श्रीगणेशाय नमः।
महाभारत — खण्ड २ — पृष्ठ 2291–2300
महाभारत — खण्ड २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 2291–2300
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अद्याहमनृणो भूत्वा भ्रातुर्भार्यापहारिणम् ।
शान्तिं लब्धास्मि परमां हत्वा सैरन्ध्रिकण्टकम् ॥ ७९ ॥
' जो सैरन्ध्रीके लिये कण्टक था, जिसने मेरे भाईकी पत्नीका अपहरण करनेकी चेष्टा की थी, उस दुष्ट कीचकको मारकर आज मैं उऋण हो जाऊँगा और मुझे बड़ी शान्ति मिलेगी' ॥ ७ ९ ॥
इत्येवमुक्त्वा पुरुषप्रवीर- स्तं कीचकं क्रोधसरागनेत्रः ।
आस्रस्तवस्त्राभरणं स्फुरन्त- मुद्भ्रान्तनेत्रं व्यसुमुत्ससर्ज ॥ ८० ॥
पुरुषोंमें उत्कृष्ट वीर भीमसेनके नेत्र क्रोधसे लाल हो रहे थे। उन्होंने उपर्युक्त बातें कहकर कीचकको नीचे डाल दिया । उस समय उसके गहने - कपड़े इधर- उधर बिखर गये थे । वह छटपटा रहा था । उसकी आँखें ऊपरको चढ़ गयी थीं और उसके प्राणपखेरू निकल रहे थे ॥ ८० ॥
निष्पिष्य पाणिना पाणिं संदष्टौष्ठपुटं बली ।
समाक्रम्य च संक्रुद्धो बलेन बलिनां वरः ॥ ८१ ॥
बलवानोंमें श्रेष्ठ भीम अब भी क्रोधमें भरे थे । वे हाथसे हाथ मलते हुए दाँतोंसे ओठ दबाकर पुनः बलपूर्वक कीचकके ऊपर चढ़ गये ॥ ८१ ॥
तस्य पादौ च पाणी च शिरो ग्रीवां च सर्वशः ।
काये प्रवेशयामास पशोरिव पिनाकधृक् ॥ ८२ ॥
तदनन्तर जैसे महादेवजीने गयासुरके सब अंगोंको उसके शरीरके भीतर घुसेड़ दिया था, उसी प्रकार उन्होंने भी कीचकके हाथ, पैर, सिर और गर्दन आदि सब अंगोंको उसके धड़में ही घुसा दिया ॥ ८२ ॥
तं सम्मथितसर्वाङ्गं मांसपिण्डोपमं कृतम् ।
कृष्णाया दर्शयामास भीमसेनो महाबलः ॥ ८३ ॥
महाबली भीमने उसका सारा शरीर मथ डाला और उसे मांसका लोंदा-सा बना दिया ।
इसके बाद उन्होंने द्रौपदीको दिखाया ॥ ८३ ॥
उवाच च महातेजा द्रौपदीं योषितां वराम् ।
पश्यैनमेहि पाञ्चालि कामुकोऽयं यथा कृतः ॥ ८४ ॥
उस समय महातेजस्वी भीमने युवतियोंमें श्रेष्ठ द्रौपदीसे कहा- ' पांचाली! यहाँ आओ और इसे देखो । इस कामीकी शक्ल कैसी बना दी है! ' ॥ ८४ ॥
एवमुक्त्वा महाराज भीमो भीमपराक्रमः ।
पादेन पीडयामास तस्य कायं दुरात्मनः ॥ ८५ ॥
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महाराज! भयंकर पराक्रमी भीमने ऐसा कहकर उस दुरात्माकी लाशको पैरसे दबाया ॥ ८५ ॥
ततोऽग्निं तत्र प्रज्वाल्य दर्शयित्वा तु कीचकम् ।
पाञ्चालीं स तदा वीर इदं वचनमब्रवीत् ॥ ८६ ॥
फिर वहाँ आग जलाकर उन्होंने कीचकका शव दिखाया । उस समय वीरवर भीमने पांचालीसे यह बात कही— ॥ ८६ ॥
प्रार्थयन्ति सुकेशान्ते ये त्वां शीलगुणान्विताम् ।
एवं ते भीरु वध्यन्ते कीचकः शोभते यथा ॥ ८७ ॥
