श्रीगणेशाय नमः।
महाभारत — खण्ड २ — पृष्ठ 961–970
महाभारत — खण्ड २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 961–970
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द्विचत्वारिंशदधिकशततमोऽध्यायः पाण्डवोंद्वारा गंगाजीकी वन्दना, लोमशजीका नरकासुरके वध और भगवान् वाराहद्वारा वसुधाके उद्धारकी कथा कहना लोमशउवाच
द्रष्टारः पर्वताः सर्वे नद्यः सपुरकाननाः ।
तीर्थानि चैव श्रीमन्ति स्पृष्टं च सलिलं करैः ॥ १ ॥
लोमशजीने कहा— तीर्थदर्शी पाण्डुकुमारो! तुमने सब पर्वतोंके दर्शन कर लिये । नगरों और वनोंसहित नदियोंका भी अवलोकन किया । शोभाशाली तीर्थोंके भी दर्शन किये और उन सबके जलका अपने हाथोंसे स्पर्श भी कर लिया ॥ १ ॥
पर्वतं मन्दरं दिव्यमेष पन्थाः प्रयास्यति ।
समाहिता निरुद्विग्नाः सर्वे भवत पाण्डवाः ॥ २ ॥
अयं देवनिवास वै गन्तव्यो वो भविष्यति ।
ऋषीणां चैव दिव्यानां निवासः पुण्यकर्मणाम् ॥ ३ ॥
पाण्डवो! यह मार्ग दिव्य मन्दराचलकी ओर जायगा । अब तुम सब लोग उद्वेगशून्य
और एकाग्रचित्त हो जाओ । यह देवताओंका निवासस्थान है, जिसपर तुम्हें चलना होगा ।
यहाँ पुण्यकर्म करनेवाले दिव्य ऋषियोंका भी निवास है ॥ २-३ ॥
एषा शिवजला पुण्या याति सौम्य महानदी ।
बदरीप्रभवा राजन् देवर्षिगणसेविता ॥ ४ ॥
सौम्य स्वभाववाले नरेश! यह कल्याणमय जलसे भरी हुई पुण्यस्वरूपा महानदी अलकनन्दा ( गंगा ) प्रवाहित होती है, जो देवर्षियोंके समुदायसे सेवित है । इसका प्रादुर्भाव बदरिकाश्रमसे ही हुआ है ॥ ४ ॥
एषा वैहायसैर्नित्यं बालखिल्यैर्महात्मभिः ।
अर्चिता चोपयाता च गन्धर्वैश्च महात्मभिः ॥ ५ ॥
आकाशचारी महात्मा बालखिल्य तथा महामना गन्धर्वगण भी नित्य इसके तटपर आते - जाते हैं और इसकी पूजा करते हैं ॥ ५ ॥
अत्र साम स्म गायन्ति सामगाः पुण्यनिःस्वनाः ।
मरीचिः पुलहश्चैव भृगुश्चैवाङ्गिरास्तथा ॥ ६ ॥
सामगान करनेवाले विद्वान् वेदमन्त्रोंकी पुण्यमयी ध्वनि फैलाते हुए यहाँ सामवेदकी ऋचाओंका गान करते हैं । मरीचि, पुलह, भृगु तथा अंगिरा भी यहाँ जप एवं स्वाध्याय करते
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हैं ॥ ६ ॥
अत्राह्निकं सुरश्रेष्ठो जपते समरुद्गणः ।
साध्याश्चैवाश्विनौ चैव परिधावन्ति तं तदा ॥ ७ ॥
देवश्रेष्ठ इन्द्र भी मरुद्गणोंके साथ यहाँ आकर प्रतिदिन नियमपूर्वक जप करते हैं । उस समय साध्य तथा अश्विनीकुमार भी उनकी परिचर्यामें रहते हैं ॥ ७ ॥
चन्द्रमाः सह सूर्येण ज्योतींषि च ग्रहैः सह ।
अहोरात्रविभागेन नदीमेनामनुव्रजन् ॥ ८ ॥
चन्द्रमा, सूर्य, ग्रह और नक्षत्र भी दिन- रातके विभागपूर्वक इस पुण्य नदीकी यात्रा करते हैं ॥ ८ ॥
एतस्याः सलिलं मूर्ध्नि वृषाङ्कः पर्यधारयत् ।
