श्रीगणेशाय नमः।
महाभारत — खण्ड २ — पृष्ठ 2281–2290
महाभारत — खण्ड २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 2281–2290
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एवमेतत् करिष्यामि यथा सुश्रोणि भाषसे ।
एको भद्रे गमिष्यामि शून्यमावसथं तव ॥ १४ ॥
कीचक बोला- ठीक है । सुश्रोणि! तुम जैसा कहती हो, वैसा ही करूँगा । भद्रे! तुम्हारे सूने घरमें मैं अकेला ही जाऊँगा ॥ १४ ॥
समागमार्थं रम्भोरु त्वया मदनमोहितः ।
यथा त्वां नैव पश्येयुर्गन्धर्वाः सूर्यवर्चसः ॥ १५ ॥
रम्भोरु! मैं कामसे मोहित होकर तुम्हारे साथ समागमके लिये इस प्रकार आऊँगा, जिससे सूर्यके समान तेजस्वी गन्धर्व तुम्हें उस समय मेरे साथ न देख सकें ॥ १५ ॥
द्रौपद्युवाच
यदेतन्नर्तनागारं मत्स्यराजेन कारितम् ।
दिवात्र कन्या नृत्यन्ति रात्रौ यान्ति यथागृहम् ॥ १६ ॥
द्रौपदीने कहा – कीचक! मत्स्यराजने यह जो नृत्यशाला बनवायी है, उसमें दिनके समय कन्याएँ नृत्य करती हैं तथा रातमें अपने - अपने घर चली जाती हैं ॥
तमिस्रे तत्र गच्छेथा गन्धर्वास्तन्न जानते ।
तत्र दोषः परिहृतो भविष्यति न संशयः ॥ १७ ॥
वहाँ अँधेरा रहता है, अतः मुझसे मिलनेके लिये वहीं जाना । उस स्थानको गन्धर्व नहीं जानते । वहाँ मिलनेसे सब दोष दूर हो जायगा; इसमें संशय नहीं है ॥ १७ ॥
(कीचक उवाच
तथा भद्रे करिष्यामि यथा त्वं भीरु मन्यसे ।
एकः सन् नर्तनागारमागमिष्यामि शोभने ॥
समागमार्थं सुश्रोणि शपे च सुकृतेन मे । कीचक बोला— भद्रे! भीरु! तुम जैसा ठीक समझती हो, वैसा ही करूँगा । शोभने! मैं तुमसे मिलनेके लिये अकेला ही नृत्यशालामें आऊँगा । सुश्रोणि! यह बात मैं अपने पुण्यकी
शपथ खाकर कहता हूँ ।
यथा त्वां नावबुध्यन्ते गन्धर्वा वरवर्णिनि ॥
सत्यं ते प्रतिजानामि गन्धर्वेभ्यो न ते भयम् । ) वरवर्णिनी! मैं ऐसा प्रयत्न करूँगा, जिससे गन्धर्वोंको तुम्हारे विषयमें कुछ भी पता न लगे । मैं सच्ची प्रतिज्ञा करके कहता हूँ कि तुम्हें गन्धर्वोंसे कोई भय नहीं है । वैशम्पायन उवाच
तमर्थमपि जल्पन्त्याः कृष्णायाः कीचकेन ह ।
दिवसार्धं समभवन्मासेनैव समं नृप ॥ १८ ॥
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वैशम्पायनजी कहते हैं -राजन्! इस प्रकार कीचकके साथ बात करनेके बाद द्रौपदीको अवशिष्ट आधा दिन ( भीमसेनसे यह बात निवेदन करनेकी प्रतीक्षामें ) एक महीनेके समान भारी मालूम हुआ ॥ १८ ॥
कीचकोऽथ गृहं गत्वा भृशं हर्षपरिप्लुतः ।
