श्रीगणेशाय नमः।

महाभारत — खण्ड ३ — पृष्ठ 1071–1080

महाभारत — खण्ड ३ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1071–1080

पृष्ठ 1071

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सप्तषष्ट्यधिकशततमोऽध्यायः कौरवपक्षके रथी, महारथी और अतिरथियोंका वर्णन भीष्म उवाच

शकुनिर्मातुलस्तेऽसौ रथ एको नराधिप ।

प्रयुज्य पाण्डवैर्वैरं योत्स्यते नात्र संशयः ॥ १ ॥

भीष्मने कहा — नरेश्वर! यह तुम्हारा मामा शकुनि भी एक रथी है । यह पाण्डवोंसे वैर बाँधकर युद्ध करेगा, इसमें संशय नहीं है ॥ १ ॥

एतस्य सेना दुर्धर्षा समरे प्रतियायिनः ।

विकृतायुधभूयिष्ठा वायुवेगसमा जवे ॥ २ ॥

युद्धमें डटकर शत्रुओंका सामना करनेवाले इस शकुनिकी सेना दुर्धर्ष है । इसका वेग वायुके समान है तथा यह विविध आकारवाले अनेक आयुधोंसे विभूषित है ॥ २ ॥

द्रोणपुत्रो महेष्वासः सर्वानेवाति धन्विनः ।

समरे चित्रयोधी च दृढास्त्रश्च महारथः ॥ ३ ॥

महाधनुर्धर द्रोणपुत्र अश्वत्थामा तो सभी धनुर्धरोंसे बढ़कर है । वह युद्धमें विचित्र ढंगसे शत्रुओंका सामना करनेवाला, सुदृढ़ अस्त्रोंसे सम्पन्न तथा महारथी है ॥ ३ ॥

एतस्य हि महाराज यथा गाण्डीवधन्वनः ।

शरासनविनिर्मुक्ताः संसक्ता यान्ति सायकाः ॥ ४ ॥

महाराज! गाण्डीवधारी अर्जुनकी भाँति इसके धनुषसे एक साथ छूटे हुए बहुत- से बाण भी परस्पर सटे हुए ही लक्ष्यतक पहुँचते हैं ॥ ४ ॥

नैष शक्यो मया वीरः संख्यातुं रथसत्तमः ।

निर्दहेदपि लोकांस्त्रीनिच्छन्नेष महारथः ॥ ५ ॥

रथियोंमें श्रेष्ठ इस वीर पुरुषके महत्त्वकी गणना नहीं की जा सकती । यह महारथी चाहे, तो तीनों लोकोंको दग्ध कर सकता है ॥ ५ ॥

क्रोधस्तेजश्च तपसा सम्भृतोऽऽश्रमवासिनाम् ।

द्रोणेनानुगृहीतश्च दिव्यैरस्त्रैरुदारधीः ॥ ६ ॥

इसमें क्रोध है, तेज है और आश्रमवासी महर्षियोंके योग्य तपस्या भी संचित है । इसकी बुद्धि उदार है । द्रोणाचार्यने सम्पूर्ण दिव्यास्त्रोंका ज्ञान देकर इसपर महान् अनुग्रह किया ॥ ६ ॥

दोषस्त्वस्य महानेको येनैव भरतर्षभ ।

न मे रथो नातिरथो मतः पार्थिवसत्तम ॥ ७ ॥

पृष्ठ 1072

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किंतु भरतश्रेष्ठ! नृपशिरोमणे! इसमें एक ही बहुत बड़ा दोष है, जिससे मैं इसे न तो अतिरथी मानता हूँ और न रथी ही ॥ ७ ॥

जीवितं प्रियमत्यर्थमायुष्कामः सदा द्विजः ।

न ह्यस्य सदृशः कश्चिदुभयोः सेनयोरपि ॥ ८ ॥

इस ब्राह्मणको अपना जीवन बहुत प्रिय है, अतः यह सदा दीर्घायु बना रहना चाहता है ( यही इसका दोष है ) । अन्यथा दोनों सेनाओंमें इसके समान शक्तिशाली कोई नहीं है ॥ ८ ॥

