श्रीगणेशाय नमः।

महाभारत — खण्ड २ — पृष्ठ 2231–2240

महाभारत — खण्ड २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 2231–2240

पृष्ठ 2231

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विवादेषु प्रवृत्तेषु समं कार्यानुदर्शिना ।

राज्ञा धर्मासनस्थेन जितौ लोकावुभावपि ॥

जो प्रियजनों तथा द्वेषपात्रोंमें भी समानभाव रखते हैं, प्रजाजनोंमें विवाद आरम्भ होनेपर जो राजा धर्मासनपर बैठकर समानभावसे प्रत्येक कार्यपर विचार करते हैं, वे दोनों

लोकों को जीत लेते हैं ।

राजन् धर्मासनस्थोऽपि रक्ष मां त्वमनागसीम् ॥

अहं त्वनपराध्यन्ती कीचकेन दुरात्मना ।

पश्यतस्ते महाराज हता पादेन दासवत् ॥

राजन्! आप धर्मके आसनपर बैठे हैं। मुझ निरपराध अबलाकी रक्षा कीजिये । महाराज! मैंने कोई अपराध नहीं किया है तो भी दुरात्मा कीचकने आपके देखते - देखते

मुझको लात मारी है; मेरे साथ ( खरीदे हुए) दासका- सा बर्ताव किया है ।

मत्स्याधिप प्रजा रक्ष पिता पुत्रानिवौरसान् ॥

यस्त्वधर्मेण कार्याणि मोहात्मा कुरुते नृपः ।

अचिरात् तं दुरात्मानं वशे कुर्वन्ति शत्रवः ॥

मत्स्यराज! जैसे पिता अपने औरस पुत्रोंकी रक्षा करता है, उसी प्रकार आप अपने प्रजाजनोंका संरक्षण कीजिये । जो मोहमें डूबा हुआ राजा अधर्मयुक्त कार्य करता है, उस दुरात्माको उसके शत्रु शीघ्र ही वशमें कर लेते हैं ।

मत्स्यानां कुलजस्त्वं हि तेषां सत्यं परायणम् ।

त्वं किलैवंविधो जातः कुले धर्मपरायणे ॥

आप मत्स्यकुलमें उत्पन्न हुए हैं । सत्य ही मत्स्यनरेशोंका महान् आश्रय रहा है । आप भी इस धर्मपरायण कुलमें ऐसे ही धर्मात्मा पैदा हुए हैं ।

अतस्त्वाहमभिक्रन्दे शरणार्थं नराधिप ।

त्राहि मामद्य राजेन्द्र कीचकात् पापपूरुषात् ॥

अतः नरेश्वर! मैं आपसे शरण देनेके लिये रुदन करती हूँ । राजेन्द्र! आज मुझे इस पापी कीचकसे बचाइये ।

अनाथामिह मां ज्ञात्वा कीचकः पुरुषाधमः ।

प्रहरत्येव नीचात्मा न तु धर्ममवेक्षते ॥

पुरुषाधम कीचक यहाँ मुझे असहाय जानकर मार रहा है । यह नीच अपने धर्मकी ओर नहीं देखता है ।

अकार्याणामनारम्भात् कार्याणामनुपालनात् ।

प्रजासु ये सुवृत्तास्ते स्वर्गमायान्ति भूमिपाः ॥

जो भूमिपाल न करनेयोग्य कार्योंका आरम्भ नहीं करते, करनेयोग्य कर्तव्योंका निरन्तर पालन करते हैं और सदा प्रजाके साथ उत्तम बर्ताव करते हैं, वे स्वर्गलोकमें जाते हैं ।

पृष्ठ 2232

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कार्याकार्यविशेषज्ञाः कामकारेण पार्थिव ।

प्रजासु किल्बिषं कृत्वा नरकं यान्त्यधोमुखाः ॥

परंतु राजन्! जो राजा कर्तव्य और अकर्तव्यके अन्तरको जानते हुए भी स्वेच्छाचारितावश प्रजावर्गके साथ पापाचार करते हैं, वे अधोमुख हो नरकमें जाते हैं ।

