श्रीगणेशाय नमः।

महाभारत — खण्ड २ — पृष्ठ 841–850

महाभारत — खण्ड २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 841–850

पृष्ठ 841

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श्रीकृष्णको विदा करके धर्मराज युधिष्ठिर लोमशजी, भाइयों और सेवकोंके साथ विदर्भनरेशद्वारा पूजित, उत्तम तीर्थोंवाली पुण्य नदी पयोष्णीके तटपर गये ॥ ३१ ॥

सुतेन सोमेन विमिश्रतोयां पयः पयोष्णीं प्रति सोऽध्युवास । द्विजातिमुख्यैर्मुदितैर्महात्मा संस्तूयमानः स्तुतिभिर्वराभिः ॥ ३२ ॥

उसके जलमें यज्ञसम्बन्धी सोमरस मिला हुआ था । पयोष्णीके तटपर जा उन्होंने उसका जल पीकर वहाँ निवास किया । उस समय प्रसन्नतासे भरे हुए श्रेष्ठ द्विज उत्तम स्तुतियोंद्वारा उन महात्मा नरेशकी स्तुति कर रहे थे ॥ ३२ ॥

इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि तीर्थयात्रापर्वणि लोमशतीर्थयात्रायां यादवगमने विंशत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १२० ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत तीर्थयात्रापर्वमें लोमशतीर्थयात्राप्रसंगमें यादवगमनविषयक एक सौ बीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १२० ॥

पृष्ठ 842

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एकविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः राजा गयके यज्ञकी प्रशंसा, पयोष्णी, वैदूर्य पर्वत और नर्मदाके माहात्म्य तथा च्यवन- सुकन्याके चरित्रका आरम्भ लोमशउवाच

नृगेण यजमानेन सोमेनेह पुरंदरः ।

तर्पितः श्रूयते राजन् स तृप्तो मुदमभ्यगात् ॥ १ ॥

लोमशजी कहते हैं - युधिष्ठिर! सुना जाता है कि इस पयोष्णी नदीके तटपर राजा नृगने यज्ञ करके सोमरसके द्वारा देवराज इन्द्रको तृप्त किया था । उस समय इन्द्र पूर्णतः तृप्त होकर आनन्दमग्न हो गये थे ॥ १ ॥

इह देवैः सहेन्द्रैश्च प्रजापतिभिरेव च ।

इष्टं बहुविधैर्यज्ञैर्महद्भिर्भूरिदक्षिणैः ॥ २ ॥

यहीं इन्द्रसहित देवताओंने और प्रजापतियोंने भी प्रचुर दक्षिणासे युक्त अनेक प्रकारके बड़े - बड़े यज्ञोंद्वारा भगवान्‌का यजन किया है ॥ २ ॥

आमूर्तरयसश्चेह राजा वज्रधरं प्रभुम् ।

तर्पयामास सोमेन हयमेधेषु सप्तसु ॥ ३ ॥

अमूर्तरयाके पुत्र राजा गयने भी यहाँ सात अश्वमेधयज्ञोंका अनुष्ठान करके उनमें सोमरसके द्वारा वज्रधारी इन्द्रको संतुष्ट किया था ॥ ३ ॥

तस्य सप्तसु यज्ञेषु सर्वमासीद्धिरण्मयम् ।

वानस्पत्यं च भौमं च यद् द्रव्यं नियतं मखे ॥ ४ ॥

यज्ञमें जो वस्तुएँ नियमितरूपसे काष्ठ और मिट्टीकी बनी हुई होती हैं, ये सब - की सब राजा गयके उक्त सातों यज्ञोंमें सुवर्णसे बनायी गयी थीं ॥ ४ ॥

चषालयूपचमसाः स्थाल्यः पात्र्यः स्रुचः स्रुवाः ।

तेष्वेव चास्य यज्ञेषु प्रयोगाः सप्त विश्रुताः ॥ ५ ॥

प्रायः यज्ञोंमें चषाल, यूप, चमस, स्थाली, 'पात्री, 'स्रुक् और स्रुवा – ये सात साधन उपयोगमें लाये जाते हैं । राजा गयके पूर्वोक्त सातों यज्ञोंमें ये सभी उपकरण सुवर्णके ही थे, ऐसा सुना जाता है ॥ ५ ॥

