श्रीगणेशाय नमः।
महाभारत — खण्ड २ — पृष्ठ 241–250
महाभारत — खण्ड २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 241–250
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रक्ष्याण्येतानि देवानां गूढमाया हि देवताः ।
कृताशाश्च व्रताशाश्च तपसा दग्धकिल्बिषाः ।
प्रसादैर्मानसैर्युक्ताः पश्यन्त्येतानि वै द्विजाः ॥ ३७ ॥
इन सब विषयोंको देवतालोग गुप्त रखते हैं । देवताओंकी माया भी गूढ़ ( दुर्बोध ) है । जो आशाका परित्याग करके सात्त्विक हितकर एवं पवित्र आहार करनेवाले हैं । तपस्यासे जिनके सारे पाप दग्ध हो गये हैं तथा जो मानसिक प्रसन्नतासे युक्त हैं, वे द्विज ही इन देवगुह्य विषयोंको देख पाते हैं ॥ ३७ ॥
न फलादर्शनाद् धर्मः शङ्कितव्यो न देवताः ।
यष्टव्यं च प्रयत्नेन दातव्यं चानसूयता ॥ ३८ ॥
धर्मका फल तुरंत दिखायी न दे तो इसके कारण धर्म एवं देवताओंपर आशंका नहीं करनी चाहिये । दोषदृष्टि न रखते हुए यत्नपूर्वक यज्ञ और दान करते रहना चाहिये ॥ ३८ ॥
कर्मणां फलमस्तीह तथैतद् धर्मशासनम् ।
ब्रह्मा प्रोवाच पुत्राणां यदृषिर्वेद कश्यपः ॥ ३ ९ ॥
कर्मोंका फल यहाँ अवश्य प्राप्त होता है, यह धर्मशास्त्रका विधान है । यह बात ब्रह्माजीने अपने पुत्रोंसे कही है, जिसे कश्यप ऋषि जानते हैं ॥ ३ ९ ॥
तस्मात् ते संशयः कृष्णे नीहार इव नश्यतु ।
व्यवस्य सर्वमस्तीति नास्तिक्यं भावमुत्सृज ॥ ४० ॥
इसलिये कृष्णे! सब कुछ सत्य है, ऐसा निश्चय करके तुम्हारा धर्मविषयक संदेह कुहरेकी भाँति नष्ट हो जाना चाहिये । तुम अपने इस नास्तिकतापूर्ण विचारको त्याग दो ॥ ४० ॥
ईश्वरं चापि भूतानां धातारं मा च वै क्षिप ।
शिक्षस्वैनं नमस्वैनं मा तेऽभूद् बुद्धिरीदृशी ॥ ४१ ॥
और समस्त प्राणियोंका भरण- पोषण करनेवाले ईश्वरपर आक्षेप बिलकुल न करो । तुम शास्त्र और गुरुजनोंके उपदेशानुसार ईश्वरको समझनेकी चेष्टा करो और उन्हींको नमस्कार करो । आज जैसी तुम्हारी बुद्धि है, वैसी नहीं रहनी चाहिये ॥ ४१ ॥
यस्य प्रसादात् तद्भक्तो मर्त्यो गच्छत्यमर्त्यताम् ।
उत्तमां देवतां कृष्णे मावमंस्थाः कथंचन ॥ ४२ ॥
कृष्णे! जिनके कृपाप्रसादसे उनके प्रति भक्तिभाव रखनेवाला मरणधर्मा मनुष्य अमरत्वको प्राप्त हो जाता है, उन परमदेव परमेश्वरकी तुमको किसी प्रकार अवहेलना नहीं करनी चाहिये ॥ ४२ ॥
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि अर्जुनाभिगमनपर्वणि युधिष्ठिरवाक्ये एकत्रिंशोऽध्यायः ॥ ३१ ॥
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इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत अर्जुनाभिगमनपर्वमें युधिष्ठिरवाक्यविषयक इकतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३१ ॥
