श्रीगणेशाय नमः।
महाभारत — खण्ड २ — पृष्ठ 891–900
महाभारत — खण्ड २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 891–900
पृष्ठ 891
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
सुपर्णः पक्षिराट् किं त्वं धर्मज्ञश्चास्यसंशयम् ॥ १४ ॥
राजाने कहा —पक्षिश्रेष्ठ! तुम्हारी बातें अत्यन्त कल्याणमय गुणोंसे युक्त हैं । तुम साक्षात् पक्षिराज गरुड़ तो नहीं हो? इसमें संदेह नहीं कि तुम धर्मके ज्ञाता हो ॥ १४ ॥
तथा हि धर्मसंयुक्तं बहु चित्रं च भाषसे ।
न तेऽस्त्यविदितं किंचिदिति त्वां लक्षयाम्यहम् ॥ १५ ॥
तुम जो बातें कह रहे हो वे बड़ी ही विचित्र और धर्मसंगत हैं । मुझे लक्षणोंसे ऐसा जान पड़ता है कि ऐसी कोई बात नहीं है जो तुम्हें ज्ञात न हो ॥ १५ ॥
शरणैषिपरित्यागं कथं साध्विति मन्यसे ।
आहारार्थं समारम्भस्तव चायं विहंगम ॥ १६ ॥
तो भी तुम शरणागतके त्यागको कैसे अच्छा मानते हो? यह मेरी समझमें नहीं आता ।
विहंगम! वास्तवमें तुम्हारा यह उद्योग केवल भोजन प्राप्त करनेके लिये है ॥
शक्यश्चाप्यन्यथा कर्तुमाहारोऽप्यधिकस्त्वया ।
गोवृषो वा वराहो वा मृगो वा महिषोऽपि वा ।
त्वदर्थमद्य क्रियतां यच्चान्यदिह काङ्क्षसि ॥ १७ ॥
परंतु तुम्हारे लिये आहारका प्रबन्ध तो दूसरे प्रकारसे भी किया जा सकता है और वह इस कबूतरकी अपेक्षा अधिक हो सकता है। सूअर, हिरन, भैंसा या कोई उत्तम पशु अथवा अन्य जो कोई भी वस्तु तुम्हें अभीष्ट हो वह तुम्हारे लिये प्रस्तुत की जा सकती है ॥ १७ ॥
श्येनउवाच
न वराहं न चोक्षाणं न मृगान् विविधांस्तथा ।
भक्षयामि महाराज किं ममान्येन केनचित् ॥ १८ ॥
बाज बोला - महाराज! मैं न सूअर खाऊँगा, न कोई उत्तम पशु और न भाँति - भाँतिके
मृगोंका ही आहार करूँगा । दूसरी किसी वस्तुसे भी मुझे क्या लेना है? ॥
यस्तु मे देवविहितो भक्षः क्षत्रियपुङ्गव ।
तमुत्सृज महीपाल कपोतमिममेव मे ॥ १ ९ ॥
क्षत्रियशिरोमणे! विधाताने मेरे लिये जो भोजन नियत किया है वह तो यह कबूतर ही है; अतः भूपाल! इसीको मेरे लिये छोड़ दीजिये ॥ १ ९ ॥
श्येनः कपोतानत्तीति स्थितिरेषा सनातनी ।
मा राजन् सारमज्ञात्वा कदलीस्कन्धमाश्रय ॥ २० ॥
यह सनातन कालसे चला आ रहा है कि बाज कबूतरोंको खाता है । राजन्! धर्मके सारभूत तत्त्वको न जानकर आप केलेके खम्भे ( -जैसे सारहीन धर्म) का आश्रय न लीजिये ॥ २० ॥
राजोवाच
पृष्ठ 892
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
राष्ट्रं शिबीनामृद्धं वै ददानि तव खेचर ।
यं वा कामयसे कामं श्येन सर्वं ददानि ते ॥ २१ ॥
राजाने कहा — विहंगम! मैं शिबिदेशका समृद्धिशाली राज्य तुम्हें सौंप दूँगा, और भी जिस वस्तुकी तुम्हें इच्छा होगी वह सब दे सकता हूँ ॥ २१ ॥
विनेमं पक्षिणं श्येन शरणार्थिनमागतम् ।
येनेमं वर्जयेथास्त्वं कर्मणा पक्षिसत्तम ।
तदाचक्ष्व करिष्यामि न हि दास्ये कपोतकम् ॥ २२ ॥