सप्तैकैकस्य यूपस्य चषालाश्चोपरि स्थिताः ।

तस्य स्म यूपान् यज्ञेषु भ्राजमानान् हिरण्मयान् ॥ ६ ॥

स्वयमुत्थापयामासुर्देवाः सेन्द्रा युधिष्ठिर ।

तेषु तस्य मखाग्रयेषु गयस्य पृथिवीपतेः ॥ ७ ॥

पृष्ठ 843

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अमाद्यदिन्द्रः सोमेन दक्षिणाभिर्द्विजातयः ।

प्रसंख्यानानसंख्येयान् प्रत्यगृह्णन् द्विजातयः ॥ ८ ॥

सात यूपोंमेंसे प्रत्येकके ऊपर सात- सात चषाल थे । युधिष्ठिर! उन यज्ञोंमें जो चमकते हुए सुवर्णमय यूप थे, उन्हें इन्द्र आदि देवताओंने स्वयं खड़ा किया था । राजा गयके उन उत्तम यज्ञोंमें इन्द्र सोमपान करके और ब्राह्मण बहुत -सी दक्षिणा पाकर हर्षोन्मत्त हो गये थे । ब्राह्मणोंने दक्षिणामें जो बहुसंख्यक धनराशि प्राप्त की थी, उसकी गणना नहीं की जा सकती थी ॥ ६–८ ॥

सिकता वा यथा लोके यथा वा दिवि तारकाः ।

यथा वा वर्षतो धारा असंख्येयाः स्म केनचित् ॥ ९ ॥

तथैव तदसंख्येयं धनं यत् प्रददौ गयः ।

सदस्येभ्यो महाराज तेषु यज्ञेषु सप्तसु ॥ १० ॥

महाराज! राजा गयने सातों यज्ञोंमें सदस्योंको, जो असंख्य धन प्रदान किया था, उसकी गणना उसी प्रकार नहीं हो सकती थी, जैसे इस जगत्में कोई बालूके कणों, आकाशके तारों और वर्षाकी धाराओंको नहीं गिन सकता ॥ ९ -१० ॥

भवेत् संख्येयमेतद्धि यदेतत् परिकीर्तितम् ।

न तस्य शक्याः संख्यातुं दक्षिणा दक्षिणावतः ॥ ११ ॥

उपर्युक्त बालूके कण आदि कदाचित् गिने भी जा सकते हैं, परंतु दक्षिणा देनेवाले राजा गयकी दक्षिणाकी गणना करना सम्भव नहीं है ॥ ११ ॥

हिरण्मयीभिर्गोभिश्च कृताभिर्विश्वकर्मणा ।

ब्राह्मणांस्तर्पयामास नानादिग्भ्यः समागतान् ॥ १२ ॥

अल्पावशेषा पृथिवी चैत्यैरासीन्महात्मनः ।

गयस्य यजमानस्य तत्र तत्र विशाम्पते ॥ १३ ॥

उन्होंने विश्वकर्माकी बनायी हुई सुवर्णमयी गौएँ देकर विभिन्न दिशाओंसे आये हुए ब्राह्मणोंको संतुष्ट किया था । युधिष्ठिर! भिन्न - भिन्न स्थानोंमें यज्ञ करनेवाले महामना राजा गयके राज्यकी थोड़ी ही भूमि ऐसी बच गयी थी जहाँ यज्ञके मण्डप न हों ॥ १२-१३ ॥

स लोकान् प्राप्तवानैन्द्रान् कर्मणा तेन भारत ।

सलोकतां तस्य गच्छेत् पयोष्ण्यां य उपस्पृशेत् ॥ १४ ॥

भारत! उस यज्ञकर्मके प्रभावसे गयने इन्द्रादि लोकोंको प्राप्त किया । जो इस पयोष्णी नदीमें स्नान करता है वह भी राजा गयके समान पुण्यलोकका भागी होता है ॥ १४ ॥