गङ्गाद्वारे महाभाग येन लोकस्थितिर्भवेत् ॥ ९ ॥
महाभाग! गंगाद्वार ( हरिद्वार ) - में साक्षात् भगवान् शंकरने इसके पावन जलको अपने मस्तकपर धारण किया है, जिससे जगत्की रक्षा हो ॥ ९ ॥
एतां भगवतीं देवीं भवन्तः सर्व एव हि ।
प्रयतेनात्मना तात प्रतिगम्याभिवादत ॥ १० ॥
तात! तुम सब लोग मनको संयममें रखते हुए इस ऐश्वर्यशालिनी दिव्य नदीके तटपर चलकर इसे सादर प्रणाम करो ॥ १० ॥
तस्य तद् वचनं श्रुत्वा लोमशस्य महात्मनः ।
आकाशगङ्गां प्रयताः पाण्डवास्तेऽभ्यवादयन् ॥ ११ ॥
महात्मा लोमशका यह वचन सुनकर सब पाण्डवोंने संयतचित्तसे भगवती आकाशगंगा (अलकनन्दा ) को प्रणाम किया ॥ ११ ॥
अभिवाद्य च ते सर्वे पाण्डवा धर्मचारिणः ।
पुनः प्रयाताः संहृष्टाः सर्वैर्ऋषिगणैः सह ॥ १२ ॥
प्रणाम करके धर्मका आचरण करनेवाले वे समस्त पाण्डव पुनः सम्पूर्ण ऋषि- मुनियोंके साथ हर्षपूर्वक आगे बढ़े ॥ १२ ॥
ततो दूरात् प्रकाशन्तं पाण्डुरं मेरुसंनिभम् ।
ददृशुस्ते नरश्रेष्ठा विकीर्णं सर्वतोदिशम् ॥ १३ ॥
तदनन्तर उन नरश्रेष्ठ पाण्डवोंने एक श्वेत पर्वत- सा देखा जो मेरुगिरिके समान दूरसे ही प्रकाशित हो रहा था । वह सम्पूर्ण दिशाओंमें बिखरा जान पड़ता था ॥ १३ ॥
तान् प्रष्टुकामान् विज्ञाय पाण्डवान् स तु लोमशः ।
उवाच वाक्यं वाक्यज्ञः शृणुध्वं पाण्डुनन्दनाः ॥ १४ ॥
लोमशजी ताड़ गये कि पाण्डवलोग उस श्वेत पर्वताकार वस्तुके विषयमें कुछ पूछना चाहते हैं, तब प्रवचनकी कला जाननेवाले उन महर्षिने कहा – ' पाण्डवो! सुनो ॥ १४ ॥
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एतद् विकीर्ण सुश्रीमत् कैलासशिखरोपमम् ।
यत् पश्यसि नरश्रेष्ठ पर्वतप्रतिमं स्थितम् ॥ १५ ॥
एतान्यस्थीनि दैत्यस्य नरकस्य महात्मनः ।
पर्वतप्रतिमं भाति पर्वतप्रस्तराश्रितम् ॥ १६ ॥
' नरश्रेष्ठ! यह जो सब ओर बिखरी हुई कैलासशिखरके समान सुन्दर प्रकाशयुक्त पर्वताकार वस्तु देख रहे हो, ये सब विशालकाय नरकासुरकी हड्डियाँ हैं । पर्वत और शिलाखण्डोंपर स्थित होनेके कारण ये भी पर्वतके समान ही प्रतीत होती हैं ॥ १५-१६ ॥
पुरातनेन देवेन विष्णुना परमात्मना ।
दैत्यो विनिहतस्तेन सुरराजहितैषिणा ॥ १७ ॥
‘पुरातन परमात्मा श्रीविष्णुदेवने देवराज इन्द्रका हित करनेकी इच्छासे उस दैत्यका वध किया था ॥ १७ ॥
दशवर्षसहस्राणि तपस्तप्यन् महामनाः ।
ऐन्द्रं प्रार्थयते स्थानं तपःस्वाध्यायविक्रमात् ॥ १८ ॥
‘ वह महामना दैत्य दस हजार वर्षोंतक कठोर तपस्या करके तप, स्वाध्याय और पराक्रमसे इन्द्रका स्थान लेना चाहता था ॥ १८ ॥
तपोबलेन महता बाहुवेगबलेन च ।
नित्यमेव दुराधर्षो धर्षयन् स दितेः सुतः ॥ १ ९ ॥
‘ अपने महान् तपोबल तथा वेगयुक्त बाहुबलसे वह देवताओंके लिये सदा अजेय बना रहता था और स्वयं सब देवताओंको सताया करता था ॥ १ ९ ॥