किंतु शरण लेनेकी इच्छासे आये हुए इस पक्षीको नहीं त्याग सकता । पक्षिश्रेष्ठ श्येन! जिस काम करनेसे तुम इसे छोड़ सको, वह मुझे बताओ; मैं वही करूँगा, किंतु इस कबूतरको तो नहीं दूँगा ॥ २२ ॥
श्येनउवाच
उशीनर कपोते ते यदि स्नेहो नराधिप ।
आत्मनो मांसमुत्कृत्य कपोततुलया धृतम् ॥ २३ ॥
यदा समं कपोतेन तव मांसं नृपोत्तम ।
तदा देयं तु तन्मह्यं सा मे तुष्टिर्भविष्यति ॥ २४ ॥
बाज बोला — महाराज उशीनर! यदि आपका इस कबूतरपर स्नेह है तो इसीके बराबर अपना मांस काटकर तराजूमें रखिये । नृपश्रेष्ठ! जब वह तौलमें इस कबूतरके बराबर हो जाय तब वही मुझे दे दीजियेगा, उससे मेरी तृप्ति हो जायगी ॥ २३-२४ ॥
पृष्ठ 893
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
राजा शिबिका कबूतरकी रक्षाके लिये बाजको अपने शरीरका मांस काटकर देना राजोवाच
पृष्ठ 894
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
अनुग्रहमिमं मन्ये श्येन यन्माभियाचसे ।
तस्मात् तेऽद्य प्रदास्यामि स्वमांसं तुलया धृतम् ॥ २५ ॥
राजाने कहा — बाज! तुम जो मेरा मांस माँग रहे हो इसे मैं अपने ऊपर तुम्हारी बहुत बड़ी कृपा मानता हूँ, अतः मैं अभी अपना मांस तराजूपर रखकर तुम्हें दिये देता हूँ ॥ २५ ॥
लोमशउवाच
उत्कृत्य स स्वयं मांसं राजा परमधर्मवित् ।
तोलयामास कौन्तेय कपोतेन समं विभो ॥ २६ ॥
लोमशजी कहते हैं— कुन्तीनन्दन! तत्पश्चात् परम धर्मज्ञ राजा उशीनरने स्वयं अपना मांस काटकर उस कबूतरके साथ तौलना आरम्भ किया ॥ २६ ॥
ध्रियमाणः कपोतस्तु मांसेनात्यतिरिच्यते ।
पुनश्चोत्कृत्य मांसानि राजा प्रादादुशीनरः ॥ २७ ॥
न विद्यते यदा मांसं कपोतेन समं धृतम् ।
तत उत्कृत्तमांसोऽसावारुरोह स्वयं तुलाम् ॥ २८ ॥
किंतु दूसरे पलड़े में रखा हुआ कबूतर उस मांसकी अपेक्षा अधिक भारी निकला, तब महाराज उशीनरने पुनः अपना मांस काटकर चढ़ाया । इस प्रकार बार- बार करनेपर भी जब
पृष्ठ 895
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
वह मांस कबूतरके बराबर न हुआ, तब सारा मांस काट लेनेके पश्चात् वे स्वयं ही तराजूपर चढ़ गये ॥ २७-२८ ॥ श्येन उवाच
इन्द्रोऽहमस्मि धर्मज्ञ कपोतो हव्यवाडयम् ।
जिज्ञासमानौ धर्मं त्वां यज्ञवाटमुपागतौ ॥ २ ९ ॥
बाज बोला — धर्मज्ञ नरेश! मैं इन्द्र हूँ और यह कबूतर साक्षात् अग्निदेव हैं । हम दोनों आपके धर्मकी परीक्षा लेनेके लिये इस यज्ञशालामें आपके निकट आये थे ॥
यत् ते मांसानि गात्रेभ्य उत्कृत्तानि विशाम्पते ।
एषा ते भास्वती कीर्तिर्लोकानभिभविष्यति ॥ ३० ॥
प्रजानाथ! आपने अपने अंगोंसे जो मांस काटकर चढ़ाये हैं, उससे फैली हुई आपकी प्रकाशमान कीर्ति सम्पूर्ण लोगोंसे बढ़कर होगी ॥ ३० ॥
यावल्लोके मनुष्यास्त्वां कथयिष्यन्ति पार्थिव ।
तावत् कीर्तिश्च लोकाश्च स्थास्यन्ति तव शाश्वताः ॥ ३१ ॥