' सुन्दर केशोंवाली भीरु पांचाली! तुम सुशील और सद्गुणोंसे सम्पन्न हो । जो दुष्ट तुमसे समागमकी याचना करेंगे, वे इसी प्रकार मारे जायँगे । जैसे आज कीचक शोभा पाता है, वही दशा उनकी भी होगी ' ॥ ८७ ॥
तत् कृत्वा दुष्करं कर्म कृष्णायाः प्रियमुत्तमम् ।
तथा स कीचकं हत्वा गत्वा रोषस्य वै शमम् ॥ ८८ ॥
आमन्त्र्य द्रौपदीं कृष्णां क्षिप्रमायान्महानसम् ।
कीचकं घातयित्वा तु द्रौपदी योषितां वरा ।
प्रहृष्टा गतसंतापा सभापालानुवाच ह ॥ ८ ९ ॥
द्रौपदीको प्रिय लगनेवाले इस उत्तम एवं दुष्कर कर्मको करके ऊपर बताये अनुसार कीचकको मारकर अपना रोष शान्त करनेके पश्चात् द्रौपदीसे पूछकर भीमसेन पुनः पाकशालामें चले गये । युवतियोंमें श्रेष्ठ द्रौपदी इस प्रकार कीचकको मरवाकर बड़ी प्रसन्न हुई । उसके सब संताप दूर हो गये । फिर वह सभाभवनके रक्षकोंके पास जाकर बोली ॥ ८८-८९ ॥
कीचकोऽयं हतः शेते गन्धर्वैः पतिभिर्मम ।
परस्त्रीकामसम्मत्तस्तत्रागच्छत पश्यत ॥ ९ ० ॥
'आओ, देखो, ' परायी स्त्रीके प्रति कामोन्मत्त रहनेवाला यह कीचक मेरे पति गन्धर्वोंद्वारा मारा जाकर वहाँ नृत्यशालामें पड़ा है ' ॥ ९ ० ॥
तच्छ्रुत्वा भाषितं तस्या नर्तनागाररक्षिणः ।
सहसैव समाजग्मुरादायोल्काः सहस्रशः ॥ ९ १ ॥
उसका यह कथन सुनकर नृत्यशालाके रक्षक सहस्रोंकी संख्यामें हाथोंमें मसाल लिये सहसा वहाँ आये ॥ ९ १ ॥
ततो गत्वाथ तद् वेश्म कीचकं विनिपातितम् ।
गतासुं ददृशुर्भूमौ रुधिरेण समुक्षितम् ॥ ९ २ ॥
और उस घरके भीतर जाकर उन्होंने देखा; कीचकको गन्धर्वने मार गिराया है, उसके प्राण निकल गये हैं और उसकी लाश खूनसे लथपथ होकर धरतीपर पड़ी है ॥ ९ २ ॥
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पाणिपादविहीनं तु दृष्ट्वा च व्यथिताऽभवन् ।
निरीक्षन्ति ततः सर्वे परं विस्मयमागताः ॥ ९ ३ ॥
उसे हाथ - पैरसे हीन देख उन सबको बड़ी व्यथा हुई । फिर वे सभी बड़े आश्चर्यमें पड़कर उसे ध्यानसे देखने लगे ॥ ९ ३ ॥ अमानुषं कृतं कर्म तं दृष्ट्वा विनिपातितम् ।
क्वास्य ग्रीवा क्व चरणौ क्व पाणी क्व शिरस्तथा ।
इति स्म तं परीक्षन्ते गन्धर्वेण हतं तदा ॥ ९ ४ ॥
कीचकको इस तरह मारा गया देख वे आपसमें बोले-- -'यह कर्म तो किसी मनुष्यका किया हुआ नहीं हो सकता । देखो न, इसकी गर्दन, हाथ, पैर और सिर आदि अंग कहाँ चले गये? ' यों कहकर जब परीक्षा की, तो वे इसी निश्चयपर पहुँचे कि हो न हो, इसे गन्धर्वने ही मारा है ॥ ९ ४ ॥ इति श्रीमहाभारते विराटपर्वणि कीचकवधपर्वणि कीचकवधे द्वाविंशोऽध्यायः ॥ २२ इस प्रकार श्रीमहाभारत विराटपर्वके अन्तर्गत कीचकवधपर्वमें कीचकवधविषयक बाईसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २२ ॥
