श्रीगणेशाय नमः।
महाभारत — खण्ड २ — पृष्ठ 851–860
महाभारत — खण्ड २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 851–860
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त्रयोविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः अश्विनीकुमारोंकी कृपासे महर्षि च्यवनको सुन्दर रूप और युवावस्थाकी प्राप्ति लोमशउवाच
कस्यचित् त्वथ कालस्य त्रिदशावश्विनौ नृप ।
कृताभिषेकां विवृतां सुकन्यां तामपश्यताम् ॥ १ ॥
तां दृष्ट्वा दर्शनीयाङ्गीं देवराजसुतामिव ।
ऊचतुः समभिद्रुत्य नासत्यावश्विनाविदम् ॥ २ ॥
लोमशजी कहते हैं - युधिष्ठिर! तदनन्तर कुछ कालके बाद जब एक समय सुकन्या स्नान कर चुकी थी, उस समय उसके सब अंग ढके हुए नहीं थे । इसी अवस्थामें दोनों अश्विनीकुमार देवताओंने उसे देखा। साक्षात् देवराज इन्द्रकी पुत्रीके समान दर्शनीय अंगोंवाली उस राजकन्याको देखकर नासत्यसंज्ञक अश्विनीकुमारोंने उसके पास जा यह बात कही- ॥ १-२ ॥
कस्य त्वमसि वामोरु वनेऽस्मिन् किं करोषि च ।
इच्छाव भद्रे ज्ञातुं त्वां तत्त्वमाख्याहि शोभने ॥ ३ ॥
‘ वामोरु! तुम किसकी पुत्री और किसकी पत्नी हो? इस वनमें क्या करती हो? भद्रे! हम तुम्हारा परिचय प्राप्त करना चाहते हैं । शोभने! तुम सब बातें ठीक -ठीक बताओ ' ॥ ३ ॥
ततः सुकन्या सव्रीडा तावुवाच सुरोत्तमौ ।
शर्यातितनयां वित्तं भार्यां मां च्यवनस्य च ॥ ४ ॥
तब सुकन्याने लज्जित होकर उन दोनों श्रेष्ठ देवताओंसे कहा– ' देवेश्वरो! आपको विदित होना चाहिये कि मैं राजा शर्यातिकी पुत्री और महर्षि च्यवनकी पत्नी हूँ ॥ ४ ॥
( नाम्ना चाहं सुकन्यास्मि नृलोकेऽस्मिन् प्रतिष्ठिता । साहं सर्वात्मना नित्यं पतिं प्रति सुनिष्ठिता ॥ )
अथाश्विनी प्रहस्यैतामब्रूतां पुनरेव तु ।
कथं त्वमसि कल्याणि पित्रा दत्ता गताध्वने ॥ ५ ॥
भ्राजसेऽस्मिन् वने भीरु विद्युत्सौदामनी यथा ।
न देवेष्वपि तुल्यां हि त्वया पश्याव भाविनि ॥ ६ ॥
' मेरा नाम इस जगत्में सुकन्या प्रसिद्ध है । मैं सम्पूर्ण हृदयसे सदा अपने पतिदेवके प्रति निष्ठा रखती हूँ । ' यह सुनकर अश्विनीकुमारोंने पुनः हँसते हुए कहा — ‘ कल्याणि!