राजन्! संसारके मनुष्य इस जगत् में जबतक आपकी चर्चा करेंगे, तबतक आपकी कीर्ति और सनातन लोक स्थिर रहेंगे ॥ ३१ ॥
इत्येवमुक्त्वा राजानमारुरोह दिवं पुनः ।
उशीनरोऽपि धर्मात्मा धर्मेणावृत्य रोदसी ॥ ३२ ॥
विभ्राजमानो वपुषाप्यारुरोह त्रिविष्टपम् ।
तदेतत् सदनं राजन् राज्ञस्तस्य महात्मनः ॥ ३३ ॥
पश्यस्वैतन्मया सार्धं पुण्यं पापप्रमोचनम् ।
तत्र वै सततं देवा मुनयश्च सनातनाः ।
दृश्यन्ते ब्राह्मणै राजन् पुण्यवद्भिर्महात्मभिः ॥ ३४ ॥
राजासे ऐसा कहकर इन्द्र फिर देवलोकमें चले गये तथा धर्मात्मा राजा उशीनर भी अपने धर्मसे पृथ्वी और आकाशको व्याप्त कर देदीप्यमान शरीर धारण करके स्वर्गलोकमें चले गये । राजन्! यही उन महात्मा राजा उशीनरका आश्रम है जो पुण्यजनक होनेके साथ ही समस्त पापोंसे छुटकारा दिलानेवाला है । तुम मेरे साथ इस पवित्र आश्रमका दर्शन करो । महाराज! वहाँ पुण्यात्मा महात्मा ब्राह्मणोंको सदा सनातन देवता तथा मुनियोंका दर्शन होता रहता है ॥ ३२-३४ ॥ इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि तीर्थयात्रापर्वणि लोमशतीर्थयात्रायां श्येनकपोतीये एकत्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः ॥ १३१ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत तीर्थयात्रापर्वमें लोमशतीर्थयात्राके प्रसंगमें श्येनकपोतीयोपाख्यानविषयक एक सौ इकतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १३१ ॥
पृष्ठ 896
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
Fut F2I CL) Kos Fas
पृष्ठ 897
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
द्वात्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः अष्टावक्रके जन्मका वृत्तान्त और उनका राजा जनकके दरबारमें जाना लोमशउवाच यः कथ्यते मन्त्रविदग्धबुद्धि- रौद्दालकिः श्वेतकेतुः पृथिव्याम् । तस्याश्रमं पश्य नरेन्द्र पुण्यं सदाफलैरुपपन्नं महीजैः ॥ १ ॥
लोमशजी कहते हैं — युधिष्ठिर! उद्दालकके पुत्र श्वेतकेतु हो गये हैं, जो इस भूतलपर मन्त्र- शास्त्रमें अत्यन्त निपुण कहे जाते थे, देखो यह पवित्र आश्रम उन्हींका है । जो सदा फल देनेवाले वृक्षोंसे हरा- भरा दिखायी देता है ॥ १ ॥
साक्षादत्र श्वेतकेतुर्ददर्श सरस्वतीं मानुषदेहरूपाम् । वेत्स्यामि वाणीमिति सम्प्रवृत्तां सरस्वतीं श्वेतकेतुर्बभाषे ॥ २ ॥
इस आश्रममें श्वेतकेतुने मानवरूपधारिणी सरस्वती देवीका प्रत्यक्ष दर्शन किया था और अपने निकट आयी हुई उन सरस्वतीसे यह कहा था कि ' मैं वाणीस्वरूपा आपके तत्त्वको यथार्थरूपसे जानना चाहता हूँ' ॥ २ ॥
तस्मिन् युगे ब्रह्मकृतां वरिष्ठा- वास्तां मुनी मातुलभागिनेयौ ।
अष्टावक्रश्चैव कहोडसूनु- रौद्दालकिः श्वेतकेतुः पृथिव्याम् ॥ ३ ॥
उस युगमें कहोड मुनिके पुत्र अष्टावक्र और उद्दालकनन्दन श्वेतकेतु ये दोनों महर्षि समस्त भूमण्डलके वेदवेत्ताओंमें श्रेष्ठ थे । वे आपसमें मामा और भानजा लगते थे ( इनमें श्वेतकेतु ही मामा था ) ॥ ३ ॥
