श्रीगणेशाय नमः।

महाभारत — खण्ड २ — पृष्ठ 851–860

महाभारत — खण्ड २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 851–860

पृष्ठ 851

महाभारत — खण्ड २, पृष्ठ 851 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

त्रयोविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः अश्विनीकुमारोंकी कृपासे महर्षि च्यवनको सुन्दर रूप और युवावस्थाकी प्राप्ति लोमशउवाच

कस्यचित् त्वथ कालस्य त्रिदशावश्विनौ नृप ।

कृताभिषेकां विवृतां सुकन्यां तामपश्यताम् ॥ १ ॥

तां दृष्ट्वा दर्शनीयाङ्गीं देवराजसुतामिव ।

ऊचतुः समभिद्रुत्य नासत्यावश्विनाविदम् ॥ २ ॥

लोमशजी कहते हैं - युधिष्ठिर! तदनन्तर कुछ कालके बाद जब एक समय सुकन्या स्नान कर चुकी थी, उस समय उसके सब अंग ढके हुए नहीं थे । इसी अवस्थामें दोनों अश्विनीकुमार देवताओंने उसे देखा। साक्षात् देवराज इन्द्रकी पुत्रीके समान दर्शनीय अंगोंवाली उस राजकन्याको देखकर नासत्यसंज्ञक अश्विनीकुमारोंने उसके पास जा यह बात कही- ॥ १-२ ॥

कस्य त्वमसि वामोरु वनेऽस्मिन् किं करोषि च ।

इच्छाव भद्रे ज्ञातुं त्वां तत्त्वमाख्याहि शोभने ॥ ३ ॥

‘ वामोरु! तुम किसकी पुत्री और किसकी पत्नी हो? इस वनमें क्या करती हो? भद्रे! हम तुम्हारा परिचय प्राप्त करना चाहते हैं । शोभने! तुम सब बातें ठीक -ठीक बताओ ' ॥ ३ ॥

ततः सुकन्या सव्रीडा तावुवाच सुरोत्तमौ ।

शर्यातितनयां वित्तं भार्यां मां च्यवनस्य च ॥ ४ ॥

तब सुकन्याने लज्जित होकर उन दोनों श्रेष्ठ देवताओंसे कहा– ' देवेश्वरो! आपको विदित होना चाहिये कि मैं राजा शर्यातिकी पुत्री और महर्षि च्यवनकी पत्नी हूँ ॥ ४ ॥

( नाम्ना चाहं सुकन्यास्मि नृलोकेऽस्मिन् प्रतिष्ठिता । साहं सर्वात्मना नित्यं पतिं प्रति सुनिष्ठिता ॥ )

अथाश्विनी प्रहस्यैतामब्रूतां पुनरेव तु ।

कथं त्वमसि कल्याणि पित्रा दत्ता गताध्वने ॥ ५ ॥

भ्राजसेऽस्मिन् वने भीरु विद्युत्सौदामनी यथा ।

न देवेष्वपि तुल्यां हि त्वया पश्याव भाविनि ॥ ६ ॥

' मेरा नाम इस जगत्में सुकन्या प्रसिद्ध है । मैं सम्पूर्ण हृदयसे सदा अपने पतिदेवके प्रति निष्ठा रखती हूँ । ' यह सुनकर अश्विनीकुमारोंने पुनः हँसते हुए कहा — ‘ कल्याणि!

पृष्ठ 852

महाभारत — खण्ड २, पृष्ठ 852 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

तुम्हारे पिताने इस अत्यन्त बूढ़े पुरुषके साथ तुम्हारा विवाह कैसे कर दिया? भीरु! इस वनमें तुम विद्युत्की भाँति प्रकाशित हो रही हो । भामिनि! देवताओंके यहाँ भी तुम - जैसी सुन्दरीको हम नहीं देख पाते हैं ॥ ५-६ ॥

अनाभरणसम्पन्ना परमाम्बरवर्जिता ।

शोभयस्यधिकं भद्रे वनमप्यनलंकृता ॥ ७ ॥

‘ भद्रे! तुम्हारे अंगोंपर आभूषण नहीं है । तुम उत्तम वस्त्रोंसे भी वञ्चित हो और तुमने कोई शृंगार भी नहीं धारण किया है तो भी इस वनकी अधिकाधिक शोभा बढ़ा रही हो ॥ ७ ॥