सैरन्ध्रीरूपिणं मूढो मृत्युं तं नावबुद्धवान् ॥ १ ९ ॥
इधर कीचक महान् हर्षमें भरा हुआ अपने घरको गया । उस मूर्खको यह पता नहीं था कि सैरन्ध्रीके रूपमें मेरी मृत्यु आ रही है ॥ १ ९ ॥
गन्धाभरणमाल्येषु व्यासक्तः सविशेषतः ।
अलंचक्रे तदाऽऽत्मानं सत्वरः काममोहितः ॥ २० ॥
वह तो कामसे मोहित हो रहा था, अतः घर जाकर शीघ्र ही अपने - आपको ( गहने-कपड़ोंसे ) सजाने लगा । वह विशेषतः सुगन्धित पदार्थों, आभूषणों तथा मालाओंके सेवनमें संलग्न रहा ॥ २० ॥
तस्य तत् कुर्वतः कर्म कालो दीर्घ इवाभवत् ।
अनुचिन्तयतश्चापि तामेवायतलोचनाम् ॥ २१ ॥
मन- ही- मन विशाल नेत्रोंवाली द्रौपदीका बारंबार चिन्तन करते हुए शृंगार धारण करते समय कीचकको वह थोड़ा- सा समय भी उत्कण्ठावश बहुत बड़ा- सा प्रतीत हुआ ॥ २१ ॥
आसीदभ्यधिका चापि श्रीः श्रियं प्रमुमुक्षतः ।
निर्वाणकाले दीपस्य वर्तीमिव दिधक्षतः ॥ २२ ॥
वास्तवमें जो सदाके लिये राजलक्ष्मीसे वियुक्त होनेवाला है, उस कीचककी भी उस समय शृंगार आदि धारण करनेसे श्री ( शोभा ) बहुत बढ़ गयी थी । ठीक उसी तरह जैसे बुझनेके समय बत्तीको भी जला देनेकी इच्छावाले दीपककी प्रभा विशेष बढ़ जाती है ॥ २२ ॥
कृतसम्प्रत्ययस्तस्याः कीचकः काममोहितः ।
नाजानाद् दिवसं यान्तं चिन्तयानः समागमम् ॥ २३ ॥
काममोहित कीचकने द्रौपदीकी बातपर पूरा विश्वास कर लिया था; अतः उसके समागम- सुखका चिन्तन करते- करते उसे यह भी पता न चला कि दिन कब बीत गया ॥ २३ ॥
ततस्तु द्रौपदी गत्वा तदा भीमं महानसे ।
उपातिष्ठत कल्याणी कौरव्यं पतिमन्तिकम् ॥ २४ ॥
तदनन्तर कल्याणस्वरूपा द्रौपदी पाकशालामें अपने पति कुरुनन्दन भीमसेनके पास गयी ॥ २४ ॥
तमुवाच सुकेशान्ता कीचकस्य मया कृतः ।
संगम नर्तनागारे यथावोचः परंतप ॥ २५ ॥
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वहाँ सुन्दर लटोंवाली कृष्णाने कहा- ' शत्रुतापन! जैसा तुमने कहा था, उसके अनुसार मैंने कीचकको नृत्यशाला में मिलनेका संकेत कर दिया है ॥ २५ ॥
शून्यं स नर्तनागारमागमिष्यति कीचकः ।
एको निशि महाबाहो कीचकं तं निषूदय ॥ २६ ॥
‘ अतः महाबाहो! कीचक रातके समय उस सूनी नृत्यशालामें अकेला आवेगा । तुम वहीं उसे मार डालना ॥
तं सूतपुत्रं कौन्तेय कीचकं मददर्पितम् ।
गत्वा त्वं नर्तनागारं निर्जीवं कुरु पाण्डव ॥ २७ ॥
‘कुन्तीकुमार! पाण्डुनन्दन! तुम नृत्यगृहमें जाकर उस मदोन्मत्त सूतपुत्र कीचकको प्राणशून्य कर दो ॥ २७ ॥
दर्पाच्च सूतपुत्रोऽसौ गन्धर्वानवमन्यते ।