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द्वात्रिंशोऽध्यायः द्रौपदीका पुरुषार्थको प्रधान मानकर पुरुषार्थ करनेके लिये जोर देना द्रौपद्युवाच
नावमन्ये न गर्हे च धर्मं पार्थ कथंचन ।
ईश्वरं कुत एवाहमवमंस्ये प्रजापतिम् ॥ १ ॥
द्रौपदी बोली – कुन्तीनन्दन! मैं धर्मकी अवहेलना तथा निन्दा किसी प्रकार नहीं कर सकती । फिर समस्त प्रजाओंका पालन करनेवाले परमेश्वरकी अवहेलना तो कर ही कैसे सकती हूँ ॥ १ ॥
आर्ताहं प्रलपामीदमिति मां विद्धि भारत ।
भूयश्च विलपिष्यामि सुमनास्त्वं निबोध मे ॥ २ ॥
भारत! आप ऐसा समझ लें कि मैं शोकसे आर्त होकर प्रलाप कर रही हूँ । मैं इतनेसे ही
चुप नहीं रहूँगी और भी विलाप करूंगी । आप प्रसन्नचित्त होकर मेरी बात सुनिये ॥ २ ॥
कर्म खल्विह कर्तव्यं जानतामित्रकर्शन ।
अकर्माणो हि जीवन्ति स्थावरा नेतरे जनाः ॥ ३ ॥
शत्रुनाशन! ज्ञानी पुरुषको भी इस संसारमें कर्म अवश्य करना चाहिये । पर्वत और वृक्ष आदि स्थावर भूत ही बिना कर्म किये जी सकते हैं, दूसरे लोग नहीं ॥ ३ ॥
यावद्गोस्तनपानाच्च यावच्छायोपसेवनात् ।
जन्तवः कर्मणा वृत्तिमाप्नुवन्ति युधिष्ठिर ॥ ४ ॥
महाराज युधिष्ठिर! गौओंके बछड़े भी माताका दूध पीते और छायामें जाकर विश्राम करते हैं । इस प्रकार सभी जीव कर्म करके ही जीवन - निर्वाह करते हैं ॥ ४ ॥
जङ्गमेषु विशेषेण मनुष्या भरतर्षभ ।
इच्छन्ति कर्मणा वृत्तिमवाप्तुं प्रेत्य चेह च ॥ ५ ॥
भरतश्रेष्ठ! जंगम जीवोंमें विशेषरूपसे मनुष्य कर्मके द्वारा ही इहलोक और परलोकमें जीविका प्राप्त करना चाहते हैं ॥ ५ ॥
उत्थानमभिजानन्ति सर्वभूतानि भारत ।
प्रत्यक्षं फलमश्नन्ति कर्मणां लोकसाक्षिकम् ॥ ६ ॥
भारत! सभी प्राणी अपने उत्थानको समझते हैं और कर्मोंके प्रत्यक्ष फलका उपभोग करते हैं, जिसका साक्षी सारा जगत् है ॥ ६ ॥
सर्वे हि स्वं समुत्थानमुपजीवन्ति जन्तवः ।
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अपि धाता विधाता च यथायमुदके बकः ॥ ७ ॥
यह जलके समीप जो बगुला बैठकर ( मछलीके लिये ) ध्यान लगा रहा है, उसीके समान ये सभी प्राणी अपने उद्योगका आश्रय लेकर जीवन धारण करते हैं । धाता और विधाता भी सदा सृष्टिपालनके उद्योगमें लगे रहते हैं ॥ ७ ॥
अकर्मणां वै भूतानां वृत्तिः स्यान्न हि काचन ।
तदेवाभिप्रपद्येत न विहन्यात् कदाचन ॥ ८ ॥
कर्म न करनेवाले प्राणियोंकी कोई जीविका भी सिद्ध नहीं होती । अतः ( प्रारब्धका
भरोसा करके ) कभी कर्मका परित्याग न करे । सदा कर्मका ही आश्रय ले ॥ ८ ॥