नैव यज्ञैर्न वा दानैर्न गुरोरुपसेवया ।

प्राप्नुवन्ति तथा धर्मं यथा कार्यानुपालनात् ॥

राजालोग यज्ञ, दान अथवा गुरुसेवनसे भी वैसा धर्म ( पुण्य ) नहीं पाते हैं, जैसा कि

अपने कर्तव्यका ठीक- ठीक पालन करनेसे प्राप्त करते हैं ।

क्रियायामक्रियायां च प्रापणे पुण्यपापयोः ॥

प्रजायां सृज्यमानायां पुरा ह्येतदुदाहृतम् ।

एतद् वो मानुषाः सम्यक् कार्यं द्वन्द्वतया भुवि ।

अस्मिन् सुनीते दुर्नीते लभते कर्मजं फलम् ॥

पूर्वकालमें सृष्टिकी रचनाके समय ब्रह्माजीने क्रिया करने और न करनेकी स्थितिमें पुण्य और पापकी प्राप्तिके विषयमें इस प्रकार कहा था-' मनुष्यो! तुमलोगोंको इस पृथ्वीलोकमें द्वन्द्वरूपमें प्राप्त धर्म और अधर्मके विषयमें भलीभाँति समझकर कर्म करना चाहिये; क्योंकि अच्छी या बुरी जैसी नीयतसे काम किया जाता है, वैसा ही कर्मजनित फल मिलता है ।

कल्याणकारी कल्याणं पापकारी च पापकम् ।

तेन गच्छति संसर्गं स्वर्गाय नरकाय वा ॥

‘ कल्याणकारी मनुष्य कल्याणका और पापाचारी पुरुष पापके फलस्वरूप दुःखका भागी होता है । जो इनके संसर्गमें आता है, वह भी ( कर्मानुसार ) स्वर्ग या नरकमें जाता है ।

सुकृतं दुष्कृतं वापि कृत्वा मोहेन मानवः ।

पश्चात्तापेन तप्येत स्वबुद्धया मरणं गतः ॥

' मनुष्य मोहपूर्वक सत्कर्म या दुष्कर्म करके मृत्युके बाद भी मन- ही-मन पश्चात्ताप करता रहता है ' ॥

एवमुक्त्वा परं वाक्यं विससर्ज शतक्रतुम् ।

शक्रोऽप्यापृच्छ्य ब्रह्माणं देवराज्यमपालयत् ॥

इस प्रकार उत्तम वचन कहकर ब्रह्माजीने इन्द्रको विदा कर दिया । इन्द्र भी ब्रह्माजीसे पूछकर देवलोकमें आये और देवसाम्राज्यका पालन करने लगे ।

यथोक्तं देवदेवेन ब्रह्मणा परमेष्ठिना ।

तथा त्वमपि राजेन्द्र कार्याकार्ये स्थिरो भव ॥

राजेन्द्र! देवाधिदेव परमेष्ठी ब्रह्माजीने जैसा उपदेश दिया है, उसके अनुसार आप भी कर्तव्य और अकर्तव्यके निर्णयमें दृढ़तापूर्वक लगे रहिये ।

पृष्ठ 2233

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वैशम्पायन उवाच

एवं विलपमानायां पाञ्चाल्यां मत्स्यपुङ्गवः ।

अशक्तः कीचकं तत्र शासितुं बलदर्पितम् ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं - राजन्! पांचाल- राजकुमारी द्रौपदीके इस प्रकार विलाप करनेपर भी मत्स्यराज विराट बलाभिमानी कीचकपर शासन करनेमें असमर्थ ही रहे ।

विराटराजः सूतं तु सान्त्वेनैव न्यवारयत् ।

कीचकं मत्स्यराजेन कृतागसमनिन्दिता ॥

नापराधानुरूपेण दण्डेन प्रतिपादितम् ।

पाञ्चालराजस्य सुता दृष्ट्वा सुरसुतोपमा ॥

धर्मज्ञा व्यवहाराणां कीचकं कृतकिल्बिषम् ।

पुनः प्रोवाच राजानं स्मरन्ती धर्ममुत्तमम् ॥

सम्प्रेक्ष्य च वरारोहा सर्वांस्तत्र सभासदः । विराटं चाह पाञ्चाली दुःखेनाविष्टचेतना II ) उन्होंने शान्तिपूर्वक समझा-बुझाकर ही सूतको वैसा करनेसे मना किया । यद्यपि कीचकने भारी अपराध किया था, तो भी मत्स्यराजने उसे अपराधके अनुसार दण्ड नहीं दिया; यह देख देवकन्याके समान सुन्दरी एवं व्यवहार- धर्मको जाननेवाली साध्वी द्रौपदी उत्तम धर्मका स्मरण करती हुई राजा विराट तथा समस्त सभासदोंकी ओर देखकर दुःखी हृदयसे इस प्रकार बोली- 1