स तु तस्य बलं ज्ञात्वा धर्मे च चरितव्रतम् ।
भयाभिभूतः संविग्नः शक्र आसीत् तदानघ ॥ २० ॥
‘ निष्पाप युधिष्ठिर! नरकासुर बलवान् तो था ही, धर्मके लिये भी उसने कितने ही उत्तम व्रतोंका आचरण किया था, यह सब जानकर इन्द्रको बड़ा भय हुआ, वे घबरा उठे ॥ २० ॥
तेन संचिन्तितो देवो मनसा विष्णुरव्ययः ।
सर्वत्रगः प्रभुः श्रीमानागतश्च स्थितो बभौ ॥ २१ ॥
' तब उन्होंने मन-ही-मन अविनाशी भगवान् विष्णुका चिन्तन किया, उनके स्मरण करते ही सर्वव्यापी भगवान् श्रीपति वहाँ उपस्थित हो प्रकाशित हुए ॥ २१ ॥
ऋषयश्चापि तं सर्वे तुष्टुवुश्च दिवौकसः ।
तं दृष्ट्वा ज्वलमानश्रीर्भगवान् हव्यवाहनः ॥ २२ ॥
नष्टतेजाः समभवत् तस्य तेजोऽभिभर्त्सितः ।
तं दृष्ट्वा वरदं देवं विष्णुं देवगणेश्वरम् ॥ २३ ॥
प्राञ्जलिः प्रणतो भूत्वा नमस्कृत्य च वज्रभृत् ।
प्राह वाक्यं ततस्तत्त्वं यतस्तस्य भयं भवेत् ॥ २४ ॥
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‘ उस समय सभी देवताओं तथा ऋषियोंने उनकी स्तुति की । उन्हें देखते ही प्रज्वलित कान्तिसे सुशोभित भगवान् अग्निदेवका तेज नष्ट -सा हो गया । वे श्रीहरिके तेजसे तिरस्कृत हो गये । समस्त देवसमुदायके स्वामी एवं वरदायक भगवान् विष्णुका दर्शन करके वज्रधारी इन्द्रने उन्हें हाथ जोड़कर प्रणाम किया और बार- बार मस्तक झुकाया । तदनन्तर वे सारी बातें भगवान्से कह सुनायीं, जिनके कारण उन्हें उस दैत्यसे भय हो रहा था' ॥ २२— २४ ॥ विष्णुरुवाच
जानामि ते भयं शक्र दैत्येन्द्रान्नरकात् ततः ।
ऐन्द्रं प्रार्थयते स्थानं तपः सिद्धेन कर्मणा ॥ २५ ॥
तब भगवान् विष्णुने कहा - इन्द्र! मैं जानता हूँ, तुम्हें दैत्यराज नरकासुरसे भय प्राप्त हुआ है । वह अपने तपःसिद्ध कर्मोंद्वारा इन्द्रपदको लेना चाहता है ॥ २५ ॥
सोऽहमेनं तव प्रीत्या तपःसिद्धमपि ध्रुवम् ।
वियुनज्मि देहाद् देवेन्द्र मुहूर्तं प्रतिपालय ॥ २६ ॥
देवेन्द्र! यद्यपि तपस्याद्वारा उसे सिद्धि प्राप्त हो चुकी है तो भी मैं तुम्हारे प्रेमवश निश्चय ही उस दैत्यको मार डालूँगा, तुम थोड़ी देर और प्रतीक्षा करो ॥ २६ ॥
तस्य विष्णुर्महातेजाः पाणिना चेतनां हरत् ।
स पपात ततो भूमौ गिरिराज इवाहतः ॥ २७ ॥
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ऐसा कहकर महातेजस्वी भगवान् विष्णुने हाथसे मारकर उस दैत्यके प्राण हर लिये और वह वज्रके मारे हुए गिरिराजकी भाँति पृथ्वीपर गिर पड़ा ॥ २७ ॥
तस्यैतदस्थिसंघातं मायाविनिहतस्य वै ।
इदं द्वितीयमपरं विष्णोः कर्म प्रकाशते ॥ २८ ॥
इस प्रकार मायाद्वारा मारे गये उस दैत्यकी हड्डियोंका यह समूह दिखायी देता है । अब मैं भगवान् विष्णुका यह दूसरा पराक्रम बता रहा हूँ, जो सर्वत्र प्रकाशमान है ॥ २८ ॥
