श्रीगणेशाय नमः।

महाभारत — खण्ड २ — पृष्ठ 881–890

महाभारत — खण्ड २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 881–890

पृष्ठ 881

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एकोनत्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः कुरुक्षेत्रके द्वारभूत प्लक्षप्रस्रवण नामक यमुनातीर्थ एवं सरस्वतीतीर्थकी महिमा लोमशउवाच

अस्मिन् किल स्वयं राजन्निष्टवान् वै प्रजापतिः ।

सत्रमिष्टीकृतं नाम पुरा वर्षसहस्रिकम् ॥ १ ॥

लोमशजी कहते हैं - युधिष्ठिर! पूर्वकालमें यहाँ साक्षात् प्रजापतिने इष्टीकृत नामक सत्रका एक सहस्र वर्षोंतक चालू रहनेवाला अनुष्ठान किया था ॥ १ ॥

अम्बरीषश्च नाभाग इष्टवान् यमुनामनु ।

यत्रेष्ट्वा दश पद्मानि सदस्येभ्योऽभिसृष्टवान् ॥ २ ॥

यज्ञैश्च तपसा चैव परां सिद्धिमवाप सः । यहीं यमुनाके तटपर नाभागपुत्र अम्बरीषने भी यज्ञ किया था और यज्ञ पूर्ण होनेके पश्चात् सदस्योंको दस पद्म मुद्राएँ दान की थीं तथा यज्ञों और तपस्याद्वारा परम सिद्धि प्राप्त कर ली थीं ॥ २३ ॥

देशश्च नाहुषस्यायं यज्वनः पुण्यकर्मणः ॥ ३ ॥

सार्वभौमस्य कौन्तेय ययातेरमितौजसः ।

स्पर्धमानस्य शक्रेण तस्येदं यज्ञवास्त्विह ॥ ४ ॥

कुन्तीनन्दन! यह नहुषकुमार ययातिका देश है, जो पुण्यकर्मा, याज्ञिक, महातेजस्वी और सार्वभौम सम्राट् थे। वे सदा इन्द्रके साथ ईर्ष्या रखते थे । यहाँ यह उन्हींकी यज्ञभूमि है ॥ ३-४ ॥

पश्य नानाविधाकारैरग्निभिर्निचितां महीम् ।

मज्जन्तीमिव चाक्रान्तां ययातेर्यज्ञकर्मभिः ॥ ५ ॥

देखो, यहाँ अग्नियोंसे युक्त नाना प्रकारकी वेदियाँ हैं, जिनसे यह सारी भूमि व्याप्त हो रही है; मानो पृथ्वी ययातिके यज्ञकर्मोंसे आक्रान्त हो उनकी पुण्य धारामें डूबी जा रही है ॥ ५ ॥

एषा शम्येकपत्रा या सरकं चैतदुत्तमम् ।

पश्य रामह्रदानेतान् पश्य नारायणाश्रमम् ॥ ६ ॥

यह एक पत्तेवाली शमीका अवशेष अंश है तथा यह उत्तम सरोवर है । देखो, ये परशुरामजीके कुण्ड हैं और यह नारायणाश्रम है ॥ ६ ॥

एतच्चर्चीकपुत्रस्य योगैर्विचरतो महीम् ।

पृष्ठ 882

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प्रसर्पणं महीपाल रौप्यायाममितौजसः ॥ ७ ॥

महाराज! योगशक्तिसे सारी पृथ्वीपर विचरनेवाले महातेजस्वी ऋचीकनन्दन जमदग्निका प्रसर्पण ( घूमने - फिरनेका स्थान) तीर्थ है जो रौप्या नामक नदीके समीप सुशोभित है ॥ ७ ॥

अत्रानुवंशं पठतः शृणु मे कुरुनन्दन ।

उलूखलैराभरणैः पिशाची यदभाषत ॥ ८ ॥

कुरुनन्दन! इस तीर्थके विषयमें एक परम्परा -प्राप्त कथाको सूचित करनेवाले कुछ

श्लोक हैं जिन्हें मैं पढ़ता तुम मेरे मुखसे सुनो- (प्राचीनकालकी बात है, कोई स्त्री अपने