येषां वैरी न स्वपिति षष्ठेऽपि विषये वसन् ।

तेषां मां मानिनीं भार्यां सूतपुत्रः पदावधीत् ॥ २२ ॥

‘ जिन मेरे पतियोंके वैरीको पाँच देशोंको पार करके छठे देशमें रहनेपर भी भयके मारे नींद नहीं आती, आज उन्हींकी मानिनी पत्नी मुझ असहाय अबलाको एक सूतपुत्रने लातसे मारा है ॥ २२ ॥

ये दद्युर्न च याचेयुर्ब्रह्मण्याः सत्यवादिनः ।

तेषां मां मानिनीं भार्यां सूतपुत्रः पदावधीत् ॥ २३ ॥

' जो सदा दूसरोंको देते हैं, किंतु किसीसे याचना नहीं करते, जो ब्राह्मणभक्त तथा सत्यवादी हैं, उन्हींकी मुझ मानिनी पत्नीको सूतपुत्रने लात मारी है ॥ २३ ॥

येषां दुन्दुभिनिर्घोषो ज्याघोषः श्रूयतेऽनिशम् ।

तेषां मां मानिनीं भार्यां सूतपुत्रः पदावधीत् ॥ २४ ॥

‘ जिनके धनुषकी टंकार सदा देव- दुन्दुभियोंकी गम्भीर ध्वनिके समान सुनायी पड़ती है, उन्हींकी मुझ मानिनी पत्नीको सूतपुत्रने लातसे मारा है ॥ २४ ॥

ये च तेजस्विनो दान्ता बलवन्तोऽतिमानिनः ।

तेषां मां मानिनीं भार्यां सूतपुत्रः पदावधीत् ॥ २५ ॥

पृष्ठ 2234

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‘ जो तेजस्वी, जितेन्द्रिय, बलवान् और अत्यन्त मानी हैं, उन्हींकी मुझ मानिनी पत्नीपर सूतपुत्रने पैरसे आघात किया है ॥ २५ ॥

सर्वलोकमिमं हन्युर्धर्मपाशसितास्तु ये ।

तेषां मां मानिनीं भार्यां सूतपुत्रः पदावधीत् ॥ २६ ॥

‘ मेरे पति इस सम्पूर्ण संसारको मार सकते हैं; किंतु वे धर्मके बन्धनमें बँधे हैं, इसीसे आज उनकी मुझ मानिनी पत्नीपर सूतपुत्रने पैरसे प्रहार किया है ॥

शरणं ये प्रपन्नानां भवन्ति शरणार्थिनाम् ।

चरन्ति लोके प्रच्छन्नाः क्व नु तेऽद्य महारथाः ॥ २७ ॥

‘ जो शरण चाहनेवाले अथवा शरणमें आये हुए सब लोगोंको शरण देते हैं, वे मेरे महारथी पति अपने स्वरूपको छिपाकर आज जगत्में कहाँ विचर रहे हैं? ॥ २७ ॥

कथं ते सूतपुत्रेण वध्यमानां प्रियां सतीम् ।

मर्षयन्ति यथा क्लीबा बलवन्तोऽमितौजसः ॥ २८ ॥

‘ जो अमिततेजस्वी और बलवान् हैं, वे ( मेरे पति) एक सूतपुत्रद्वारा मारी जाती हुई अपनी सती- साध्वी प्रिय पत्नीका अपमान कायरों और नपुंसकोंकी भाँति कैसे सहन कर रहे हैं? ॥ २८ ॥

क्व नु तेषाममर्षश्च वीर्यं तेजश्च वर्तते ।

न परीप्सन्ति ये भार्यां वध्यमानां दुरात्मना ॥ २ ९ ॥

‘ आज उनका अमर्ष, पराक्रम और तेज कहाँ है? जो एक दुरात्माकी मार खाती हुई अपनी पत्नीकी रक्षा नहीं करते हैं ॥ २ ९ ॥