हन्यादेकरथेनैव देवानामपि वाहिनीम् ।

वपुष्मांस्तलघोषेण स्फोटयेदपि पर्वतान् ॥ ९ ॥

यह एकमात्र रथका सहारा लेकर देवताओंकी सेनाका भी संहार कर सकता है । इसका शरीर हृष्ट- पुष्ट एवं विशाल है । यह अपनी तालीकी आवाजसे पर्वतोंको भी विदीर्ण कर सकता है ॥ ९ ॥

असंख्येयगुणो वीरः प्रहर्ता दारुणद्युतिः ।

दण्डपाणिरिवासह्यः कालवत् प्रचरिष्यति ॥ १० ॥

इस वीरमें असंख्य गुण हैं । यह प्रहार करनेमें कुशल और भयंकर तेजसे सम्पन्न है; अतः दण्डधारी कालके समान असह्य होकर युद्धभूमिमें विचरण करेगा ॥ १० ॥

युगान्ताग्निसमः क्रोधात् सिंहग्रीवो महाद्युतिः ।

एष भारतयुद्धस्य पृष्ठं संशमयिष्यति ॥ ११ ॥

क्रोधमें यह प्रलयकालकी अग्निके समान जान पड़ता है । इसकी ग्रीवा सिंहके समान है । यह महातेजस्वी अश्वत्थामा महाभारत - युद्धके शेषभागका शमन करेगा ॥ ११ ॥

पिता त्वस्य महातेजा वृद्धोऽपि युवभिर्वरः ।

कर्म महत् कर्ता अत्र मे नास्ति संशयः ॥ १२ ॥

अश्वत्थामाके पिता द्रोणाचार्य महान् तेजस्वी हैं । ये बूढ़े होनेपर भी नवयुवकोंसे अच्छे हैं । इस युद्धमें ये अपना महान् पराक्रम प्रकट करेंगे, इसमें मुझे संशय नहीं है ॥ १२ ॥

अस्त्रवेगानिलोद्भूतः सेनाकक्षेन्धनोत्थितः ।

पाण्डुपुत्रस्य सैन्यानि प्रधक्ष्यति रणे धृतः ॥ १३ ॥

समरभूमिमें डटे हुए द्रोणाचार्य अग्निके समान हैं । अस्त्रवेगरूपी वायुका सहारा पाकर ये उद्दीप्त होंगे और सेनारूपी घास- फूस तथा ईंधनोंको पाकर प्रज्वलित हो उठेंगे । इस प्रकार ये प्रज्वलित होकर पाण्डुपुत्र युधिष्ठिरकी सेनाओंको जलाकर भस्म कर डालेंगे ॥ १३ ॥

रथयूथपयूथानां यूथपोऽयं नरर्षभः ।

भारद्वाजात्मजः कर्ता कर्म तीव्रं हितं तव ॥ १४ ॥

पृष्ठ 1073

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ये नरश्रेष्ठ भरद्वाजनन्दन रथयूथपतियोंके समुदायके भी यूथपति हैं । ये तुम्हारे हितके लिये तीव्र पराक्रम प्रकट करेंगे ॥ १४ ॥

सर्वमूर्धाभिषिक्तानामाचार्यः स्थविरो गुरुः ।

गच्छेदन्तं सृ॑जयानां प्रियस्त्वस्य धनंजयः ॥ १५ ॥

सम्पूर्ण मूर्धाभिषिक्त राजाओंके ये आचार्य एवं वृद्ध गुरु हैं । ये सृजयवंशी क्षत्रियोंका विनाश कर डालेंगे; परंतु अर्जुन इन्हें बहुत प्रिय हैं ॥ १५ ॥

नैष जातु महेष्वासः पार्थमक्लिष्टकारिणम् ।

हन्यादाचार्यकं दीप्तं संस्मृत्य गुणनिर्जितम् ॥ १६ ॥

महाधनुर्धर द्रोणाचार्यका समुज्ज्वल आचार्यभाव अर्जुनके गुणोंद्वारा जीत लिया गया है । उसका स्मरण करके ये अनायास ही महान् कर्म करनेवाले कुन्तीपुत्र अर्जुनको कदापि नहीं मारेंगे ॥ १६ ॥