सर्वाभरणसम्पन्ना परमाम्बरधारिणी ।

शोभसे त्वनवद्याङ्गि न त्वेवं मलपङ्किनी ॥ ८ ॥

‘निर्दोष अंगोंवाली सुन्दरी! यदि तुम समस्त भूषणोंसे भूषित हो जाओ और अच्छे-अच्छे वस्त्र पहन लो तो उस समय तुम्हारी जो शोभा होगी, वैसी इस मल और पंकसे युक्त मलिन वेशमें नहीं हो रही है ॥ ८ ॥

कस्मादेवंविधा भूत्वा जराजर्जरितं पतिम् ।

त्वमुपास्से ह कल्याणि कामभोगबहिष्कृतम् ॥ ९ ॥

' कल्याणि! तुम ऐसी अनुपम सुन्दरी होकर कामभोगसे शून्य इस जरा-जर्जर बूढ़े पतिकी उपासना कैसे करती हो? ॥ ९ ॥

असमर्थं परित्राणे पोषणे तु शुचिस्मिते ।

सा त्वं च्यवनमुत्सृज्य वरयस्वैकमावयोः ॥ १० ॥

‘ पवित्र मुसकानवाली देवि! वह बूढ़ा तो तुम्हारी रक्षा और पालन- पोषणमें भी समर्थ नहीं है । अतः तुम च्यवनको छोड़कर हम दोनोंमेंसे किसी एकको अपना पति चुन लो ॥ १० ॥

पत्यर्थं देवगर्भाभे मा वृथा यौवनं कृथाः ।

एवमुक्ता सुकन्यापि सुरौ ताविदमब्रवीत् ॥ ११ ॥

‘ देवकन्याके समान सुन्दरी राजकुमारी! बूढ़े पतिके लिये अपनी इस जवानीको व्यर्थ न गँवाओ । ' उनके ऐसा कहनेपर सुकन्याने उन दोनों देवताओंसे कहा- ॥ ११ ॥

रताहं च्यवने पत्यौ मैवं मां पर्यशङ्कतम् ।

तावब्रूतां पुनस्त्वेनामावां देवभिषग्वरौ ॥ १२ ॥

युवानं रूपसम्पन्नं करिष्यावः पतिं तव ।

ततस्तस्यावयोश्चैव वृणीष्वान्यतमं पतिम् ॥ १३ ॥

एतेन समयेनैनमामन्त्रय पतिं शुभे ।

पृष्ठ 853

महाभारत — खण्ड २, पृष्ठ 853 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

‘ देवेश्वरो! मैं अपने पतिदेव च्यवनमुनिमें ही पूर्ण अनुराग रखती हूँ, अतः आप मेरे विषयमें इस प्रकारकी अनुचित आशंका न करें। ' तब उन दोनोंने पुनः सुकन्यासे कहा -' शुभे! हम देवताओंके श्रेष्ठ वैद्य हैं । तुम्हारे पतिको तरुण और मनोहर रूपसे सम्पन्न बना देंगे । तब तुम हम तीनोंमेंसे किसी एकको अपना पति बना लेना । इस शर्तके साथ तुम चाहो तो अपने पतिको यहाँ बुला लो ' ॥ १२-१३ ३ ॥ सा तयोर्वचनाद् राजन्नुपसंगम्य भार्गवम् ॥ १४ ॥

उवाच वाक्यं यत् ताभ्यामुक्तं भृगुसुतं प्रति ।

तच्छ्रुत्वा च्यवनो भार्यामुवाच क्रियतामिति ॥ १५ ॥

राजन्! उन दोनोंकी यह बात सुनकर सुकन्या च्यवन मुनिके पास गयी और अश्विनीकुमारोंने जो कुछ कहा था, वह सब उन्हें कह सुनाया । यह सुनकर च्यवनने अपनी पत्नीसे कहा— ‘ प्रिये! देववैद्योंने जैसा कहा है, वैसा करो ' ॥ १४-१५ ॥ ( सा भर्त्रा समनुज्ञाता क्रियतामिति चाब्रवीत् । श्रुत्वा तदश्विनौ वाक्यं तस्यास्तत् क्रियतामिति ॥ )

ऊचतू राजपुत्रीं तां पतिस्तव विशत्वपः ।

ततोऽम्भश्च्यवनः शीघ्रं रूपार्थी प्रविवेश ह ॥ १६ ॥

पतिकी यह आज्ञा पाकर सुकन्याने अश्विनीकुमारोंसे कहा - ' आप मेरे पतिको रूप और यौवनसे सम्पन्न बना दें । ' उसका यह कथन सुनकर अश्विनीकुमारोंने राजकुमारी सुकन्यासे कहा — ‘ तुम्हारे पतिदेव इस जलमें प्रवेश करें । ' तब च्यवन मुनिने सुन्दर रूपकी अभिलाषा लेकर शीघ्रतापूर्वक उस सरोवरके जलमें प्रवेश किया ॥ १६ ॥

