श्रीगणेशाय नमः।

महाभारत — खण्ड २ — पृष्ठ 821–830

महाभारत — खण्ड २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 821–830

पृष्ठ 821

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अष्टादशाधिकशततमोऽध्यायः युधिष्ठिरका विभिन्न तीर्थोंमें होते हुए प्रभासक्षेत्रमें पहुँचकर तपस्यामें प्रवृत्त होना और यादवोंका पाण्डवोंसे मिलना वैशम्पायन उवाच गच्छन् स तीर्थानि महानुभावः पुण्यानि रम्याणि ददर्श राजा । सर्वाणि विप्रैरुपशोभितानि क्वचित् क्वचिद् भारत सागरस्य ॥ १ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! आगे जाते हुए महानुभाव राजा युधिष्ठिरने समुद्रतटके समस्त पुण्य तीर्थोंका दर्शन किया । वे सभी तीर्थ परम मनोहर थे । उनमें कहीं-कहीं ब्राह्मणलोग निवास करते थे, जिससे उन तीर्थोंकी बड़ी शोभा होती थी ॥ १ ॥

स वृत्तवांस्तेषु कृताभिषेकः सहानुजः पार्थिवपुत्रपौत्रः । समुद्रगां पुण्यतमां प्रशस्तां जगाम पारिक्षित पाण्डुपुत्रः ॥ २ ॥

परीक्षितनन्दन! सदाचारी पाण्डुकुमार युधिष्ठिर कश्यपपुत्र सूर्यदेवके पौत्र थे ( क्योंकि उनकी उत्पत्ति सूर्यकुमार धर्मसे हुई थी ) । वे भाइयोंसहित उन तीर्थोंमें स्नान करके समुद्रगामिनी पुण्यमयी प्रशस्ता नदीके तटपर गये ॥ २ ॥

तत्रापि चाप्लुत्य महानुभावः संतर्पयामास पितॄन् सुरांश्च । द्विजातिमुख्येषु धनं विसृज्य गोदावरीं सागरगामगच्छत् ॥ ३ ॥

महानुभाव युधिष्ठिरने वहाँ भी स्नान करके देवताओं और पितरोंका तर्पण किया तथा श्रेष्ठ ब्राह्यणोंको धन दान करके सागरगामिनी गोदावरी नदीकी ओर प्रस्थान किया ॥ ३ ॥

ततो विपाप्मा द्रविडेषु राजन् समुद्रमासाद्य च लोकपुण्यम् । अगस्त्यतीर्थं च महापवित्रं नातीर्थान्यथ वीरो ददर्श ॥ ४ ॥

जनमेजय! गोदावरीमें स्नान करके पवित्र हो वे वहाँसे द्रविड़देशमें घूमते हुए संसारके पुण्यमय तीर्थ समुद्रके तटपर गये । वहाँ स्नानादि करनेके पश्चात् वीर पाण्डुकुमारने आगे

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बढ़कर परम पवित्र अगस्त्यतीर्थ तथा *नारीतीर्थोंका दर्शन किया ॥ ४ ॥

तत्रार्जुनस्याग्रयधनुर्धरस्य निशम्य तत् कर्म नरैरशक्यम् । सम्पूज्यमानः परमर्षिसङ्घैः परां मुदं पाण्डुसुतः स लेभे ॥ ५ ॥

स तेषु तीर्थेष्वभिषिक्तगात्रः कृष्णासहायः सहितोऽनुजैश्च । सम्पूजयन् विक्रममर्जुनस्य रेमे महीपाल पतिः पृथिव्याः ॥ ६ ॥

वहाँ श्रेष्ठ धनुर्धर अर्जुनके उस पराक्रमको, जो दूसरे मनुष्योंके लिये असम्भव था, सुनकर पाण्डुनन्दन युधिष्ठिरको बड़ी प्रसन्नता प्राप्त हुई । उन तीर्थोंमें बड़े -बड़े ऋषिगण भी उनका सत्कार करते थे । जनमेजय! द्रौपदी तथा भाइयोंके साथ राजा युधिष्ठिरने उन पाँचों तीर्थोंमें स्नान करके अर्जुनके पराक्रमकी प्रशंसा करते हुए बड़े हर्षका अनुभव किया ॥ ५-६ ॥ ततः सहस्राणि गवां प्रदाय तीर्थेषु तेष्वम्बुधरोत्तमस्य । हृष्टः सह भ्रातृभिरर्जुनस्य संकीर्तयामास गवां प्रदानम् ॥ ७ ॥

