी सहायता पाकर जैसे इन्द्र दानवोंपर विजय पाते हैं, उसी प्रकार राजा विराटने भी समस्त शत्रुओंपर विजय प्राप्त की । मेखलांश्च त्रिगर्ताश्च दशार्णाश्च कशेरुकान् ।
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मालवान् यवनांश्चैव पुलिन्दान् काशिकोसलान् ।
अङ्गान् वङ्गान् कलिङ्गांश्च तङ्गणान् परतङ्गणान् ।
मलदान् निषधांश्चैव तुण्डिकेरांश्च कोङ्कणान् ॥
करदांश्च निषिद्धांश्च शिवान् दुश्छिल्लिकांस्तथा ।
अन्ये च बहवः शूराः नानाजनपदेश्वराः ।
कीचकेन रणे भग्ना व्यद्रवन्त दिशो दश ॥
मेखल, त्रिगर्त, दशार्ण, कशेरुक, मालव, यवन, पुलिन्द, काशी, कोसल, अंग, वंग, कलिंग, तंगण, परतंगण, मलद, निषध, तुण्डिकेर, कोंकण, करद, निषिद्ध, शिव, दुश्छिल्लिक तथा अन्य नाना जनपदोंके स्वामी अनेक शूरवीर नरेश रणभूमिमें कीचकसे पराजित हो दसों दिशाओंमें भाग गये ।
तमेवं वीर्यसम्पन्नं नागायुतबलं रणे ।
विराटस्तत्र सेनायाश्चकार पतिमात्मनः ॥
ऐसे पराक्रमसम्पन्न कीचकको, जो संग्राममें दस हजार हाथियोंका बल रखता था, राजा विराटने अपना सेनापति बना लिया ।
विराटभ्रातरश्चैव दश दाशरथोपमाः ।
ते चैनानन्ववर्तन्त कीचकान् बलवत्तरान् ॥
विराटके दस भाई ऐसे थे, जो दशरथनन्दन श्रीरामके समान शक्तिशाली समझे जाते थे । वे भी इन प्रबलतर कीचकबन्धुओंका अनुसरण करने लगे । एवंविधबलोपेताः कीचकास्ते न तद्विधाः । राज्ञः श्याला महात्मानो विराटस्थ हितैषिणः । ऐसे बलसम्पन्न कीचक, जो राजा विराटके साले लगते थे, शौर्यमें अपना सानी नहीं
रखते थे । वे महामना विराटके बड़े हितैषी थे ।
एतत् ते कथितं सर्वं कीचकस्य पराक्रमम् ॥
द्रौपदी न शशापैनं यस्मात् तद् गदतः शृणु । जनमेजय! इस प्रकार मैंने तुमसे कीचकके पराक्रमकी सारे बातें बता दीं । अब यह भी
सुन लो कि द्रौपदीने उसे शाप क्यों नहीं दिया? ।
क्षरतीति तपः क्रोधादृषयो न शपन्ति हि ॥
जानन्ती तद् यथातत्त्वं पाञ्चाली न शशाप तम् । क्रोधसे तपस्या नष्ट होती है, इसीलिये ऋषि भी सहसा किसीको शाप नहीं देते हैं । द्रौपदी इस बातको अच्छी तरह जानती थी; इसीलिये उसने उसे शाप नहीं दिया ।
क्षमा धर्मः क्षमा दानं क्षमा यज्ञः क्षमा यशः ।
क्षमा सत्यं क्षमा शीलं क्षमा कीर्तिः क्षमा परम् ॥
क्षमा पुण्यं क्षमा तीर्थं क्षमा सर्वमिति श्रुतिः ।
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क्षमावतामयं लोकः परश्चैव क्षमावताम् ।
एतत् सर्वं विजानन्ती सा क्षमामन्वपद्यत ॥
क्षमा धर्म है, क्षमा दान है, क्षमा यज्ञ है, क्षमा यश है, क्षमा सत्य है, क्षमाशील है, क्षमा कीर्ति है, क्षमा सबसे उत्कृष्ट तत्त्व है, क्षमा पुण्य है, क्षमा तीर्थ है और क्षमा सब कुछ है; ऐसा श्रुतिका कथन है । यह लोक क्षमावानोंका ही है। परलोक भी क्षमावानोंका ही है । द्रौपदी यह सब कुछ जानती थी, इसलिये उसने क्षमाका ही आश्रय लिया ।