नष्टा वसुमती कृत्स्ना पाताले चैव मज्जिता ।
पुनरुद्धरिता तेन वाराहेणैकशृङ्गिणा ॥ २ ९ ॥
एक समय सारी पृथ्वी एकार्णवके जलमें डूबकर अदृश्य हो गयी, पातालमें डूब गयी । उस समय भगवान् विष्णुने पर्वतशिखरके सदृश एक दाँतवाले वाराहका रूप धारण करके पुनः इसका उद्धार किया था ॥ २ ९ ॥ युधिष्ठिर उवाच
भगवन् विस्तरेणेमां कथां कथय तत्त्वतः ।
कथं तेन सुरेशेन नष्टा वसुमती तदा ॥ ३० ॥
योजनानां शतं ब्रह्मन् पुनरुद्धरिता तदा ।
केन चैव प्रकारेण जगतो धरणी ध्रुवा ॥ ३१ ॥
युधिष्ठिरने पूछा — भगवन्! देवेश्वर भगवान् विष्णुने पातालमें सैकड़ों योजन नीचे डूबी हुई इस पृथ्वीका पुनरुद्धार किस प्रकार किया? आप इस कथाको यथार्थरूपसे और विस्तारपूर्वक कहिये । जगत्का भार धारण करनेवाली इस अचला पृथ्वीका उद्धार करनेके लिये उन्होंने किस उपायका अवलम्बन किया? ॥ ३०-३१ ॥
शिवा देवी महाभागा सर्वसस्यप्ररोहिणी ।
कस्य चैव प्रभावाद्धि योजनानां शतं गता ॥ ३२ ॥
सम्पूर्ण शस्योंका उत्पादन करनेवाली यह कल्याणमयी महाभागा वसुधादेवी किसके प्रभावसे सैकड़ों योजन नीचे धँस गयी थी ॥ ३२ ॥
केन तद् वीर्यसर्वस्वं दर्शितं परमात्मनः ।
एतत् सर्वं यथातत्त्वमिच्छामि द्विजसत्तम ।
श्रोतुं विस्तरशः सर्वं त्वं हि तस्य प्रतिश्रयः ॥ ३३ ॥
परमात्माके उस अद्भुत पराक्रमका दर्शन (ज्ञान) किसने कराया था? द्विजश्रेष्ठ! यह सब मैं यथार्थरूपसे विस्तारपूर्वक सुनना चाहता हूँ। आप इस वृत्तान्तके आश्रय (ज्ञाता ) हैं ॥ ३३ ॥
लोमशउवाच यत् तेऽहं परिपृष्टोऽस्मि कथामेतां युधिष्ठिर ।
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तत् सर्वमखिलेनेह श्रूयतां मम भाषतः ॥ ३४ ॥
लोमशजीने कहा - युधिष्ठिर! तुमने जिसके विषयमें मुझसे प्रश्न किया है, वह कथा —वह सारा वृत्तान्त मैं बता रहा हूँ, सुनो ॥ ३४ ॥
पुरा कृतयुगे तात वर्तमाने भयंकरे ।
यमत्वं कारयामास आदिदेवः पुरातनः ॥ ३५ ॥
तात! इस कल्पके प्रथम सत्ययुगकी बात है, एक समय बड़ी भयंकर परिस्थिति उत्पन्न हो गयी थी । उस समय आदिदेव पुरातन पुरुष भगवान् श्रीहरि ही यमराजका भी कार्य सम्पन्न करते थे ॥ ३५ ॥
यमत्वं कुर्वतस्तस्य देवदेवस्य धीमतः ।
न तत्र म्रियते कश्चिज्जायते वा तथाप्युत ॥ ३६ ॥
युधिष्ठिर! परम बुद्धिमान् देवदेव भगवान् श्रीहरिके यमराजका कार्य सँभालते समय किसी भी प्राणीकी मृत्यु नहीं होती थी; परंतु उत्पत्तिका कार्य पूर्ववत् चलता रहा ॥
वर्धन्ते पक्षिसंघाश्च तथा पशुगवेडकम् ।
गवाश्वं च मृगाश्चैव सर्वे ते पिशिताशनाः ॥ ३७ ॥
फिर तो पक्षियोंके समूह बढ़ने लगे । गाय, बैल, भेड़ - बकरे आदि पशु, घोड़े, मृग तथा मांसाहारी जीव सभी बढ़ने लगे ॥ ३७ ॥