अश्विनावपि तद् राजन् सरः प्राविशतां तदा ।

ततो मुहूर्तादुत्तीर्णाः सर्वे ते सरसस्तदा ॥ १७ ॥

दिव्यरूपधराः सर्वे युवानो मृष्टकुण्डलाः ।

तुल्यवेषधराश्चैव मनसः प्रीतिवर्धनाः ॥ १८ ॥

राजन्! उनके साथ ही दोनों अश्विनीकुमार भी उस सरोवरमें प्रवेश कर गये । तदनन्तर दो घड़ीके पश्चात् वे सब- के - सब दिव्य रूप धारण करके सरोवरसे बाहर निकले । उन सबकी युवावस्था थी । उन्होंने कानोंमें चमकीले कुण्डल धारण कर रखे थे । वेष - भूषा भी उनकी एक- सी ही थी और वे सभी मनकी प्रीति बढ़ानेवाले थे ॥ १७-१८ ॥

तेऽब्रुवन् सहिताः सर्वे वृणीष्वान्यतमं शुभे ।

अस्माकमीप्सितं भद्रे पतित्वे वरवर्णिनि ॥ १ ९ ॥

सरोवरसे बाहर आकर उन सबने एक साथ कहा - ' शुभे! भद्रे! वरवर्णिनि! हममेंसे किसी एकको जो तुम्हारी रुचिके अनुकूल हो, अपना पति बना लो ॥ १ ९ ॥

यत्र वाप्यभिकामासि तं वृणीष्व सुशोभने ।

सा समीक्ष्य तु तान् सर्वांस्तुल्यरूपधरान् स्थितान् ॥ २० ॥

पृष्ठ 854

महाभारत — खण्ड २, पृष्ठ 854 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

निश्चित्य मनसा बुद्धया देवी वव्रे स्वकं पतिम् ।

लब्ध्वा तु च्यवनो भार्यां वयो रूपं च वाञ्छितम् ॥ २१ ॥

हृष्टोऽब्रवीन्महातेजास्तौ नासत्याविदं वचः ।

यथाहं रूपसम्पन्नो वयसा च समन्वितः ॥ २२ ॥

कृतो भवद्भयां वृद्धः सन् भार्यां च प्राप्तवानिमाम् ।

तस्माद् युवां करिष्यामि प्रीत्याहं सोमपीथिनौ ।

मिषतो देवराजस्य सत्यमेतद् ब्रवीमि वाम् ॥ २३ ॥

‘ अथवा शोभने! जिसको भी तुम मनसे चाहती होओ, उसीको पति बनाओ । ' देवी सुकन्याने उन सबको एक जैसा रूप धारण किये खड़े देख मन और बुद्धिसे निश्चय करके अपने पतिको ही स्वीकार किया । महातेजस्वी च्यवन मुनिने अनुकूल पत्नी, तरुण अवस्था और मनोवाञ्छित रूप पाकर बड़े हर्षका अनुभव किया और दोनों अश्विनीकुमारोंसे कहा -' आप दोनोंने मुझ बूढ़ेको रूपवान् और तरुण बना दिया, साथ ही मुझे अपनी यह भार्या भी मिल गयी; इसलिये मैं प्रसन्न होकर आप दोनोंको यज्ञमें देवराज इन्द्रके सामने ही

सोमपानका अधिकारी बना दूँगा। यह मैं आपलोगोंसे सत्य कहता हूँ ' ॥ २०—२३ ॥

तच्छ्रुत्वा हृष्टमनसौ दिवं तौ प्रतिजग्मतुः ।

पृष्ठ 855

महाभारत — खण्ड २, पृष्ठ 855 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

च्यवनश्च सुकन्या च सुराविव विजहतुः ॥ २४ ॥

यह सुनकर दोनों अश्विनीकुमार प्रसन्नचित्त हो देवलोकको लौट गये और च्यवन तथा सुकन्या देवदम्पतिकी भाँति विहार करने लगे ॥ २४ ॥

इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि तीर्थयात्रापर्वणि लोमशतीर्थयात्रायां सौकन्ये त्रयोविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १२३ ॥

