श्रीगणेशाय नमः।
महाभारत — खण्ड ३ — पृष्ठ 1081–1090
महाभारत — खण्ड ३ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1081–1090
पृष्ठ 1081
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
भीष्म उवाच
समुद्यतोऽयं भारो मे सुमहान् सागरोपमः ।
धार्तराष्ट्रस्य संग्रामे वर्षपूगाभिचिन्तितः ॥ ३० ॥
तस्मिन्नभ्यागते काले प्रतप्ते लोमहर्षणे ।
मिथो भेदो न मे कार्यस्तेन जीवसि सूतज ॥ ३१ ॥
- भीष्मने कहा – सूतपुत्र! इस युद्धमें दुर्योधनका यह समुद्रके समान अत्यन्त गुरुतर भार मैंने अपने कंधोंपर उठाया है । जिसके लिये मैं बहुत वर्षोंसे चिन्तित हो रहा था, वह संतापदायक रोमांचकारी समय अब आकर उपस्थित हो ही गया, ऐसे अवसरमें मुझे यह पारस्परिक भेद नहीं उत्पन्न करना चाहिये, इसीलिये तू अभीतक जी रहा है ॥ ३०-३१ ॥
न ह्यहं त्वद्य विक्रम्य स्थविरोऽपि शिशोस्तव ।
युद्धश्रद्धामहं छिन्द्यां जीवितस्य च सूतज ॥ ३२ ॥
सूतकुमार! यदि ऐसी बात न होती तो मैं वृद्ध होनेपर भी पराक्रम करके आज तुझ बालककी युद्ध -विषयक श्रद्धा और जीवनकी आशाका एक ही साथ उच्छेद कर डालता ॥ ३२ ॥
जामदग्न्येन रामेण महास्त्राणि विमुञ्चता ।
न मे व्यथा कृता काचित् त्वं तु मे किं करिष्यसि ॥ ३३ ॥
जमदग्निनन्दन परशुरामने मेरे ऊपर बड़े -बड़े अस्त्रोंका प्रयोग किया था; परंतु वे भी
मुझे कोई पीड़ा न दे सके । फिर तू तो मेरा कर ही क्या लेगा? ॥ ३३ ॥
कामं नैतत् प्रशंसन्ति सन्तः स्वबलसंस्तवम् ।
वक्ष्यामि तु त्वां संतप्तो निहीनकुलपांसन ॥ ३४ ॥
नीचकुलांगार! साधु पुरुष अपने बलकी प्रशंसा करना कदापि अच्छा नहीं मानते हैं, तथापि तेरे व्यवहारसे संतप्त होकर मैं अपनी प्रशंसाकी बात भी कह रहा हूँ ॥ ३४ ॥
समेतं पार्थिवं क्षत्रं काशिराजस्वयंवरे ।
निर्जित्यैकरथेनैव याः कन्यास्तरसा हृताः ॥ ३५ ॥
काशिराजके यहाँ स्वयंवरमें समस्त भूमण्डलके क्षत्रियनरेश एकत्र हुए थे, परंतु मैंने केवल एक रथपर ही आरूढ़ होकर उन सबको जीतकर बलपूर्वक काशिराजकी कन्याओंका अपहरण किया था ॥ ३५ ॥
ईदृशानां सहस्राणि विशिष्टानामथो पुनः ।
मयैकेन निरस्तानि ससैन्यानि रणाजिरे ॥ ३६ ॥
यहाँ जो लोग एकत्र हुए हैं, ऐसे तथा इनसे भी बढ़ - चढ़कर पराक्रमी हजारों नरेश वहाँ एकत्र थे; परंतु मैंने समरांगणमें अकेले ही उन सबको सेनाओंसहित परास्त कर दिया था ॥ ३६ ॥
त्वां प्राप्य वैरपुरुषं कुरूणामनयो महान् ।
पृष्ठ 1082
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
उपस्थितो विनाशाय यतस्व पुरुषो भव ॥ ३७ ॥
तू वैरका मूर्तिमान् स्वरूप है । तेरा सहारा पाकर कुरुकुलके विनाशके लिये बहुत बड़ा अन्याय उपस्थित हो गया है । अब तू रक्षाका प्रबन्ध कर और पुरुषत्वका परिचय दे ॥ ३७ ॥
युद्धयस्व समरे पार्थं येन विस्पर्धसे सह ।
द्रक्ष्यामि त्वां विनिर्मुक्तमस्माद् युद्धात् सुदुर्मते ॥ ३८ ॥
दुर्मते! तू जिसके साथ सदा स्पर्धा रखता है, उस अर्जुनके साथ समरभूमिमें युद्ध कर ।
मैं देखूँगा कि तू इस संग्रामसे किस प्रकार बच पाता है? ॥ ३८ ॥
तमुवाच ततो राजा धार्तराष्ट्रः प्रतापवान् ।
मां समीक्षस्व गाङ्गेय कार्यं हि महदुद्यतम् ॥ ३ ९ ॥
तदनन्तर प्रतापी राजा दुर्योधनने भीष्मजीसे कहा–' गंगानन्दन! आप मेरी ओर देखिये; क्योंकि इस समय महान् कार्य उपस्थित है ॥ ३ ९ ॥
चिन्त्यतामिदमेकाग्रं मम निःश्रेयसं परम् ।
उभावपि भवन्तौ मे महत् कर्म करिष्यतः ॥ ४० ॥
‘ आप एकाग्रचित्त होकर मेरे परम कल्याणकी बात सोचिये । आप और कर्ण दोनों ही मेरा महान् कार्य सिद्ध करेंगे ॥ ४० ॥