मयात्र शक्यं किं कर्तुं विराटे धर्मदूषके ।

यः पश्यन् मां मर्षयति वध्यमानामनागसम् ॥ ३० ॥

‘ यहाँका राजा विराट भी धर्मको कलंकित करनेवाला है; जो मुझ निरपराध अबलाको अपने सामने मार खाती देखकर भी सहन किये जाता है । भला, इसके रहते मैं इस अपमानका बदला चुकानेके लिये क्या कर सकती हूँ? ॥ ३० ॥

न राजा राजवत् किंचित् समाचरति कीचके ।

दस्यूनामिव धर्मस्ते न हि संसदि शोभते ॥ ३१ ॥

नाहमेतेन युक्तं वै हन्तुं मत्स्य तवान्तिके ।

सभासदोऽत्र पश्यन्तु कीचकस्य व्यतिक्रमम् ॥ ३२ ॥

'यह राजा होकर भी कीचकके प्रति कुछ भी राजोचित न्याय नहीं कर रहा है । मत्स्यराज! तुम्हारा यह लुटेरोंका-सा धर्म इस राजसभामें शोभा नहीं देता । तुम्हारे निकट इस कीचकद्वारा मुझपर मार पड़ी, यह कदापि उचित नहीं कहा जा सकता । यहाँ जो सभासद् बैठे हैं, वे भी कीचकका यह अत्याचार देखें ॥ ३१-३२ ॥ कीचको न च धर्मज्ञो न च मत्स्यः कथंचन ।

पृष्ठ 2235

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सभासदोऽप्यधर्मज्ञा य एनं पर्युपासते ॥ ३३ ॥

‘ कीचकको धर्मका ज्ञान नहीं है और यह मत्स्यराज भी किसी प्रकार धर्मज्ञ नहीं है तथा जो इस अधर्मी राजाके पास बैठते हैं, वे सभासद् भी धर्मके ज्ञाता नहीं हैं ' ॥ ३३ ॥

वैशम्पायन उवाच

एवंविधैर्वचोभिः सा तदा कृष्णाश्रुलोचना ।

उपालभत राजानं मत्स्यानां वरवर्णिनी ॥ ३४ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं - राजन्! उत्तम वर्णवाली द्रौपदीने उस समय आँखोंमें आँसू भरकर ऐसे वचनोंद्वारा मत्स्यराजको बहुत फटकारा और उलाहना दिया ॥ ३४ ॥

विराट उवाच

परोक्षं नाभिजानामि विग्रहं युवयोरहम् ।

अर्थतत्त्वमविज्ञाय किं नु स्यात् कौशलं मम ॥ ३५ ॥

तब विराट बोले — सैरन्ध्री! हमारे परोक्षमें तुम दोनोंमें किस प्रकार कलह हुआ है; इसे मैं नहीं जानता और वास्तविक बातको जाने बिना न्याय करनेमें मेरा क्या कौशल प्रकट होगा? ॥ ३५ ॥

वैशम्पायन उवाच

ततस्तु सभ्या विज्ञाय कृष्णां भूयोऽभ्यपूजयन् ।

साधु साध्विति चाप्याहुः कीचकं च व्यगर्हयन् ॥ ३६ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं -राजन्! तदनन्तर सभासदोंने सारा रहस्य जानकर द्रौपदीकी बार- बार सराहना की । उसे अनेक बार साधुवाद दिया और कीचककी निन्दा करते हुए उसे बहुत धिक्कारा ॥ ३६ ॥

सभ्या ऊचुः

यस्येयं चारुसर्वाङ्गी भार्या स्वादायतेक्षणा ।

परो लाभस्तु तस्य स्यान्न च शोचेत् कथंचन ॥ ३७ ॥

सभासद् बोले — सम्पूर्ण मनोहर अंगोंसे सुशोभित यह बड़े- बड़े नेत्रोंवाली साध्वी जिसकी धर्मपत्नी है, उसे जीवनमें बहुत बड़ा लाभ मिला है । वह किसी प्रकार शोक नहीं कर सकता ॥ ३७ ॥

( यस्या गात्रं शुभं पीनं मुखं जयति पङ्कजम् ।

गतिर्हंसं स्मितं कुन्दं सैषा नार्हति पद्वधम् ॥

जिसका शरीर शुभ और हृष्ट- पुष्ट है, जिसका मुख अपने सौन्दर्यसे कमलको पराजित कर रहा है तथा जिसकी मन्द मन्द गति हंसको और मुस्कान कुन्दपुष्पोंकी शोभाको तिरस्कृत कर रही है, वही यह नारी पदप्रहारके योग्य नहीं है ।