श्लाघतेऽयं सदा वीर पार्थस्य गुणविस्तरैः ।

पुत्रादभ्यधिकं चैनं भारद्वाजोऽनुपश्यति ॥ १७ ॥

वीर! ये आचार्य द्रोण अर्जुनके गुणोंका विस्तारपूर्वक उल्लेख करते हुए सदा उनकी प्रशंसा करते हैं और उन्हें पुत्रसे भी अधिक प्रिय मानते हैं ॥ १७ ॥

हन्यादेकरथेनैव देवगन्धर्वमानुषान् ।

एकीभूतानपि रणे दिव्यैरस्त्रैः प्रतापवान् ॥ १८ ॥

प्रतापी द्रोणाचार्य एकमात्र रथका ही आश्रय ले रणभूमिमें एकत्र एवं एकीभूत हुए सम्पूर्ण देवताओं, गन्धर्वों और मनुष्योंको अपने दिव्यास्त्रोंद्वारा नष्ट कर सकते हैं ॥

पौरवो राजशार्दूलस्तव राजन् महारथः ।

मतो मम रथोदारः परवीररथारुजः ॥ १ ९ ॥

राजन्! तुम्हारी सेनामें जो नृपश्रेष्ठ पौरव हैं, वे मेरे मतमें रथियोंमें उदार महारथी हैं । वे विपक्षके वीर रथियोंको पीड़ा देनेमें समर्थ हैं ॥ १ ९ ॥

स्वेन सैन्येन महता प्रतपन् शत्रुवाहिनीम् ।

प्रधक्ष्यति स पञ्चालान् कक्षमग्निगतिर्यथा ॥ २० ॥

राजा पौरव अपनी विशाल सेनाके द्वारा शत्रुवाहिनीको संतप्त करते हुए पांचालोंको उसी प्रकार भस्म कर डालेंगे, जैसे आग घास- फूसको ॥ २० ॥

सत्यश्रवा रथस्त्वेको राजपुत्रो बृहद्बलः ।

तव राजन् रिपुबले कालवत् प्रचरिष्यति ॥ २१ ॥

राजन्! राजकुमार बृहद्बल भी एक रथी हैं । संसारमें उनकी सच्ची कीर्तिका विस्तार हुआ है। वे तुम्हारे शत्रुओंकी सेनामें कालके समान विचरेंगे ॥ २१ ॥

एतस्य योधा राजेन्द्र विचित्रकवचायुधाः ।

विचरिष्यन्ति संग्रामे निघ्नन्तः शात्रवांस्तव ॥ २२ ॥

पृष्ठ 1074

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राजेन्द्र! उनके सैनिक विचित्र कवच और अस्त्र - शस्त्र धारण करके तुम्हारे शत्रुओंका संहार करते हुए संग्रामभूमिमें विचरण करेंगे ॥ २२ ॥

वृषसेनो रथस्तेऽग्र्यः कर्णपुत्रो महारथः ।

प्रधक्ष्यति रिपूणां ते बलं तु बलिनां वरः ॥ २३ ॥

कर्णका पुत्र वृषसेन भी तुम्हारी सेनाका एक श्रेष्ठ रथी है । इसे महारथी भी कह सकते हैं । बलवानोंमें श्रेष्ठ वृषसेन तुम्हारे वैरियोंकी विशाल वाहिनीको भस्म कर डालेगा ॥ २३ ॥

जलसंधो महातेजा राजन् रथवरस्तव ।

त्यक्ष्यते समरे प्राणान् माधवः परवीरहा ॥ २४ ॥

राजन्! शत्रुवीरोंका संहार करनेवाले मधुवंशी महातेजस्वी जलसंध तुम्हारी सेनामें श्रेष्ठ रथी हैं । ये तुम्हारे लिये युद्धमें अपने प्राणतक दे डालेंगे ॥ २४ ॥

एष योत्स्यति संग्रामे गजस्कन्धविशारदः ।

रथेन वा महाबाहुः क्षपयन् शत्रुवाहिनीम् ॥ २५ ॥

महाबाहु जलसंध रथ अथवा हाथीकी पीठपर बैठकर युद्ध करनेमें कुशल हैं । ये संग्राममें शत्रुसेनाका संहार करते हुए लड़ेंगे ॥ २५ ॥