तथा पुरुषशार्दूल मानुषाश्च परंतप ।
सहस्रशो ह्ययुतशो वर्धन्ते सलिलं यथा ॥ ३८ ॥
शत्रुओंको संताप देनेवाले नरश्रेष्ठ! जैसे बरसातमें पानी बढ़ता है, उसी प्रकार मनुष्य भी हजार एवं दस हजार गुनी संख्यामें बढ़ने लगे ॥ ३८ ॥
एतस्मिन् संकुले तात वर्तमाने भयंकरे ।
अतिभाराद् वसुमती योजनानां शतं गता ॥ ३ ९ ॥
तात! इस प्रकार सब प्राणियोंकी वृद्धि होनेसे जब बड़ी भयंकर अवस्था आ गयी तब अत्यन्त भारसे दबकर यह पृथ्वी सैकड़ों योजन नीचे चली गयी ॥ ३ ९ ॥
सा वै व्यथितसर्वाङ्गी भारेणाक्रान्तचेतना ।
नारायणं वरं देवं प्रपन्ना शरणं गता ॥ ४० ॥
भारी भारके कारण पृथ्वी देवीके सम्पूर्ण अंगोंमें बड़ी पीड़ा हो रही थी । उसकी चेतना लुप्त होती जा रही थी। अतः वह सर्वश्रेष्ठ देवता भगवान् नारायणकी शरणमें गयी ॥ ४० ॥
पृथिव्युवाच
भगवंस्त्वत्प्रसादाद्धि तिष्ठेयं सुचिरं त्विह ।
भारेणास्मि समाक्रान्ता न शक्नोमि स्म वर्तितुम् ॥ ४१ ॥
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पृथ्वी बोली - भगवन्! आप ऐसी कृपा करें जिससे मैं दीर्घ कालतक यहाँ स्थिर रह सकूँ । इस समय मैं भारसे इतनी दब गयी हूँ कि जीवन धारण नहीं कर सकती ॥ ४१ ॥
ममेमं भगवन् भारं व्यपनेतुं त्वमर्हसि ।
शरणागतास्मि ते देव प्रसादं कुरु मे विभो ॥ ४२ ॥
भगवन्! मेरे इस भारको आप दूर करनेकी कृपा करें । देव! मैं आपकी शरणमें आयी हूँ । विभो! मुझपर कृपाप्रसाद कीजिये ॥ ४२ ॥
तस्यास्तद् वचनं श्रुत्वा भगवानक्षरः प्रभुः ।
प्रोवाच वचनं हृष्टः श्रव्याक्षरसमीरितम् ॥ ४३ ॥
पृथ्वीका यह वचन सुनकर अविनाशी भगवान् नारायणने प्रसन्न होकर श्रवणमधुर अक्षरोंसे युक्त मीठी वाणीमें कहा ॥ ४३ ॥
विष्णुरुवाच
न ते महि भयं कार्यं भारार्ते वसुधारिणि ।
अहमेवं तथा कुर्मि यथा लघ्वी भविष्यसि ॥ ४४ ॥
भगवान् विष्णु बोले— वसुधे! तू भारसे पीड़ित है; किंतु अब उसके लिये भय न कर ।
मैं अभी ऐसा उपाय करता हूँ जिससे तू हलकी हो जायगी ॥ ४४ ॥
लोमशउवाच
स तां विसर्जयित्वा तु वसुधां शैलकुण्डलाम् ।
ततो वराहः संवृत्त एकशृङ्गो महाद्युतिः ॥ ४५ ॥
लोमशजी कहते हैं - युधिष्ठिर! पर्वतरूपी कुण्डलोंसे विभूषित वसुधादेवीको विदा करके महातेजस्वी भगवान् विष्णुने वाराहका रूप धारण कर लिया । उस समय उनके एक ही दाँत था, जो पर्वत - शिखरके समान सुशोभित होता था ॥ ४५ ॥
रक्ताभ्यां नयनाभ्यां तु भयमुत्पादयन्निव ।
धूमं च ज्वलयँल्लक्ष्म्या तत्र देशे व्यवर्धत ॥ ४६ ॥
वे अपने लाल - लाल नेत्रोंसे मानो भय उत्पन्न कर रहे थे और अपनी अंगकान्तिसे धूम प्रकट करते हुए उस स्थानपर बढ़ने लगे ॥ ४६ ॥
स गृहीत्वा वसुमतीं शृङ्गेणैकेन भास्वता ।
योजनानां शतं वीर समुद्धरति सोऽक्षरः ॥ ४७ ॥