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तुम्हारे पिताने इस अत्यन्त बूढ़े पुरुषके साथ तुम्हारा विवाह कैसे कर दिया? भीरु! इस वनमें तुम विद्युत्की भाँति प्रकाशित हो रही हो । भामिनि! देवताओंके यहाँ भी तुम - जैसी सुन्दरीको हम नहीं देख पाते हैं ॥ ५-६ ॥
अनाभरणसम्पन्ना परमाम्बरवर्जिता ।
शोभयस्यधिकं भद्रे वनमप्यनलंकृता ॥ ७ ॥
‘ भद्रे! तुम्हारे अंगोंपर आभूषण नहीं है । तुम उत्तम वस्त्रोंसे भी वञ्चित हो और तुमने कोई शृंगार भी नहीं धारण किया है तो भी इस वनकी अधिकाधिक शोभा बढ़ा रही हो ॥ ७ ॥
सर्वाभरणसम्पन्ना परमाम्बरधारिणी ।
शोभसे त्वनवद्याङ्गि न त्वेवं मलपङ्किनी ॥ ८ ॥
‘निर्दोष अंगोंवाली सुन्दरी! यदि तुम समस्त भूषणोंसे भूषित हो जाओ और अच्छे-अच्छे वस्त्र पहन लो तो उस समय तुम्हारी जो शोभा होगी, वैसी इस मल और पंकसे युक्त मलिन वेशमें नहीं हो रही है ॥ ८ ॥
कस्मादेवंविधा भूत्वा जराजर्जरितं पतिम् ।
त्वमुपास्से ह कल्याणि कामभोगबहिष्कृतम् ॥ ९ ॥
' कल्याणि! तुम ऐसी अनुपम सुन्दरी होकर कामभोगसे शून्य इस जरा-जर्जर बूढ़े पतिकी उपासना कैसे करती हो? ॥ ९ ॥
असमर्थं परित्राणे पोषणे तु शुचिस्मिते ।
सा त्वं च्यवनमुत्सृज्य वरयस्वैकमावयोः ॥ १० ॥
‘ पवित्र मुसकानवाली देवि! वह बूढ़ा तो तुम्हारी रक्षा और पालन- पोषणमें भी समर्थ नहीं है । अतः तुम च्यवनको छोड़कर हम दोनोंमेंसे किसी एकको अपना पति चुन लो ॥ १० ॥
पत्यर्थं देवगर्भाभे मा वृथा यौवनं कृथाः ।
एवमुक्ता सुकन्यापि सुरौ ताविदमब्रवीत् ॥ ११ ॥
‘ देवकन्याके समान सुन्दरी राजकुमारी! बूढ़े पतिके लिये अपनी इस जवानीको व्यर्थ न गँवाओ । ' उनके ऐसा कहनेपर सुकन्याने उन दोनों देवताओंसे कहा- ॥ ११ ॥
रताहं च्यवने पत्यौ मैवं मां पर्यशङ्कतम् ।
तावब्रूतां पुनस्त्वेनामावां देवभिषग्वरौ ॥ १२ ॥
युवानं रूपसम्पन्नं करिष्यावः पतिं तव ।
ततस्तस्यावयोश्चैव वृणीष्वान्यतमं पतिम् ॥ १३ ॥
एतेन समयेनैनमामन्त्रय पतिं शुभे ।
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‘ देवेश्वरो! मैं अपने पतिदेव च्यवनमुनिमें ही पूर्ण अनुराग रखती हूँ, अतः आप मेरे विषयमें इस प्रकारकी अनुचित आशंका न करें। ' तब उन दोनोंने पुनः सुकन्यासे कहा -' शुभे! हम देवताओंके श्रेष्ठ वैद्य हैं । तुम्हारे पतिको तरुण और मनोहर रूपसे सम्पन्न बना देंगे । तब तुम हम तीनोंमेंसे किसी एकको अपना पति बना लेना । इस शर्तके साथ तुम चाहो तो अपने पतिको यहाँ बुला लो ' ॥ १२-१३ ३ ॥ सा तयोर्वचनाद् राजन्नुपसंगम्य भार्गवम् ॥ १४ ॥
उवाच वाक्यं यत् ताभ्यामुक्तं भृगुसुतं प्रति ।
तच्छ्रुत्वा च्यवनो भार्यामुवाच क्रियतामिति ॥ १५ ॥
राजन्! उन दोनोंकी यह बात सुनकर सुकन्या च्यवन मुनिके पास गयी और अश्विनीकुमारोंने जो कुछ कहा था, वह सब उन्हें कह सुनाया । यह सुनकर च्यवनने अपनी पत्नीसे कहा— ‘ प्रिये! देववैद्योंने जैसा कहा है, वैसा करो ' ॥ १४-१५ ॥ ( सा भर्त्रा समनुज्ञाता क्रियतामिति चाब्रवीत् । श्रुत्वा तदश्विनौ वाक्यं तस्यास्तत् क्रियतामिति ॥ )