तं त्वं प्रहरतां श्रेष्ठ ह्रदान्नागमिवोद्धर ॥ २८ ॥
‘ प्रहार करनेवालोंमें श्रेष्ठ वीर! वह सूतपुत्र अपनी वीरताके घमंडमें आकर गन्धर्वोंकी अवहेलना करता है; अतः जलाशयसे सर्पकी भाँति उसे तुम इस जगत्से निकाल फेंको ॥ २८ ॥
अश्रु दुःखाभिभूताया मम मार्जस्व भारत ।
आत्मनश्चैव भद्रं ते कुरु मानं कुलस्य च ॥ २ ९ ॥
‘ भारत! तुम्हारा कल्याण हो । तुम कीचकको मारकर मुझ दुःखपीड़ित अबलाके आँसू पोंछो तथा अपना और अपने कुलका सम्मान बढ़ाओ ' ॥ २ ९ ॥ भीमसेन उवाच
स्वागतं ते वरारोहे यन्मां वेदयसे प्रियम् ।
न ह्यन्यं कञ्चिदिच्छामि सहायं वरवर्णिनि ॥ ३० ॥
भीमसेन बोले- वरारोहे! तुम्हारा स्वागत है; क्योंकि तुमने मुझे प्रिय संवाद सुनाया है । सुन्दरी! मैं इस कार्यमें दूसरे किसीको सहायक बनाना नहीं चाहता ॥
या मे प्रीतिस्त्वयाऽऽख्याता कीचकस्य समागमे ।
हत्वा हिडिम्बं सा प्रीतिर्ममासीद् वरवर्णिनि ॥ ३१ ॥
वरवर्णिनि! कीचकसे मिलनेके लिये तुमने जो शुभ संवाद दिया है और इसे सुनकर मुझे जितनी प्रसन्नता हुई है, ऐसी प्रसन्नता मुझे हिडिम्बासुरको मारकर प्राप्त हुई थी ॥ ३१ ॥
सत्यं भ्रातॄंश्च धर्मं च पुरस्कृत्य ब्रवीमि ते ।
कीचकं निहनिष्यामि वृत्रं देवपतिर्यथा ॥ ३२ ॥
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मैं सत्य, धर्म और भाइयोंको आगे करके – उनकी शपथ खाकर तुमसे कहता हूँ, जैसे देवराज इन्द्रने वृत्रासुरको मारा था, उसी प्रकार मैं भी कीचकका वध कर डालूँगा ॥ ३२ ॥
तं गह्वरे प्रकाशे वा पोथयिष्यामि कीचकम् ।
अथ चेदपि योत्स्यन्ति हिंसे मत्स्यानपि ध्रुवम् ॥ ३३ ॥
एकान्तमें या जन- समुदायमें जहाँ भी वह मिलेगा, कीचकको मैं कुचल डालूँगा और यदि मत्स्यदेशके लोग उसकी ओरसे युद्ध करेंगे, तो उन्हें भी निश्चय ही मार डालूँगा ॥ ३३ ॥
ततो दुर्योधनं हत्वा प्रतिपत्स्ये वसुन्धराम् ।
कामं मत्स्यमुपास्तां हि कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः ॥ ३४ ॥
तदनन्तर दुर्योधनको मारकर समूची पृथ्वीका राज्य ले लूँगा। भले ही कुन्तीपुत्र युधिष्ठिर यहाँ बैठकर मत्स्यराज विराटकी उपासना करते रहें ॥ ३४ ॥
द्रौपद्युवाच
यथा न संत्यजेथास्त्वं सत्यं वै मत्कृते विभो ।
निगूढस्त्वं तथा पार्थ कीचकं तं निषूदय ॥ ३५ ॥
द्रौपदीने कहा - प्रभो! तुम वही करो, जिससे मेरे लिये तुम्हें सत्यका परित्याग न करना पड़े । कुन्तीनन्दन! तुम अपनेको गुप्त रखकर ही उस कीचकका संहार करो ॥ ३५ ॥
भीमसेन उवाच