पृष्ठ 2236

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द्वात्रिंशद् दशना यस्याःश्वेता मांसनिबन्धनाः ।

स्निग्धाश्च मृदवः केशाः सैषा नार्हति पद्वधम् ॥

जिसके बत्तीसों दाँत मसूड़ोंमें दृढ़तापूर्वक आबद्ध और उज्ज्वल हैं, जिसके केश चिकने और कोमल हैं, वैसी यह नारी लात मारने योग्य कदापि नहीं है ।

पद्मं चक्रं ध्वजं शखं प्रासादो मकरस्तथा ।

यस्याः पाणितले सन्ति सैषा नार्हति पद्वधम् ॥

जिसकी हथेलीमें कमल, चक्र, ध्वजा, शंख, मन्दिर और मगरके चिह्न हैं, वह शुभलक्षणा नारी पैरोंसे ठुकरायी जाय, यह कदापि उचित नहीं है ।

आवर्ताः खलु चत्वारः सर्वे चैव प्रदक्षिणाः ।

समं गात्रं शुभं स्निग्धं यस्य नार्हति पद्वधम् ॥

जिसके शरीरमें चार आवर्त हैं और वे सबके सब प्रदक्षिणभावसे सुशोभित हैं, जिसके अङ्ग समान ( सुडौल ), शुभ लक्षणोंसे सम्पन्न और स्निग्ध हैं, वह लात मारनेयोग्य नहीं है ।

अच्छिद्रहस्तपादा च अच्छिद्रदशना च या ।

कन्या कमलपत्राक्षी कथमर्हति पद्वधम् ॥

जिसके हाथों, पैरों और दाँतोंमें छिद्र नहीं दिखायी देते हैं, वह कमलदललोचना कन्या पैरोंसे ठोकर मारने योग्य कैसे हो सकती है?।

सेयं लक्षणसम्पन्ना पूर्णचन्द्रनिभानना ।

सुरूपिणी सुवदना नेयं योग्या पदा वधम् ॥

यह समस्त शुभ लक्षणोंसे सम्पन्न है । इसका मुख पूर्णचन्द्रके समान मनोहर है । यह सुन्दर रूपवाली सुमुखी नारी पैरोंसे ठुकराने योग्य नहीं है । देवदेवीव सुभगा शक्रदेवीव शोभना । अप्सरा इव सौरूप्यान्नेयं योग्या पदा वधम् ॥ ) यह देवांगनाके समान सौभाग्यशालिनी, इन्द्राणीके समान शोभासम्पन्न तथा अप्सराके समान सुन्दर रूप धारण करनेवाली है । यह लात मारनेयोग्य कदापि नहीं है ।

नहीदृशी मनुष्येषु सुलभा वरवर्णिनी ।

नारी सर्वानवद्याङ्गी देवीं मन्यामहे वयम् ॥ ३८ ॥

मनुष्य जातिमें तो ऐसी सती- साध्वी और सुन्दरी स्त्री सुलभ ही नहीं होती । इसके

सम्पूर्ण अंग निर्दोष हैं । हम तो इसे मानवी नहीं; देवी मानते हैं ॥ ३८ ॥

वैशम्पायन उवाच

एवं सम्पूजयन्तस्ते कृष्णां प्रेक्ष्य सभासदः ।

युधिष्ठिरस्य कोपात् तु ललाटे स्वेद आगमत् ॥ ३ ९ ॥

पृष्ठ 2237

महाभारत — खण्ड २, पृष्ठ 2237 का मूल पृष्ठ
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वैशम्पायनजी कहते हैं - राजन्! जब इस प्रकार द्रौपदीको देखकर सभासद् उसकी प्रशंसा कर रहे थे, उस समय कीचकके प्रति क्रोध होनेके कारण युधिष्ठिरके ललाटमें पसीना आ गया ॥ ३ ९ ॥ ( सा विनिःश्वस्य सुश्रोणी भूमावन्तर्मुखी स्थिता । तूष्णीमासीत् तदा दृष्ट्वा विवक्षन्तं युधिष्ठिरम् ॥ ) तदनन्तर सुन्दरी द्रौपदी लंबी साँस खींचकर नीचा मुख किये भूमिपर खड़ी हो गयी और राजा युधिष्ठिरको कुछ कहनेके लिये उद्यत देख वह स्वयं मौन रह गयी ।