( दाक्षिणात्य अधिक पाठके २ श्लोक मिलाकर कुल ९ ६३ श्लोक हैं। )
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त्रयोविंशोऽध्यायः उपकीचकोंका सैरन्ध्रीको बाँधकर श्मशानभूमिमें ले जाना और भीमसेनका उन सबको मारकर सैरन्ध्रीको छुड़ाना वैशम्पायन उवाच
तस्मिन् काले समागम्य सर्वे तत्रास्य बान्धवाः ।
रुरुदुः कीचकं दृष्ट्वा परिवार्य समन्ततः ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं -जनमेजय! उसी समय यह समाचार पाकर कीचकके सब बन्धु- बान्धव वहाँ आ गये । वे कीचककी यह दशा देख उसे चारों ओरसे घेरकर विलाप करने लगे ॥ १ ॥
सर्वे संहृष्टरोमाणः संत्रस्ताः प्रेक्ष्य कीचकम् ।
तथा सम्भिन्नसर्वाङ्गं कूर्मं स्थल इवोद्धृतम् ॥ २ ॥
उसके सारे अवयव शरीरमें घुस गये थे, इसलिये वह जलसे निकालकर स्थलमें रखे हुए कछुएके समान जान पड़ता था । कीचकके शवकी वह दुर्गति देखकर वे सब थर्रा उठे, उन सबके रोंगटे खड़े हो गये ॥ २ ॥
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पोथितं भीमसेनेन तमिन्द्रेणेव दानवम् ।
संस्कारयितुमिच्छन्तो बहिर्नेतुं प्रचक्रमुः ॥ ३ ॥
जैसे इन्द्रने दानव वृत्रासुरका वध किया था, उसी प्रकार भीमसेनके हाथसे मारे गये उस कीचकका दाह - संस्कार करनेकी इच्छासे उसके बान्धवगण उसे बाहर ( श्मशानभूमिमें) ले जानेकी तैयारी करने लगे ॥ ३ ॥
ददृशुस्ते ततः कृष्णां सूतपुत्राः समागताः ।
अदूराच्चानवद्याङ्गीं स्तम्भमालिङ्गय तिष्ठतीम् ॥ ४ ॥
इसी समय वहाँ आये हुए सूतपुत्रोंने देखा, निर्दोष अंगोंवाली द्रौपदी थोड़ी ही दूरपर एक खंभेका सहारा लिये खड़ी है ॥ ४ ॥
समवेतेषु सर्वेषु तामूचुरुपकीचकाः ।
हन्यतां शीघ्रमसती यत्कृते कीचको हतः ॥ ५ ॥
जब सब लोग जुट गये, तब उन उपकीचकों ( कीचकके भाइयों ) ने द्रौपदीको लक्ष्य करके कहा — ‘ इस दुष्टाको शीघ्र मार डाला जाय, क्योंकि इसीके लिये कीचककी जान गयी है ॥ ५ ॥
अथवा नैव हन्तव्या दह्यतां कामिना सह ।
मृतस्यापि प्रियं कार्यं सूतपुत्रस्य सर्वथा ॥ ६ ॥
' अथवा मारा न जाय । कामी कीचककी लाशके साथ ही इसे भी जला दिया जाय । मर जानेपर भी सूतपुत्रका जो प्रिय हो; जिससे उसकी आत्मा प्रसन्न हो, वह कार्य हमें सर्वथा करना चाहिये ' ॥ ६ ॥
ततो विराटमूचुस्ते कीचकोऽस्याः कृते हतः ।
सहानेनाद्य दह्येम तदनुज्ञातुमर्हसि ॥ ७ ॥
तदनन्तर उन्होंने विराटसे कहा- ' इस सैरन्ध्रीके लिये ही कीचक मारा गया है, अतः आज हम कीचककी लाशके साथ इसे भी जला देना चाहते हैं, आप इसके लिये आज्ञा दें ' ॥ ७ ॥
पराक्रमं तु सूतानां मत्वा राजान्वमोदत ।
सैरन्ध्याः सूतपुत्रेण सह दाहं विशाम्पतिः ॥ ८ ॥