भर्तॄणां मतमाज्ञाय क्षमिणां धर्मचारिणाम् ।
नाशपत् तं विशालाक्षी सती शक्तापि भारत ॥
भरतनन्दन! क्षमाशील एवं धर्मात्मा पतियोंका मत जानकर विशाल नेत्रोंवाली सती-साध्वी द्रौपदीने समर्थ होते हुए भी कीचकको शाप नहीं दिया ।
पाण्डवाश्चापि ते सर्वे द्रौपदीं प्रेक्ष्य दुःखिताः ।
क्रोधाग्निना व्यदह्यन्त तदा कालव्यपेक्षया ॥
समस्त पाण्डव भी द्रौपदीकी दुरवस्था देखकर दुःखी हो समयकी प्रतीक्षा करते हुए क्रोधाग्निमें जलते रहे ।
अथ भीमो महाबाहुः सूदयिष्यंस्तु कीचकम् ।
वारितो धर्मपुत्रेण वेलयेव महोदधिः ॥
महाबाहु भीमसेन तो कीचकको तत्काल मार डालनेके लिये उद्यत थे; परंतु जैसे वेला ( तटकी सीमा ) महासागरके वेगको रोके रहती है, उसी प्रकार धर्मपुत्र युधिष्ठिरने उन्हें रोक दिया । संधार्य मनसा रोषं दिवारात्रं विनिःश्वसन् । महानसे तदा कृच्छ्रात् सुष्वाप रजनीं च ताम् II ) वे मनमें क्रोधको रोककर दिन - रात लंबी साँसें खींचते रहते थे । उस दिन पाकशालामें
जाकर वे रातमें बड़े कष्टसे सोये ।
इति श्रीमहाभारते विराटपर्वणि कीचकवधपर्वणि द्रौपदीपरिभवे षोडशोऽध्यायः ॥
१६ ॥
इसप्रकार श्रीमहाभारत विराटपर्वके अन्तर्गत कीचकवधपर्वमें द्रौपदीतिरस्कारसम्बन्धी सोलहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १६ ॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठके ९ २ श्लोक मिलाकर कुल १४३ श्लोक हैं । ) P
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सप्तदशोऽध्यायः द्रौपदीका भीमसेनके समीप जाना वैशम्पायन उवाच
साहता सूतपुत्रेण राजपत्नी यशस्विनी ।
वधं कृष्णा परीप्सन्ती सेनावाहस्य भामिनी ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं - राजन्! सूतपुत्र सेनापति कीचकने जबसे लात मारी थी, तभीसे यशस्विनी राजपत्नी भामिनी द्रौपदी उसके वधकी बात सोचने लगी ॥ १ ॥
जगामावासमेवाथ सा तदा द्रुपदात्मजा ।
कृत्वा शौचं यथान्यायं कृष्णा सा तनुमध्यमा ॥ २ ॥
गात्राणि वाससी चैव प्रक्षाल्य सलिलेन सा ।
चिन्तयामास रुदती तस्य दुःखस्य निर्णयम् ॥ ३ ॥
वह अपने निवासस्थानपर गयी । उस समय सूक्ष्म कटिभागवाली द्रुपदकुमारी कृष्णाने वहाँ यथायोग्य शौच - स्नान करके जलसे अपने शरीर और वस्त्र धोये तथा वह रोती हुई उस दुःखके निवारणका उपाय सोचने लगी- ॥ २-३ ॥
किं करोमि क्व गच्छामि कथं कार्यं भवेन्मम ।
इत्येवं चिन्तयित्वा सा भीमं वै मनसागमत् ॥ ४ ॥
‘ क्या करूँ, कहाँ जाऊँ? कैसे मेरा अभीष्ट कार्य होगा, इस प्रकार चिन्तन करके उसने मन- ही - मन भीमसेनका स्मरण किया ॥ ४ ॥