स्वकर्म कुरु मा ग्लासीः कर्मणा भव दंशितः ।
कृतं हि योऽभिजानाति सहस्रे सोऽस्ति नास्ति च ॥ ९ ॥
अतः आप अपना कर्म करें । उसमें ग्लानि न करें, कर्मका कवच पहने रहें । जो कर्म करना अच्छी तरह जानता है, ऐसा मनुष्य हजारोंमें एक भी है या नहीं? यह बताना कठिन है ॥ ९ ॥
तस्य चापि भवेत् कार्यं विवृद्धौ रक्षणे तथा ।
भक्ष्यमाणो ह्यनादानात् क्षीयेत हिमवानपि ॥ १० ॥
धनकी वृद्धि और रक्षाके लिये भी कर्मकी आवश्यकता है। यदि धनका उपभोग ( व्यय ) होता रहे और आय न हो तो हिमालय जैसी धनराशिका भी क्षय हो सकता है ॥ १० ॥
उत्सीदेरन् प्रजाः सर्वा न कुर्युः कर्म चेद् भुवि ।
तथा ह्येता न वर्धेरन् कर्म चेदफलं भवेत् ॥ ११ ॥
यदि समस्त प्रजा इस भूतलपर कर्म करना छोड़ दे तो सबका संहार हो जाय । यदि कर्मका कुछ फल न हो तो इन प्रजाओंकी वृद्धि ही न हो ॥ ११ ॥
अपि चाप्यफलं कर्म पश्यामः कुर्वतो जनान् ।
नान्यथा ह्यपि गच्छन्ति वृत्तिं लोकाः कथंचन ॥ १२ ॥
हम देखती हैं कि लोग व्यर्थ कर्ममें भी लगे रहते हैं, कर्म न करनेपर तो लोगोंकी किसी प्रकार जीविका ही नहीं चल सकती ॥ १२ ॥
यश्च दिष्टपरो लोके यश्चापि हठवादिकः ।
उभावपि शठावेतौ कर्मबुद्धिः प्रशस्यते ॥ १३ ॥
संसारमें जो केवल भाग्यके भरोसे कर्म नहीं करता अर्थात् जो ऐसा मानता है कि पहले जैसा किया है वैसा ही फल अपने आप ही प्राप्त होगा तथा जो हठवादी है - बिना किसी युक्तिके हठपूर्वक यह मानता है कि कर्म करना अनावश्यक है, जो कुछ मिलना होगा, अपने - आप मिल जायगा, वे दोनों ही मूर्ख हैं । जिसकी बुद्धि कर्म ( पुरुषार्थ ) -में रुचि रखती है, वही प्रशंसाका पात्र है ॥ १३ ॥
यो हि दिष्टमुपासीनो निर्विचेष्टः सुखं शयेत् ।
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अवसीदेत् स दुर्बुद्धिरामो घट इवोदके ॥ १४ ॥
जो खोटी बुद्धिवाला मनुष्य प्रारब्ध ( भाग्य ) - का भरोसा रखकर उद्योगसे मुँह मोड़ लेता और सुखसे सोता रहता है, उसका जलमें रखे हुए कच्चे घड़ेकी भाँति विनाश हो जाता ॥ १४ ॥
तथैव हठदुर्बुद्धिः शक्तः कर्मण्यकर्मकृत् ।
आसीत न चिरं जीवेदनाथ इव दुर्बलः ॥ १५ ॥
इसी प्रकार जो हठी और दुर्बुद्धि मानव कर्म करनेमें समर्थ होकर भी कर्म नहीं करता, बैठा रहता है, वह दुर्बल एवं अनाथकी भाँति दीर्घजीवी नहीं होता ॥ १५ ॥
अकस्मादिह यः कश्चिदर्थं प्राप्नोति पूरुषः ।
तं हठेनेति मन्यन्ते स हि यत्नो न कस्यचित् ॥ १६ ॥
जो कोई पुरुष इस जगत्में अकस्मात् कहींसे धन पा लेता है, उसे लोग हठसे मिला हुआ मान लेते हैं; क्योंकि उसके लिये किसीके द्वारा प्रयत्न किया हुआ नहीं दीखता ॥ १६ ॥