पुत्रके साथ इस तीर्थमें निवास करनेके लिये आयी थी, उससे) एक भयंकर पिशाचीने, जिसने ओखली- जैसे आभूषण पहन रखे थे, उन श्लोकोंको कहा था- ॥ ८ ॥

युगन्धरे दधि प्राश्य उषित्वा चाच्युतस्थले ।

तद्वद् भूतलये स्नात्वा सपुत्रा वस्तुमर्हसि ॥ ९ ॥

श्लोक ( का भाव ) इस प्रकार है - ' अरी! तू युगन्धरमें दही खाकर* अच्युतस्थलमें

निवास करके ' और भूतलयमें नहाकर यहाँ पुत्रसहित निवास करनेकी अधिकारिणी कैसे हो सकती है? ॥ ९ ॥

एकरात्रमुषित्वेह द्वितीयं यदि वत्स्यसि ।

एतद् वै ते दिवावृत्तं रात्रौ वृत्तमतोऽन्यथा ॥ १० ॥

' ( अच्छा, आयी है तो एक रात रह ले,) यदि एक रात यहाँ रह लेनेके पश्चात् दूसरी रातमें भी रहेगी तो दिनमें तो तेरा यह हाल है ( आज दिनमें तो तुमको यह कष्ट दिया गया है ) और रातमें तेरे साथ अन्यथा बर्ताव होगा ( विशेष कष्ट दिया जायगा) ' ॥ १० ॥

अद्य चात्र निवत्स्यामः क्षपां भरतसत्तम ।

द्वारमेतत् तु कौन्तेय कुरुक्षेत्रस्य भारत ॥ ११ ॥

भरतश्रेष्ठ! ( इस किंवदन्तीके अनुसार किसीको भी यहाँ एक ही रात रहना चाहिये ) अतः हमलोग केवल आजकी रातमें ही यहाँ निवास करेंगे । युधिष्ठिर! यह तीर्थ कुरुक्षेत्रका द्वार बताया गया है ॥ ११ ॥

अत्रैव नाहुषो राजा राजन् क्रतुभिरिष्टवान् ।

ययातिर्बहुरत्नौघैर्यत्रेन्द्रो मुदमभ्यगात् ॥ १२ ॥

राजन्! नहुषनन्दन राजा ययातिने यहीं प्रचुर रत्नराशिकी दक्षिणासे युक्त अनेक यज्ञोंद्वारा भगवान्का यजन किया था । उन यज्ञोंमें इन्द्रको बड़ी प्रसन्नता हुई थी ॥ १२ ॥

एतत् प्लक्षावतरणं यमुनातीर्थमुत्तमम् ।

एतद् वै नाकपृष्ठस्य द्वारमाहुर्मनीषिणः ॥ १३ ॥

पृष्ठ 883

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यह यमुनाजीका प्लक्षावतरण नामक उत्तम तीर्थ है । मनीषी पुरुष इसे स्वर्गलोकका द्वार बताते हैं ॥ १३ ॥

अत्र सारस्वतैर्यज्ञैरीजानाः परमर्षयः ।

यूपोलूखलिकास्तात गच्छन्त्यवभृथप्लवम् ॥ १४ ॥

यहीं यूप और ओखली आदि यज्ञ-साधनोंका संग्रह करनेवाले महर्षियोंने सारस्वत यज्ञोंका अनुष्ठान करके अवभृथ स्नान किया था ॥ १४ ॥

