श्रीगणेशाय नमः।
महाभारत — खण्ड २ — पृष्ठ 831–840
महाभारत — खण्ड २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 831–840
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चामीकराभान् क्षितिजान् प्रफुल्लान् । विचित्रवीर्यस्य सुतः सपुत्रः कृत्वा नृशंसं बत पश्यति स्म ॥ १२ ॥
विचित्रवीर्यका पुत्र धृतराष्ट्र और उसके पुत्र दुर्योधन आदि यह क्रूर कर्म करके ( स्वप्नमें ) निश्चय ही पितृलोककी भूमिमें सुवर्णके समान चमकनेवाले समृद्धिशाली एवं पुष्पित वृक्षोंको देख रहे हैं * ॥ १२ ॥
व्यूढोत्तरांसान् पृथुलोहिताक्षान् नेमान् स्म पृच्छन् स शृणोति नूनम् । प्रास्थापयद् यत् सवनं सशङ्को युधिष्ठिरं सानुजमात्तशस्त्रम् ॥ १३ ॥
धृतराष्ट्र सुदृढ़ कंधे तथा विशाल एवं लाल नेत्रोंवाले इन भीष्म आदिसे कोई बात पूछता तो है, परंतु निश्चय ही उनकी बात सुनकर मानता नहीं है, तभी तो भाइयोंसहित शस्त्रधारी युधिष्ठिरके प्रति भी मनमें शंका रखकर इन्हें उसने वनमें भेज दिया है ॥ १३ ॥
योऽयं परेषां पृतनां समृद्धां निरायुधो दीर्घभुजो निहन्यात् । श्रुत्वैव शब्दं हि वृकोदरस्य मुञ्चन्ति सैन्यानि शकृत् समूत्रम् ॥ १४ ॥
( भला! वे कौरव इन पाण्डवोंका सामना कैसे कर सकते हैं? ) ये बड़ी - बड़ी भुजाओंवाले भीमसेन बिना अस्त्र- शस्त्रोंके ही शत्रुओंकी शक्तिशाली सेनाका संहार कर सकते हैं । भीमका तो सिंहनाद सुनकर ही विरोधी दलके सैनिक मल- मूत्र करने लगते हैं ॥ १४ ॥
स क्षुत्पिपासाध्वकृशस्तरस्वी समेत्य नानायुधबाणपाणिः । वने स्मरन् वासमिमं सुघोरं शेषं न कुर्यादिति निश्चितं मे ॥ १५ ॥
वे ही वेगशाली भीम इन दिनों भूख- प्यास और रास्ता चलनेकी थकावटसे दुर्बल हो गये हैं । इस भयंकर वनवासका स्मरण करते हुए जब ये हाथोंमें अनेक प्रकारके अस्त्र - शस्त्र एवं धनुष- बाण लिये शत्रुओंपर आक्रमण करेंगे, उस समय किसीको भी जीता न छोड़ेंगे — यह मेरा निश्चय है ॥ १५ ॥
न ह्यस्य वीर्येण बलेन कश्चित् समः पृथिव्यामपि विद्यतेऽन्यः । सशीतवातातपकर्शिताङ्गी न शेषमाजावसुहृत्सु कुर्यात् ॥ १६ ॥
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इनके समान पराक्रमी और बलवान् वीर इस पृथ्वीपर कोई नहीं है। इस समय सर्दी-गरमी और वायुके कष्टसे यद्यपि इनका शरीर दुबला हो गया है तो भी समरमें शत्रुओंमेंसे किसीको भी ये शेष नहीं रहने देंगे ॥ १६ ॥
प्राच्यां नृपानेकरथेन जित्वा वृकोदरः सानुचरान् रणेषु । स्वस्त्यागमद् योऽतिरथस्तरस्वी सोऽयं वने क्लिश्यति चीरवासाः ॥ १७ ॥