वीर युधिष्ठिर! अविनाशी भगवान् विष्णुने अपने एक ही तेजस्वी दाँतके द्वारा पृथ्वीको थामकर उसे सौ योजन ऊपर उठा दिया ॥ ४७ ॥
तस्यां चोद्धार्यमाणायां संक्षोभः समजायत ।
देवाः संक्षुभिताः सर्वे ऋषयश्च तपोधनाः ॥ ४८ ॥
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पृथ्वीको उठाते समय सब ओर भारी हलचल मच गयी । सम्पूर्ण देवता तथा तपस्वी ऋषि क्षुब्ध हो उठे ॥
हाहाभूतमभूत् सर्वं त्रिदिवं व्योम भूस्तथा ।
न पर्यवस्थितः कश्चिद् देवो वा मानुषोऽपि वा ॥ ४ ९ ॥
ततो ब्रह्माणमासीनं ज्वलमानमिव श्रिया ।
देवाः सर्षिगणाश्चैव उपतस्थुरनेकशः ॥ ५० ॥
स्वर्ग, अन्तरिक्ष तथा भूलोक सबमें अत्यन्त हाहाकार मच गया । कोई भी देवता या मनुष्य स्थिर नहीं रह सका । तब अनेक देवता और ऋषि ब्रह्माजीके समीप गये । उस समय ' अपने आसनपर बैठकर दिव्य कान्तिसे प्रकाशित हो रहे थे ॥ ४ ९ -५० ॥
उपसर्प्य च देवेशं ब्रह्माणं लोकसाक्षिकम् ।
भूत्वा प्राञ्जलयः सर्वे वाक्यमुच्चारयंस्तदा ॥ ५१ ॥
लोकसाक्षी देवेश्वर ब्रह्माके निकट पहुँचकर सबने हाथ जोड़कर प्रणाम किया और कहा— ॥ ५१ ॥
लोकाः संक्षुभिताः सर्वे व्याकुलं च चराचरम् ।
समुद्राणां च संक्षोभस्त्रिदशेश प्रकाशते ॥ ५२ ॥
‘ देवेश्वर! सम्पूर्ण लोकोंमें हलचल मच गयी है । चर और अचर सभी प्राणी व्याकुल हैं । समुद्रोंमें बड़ा भारी क्षोभ दिखायी दे रहा है ॥ ५२ ॥
सैषा वसुमती कृत्स्ना योजनानां शतं गता ।
किमेतद् किं प्रभावेण येनेदं व्याकुलं जगत् ।
अख्यातु नो भवान् शीघ्रं विसंज्ञाः स्मेह सर्वशः ॥ ५३ ॥
‘ यह सारी पृथ्वी सैकड़ों योजन नीचे चली गयी थी, अब यह किसके प्रभावसे कौन - सी अद्भुत घटना घटित हो रही है जिससे सारा संसार व्याकुल हो उठा है । आप शीघ्र हमें इसका कारण बताइये । हम सब लोग अचेत - से हो रहे हैं ' ॥ ५३ ॥
ब्रह्मोवाच
असुरेभ्यो भयं नास्ति युष्माकं कुत्रचित् क्वचित् ।
श्रूयतां यत्कृतेष्वेष संक्षोभो जायतेऽमराः ॥ ५४ ॥
योऽसौ सर्वत्रगः श्रीमानक्षरात्मा व्यवस्थितः ।
तस्य प्रभावात् संक्षोभस्त्रिदिवस्य प्रकाशते ॥ ५५ ॥
ब्रह्माजीने कहा- देवताओ! तुम्हें असुरोंसे कभी और कोई भय नहीं है । यह जो चारों ओर क्षोभ फैल रहा है, इसका क्या कारण है? वह सुनो । वे जो सर्वव्यापी अक्षरस्वरूप श्रीमान् भगवान् नारायण हैं, उन्हींके प्रभावसे यह स्वर्गलोकमें क्षोभ प्रकट हो रहा है ॥ ५४-५५ ॥
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यैषा वसुमती कृत्स्ना योजनानां शतं गता ।
समुद्धृता पुनस्तेन विष्णुना परमात्मना ॥ ५६ ॥
यह सारी पृथ्वी, जो सैकड़ों योजन नीचे चली गयी थी, इसे परमात्मा श्रीविष्णुने पुनः ऊपर उठाया है ॥ ५६ ॥