अत्र वै भरतो राजा राजन् क्रतुभिरिष्टवान् ।

हयमेधेन यज्ञेन मेध्यमश्वमवासृजत् ॥ १५ ॥

असकृत् कृष्णसारङ्गं धर्मेणाप्य च मेदिनीम् ।

अत्रैव पुरुषव्याघ्र मरुत्तः सत्रमुत्तमम् ॥ १६ ॥

प्राप चैवर्षिमुख्येन संवर्तेनाभिपालितः ।

अत्रोपस्पृश्य राजेन्द्र सर्वाल्लोंकान् प्रपश्यति ।

पूयते दुष्कृताच्चैव अत्रापि समुपस्पृश ॥ १७ ॥

राजन्! राजा भरतने धर्मपूर्वक वसुधाका राज्य पाकर यहीं बहुत - से यज्ञ किये थे और यहीं अश्वमेधयज्ञके उद्देश्यसे उन्होंने अनेक बार कृष्णमृगके समान रंगवाले यज्ञसम्बन्धी श्यामकर्ण अश्वको भूतलपर भ्रमणके लिये छोड़ा था । नरश्रेष्ठ! इसी तीर्थमें ऋषिप्रवर संवर्तसे सुरक्षित हो महाराज मरुत्तने उत्तम यज्ञका अनुष्ठान किया । राजेन्द्र! यहाँ स्नान करके शुद्ध हुआ मनुष्य सम्पूर्ण लोकोंको प्रत्यक्ष देखता है और पापसे मुक्त हो पवित्र हो जाता है; अतः तुम इसमें भी स्नान करो ॥ १५–१७ ॥ वैशम्पायन उवाच

तत्र सभ्रातृकः स्नात्वा स्तूयमानो महर्षिभिः ।

लोमशं पाण्डवश्रेष्ठ इदं वचनमब्रवीत् ॥ १८ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं - जनमेजय! तदनन्तर भाइयोंसहित स्नान करके महर्षियोंद्वारा प्रशंसित हो पाण्डवश्रेष्ठ युधिष्ठिरने लोमशजीसे इस प्रकार कहा— ॥ १८ ॥

सर्वाल्लोँकान् प्रपश्यामि तपसा सत्यविक्रम ।

इहस्थः पाण्डवश्रेष्ठं पश्यामि श्वेतवाहनम् ॥ १ ९ ॥

‘ मुनीश्वर! तपोबलसे सम्पन्न होनेके कारण वस्तुतः आप ही यथार्थ पराक्रमी हैं । आपकी कृपासे आज मैं इस प्लक्षावतरणके जलमें स्थित होकर सब लोकोंको प्रत्यक्ष देख रहा हूँ । यहींसे मुझे पाण्डवश्रेष्ठ श्वेतवाहन अर्जुन भी दिखायी देते हैं ॥ १ ९ ॥ लोमशउवाच एवमेतन्महाबाहो पश्यन्ति परमर्षयः । ( इह स्नात्वा तपोयुक्तांस्त्रील्लोंकान् सचराचरान्)

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सरस्वतीमिमां पुण्यां पुण्यैकशरणावृताम् ॥ २० ॥

लोमशजीने कहा- महाबाहो! तुम ठीक कहते हो । यहाँ स्नान करके तपःशक्तिसम्पन्न श्रेष्ठ ऋषिगण इसी प्रकार चराचर प्राणियोंसहित तीनों लोकोंका दर्शन करते हैं । अब इस पुण्यसलिला सरस्वतीका दर्शन करो जो एकमात्र पुण्यका ही आश्रय लेनेवाले पुरुषोंसे घिरी हुई है ॥ २० ॥

यत्र स्नात्वा नरश्रेष्ठ धूतपाप्मा भविष्यसि ।

इह सारस्वतैर्यज्ञैरिष्टवन्तः सुरर्षयः ।

ऋषयश्चैव कौन्तेय तथा राजर्षयोऽपि च ॥ २१ ॥

नरश्रेष्ठ! इसमें स्नान करनेसे तुम्हारे सारे पाप धुल जायँगे । कुन्तीनन्दन! यहाँ अनेक देवर्षि, ब्रह्मर्षि तथा राजर्षियोंने सारस्वत यज्ञोंका अनुष्ठान किया है ॥ २१ ॥

वेदी प्रजापतेरेषा समन्तात् पञ्चयोजना ।

कुरोर्वै यज्ञशीलस्य क्षेत्रमेतन्महात्मनः ॥ २२ ॥

यह सब ओर पाँच योजन फैली हुई प्रजापतिकी यज्ञवेदी है । यही यज्ञपरायण महात्मा राजा कुरुका क्षेत्र है ॥ २२ ॥

इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि तीर्थयात्रापर्वणि लोमशतीर्थयात्रायामेकोनत्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः ॥ १२ ९ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत तीर्थयात्रापर्वमें लोमशतीर्थयात्राविषयक एक सौ उनतीसवाँअध्याय पूरा हुआ ॥ १२९ ॥

(दाक्षिणात्य अधिक पाठका श्लोक मिलाकर कुल २२३ श्लोक हैं) युगन्धर एक पर्वत या प्रदेशका नाम है, जहाँके लोग ऊँटनी और गदहीतकके दूधका दही जमा लेते हैं । उस स्त्रीने कभी वहाँ जाकर दही खाया था । धर्मशास्त्रमें ऊँट और एक खुरवाले पशुओंके दूधको मदिराके तुल्य बताया गया है -'औष्ट्रमेकशफं क्षीरं सुरातुल्यम् । ' इति । १. प्राचीनकालमें अच्युतस्थल नामक गाँव वर्णसंकरजातीय अन्त्यजों एवं चाण्डालोंका निवासस्थान था । उस स्त्रीने उस गाँवमें किसी समय निवास किया था । धर्म- शास्त्र के अनुसार वर्णसंकरोंके संसर्गमें आनेपर प्रायश्चित्तरूपसे प्राजापत्य व्रतका अनुष्ठान करना चाहिये - ' संसृज्य संकरैः सार्धं प्राजापत्यं व्रतं चरेत् । ' इति । २. ‘ भूतलय' नामक गाँव चोरों और डाकुओंका अड्डा था । वहाँ एक नदी थी, जिसमें मुर्दे बहाये जाते थे । उस स्त्रीने उसी दूषित जलमें स्नान किया था । धर्मशास्त्रके अनुसार उस गाँवमें रहनेमात्रसे प्राजापत्य व्रत करनेकी आवश्यकता है - ' प्रोष्य भूतलये विप्रः प्राजापत्यं व्रतं चरेत् । ' इति ॥ इन तीनों दोषोंसे युक्त होनेके कारण वह स्त्री तीर्थवासकी अधिकारिणी नहीं रह गयी थी ।

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त्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः विभिन्न तीर्थोंकी महिमा और राजा उशीनरकी कथाका आरम्भ लोमशउवाच

इह मर्त्यास्तनूस्त्यक्त्वा स्वर्गं गच्छन्ति भारत ।

मर्तुकामा नरा राजन्निहायान्ति सहस्रशः ॥ १ ॥

लोमशजी कहते हैं - भारत! यहाँ शरीर छूट जानेपर मनुष्य स्वर्गलोकमें जाते हैं; इसलिये हजारों इस तीर्थमें मरनेके लिये आकर निवास करते हैं ॥ १ ॥

एवमाशीः प्रयुक्ता हि दक्षेण यजता पुरा ।

इह ये वै मरिष्यन्ति ते वै स्वर्गजितो नराः ॥ २ ॥

एषा सरस्वती रम्या दिव्या चौघवती नदी ।

एतद् विनशनं नाम सरस्वत्या विशाम्पते ॥ ३ ॥

प्राचीनकालमें प्रजापति दक्षने यज्ञ करते समय यह आशीर्वाद दिया था कि जो मनुष्य यहाँ मरेंगे वे स्वर्गलोकपर अधिकार प्राप्त कर लेंगे । यह रमणीय, दिव्य और तीव्र प्रवाहवाली सरस्वती नदी है और यह सरस्वतीका विनशन नामक तीर्थ है ॥ २-३ ॥

द्वारं निषादराष्ट्रस्य येषां दोषात् सरस्वती ।

प्रविष्टा पृथिवीं वीर मा निषादा हि मां विदुः ॥ ४ ॥

एष वै चमसोद्भेदो यत्र दृश्या सरस्वती ।

यत्रैनामभ्यवर्तन्त सर्वाः पुण्याः समुद्रगाः ॥ ५ ॥

यह निषादराजका द्वार है । वीर युधिष्ठिर! उन निषादोंके ही संसर्गदोषसे सरस्वती नदी यहाँ इसलिये पृथ्वीके भीतर प्रविष्ट हो गयी कि निषाद मुझे जान न सकें । यह चमसोद्भेदतीर्थ है; जहाँ सरस्वती पुनः प्रकट हो गयी है । यहाँ समुद्रमें मिलनेवाली सम्पूर्ण पवित्र नदियाँ इसके सम्मुख आयी हैं ॥ ४-५ ॥