यः सिन्धुकूले व्यजयन्नृदेवान् समागतान् दाक्षिणात्यान् महीपान् । तं पश्यतेमं सहदेवमद्य तरस्विनं तापसवेषरूपम् ॥ १८ ॥
जो पूर्वदिशामें ( दिग्विजयकी यात्राके समय ) केवल एक रथ लेकर युद्धमें बहुत- से राजाओंको सेवकोंसहित परास्त करके सकुशल लौट आये थे, वे ही अतिरथी और वेगशाली वीर वृकोदर आज वनमें वल्कल वस्त्र पहनकर कष्ट भोग रहे हैं । जिसने समुद्र-तटपर सामना करनेके लिये आये हुए दक्षिण दिशाके सम्पूर्ण राजाओंपर विजय पायी थी, उसी वेगवान् वीर इस सहदेवको देखो - यह आज तपस्वीकी- सी वेषभूषा धारण किये हुए दुःख पा रहा है ॥ १७-१८ ॥ यः पार्थिवानेकरथेन जिग्ये
दिशं प्रतीचीं प्रति युद्धशौण्डः ।
सोऽयं वने मूलफलेन जीव- ञ्जटी चरत्यद्य मलाचिताङ्गः ॥ १ ९ ॥
जिस युद्धकुशल नकुलने एकमात्र रथकी सहायतासे पश्चिम दिशाके समस्त भूपालोंको जीत लिया था, वही आज वनमें फल- मूलसे जीवन- निर्वाह करता हुआ सिरपर जटा धारण किये मलिन शरीरसे विचर रहा है ॥ १ ९ ॥ सत्रे समृद्धेऽतिरथस्य राज्ञो वेदीतलादुत्पतिता सुता या । सेयं वने वासमिमं सुदुःखं कथं सहत्यद्य सती सुखार्हा ॥ २० ॥
जो अतिरथी राजा द्रुपदके समृद्धिशाली यज्ञमें वेदीसे प्रकट हुई थी, वही यह सुख भोगनेके योग्य सती - साध्वी द्रौपदी वनवासके इस महान् दुःखको कैसे सहन करती है? ॥ २० ॥
त्रिवर्गमुख्यस्य समीरणस्य देवेश्वरस्याप्यथवाश्विनोश्च ।
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एषां सुराणां तनयाः कथं नु वनेऽचरन् ह्यस्तसुखाः सुखार्हाः ॥ २१ ॥
धर्म, वायु, इन्द्र और अश्विनीकुमारों जैसे देवताओंके ये पुत्र सुख भोगनेके योग्य होते हुए भी आज सब प्रकारके सुखोंसे वञ्चित हो वनमें कैसे विचरण कर रहे हैं? ॥ २१ ॥
जिते हि धर्मस्य सुते सभायें सभ्रातृके सानुचरे निरस्ते । दुर्योधने चापि विवर्धमाने कथं न सीदत्यवनिः सशैला ॥ २२ ॥
पत्नीसहित धर्मराज युधिष्ठिर जूएमें हार गये और भाइयों एवं सेवकोंसहित राज्यसे बाहर कर दिये गये, उधर दुर्योधन ( अनीतिपरायण होकर भी दिनोदिन ) बढ़ रहा है, ऐसी दशामें पर्वतोंसहित यह पृथ्वी क्यों नहीं फट जाती? ॥ २२ ॥
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि तीर्थयात्रापर्वणि लोमशतीर्थयात्रायां बलरामवाक्ये एकोनविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ ११ ९ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत तीर्थयात्रापर्वमें लोमशतीर्थयात्राके प्रसंगमें बलरामवाक्यविषयक एक सौ उन्नीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ११ ९ ॥ * इस प्रकारके वृक्षोंको प्रत्यक्ष देखना मृत्युसूचक माना गया है ।