राजाने सूतपुत्रोंके पराक्रमका विचार करके सैरन्ध्रीको कीचकके साथ जला डालनेकी अनुमति दे दी ॥ ८ ॥
तां समासाद्य वित्रस्तां कृष्णां कमललोचनाम् ।
मोमुह्यमानां ते तत्र जगृहुः कीचका भृशम् ॥ ९ ॥
फिर क्या था, उपकीचकोंने उसके पास जाकर भयभीत एवं मूर्च्छित हुई कमललोचना कृष्णाको बलपूर्वक पकड़ लिया ॥ ९ ॥
ततस्तु तां समारोप्य निबध्य च सुमध्यमाम् ।
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जग्मुरुद्यम्य ते सर्वे श्मशानाभिमुखास्तदा ॥ १० ॥
फिर उन्होंने सुन्दर कटिभागवाली उस देवीको टिकटीपर चढ़ाकर लाशके साथ ही बाँध दिया । इसके बाद वे सब लोग मृतकको उठाकर श्मशानभूमिकी ओर ले चले ॥ १० ॥
ह्रियमाणा तु सा राजन् सूतपुत्रैरनिन्दिता ।
प्राक्रोशन्नाथमिच्छन्ती कृष्णा नाथवती सती ॥ ११ ॥
राजन्! सूतपुत्रोंद्वारा इस प्रकार ले जायी जाती हुई सती द्रौपदी सनाथा होकर भी [अनाथा - सी हो रही थी, वह] नाथ (रक्षक) -की इच्छा करती हुई जोर-जोरसे पुकारने लगी ॥ ११ ॥
द्रौपद्युवाच
जय जयन्तो विजयो जयत्सेनो जयद्बलः ।
ते मे वाचं विजानन्तु सूतपुत्रा नयन्ति माम् ॥ १२ ॥
द्रौपदी बोली- मेरे पति जय, जयन्त, विजय, जयत्सेन और जयद्बल जहाँ भी हों, मेरी यह आर्त वाणी सुनें और समझें । ये सूतपुत्र मुझे श्मशानमें लिये जा रहे हैं ॥ १२ ॥
येषां ज्यातलनिर्घोषो विस्फूर्जितमिवाशनेः ।
व्यश्रूयत महायुद्धे भीमघोषस्तरस्विनाम् ॥ १३ ॥
रथघोषश्च बलवान् गन्धर्वाणां तरस्विनाम् ।
ते मे वाचं विजानन्तु सूतपुत्रा नयन्ति माम् ॥ १४ ॥
जिन वेगवान् गन्धर्वोंके धनुषोंकी प्रत्यंचाका भीषण शब्द वज्राघातके समान सुनायी देता है तथा जिनके रथोंकी घर्घराहटकी आवाज भी बड़े जोरसे उठती और दूरतक फैलती है, वे मेरी आर्त वाणी सुनें और समझें । ये सुतपुत्र मुझे श्मशानमें ले जा रहे हैं ॥ १३-१४ ॥ वैशम्पायन उवाच
तस्यास्ताः कृपणा वाचः कृष्णायाः परिदेवितम् ।
श्रुत्वैवाभ्यापतद् भीमः शयनादविचारयन् ॥ १५ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं - राजन्! द्रौपदीकी वह दीन वाणी और करुण विलाप सुनते ही भीमसेन बिना कोई विचार किये शय्यासे कूद पड़े ॥ १५ ॥
भीमसेन उवाच
अहं शृणोमि ते वाचं त्वया सैरन्ध्रि भाषिताम् ।
तस्मात् ते सूतपुत्रेभ्यो भयं भीरु न विद्यते ॥ १६ ॥
भीमसेन बोले — सैरन्ध्री! तुम जो कुछ कह रही हो, तुम्हारी वह वाणी मैं सुनता हूँ ।
इसलिये भीरु! अब इन सूतपुत्रोंसे तेरे लिये कोई भय नहीं है ॥ १६ ॥
वैशम्पायन उवाच
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इत्युक्त्वा स महाबाहुर्विजजृम्भे जिघांसया ।
ततः स व्यायतं कृत्वा वेषं विपरिवर्त्य च ॥ १७ ॥
अद्वारेणाभ्यवस्कन्द्य निर्जगाम बहिस्तदा ।