रथ एष महाराज मतो मे राजसत्तम ।

त्वदर्थे त्यक्ष्यते प्राणान् सहसैन्यो महारणे ॥ २६ ॥

महाराज! नृपश्रेष्ठ! ये मेरे मतमें रथी ही हैं और इस महायुद्धमें तुम्हारे लिये अपनी सेनासहित प्राणत्याग करेंगे ॥ २६ ॥

एष विक्रान्तयोधी च चित्रयोधी च सङ्गरे ।

वीतभीश्चापि ते राजन् शत्रुभिः सह योत्स्यते ॥ २७ ॥

राजन्! ये समरांगणमें महान् पराक्रम प्रकट करते हुए विचित्र ढंगसे युद्ध करनेवाले हैं । ये तुम्हारे शत्रुओंके साथ निर्भय होकर युद्ध करेंगे ॥ २७ ॥

बाह्लीकोऽतिरथश्चैव समरे चानिवर्तनः ।

मम राजन् मतो युद्धे शूरो वैवस्वतोपमः ॥ २८ ॥

बाह्लीक अतिरथी वीर हैं । ये युद्धसे कभी पीछे नहीं हटते हैं । राजन्! मैं समरभूमिमें इन्हें यमराजके समान शूरवीर मानता हूँ ॥ २८ ॥

न ह्येष समरं प्राप्य निवर्तेत कथञ्चन ।

यथा सततगो राजन् स हि हन्यात् परान् रणे ॥ २ ९ ॥

ये रणक्षेत्रमें पहुँचकर किसी तरह पीछे पैर नहीं हटा सकते । राजन्! ये वायुके समान वेगसे रणभूमिमें शत्रुओंको मारेंगे ॥ २ ९ ॥

सेनापतिर्महाराज सत्यवांस्ते महारथः ।

रणेष्वद्भुतकर्मा च रथी पररथारुजः ॥ ३० ॥

पृष्ठ 1075

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महाराज! रथारूढ हो युद्धमें अद्भुत पराक्रम दिखाने और शत्रुपक्षके रथियोंको मार भगानेवाले तुम्हारे सेनापति सत्यवान् भी महारथी हैं ॥ ३० ॥

एतस्य समरं दृष्ट्वा न व्यथास्ति कथञ्चन ।

उत्स्मयन्नुत्पतत्येष परान् रथपथे स्थितान् ॥ ३१ ॥

युद्ध देखकर इनके मनमें किसी प्रकार भी भय एवं दुःख नहीं होता । ये रथके मार्गमें खड़े हुए शत्रुओंपर हँसते -हँसते कूद पड़ते हैं ॥ ३१ ॥

एष चारिषु विक्रान्तः कर्म सत्पुरुषोचितम् ।

कर्ता विमर्दे सुमहत् त्वदर्थे पुरुषोत्तमः ॥ ३२ ॥

पुरुषश्रेष्ठ सत्यवान् शत्रुओंपर महान् पराक्रम दिखाते हैं । ये युद्धमें तुम्हारे लिये श्रेष्ठ पुरुषोंके योग्य महान् कर्म करेंगे ॥ ३२ ॥

अलम्बुषो राक्षसेन्द्रः क्रूरकर्मा महारथः ।

हनिष्यति परान् राजन् पूर्ववैरमनुस्मरन् ॥ ३३ ॥

क्रूरकर्मा राक्षसराज अलम्बुष भी महारथी है । राजन्! यह पहलेके वैरको याद करके शत्रुओंका संहार करेगा ॥ ३३ ॥

एष राक्षससैन्यानां सर्वेषां रथसत्तमः ।

मायावी दृढवैरश्च समरे विचरिष्यति ॥ ३४ ॥

मायावी, वैरभावको दृढ़तापूर्वक सुरक्षित रखनेवाला तथा समस्त राक्षस सैनिकोंमें श्रेष्ठ रथी यह अलम्बुष संग्रामभूमिमें ( निर्भय होकर ) विचरेगा ॥ ३४ ॥