नान्यः कर्ता ऋते भीमान्ममाद्य मनसः प्रियम् ।
तत उत्थाय रात्रौ सा विहाय शयनं स्वकम् ॥ ५ ॥
प्राद्रवन्नाथमिच्छन्ती कृष्णा नाथवती सती ।
भवनं भीमसेनस्य क्षिप्रमायतलोचना ॥ ६ ॥
दुःखेन महता युक्ता मानसेन मनस्विनी । ' भीमसेनके सिवा दूसरा कोई आज मेरे मनको प्रिय लगनेवाला कार्य नहीं कर सकता' – ऐसा निश्चय करके वह विशाल नेत्रोंवाली सती-साध्वी सनाथा कृष्णा रातको अपनी शय्या छोड़कर उठी और अपने नाथ ( रक्षक ) - से मिलनेकी इच्छा रखकर शीघ्रतापूर्वक भीमसेनके भवनमें गयी । उस समय मनस्विनी द्रौपदी महान् मानसिक दुःखसे पीड़ित थी ॥ ५-६३ ॥ सैरन्ध्र्युवाच तस्मिञ्जीवति पापिष्ठे सेनावाहे मम द्विषि ॥ ७ ॥
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तत् कर्म कृतवानद्य कथं निद्रां निषेवसे । वहाँ पहुँचते ही सैरन्ध्री बोली - आर्यपुत्र! मुझसे द्वेष रखनेवाले उस महापापी सेनापतिके, जिसने मेरे साथ वैसा अपमानजनक बर्ताव किया था, जीते - जी तुम आज नींद कैसे ले रहे हो? ॥ ७३ ॥
वैशम्पायन उवाच एवमुक्त्वाथ तां शालां प्रविवेश मनस्विनी ॥ ८ ॥
यस्यां भीमस्तथा शेते मृगराज इव श्वसन् । वैशम्पायनजी कहते हैं - राजन्! ऐसा कहती हुई मनस्विनी द्रौपदीने उस भवनमें प्रवेश किया, जिसमें सिंहकी भाँति साँसें खींचते हुए भीमसेन सो रहे थे ॥ तस्या रूपेण सा शाला भीमस्य च महात्मनः ॥ ९ ॥
सम्मूर्छितेव कौरव्य प्रजज्वाल च तेजसा ।
सा वै महानसं प्राप्य भीमसेनं शुचिस्मिता ॥ १० ॥
सर्वश्वेतेव माहेयी वने जाता त्रिहायणी ।
उपातिष्ठत पाञ्चाली वासितेव नरर्षभम् ॥ ११ ॥
कुरुनन्दन! द्रौपदीके दिव्य रूपसे महात्मा भीमकी वह पाकशाला शोभा- समृद्धिको प्राप्त होकर तेजसे प्रकाशित हो उठी । पवित्र मुसकानवाली द्रौपदी पाक- शालामें पहुँचकर क्रमशः [ बक, साँड़ और गजराजके पास जानेवाली] जलमें उत्पन्न हुई बकी, तीन सालकी पार्थिव गौ तथा हथिनीके समान श्रेष्ठ पुरुष भीमसेनके समीप गयीं ॥ ९ –११ ॥
सा लतेव महाशालं फुल्लं गोमतितीरजम् ।
परिष्वजत पाञ्चाली मध्यमं पाण्डुनन्दनम् ॥ १२ ॥
जैसे लता गोमतीके तटपर उत्पन्न एवं खिले हुए ऊँचे शालवृक्षमें लिपट जाती है, उसी प्रकार सती - साध्वी पांचालीने मध्यम* पाण्डव भीमसेनका आलिंगन किया ॥ १२ ॥
बाहुभ्यां परिरभ्यैनं प्राबोधयदनिन्दिता ।
सिंहं सुप्तं वने दुर्गे मृगराजवधूरिव ॥ १३ ॥
उसने उन्हें दोनों भुजाओंसे कसकर जगाया; ठीक वैसे ही, जैसे दुर्गम वनमें सोये हुए सिंहको सिंहिनी जगाती है ॥ १३ ॥
भीमसेनमुपाश्लिष्यद्धस्तिनीव महागजम् ।
वीणेव मधुरालापा गान्धारं साधु मूर्छती ।
अभ्यभाषत पाञ्चाली भीमसेनमनिन्दिता ॥ १४ ॥
जैसे हथिनी महान् गजराजका आलिंगन करती है, उसी प्रकार निर्दोष पाञ्चालराजकुमारी भीमसेनसे सटकर गान्धार स्वरमें मधुर ध्वनि फैलाती हुई वीणाकी भाँति मीठे वचनोंमें बोली – ॥ १४ ॥