ऊचतू राजपुत्रीं तां पतिस्तव विशत्वपः ।
ततोऽम्भश्च्यवनः शीघ्रं रूपार्थी प्रविवेश ह ॥ १६ ॥
पतिकी यह आज्ञा पाकर सुकन्याने अश्विनीकुमारोंसे कहा - ' आप मेरे पतिको रूप और यौवनसे सम्पन्न बना दें । ' उसका यह कथन सुनकर अश्विनीकुमारोंने राजकुमारी सुकन्यासे कहा — ‘ तुम्हारे पतिदेव इस जलमें प्रवेश करें । ' तब च्यवन मुनिने सुन्दर रूपकी अभिलाषा लेकर शीघ्रतापूर्वक उस सरोवरके जलमें प्रवेश किया ॥ १६ ॥
अश्विनावपि तद् राजन् सरः प्राविशतां तदा ।
ततो मुहूर्तादुत्तीर्णाः सर्वे ते सरसस्तदा ॥ १७ ॥
दिव्यरूपधराः सर्वे युवानो मृष्टकुण्डलाः ।
तुल्यवेषधराश्चैव मनसः प्रीतिवर्धनाः ॥ १८ ॥
राजन्! उनके साथ ही दोनों अश्विनीकुमार भी उस सरोवरमें प्रवेश कर गये । तदनन्तर दो घड़ीके पश्चात् वे सब- के - सब दिव्य रूप धारण करके सरोवरसे बाहर निकले । उन सबकी युवावस्था थी । उन्होंने कानोंमें चमकीले कुण्डल धारण कर रखे थे । वेष - भूषा भी उनकी एक- सी ही थी और वे सभी मनकी प्रीति बढ़ानेवाले थे ॥ १७-१८ ॥
तेऽब्रुवन् सहिताः सर्वे वृणीष्वान्यतमं शुभे ।
अस्माकमीप्सितं भद्रे पतित्वे वरवर्णिनि ॥ १ ९ ॥
सरोवरसे बाहर आकर उन सबने एक साथ कहा - ' शुभे! भद्रे! वरवर्णिनि! हममेंसे किसी एकको जो तुम्हारी रुचिके अनुकूल हो, अपना पति बना लो ॥ १ ९ ॥
यत्र वाप्यभिकामासि तं वृणीष्व सुशोभने ।
सा समीक्ष्य तु तान् सर्वांस्तुल्यरूपधरान् स्थितान् ॥ २० ॥
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निश्चित्य मनसा बुद्धया देवी वव्रे स्वकं पतिम् ।
लब्ध्वा तु च्यवनो भार्यां वयो रूपं च वाञ्छितम् ॥ २१ ॥
हृष्टोऽब्रवीन्महातेजास्तौ नासत्याविदं वचः ।
यथाहं रूपसम्पन्नो वयसा च समन्वितः ॥ २२ ॥
कृतो भवद्भयां वृद्धः सन् भार्यां च प्राप्तवानिमाम् ।
तस्माद् युवां करिष्यामि प्रीत्याहं सोमपीथिनौ ।
मिषतो देवराजस्य सत्यमेतद् ब्रवीमि वाम् ॥ २३ ॥
‘ अथवा शोभने! जिसको भी तुम मनसे चाहती होओ, उसीको पति बनाओ । ' देवी सुकन्याने उन सबको एक जैसा रूप धारण किये खड़े देख मन और बुद्धिसे निश्चय करके अपने पतिको ही स्वीकार किया । महातेजस्वी च्यवन मुनिने अनुकूल पत्नी, तरुण अवस्था और मनोवाञ्छित रूप पाकर बड़े हर्षका अनुभव किया और दोनों अश्विनीकुमारोंसे कहा -' आप दोनोंने मुझ बूढ़ेको रूपवान् और तरुण बना दिया, साथ ही मुझे अपनी यह भार्या भी मिल गयी; इसलिये मैं प्रसन्न होकर आप दोनोंको यज्ञमें देवराज इन्द्रके सामने ही
सोमपानका अधिकारी बना दूँगा। यह मैं आपलोगोंसे सत्य कहता हूँ ' ॥ २०—२३ ॥
तच्छ्रुत्वा हृष्टमनसौ दिवं तौ प्रतिजग्मतुः ।
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च्यवनश्च सुकन्या च सुराविव विजहतुः ॥ २४ ॥