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विंशत्यधिकशततमोऽध्यायः सात्यकिके शौर्यपूर्ण उद्गार तथा युधिष्ठिरद्वारा श्रीकृष्णके वचनोंका अनुमोदन एवं पाण्डवोंका पयोष्णी नदीके तटपर निवास सात्यकिरुवाच न राम कालः परिदेवनाय यदुत्तरं त्वत्र तदेव सर्वे । समाचरामो हानतीतकालं युधिष्ठिरो यद्यपि नाह किंचित् ॥ १ ॥
सात्यकिने कहा — बलरामजी! यह समय बैठकर विलाप करनेका नहीं है । अब आगे जो कुछ करना है उसीको हम सब लोग मिलकर करें । यद्यपि महाराज युधिष्ठिर हमसे कुछ नहीं कहते हैं तो भी हमें अब व्यर्थ समय न बिताकर कौरवोंको उचित उत्तर देना चाहिये ॥ ये नाथवन्तोऽद्य भवन्ति लोके ते नात्मना कर्म समारभन्ते । तेषां तु कार्येषु भवन्ति नाथाः शिब्यादयो राम यथा ययातेः ॥ २ ॥
इस संसारमें जो लोग सनाथ हैं - जिनके बहुत- से सहायक हैं - वे स्वयं कोई कार्य आरम्भ नहीं करते हैं । उनके सभी कार्योंमें वे सहायक एवं सुहृद् ही सहयोगी होते हैं, जैसे ययातिके उद्धार- कार्यमें शिबि आदि उनके नातियोंने योगदान किया था ॥ २ ॥
येषां तथा राम समारभन्ते कार्याणि नाथाः स्वमतेन लोके । ते नाथवन्तः पुरुषप्रवीरा नानाथवत् कृच्छ्रमवाप्नुवन्ति ॥ ३ ॥
बलरामजी! जगत्में जिनके कार्य उनके सहायक अपने ही विचारसे प्रारम्भ करते हैं, वे
पुरुषश्रेष्ठ सनाथ माने जाते हैं । वे अनाथकी भाँति कभी कष्टमें नहीं पड़ते ॥ ३ ॥
कस्मादिमौ रामजनार्दनौ च प्रद्युम्नसाम्बौ च मया समेतौ । वसन्त्यरण्ये सहसोदरीयै- स्त्रैलोक्यनाथानभिगम्य पार्थाः ॥ ४ ॥
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आप दोनों भाई बलराम और श्रीकृष्ण, मेरेसहित ये प्रद्युम्न और साम्ब सब - के - सब मौजूद हैं । इन त्रिभुवनपतियोंसे मिलकर भी ये कुन्तीके पुत्र अभीतक अपने भाइयोंके साथ वनमें क्यों निवास करते हैं? ॥ ४ ॥
निर्यातु साध्वद्य दशार्हसेना प्रभूतनानायुधचित्रवर्मा । यमक्षयं गच्छतु धार्तराष्ट्रः सबान्धवो वृष्णिबलाभिभूतः ॥ ५ ॥
त्वं ह्येव कोपात् पृथिवीमपीमां संवेष्टयेस्तिष्ठतु शार्ङ्गधन्वा । स धार्तराष्ट्रं जहि सानुबन्धं वृत्रं यथा देवपतिर्महेन्द्रः ॥ ६ ॥
उत्तम तो यह है कि आज ही यदुवंशियोंकी सेना नाना प्रकारके प्रचुर अस्त्र - शस्त्र और विचित्र कवच धारण करके युद्धके लिये प्रस्थान करे । धृतराष्ट्रपुत्र दुर्योधन वृष्णिवंशियोंके पराक्रमसे पराजित हो बन्धु बान्धवोंसहित यमलोक चला जाय। बलरामजी! भगवान् श्रीकृष्ण अलग खड़े रहें, केवल आप ही चाहें तो इस समूची पृथ्वीको भी अपन क्रोधाग्निकी लपटोंमें लपेट सकते हैं । जैसे देवराज इन्द्रने वृत्रासुरका वध किया था उसी प्रकार आप भी दुर्योधनको उसके सगे- सम्बन्धियों सहित मार डालिये ॥ ५-६ ॥ भ्राता च मे यः स सखा गुरुश्च जनार्दनस्यात्मसमश्च पार्थः । यदर्थमैच्छन् मनुजाः सुपुत्रं शिष्यं गुरुश्चाप्रतिकूलवादम् ॥ ७ ॥