यच्चापि किंचित् पुरुषो दिष्टं नाम भजत्युत ।
दैवेन विधिना पार्थ तद् दैवमिति निश्चितम् ॥ १७ ॥
कुन्तीनन्दन! मनुष्य जो कुछ भी देवाराधनकी विधिसे अपने भाग्यके अनुसार पाता है, उसे निश्चितरूपसे दैव ( प्रारब्ध) कहा गया है ॥ १७ ॥
यत् स्वयं कर्मणा किंचित् फलमाप्नोति पूरुषः ।
प्रत्यक्षमेतल्लोकेषु तत् पौरुषमिति श्रुतम् ॥ १८ ॥
तथा मनुष्य स्वयं कर्म करके जो कुछ फल प्राप्त करता है, उसे पुरुषार्थ कहते हैं । यह सब लोगोंको प्रत्यक्ष दिखायी देता है ॥ १८ ॥
स्वभावतः प्रवृत्तो यः प्राप्नोत्यर्थं न कारणात् ।
तत् स्वभावात्मकं विद्धि फलं पुरुषसत्तम ॥ १ ९ ॥
नरश्रेष्ठ! जो स्वभावसे ही कर्ममें प्रवृत्त होकर धन प्राप्त करता है, किसी कारणवश नहीं, उसके उस धनको स्वाभाविक फल समझना चाहिये ॥ १ ९ ॥
एवं हठाच्च दैवाच्च स्वभावात् कर्मणस्तथा ।
यानि प्राप्नोति पुरुषस्तत् फलं पूर्वकर्मणाम् ॥ २० ॥
इस प्रकार हठ, दैव, स्वभाव तथा कर्मसे मनुष्य जिन -जिन वस्तुओंको पाता है, वे सब उसके पूर्वकर्मोंके ही फल हैं ॥ २० ॥
धातापि हि स्वकर्मैव तैस्तैर्हेतुभिरीश्वरः ।
विदधाति विभज्येह फलं पूर्वकृतं नृणाम् ॥ २१ ॥
जगदाधार परमेश्वर भी उपर्युक्त हठ आदि हेतुओंसे जीवोंके अपने - अपने कर्मको ही विभक्त करके मनुष्योंको उनके पूर्वजन्ममें किये हुए कर्मके फलरूपसे यहाँ प्राप्त कराता
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है ॥ २१ ॥
यद्ध्ययं पुरुषः किंचित् कुरुते वै शुभाशुभम् ।
तद् धातृविहितं विद्धि पूर्वकर्मफलोदयम् ॥ २२ ॥
पुरुष यहाँ जो कुछ भी शुभ - अशुभ कर्म करता है, उसे ईश्वरद्वारा विहित उसके पूर्वकर्मोंके फलका उदय समझिये ॥ २२ ॥
कारणं तस्य देहोऽयं धातुः कर्मणि वर्तते ।
स यथा प्रेरयत्येनं तथायं कुरुतेऽवशः ॥ २३ ॥
यह मानव- शरीर जो कर्ममें प्रवृत्त होता है, वह ईश्वरके कर्मफलसम्पादन -कार्यका साधन है । वे इसे जैसी प्रेरणा देते हैं, यह विवश होकर (स्वेच्छा- प्रारब्ध भोगके लिये ) वैसा ही करता है ॥ २३ ॥
तेषु तेषु हि कृत्येषु विनियोक्ता महेश्वरः ।
सर्वभूतानि कौन्तेय कारयत्यवशान्यपि ॥ २४ ॥
कुन्तीनन्दन! परमेश्वर ही समस्त प्राणियोंको विभिन्न कार्योंमें लगाते और स्वभावके परवश हुए उन प्राणियोंसे कर्म कराते हैं ॥ २४ ॥
मनसार्थान् विनिश्चित्य पश्चात् प्राप्नोति कर्मणा ।
बुद्धिपूर्वं स्वयं वीर पुरुषस्तत्र कारणम् ॥ २५ ॥
किंतु वीर! मनसे अभीष्ट वस्तुओंका निश्चय करके फिर कर्मद्वारा मनुष्य स्वयं
बुद्धिपूर्वक उन्हें प्राप्त करता है । अतः पुरुष ही उसमें कारण है ॥ २५ ॥