यह सुनकर दोनों अश्विनीकुमार प्रसन्नचित्त हो देवलोकको लौट गये और च्यवन तथा सुकन्या देवदम्पतिकी भाँति विहार करने लगे ॥ २४ ॥
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि तीर्थयात्रापर्वणि लोमशतीर्थयात्रायां सौकन्ये त्रयोविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १२३ ॥
इस प्रकारश्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत तीर्थयात्रापर्वमें लोमशतीर्थयात्राप्रसंगमें सुकन्योपाख्यानविषयक एक सौ तेईसवाँ अध्याय पूराहुआ ॥ १२३ ॥
( दाक्षिणात्य अधिक पाठके २ श्लोक मिलाकर कुल २६ श्लोक हैं )
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चतुर्विंशत्यधिकशततमोऽध्यायः शर्यातिके यज्ञमें च्यवनका इन्द्रपर कोप करके वज्रको स्तम्भित करना और उसे मारनेके लिये मदासुरको उत्पन्न करना लोमशउवाच
ततः शुश्राव शर्यातिर्वयस्थं च्यवनं कृतम् ।
सुहृष्टः सेनया सार्धमुपायाद् भार्गवाश्रमम् ॥ १ ॥
लोमशजी कहते हैं -युधिष्ठिर! तदनन्तर राजा शर्यातिने सुना कि महर्षि च्यवन युवावस्थाको प्राप्त हो गये; इस समाचारसे उन्हें बड़ी प्रसन्नता हुई । वे सेनाके साथ महर्षि च्यवनके आश्रमपर आये ॥ १ ॥
च्यवनं च सुकन्यां च दृष्ट्वा देवसुताविव ।
रेमे सभार्यः शर्यातिः कृत्स्नां प्राप्य महीमिव ॥ २ ॥
ऋषिणा सत्कृतस्तेन सभार्यः पृथिवीपतिः ।
उपोपविष्टः कल्याणीः कथाश्चक्रे मनोरमाः ॥ ३ ॥
च्यवन और सुकन्याको देवकुमारोंके समान सुखी देखकर पत्नीसहित शर्यातिको महान् हर्ष हुआ, मानो उन्हें सम्पूर्ण पृथ्वीका राज्य मिल गया हो । च्यवन ऋषिने रानियोंसहित राजाका बड़ा आदर-सत्कार किया और उनके पास बैठकर मनको प्रिय लगनेवाली कल्याणमयी कथाएँ सुनायीं ॥ २-३ ॥
अथैनं भार्गवो राजन्नुवाच परिसान्त्वयन् ।
याजयिष्यामि राजंस्त्वां सम्भारानवकल्पय ॥ ४ ॥
युधिष्ठिर! तत्पश्चात् भृगुनन्दन च्यवनने उन्हें सान्त्वना देते हुए कहा — ‘ राजन्! मैं
आपसे यज्ञ कराऊँगा । आप सामग्री जुटाइये ' ॥ ४ ॥
ततः परमसंहृष्टः शर्यातिरवनीपतिः ।
च्यवनस्य महाराज तद् वाक्यं प्रत्यपूजयत् ॥ ५ ॥
महाराज! यह सुनकर राजा शर्याति बड़े प्रसन्न हुए और उन्होंने च्यवन मुनिके उस वचनकी बड़ी सराहना की ॥ ५ ॥
प्रशस्तेऽहनि यज्ञीये सर्वकामसमृद्धिमत् ।
कारयामास शर्यातिर्यज्ञायतनमुत्तमम् ॥ ६ ॥
तदनन्तर यज्ञके लिये उपयोगी शुभ दिन आनेपर शर्यातिने एक उत्तम यज्ञमण्डप तैयार करवाया, जो सम्पूर्ण मनोवाञ्छित समृद्धियोंसे सम्पन्न था ॥ ६ ॥
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तत्रैनं च्यवनो राजन् याजयामास भार्गवः ।
अद्भुतानि च तत्रासन् यानि तानि निबोध मे ॥ ७ ॥
राजन्! भृगुपुत्र च्यवनने उस यज्ञमण्डपमें राजासे यज्ञ करवाया । उस यज्ञमें जो अद्भुत बातें हुई थीं, उन्हें मुझसे सुनो ॥ ७ ॥
अगृह्णाच्च्यवनः सोममश्विनोर्देवयोस्तदा ।
तमिन्द्रो वारयामास गृह्णानं स तयोर्ग्रहम् ॥ ८ ॥