एवमेतत् करिष्यामि यथा त्वं भीरु भाषसे ।
अद्य तं सूदयिष्यामि कीचकं सह बान्धवैः ॥ ३६ ॥
भीमसेन बोले – ठीक है, भीरु! तुम जैसा कहती हो, वही करूँगा । आज मैं उस कीचकको उसके भाई - बन्धुओंसहित मार डालूँगा ॥ ३६ ॥
अदृश्यमानस्तस्याथ तमस्विन्यामनिन्दिते ।
नागो बिल्वमिवाक्रम्य पोथयिष्याम्यहं शिरः ।
अलभ्यामिच्छतस्तस्य कीचकस्य दुरात्मनः ॥ ३७ ॥
अनिन्दिते! गजराज जैसे बेलके फलपर पैर रखकर उसे कुचल दे, उसी प्रकार मैं अँधेरी रातमें उससे अदृश्य रहकर तुझ जैसी अलभ्य नारीको प्राप्त करनेकी इच्छावाले दुरात्मा कीचकके मस्तकको कुचल डालूँगा ॥ ३७ ॥
वैशम्पायन उवाच
भीमोऽथ प्रथमं गत्वा रात्रौ छन्न उपाविशत् ।
मृगं हरिरिवादृश्यः प्रत्याकाङ्क्षत कीचकम् ॥ ३८ ॥
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वैशम्पायनजी कहते हैं - राजन्! तदनन्तर भीमसेन रातके समय पहले ही जाकर नृत्यशालामें छिपकर बैठ गये और कीचककी इस प्रकार प्रतीक्षा करने लगे, जैसे सिंह अदृश्य रहकर मृगकी घातमें बैठा रहता है ॥ ३८ ॥
कीचकश्चाप्यलंकृत्य यथाकाममुपागमत् ।
तां वेलां नर्तनागारं पाञ्चालीसंगमाशया ॥ ३ ९ ॥
इधर कीचक भी इच्छानुसार वस्त्राभूषणोंसे सज- धजकर द्रौपदीके साथ समागमकी अभिलाषासे उसी समय नृत्यशालाके समीप आया ॥ ३ ९ ॥
मन्यमानः स संकेतमागारं प्राविशच्च तत् ।
प्रविश्य च स तद् वेश्म तमसा संवृतं महत् ॥ ४० ॥
उस गृहको संकेत- स्थान मानकर उसने भीतर प्रवेश किया। वह विशाल भवन सब ओरसे अन्धकारसे आच्छन्न हो रहा था ॥ ४० ॥
पूर्वागतं ततस्तत्र भीममप्रतिमौजसम् ।
एकान्तावस्थितं चैनमाससाद स दुर्मतिः ॥ ४१ ॥
शयानं शयने तत्र सूतपुत्रः परामृशत् ।
जाज्वल्यमानं कोपेन कृष्णाधर्षणजेन ह ॥ ४२ ॥
अतुलितपराक्रमी भीमसेन तो वहाँ पहलेसे ही आकर एकान्तमें एक शय्यापरलेटेहुए थे । खोटी बुद्धिवाला सूतपुत्र कीचक वहीं पहुँच गया और उन्हें हाथसे टटोलने लगा । उस समय भीमसेन कीचकद्वारा द्रौपदीके अपमानके कारण क्रोधसे जल रहे थे ॥ ४१-४२ ॥
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उपसंगम्य चैवैनं कीचकः काममोहितः ।
हर्षोन्मथितचित्तात्मा स्मयमानोऽभ्यभाषत ॥ ४३ ॥
उनके पास पहुँचते ही काममोहित कीचक हर्ष से उन्मत्तचित्त हो मुसकराते हुए बोला ॥ ४३ ॥
प्रापितं ते मया वित्तं बहुरूपमनन्तकम् ।
यत् कृतं धनरत्नाढ्यं दासीशतपरिच्छदम् ॥ ४४ ॥
रूपलावण्ययुक्ताभिर्युवतीभिरलंकृतम् ।
गृहं चान्तःपुरं सुभ्रु क्रीडारतिविराजितम् ।