तस्मात् त्वमत्र राजेन्द्र भ्रातृभिः सहितोऽच्युत ।

उपस्पृश्य महीपाल धूतपाप्मा भविष्यसि ॥ १५ ॥

अतः राजेन्द्र! तुम भाइयोंसहित इसमें स्नान करके सब पापोंसे मुक्त हो जाओगे ॥ १५ ॥

पृष्ठ 844

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वैशम्पायन उवाच

स पयोष्ण्यां नरश्रेष्ठः स्नात्वा वै भ्रातृभिः सह ।

वैदूर्यपर्वतं चैव नर्मदां च महानदीम् ॥ १६ ॥

(उद्दिश्य पाण्डवश्रेष्ठः स प्रतस्थे महीपतिः । )

समागमत तेजस्वी भ्रातृभिः सहितोऽनघ ।

तत्रास्य सर्वाण्याचख्यौ लोमशो भगवानृषिः ॥ १७ ॥

तीर्थानि रमणीयानि पुण्यान्यायतनानि च ।

यथायोगं यथाप्रीति प्रययौ भ्रातृभिः सह ।

तत्र तत्राददाद् वित्तं ब्राह्मणेभ्यः सहस्रशः ॥ १८ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं - निष्पाप जनमेजय! पाण्डवप्रवर नरश्रेष्ठ राजा युधिष्ठिर भाइयोंसहित पयोष्णी नदीमें स्नान करके वैदूर्यपर्वत और महानदी नर्मदाके तटपर जानेका उद्देश्य लेकर वहाँसे चल दिये और वे तेजस्वी नरेश सब भाइयोंको साथ लिये यथासमय अपने गन्तव्य स्थानपर पहुँच गये । वहाँ भगवान् लोमश मुनिने उनसे समस्त रमणीय तीर्थों और पवित्र देवस्थानोंका परिचय कराया । तत्पश्चात् राजाने अपनी सुविधा और प्रसन्नताके अनुसार सहस्रों ब्राह्मणोंको धनका दान किया और भाइयोंसहित उन सब स्थानोंकी यात्रा की ॥ १६–१८ ॥ लोमशउवाच

देवानामेति कौन्तेय तथा राज्ञां सलोकताम् ।

वैदूर्यपर्वतं दृष्ट्वा नर्मदामवतीर्य च ॥ १ ९ ॥

लोमशजीने कहा – कुन्तीनन्दन! वैदूर्यपर्वतका दर्शन करके नर्मदामें उतरनेसे मनुष्य देवताओं तथा पुण्यात्मा राजाओंके समान पवित्र लोकोंको प्राप्त कर लेता है ॥ १ ९ ॥

संधिरेष नरश्रेष्ठ त्रेताया द्वापरस्य च ।

नमासाद्य कौन्तेय सर्वपापैः प्रमुच्यते ॥ २० ॥

नरश्रेष्ठ! यह वैदूर्यपर्वत त्रेता और द्वापरकी सन्धिमें प्रकट हुआ है, इसके निकट जाकर मनुष्य सब पापोंसे मुक्त हो जाता है ॥ २० । ।

एष शर्यातियज्ञस्य देशस्तात प्रकाशते ।

साक्षाद् यत्रापिबत् सोममश्विभ्यां सह कौशिकः ॥ २१ ॥

तात! यह राजा शर्यातिके यज्ञका स्थान प्रकाशित हो रहा है जहाँ साक्षात् इन्द्रने अश्विनीकुमारोंके साथ बैठकर सोमपान किया था ॥ २१ ॥