महर्षि च्यवनने उस समय दोनों अश्विनीकुमारों को देनेके लिये सोमरसका भाग हाथमें लिया । उन दोनोंके लिये सोमका भाग ग्रहण करते समय इन्द्रने मुनिको मना किया ॥ ८ ॥
इन्द्र उवाच
उभावेतौ न सोमार्हो नासत्याविति मे मतिः ।
भिषजौ दिवि देवानां कर्मणा तेन नार्हतः ॥ ९ ॥
इन्द्र बोले- मुने! मेरा यह सिद्धान्त है कि ये दोनों अश्विनीकुमार यज्ञमें सोमपानके अधिकारी नहीं हैं; क्योंकि ये द्युलोकनिवासी देवताओंके वैद्य हैं और उस वैद्यवृत्तिके कारण ही इन्हें यज्ञमें सोमपानका अधिकार नहीं रह गया है ॥ ९ ॥
च्यवन उवाच
महोत्साहौ महात्मानौ रूपद्रविणवत्तरौ ।
यौ चक्रतुर्मां मघवन् वृन्दारकमिवाजरम् ॥ १० ॥
ऋते त्वां विबुधांश्चान्यान् कथं वै नार्हतः सवम् ।
अश्विनावपि देवेन्द्र देवौ विद्धि पुरंदर ॥ ११ ॥
च्यवनने कहा — मघवन्! ये दोनों अश्विनीकुमार बड़े उत्साही और महान् बुद्धिमान् हैं । रूप-- सम्पत्तिमें भी सबसे बढ़ - चढ़कर हैं । इन्होंने ही मुझे देवताओंके समान दिव्य रूपसे युक्त और अजर बनाया है । देवराज! फिर तुम्हारे या अन्य देवताओंके सिवा इन्हें यज्ञमें सोमरसका भाग पानेका अधिकार क्यों नहीं है? पुरंदर! इन अश्विनीकुमारोंको भी देवता ही समझो ॥ १०-११ ॥ इन्द्र उवाच
चिकित्सकौ कर्मकरौ कामरूपसमन्वितौ ।
लोके चरन्तौ मर्त्यानां कथं सोममिहार्हतः ॥ १२ ॥
इन्द्र बोले — ये दोनों चिकित्सा- कार्य करते हैं और मनमाना रूप धारण करके मृत्युलोकमें भी विचरते रहते हैं, फिर इन्हें इस यज्ञमें सोमपानका अधिकार कैसे प्राप्त हो सकता है? ॥ १२ ॥
लोमशउवाच
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एतदेव यदा वाक्यमाम्रेडयति देवराट् ।
अनादृत्य ततः शक्रं ग्रहं जग्राह भार्गवः ॥ १३ ॥
लोमशजी कहते हैं — युधिष्ठिर! जब देवराज इन्द्र बार- बार यही बात दुहराने लगे तब भृगुनन्दन च्यवनने उनकी अवहेलना करके अश्विनीकुमारोंको देनेके लिये सोमरसका भाग ग्रहण किया ॥ १३ ॥
ग्रहीष्यन्तं तु तं सोममश्विनोरुत्तमं तदा ।
समीक्ष्य बलभिद् देव इदं वचनमब्रवीत् ॥ १४ ॥
उस समय देववैद्योंके लिये उत्तम सोमरस ग्रहण करते देख इन्द्रने च्यवन मुनिसे इस प्रकार कहा— ||
आभ्यामर्थाय सोमं त्वं ग्रहीष्यसि यदि स्वयम् ।
वज्रं ते प्रहरिष्यामि घोररूपमनुत्तमम् ॥ १५ ॥
ब्रह्मन्! यदि तुम इन दोनोंके लिये स्वयं सोमरस ग्रहण करोगे तो मैं तुमपर अपना परम उत्तम भयंकर वज्र छोड़ दूँगा ॥ १५ ॥
एवमुक्तः स्मयन्निन्द्रमभिवीक्ष्य स भार्गवः ।
जग्राह विधिवत् सोममश्विभ्यामुत्तमं ग्रहम् ॥ १६ ॥
उनके ऐसा कहनेपर च्यवन मुनिने मुसकराते हुए इन्द्रकी ओर देखकर अश्विनीकुमारोंके लिये विधिपूर्वक उत्तम सोमरस हाथमें लिया ॥ १६ ॥
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ततोऽस्मै प्राहरद् वज्रं घोररूपं शचीपतिः ।
तस्य प्रहरतो बाहुं स्तम्भयामास भार्गवः ॥ १७ ॥