जो मेरे भाई, सखा और गुरु हैं, जो भगवान् श्रीकृष्णके आत्मतुल्य सुहृद् हैं, वे कुन्तीकुमार अर्जुन भी अलग रहें। मनुष्य जिस उद्देश्यसे अच्छे पुत्रकी और गुरु प्रतिकूल न बोलनेवाले शिष्यकी कामना करते हैं, उसे सफल करनेका समय आ गया है ॥ ७ ॥
यदर्थमभ्युद्यतमुत्तमं तत्
करोति कर्माग्रयमपारणीयम् ।
तस्यास्त्रवर्षाण्यहमुत्तमास्त्र- र्विहत्य सर्वाणि रणेऽभिभूय ॥ ८ ॥
जिसके लिये सुयोग्य शिष्य या पुत्र उत्तम अस्त्र - शस्त्र उठाता है तथा युद्धमें श्रेष्ठ एवं अपार पराक्रम कर दिखाता है, उसकी पूर्तिका यही अवसर है । मैं संग्रामभूमिमें अपने उत्तम आयुधोंद्वारा शत्रुओंकी सारी अस्त्र- वर्षाको नष्ट करके उनके समस्त सैनिकोंको परास्त कर दूँगा ॥ ८ ॥
कायाच्छिरः सर्पविषाग्निकल्पैः
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शरोत्तमैरुन्मथितास्मि राम । खड्गेन चाहं निशितेन संख्ये कायाच्छिरस्तस्य बलात् प्रमथ्य ॥ ९ ॥
बलरामजी! सर्प, विष एवं अग्निके समान भयंकर उत्तम बाणोंद्वारा शत्रुके सिरको धड़से अलग कर दूँगा, साथ ही उस समरांगणमें शत्रुमण्डलीको मैं बलपूर्वक रौंदकर तीखी तलवारद्वारा उसका मस्तक उड़ा दूँगा ॥ ९ ॥
ततोऽस्य सर्वाननुगान् हनिष्ये दुर्योधनं चापि कुरूंश्च सर्वान् । आत्तायुधं मामिह रौहिणेय पश्यन्तु भैमा युधि जातहर्षाः ॥ १० ॥
तदनन्तर उसके समस्त सेवकोंसहित दुर्योधन और समस्त कौरवोंको भी मार डालूँगा । रोहिणीनन्दन! युद्धमें भयानक पराक्रम दिखानेवाले योद्धा हर्ष और उत्साहमें भरकर आज मुझे हाथमें अस्त्र लिये पूर्वोक्त पराक्रम करते हुए प्रत्यक्ष देखें ॥ १० ॥
निघ्नन्तमेकं कुरुयोधमुख्या- नग्निं महाकक्षमिवान्तकाले । प्रद्युम्नमुक्तान् निशितान् न शक्ताः सोढुं कृपद्रोणविकर्णकर्णाः ॥ ११ ॥
जैसे प्रलयकालीन अग्नि सूखे घासकी राशिको जलाकर भस्म कर देती है, उसी प्रकार मैं अकेला ही कौरवदलके प्रधान वीरोंका संहार कर डालूँगा और ऐसा करते हुए सब लोग मुझे प्रत्यक्ष देखेंगे । प्रद्युम्नके छोड़े हुए तीखे बाणोंको सहन करनेकी शक्ति कृपाचार्य, द्रोणाचार्य, विकर्ण और कर्ण - किसीमें नहीं है ॥ ११ ॥
जानामि वीर्यं च जयात्मजस्य कार्ष्णिर्भवत्येष यथा रणस्थः । साम्बः ससूतं सरथं भुजाभ्यां दुःशासनं शास्तु बलात् प्रमथ्य ॥ १२ ॥