इस प्रकारश्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत तीर्थयात्रापर्वमें लोमशतीर्थयात्राप्रसंगमें सुकन्योपाख्यानविषयक एक सौ तेईसवाँ अध्याय पूराहुआ ॥ १२३ ॥

( दाक्षिणात्य अधिक पाठके २ श्लोक मिलाकर कुल २६ श्लोक हैं )

पृष्ठ 856

महाभारत — खण्ड २, पृष्ठ 856 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

चतुर्विंशत्यधिकशततमोऽध्यायः शर्यातिके यज्ञमें च्यवनका इन्द्रपर कोप करके वज्रको स्तम्भित करना और उसे मारनेके लिये मदासुरको उत्पन्न करना लोमशउवाच

ततः शुश्राव शर्यातिर्वयस्थं च्यवनं कृतम् ।

सुहृष्टः सेनया सार्धमुपायाद् भार्गवाश्रमम् ॥ १ ॥

लोमशजी कहते हैं -युधिष्ठिर! तदनन्तर राजा शर्यातिने सुना कि महर्षि च्यवन युवावस्थाको प्राप्त हो गये; इस समाचारसे उन्हें बड़ी प्रसन्नता हुई । वे सेनाके साथ महर्षि च्यवनके आश्रमपर आये ॥ १ ॥

च्यवनं च सुकन्यां च दृष्ट्वा देवसुताविव ।

रेमे सभार्यः शर्यातिः कृत्स्नां प्राप्य महीमिव ॥ २ ॥

ऋषिणा सत्कृतस्तेन सभार्यः पृथिवीपतिः ।

उपोपविष्टः कल्याणीः कथाश्चक्रे मनोरमाः ॥ ३ ॥

च्यवन और सुकन्याको देवकुमारोंके समान सुखी देखकर पत्नीसहित शर्यातिको महान् हर्ष हुआ, मानो उन्हें सम्पूर्ण पृथ्वीका राज्य मिल गया हो । च्यवन ऋषिने रानियोंसहित राजाका बड़ा आदर-सत्कार किया और उनके पास बैठकर मनको प्रिय लगनेवाली कल्याणमयी कथाएँ सुनायीं ॥ २-३ ॥

अथैनं भार्गवो राजन्नुवाच परिसान्त्वयन् ।

याजयिष्यामि राजंस्त्वां सम्भारानवकल्पय ॥ ४ ॥

युधिष्ठिर! तत्पश्चात् भृगुनन्दन च्यवनने उन्हें सान्त्वना देते हुए कहा — ‘ राजन्! मैं

आपसे यज्ञ कराऊँगा । आप सामग्री जुटाइये ' ॥ ४ ॥

ततः परमसंहृष्टः शर्यातिरवनीपतिः ।

च्यवनस्य महाराज तद् वाक्यं प्रत्यपूजयत् ॥ ५ ॥

महाराज! यह सुनकर राजा शर्याति बड़े प्रसन्न हुए और उन्होंने च्यवन मुनिके उस वचनकी बड़ी सराहना की ॥ ५ ॥

प्रशस्तेऽहनि यज्ञीये सर्वकामसमृद्धिमत् ।

कारयामास शर्यातिर्यज्ञायतनमुत्तमम् ॥ ६ ॥

तदनन्तर यज्ञके लिये उपयोगी शुभ दिन आनेपर शर्यातिने एक उत्तम यज्ञमण्डप तैयार करवाया, जो सम्पूर्ण मनोवाञ्छित समृद्धियोंसे सम्पन्न था ॥ ६ ॥

पृष्ठ 857

महाभारत — खण्ड २, पृष्ठ 857 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

तत्रैनं च्यवनो राजन् याजयामास भार्गवः ।

अद्भुतानि च तत्रासन् यानि तानि निबोध मे ॥ ७ ॥

राजन्! भृगुपुत्र च्यवनने उस यज्ञमण्डपमें राजासे यज्ञ करवाया । उस यज्ञमें जो अद्भुत बातें हुई थीं, उन्हें मुझसे सुनो ॥ ७ ॥

अगृह्णाच्च्यवनः सोममश्विनोर्देवयोस्तदा ।

तमिन्द्रो वारयामास गृह्णानं स तयोर्ग्रहम् ॥ ८ ॥

महर्षि च्यवनने उस समय दोनों अश्विनीकुमारों को देनेके लिये सोमरसका भाग हाथमें लिया । उन दोनोंके लिये सोमका भाग ग्रहण करते समय इन्द्रने मुनिको मना किया ॥ ८ ॥