तब शचीपति इन्द्र उनके ऊपर भयंकर वज्र छोड़ने लगे, परंतु वे जैसे ही प्रहार करने लगे, भृगुनन्दन च्यवनने उनकी भुजाको स्तंभित कर दिया ॥ १७ ॥
तं स्तम्भयित्वा च्यवनो जुहुवे मन्त्रतोऽनलम् ।
कृत्यार्थी सुमहातेजा देवं हिंसितुमुद्यतः ॥ १८ ॥
इस प्रकार उनकी भुजा स्तंभित करके महातेजस्वी च्यवन ऋषिने मन्त्रोच्चारणपूर्वक अग्निमें आहुति दी । वे देवराज इन्द्रको मार डालनेके लिये उद्यत होकर कृत्या उत्पन्न करना चाहते थे ॥ १८ ॥
ततः कृत्याथ संजज्ञे मुनेस्तस्य तपोबलात् ।
मदो नाम महावीर्यो बृहत्कायो महासुरः ॥ १ ९ ॥
शरीरं यस्य निर्देष्टुमशक्यं तु सुरासुरैः ।
तस्यास्यमभवद् घोरं तीक्ष्णाग्रदशनं महत् ॥ २० ॥
हनुरेका स्थिता त्वस्य भूमावेका दिवं गता ।
चतस्रश्चायता दंष्ट्रा योजनानां शतं शतम् ॥ २१ ॥
च्यवन ऋषिके तपोबलसे वहाँ कृत्या प्रकट हो गयी । उस कृत्याके रूपमें महापराक्रमी विशालकाय महादैत्य मदका प्रादुर्भाव हुआ । जिसके शरीरका वर्णन देवता तथा असुर भी नहीं कर सकते । उस असुरका विशाल मुख बड़ा भयंकर था । उसके आगेके दाँत बड़े तीखे दिखायी देते थे । उसका ठोड़ीसहित नीचेका ओष्ठ धरतीपर टिका हुआ था और दूसरा स्वर्गलोकतक पहुँच गया था । उसकी चार दाढ़ें सौ- सौ योजनतक फैली हुई थीं ॥ १ ९– २१ ॥
इतरे तस्य दशना बभूवुर्दशयोजनाः ।
प्रासादशिखराकाराः शूलाग्रसमदर्शनाः ॥ २२ ॥
उस दैत्यके दूसरे दाँत भी दस- दस योजन लम्बे थे । उनकी आकृति महलोंके कँगूरोंके समान थी । उनका अग्रभाग शूलके समान तीखा दिखलायी देता था ॥ २२ ॥
बाहू पर्वतसंकाशावायतावयुतं समौ ।
नेत्रे रविशशिप्रख्ये वक्त्रं कालाग्निसंनिभम् ॥ २३ ॥
लेलिहञ्जिह्वया वक्त्रं विद्युच्चपललोलया ।
व्यात्ताननो घोरदृष्टिर्ग्रसन्निव जगद् बलात् ॥ २४ ॥
स भक्षयिष्यन् संक्रुद्धः शतक्रतुमुपाद्रवत् ।
महता घोररूपेण लोकाञ्छब्देन नादयन् ॥ २५ ॥
दोनों भुजाएँ दो पर्वतोंके समान प्रतीत होती थीं। दोनोंकी लंबाई एक समान दस - दस हजार योजनकी थी । उसके दोनों नेत्र चन्द्रमा और सूर्यके समान प्रज्वलित हो रहे थे ।
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उसका मुख प्रलयकालकी अग्निके समान जाज्वल्यमान जान पड़ता था । उसकी लपलपाती हुई चञ्चल जीभ विद्युत्के समान चमक रही थी और उसके द्वारा वह अपने जबड़ोंको चाट रहा था । उसका मुख खुला हुआ था और दृष्टि भयंकर थी; ऐसा जान पड़ता था, मानो वह सारे जगत्को बलपूर्वक निगल जायगा । वह दैत्य कुपित हो अपनी अत्यन्त भयंकर गर्जनासे सम्पूर्ण जगत्को गुँजाता हुआ इन्द्रको खा जानेके लिये उनकी ओर दौड़ा ॥ २३–२५ ॥ इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि तीर्थयात्रापर्वणि लोमशतीर्थयात्रायां सौकन्ये चतुर्विंशत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १२४ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत तीर्थयात्रापर्वमें लोमशतीर्थयात्राके प्रसंगमें सुकन्योपाख्यानविषयक एक सौ चौबीसवाँ अध्याय पूराहुआ ॥ १२४ ॥