चुकोप भार्गवश्चापि महेन्द्रस्य महातपाः ।

संस्तम्भयामास च तं वासवं च्यवनः प्रभुः ।

सुकन्यां चापि भार्यां स राजपुत्रीमवाप्तवान् ॥ २२ ॥

पृष्ठ 845

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(नासत्यौ च महाभाग कृतवान् सोमपीथिनौ । ) महाभाग! यहीं महातपस्वी भृगुनन्दन भगवान् च्यवन देवराज इन्द्रपर कुपित हुए थे और यहीं उन्होंने इन्द्रको स्तम्भित भी कर दिया था। इतना ही नहीं, मुनिवर च्यवनने यहीं अश्विनीकुमारोंको यज्ञमें सोमपानका अधिकारी बनाया था । और इसी स्थानपर राजकुमारी सुकन्या उन्हें पत्नीरूपमें प्राप्त हुई थी ॥ २२ ॥

युधिष्ठिर उवाच

कथं विष्टम्भितस्तेन भगवान् पाकशासनः ।

किमर्थं भार्गवश्चापि कोपं चक्रे महातपाः ॥ २३ ॥

युधिष्ठिरने पूछा- मुने! महातपस्वी भृगुपुत्र महर्षि च्यवनने भगवान् इन्द्रका स्तम्भन कैसे किया? उन्हें इन्द्रपर क्रोध किसलिये हुआ? ॥ २३ ॥

नासत्यौ च कथं ब्रह्मन् कृतवान् सोमपीथिनौ ।

एतत् सर्वं यथावृत्तमाख्यातु भगवान् मम ॥ २४ ॥

तथा ब्रह्मन्! उन्होंने अश्विनीकुमारोंको यज्ञमें सोमपानका अधिकारी किस प्रकार बनाया? ये सब बातें आप यथार्थरूपसे मुझे बतावें ॥ २४ ॥

इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि तीर्थयात्रापर्वणि लोमशतीर्थयात्रायां सौकन्ये एकविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १२१ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत तीर्थयात्रापर्वमें लोमशतीर्थयात्राके प्रसंगमें सुकन्योपाख्यानविषयक एक सौ इक्कीसवाँ अध्याय पूराहुआ II १२१ ॥ (दाक्षिणात्य अधिक पाठका १ श्लोक मिलाकर कुल २५ श्लोक हैं ) 3. यूपके ऊपरका गोलाकार काष्ठ । २. यूप— यज्ञस्तम्भ । ३. चमस – सोमपानका पात्र । ४. बटलोई । ५. पकी- पकायी रखनेका सामग्री- पात्र । ६. हविष्य अर्पण करनेका उपकरण । ७. घृत आदिकी आहुति डालनेका साधन ।

पृष्ठ 846

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द्वाविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः महर्षि च्यवनको सुकन्याकी प्राप्ति लोमशउवाच

भृगोर्महर्षेः पुत्रोऽभूच्च्यवनो नाम भारत ।

समीपे सरसस्तस्य तपस्तेपे महाद्युतिः ॥ १ ॥

स्थाणुभूतो महातेजा वीरस्थानेन पाण्डव ।

अतिष्ठत चिरं कालमेकदेशे विशाम्पते ॥ २ ॥

लोमशजी कहते हैं - युधिष्ठिर! महर्षि भृगुके पुत्र च्यवन मुनि हुए, जो महान् तेजस्वी थे । उन्होंने उस सरोवरके समीप तपस्या आरम्भ की । पाण्डुनन्दन! परम तेजस्वी महात्मा च्यवन वीरासनसे बैठकर ठूंठे काठके समान जान पड़ते थे । राजन्! वे एक ही स्थानपर दीर्घकालतक अविचलभावसे बैठे रहे ॥ १-२ ॥

स वल्मीकोऽभवदृषिर्लताभिरिव संवृतः ।

कालेन महता राजन् समाकीर्णः पिपीलिकैः ॥ ३ ॥

धीरे - धीरे अधिक समय बीतनेपर उनका शरीर चींटियोंसे व्याप्त हो गया । वे महर्षि लताओंसे आच्छादित हो गये और बाँबीके समान प्रतीत होने लगे ॥ ३ ॥

तथा स संवृतो धीमान् मृत्पिण्ड इव सर्वशः ।

तप्यते स्म तपो घोरं वल्मीकेन समावृतः ॥ ४ ॥

इस प्रकार लता- वेलोंसे आच्छादित हो बुद्धिमान् च्यवन मुनि सब ओरसे केवल मिट्टीके लोंदेके समान जान पड़ने लगे । दीमकोंद्वारा जमा की हुई मिट्टीके ढेरसे ढके हुए वे बड़ी भारी तपस्या कर रहे थे ॥ ४ ॥