अथाब्रवीद् राजपुत्रीं कौरव्यो महिषीं प्रियाम् ।

गच्छ सैरन्ध्रि मात्र स्थाः सुदेष्णाया निवेशनम् ॥ ४० ॥

तब उन कुरुनन्दनने अपनी प्यारी रानीसे इस प्रकार कहा - ' सैरन्ध्री! अब तू यहाँ न ठहर । रानी सुदेष्णाके महलमें चली जा ॥ ४० ॥

भर्तारमनुरुन्धन्त्यः क्लिश्यन्ते वीरपत्नयः ।

शुश्रूषया क्लिश्यमानाः पतिलोकं जयन्त्युत ॥ ४१ ॥

‘ पतिका अनुसरण करनेवाली वीरपत्नियाँ सब क्लेश चुपचाप सहन कर लेती हैं । जो पतिसेवापूर्वक क्लेश उठाती हैं, वे साध्वी देवियाँ पतिलोकपर विजय पा लेती हैं ॥ ४१ ॥

मन्ये न कालं क्रोधस्य पश्यन्ति पतयस्तव ।

तेन त्वां नाभिधावन्ति गन्धर्वाः सूर्यवर्चसः ॥ ४२ ॥

'मैं समझता हूँ, तुम्हारे सूर्यके समान तेजस्वी पति गन्धर्वगण अभी क्रोध करनेका अवसर नहीं देखते; इसीलिये तुम्हारे पास दौड़कर नहीं आ रहे हैं ॥ ४२ ॥

( श्रूयन्तां ते सुकेशान्ते मोक्षधर्माश्रयाः कथाः ।

यथा धर्मः कुलस्त्रीणां दृष्टो धर्मानुरोधनात् ॥

' सुन्दर केशप्रान्तवाली सैरन्ध्री! तुम मोक्षधर्मसे सम्बन्ध रखनेवाली बातें सुनो । धर्मशास्त्रके अनुसार कुलवती स्त्रियोंका धर्म इस प्रकार देखा गया है ।

नास्ति कश्चित् स्त्रिया यज्ञो न श्राद्धं नाप्युपोषणम् ।

या च भर्तरि शुश्रूषा सा स्वर्गायाभिजायते ॥

' स्त्रीके लिये न तो कोई यज्ञ है, न श्राद्ध है और न उपवासका ही विधान है । स्त्रियोंके द्वारा जो पतिकी सेवा होती है, वही उन्हें स्वर्गकी प्राप्ति करानेवाली है ।

पिता रक्षति कौमारे भर्ता रक्षति यौवने ।

पुत्रस्तु स्थविरे भावे न स्त्री स्वाततन्त्र्यमर्हति ॥

‘ कुमारावस्थामें पिता, युवावस्थामें पति और वृद्धावस्थामें पुत्र नारीकी रक्षा करता है । स्त्रीको कभी स्वतन्त्र नहीं रहना चाहिये ।

भर्तृन् प्रति तथा पत्न्यो न क्रुध्यन्ति कदाचन ।

बहुभिश्च परिक्लेशैरवज्ञाताश्च शत्रुभिः ॥

पृष्ठ 2238

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‘ पतिव्रता स्त्रियाँ नाना प्रकारके क्लेश सहकर तथा शत्रुओंद्वारा अपमानित होकर भी अपने पतियोंपर कभी क्रोध नहीं करतीं ।

अनन्यभावशुश्रूषाः पुण्यलोकं व्रजन्त्युत ।

न क्रुद्धान् प्रति यायाद् वै पतींस्ते वृत्रहा अपि ॥

‘ इस प्रकार अनन्यभावसे पतिकी शुश्रूषा करनेवाली स्त्रियाँ पुण्यलोकोंको प्राप्त कर लेती हैं । सैरन्ध्री! तुम्हारे पतियोंके कुपित होनेपर तो वृत्रहन्ता इन्द्र भी युद्धमें उनका सामना नहीं कर सकते ।

यदि ते समयः कश्चित् कृतो ह्यायतलोचने ।

तं स्मरस्व क्षमाशीले क्षमा धर्मो ह्यनुत्तमः ॥

‘ विशाललोचने! यदि उनके साथ तेरी कोई शर्त हुई हो तो उसे याद कर क्षमाशीले! क्षमा सबसे उत्तम धर्म है ।