मैं अर्जुनकुमार अभिमन्युके भी पराक्रमको जानता हूँ । वह समरभूमिमें खड़ा होनेपर साक्षात् श्रीकृष्णनन्दन प्रद्युम्नके ही समान जान पड़ता है । वीरवर साम्ब बलपूर्वक शत्रुसेनाको मथकर अपनी दोनों भुजाओंसे रथ और सारथिसहित दुःशासनका दमन करें ॥ १२ ॥
न विद्यते जाम्बवतीसुतस्य रणे विषह्यं हि रणोत्कटस्य । एतेन बालेन हि शम्बरस्य दैत्यस्य सैन्यं सहसा प्रणुन्नम् ॥ १३ ॥
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जाम्बवतीनन्दन साम्ब रणभूमिमें बड़े प्रचण्ड पराक्रमशाली बन जाते हैं । उस समय इनके लिये कुछ भी असह्य नहीं है । इन्होंने बाल्यावस्थामें ही सहसा शम्बरासुरकी सेनाको नष्ट - भ्रष्ट कर दिया था ॥ १३ ॥
वृत्तोरुरत्यायतपीनबाहु- रेतेन संख्ये निहतोऽश्वचक्रः । को नाम साम्बस्य महारथस्य रणे समक्षं रथमभ्युदीयात् ॥ १४ ॥
इनकी जाँघें गोल हैं, भुजाएँ लंबी और मोटी हैं; इन्होंने युद्धमें अश्वारोहियोंकी कितनी ही सेनाओंका संहार किया है । भला, संग्रामभूमिमें महारथी साम्बके रथके सम्मुख कौन आ सकता है? ॥ १४ ॥
यथा प्रविश्यान्तरमन्तकस्य काले मनुष्यो न विनिष्क्रमेत । तथा प्रविश्यान्तरमस्य संख्ये को नाम जीवन् पुनराव्रजेत ॥ १५ ॥
जैसे अन्तकाल आनेपर यमराजकी भुजाओंमें पड़ा हुआ मनुष्य कदापि वहाँसे निकल नहीं सकता, उसी प्रकार रणक्षेत्रमें वीरवर साम्बके वशमें आया हुआ कौन ऐसा योद्धा होगा, जो पुनः जीवित लौट सके ॥ १५ ॥
द्रोणं च भीष्मं च महारथौ तौ सुतैर्वृतं चाप्यथ सोमदत्तम् । सर्वाणि सैन्यानि च वासुदेवः प्रधक्ष्यते सायकवह्निजालैः ॥ १६ ॥
वसुदेवनन्दन भगवान् श्रीकृष्ण चाहें तो अपने बाणरूपी अग्निकी लपटोंसे द्रोण और भीष्म- इन दोनों प्रसिद्ध महारथियोंको, पुत्रोंसहित सोमदत्तको तथा सारी कौरवसेनाको भी भस्म कर डालेंगे ॥ १६ ॥
किं नाम लोकेष्वविषह्यमस्ति
कृष्णस्य सर्वेषु सदेवकेषु ।
आत्तायुधस्योत्तमबाणपाणे- श्चक्रायुधस्याप्रतिमस्य युद्धे ॥ १७ ॥
देवताओंसहित सम्पूर्ण लोकोंमें कौन - सी ऐसी वस्तु है, जो हाथोंमें हथियार, उत्तम बाण तथा चक्र धारण करके युद्धमें अनुपम पराक्रम प्रकट करनेवाले भगवान् श्रीकृष्णके लिये असह्य हो ॥ १७ ॥
ततोऽनिरुद्धोऽप्यसिचर्मपाणि- र्महीमिमां धार्तराष्ट्रैर्विसंज्ञैः ।
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हृतोत्तमाङ्गैर्निहतैः करोतु कीर्णां कुशैर्वेदिमिवाध्वरेषु ॥ १८ ॥