विदेहराजस्य महीपतेस्तौ विप्रावुभौ मातुलभागिनेयौ । प्रविश्य यज्ञायतनं विवादे बन्दिं निजग्राहतुरप्रमेयौ ॥ ४ ॥
पृष्ठ 898
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
एक समय वे दोनों मामा- भानजे विदेहराजके यज्ञमण्डपमें गये । दोनों ही ब्राह्मण अनुपम विद्वान् थे । वहाँ शास्त्रार्थ होनेपर उन दोनोंने अपने ( विपक्षी ) बन्दीको जीत लिया ॥ ४ ॥
उपास्स्व कौन्तेय सहानुजस्त्वं
तस्याश्रमं पुण्यतमं प्रविश्य ।
अष्टावक्रं यस्य दौहित्रमाहु- र्योऽसौ बन्दिं जनकस्याथ यज्ञे ॥ ५ ॥
वादी विप्राग्रयो बाल एवाभिगम्य वादे भङ्क्त्वा मज्जयामास नद्याम् ॥ ६ ॥
कुन्तीनन्दन! विप्रशिरोमणि अष्टावक्र वाद-विवादमें बड़े निपुण थे । उन्होंने बाल्यावस्थामें ही महाराज जनकके यज्ञमण्डपमें पधारकर अपने प्रतिवादी बन्दीको पराजित करके नदीमें डलवा दिया था । वे अष्टावक्र मुनि जिन महात्मा उद्दालकके दौहित्र ( नाती ) बताये जाते हैं, उन्हींका यह परम पवित्र आश्रम है । तुम अपने भाइयोंसहित इसमें प्रवेश करके कुछ देरतक उपासना ( भगवच्चिन्तन ) करो ॥ ५-६ ॥ युधिष्ठिर उवाच कथंप्रभावः स बभूव विप्र- स्तथाभूतं यो निजग्राह बन्दिम् । अष्टावक्रः केन चासौ बभूव तत् सर्वं मे लोमश शंस तत्त्वम् ॥ ७ ॥
युधिष्ठिरने पूछा – लोमशजी! उन ब्रह्मर्षिका कैसा प्रभाव था, जिन्होंने बन्दी - जैसे सुप्रसिद्ध विद्वान्को भी जीत लिया । वे किस कारणसे अष्टावक्र
( आठों अङ्गोंसे टेढ़े - मेढ़े हो गये । ये सब बातें मुझे यथार्थरूपसे बताइये ॥ ७ ॥
लोमश उवाच उद्दालकस्य नियतः शिष्य एको नाम्ना कहोड इति विश्रुतोऽभूत् । शुश्रूषुराचार्यवशानुवर्ती दीर्घं कालं सोऽध्ययनं चकार ॥ ८ ॥
लोमशजीने कहा— राजन्! महर्षि उद्दालकका कहोड नामसे विख्यात एक शिष्य था जो बड़े संयम - नियमसे रहकर आचार्यकी सेवा किया करता था । उसने गुरुकी आज्ञाके अंदर रहकर दीर्घकालतक अध्ययन किया ॥ ८ ॥
तं वै विप्रः पर्यचरत् सशिष्य-
पृष्ठ 899
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
स्तां च ज्ञात्वा परिचर्यां गुरुः सः । तस्मै प्रादात् सद्य एव श्रुतं च भार्यां च वै दुहितरं स्वां सुजाताम् ॥ ९ ॥
विप्रवर ' कहोड' एक विनीत शिष्यकी भाँति उद्दालक मुनिकी परिचर्यामें संलग्न रहते थे । गुरुने शिष्यकी उस सेवाके महत्त्वको समझकर शीघ्र ही उन्हें सम्पूर्ण वेद- शास्त्रोंका ज्ञान करा दिया और अपनी पुत्री सुजाताको भी उन्हें पत्नीरूपसे समर्पित कर दिया ॥ ९ ॥
तस्या गर्भः समभवदग्निकल्पः सोऽधीयानं पितरं चाप्युवाच । सर्वां रात्रिमध्ययनं करोषि नेदं पितः सम्यगिवोपवर्तते ॥ १० ॥ *