एतत् सिन्धोर्महत् तीर्थं यत्रागस्त्यमरिंदम ।

लोपामुद्रा समागम्य भर्तारमवृणीत वै ॥ ६ ॥

शत्रुदमन! यह सिन्धुका महान् तीर्थ है; जहाँ जाकर लोपामुद्राने अपने पति अगस्त्यमुनिका वरण किया था ॥ ६ ॥

एतत् प्रकाशते तीर्थं प्रभासं भास्करद्युते ।

इन्द्रस्य दयितं पुण्यं पवित्रं पापनाशनम् ॥७ ॥

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सूर्यके समान तेजस्वी नरेश! यह प्रभासतीर्थ* प्रकाशित हो रहा है, जो इन्द्रको बहुत प्रिय है । यह पुण्यमय क्षेत्र सब पापोंका नाश करनेवाला और परम पवित्र है ॥ ७ ॥

एतद् विष्णुपदं नाम दृश्यते तीर्थमुत्तमम् ।

एषा रम्या विपाशा च नदी परमपावनी ॥ ८ ॥

अत्र वै पुत्रशोकेन वसिष्ठो भगवानृषिः ।

बद्ध्वाऽऽत्मानं निपतितो विपाशः पुनरुत्थितः ॥ ९ ॥

यह विष्णुपद नामवाला उत्तम तीर्थ दिखायी देता है तथा यह परम पावन और मनोरम विपाशा ( व्यास ) नदी है । यहीं भगवान् वसिष्ठ मुनि पुत्रशोकसे पीड़ित हो अपने शरीरको पाशोंसे बाँधकर कूद पड़े थे, परंतु पुनः विपाश ( पाशमुक्त ) होकर जलसे बाहर निकल आये ॥ ८ - ९ ॥

काश्मीरमण्डलं चैतत् सर्वपुण्यमरिंदम ।

महर्षिभिश्चाध्युषितं पश्येदं भ्रातृभिः सह ॥ १० ॥

यत्रोत्तराणां सर्वेषामृषीणां नाहुषस्य च ।

अग्नेश्चैवात्र संवादः काश्यपस्य च भारत ॥ ११ ॥

शत्रुदमन! यह पुण्यमय काश्मीरमण्डल है, जहाँ बहुत - से महर्षि निवास करते हैं । तुम भाइयोंसहित इसका दर्शन करो । भारत! यह वही स्थान है जहाँ उत्तरके समस्त ऋषि, नहुषकुमार ययाति, अग्नि और काश्यपका संवाद हुआ था ॥ १०-११ ॥

एतद् द्वारं महाराज मानसस्य प्रकाशते ।

वर्षमस्य गिरेर्मध्ये रामेण श्रीमता कृतम् ॥ १२ ॥

महाराज! यह मानससरोवरका द्वार प्रकाशित हो रहा है । इस पर्वतके मध्यभागमें परशुरामजीने अपना आश्रम बनाया था ॥ १२ ॥

एष वातिकषण्डो वै प्रख्यातः सत्यविक्रमः ।

नात्यवर्तत यद्द्वारं विदेहादुत्तरं च यः ॥ १३ ॥

युधिष्ठिर! परशुरामजी सर्वत्र विख्यात हैं । वे सत्यपराक्रमी हैं । उनके इस आश्रमका द्वार विदेह देशसे उत्तर है । यह बवंडर ( वायुका तूफान) भी उनके इस द्वारका कभी उल्लंघन नहीं कर सकता है ( फिर औरोंकी तो बात ही क्या है ) ॥ १३ ॥