अथ दीर्घस्य कालस्य शर्यातिर्नाम पार्थिवः ।

आजगाम सरो रम्यं विहर्तुमिदमुत्तमम् ॥ ५ ॥

इस प्रकार दीर्घकाल व्यतीत होनेपर राजा शर्याति इस उत्तम एवं रमणीय सरोवरके तटपर विहारके लिये आये ॥ ५ ॥

तस्य स्त्रीणां सहस्राणि चत्वार्यासन् परिग्रहे ।

एकैव च सुता सुभ्रूः सुकन्या नाम भारत ॥ ६ ॥

युधिष्ठिर! उनके अन्तःपुरमें चार हजार स्त्रियाँ थीं, परंतु संतानके नामपर केवल एक ही सुन्दरी पुत्री थी, जिसका नाम सुकन्या था ॥ ६ ॥

सा सखीभिः परिवृता दिव्याभरणभूषिता ।

चंक्रम्यमाणा वल्मीकं भार्गवस्य समासदत् ॥ ७ ॥

पृष्ठ 847

महाभारत — खण्ड २, पृष्ठ 847 का मूल पृष्ठ
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वह कन्या दिव्य वस्त्राभूषणोंसे विभूषित हो सखियोंसे घिरी हुई वनमें इधर - उधर घूमने लगी । घूमती - घामती वह भृगुनन्दन च्यवनकी बाँबीके पास जा पहुँची ॥ ७ ॥

सा वै वसुमतीं तत्र पश्यन्ती सुमनोरमाम् ।

वनस्पतीन् विचिन्वन्ती विजहार सखीवृता ॥ ८ ॥

वहाँकी भूमि उसे बड़ी मनोहर दिखायी दी । वह सखियोंके साथ वृक्षोंके फल- फूल तोड़ती हुई चारों ओर घूमने लगी ॥ ८ ॥

रूपेण वयसा चैव मदनेन मदेन च ।

बभञ्ज वनवृक्षाणां शाखाः परमपुष्पिताः ॥ ९ ॥

तां सखीरहितामेकामेकवस्त्रामलंकृताम् ।

ददर्श भार्गवो धीमांश्चरन्तीमिव विद्युतम् ॥। १० ॥

सुन्दर रूप, नयी अवस्था, कामभावके उदय और यौवनके मदसे प्रेरित हो सुकन्याने उत्तम फूलोंसे भरी हुई वन वृक्षोंकी बहुत- सी शाखाएँ तोड़ लीं। वह सखियोंका साथ छोड़कर अकेली टहलने लगी । उस समय उसके शरीरपर एक ही वस्त्र था और वह भाँति-भाँतिके अलंकारोंसे अलंकृत थी । बुद्धिमान् च्यवन मुनिने उसे देखा । वह चमकती हुई विद्युत्के समान चारों ओर विचर रही थी ॥ ९ -१० ॥

तां पश्यमानो विजने स रेमे परमद्युतिः ।

क्षामकण्ठश्च विप्रर्षिस्तपोबलसमन्वितः ॥ ११ ॥

उसे एकान्तमें देखकर परम कान्तिमान्, तपोबल- सम्पन्न एवं दुर्बल कण्ठवाले ब्रह्मर्षि च्यवनको बड़ी प्रसन्नता हुई ॥ ११ ॥

तामाबभाषे कल्याणीं सा चास्य न शृणोति वै ।

ततः सुकन्या वल्मीके दृष्ट्वा भार्गवचक्षुषी ॥ १२ ॥

कौतूहलात् कण्टकेन बुद्धिमोहबलात्कृता किं नु खल्विदमित्युक्त्वा निर्बिभेदास्य लोचने ॥ १३ ॥