तत् सर्वं त्वां समुद्दिश्य सहसाहमुपागतः ॥ ४५ ॥
' सुभ्रु! मैंने अनेक प्रकारका जो अनन्त धन संचित किया है, वह सब तुम्हें भेंट कर दिया तथा मेरा जो धन-रत्नादिसे सम्पन्न, सैकड़ों दासी आदि उपकरणोंसे युक्त, रूप-लावण्यवती युवतियोंसे अलंकृत तथा क्रीडा -विलाससे सुशोभित गृह एवं अन्तःपुर है, वह सब तुम्हारे लिये ही निछावर करके मैं सहसा तुम्हारे पास चला आया हूँ ॥ ४४-४५ ॥
अकस्मान्मां प्रशंसन्ति सदा गृहगताः स्त्रियः ।
सुवासा दर्शनीयश्च नान्योऽस्ति त्वादृशः पुमान् ॥ ४६ ॥
मेरे घरकी स्त्रियाँ अकस्मात् मेरी प्रशंसा करने लगती हैं और कहती हैं — ' आपके समान सुन्दर वस्त्रधारी और दर्शनीय दूसरा कोई पुरुष नहीं है ' ॥ ४६ ॥
भीमसेन उवाच
दिष्ट्या त्वं दर्शनीयोऽथ दिष्ट्याऽऽत्मानं प्रशंससि ।
ईदृशस्तु त्वया स्पर्शः स्पृष्टपूर्वो न कर्हिचित् ॥ ४७ ॥
भीमसेन बोले – सौभाग्यकी बात है कि तुम ऐसे दर्शनीय हो और यह भी भाग्यकी ही बात है कि तुम स्वयं ही अपनी प्रशंसा कर रहे हो । परंतु ऐसा कोमल स्पर्श भी तुम्हें पहले कभी नहीं प्राप्त हुआ होगा ॥
स्पर्शं वेत्सि विदग्धस्त्वं कामधर्मविचक्षणः ।
स्त्रीणां प्रीतिकरो नान्यस्त्वत्समः पुरुषस्त्विह ॥ ४८ ॥
स्पर्शको तो तुम खूब पहचानते हो । इस कलामें बड़े चतुर हो । कामधर्मके विलक्षण ज्ञाता जान पड़ते हो । इस संसारमें स्त्रियोंको प्रसन्न करनेवाला तुम्हारे सिवा दूसरा कोई पुरुष नहीं है ॥ ४८ ॥
वैशम्पायन उवाच
इत्युक्त्वा तं महाबाहुर्भीमो भीमपराक्रमः ।
सहसोत्पत्य कौन्तेयः प्रहस्येदमुवाच ह ॥ ४ ९ ॥
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वैशम्पायनजी कहते हैं - राजन्! कीचकसे ऐसा कहकर भयंकरपराक्रमी कुन्तीपुत्र महाबाहु भीमसेन सहसा उछलकर खड़े हो गये और हँसते हुए इस प्रकार बोले ॥ ४ ९ ॥
अद्य त्वां भगिनी पापं कृष्यमाणं मया भुवि ।
द्रक्ष्यतेऽद्रिप्रतीकाशं सिंहेनेव महागजम् ॥ ५० ॥
‘ अरे! तू पर्वतके समान विशालकाय है, तो भी जैसे सिंह महान् गजराजको घसीटता है, उसी प्रकार आज मैं तुझ पापीको पृथ्वीपर पटककर घसीदूँगा और तेरी बहिन यह सब देखेगी ॥ ५० ॥
निराबाधा त्वयि हते सैरन्ध्री विचरिष्यति ।
सुखमेव चरिष्यन्ति सैरन्ध्याः पतयः सदा ॥ ५१ ॥
‘ इस प्रकार तेरे मारे जानेपर सैरन्ध्री बेखटके विचरेगी और उसके पति भी सदा सुखसे ही रहेंगे ' ॥ ५१ ॥
ततो जग्राह केशेषु माल्यवत्सु महाबलः ।
स केशेषु परामृष्टो बलेन बलिनां वरः ॥ ५२ ॥
आक्षिप्य केशान् वेगेन बाह्वोर्जग्राह पाण्डवम् ।