गदोल्मुकौ बाहुकभानुनीथाः शूरश्च संख्ये निशठः कुमारः । रणोत्कटौ सारणचारुदेष्णौ कुलोचितं विप्रथयन्तु कर्म ॥ १ ९ ॥ ढाल- तलवार लिये हुए वीरवर अनिरुद्ध भी, जैसे यज्ञोंमें कुशाओंद्वारा यज्ञकी वेदी ढक दी जाती है, उसी प्रकार युद्धमें सिर कटाकर मरे और अचेत पड़े हुए धृतराष्ट्रपुत्रोंद्वारा इस भूमिको ढक दें । गद, उल्मुक, बाहुक, भानु, नीथ, युद्धमें शूरवीर कुमार निशठ तथा रणभूमिमें प्रचण्ड पराक्रमी सारण और चारुदेष्ण– ये सब लोग अपने कुलके अनुरूप पराक्रम प्रकट करें ॥ १८-१९ ॥ सवृष्णिभोजान्धकयोधमुख्या
समागता सात्वतशूरसेना ।
हत्वा रणे तान् धृतराष्ट्रपुत्राँ- ल्लोके यशः स्फीतमुपाकरोतु ॥ २० ॥
यदुवंशियोंकी शौर्यपूर्ण सेना, जिसमें वृष्णि, भोज और अन्धकवंशी योद्धाओंकी प्रधानता है, आक्रमण करके युद्धमें धृतराष्ट्रपुत्रोंको मार डाले और संसारमें अपने उज्ज्वल यशका विस्तार करे ॥ २० ॥
ततोऽभिमन्युः पृथिवीं प्रशास्तु यावद् व्रतं धर्मभृतां वरिष्ठः । युधिष्ठिरः पारयते महात्मा द्यूते यथोक्तं कुरुसत्तमेन ॥ २१ ॥
धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ महात्मा युधिष्ठिर जबतक अपने उस व्रतको, जिसे इन कुरुकुलभूषणने जूएके समय प्रतिज्ञापूर्वक स्वीकार किया था, पूर्ण न कर लें, तबतक अभिमन्यु इस पृथ्वीका शासन करे ॥ २१ ॥
अस्मत्प्रमुक्तैर्विशिखैर्जितारि- स्ततो महीं भोक्ष्यति धर्मराजः ।
निर्धार्तराष्ट्रां हतसूतपुत्रा- मेतद्धि नः कृत्यतमं यशस्यम् ॥ २२ ॥
तदनन्तर अपना व्रत समाप्त करके हमारे द्वारा छोड़े हुए बाणोंसे ही शत्रुओंपर विजय पाकर धर्मराज युधिष्ठिर इस पृथ्वीका राज्य भोगेंगे । उस समयतक यह पृथ्वी धृतराष्ट्रके पुत्रोंसे रहित हो जायगी और सूतपुत्र कर्ण भी मर जायगा। यदि ऐसा हुआ तो यह हमारे लिये महान् यशोवर्धक कार्य होगा ॥ २२ ॥
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वासुदेव उवाच असंशयं माधव सत्यमेतद् गृह्णीते वाक्यमदीनसत्त्व । स्वाभ्यां भुजाभ्यामजितां तु भूमिं नेच्छेत् कुरूणामृषभः कथंचित् ॥ २३ ॥
भगवान् श्रीकृष्ण बोले- उदारहृदय मधुकुलभूषण सात्यके! तुम्हारी यह बात सत्य है, इसमें तनिक भी संशय नहीं है । हम तुम्हारे इन वचनोंको स्वीकार करते हैं; परंतु ये कुरुश्रेष्ठ युधिष्ठिर किसी भी ऐसी भूमिको किसी तरह लेना नहीं चाहेंगे, जिसे इन्होंने अपनी भुजाओंद्वारा न जीता हो ॥ २३ ॥
न ह्येष कामान्न भयान्न लोभाद् युधिष्ठिरो जातु जह्यात् स्वधर्मम् । भीमार्जुना चातिरथौ यमौ च तथैव कृष्णा द्रुपदात्मजेयम् ॥ २४ ॥
कामना, भय अथवा लोभ किसी भी कारणसे युधिष्ठिर अपना धर्म कदापि नहीं छोड़ सकते । उसी तरह अतिरथी वीर भीम, अर्जुन, नकुल, सहदेव तथा यह द्रुपदकुमारी कृष्णा भी अपना धर्म नहीं छोड़ सकती ॥ २४ ॥
उभौ हि युद्धेऽप्रतिमौ पृथिव्यां
वृकोदरश्चैव धनंजयश्च ।