इदमाश्चर्यमपरं देशेऽस्मिन् पुरुषर्षभ ।

क्षीणे युगे तु कौन्तेय शर्वस्य सह पार्षदैः ॥ १४ ॥

सहोमया च भवति दर्शनं कामरूपिणः ।

अस्मिन् सरसि सत्रैर्वै चैत्रे मासि पिनाकिनम् ॥ १५ ॥

यजन्ते याजकाः सम्यक् परिवारं शुभार्थिनः ।

अत्रोपस्पृश्य सरसि श्रद्दधानो जितेन्द्रियः ॥ १६ ॥

क्षीणपापः शुभाल्लोँकान् प्राप्नुते नात्र संशयः ।

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एष उज्जानको नाम पावकिर्यत्र शान्तवान् ।

अरुन्धतीसहायश्च वसिष्ठो भगवानृषिः ॥ १७ ॥

नरश्रेष्ठ! इस देशमें दूसरी आश्चर्यकी बात यह है कि यहाँ निवास करनेवाले साधकको युगके अन्तमें पार्षदों तथा पार्वतीसहित इच्छानुसार रूप धारण करनेवाले भगवान् शंकरका प्रत्यक्ष दर्शन होता है । इस सरोवरके तटपर चैत्र मासमें कल्याणकामी याजक पुरुष अनेक प्रकारके यज्ञोंद्वारा परिवारसहित पिनाकधारी भगवान् शिवकी आराधना करते हैं । इस तालाबमें श्रद्धापूर्वक स्नान एवं आचमन करके पापमुक्त हुआ जितेन्द्रिय पुरुष शुभ लोकोंमें जाता है; इसमें संशय नहीं है । यह सरोवर उज्जानक नामसे प्रसिद्ध है । यहाँ भगवान् स्कन्द तथा अरुन्धतीसहित महर्षि वसिष्ठने साधना करके सिद्धि एवं शान्ति प्राप्त की है ॥ १४– १७ ॥

हृदश्च कुशवानेष यत्र पद्मं कुशेशयम् ।

आश्रमश्चैव रुक्मिण्या यत्राशाम्यदकोपना ॥ १८ ॥

यह कुशवान् नामक हृद है, जिसमें कुशेशय नामवाले कमल खिले रहते हैं । यहीं रुक्मिणीदेवीका आश्रम है जहाँ उन्होंने क्रोधको जीतकर शान्तिका लाभ किया था ॥

समाधीनां समासस्तु पाण्डवेय श्रुतस्त्वया ।

तं द्रक्ष्यसि महाराज भृगुतुङ्गं महागिरिम् ॥ १ ९ ॥

पाण्डुनन्दन! महाराज! तुमने जिसके विषयमें यह सुन रखा है कि वह योगसिद्धिका संक्षिप्त स्वरूप है—जिसके दर्शनमात्रसे समाधिरूप फलकी प्राप्ति हो जाती है, उस भृगुतुंग नामक महान् पर्वतका अब तुम दर्शन करोगे ॥ १ ९ ॥

वितस्तां पश्य राजेन्द्र सर्वपापप्रमोचनीम् ।

महर्षिभिश्चाध्युषितां शीततोयां सुनिर्मलाम् ॥ २० ॥

राजेन्द्र! वितस्ता ( झेलम ) नदीका दर्शन करो जो सब पापोंसे मुक्त करनेवाली है । इसका जल बहुत शीतल और अत्यन्त निर्मल है । इसके तटपर बहुत- से महर्षिगण निवास करते हैं ॥ २० ॥

जलां चोपजलां चैव यमुनामभितो नदीम् ।

उशीनरो वै यत्रेष्ट्वा वासवादत्यरिच्यत ॥ २१ ॥

यमुना नदीके दोनों पार्श्वमें जला और उपजला नामकी दो नदियोंका दर्शन करो, जहाँ राजा उशीनरने यज्ञ करके इन्द्रसे भी ऊँचा स्थान प्राप्त किया था ॥ २१ ॥