बाहुयुद्धं तयोरासीत् क्रुद्धयोर्नरसिंहयोः ॥ ५३ ॥
वसन्ते वासिताहेतोर्बलवद्गजयोरिव । ऐसा कहकर महाबली भीमसेनने उसके पुष्पहार- विभूषित केश पकड़ लिये । कीचक भी बलवानोंमें श्रेष्ठ था । सिरके बाल पकड़ लिये जानेपर उसने बलपूर्वक झटका देकर उन्हें छुड़ा लिया और बड़ी फुर्तीसे पाण्डुनन्दन भीमको दोनों भुजाओंमें भर लिया । तदनन्तर क्रोधमें भरे हुए उन दोनों पुरुषसिंहोंमें बाहुयुद्ध होने लगा, मानो वसन्त-ऋतुमें हथिनीके लिये दो बलवान् गजराज एक- दूसरे से जूझ रहे हों ॥ ५२-५३ ॥ कीचकानां तु मुख्यस्य नराणामुत्तमस्य च ॥ ५४ ॥
वालिसुग्रीवयोर्भ्रात्रोः पुरेव कपिसिंहयोः ।
अन्योन्यमपि संरब्धौ परस्परजयैषिणौ ॥ ५५ ॥
एक ओर कीचकोंका प्रधान कीचक था, तो दूसरी ओर मनुष्योंमें श्रेष्ठ भीमसेन । जैसे पूर्वकालमें कपिश्रेष्ठ वाली और सुग्रीव दोनों भाइयोंमें घोर युद्ध हुआ था, वैसा ही इन दोनोंमें भी होने लगा । दोनों एक-दूसरेपर कुपित थे और परस्पर विजय पानेकी इच्छासे लड़ रहे थे ॥ ५४-५५ ॥
ततः समुद्यम्य भुजौ पञ्चशीर्षाविवोरगौ ।
नखदंष्ट्राभिरन्योन्यं घ्नतः क्रोधविषोद्धतौ ॥ ५६ ॥
फिर दोनों क्रोधरूपी विषसे उद्धत हुए पाँच मस्तकोंवाले सर्पोंकी भाँति अपनी- अपनी ( पाँच अंगुलियोंसे युक्त ) भुजाओंको ऊपर उठाकर एक- दूसरेपर नखों और दाँतोंसे प्रहार
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करने लगे ॥ ५६ ॥
वेगेनाभिहतो भीमः कीचकेन बलीयसा ।
स्थिरप्रतिज्ञः स रणे पदान्न चलितः पदम् ॥ ५७ ॥
बलिष्ठ कीचकने बड़े वेगसे आघात किया, तो भी दृढ़प्रतिज्ञ भीम उस युद्धमें स्थिर रहे; एक पग भी पीछे नहीं हटे ॥ ५७ ॥
तावन्योन्यं समाश्लिष्य प्रकर्षन्तौ परस्परम् ।
उभावपि प्रकाशेते प्रवृद्धौ वृषभाविव ॥ ५८ ॥
फिर दोनों आपसमें गुँथ गये और एक- दूसरेको खींचने लगे । उस समय वे दो हृष्ट - पुष्ट साँड़ोंकी भाँति सुशोभित होते थे ॥ ५८ ॥
तयोर्ह्यासीत् सुतुमुलः सम्प्रहारः सुदारुणः ।
नखदन्तायुधवतोर्व्याघ्रयोरिव दृप्तयोः ॥ ५ ९ ॥
नख और दाँत ही उनके आयुध थे । जैसे दो मतवाले व्याघ्र परस्पर लड़ रहे हों, उसी प्रकार उनमें अत्यन्त भयंकर तुमुल युद्ध होने लगा ॥ ५ ९ ॥
अभिपत्याथ बाहुभ्यां प्रत्यगृह्णादमर्षितः ।
मातङ्ग इव मातङ्गं प्रभिन्नकरटामुखम् ॥ ६० ॥
जैसे क्रोधमें भरा हुआ एक हाथी गण्डस्थलसे मद टपकाते हुए दूसरे हाथीको सूँड़से पकड़ ले, उसी प्रकार रोषयुक्त कीचकने सहसा झपटकर दोनों हाथोंसे भीमसेनको पकड़ लिया ॥ ६० ॥