इन्द्र उवाच

उभावेतौ न सोमार्हो नासत्याविति मे मतिः ।

भिषजौ दिवि देवानां कर्मणा तेन नार्हतः ॥ ९ ॥

इन्द्र बोले- मुने! मेरा यह सिद्धान्त है कि ये दोनों अश्विनीकुमार यज्ञमें सोमपानके अधिकारी नहीं हैं; क्योंकि ये द्युलोकनिवासी देवताओंके वैद्य हैं और उस वैद्यवृत्तिके कारण ही इन्हें यज्ञमें सोमपानका अधिकार नहीं रह गया है ॥ ९ ॥

च्यवन उवाच

महोत्साहौ महात्मानौ रूपद्रविणवत्तरौ ।

यौ चक्रतुर्मां मघवन् वृन्दारकमिवाजरम् ॥ १० ॥

ऋते त्वां विबुधांश्चान्यान् कथं वै नार्हतः सवम् ।

अश्विनावपि देवेन्द्र देवौ विद्धि पुरंदर ॥ ११ ॥

च्यवनने कहा — मघवन्! ये दोनों अश्विनीकुमार बड़े उत्साही और महान् बुद्धिमान् हैं । रूप-- सम्पत्तिमें भी सबसे बढ़ - चढ़कर हैं । इन्होंने ही मुझे देवताओंके समान दिव्य रूपसे युक्त और अजर बनाया है । देवराज! फिर तुम्हारे या अन्य देवताओंके सिवा इन्हें यज्ञमें सोमरसका भाग पानेका अधिकार क्यों नहीं है? पुरंदर! इन अश्विनीकुमारोंको भी देवता ही समझो ॥ १०-११ ॥ इन्द्र उवाच

चिकित्सकौ कर्मकरौ कामरूपसमन्वितौ ।

लोके चरन्तौ मर्त्यानां कथं सोममिहार्हतः ॥ १२ ॥

इन्द्र बोले — ये दोनों चिकित्सा- कार्य करते हैं और मनमाना रूप धारण करके मृत्युलोकमें भी विचरते रहते हैं, फिर इन्हें इस यज्ञमें सोमपानका अधिकार कैसे प्राप्त हो सकता है? ॥ १२ ॥

लोमशउवाच

पृष्ठ 858

महाभारत — खण्ड २, पृष्ठ 858 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

एतदेव यदा वाक्यमाम्रेडयति देवराट् ।

अनादृत्य ततः शक्रं ग्रहं जग्राह भार्गवः ॥ १३ ॥

लोमशजी कहते हैं — युधिष्ठिर! जब देवराज इन्द्र बार- बार यही बात दुहराने लगे तब भृगुनन्दन च्यवनने उनकी अवहेलना करके अश्विनीकुमारोंको देनेके लिये सोमरसका भाग ग्रहण किया ॥ १३ ॥

ग्रहीष्यन्तं तु तं सोममश्विनोरुत्तमं तदा ।

समीक्ष्य बलभिद् देव इदं वचनमब्रवीत् ॥ १४ ॥

उस समय देववैद्योंके लिये उत्तम सोमरस ग्रहण करते देख इन्द्रने च्यवन मुनिसे इस प्रकार कहा— ||

आभ्यामर्थाय सोमं त्वं ग्रहीष्यसि यदि स्वयम् ।

वज्रं ते प्रहरिष्यामि घोररूपमनुत्तमम् ॥ १५ ॥

ब्रह्मन्! यदि तुम इन दोनोंके लिये स्वयं सोमरस ग्रहण करोगे तो मैं तुमपर अपना परम उत्तम भयंकर वज्र छोड़ दूँगा ॥ १५ ॥

एवमुक्तः स्मयन्निन्द्रमभिवीक्ष्य स भार्गवः ।

जग्राह विधिवत् सोममश्विभ्यामुत्तमं ग्रहम् ॥ १६ ॥

उनके ऐसा कहनेपर च्यवन मुनिने मुसकराते हुए इन्द्रकी ओर देखकर अश्विनीकुमारोंके लिये विधिपूर्वक उत्तम सोमरस हाथमें लिया ॥ १६ ॥

पृष्ठ 859

महाभारत — खण्ड २, पृष्ठ 859 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

ततोऽस्मै प्राहरद् वज्रं घोररूपं शचीपतिः ।

तस्य प्रहरतो बाहुं स्तम्भयामास भार्गवः ॥ १७ ॥

तब शचीपति इन्द्र उनके ऊपर भयंकर वज्र छोड़ने लगे, परंतु वे जैसे ही प्रहार करने लगे, भृगुनन्दन च्यवनने उनकी भुजाको स्तंभित कर दिया ॥ १७ ॥