तां देवसमितिं तस्य वासवश्च विशाम्पते ।

अभ्यागच्छन्नृपवरं ज्ञातुमग्निश्च भारत ॥ २२ ॥

महाराज भरतनन्दन! नृपश्रेष्ठ उशीनरके महत्त्वको समझनेके लिये किसी समय इन्द्र और अग्नि उनकी राजसभामें गये ॥ २२ ॥

जिज्ञासमानौ वरदी महात्मानमुशीनरम् ।

पृष्ठ 888

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इन्द्रः श्येनः कपोतोऽग्निर्भूत्वा यज्ञेऽभिजग्मतुः ॥ २३ ॥

वे दोनों वरदायक महात्मा उस समय उशीनरकी परीक्षा लेना चाहते थे; अतः इन्द्रने बाज पक्षीका रूप धारण किया और अग्निने कबूतरका । इस प्रकार वे राजाके यज्ञमण्डपमें गये ॥ २३ ॥

ऊरू राज्ञः समासाद्य कपोतः श्येनजाद् भयात् ।

शरणार्थी तदा राजन् निलिल्ये भयपीडितः ॥ २४ ॥

अपनी रक्षाके लिये आश्रय चाहनेवाला कबूतर बाजके भयसे डरकर राजाकी गोदीमें जा छिपा ॥ २४ ॥

इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि तीर्थयात्रापर्वणि लोमशतीर्थयात्रायां श्येनकपोतीये त्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः ॥ १३० ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत तीर्थयात्रापर्वमें लोमशतीर्थयात्राके प्रसंगमें श्येनकपोतीयोपाख्यानविषयक एक सौ तीसवाँअध्याय पूरा हुआ ॥ १३० ॥

* 'प्रभास' की जगह ' हाटक' पाठभेद भी मिलता है ।

पृष्ठ 889

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एकत्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः राजा उशीनरद्वारा बाजको अपने शरीरका मांस देकर शरणमें आये हुए कबूतरके प्राणोंकी रक्षा करना श्येनउवाच

धर्मात्मानं त्वाहुरेकं सर्वे राजन् महीक्षितः ।

सर्वधर्मविरुद्धं त्वं कस्मात् कर्म चिकीर्षसि ॥ १ ॥

विहितं भक्षणं राजन् पीड्यमानस्य मेक्षुधा मा रक्षीर्धर्मलोभेन धर्ममुत्सृष्टवानसि ॥ २ ॥

तब बाजने कहा- राजन्! समस्त भूपाल केवल आपको ही धर्मात्मा बताते हैं । फिर आप यह सम्पूर्ण धर्मोंसे विरुद्ध कर्म कैसे करना चाहते हैं । महाराज! मैं भूखसे कष्ट पा रहा

हूँ और कबूतर मेरा आहार नियत किया गया है । आप धर्मके लोभसे इसकी रक्षा न करें ।

वास्तवमें इसे आश्रय देकर आपने धर्मका परित्याग ही किया है ॥ १-२ ॥

राजोवाच

संत्रस्तरूपस्त्राणार्थी त्वत्तो भीतो महाद्विज ।

मत्सकाशमनुप्राप्तः प्राणगृध्नुरयं द्विजः ॥ ३ ॥

एवमभ्यागतस्येह कपोतस्याभयार्थिनः ।

अप्रदाने परं धर्मं कथं श्येन न पश्यसि ॥ ४ ॥

राजा बोले - पक्षिराज! यह कबूतर तुमसे डरकर घबराया हुआ है और अपने प्राण बचानेकी इच्छासे मेरे समीप आया है । यह अपनी रक्षा चाहता है । बाज! इस प्रकार अभय चाहनेवाले इस कबूतरको यदि मैं तुमको नहीं सौंप रहा हूँ, यह तो परम धर्म है । इसे तुम कैसे नहीं देख रहे हो? ॥ ३-४ ॥