संख्यातुं नैव शक्यानि कर्माणि पुरुषर्षभ ।
अगारनगराणां हि सिद्धिः पुरुषहैतुकी ॥ २६ ॥
तिले तैलं गवि क्षीरं काष्ठे पावकमन्ततः ।
धिया धीरो विजानीयादुपायं चास्य सिद्धये ॥ २७ ॥
नरश्रेष्ठ! कर्मोंकी गणना नहीं की जा सकती । गृह एवं नगर आदि सभीकी प्राप्तिमें पुरुष ही कारण है । विद्वान् पुरुष पहले बुद्धिद्वारा यह निश्चय करे कि तिलमें तेल है, गायके भीतर दूध है और काष्ठमें अग्नि है, तत्पश्चात् उसकी सिद्धिके उपायका निश्चय करे ॥ २६-२७ ॥
ततः प्रवर्तते पश्चात् कारणैस्तस्य सिद्धये ।
तां सिद्धिमुपजीवन्ति कर्मजामिह जन्तवः ॥ २८ ॥
तदनन्तर उन्हीं उपायोंद्वारा उस कार्यकी सिद्धिके लिये प्रवृत्त होना चाहिये । सभी प्राणी इस जगत्में उस कर्मजनित सिद्धिका सहारा लेते हैं ॥ २८ ॥
कुशलेन कृतं कर्म कर्त्रा साधु स्वनुष्ठितम् ।
इदं त्वकुशलेनेति विशेषादुपलभ्यते ॥ २ ९ ॥
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योग्य कर्ताके द्वारा किया गया कर्म अच्छे ढंगसे सम्पादित होता है । यह कार्य किसी अयोग्य कर्ताके द्वारा किया गया है, यह बात कार्यकी विशेषतासे अर्थात् परिणामसे जानी जाती है ॥ २ ९ ॥
इष्टापूर्तफलं न स्यान्न शिष्यो न गुरुर्भवेत् ।
पुरुषः कर्मसाध्येषु स्याच्चेदयमकारणम् ॥ ३० ॥
यदि कर्मसाध्य फलोंमें पुरुष ( एवं उसका प्रयत्न ) कारण न होता अर्थात् वह कर्ता नहीं बनता तो किसीको यज्ञ और कूपनिर्माण आदि कर्मोंका फल नहीं मिलता । फिर तो न कोई किसीका शिष्य होता और न गुरु ही ॥ ३० ॥
कर्तृत्वादेव पुरुषः कर्मसिद्धौ प्रशस्यते ।
असिद्धौ निन्द्यते चापि कर्मनाशात् कथं त्विह ॥ ३१ ॥
कर्ता होनेके कारण ही कार्यकी सिद्धिमें पुरुषकी प्रशंसा की जाती है और जब कार्यकी सिद्धि नहीं होती, तब उसकी निन्दा की जाती है । यदि कर्मका सर्वथा नाश ही हो जाय, तो यहाँ कार्यकी सिद्धि ही कैसे हो ॥ ३१ ॥
सर्वमेव हठेनैके दैवेनैके वदन्त्युत ।
पुंसः प्रयत्नजं केचित्त्रैधमेतन्निरुच्यते ॥ ३२ ॥
कोई तो सब कार्योंको हठसे ही सिद्ध होनेवाला बतलाते हैं । कुछ लोग दैवसे कार्यकी सिद्धिका प्रतिपादन करते हैं तथा कुछ लोग पुरुषार्थको ही कार्यसिद्धिका कारण बताते हैं । इस तरह ये तीन प्रकारके कारण बताये जाते हैं ॥ ३२ ॥
न चैवैतावता कार्यं मन्यन्त इति चापरे ।
अस्ति सर्वमदृश्यं तु दिष्टं चैव तथा हठः ॥ ३३ ॥
दूसरे लोगोंकी मान्यता इस प्रकार है कि मनुष्यके प्रयत्नकी कोई आवश्यकता नहीं है ।
अदृश्य दैव ( प्रारब्ध ) तथा हठ - ये दो ही सब कार्योंके कारण हैं ॥ ३३ ॥