अक्रुध्यत् स तया विद्धे नेत्रे परममन्युमान् ।

ततः शर्यातिसैन्यस्य शकृन्मूत्रे समावृणोत् ॥ १४ ॥

ततो रुद्धे शकृन्मूत्रे सैन्यमानाहदुःखितम् ।

तथागतमभिप्रेक्ष्य पर्यपृच्छत् स पार्थिवः ॥ १५ ॥

तपोनित्यस्य वृद्धस्य रोषणस्य विशेषतः ।

केनापकृतमद्येह भार्गवस्य महात्मनः ॥ १६ ॥

ज्ञातं वा यदि वाज्ञातं तद् द्रुतं ब्रूत मा चिरम् ।

तमूचुः सैनिकाः सर्वे न विद्मोऽपकृतं वयम् ॥ १७ ॥

उन्होंने उस कल्याणमयी राजकन्याको पुकारा; परंतु वह (ब्रह्मर्षिका कण्ठ दुर्बल होनेके कारण) उनकी आवाज नहीं सुनती थी । उस बाँबीमें मुनिवर च्यवनकी चमकती हुई

पृष्ठ 848

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आँखोंको देखकर उसे बहुत कौतूहल हुआ । उसकी बुद्धिपर मोह छा गया और उसने विवश होकर यह कहती हुई कि ' देखूँ यह क्या है? ' एक काँटेसे उन्हें छेद दिया । उसके द्वारा आँखें बिंध जानेके कारण परम क्रोधी ब्रह्मर्षि च्यवन अत्यन्त कुपित हो उठे । फिर तो उन्होंने शर्यातिकी सेनाके मल - मूत्र बंद कर दिये । मल- मूत्रका द्वार बंद हो जानेसे मलावरोधके कारण सारी सेनाको बहुत दुःख होने लगा । सैनिकोंकी ऐसी अवस्था देखकर राजाने सबसे पूछा — ' यहाँ नित्य - निरन्तर तपस्यामें संलग्न रहनेवाले वयोवृद्ध महामना च्यवन रहते हैं । वे स्वभावतः बड़े क्रोधी हैं । उनका जानकर या बिना जाने आज किसने अपकार किया है? जिन लोगोंने भी ब्रह्मर्षिका अपराध किया हो, वे तुरंत सब कुछ बता दें, विलम्ब न करें। ' तब सम्पूर्ण सैनिकोंने उनसे कहा - ' महाराज! हम नहीं जानते कि किसके द्वारा उनका अपराध हुआ है? ॥ १२–१७ ॥

सर्वोपायैर्यथाकामं भवांस्तदधिगच्छतु ।

ततः स पृथिवीपालः साम्ना चोग्रेण च स्वयम् ॥ १८ ॥

पर्यपृच्छत् सुहृद्वर्गं पर्यजानन्न चैव ते ।

आनाहार्तं ततो दृष्ट्वा तत्सैन्यमसुखार्दितम् ॥ १ ९ ॥

पितरं दुःखितं दृष्ट्वा सुकन्येदमथाब्रवीत् ।

मयाटन्त्येह वल्मीके दृष्टं सत्त्वमभिज्वलत् ॥ २० ॥

पृष्ठ 849

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खद्योतवदभिज्ञातं तन्मया विद्धमन्तिकात् ।

एतच्छ्रुत्वा तु वल्मीकं शर्यातिस्तूर्णमभ्ययात् ॥ २१ ॥

तत्रापश्यत् तपोवृद्धं वयोवृद्धं च भार्गवम् ।

अयाचदथ सैन्यार्थं प्राञ्जलिः पृथिवीपतिः ॥ २२ ॥

' आप अपनी रुचिके अनुसार सभी उपायोंद्वारा इसका पता लगावें । ' तब राजा शर्यातिने साम और उग्रनीतिके द्वारा सभी सुहृदोंसे पूछा; परंतु वे भी इसका पता न लगा सके । तदनन्तर सुकन्याने सारी सेनाको मलावरोधके कारण दुःखसे पीड़ित और पिताको भी चिन्तित देख इस प्रकार कहा- ' तात! मैंने इस वनमें घूमते समय एक बाँबीके भीतर कोई चमकीली वस्तु देखी, जो जुगनूके समान जान पड़ती थी । उसके निकट जाकर मैंने उसे काँटेसे बींध दिया । ' यह सुनकर शर्याति तुरंत ही बाँबीके पास गये । वहाँ उन्होंने तपस्यामें बढ़े - चढ़े वयोवृद्ध महात्मा च्यवनको देखा और हाथ जोड़कर अपने सैनिकोंका कष्ट निवारण करनेके लिये याचना की— ॥ १८–२२ ॥