स भीमसेनः प्राकारादारुह्य तरसा द्रुमम् ॥ १८ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं - राजन्! ऐसा कहकर महाबाहु भीमसेनने उपकीचकोंका वध करनेके लिये अँगड़ाई लेते हुए अपने शरीरको बढ़ा लिया और प्रयत्नपूर्वक वेष बदलकर बिना दरवाजेके ही दीवार फाँदकर पाकशालासे बाहर निकल गये । फिर वे नगरका परकोटा लाँघकर बड़े वेगसे एक वृक्षपर चढ़ गये ( और वहींसे यह देखने लगे कि उपकीचक द्रौपदीको किधर ले जा रहे हैं ) ॥ १७-१८ ॥ श्मशानाभिमुखः प्रायाद् यत्र ते कीचका गताः ।
स लङ्घयित्वा प्राकारं निःसृत्य च पुरोत्तमात् ।
जवेन पतितो भीमः सूतानामग्रतस्तदा ॥ १९ ॥
तत्पश्चात् वे उपकीचक जिधर गये थे, उसी ओर भीमसेन भी श्मशानभूमिकी दिशामें चल दिये । चहारदीवारी लाँघनेके पश्चात् उस श्रेष्ठ नगरसे निकलकर भीमसेन इतने वेगसे चले कि सूतपुत्रोंसे पहले ही वहाँ पहुँच गये ॥ १ ९ ॥
चितासमीपे गत्वा स तत्रापश्यद् वनस्पतिम् ।
तालमात्रं महास्कन्धं मूर्धशुष्कं विशाम्पते ॥ २० ॥
राजन्! चिताके समीप जाकर उन्होंने वहाँ ताड़के बराबर एक वृक्ष देखा, जिसकी शाखाएँ बहुत बड़ी थीं और जो ऊपरसे सूख गया था ॥ २० ॥
तं नागवदुपक्रम्य बाहुभ्यां परिरभ्य च ।
स्कन्धमारोपयामास दशव्यामं परंतपः ॥ २१ ॥
उस वृक्षकी ऊँचाई दस व्याम* थी । उसे शत्रुतापन भीमसेनने दोनों भुजाओंमें भरकर हाथीके समान जोर लगाकर उखाड़ा और अपने कंधेपर रख लिया ॥ २१ ॥
स तं वृक्षं दशव्यामं सस्कन्धविटपं बली ।
प्रगृह्याभ्यद्रवत् सूतान् दण्डपाणिरिवान्तकः ॥ २२ ॥
शाखा- प्रशाखाओंसहित उस दस व्याम ऊँचे वृक्षको लेकर बलवान् भीम दण्डपाणि यमराजके समान उन सूतपुत्रोंकी ओर दौड़े ॥ २२ ॥
ऊरुवेगेन तस्याथ न्यग्रोधाश्वत्थकिंशुकाः ।
भूमौ निपतिता वृक्षाः सङ्घशस्तत्र शेरते ॥ २३ ॥
उस समय उनकी जंघाओंके वेगसे टकराकर बहुतेरे बरगद, पीपल और ढाकके वृक्ष पृथ्वीपर गिरकर ढेर- के - ढेर बिखर गये ॥ २३ ॥
तं सिंहमिव संक्रुद्धं दृष्ट्वा गन्धर्वमागतम् ।
वित्रेसुः सर्वशः सूता विषादभयकम्पिताः ॥ २४ ॥
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सिंहके समान क्रोधमें भरे हुए गन्धर्वरूपी भीमको अपनी ओर आते देखकर सभी सूतपुत्र डर गये और विषाद एवं भयसे काँपते हुए कहने लगे— ॥ २४ ॥
गन्धर्वो बलवानेति क्रुद्ध उद्यम्य पादपम् ।
सैरन्ध्री मुच्यतां शीघ्रं यतो नो भयमागतम् ॥ २५ ॥
‘ अरे! देखो, यह बलवान् गन्धर्व वृक्ष उठाये कुपित हो हमारी ओर आ रहा है ।
सैरन्ध्रीको शीघ्र छोड़ दो, क्योंकि उसीके कारण हमें यह भय उपस्थित हुआ है ' ॥ २५ ॥
ते तु दृष्ट्वा तदाऽऽविद्धं भीमसेनेन पादपम् ।
विमुच्य द्रौपदीं तत्र प्राद्रवन्नगरं प्रति ॥ २६ ॥