कुछ कालके बाद सुजाता गर्भवती हुई, उसका वह गर्भ अग्निके समान तेजस्वी था । एक दिन स्वाध्यायमें लगे हुए अपने पिता कहोड मुनिसे उस गर्भस्थ बालकने कहा, ' पिताजी! आप रातभर वेदपाठ करते हैं तो भी आपका वह अध्ययन अच्छी प्रकारसे शुद्ध उच्चारणपूर्वक नहीं हो पाता ' ॥ १० ॥
उपालब्धः शिष्यमध्ये महर्षिः स तं कोपादुदरस्थं शशाप । यस्मात् कुक्षौ वर्तमानो ब्रवीषि तस्माद् वक्रो भवितास्यष्टकृत्वः ॥ ११ ॥
शिष्योंके बीचमें बैठे हुए महर्षि कहोड इस प्रकार उलाहना सुनकर अपमानका अनुभव करते हुए कुपित हो उठे और उस गर्भस्थ बालकको शाप देते हुए बोले, ‘ अरे! तू अभी पेटमें रहकर ऐसी टेढ़ी बातें बोलता है, अतः तू आठों अंगोंसे टेढ़ा हो जायगा ' ॥ ११ ॥
स वै तथा वक्र एवाभ्यजाय- दष्टावक्रः प्रथितो वै महर्षिः । अस्यासीद् वै मातुलः श्वेतकेतुः स तेन तुल्यो वयसा बभूव ॥ १२ ॥
उस शापके अनुसार वे महर्षि आठों अंगोंसे टेढ़े होकर पैदा हुए । इसलिये अष्टावक्र नामसे उनकी प्रसिद्धि हुई । श्वेतकेतु उनके मामा थे, परंतु अवस्थामें उन्हींके बराबर थे ॥ १२ ॥
सम्पीड्यमाना तु तदा सुजाता सा वर्धमानेन सुतेन कुक्षौ । उवाच भर्तारमिदं रहोगता
पृष्ठ 900
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
प्रसाद्य हीनं वसुना धनार्थिनी ॥ १३ ॥
जब पेटमें गर्भ बढ़ रहा था, उस समय सुजाताने उससे पीड़ित होकर एकान्तमें अपने निर्धन पतिसे धनकी इच्छा रखकर कहा— ॥ १३ ॥
कथं करिष्याम्यधुना महर्षे मासश्चायं दशमो वर्तते मे । नैवास्ति ते वसु किंचित् प्रजाता येनाहमेतामापदं निस्तरेयम् ॥ १४ ॥
‘ महर्षे! यह मेरे गर्भका दसवाँ महीना चल रहा है । मैं धनहीन नारी खर्चकी कैसे व्यवस्था करूँगी । आपके पास थोड़ा-सा भी धन नहीं है जिससे मैं प्रसवकालके इस संकटसे पार हो सकूँ' ॥ १४ ॥
उक्तस्त्वेवं भार्यया वै कहोडो वित्तस्यार्थे जनकमथाभ्यगच्छत् । स वै तदा वादविदा निगृह्य निमज्जितो बन्दिनेहाप्सु विप्रः ॥ १५ ॥
पत्नीके ऐसा कहनेपर कहोड मुनि धनके लिये राजा जनकके दरबारमें गये । उस समय शास्त्रार्थी पण्डित बन्दीने उन ब्रह्मर्षिको विवादमें हराकर जलमें डुबो दिया ॥ १५ ॥
उद्दालकस्तं तु तदा निशम्य
सूतेन वादेऽप्सु निमज्जितं तथा ।
उवाच तां तत्र ततः सुजाता- मष्टावक्रे गूहितव्योऽयमर्थः ॥ १६ ॥
जब उद्दालकको यह समाचार मिला कि ' कहोड मुनि शास्त्रार्थमें पराजित होनेपर सूत ( बन्दी ) के द्वारा जलमें डुबो दिये गये। ' तब उन्होंने सुजातासे सब कुछ बता दिया और कहा, ' बेटी! अपने बच्चेसे इस वृत्तान्तको सदा ही गुप्त रखना' ॥ १६ ॥
रक्ष सा चापि तमस्य मन्त्रं जातोऽप्यसौ नैव शुश्राव विप्रः । उद्दालकं पितृवच्चापि मेने तथाष्टावक्रो भ्रातृवच्छ्वेतकेतुम् ॥ १७ ॥
सुजाताने भी अपने पुत्रसे उस गोपनीय समाचारको गुप्त ही रखा । इसीसे जन्म लेनेके बाद भी उस ब्राह्मण- बालकको इसके विषयमें कुछ भी पता न लगा। अष्टावक्र अपने नाना उद्दालकको ही पिताके समान मानते थे और श्वेतकेतुको अपने भाईके समान समझते थे ॥ १७ ॥