अज्ञानाद् बालया यत् ते कृतं तत् क्षन्तुमर्हसि ।

ततोऽब्रवीन्महीपालं च्यवनो भार्गवस्तदा ॥ २३ ॥

अपमानादहं विद्धो ह्यनया दर्पपूर्णया ।

रूपौदार्यसमायुक्तां लोभमोहबलात्कृताम् ॥ २४ ॥

तामेव प्रतिगृह्याहं राजन् दुहितरं तव ।

क्षंस्यामीति महीपाल सत्यमेतद् ब्रवीमि ते ॥ २५ ॥

‘ भगवन्! मेरी बालिकाने अज्ञानवश जो आपका अपराध किया है, उसे आप कृपापूर्वक क्षमा करें । ' उनके ऐसा कहनेपर भृगुनन्दन च्यवनने राजासे कहा — ‘ राजन्! तुम्हारी इस पुत्रीने अहंकारवश अपमानपूर्वक मेरी आँखें फोड़ी हैं, अतः रूप और उदारता आदि गुणोंसे युक्त तथा लोभ और मोहके वशीभूत हुई तुम्हारी इस कन्याको पत्नीरूपमें प्राप्त करके ही मैं इसका अपराध क्षमा कर सकता हूँ । भूपाल! यह मैं तुमसे सच्ची बात कहता हूँ' ॥ २३–२५ ॥ लोमशउवाच

ऋषेर्वचनमाज्ञाय शर्यातिरविचारयन् ।

ददौ दुहितरं तस्मै च्यवनाय महात्मने ॥ २६ ॥

लोमशजी कहते हैं -च्यवन ऋषिका यह वचन सुनकर राजा शर्यातिने बिना कुछ विचार किये ही महात्मा च्यवनको अपनी पुत्री दे दी ॥ २६ ॥

प्रतिगृह्य च तां कन्यां भगवान् प्रससाद ह ।

प्राप्तप्रसादो राजा वै ससैन्यः पुरमाव्रजत् ॥ २७ ॥

पृष्ठ 850

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उस राजकन्याको पाकर भगवान् च्यवन मुनि प्रसन्न हो गये । तत्पश्चात् उनका कृपाप्रसाद प्राप्त करके राजा शर्याति सेनासहित सकुशल अपनी राजधानीको लौट आये ॥ २७ ॥

सुकन्यापि पतिं लब्ध्वा तपस्विनमनिन्दिता ।

नित्यं पर्यचरत् प्रीत्या तपसा नियमेन च ॥ २८ ॥

सुकन्या भी तपस्वी च्यवनको पतिरूपमें पाकर प्रतिदिन प्रेमपूर्वक तप और नियमका पालन करती हुई उनकी परिचर्या करने लगी ॥ २८ ॥

अग्नीनामतिथीनां च शुश्रूषुरनसूयिका ।

समाराधयत क्षिप्रं च्यवनं सा शुभानना ॥ २ ९ ॥

सुमुखी सुकन्या किसीके गुणोंमें दोष नहीं देखती थी । वह त्रिविध अग्नियों और अतिथियोंकी सेवामें तत्पर हो शीघ्र ही महर्षि च्यवनकी आराधनामें लग गयी ॥ २ ९ ॥ इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि तीर्थयात्रापर्वणि लोमशतीर्थयात्रायां सौकन्ये द्वाविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १२२ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत तीर्थयात्रापर्वमें लोमशतीर्थयात्राके प्रसंगमें सुकन्योपाख्यानविषयक एक सौ बाईसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १२२ ॥