क्षमा सत्यं क्षमा दानं क्षमा धर्मः क्षमा तपः ।

क्षमावतामयं लोकः परलोकः क्षमावताम् ॥

द्वयंशिनो द्वादशाङ्गस्य चतुर्विंशतिपर्वणः ।

कः षष्टित्रिशतारस्य मासोनस्याक्षमी भवेत् ॥

‘ क्षमा सत्य है, क्षमा दान है, क्षमा धर्म है और क्षमा ही तप है । क्षमाशील मनुष्योंके लिये ही यह लोक और परलोक है । जिसके दो ( उत्तरायण एवं दक्षिणायन) अंश हैं, बारह ( मास ) अंग हैं, चौबीस ( पक्ष ) पर्व हैं और तीन सौ साठ ( दिन ) अरे हैं, उस कालचक्रके पूर्ण होनेमें यदि एक मासकी ही कमी रह गयी हो; तो कौन उसकी प्रतीक्षा न करके क्षमाका त्याग कर सकता है? ' । वैशम्पायन उवाच इत्येवमुक्ते तिष्ठन्तीं पुनरेवाह धर्मराट् । ) वैशम्पायनजी कहते हैं - राजन्! इतना कहनेपर भी जब द्रौपदी वहाँ खड़ी ही रह गयी, तब धर्मराजने पुनः उससे कहा— ।

अकालज्ञासि सैरन्ध्रि शैलूषीव विरोदिषि ।

विघ्नं करोषि मत्स्यानां दीव्यतां राजसंसदि ॥ ४३ ॥

' सैरन्ध्री! तू अवसरको नहीं पहचानती; इसीलिये नटीकी भाँति राजसभामें रो रही है और द्यूतक्रीड़ामें लगे हुए मत्स्यराजकुमारोंके खेलमें विघ्न डालती है ॥

गच्छ सैरन्ध्रि गन्धर्वाः करिष्यन्ति तव प्रियम् ।

व्यपनेष्यन्ति ते दुःखं येन ते विप्रियं कृतम् ॥ ४४ ॥

‘ सैरन्ध्री! जाओ, गन्धर्व तुम्हारा प्रिय करेंगे । जिसने तुम्हारा अपकार किया है, उसे मारकर तुम्हारा दुःख दूर कर देंगे ' ॥ ४४ ॥

पृष्ठ 2239

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सैरन्ध्र्युवाच

अतीव तेषां घृणिनामर्थेऽहं धर्मचारिणी ।

तस्य तस्यैव ते वध्या येषां ज्येष्ठोऽक्षदेविता ॥ ४५ ॥

सैरन्ध्री बोली - जिनके बड़े भाई सदा जूआ खेला करते हैं, उन दयालु गन्धर्वोंके लिये मैं अत्यन्त धर्मपरायणा रहूँगी। मेरा अपकार करनेवाले दुरात्मा उन सबके लिये वध्य हों ॥ ४५ ॥

वैशम्पायन उवाच

इत्युक्त्वा प्राद्रवत् कृष्णा सुदेष्णाया निवेशनम् ।

केशान् मुक्त्वा च सुश्रोणी संरम्भाल्लोहितेक्षणा ॥ ४६ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं - राजन्! यों कहकर सुन्दर कटिप्रान्तवाली द्रौपदी तीव्र गतिसे रानी सुदेष्णाके महलको चली गयी । उसके केश खुले हुए थे और क्रोधसे उसकी आँखें लाल हो रही थीं ॥ ४६ ॥

शुशुभे वदनं तस्या रुदत्याः सुचिरं तदा ।

मेघलेखाविनिर्मुक्तं दिवीव शशिमण्डलम् ॥ ४७ ॥

उस समय रोती हुई द्रौपदीका मुख इस प्रकार सुशोभित हो रहा था, मानो आकाशमें मेघमालाके आवरणसे मुक्त चन्द्रबिम्ब शोभा पा रहा हो ॥ ४७ ॥

(पांसुकुण्ठितसर्वाङ्गी गजराजवधूरिव ।

प्रतस्थे नागनासोरूर्भर्तुराज्ञाय शासनम् ॥

समस्त अंगोंमें धूलिसे धूसरित गजराजवधूकी भाँति शोभा पानेवाली तथा हाथीकी सूँड़के समान जाँघोंवाली द्रौपदी स्वामीकी आज्ञा शिरोधार्य करके राजसभासे अन्तःपुरमें चली गयी ।