इतनेमें ही भीमसेनके द्वारा घुमाये जाते हुए उस वृक्षको देखकर वे द्रौपदीको वहीं छोड़ नगरकी ओर भागने लगे ॥ २६ ॥
द्रवतस्तांस्तु सम्प्रेक्ष्य स वज्री दानवानिव ।
शतं पञ्चाधिकं भीमः प्राहिणोद् यमसादनम् ॥ २७ ॥
वृक्षेणैतेन राजेन्द्र प्रभञ्जनसुतो बली । राजेन्द्र! उन्हें भागते देख वायुपुत्र बलवान् भीमने, वज्रधारी इन्द्र जैसे दानवोंका वध करते हैं, उसी प्रकार उस वृक्षसे एक सौ पाँच उपकीचकोंको यमराजके घर भेज दिया ॥ २७ ॥
तत आश्वासयत् कृष्णां स विमुच्य विशाम्पते ॥ २८ ॥
महाराज! तदनन्तर उन्होंने द्रौपदीको बन्धनसे मुक्त करके आश्वासन दिया ॥ २८ ॥
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उवाच च महाबाहुः पाञ्चालीं तत्र द्रौपदीम् ।
अश्रुपूर्णमुखीं दीनां दुर्धर्षः स वृकोदरः ॥ २ ९ ॥
उस समय पांचालराजकुमारी द्रौपदी बड़ी दीन एवं दयनीय हो गयी थी । उसके मुखपर आँसुओंकी धारा बह रही थी । दुर्धर्ष वीर महाबाहु वृकोदरने उसे धीरज बँधाते हुए कहा ॥ २ ९ ॥
एवं ते भीरु वध्यन्ते ये त्वां क्लिश्यन्त्यनागसम् ।
प्रैहि त्वं नगरं कृष्णे न भयं विद्यते तव ॥ ३० ॥
अन्येनाहं गमिष्यामि विराटस्य महानसम् ॥ ३१ ॥
‘ भीरु! जो तुझ निरपराध अबलाको सतायेंगे, वे इसी तरह मारे जायँगे । कृष्णे! नगरको जाओ । अब तुम्हारे लिये कोई भय नहीं है । मैं दूसरे मार्गसे विराटकी पाकशालामें चला जाऊँगा' ॥ ३०-३१ ॥ वैशम्पायन उवाच
पञ्चाधिकं शतं तच्च निहतं तेन भारत ।
महावनमिवच्छिन्नं शिश्ये विगलितद्रुमम् ॥ ३२ ॥
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वैशम्पायनजी कहते हैं - भारत! भीमसेनके द्वारा मारे गये वे एक सौ पाँच उपकीचक वहाँ श्मशानभूमिमें इस प्रकार सो रहे थे, मानो काटा हुआ महान् जंगल गिरे हुए पेड़ोंसे भरा हो ॥ ३२ ॥
एवं ते निहता राजञ्छतं पञ्च च कीचकाः ।
स च सेनापतिः पूर्वमित्येतत् सूतषट्शतम् ॥ ३३ ॥
राजन्! इस प्रकार वे एक सौ पाँच उपकीचक और पहले मरा हुआ सेनापति कीचक सब मिलकर एक सौ छः सूतपुत्र मारे गये ॥ ३३ ॥
तद् दृष्ट्वा महदाश्चर्यं नरा नार्यश्च संगताः ।
विस्मयं परमं गत्वा नोचुः किञ्चन भारत ॥ ३४ ॥
भारत! उस समय श्मशानभूमिमें बहुत- से पुरुष और स्त्रियाँ एकत्र हो गयी थीं । उन सबने यह महान् आश्चर्यजनक काण्ड देखा, किंतु भारी विस्मयमें पड़कर किसीने कुछ कहा नहीं ॥ ३४ ॥
इति श्रीमहाभारते विराटपर्वणि कीचकवधपर्वणि त्रयोविंशोऽध्यायः ॥ २३ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत विराटपर्वके अन्तर्गत कीचकवधपर्वमें तेईसवाँअध्याय पूरा हुआ ॥ २३ ॥
* दोनों हाथोंको फैलानेपर जितनी लंबाई होती है, उसे एक व्याम कहते हैं ।