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उत्तिष्ठोत्तिष्ठ किं शेषे भीमसेन यथा मृतः ।
नामृतस्य हि पापीयान् भार्यामालभ्य जीवति ॥ १५ ॥
' भीमसेन! उठो, उठो, क्यों मुर्देकी तरह सो रहे हो?; क्योंकि ( तुम्हारे- जैसे वीर ) पुरुषके जीवित रहते हुए उसकी पत्नीका स्पर्श करके कोई महापापी मनुष्य जीवित नहीं रह सकता' ॥ १५ ॥
स सम्प्रहाय शयनं राजपुत्र्या प्रबोधितः ।
उपातिष्ठत मेघाभः पर्यङ्के सोपसंग्रहे ॥ १६ ॥
अथाब्रवीद् राजपुत्रीं कौरव्यो महिषीं प्रियाम् ।
केनास्यर्थेन सम्प्राप्ता त्वरितेव ममान्तिकम् ॥ १७ ॥
न ते प्रकृतिमान् वर्णः कृशा पाण्डुश्च लक्ष्यसे ।
आचक्ष्व परिशेषेण सर्वं विद्यामहं यथा ॥ १८ ॥
राजकुमारी द्रौपदीके जगानेपर मेघके समान श्याम वर्णवाले कुरुनन्दन भीमसेन तोशक बिछे हुए पलंगपर शयन छोड़कर उठ बैठे और अपनी प्यारी रानीसे बोले — ‘ देवि! किस कार्यसे तुम इतनी उतावली- सी होकर मेरे पास आयी हो? तुम्हारे शरीरकी कान्ति स्वाभाविक नहीं रह गयी है । तुमपर उदासी छायी है । तुम दुबली और पीली दिखायी देती हो । पूरी बात बताओ, जिससे मैं सब कुछ जान सकूँ ॥ १६–१८ ॥
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सुखं वा यदि वा दुःखं द्वेष्यं वा यदि वा प्रियम् ।
यथावत् सर्वमाचक्ष्व श्रुत्वा ज्ञास्यामि यत् क्षमम् ॥ १ ९ ॥
'तुम्हें सुख हो या दुःख, बुरा हुआ हो या भला, सब बातें ठीक- ठीक कह जाओ । वह सब सुनकर मैं उसके निवारणके लिये उचित उपाय सोचूँगा ॥
अहमेव हि ते कृष्णे विश्वास्यः सर्वकर्मसु ।
अहमापत्सु चापि त्वां मोक्षयामि पुनः पुनः ॥ २० ॥
' कृष्णे! सब कार्योंके लिये मैं ही तुम्हारा विश्वासपात्र हूँ। मैं ही सब प्रकारकी विपत्तियोंमें बार- बार सहायता करके तुम्हें संकटसे मुक्त करता हूँ ॥ २० ॥
शीघ्रमुक्त्वा यथाकामं यत् ते कार्यं विवक्षितम् ।
गच्छ वै शयनायैव पुरा नान्येन बुध्यते ॥ २१ ॥
‘ अतः जैसी तुम्हारी रुचि हो और जिस कार्यके लिये कुछ कहना चाहती हो, उसे शीघ्र कहकर पहले ही अपने शयनगृहमें चली जाओ, जिससे दूसरे किसीको इसका पता न चल सके ' ॥ २१ ॥
इति श्रीमहाभारते विराटपर्वणि कीचकवधपर्वणि द्रौपदी भीमसंवादे सप्तदशोऽध्यायः ॥ १७ ॥
इसप्रकार श्रीमहाभारत विराटपर्वके अन्तर्गत कीचकवधपर्वमें द्रौपदी-भीम-संवादविषयक सत्रहवाँ अध्याय पूराहुआ ॥ १७ ॥
* नकुल- सहदेव जुड़वें पैदा हुए थे; अतः वे दोनों कनिष्ठ (छोटे ) भाई हैं । युधिष्ठिर बड़े हैं । भीमसेन और अर्जुन मध्यम हैं । विराटपर्वके प्रसंगमें अर्जुन पुरुष नहीं रह गये हैं । अतः भीमसेन ही यहाँ प्रधानरूपसे मध्यम पाण्डव कहे गये हैं ।