तदनन्तर समुद्रतटवर्ती उन सभी तीर्थोंमें सहस्रों गोदान करके भाइयोंसहित युधिष्ठिरने प्रसन्नतापूर्वक अर्जुनके द्वारा किये हुए गोदानका बारंबार वर्णन किया ॥ ७ ॥

सतानि तीर्थानि च सागरस्य पुण्यानि चान्यानि बहूनि राजन् । क्रमेण गच्छन् परिपूर्णकामः शूर्पारकं पुण्यतमं ददर्श ॥ ८ ॥

राजन्! समुद्रसम्बन्धी तथा अन्य बहुत-से पुण्य तीर्थोंमें क्रमशः भ्रमण करते हुए पूर्णकाम राजा युधिष्ठिरने अत्यन्त पुण्यमय शूर्पारकतीर्थका दर्शन किया ॥ ८ ॥

तत्रोदधेः कंचिदतीत्य देशं

ख्यातं पृथिव्यां वनमाससाद ।

तप्तं सुरैस्तत्र तपः पुरस्ता- दिष्टं तथा पुण्यपरैर्नरेन्द्रैः ॥ ९ ॥

वहाँ समुद्रके कुछ भागको लाँघकर वे एक ऐसे वनमें आये जो भूमण्डलमें सर्वत्र विख्यात था । वहाँ पूर्वकालमें देवताओंने तपस्या की थी और पुण्यात्मा नरेशोंने यज्ञोंका अनुष्ठान किया था ॥ ९ ॥

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स तत्र तामग्रयधनुर्धरस्य वेदीं ददर्शायतपीनबाहुः । ऋचीकपुत्रस्य तपस्विसङ्घैः समावृतां पुण्यकृदर्चनीयाम् ॥ १० ॥

लम्बी और मोटी भुजाओंवाले युधिष्ठिरने उस वनमें धनुर्धरशिरोमणि ऋचीकवंशी परशुरामजीकी वेदी देखी, जो पुण्यात्मा पुरुषोंके लिये पूजनीय थी तथा तपस्वियोंके समुदाय उसे सदा घेरे रहते थे ॥ १० ॥

ततो वसूनां वसुधाधिपः स

मरुद्गणानां च तथाश्विनोश्च ।

वैवस्वतादित्यधनेश्वराणा- मिन्द्रस्य विष्णोः सवितुर्विभोश्च ॥ ११ ॥

भवस्य चन्द्रस्य दिवाकरस्य पतेरपां साध्यगणस्य चैव । धातुः पितॄणां च तथा महात्मा रुद्रस्य राजन् सगणस्य चैव ॥ १२ ॥

सरस्वत्याः सिद्धगणस्य चैव पुण्याश्च ये चाप्यमरास्तथान्ये । पुण्यानि चाप्यायतनानि तेषां ददर्श राजा सुमनोहराणि ॥ १३ ॥

राजन्! तत्पश्चात् उन महात्मा नरेशने वसु, मरुद्गण, अश्विनीकुमार, यम, आदित्य, कुबेर, इन्द्र, विष्णु, भगवान् सविता, शिव, चन्द्रमा, सूर्य, वरुण, साध्यगण, धाता, पितृगण, अपने गणोंसहित रुद्र, सरस्वती, सिद्धसमुदाय तथा अन्य पुण्यमय देवताओंके परम पवित्र और मनोहर मन्दिरोंके दर्शन किये ॥ ११–१३ ॥ तेषूपवासान् विबुधानुपोष्य दत्त्वा च रत्नानि महान्ति राजा । तीर्थेषु सर्वेषु परिप्लुताङ्गः पुनः स शूर्पारकमाजगाम ॥ १४ ॥

उन तीर्थोंके निकट निवास करनेवाले विद्वान् ब्राह्मणोंको वस्त्राभूषणोंसे आच्छादित एवं विभूषित करके उन्हें बहुमूल्य रत्नोंकी भेंट दे वहाँके सभी तीर्थोंमें स्नान करके महाराज युधिष्ठिर पुनः शूर्पारक- क्षेत्रमें लौट आये ॥ १४ ॥

स तेन तीर्थेन तु सागरस्य पुनः प्रयातः सह सोदरीयैः । द्विजैः पृथिव्यां प्रथितं महद्भि-

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स्तीर्थं प्रभासं समुपाजगाम ॥ १५ ॥