प्राग्ज्योतिषाधिपो वीरो भगदत्तः प्रतापवान् ।

गजाङ्कुशधरश्रेष्ठो रथे चैव विशारदः ॥ ३५ ॥

प्राग्ज्योतिषपुरके राजा भगदत्त बड़े वीर और प्रतापी हैं। हाथमें अंकुश लेकर हाथियोंको काबूमें रखनेवाले वीरोंमें इनका सबसे ऊँचा स्थान है । ये रथयुद्धमें भी कुशल हैं ॥ ३५ ॥

एतेन युद्धमभवत् पुरा गाण्डीवधन्वनः ।

दिवसान् सुबहून् राजन्नुभयोर्जयगृद्धिनोः ॥ ३६ ॥

राजन्! पहले इनके साथ गाण्डीवधारी अर्जुनका युद्ध हुआ था । उस संग्राममें दोनों अपनी- अपनी विजय चाहते हुए बहुत दिनोंतक लड़ते रहे ॥ ३६ ॥

ततः सखायं गान्धारे मानयन् पाकशासनम् ।

अकरोत् संविदं तेन पाण्डवेन महात्मना ॥ ३७ ॥

गान्धारीकुमार! कुछ दिनों बाद भगदत्तने अपने सखा इन्द्रका सम्मान करते हुए महात्मा पाण्डुनन्दन अर्जुनके साथ संधि कर ली थी ॥ ३७ ॥

एष योत्स्यति संग्रामे गजस्कन्धविशारदः ।

ऐरावतगतो राजा देवानामिव वासवः ॥ ३८ ॥

पृष्ठ 1076

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राजा भगदत्त हाथीकी पीठपर बैठकर युद्ध करनेमें अत्यन्त कुशल हैं । ये ऐरावतपर बैठे हुए देवराज इन्द्रके समान संग्राममें तुम्हारे शत्रुओंके साथ युद्ध करेंगे ॥ ३८ ॥

इति श्रीमहाभारते उद्योगपर्वणि रथातिरथसंख्यानपर्वणि सप्तषष्ट्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १६७ ॥

इसप्रकार श्रीमहाभारत उद्योगपर्वके अन्तर्गत रथातिरथसंख्यानपर्वमें एक सौ सरसठवाँ अध्याय पूराहुआ ॥ १६७ ॥

Card

पृष्ठ 1077

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अष्टषष्ट्यधिकशततमोऽध्यायः कौरवपक्षके रथियों और अतिरथियोंका वर्णन, कर्ण और भीष्मका रोषपूर्वक संवाद तथा दुर्योधनद्वारा उसका निवारण भीष्म उवाच

अचलो वृषकश्चैव सहितौ भ्रातरावुभौ ।

रथौ तव दुराधर्षौ शत्रून् विध्वंसयिष्यतः ॥ १ ॥

भीष्म कहते हैं - अचल और वृषक– ये साथ रहनेवाले दोनों भाई दुर्धर्ष रथी हैं, जो तुम्हारे शत्रुओंका विध्वंस कर डालेंगे ॥ १ ॥

बलवन्तौ नरव्याघ्रौ दृढक्रोधौ प्रहारिणौ ।

गान्धारमुख्यौ तरुणौ दर्शनीयौ महाबलौ ॥ २ ॥

गान्धारदेशके ये प्रधान वीर मनुष्योंमें सिंहके समान पराक्रमी, बलवान्, अत्यन्त क्रोधी, प्रहार करनेमें कुशल, तरुण, दर्शनीय एवं महाबली हैं ॥ २ ॥

सखा ते दयितो नित्यं य एष रणकर्कशः ।

उत्साहयति राजंस्त्वां विग्रहे पाण्डवैः सह ॥ ३ ॥

परुषः कत्थनो नीचः कर्णो वैकर्तनस्तव ।

मन्त्री नेता च बन्धुश्च मानी चात्यन्तमुच्छ्रितः ॥ ४ ॥

राजन्! यह जो तुम्हारा प्रिय सखा कर्ण है, जो तुम्हें पाण्डवोंके साथ युद्धके लिये सदा उत्साहित करता रहता है और रणक्षेत्रमें सदा अपनी क्रूरताका परिचय देता है, बड़ा ही कटुभाषी, आत्मप्रशंसी और नीच है । यह कर्ण तुम्हारा मन्त्री, नेता और बन्धु बना हुआ है । यह अभिमानी तो है ही, तुम्हारा आश्रय पाकर बहुत ऊँचे चढ़ गया है ॥ ३-४ ॥