दृश्यते हि हठाच्चैव दिष्टाच्चार्थस्य संततिः ।
किंचिद् दैवाद्धठात् किंचित् किंचिदेव स्वभावतः ॥ ३४ ॥
पुरुषः फलमाप्नोति चतुर्थं नात्र कारणम् ।
कुशलाः प्रतिजानन्ति ये वै तत्त्वविदो जनाः ॥ ३५ ॥
क्योंकि यह देखा जाता है कि हठ तथा दैवसे सब कार्योंकी धारावाहिक रूपसे सिद्धि हो रही है । जो लोग तत्त्वज्ञ एवं कुशल हैं, वे प्रतिज्ञापूर्वक कहते हैं कि मनुष्य कुछ फल दैवसे, कुछ हठसे और कुछ स्वभावसे प्राप्त करता है । इस विषयमें इन तीनोंके सिवा कोई चौथा कारण नहीं है ॥ ३४-३५ ॥
तथैव धाता भूतानामिष्टानिष्टफलप्रदः ।
यदि न स्यान्न भूतानां कृपणो नाम कश्चन ॥ ३६ ॥
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क्योंकि यदि ईश्वर सब प्राणियोंको इष्ट - अनिष्टरूप फल नहीं देते तो उन प्राणियोंमेंसे कोई भी दीन नहीं होता ॥ ३६ ॥
यं यमर्थमभिप्रेप्सुः कुरुते कर्म पूरुषः ।
तत्तत् सफलमेव स्याद् यदि न स्यात् पुरा कृतम् ॥ ३७ ॥
यदि पूर्वकृत प्रारब्धकर्म प्रभाव डालनेवाला न होता तो मनुष्य जिस - जिस प्रयोजनके अभिप्रायसे कर्म करता, वह सब सफल ही हो जाता ॥ ३७ ॥
त्रिद्वारामर्थसिद्धिं तु नानुपश्यन्ति ये नराः ।
तथैवानर्थसिद्धिं च यथा लोकास्तथैव ते ॥ ३८ ॥
अतः जो लोग अर्थसिद्धि तथा अनर्थकी प्राप्तिमें दैव, हठ और स्वभाव– इन तीनोंको कारण नहीं समझते, वे वैसे ही हैं, जैसे कि साधारण अज्ञ लोग होते हैं ॥ ३८ ॥
कर्तव्यमेव कर्मेति मनोरेष विनिश्चयः ।
एकान्तेन ह्यनीहोऽयं पराभवति पूरुषः ॥ ३ ९ ॥
किंतु मनुका यह सिद्धान्त है कि कर्म करना ही चाहिये, जो बिलकुल कर्म छोड़कर निश्चेष्ट हो बैठ रहता है, वह पुरुष पराभवको प्राप्त होता है ॥ ३ ९ ॥
कुर्वतो हि भवत्येव प्रायेणेह युधिष्ठिर ।
एकान्तफलसिद्धिं तु न विन्दत्यलसः क्वचित् ॥ ४० ॥
( इसलिये मेरा तो कहना यह है कि ) महाराज युधिष्ठिर! कर्म करनेवाले पुरुषको यहाँ प्रायः फलकी सिद्धि प्राप्त होती ही है । परंतु जो आलसी है, जिससे ठीक- ठीक कर्तव्यका पालन नहीं हो पाता, उसे कभी फलकी सिद्धि नहीं प्राप्त होती ॥ ४० ॥
असम्भवे त्वस्य हेतुः प्रायश्चित्तं तु लक्षयेत् ।
कृते कर्मणि राजेन्द्र तथानृण्यमवाप्नुते ॥ ४१ ॥
यदि कर्म करनेपर भी फलकी उत्पत्ति न हो तो कोई- न - कोई कारण है; ऐसा मानकर प्रायश्चित्त ( उसके दोषके समाधान ) - पर दृष्टि डाले । राजेन्द्र! कर्मको सांगोपांग कर लेनेपर कर्ता उऋण ( निर्दोष ) हो जाता है ॥ ४१ ॥
अलक्ष्मीराविशत्येनं शयानमलसं नरम् ।
निःसंशयं फलं लब्ध्वा दक्षो भूतिमुपाश्नुते ॥ ४२ ॥