स चाप्येनं तदा भीमः प्रतिजग्राह वीर्यवान् ।
तमाक्षिपत् कीचकोऽथ बलेन बलिनां वरः ॥ ६१ ॥
तब पराक्रमी भीमने भी झपटकर उसे पकड़ा, किंतु बलवानोंमें श्रेष्ठ कीचकने बलपूर्वक उन्हें झटक दिया ॥ ६१ ॥
तयोर्भुजविनिष्येषादुभयोर्बलिनोस्तदा ।
शब्दः समभवद् घोरो वेणुस्फोटसमो युधि ॥ ६२ ॥
उस समय उस युद्धमें उन दोनों बलवानोंकी भुजाओंकी रगड़से बाँस फटनेका - सा भयानक शब्द होने लगा ॥ ६२ ॥
अथैनमाक्षिप्य बलाद् गृहमध्ये वृकोदरः ।
धूनयामास वेगेन वायुश्चण्ड इव द्रुमम् ॥ ६३ ॥
फिर जिस प्रकार प्रचण्ड आँधी वृक्षको झकझोर डालती है, उसी प्रकार भीमसेन कीचकको बलपूर्वक धक्के दे - देकर उसे नृत्यशालामें वेगसे घुमाने लगे ॥ ६३ ॥
भीमेन च परामृष्टो दुर्बलो बलिना रणे ।
प्रास्पन्दत यथाप्राणं विचकर्ष च पाण्डवम् ॥ ६४ ॥
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उस युद्धमें बलवान् भीमकी पकड़में आकर यद्यपि कीचक अपना बल खो रहा था, तथापि वह यथाशक्ति उन्हें परास्त करनेकी चेष्टा करता रहा और भीमसेनको अपनी ओर खींचने लगा ॥ ६४ ॥
ईषदाकलितं चापि क्रोधाद् द्रुतपदं स्थितम् ।
कीचको बलवान् भीमं जानुभ्यामाक्षिपद् भुवि ॥ ६५ ॥
जब वे कुछ- कुछ वशमें आ गये और उनका पैर कुछ लड़खड़ाने लगा, तब उस दशामें खड़े हुए भीमसेनको बलवान् कीचकने क्रोधपूर्वक दोनों घुटनोंसे मारकर पृथ्वीपर गिरा दिया ॥ ६५ ॥
पातितो भुवि भीमस्तु कीचकेन बलीयसा ।
उत्पपाताथ वेगेन दण्डपाणिरिवान्तकः ॥ ६६ ॥
अत्यन्त बलशाली कीचकद्वारा इस प्रकार भूमिपर गिराये हुए भीमसेन हाथमें दण्ड धारण करनेवाले यमराजकी भाँति बड़े वेगसे उछलकर खड़े हो गये ॥ ६६ ॥
स्पर्धया च बलोन्मत्तौ तावुभौ सूतपाण्डवौ ।
निशीथे पर्यकर्षेतां बलिनौ निर्जने स्थले ॥ ६७ ॥
सूतपुत्र और पाण्डुनन्दन दोनों बलसे उन्मत्त हो रहे थे । वे दोनों बलवान् वीर स्पर्धाके कारण उस निर्जन स्थानमें आधी रातके समय एक- दूसरेको खींचते और धक्के देते रहे ॥ ६७ ॥
ततस्तद् भवनं श्रेष्ठं प्राकम्पत मुहुर्मुहुः ।
बलवच्चापि संक्रुद्धावन्योन्यं प्रति गर्जतः ॥ ६८ ॥
इससे वह विशाल भवन बार- बार हिल उठता था । दोनों योद्धा बड़े क्रोधमें भरकर एक- दूसरेके सामने जोर- जोरसे गरज रहे थे ॥ ६८ ॥
तलाभ्यां स तु भीमेन वक्षस्यभिहतो बली ।
कीचको रोषसंतप्तः पदान्न चलितः पदम् ॥ ६ ९ ॥
इतनेमें ही भीमने दोनों हथेलियोंसे कीचककी छातीपर प्रहार किया । चोट खाकर बलवान् कीचक क्रोधसे जल उठा, किंतु अपने स्थानसे एक पग भी विचलित नहीं हुआ ॥ ६ ९ ॥