एष नैव रथः कर्णो न चाप्यतिरथो रणे ।

वियुक्तः कवचेनैष सहजेन विचेतनः ॥ ५ ॥

कुण्डलाभ्यां च दिव्याभ्यां वियुक्तः सततं घृणी ।

अभिशापाच्च रामस्य ब्राह्मणस्य च भाषणात् ॥ ६ ॥

करणानां वियोगाच्च तेन मेऽर्धरथो मतः ।

नैष फाल्गुनमासाद्य पुनर्जीवन् विमोक्ष्यते ॥ ७ ॥

यह कर्ण युद्धभूमिमें न तो अतिरथी है और न रथी ही कहलानेयोग्य है, क्योंकि यह मूर्ख अपने सहज कवच तथा दिव्य कुण्डलोंसे हीन हो चुका है । यह दूसरोंके प्रति सदा घृणाका भाव रखता है । परशुरामजीके अभिशापसे, ब्राह्मणकी शापोक्तिसे तथा

पृष्ठ 1078

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विजयसाधक उपर्युक्त उपकरणोंको खो देनेसे मेरी दृष्टिमें यह कर्ण अर्धरथी है । अर्जुनसे भिड़नेपर यह कदापि जीवित नहीं बच सकता ॥ ५–७ ॥

ततोऽब्रवीत् पुनर्द्रोणः सर्वशस्त्रभृतां वरः ।

एवमेतद् यथाऽऽत्थ त्वं न मिथ्यास्ति कदाचन ॥ ८ ॥

यह सुनकर समस्त शस्त्रधारियोंमें श्रेष्ठ द्रोणाचार्य भी बोल उठे —' आप जैसा कहते हैं, बिलकुल ठीक है । आपका यह मत कदापि मिथ्या नहीं है ॥ ८ ॥

रणे रणेऽभिमानी च विमुखश्चापि दृश्यते ।

घृणी कर्णः प्रमादी च तेन मेऽर्धरथो मतः ॥ ९ ॥

‘ यह प्रत्येक युद्धमें घमंड तो बहुत दिखाता है; परंतु वहाँसे भागता ही देखा जाता है ।

कर्ण दयालु और प्रमादी है । इसलिये मेरी रायमें भी यह अर्धरथी ही है ' ॥ ९ ॥

एतच्छ्रुत्वा तु राधेयः क्रोधादुत्फाल्य लोचने ।

उवाच भीष्मं राधेयस्तुदन् वाग्भिः प्रतोदवत् ॥ १० ॥

यह सुनकर राधानन्दन कर्ण क्रोधसे आँखें फाड़- फाड़कर देखने लगा और अपने वचनरूपी चाबुकसे पीड़ा देता हुआ भीष्मसे बोला- ॥ १० ॥

पितामह यथेष्टं मां वाक्शरैरुपकृन्तसि ।

अनागसं सदा द्वेषादेवमेव पदे पदे ॥ ११ ॥

‘ पितामह! यद्यपि मैंने तुम्हारा कोई अपराध नहीं किया है, तो भी सदा मुझसे द्वेष रखनेके कारण तुम इसी प्रकार पग-पगपर मुझे अपने वाग्बाणोंद्वारा इच्छानुसार चोट पहुँचाते रहते हो ॥ ११ ॥

मर्षयामि च तत् सर्वं दुर्योधनकृतेन वै ।

त्वं तु मां मन्यसे मन्दं यथा कापुरुषं तथा ॥ १२ ॥

‘ मैं दुर्योधनके कारण यह सब कुछ चुपचाप सह लेता हूँ, परंतु तुम मुझे मूर्ख और कायरके समान समझते हो ॥ १२ ॥