वहाँसे प्रस्थित हो वे भाइयोंसहित सागरतटवर्ती तीर्थोंके मार्गसे होते हुए फिर प्रभासक्षेत्र आये जो श्रेष्ठ ब्राह्मणोंके कारण भूमण्डलमें अधिक प्रसिद्ध है ॥ १५ ॥

तत्राभिषिक्तः पृथुलोहिताक्षः सहानुजैर्देवगणान् पितॄंश्च । संतर्पयामास तथैव कृष्णा ते चापि विप्राः सह लोमशेन ॥ १६ ॥

वहाँ भाइयोंसहित स्नान करके विशाल एवं लाल नेत्रोंवाले राजा युधिष्ठिरने देवताओं और पितरोंका तर्पण किया । इसी प्रकार द्रौपदीने, साथ आये हुए उन ब्राह्मणोंने तथा महर्षि लोमशने भी वहाँ स्नान एवं तर्पण किये ॥ १६ ॥

स द्वादशाहं जलवायुभक्षः कुर्वन् क्षपाहःसु तदाभिषेकम् । समन्ततोऽग्नीनुपदीपयित्वा तेपे तपो धर्मभृतां वरिष्ठः ॥ १७ ॥

धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ युधिष्ठिर वहाँ बारह दिनोंतक केवल जल और वायु पीकर रहते हुए दिनमें और रातमें भी स्नान करते तथा अपने चारों ओर आग जलाकर तपस्यामें लगे रहते थे ॥ १७ ॥

तमुग्रमास्थाय तपश्चरन्तं शुश्राव रामश्च जनार्दनश्च । तौ सर्ववृष्णिप्रवरौ ससैन्यौ युधिष्ठिरं जग्मतुराजमीढम् ॥ १८ ॥

इसी समय वृष्णिवंशशिरोमणि भगवान् श्रीकृष्ण और बलरामने सुना कि महाराज युधिष्ठिर प्रभासक्षेत्रमें उग्र तपस्या कर रहे हैं; तब वे अपने सैनिकोंसहित अजमीढकुलभूषण युधिष्ठिरसे मिलनेके लिये गये ॥ १८ ॥

ते वृष्णयः पाण्डुसुतान् समीक्ष्य भूमौ शयानान् मलदिग्धगात्रान् । अनर्हतीं द्रौपदीं चापि दृष्ट्वा सुदुःखिताश्चुक्रुशुरार्तनादम् ॥ १ ९ ॥ वहाँ जाकर वृष्णिवंशियोंने देखा, पाण्डवलोग पृथ्वीपर सो रहे हैं, उनके सारे अंग धूलसे सने हुए हैं तथा कष्टसहनके अयोग्य द्रौपदी भी भारी दुर्दशा भोग रही है । यह सब देखकर वे बड़े दुःखी हुए और आर्त स्वरसे रोने लगे ॥ १ ९ ॥ ततः स रामं च जनार्दनं च कार्ष्णिं च साम्बं च शिनेश्च पौत्रम् ।

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अन्यांश्च वृष्णीनुपगम्य पूजां चक्रे यथाधर्ममहीनसत्त्वः ॥ २० ॥

( उस महान् संकटमें भी ) महाराज युधिष्ठिरने अपना धैर्य नहीं छोड़ा था । उन्होंने बलराम, श्रीकृष्ण, प्रद्युम्न, साम्ब, सात्यकि तथा अन्यान्य वृष्णिवंशियोंके पास जा- जाकर धर्मानुसार उन सबका आदर-सत्कार किया ॥ २० ॥

ते चापि सर्वान् प्रतिपूज्य पार्थां- स्तैः सत्कृताः पाण्डुसुतैस्तथैव ।

युधिष्ठिरं सम्परिवार्य राज- न्नुपाविशन् देवगणा यथेन्द्रम् ॥ २१ ॥

राजन्! पाण्डुपुत्रोंद्वारा सत्कृत होकर यादवोंने भी उन सबका यथोचित सत्कार किया और फिर देवता जैसे इन्द्रके चारों ओर बैठ जाते हैं उसी प्रकार वे धर्मराज युधिष्ठिरको सब ओरसे घेरकर बैठ गये ॥ २१ ॥

तेषां स सर्वं चरितं परेषां वने च वासं परमप्रतीतः । अस्त्रार्थमिन्द्रस्य गतं च पार्थं निवेशनं हृष्टमनाः शशंस ॥ २२ ॥