कस्मान्न कृत्स्नां पृथिवीं प्रशासे- न्माद्रीसुताभ्यां च पुरस्कृतोऽयम् ॥ २५ ॥
भीमसेन और अर्जन — ये दोनों वीर युद्धमें इस पृथ्वीपर अपना सानी नहीं रखते । इनसे और दोनों माद्रीकुमारोंसे संयुक्त होनेपर ये युधिष्ठिर सारी पृथ्वीका शासन कैसे नहीं कर सकते? ॥ २५ ॥
यदा तु पञ्चालपतिर्महात्मा
सकेकयश्चेदिपतिर्वयं च ।
युध्येम विक्रम्य रणे समेता- स्तदैव सर्वे रिपवो हि न स्युः ॥ २६ ॥
जब महात्मा पांचालराज, केकय, चेदिराज और हम सब लोग एक साथ होकर रणमें पराक्रम दिखायेंगे, उसी समय हमारे सारे शत्रुओंका अस्तित्व मिट जायगा ॥ २६ ॥
युधिष्ठिर उवाच नेदं चित्रं माधव यद् ब्रवीषि सत्यं तु मे रक्ष्यतमं न राज्यम् ।
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कृष्णस्तु मां वेद यथावदेकः कृष्णं च वेदाहमथो यथावत् ॥ २७ ॥
युधिष्ठिरने कहा — सात्यके! तुम जो कुछ कह रहे हो वह तुम्हारे जैसे वीरके लिये कोई आश्चर्यकी बात नहीं है, परंतु मेरे लिये सत्यकी रक्षा ही प्रधान है, राज्यकी प्राप्ति नहीं । केवल श्रीकृष्ण ही मुझे अच्छी तरह जानते हैं और मैं भी कृष्णके स्वरूपको यथार्थ- रूपसे जानता हूँ ॥ २७ ॥
यदैव कालं पुरुषप्रवीरो वेत्स्यत्ययं माधव विक्रमस्य । तदा रणे त्वं च शिनिप्रवीर सुयोधनं जेष्यसि केशवश्च ॥ २८ ॥
शिनिवंशके प्रधान वीर माधव! ये पुरुषरत्न श्रीकृष्ण जभी पराक्रम दिखानेका अवसर आया समझेंगे, तभी तुम और भगवान् केशव मिलकर युद्धमें दुर्योधनको जीत सकोगे ॥ २८ ॥
प्रतिप्रयान्त्वद्य दशार्हवीरा दृष्टोऽस्मि नाथैर्नरलोकनाथैः । धर्मेऽप्रमादं कुरुताप्रमेया द्रष्टास्मि भूयः सुखिनः समेतान् ॥ २ ९ ॥ अब ये यदुवंशी वीर द्वारकाको लौट जायँ । आपलोग मेरे नाथ या सहायक तो हैं ही, सम्पूर्ण मनुष्य - लोकके भी रक्षक हैं, आपलोगोंसे मिलना हो गया, यह बड़े आनन्दकी बात है । अनुपम शक्तिशाली वीरो! आपलोग धर्मपालनकी ओरसे सदा सावधानी रखें । मैं पुनः आप सभी सुखी मित्रोंको एकत्र हुआ देखूँगा ॥ २ ९ ॥ तेऽन्योन्यमामन्त्र्य तथाभिवाद्य
वृद्धान् परिष्वज्य शिशूंश्च सर्वान् ।
यदुप्रवीराः स्वगृहाणि जग्मु- स्ते चापि तीर्थान्यनुसंविचेरुः ॥ ३० ॥
तत्पश्चात् वे यादव- पाण्डव वीर एक दूसरेकी अनुमति ले, वृद्धोंको प्रणाम करके, बालकोंको हृदयसे लगाकर तथा अन्य सबसे यथायोग्य मिलकर अपने अभीष्ट स्थानको चल दिये । यादववीर अपने घर गये और पाण्डवलोग पूर्ववत् तीर्थोंमें विचरने लगे ॥ ३० ॥
विसृज्य कृष्णं त्वथ धर्मराजो विदर्भराजोपचितां सुतीर्थाम् । जगाम पुण्यां सरितं पयोष्णीं सभ्रातृभृत्यः सह लोमशेन ॥ ३१ ॥