भवानर्धरथो मह्यं मतो वै नात्र संशयः ।

सर्वस्य जगतश्चैव गाङ्गेयो न मृषा वदेत् ॥ १३ ॥

‘ तुम मेरे विषयमें जो अर्धरथी होनेका मत प्रकट कर रहे हो, इससे सम्पूर्ण जगत्को निःसंदेह ऐसा ही प्रतीत होने लगेगा; क्योंकि सब यही जानते हैं कि गंगानन्दन भीष्म झूठ नहीं बोलते ॥ १३ ॥

कुरूणामहितो नित्य न च राजावबुध्यते ।

को हि नाम समानेषु राजसूदारकर्मसु ॥ १४ ॥

तेजोवधमिमं कुर्याद् विभेदयिषुराहवे ।

यथा त्वं गुणविद्वेषादपरागं चिकीर्षसि ॥ १५ ॥

पृष्ठ 1079

महाभारत — खण्ड ३, पृष्ठ 1079 का मूल पृष्ठ
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' तुम कौरवोंका सदा अहित करते हो; परंतु राजा दुर्योधन इस बातको नहीं समझते हैं । तुम मेरे गुणोंके प्रति द्वेष रखनेके कारण जिस प्रकार राजाओंकी मुझपर विरक्ति कराना चाहते हो, वैसा प्रयत्न तुम्हारे सिवा दूसरा कौन कर सकता है? इस समय युद्धका अवसर उपस्थित है और समान श्रेणीके उदारचरित राजा एकत्र हुए हैं; ऐसे अवसरपर आपसमें भेद ( फूट ) उत्पन्न करनेकी इच्छा रखकर कौन पुरुष अपने ही पक्षके योद्धाका इस प्रकार तेज और उत्साह नष्ट करेगा? ॥ १४-१५ ॥

न हायनैर्न पलितैर्न वित्तैर्न च बन्धुभिः ।

महारथत्वं संख्यातुं शक्यं क्षत्रस्य कौरव ॥ १६ ॥

‘ कौरव! केवल बड़ी अवस्था हो जाने, बाल पक जाने, अधिक धनका संग्रह कर लेने तथा बहुसंख्यक भाई- बन्धुओंके होनेसे ही किसी क्षत्रियको महारथी नहीं गिना जा सकता ॥ १६ ॥

बलज्येष्ठं स्मृतं क्षत्रं मन्त्रज्येष्ठा द्विजातयः ।

धनज्येष्ठाः स्मृता वैश्याः शूद्रास्तु वयसाधिकाः ॥ १७ ॥

' क्षत्रियजातिमें जो बलमें अधिक हो, वही श्रेष्ठ माना गया है । ब्राह्मण वेदमन्त्रोंके ज्ञानसे, वैश्य अधिक धनसे और शूद्र अधिक आयु होनेसे श्रेष्ठ समझे जाते हैं ॥ १७ ॥

यथेच्छकं स्वयं ब्रूया रथानतिरथांस्तथा ।

कामद्वेषसमायुक्तो मोहात् प्रकुरुते भवान् ॥ १८ ॥

'तुम राग- द्वेषसे भरे हुए हो; अतः मोहवश मनमाने ढंगसे रथी- अतिरथियोंका विभाग कर रहे हो ॥

दुर्योधन महाबाहो साधु सम्यगवेक्ष्यताम् ।

त्यज्यतां दुष्टभावोऽयं भीष्मः किल्बिषकृत् तव ॥ १ ९ ॥

'महाबाहु दुर्योधन! तुम अच्छी तरह विचार करके देख लो । ये भीष्म दुर्भावसे दूषित

होकर तुम्हारी बुराई कर रहे हैं । तुम इन्हें अभी त्याग दो ॥ १ ९ ॥

भिन्ना हि सेना नृपते दुःसंधेया भवत्युत ।

मौला हि पुरुषव्याघ्र किमु नानासमुत्थिताः ॥ २० ॥

‘नरेश्वर! पुरुषसिंह! एक बार सेनामें फूट पड़ जानेपर उसमें पुनः मेल कराना कठिन हो जाता है । उस दशामें मौलिक ( पीढ़ियोंसे चले आनेवाले ) सेवक भी हाथसे निकल जाते हैं । फिर जो भिन्न - भिन्न स्थानोंके लोग किसी एक कार्यके लिये उद्यत होकर एकत्र हुए हों, उनकी तो बात ही क्या है? ॥ २० ॥