तत्पश्चात् राजा युधिष्ठिरने अत्यन्त विश्वस्त होकर यादवोंसे शत्रुओंकी सारी करतूतें कह सुनायीं और अपने वनवासका भी सब समाचार बताया । साथ ही बड़ी प्रसन्नताके साथ यह भी सूचित किया कि अर्जुन दिव्यास्त्रोंकी प्राप्तिके लिये इन्द्रलोकमें गये हैं ॥ २२ ॥

श्रुत्वा तु ते तस्य वचः प्रतीता- स्तांश्चापि दृष्ट्वा सुकृशानतीव । नेत्रोद्भवं सम्मुमुचुर्महार्हा दुःखार्तिजं वारि महानुभावाः ॥ २३ ॥

युधिष्ठिरका यह वचन सुनकर उन्हें कुछ सान्त्वना मिली । परंतु पाण्डवोंको अत्यन्त दुर्बल देखकर वे परम पूजनीय महानुभाव यादव वीर दुःख और वेदनासे पीड़ित हो आँसू बहाने लगे ॥ २३ ॥

इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि तीर्थयात्रापर्वणि लोमशतीर्थयात्रायां प्रभासे यादवपाण्डवसमागमे अष्टादशाधिकशततमोऽध्यायः ॥ ११८ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत तीर्थयात्रापर्वमें लोमशतीर्थयात्राके प्रसंगमें प्रभासक्षेत्रके भीतर यादव- पाण्डव-समागमविषयक एक सौ अठारहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ११८ ॥

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*• पाँच अप्सराओंके तीर्थ ।

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भगवान् परशुरामद्वारा सहस्रार्जुनका वध प्रभासक्षेत्रमें पाण्डवोंकी यादवोंसे भेंट

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एकोनविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः प्रभासतीर्थमें बलरामजीके पाण्डवोंके प्रति सहानुभूतिसूचक दुःखपूर्ण उद्गार जनमेजय उवाच

प्रभासतीर्थमासाद्य पाण्डवा वृष्णयस्तथा ।

किमकुर्वन् कथाश्चैषां कास्तत्रासंस्तपोधन ॥ १ ॥

ते हि सर्वे महात्मानः सर्वशास्त्रविशारदाः ।

वृष्णयः पाण्डवाश्चैव सुहृदश्च परस्परम् ॥ २ ॥

जनमेजयने पूछा —तपोधन! प्रभासतीर्थमें पहुँचकर पाण्डवों तथा वृष्णिवंशियोंने क्या किया? वहाँ उनमें कैसी बातचीत हुई? वे सब महात्मा यादव और पाण्डव सम्पूर्ण शास्त्रोंके विद्वान् और एक- दूसरेका हित चाहनेवाले थे, ( अतः उनमें क्या बात हुई? यह मैं जानना चाहता हूँ) ॥ १-२ ॥ वैशम्पायन उवाच

प्रभासतीर्थं सम्प्राप्य पुण्यं तीर्थं महोदधेः ।

वृष्णयः पाण्डवान् वीराः परिवार्योपतस्थिरे ॥ ३ ॥

वैशम्पायनजीने कहा- राजन्! प्रभासक्षेत्र समुद्र- तटवर्ती एक पुण्यमय तीर्थ है । वहाँ जाकर वृष्णिवंशी वीर पाण्डवोंको चारों ओरसे घेरकर बैठ गये ॥ ३ ॥

ततो गोक्षीरकुन्देन्दुमृणालरजतप्रभः ।

वनमाली हली रामो बभाषे पुष्करेक्षणम् ॥ ४ ॥

तदनन्तर गोदुग्ध, कुन्दकुसुम, चन्द्रमा, मृणाल ( कमलनाल) तथा चाँदीकी - सी कान्तिवाले वनमाला--विभूषित हलधर बलरामने कमलनयन भगवान् श्रीकृष्णसे कहा ॥ ४ ॥

बलदेव उवाच न कृष्ण धर्मश्चरितो भवाय जन्तोरधर्मश्च पराभवाय । युधिष्ठिरो यत्र जटी महात्मा वनाश्रयः क्लिश्यति चीरवासाः ॥ ५ ॥

बलदेवजी बोले – श्रीकृष्ण! जान पड़ता है आचरणमें लाया हुआ धर्म भी प्राणियोंके अभ्युदयका कारण नहीं होता; और उनका किया हुआ अधर्म भी पराजयकी प्राप्ति