तस्यामुद्धार्यमाणायां संक्षोभः समजायत ।
एवं भवन्तो जानन्तु छिद्यतां संशयश्च वः ॥ ५७ ॥
इस पृथ्वीका उद्धार करते समय ही सब ओर यह महान् क्षोभ प्रकट हुआ है । इस प्रकार तुम्हें इस विश्वव्यापी हलचलका यथार्थ कारण ज्ञात होना और तुम्हारा आन्तरिक संशय दूर हो जाना चाहिये ॥ ५७ ॥
देवा ऊचुः
क्व तद् भूतं वसुमतीं समुद्धरति हृष्टवत् ।
तं देशं भगवन् ब्रूहि तत्र यास्यामहे वयम् ॥ ५८ ॥
देवता बोले — भगवन्! वे वाराहरूपधारी भगवान् प्रसन्न- से होकर कहाँ पृथ्वीका उद्धार कर रहे हैं, उस प्रदेशका पता हमें बताइये; हम सब लोग वहाँ जायँगे ॥ ५८ ॥
ब्रह्मोवाच
हन्त गच्छत भद्रं वो नन्दने पश्यत स्थितम् ।
एषोऽत्र भगवान् श्रीमान् सुपर्णः सम्प्रकाशते ॥ ५ ९ ॥
वाराहेणैव रूपेण भगवाँल्लोकभावनः ।
कालानल इवाभाति पृथिवीतलमुद्धरन् ॥ ६० ॥
ब्रह्माजीने कहा- देवताओ! बड़े हर्षकी बात है, जाओ । तुम्हारा कल्याण हो । भगवान् नन्दनवनमें विराजमान हैं । वहीं उनका दर्शन करो । उस वनके निकट ये स्वर्णके समान सुन्दर रोमवाले परम कान्तिमान् विश्वभावन भगवान् श्रीविष्णु वाराहरूपसे प्रकाशित हो रहे हैं । भूतलका उद्धार करते हुए वे प्रलयकालीन अग्निके समान उद्भासित होते हैं ॥ ५ ९ -६० ॥
एतस्योरसि सुव्यक्तं श्रीवत्समभिराजते ।
पश्यध्वं विबुधाः सर्वे भूतमेतदनामयम् ॥ ६१ ॥
इनके वक्षःस्थलमें स्पष्टरूपसे श्रीवत्सचिह्न प्रकाशित हो रहा है । देवताओ! ये रोग-शोकसे रहित साक्षात् भगवान् ही वाराहरूपसे प्रकट हुए हैं, तुम सब लोग इनका दर्शन करो ॥ ६१ ॥
लोमश उवाच ततो दृष्ट्वा महात्मानं श्रुत्वा चामन्त्र्य चामराः ।
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पितामहं पुरस्कृत्य जग्मुर्देवा यथागतम् ॥ ६२ ॥
लोमशजी कहते हैं - युधिष्ठिर! तदनन्तर देवताओंने जाकर वाराहरूपधारी परमात्मा श्रीविष्णुका दर्शन किया, उनकी महिमा सुनी और उनकी आज्ञा लेकर वे ब्रह्माजीको आगे करके जैसे आये थे वैसे लौट गये ॥ ६२ ॥
वैशम्पायन उवाच
श्रुत्वा तु तां कथां सर्वे पाण्डवा जनमेजय ।
लोमशादेशितेनाशु पथा जग्मुः प्रहृष्टवत् ॥ ६३ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं— जनमेजय! यह कथा सुनकर सब पाण्डव बड़े प्रसन्न हुए और लोमशजीके बताये हुए मार्गसे शीघ्रतापूर्वक आगे बढ़ गये ॥ ६३ ॥
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि तीर्थयात्रापर्वणि लोमशतीर्थयात्रायां गन्धमादनप्रवेशे द्विचत्वारिंशदधिकशततमोऽध्यायः ॥ १४२ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत तीर्थयात्रापर्वमें लोमशतीर्थयात्राके प्रसंगमें गन्धमादनप्रवेशविषयक एक सौ बयालीसवाँअध्याय पूरा हुआ ॥ १४२ ॥
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