एषां द्वैधं समुत्पन्नं योधानां युधि भारत ।

तेजोवधो नः क्रियते प्रत्यक्षेण विशेषतः ॥ २१ ॥

‘ भारत! इन योद्धाओंमें युद्धके अवसरपर दुविधा उत्पन्न हो गयी है । तुम प्रत्यक्ष देख रहे हो, हमारे तेज और उत्साहकी विशेषरूपसे हत्या की जा रही है ॥ २१ ॥

पृष्ठ 1080

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रथानां क्व च विज्ञानं क्व च भीष्मोऽल्पचेतनः ।

अहमावारयिष्यामि पाण्डवानामनीकिनीम् ॥ २२ ॥

‘ कहाँ रथियोंको समझना और कहाँ अल्पबुद्धि भीष्म? मैं अकेला ही पाण्डवोंकी सेनाको आगे बढ़नेसे रोक दूँगा ॥ २२ ॥

आसाद्य माममोघेषुं गमिष्यन्ति दिशो दश ।

पाण्डवाः सहपञ्चालाः शार्दूलं वृषभा इव ॥ २३ ॥

' मेरे बाण अमोघ हैं । मेरे सामने आकर पाण्डव और पांचाल उसी प्रकार दसों दिशाओंमें भाग जायँगे, जैसे सिंहको देखकर बैल भागते हैं ॥ २३ ॥

क्व च युद्धं विमर्दो वा मन्त्रे सुव्याहृतानि च ।

क्व च भीष्मो गतवया मन्दात्मा कालचोदितः ॥ २४ ॥

'कहाँ युद्ध, मारकाट और गुप्त मन्त्रणामें अच्छी बातें बतानेका कार्य और कहाँ कालप्रेरित मन्दबुद्धि भीष्म, जिनकी आयु समाप्त हो चुकी है ॥ २४ ॥

एकाकी स्पर्धते नित्यं सर्वेण जगता सह ।

न चान्यं पुरुषं कंचिन्मन्यते मोघदर्शनः ॥ २५ ॥

' ये अकेले ही सदा सम्पूर्ण जगत्के साथ स्पर्धा रखते हैं और अपनी व्यर्थ दृष्टिके कारण दूसरे किसीको पुरुष ही नहीं समझते हैं ॥ २५ ॥

श्रोतव्यं खलु वृद्धानामिति शास्त्रनिदर्शनम् ।

न त्वेव ह्यतिवृद्धानां पुनर्बाला हि ते मताः ॥ २६ ॥

' वृद्धोंकी बातें सुननी चाहिये; यह शास्त्रका आदेश है । परंतु जो अत्यन्त बूढ़े हो गये हैं, उनकी बातें श्रवण करनेयोग्य नहीं हैं; क्योंकि वे तो फिर बालकोंके ही समान माने गये हैं ॥ २६ ॥

अहमेको हनिष्यामि पाण्डवानामनीकिनीम् ।

सुयुद्धे राजशार्दूल यशो भीष्मं गमिष्यति ॥ २७ ॥

'नृपश्रेष्ठ! मैं इस युद्धमें अकेला ही पाण्डवोंकी सेनाका विनाश करूँगा; परंतु सारा यश भीष्मको मिल जायगा ॥

कृतः सेनापतिस्त्वेष त्वया भीष्मो नराधिप ।

सेनापतौ यशो गन्ता न तु योधान् कथंचन ॥ २८ ॥

' नरेश्वर! तुमने इन भीष्मको ही सेनापति बनाया है । विजयका यश सेनापतिको ही प्राप्त होता है; योद्धाओंको किसी प्रकार नहीं मिलता ॥ २८ ॥

नाहं जीवति गाङ्गेये योत्स्ये राजन् कथंचन ।

हते भीष्मे तु योद्धास्मि सर्वैरेव महारथैः ॥ २ ९ ॥

‘ अतः राजन्! मैं भीष्मके जीते - जी किसी प्रकार युद्ध नहीं करूँगा; परंतु भीष्मके मारे जानेपर सम्पूर्ण महारथियोंके साथ टक्कर लूँगा ' ॥ २ ९ ॥