विमुक्ता मृगशावाक्षी निरन्तरपयोधरा ।

प्रभा नक्षत्रराजस्य कालमेघैरिवावृता ॥

उसके स्तन एक- दूसरेसे सटे हुए थे, तथा नेत्र मृगशावकोंके समान चंचल हो रहे थे । वह कीचकके हाथसे छूटकर शोक और दुःखसे इस प्रकार मलिन हो रही थी, मानो चन्द्रमाकी प्रभा वर्षाकालके मेघोंसे आच्छादित हो गयी हो ।

यस्या ह्यर्थे पाण्डवेयास्त्यजेयुरपि जीवितम् ।

तां ते दृष्ट्वा तथा कृष्णां क्षमिणो धर्मचारिणः ॥

समयं नातिवर्तन्ते वेलामिव महोदधिः ॥ ) जिसके लिये समस्त पाण्डव अपने प्राणतक दे सकते थे, उसी कृष्णाको उस दशामें देखकर भी धर्मात्मा पाण्डव क्षमा धारण किये बैठे थे । जैसे समुद्र अपने तटकी सीमाका

पृष्ठ 2240

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उल्लंघन नहीं करता, उसी प्रकार वे अज्ञातवासके लिये स्वीकृत समयका अतिक्रमण नहीं कर रहे थे । सुदेष्णोवाच

कस्त्वावधीद् वरारोहे कस्माद् रोदिषि शोभने ।

कस्याद्य न सुखं भद्रे केन ते विप्रियं कृतम् ॥ ४८ ॥

सुदेष्णाने पूछा- वरारोहे! तुम्हें किसने मारा है? शोभने! तू क्यों रोती है? भद्रे! आज किसका सुख समाप्त हो गया? किसने तुम्हारा अपराध किया है? ४८ ॥

( किमिदं पद्मसंकाशं सुदन्तोष्ठाक्षिनासिकम् ।

रुदन्त्या अवमृष्टास्रं पूर्णेन्दुसमवर्चसम् ॥

कमलके समान कमनीय, सुन्दर दाँत, ओठ, नेत्र और नासिकासे सुशोभित तथा पूर्णचन्द्रके समान कान्तिमान् तुम्हारा यह मनोहर मुख ऐसा ( मलिन) क्यों हो रहा है? तुम रोती हुई अपने मुखपर बहे हुए आँसुओंको पोंछ रही हो ।

बिम्बोष्ठं कृष्णताराभ्यामत्यन्तरुचिरप्रभम् ।

नयनाभ्यामजिह्माभ्यां मुखं ते मुञ्चते जलम् ॥

काली पुतलीवाले सरल नेत्रोंसे सुशोभित, बिम्ब- फलके समान अरुण अधरोंसे उपलक्षित और अत्यन्त मनोहर प्रभासे प्रकाशित तुम्हारा मुख इस समय आँसू क्यों गिरा रहा है? । वैशम्पायन उवाच तीं निःश्वस्याब्रवीत् कृष्णा जानन्ती नाम पृच्छसि । भ्रात्रे त्वं मामनुप्रेष्य किमेवं त्वं विकत्थसे ॥ ) वैशम्पायनजी कहते हैं - जनमेजय! तब कृष्णाने लंबी साँसे खींचकर कहा - ' तुम सब कुछ जानती हुई भी मुझसे क्या पूछ रही हो? स्वयं ही मुझे अपने भाईके पास भेजकर अब इस प्रकारकी बातें क्यों बना रही हो? ' । द्रौपद्युवाच

कीचको मावधीत् तत्र सुराहारीं गतां तव ।

सभायां पश्यतो राज्ञो यथैव विजने वने ॥ ४ ९ ॥

द्रौपदी फिर बोली- मैं तुम्हारे लिये मदिरा लाने गयी थी । वहाँ कीचकने राजसभामें महाराजके देखते - देखते मुझपर प्रहार किया है; ठीक उसी तरह, जैसे कोई निर्जन वनमें किसी असहाय अबलापर आघात करता हो ॥ ४ ९ ॥ सुदेष्णोवाच घातयामि सुकेशान्ते कीचकं यदि मन्यसे ।