प्रस्पन्दमानः सम्भ्रान्तः कपोतः श्येन लक्ष्यते ।

मत्सकाशं जीवितार्थी तस्य त्यागो विगर्हितः ॥ ५ ॥

यो हि कश्चिद् द्विजान् हन्याद् गां वा लोकस्य मातरम् ।

शरणागतं च त्यजते तुल्यं तेषां हि पातकम् ॥ ६ ॥

बाज! देखो तो यह बेचारा कबूतर किस प्रकार भयसे व्याकुल हो थर- थर काँप रहा है । इसने अपने प्राणोंकी रक्षाके लिये ही मेरी शरण ली है । ऐसी दशामें इसे त्याग देना बड़ी ही निन्दाकी बात है । जो मनुष्य ब्राह्मणोंकी हत्या करता है, जो जगन्माता गौका वध करता है तथा जो शरणमें आये हुए को त्याग देता है, इन तीनोंको समान पाप लगता है ॥ ५-६ ॥ श्येन उवाच

पृष्ठ 890

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आहारात् सर्वभूतानि सम्भवन्ति महीपते ।

आहारेण विवर्धन्ते तेन जीवन्ति जन्तवः ॥ ७ ॥

बाजने कहा — महाराज! सब प्राणी आहारसे ही उत्पन्न होते हैं, आहारसे ही उनकी वृद्धि होती है और आहारसे ही जीवित रहते हैं ॥ ७ ॥

शक्यते दुस्त्यजेऽप्यर्थे चिररात्राय जीवितुम् ।

न तु भोजनमुत्सृज्य शक्यं वर्तयितुं चिरम् ॥ ८ ॥

जिसको त्यागना बहुत कठिन है, उस अर्थके बिना भी मनुष्य बहुत दिनोंतक जीवित रह सकता है, परंतु भोजन छोड़ देनेपर कोई भी अधिक समयतक जीवन धारण नहीं कर सकता ॥ ८ ॥

भक्ष्याद् वियोजितस्याद्य मम प्राणा विशाम्पते ।

विसृज्य कायमेष्यन्ति पन्थानमकुतोभयम् ॥ ९ ॥

प्रमृते मयि धर्मात्मन् पुत्रदारादि नङ्क्ष्यति ।

रक्षमाणः कपोतं त्वं बहून् प्राणान् न रक्षसि ॥ १० ॥

प्रजानाथ! आज आपने मुझे भोजनसे वंचित कर दिया है, इसलिये मेरे प्राण इस शरीरको छोड़कर अकुतोभय - पथ ( मृत्यु) को प्राप्त हो जायँगे । धर्मात्मन्! इस प्रकार मेरी मृत्यु हो जानेपर मेरे स्त्री- पुत्र आदि भी ( असहाय होनेके कारण) नष्ट हो जायँगे । इस तरह आप एक कबूतरकी रक्षा करके बहुत- से प्राणियोंकी रक्षा नहीं कर रहे हैं ॥ ९ -१० ॥

धर्मं यो बाधते धर्मो न स धर्मः कुधर्म तत् ।

अविरोधात् तु यो धर्मः स धर्मः सत्यविक्रम ॥ ११ ॥

सत्यपराक्रमी नरेश! जो धर्म दूसरे धर्मका बाधक हो वह धर्म नहीं, कुधर्म है । जो दूसरे किसी धर्मका विरोध न करके प्रतिष्ठित होता है वही वास्तविक धर्म है ॥

विरोधिषु महीपाल निश्चित्य गुरुलाघवम् ।

न बाधा विद्यते यत्र तं धर्मं समुपाचरेत् ॥ १२ ॥

परस्परविरुद्ध प्रतीत होनेवाले धर्मोंमें गौरव- लाघवका विचार करके, जिसमें दूसरोंके लिये बाधा न हो उसी धर्मका आचरण करना चाहिये ॥ १२ ॥

गुरुलाघवमादाय धर्माधर्मविनिश्चये ।

यतो भूयांस्ततो राजन् कुरुष्व धर्मनिश्चयम् ॥ १३ ॥

राजन्! धर्म और अधर्मका निर्णय करते समय पुण्य और पापके गौरव - लाघवपर ही दृष्टि रखकर विचार कीजिये तथा जिसमें अधिक पुण्य हो उसीको आचरणमें लाने योग्य धर्म ठहराइये ॥ १३ ॥

राजोवाच बहुकल्याणसंयुक्तं भाषसे विहगोत्तम ।