तं स्तम्भयित्वा च्यवनो जुहुवे मन्त्रतोऽनलम् ।

कृत्यार्थी सुमहातेजा देवं हिंसितुमुद्यतः ॥ १८ ॥

इस प्रकार उनकी भुजा स्तंभित करके महातेजस्वी च्यवन ऋषिने मन्त्रोच्चारणपूर्वक अग्निमें आहुति दी । वे देवराज इन्द्रको मार डालनेके लिये उद्यत होकर कृत्या उत्पन्न करना चाहते थे ॥ १८ ॥

ततः कृत्याथ संजज्ञे मुनेस्तस्य तपोबलात् ।

मदो नाम महावीर्यो बृहत्कायो महासुरः ॥ १ ९ ॥

शरीरं यस्य निर्देष्टुमशक्यं तु सुरासुरैः ।

तस्यास्यमभवद् घोरं तीक्ष्णाग्रदशनं महत् ॥ २० ॥

हनुरेका स्थिता त्वस्य भूमावेका दिवं गता ।

चतस्रश्चायता दंष्ट्रा योजनानां शतं शतम् ॥ २१ ॥

च्यवन ऋषिके तपोबलसे वहाँ कृत्या प्रकट हो गयी । उस कृत्याके रूपमें महापराक्रमी विशालकाय महादैत्य मदका प्रादुर्भाव हुआ । जिसके शरीरका वर्णन देवता तथा असुर भी नहीं कर सकते । उस असुरका विशाल मुख बड़ा भयंकर था । उसके आगेके दाँत बड़े तीखे दिखायी देते थे । उसका ठोड़ीसहित नीचेका ओष्ठ धरतीपर टिका हुआ था और दूसरा स्वर्गलोकतक पहुँच गया था । उसकी चार दाढ़ें सौ- सौ योजनतक फैली हुई थीं ॥ १ ९– २१ ॥

इतरे तस्य दशना बभूवुर्दशयोजनाः ।

प्रासादशिखराकाराः शूलाग्रसमदर्शनाः ॥ २२ ॥

उस दैत्यके दूसरे दाँत भी दस- दस योजन लम्बे थे । उनकी आकृति महलोंके कँगूरोंके समान थी । उनका अग्रभाग शूलके समान तीखा दिखलायी देता था ॥ २२ ॥

बाहू पर्वतसंकाशावायतावयुतं समौ ।

नेत्रे रविशशिप्रख्ये वक्त्रं कालाग्निसंनिभम् ॥ २३ ॥

लेलिहञ्जिह्वया वक्त्रं विद्युच्चपललोलया ।

व्यात्ताननो घोरदृष्टिर्ग्रसन्निव जगद् बलात् ॥ २४ ॥

स भक्षयिष्यन् संक्रुद्धः शतक्रतुमुपाद्रवत् ।

महता घोररूपेण लोकाञ्छब्देन नादयन् ॥ २५ ॥

दोनों भुजाएँ दो पर्वतोंके समान प्रतीत होती थीं। दोनोंकी लंबाई एक समान दस - दस हजार योजनकी थी । उसके दोनों नेत्र चन्द्रमा और सूर्यके समान प्रज्वलित हो रहे थे ।

पृष्ठ 860

महाभारत — खण्ड २, पृष्ठ 860 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

उसका मुख प्रलयकालकी अग्निके समान जाज्वल्यमान जान पड़ता था । उसकी लपलपाती हुई चञ्चल जीभ विद्युत्के समान चमक रही थी और उसके द्वारा वह अपने जबड़ोंको चाट रहा था । उसका मुख खुला हुआ था और दृष्टि भयंकर थी; ऐसा जान पड़ता था, मानो वह सारे जगत्को बलपूर्वक निगल जायगा । वह दैत्य कुपित हो अपनी अत्यन्त भयंकर गर्जनासे सम्पूर्ण जगत्‌को गुँजाता हुआ इन्द्रको खा जानेके लिये उनकी ओर दौड़ा ॥ २३–२५ ॥ इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि तीर्थयात्रापर्वणि लोमशतीर्थयात्रायां सौकन्ये चतुर्विंशत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १२४ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत तीर्थयात्रापर्वमें लोमशतीर्थयात्राके प्रसंगमें सुकन्योपाख्यानविषयक एक सौ चौबीसवाँ अध्याय पूराहुआ ॥ १२४ ॥