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करानेवाला नहीं होता, क्योंकि महात्मा युधिष्ठिरको ( जो सदा धर्मका ही पालन करते हैं ) जटाधारी होकर वल्कल वस्त्र पहने वनमें रहते हुए महान् क्लेश भोगना पड़ रहा है ॥ ५ ॥

दुर्योधनश्चापि महीं प्रशास्ति

न चास्य भूमिर्विवरं ददाति ।

धर्मादधर्मश्चरितो वरीया- नितीव मन्येत नरोऽल्पबुद्धिः ॥ ६ ॥

दुर्योधने चापि विवर्धमाने युधिष्ठिरे चासुखमात्तराज्ये । किं त्वत्र कर्तव्यमिति प्रजाभिः शङ्का मिथः संजनिता नराणाम् ॥ ७ ॥

उधर, दुर्योधन ( अधर्मपरायण होनेपर भी ) पृथ्वीका शासन कर रहा है । उसके लिये यह पृथ्वी भी नहीं फटती है । इससे तो मन्द बुद्धिवाले मनुष्य यही समझेंगे कि धर्माचरणकी अपेक्षा अधर्मका आचरण ही श्रेष्ठ है । दुर्योधन निरन्तर उन्नति कर रहा है और युधिष्ठिर छलसे राज्य छिन जानेके कारण दुःख उठा रहे हैं । ( युधिष्ठिर और दुर्योधनके दृष्टान्तको

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सामने रखकर) मनुष्योंमें परस्पर महान् संदेह खड़ा हो गया है । प्रजा यह सोचने लगी है कि हमें क्या करना चाहिये - हमें धर्मका आश्रय लेना चाहिये या अधर्मका? ॥ ६-७ ॥ अयं स धर्मप्रभवो नरेन्द्रो धर्मे धृतः सत्यधृतिः प्रदाता । चलेद्धि राज्याच्च सुखाच्च पार्थो धर्मादपेतस्तु कथं विवर्धेत् ॥ ८ ॥

ये राजा युधिष्ठिर साक्षात् धर्मके पुत्र हैं । धर्म ही इनका आधार है । ये सदा सत्यका आश्रय लेते और दान देते रहते हैं । कुन्तीकुमार युधिष्ठिर राज्य और सुख छोड़ सकते हैं, ( परंतु धर्मका त्याग नहीं कर सकते ) भला, धर्मसे दूर होकर कोई कैसे अभ्युदयका भागी हो सकता है? ॥ ८ ॥

कथं नु भीष्मश्च कृपश्च विप्रो द्रोणश्च राजा च कुलस्य वृद्धः । प्रव्राज्य पार्थान् सुखमाप्नुवन्ति धिक् पापबुद्धीन् भरतप्रधानान् ॥ ९ ॥

पितामह भीष्म, ब्राह्मण कृपाचार्य, द्रोण तथा कुलके बड़े - बूढ़े राजा धृतराष्ट्र — ये कुन्तीके पुत्रोंको राज्यसे निकालकर कैसे सुख पाते हैं? भरतकुलके इन प्रधान व्यक्तियोंको धिक्कार है! क्योंकि इनकी बुद्धि पापमें लगी हुई है ॥ ९ ॥

किं नाम वक्ष्यत्यवनिप्रधानः पितॄन् समागम्य परत्र पापः । पुत्रेषु सम्यक् चरितं मयेति पुत्रानपापान् व्यपरोप्य राज्यात् ॥ १० ॥

पापी राजा धृतराष्ट्र परलोकमें पितरोंसे मिलनेपर उनके सामने कैसे यह कह सकेगा कि ‘ मैंने अपने और भाई पाण्डुके पुत्रोंके साथ न्याययुक्त बर्ताव किया है । ' जबकि उसने इन निर्दोष पुत्रोंको राज्यसे वञ्चित कर दिया है ॥ १० ॥

नासौ धिया सम्प्रति पश्यति स्म किं नाम कृत्वाहमचक्षुरेवम् । जातः पृथिव्यामिति पार्थिवेषु प्रव्राज्य कौन्तेयमिति स्म राज्यात् ॥ ११ ॥

वह अब भी अपने बुद्धिरूप नेत्रोंसे यह नहीं देख पाता कि कौन-सा पाप करनेके कारण मुझे इस प्रकार अन्धा होना पड़ा है और आगे कुन्तीपुत्र युधिष्ठिरको राज्यसे निकालकर जब मैं भूतलके राजाओंमें फिरसे जन्म लूँगा, तब मेरी दशा कैसी होगी? ॥ ११ ॥

नूनं समृद्धान् पितृलोकभूमौ