जो मनुष्य आलस्यके वशमें पड़कर सोता रहता है, उसे दरिद्रता प्राप्त होती है और कार्यकुशल मानव निश्चय ही अभीष्ट फल पाकर ऐश्वर्यका उपभोग करता है ॥ ४२ ॥
अनर्थाः संशयावस्थाः सिद्ध्यन्ते मुक्तसंशयाः ।
धीरा नराः कर्मरता ननु निःसंशयाः क्वचित् ॥ ४३ ॥
कर्मका फल होगा या नहीं, इस संशयमें पड़े हुए मनुष्य अर्थसिद्धिसे वंचित रह जाते हैं और जो संशयरहित हैं, उन्हें सिद्धि प्राप्त होती है । कर्मपरायण और संशयरहित धीर मनुष्य निश्चय ही कहीं बिरले देखे जाते हैं ॥ ४३ ॥
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एकान्तेन ह्यनर्थोऽयं वर्ततेऽस्मासु साम्प्रतम् ।
स तु निःसंशयं न स्यात् त्वयि कर्मण्यवस्थिते ॥ ४४ ॥
इस समय हमलोगोंपर राज्यापहरणरूप भारी विपद् आ पड़ी है, यदि आप कर्म ( पुरुषार्थ) -में तत्परतासे लग जायँ तो निश्चय ही यह आपत्ति टल सकती है ॥ ४४ ॥
अथवा सिद्धिरेव स्यादभिमानं तदेव ते ।
वृकोदरस्य बीभत्सोर्भ्रात्रोश्च यमयोरपि ॥ ४५ ॥
अथवा यदि कार्यकी सिद्धि ही हो जाय, तो वह आपके, भीमसेन और अर्जुनके तथा नकुल सहदेवके लिये भी विशेष गौरवकी बात होगी ॥ ४५ ॥
अन्येषां कर्म सफलमस्माकमपि वा पुनः ।
विप्रकर्षेण बुध्येत कृतकर्मा यथाफलम् ॥ ४६ ॥
कर्मोंके कर लेनेपर अन्तमें कर्ताको जैसा फल मिलता है, उसके अनुसार ही यह जाना जा सकता है कि दूसरोंका कर्म सफल हुआ है या हमारा ॥ ४६ ॥
पृथिवीं लाङ्गलेनेह भित्त्वा बीजं वपत्युत ।
आस्तेऽथ कर्षकस्तूष्णीं पर्जन्यस्तत्र कारणम् ॥ ४७ ॥
वृष्टिश्चेन्नानुगृह्णीयादनेनास्तत्र कर्षकः ।
यदन्यः पुरुषः कुर्यात् तत् कृतं सफलं मया ॥ ४८ ॥
तच्चेदं फलमस्माकमपराधो न मे क्वचित् ।
इति धीरोऽन्ववेक्ष्यैव नात्मानं तत्र गर्हयेत् ॥ ४ ९ ॥
किसान हलसे पृथ्वीको चीरकर उसमें बीज बोता है और फिर चुपचाप बैठा रहता है; क्योंकि उसे सफल बनानेमें मेघ कारण हैं । यदि वृष्टिने अनुग्रह नहीं किया तो उसमें किसानका कोई दोष नहीं है । वह किसान मन- ही- मन यह सोचता है कि दूसरे लोग जोतने-बोनेका जो सफल कार्य जैसे करते हैं, वह सब मैंने भी किया है । उस दशामें यदि मुझे ऐसा प्रतिकूल फल मिला तो इसमें मेरा कोई अपराध नहीं है - ऐसा विचार करके उस असफलताके लिये वह बुद्धिमान् किसान अपनी निन्दा नहीं करता ॥ ४७–४९ ॥
कुर्वतो नार्थसिद्धिर्मे भवतीति ह भारत ।
निर्वेदो नात्र कर्तव्यो द्वावन्यौ ह्यत्र कारणम् ॥ ५० ॥
भारत! पुरुषार्थ करनेपर भी यदि अपनेको सिद्धि न प्राप्त हो तो इस बातको लेकर मन-ही- मन खिन्न नहीं होना चाहिये; क्योंकि फलकी सिद्धिमें पुरुषार्थके सिवा दो और भी कारण हैं— प्रारब्ध और ईश्वरकृपा ॥ ५० ॥
सिद्धिर्वाप्यथवासिद्धिरप्रवृत्तिरतोऽन्यथा ।