मुहूर्तं तु स तं वेगं सहित्वा भुवि दुःसहम् ।
बलादहीयत तदा सूतो भीमबलार्दितः ॥ ७० ॥
भूमिपर खड़े रहकर दो घड़ीतक उस दुःसह वेगको सह लेनेके पश्चात् भीमसेनके बलसे पीड़ित हो सूतपुत्र कीचक अपनी शक्ति खो बैठा ॥ ७० ॥
तं हीयमानं विज्ञाय भीमसेनो महाबलः ।
वक्षस्यानीय वेगेन ममर्दैनं विचेतसम् ॥ ७१ ॥
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महाबली भीमसेन उसे निर्बल एवं अचेत होते देख उसकी छातीपर चढ़ बैठे और बड़े वेगसे उसे रौंदने लगे ॥ ७१ ॥
क्रोधाविष्टो विनिःश्वस्य पुनश्चैनं वृकोदरः ।
जग्राह जयतां श्रेष्ठः केशेष्वेव तदा भृशम् ॥ ७२ ॥
विजयी वीरोंमें श्रेष्ठ भीमसेनका क्रोधावेश अभी उतरा नहीं था । उन्होंने पुनः बारंबार उच्छ्वास लेकर कीचकके केश पकड़ लिये ॥ ७२ ॥
गृहीत्वा कीचकं भीमो विरराज महाबलः ।
शार्दूलः पिशिताकाङ्क्षी गृहीत्वेव महामृगम् ॥ ७३ ॥
जैसे कच्चे मांसकी अभिलाषा रखनेवाला सिंह महान् मृगको पकड़ ले, उसी प्रकार महाबली भीम कीचकको पकड़कर बड़ी शोभा पा रहे थे ॥ ७३ ॥
तत एनं परिश्रान्तमुपलभ्य वृकोदरः ।
योक्त्रयामास बाहुभ्यां पशुं रशनया यथा ॥ ७४ ॥
तदनन्तर उसे अत्यन्त थका जानकर भीमने अपनी भुजाओंमें इस प्रकार कस लिया, जैसे पशुको रस्सीसे बाँध दिया गया हो ॥ ७४ ॥
नदन्तं च महानादं भिन्नभेरीसमस्वनम् ।
भ्रामयामास सुचिरं विस्फुरन्तमचेतसम् ॥ ७५ ॥
अब वह फूटे नगारेके समान विकृत स्वरमें जोर- जोर से सिंहनाद करने तथा बन्धनसे छूटनेके लिये छटपटाने लगा । उसकी चेतना लुप्त हो रही थी । उसी दशामें भीमसेनने बहुत देरतक उसे घुमाया ॥ ७५ ॥
प्रगृह्य तरसा दोर्भ्यां कण्ठं तस्य वृकोदरः ।
अपीडयत कृष्णायास्तदा कोपोपशान्तये ॥ ७६ ॥
फिर द्रौपदीका क्रोध शान्त करनेके लिये उन्होंने दोनों हाथोंसे उसका गला पकड़कर बड़े वेगसे दबाया ॥ अथ तं भग्नसर्वाङ्गं व्याविद्धनयनाम्बरम् ।
आक्रम्य च कटीदेशे जानुना कीचकाधमम् ।
अपीडयत बाहुभ्यां पशुमारममारयत् ॥ ७७ ॥
इस प्रकार जब उसके सब अंग भग्न हो गये, आँखकी पुतलियाँ बाहर निकल आयीं और वस्त्र फट गये, तब उन्होंने उस कीचकाधमकी कमरको अपने घुटनोंसे दबाकर दोनों भुजाओंद्वारा उसका गला घोंट दिया और उसे पशुकी तरह मारने लगे ॥ ७७ ॥
तं विषीदन्तमाज्ञाय कीचकं पाण्डुनन्दनः ।
भूतले भ्रामयामास वाक्यं चेदमुवाच ह ॥ ७८ ॥
मृत्युके समय कीचकको विषाद करते देख पाण्डुनन्दन भीमने उसे धरतीपर घसीटा और इस प्रकार कहा— ॥ ७८ ॥