बहूनां समवाये हि भावानां कर्म सिद्ध्यति ॥ ५१ ॥
महाराज! कार्यमें सिद्धि प्राप्त होगी या असिद्धि, ऐसा संदेह मनमें लेकर आप कर्ममें प्रवृत्त ही न हों, यह उचित नहीं है; क्योंकि बहुत - से कारण एकत्र होनेपर ही कर्ममें सफलता
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मिलती है ॥ ५१ ॥
गुणाभावे फलं न्यूनं भवत्यफलमेव च ।
अनारम्भे हि न फलं न गुणो दृश्यते क्वचित् ॥ ५२ ॥
कर्मोंमें किसी अंगकी कमी रह जानेपर थोड़ा फल हो सकता है । यह भी सम्भव है कि फल हो ही नहीं । परंतु कर्मका आरम्भ ही न किया जाय तब तो न कहीं फल दिखायी देगा और न कर्ताका कोई गुण ( शौर्य आदि) ही दृष्टिगोचर होगा ॥ ५२ ॥
देशकालावुपायांश्च मङ्गलं स्वस्तिवृद्धये ।
युनक्ति मेधया धीरो यथाशक्ति यथाबलम् ॥ ५३ ॥
धीर मनुष्य मंगलमय कल्याणकी वृद्धिके लिये अपनी बुद्धिके द्वारा शक्ति तथा बलका विचार करते हुए देश - कालके अनुसार साम-दाम आदि उपायोंका प्रयोग करे ॥ ५३ ॥
अप्रमत्तेन तत् कार्यमुपदेष्टा पराक्रमः ।
भूयिष्ठं कर्मयोगेषु दृष्ट एव पराक्रमः ॥ ५४ ॥
सावधान होकर देश - कालके अनुरूप कार्य करे । इसमें पराक्रम ही उपदेशक ( प्रधान ) है । कार्यकी समस्त युक्तियोंमें पराक्रम ही सबसे श्रेष्ठ समझा गया है ॥ ५४ ॥
यत्र धीमानवेक्षेत श्रेयांसं बहुभिर्गुणैः ।
साम्नैवार्थं ततो लिप्सेत् कर्म चास्मै प्रयोजयेत् ॥ ५५ ॥
जहाँ बुद्धिमान् पुरुष शत्रुको अनेक गुणोंसे श्रेष्ठ देखे, वहाँ सामनीतिसे ही काम बनानेकी इच्छा करे और उसके लिये जो सन्धि आदि आवश्यक कर्तव्य हो, करे ॥ ५५ ॥
व्यसनं वास्य काङ्क्षेत विवासं वा युधिष्ठिर ।
अपि सिन्धोर्गिरेर्वापि किं पुनर्मर्त्यधर्मिणः ॥ ५६ ॥
महाराज युधिष्ठिर! अथवा शत्रुपर कोई भारी संकट आने या देशसे उसके निकाले जानेकी प्रतीक्षा करे; क्योंकि अपना विरोधी यदि समुद्र अथवा पर्वत हो तो उसपर भी विपत्ति लानेकी इच्छा रखनी चाहिये, फिर जो मरणधर्मा मनुष्य है, उसके लिये तो कहना ही क्या है? ॥ ५६ ॥
उत्थानयुक्तः सततं परेषामन्तरैषणे ।
आनृण्यमाप्नोति नरः परस्यात्मन एव च ॥ ५७ ॥
शत्रुओंके छिद्रका अन्वेषण करनेके लिये सदा प्रयत्नशील रहे । ऐसा करनेसे वह अपनी और दूसरे लोगोंकी दृष्टिमें भी निर्दोष होता है ॥ ५७ ॥
न त्वेवात्मावमन्तव्यः पुरुषेण कदाचन ।
न ह्यात्मपरिभूतस्य भूतिर्भवति शोभना ॥ ५८ ॥
मनुष्य कभी अपने- आपका अनादर न करे - अपने आपको छोटा न समझे । जो स्वयं ही अपना अनादर करता है, उसे उत्तम ऐश्वर्यकी प्राप्ति नहीं होती ॥ ५८ ॥
एवं संस्थितिका सिद्धिरियं लोकस्य भारत ।