भूयश्च श्रोतुमिच्छामि परेषां रथसत्तमान् ।
ये चैवातिरथास्तत्र ये चैव रथयूथपाः ॥ ४१ ॥
' अब मैं पुनः शत्रुपक्षके श्रेष्ठ रथियों, अतिरथियों तथा रथयूथपतियोंका परिचय सुनना चाहता हूँ ॥ ४१ ॥
बलाबलममित्राणां श्रोतुमिच्छामि कौरव ।
प्रभातायां रजन्यां वै इदं युद्धं भविष्यति ॥ ४२ ॥
‘ कुरुनन्दन! शत्रुओंके बलाबलको सुननेकी मेरी इच्छा है । आजकी रात बीतते ही कल प्रातःकाल यह युद्ध प्रारम्भ हो जायगा' ॥ ४२ ॥
इति श्रीमहाभारते उद्योगपर्वणि रथातिरथसंख्यानपर्वणि भीष्मकर्णसंवादे अष्टषष्ट्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १६८ ॥
इसप्रकार श्रीमहाभारत उद्योगपर्वके अन्तर्गत रथातिरथसंख्यानपर्वमें भीष्म- कर्णसंवादविषयक एक सौ अड़सठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १६८ ॥
पृष्ठ 1083
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
एकोनसप्तत्यधिकशततमोऽध्यायः पाण्डवपक्षके रथी आदिका एवं उनकी महिमाका वर्णन भीष्म उवाच
एते रथास्तवाख्यातास्तथैवातिरथा नृप ।
ये चाप्यर्धरथा राजन् पाण्डवानामतः शृणु ॥ १ ॥
भीष्मजी कहते हैं – नरेश्वर! ये तुम्हारे पक्षके रथी, अतिरथी और अर्धरथी बताये गये हैं । राजन्! अब तुम पाण्डवपक्षके रथी आदिका वर्णन सुनो ॥ १ ॥
यदि कौतूहलं तेऽद्य पाण्डवानां बले नृप ।
रथसंख्यां शृणुष्व त्वं सहैभिर्वसुधाधिपैः ॥ २ ॥
नरेश! अब यदि पाण्डवोंकी सेनाके विषयमें भी जानकारी करनेके लिये तुम्हारे मनमें कौतूहल हो तो इन भूमिपालोंके साथ तुम उनके रथियोंकी गणना सुनो ॥
स्वयं राजा रथोदारः पाण्डवः कुन्तिनन्दनः ।
अग्निवत् समरे तात चरिष्यति न संशयः ॥ ३ ॥
तात! कुन्तीका आनन्द बढ़ानेवाले स्वयं पाण्डुपुत्र राजा युधिष्ठिर एक श्रेष्ठ रथी ( महारथी ) हैं । वे समरभूमिमें अग्निके समान सब ओर विचरेंगे, इसमें संशय नहीं है ॥
भीमसेनस्तु राजेन्द्र रथोऽष्टगुणसम्मितः ।
न तस्यास्ति समो युद्धे गदया सायकैरपि ॥ ४ ॥
नागायुतबलो मानी तेजसा न स मानुषः । राजेन्द्र! भीमसेन तो अकेले आठ रथियोंके बराबर हैं । गदा और बाणोंद्वारा किये जानेवाले युद्धमें उनके समान दूसरा कोई योद्धा नहीं है । उनमें दस हजार हाथियोंका बल है । वे बड़े ही मानी तथा अलौकिक तेजसे सम्पन्न हैं ॥ ४३ ॥
माद्रीपुत्रौ च रथिनौ द्वावेव पुरुषर्षभौ ॥ ५ ॥
अश्विनाविव रूपेण तेजसा च समन्वितौ । माद्रीके दोनों पुत्र अश्विनीकुमारोंके समान रूपवान् और तेजस्वी हैं । वे दोनों ही पुरुषरत्न रथी हैं ॥ ५३ ॥
एते चमूमुपगताः स्मरन्तः क्लेशमुत्तमम् ॥ ६ ॥
रुद्रवत् प्रचरिष्यन्ति तत्र मे नास्ति संशयः । ये चारों भाई महान् क्लेशोंका स्मरण करके तुम्हारी सेनामें घुसकर रुद्रदेवके समान संहार करते हुए विचरेंगे; इस विषयमें मुझे संशय नहीं है ॥ ६३ ॥
सर्व एव महात्मानः शालस्तम्भा इवोद्गताः ॥ ७ ॥
प्रादेशेनाधिकाः पुम्भिरन्यैस्ते च प्रमाणतः ।
पृष्ठ 1084
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
ये सभी महामना पाण्डव शालवृक्षके स्तम्भोंके समान ऊँचे हैं । उनकी ऊँचाईका मान अन्य पुरुषोंसे एक बित्ता अधिक है ॥ ७३ ॥
सिंहसंहननाः सर्वे पाण्डुपुत्रा महाबलाः ॥ ८ ॥
चरितब्रह्मचर्याश्च सर्वे तात तपस्विनः ।
ह्रीमन्तः पुरुषव्याघ्रा व्याघ्रा इव बलोत्कटाः ॥ ९ ॥
सभी पाण्डव सिंहके समान सुगठित शरीरवाले और महान् बलवान् हैं । तात! उन सबने ब्रह्मचर्यव्रतका पालन किया है, पुरुषोंमें सिंहके समान पराक्रमी पाण्डव तपस्वी, लज्जाशील और व्याघ्रके समान उत्कट बलशाली हैं ॥ ८ - ९ ॥
जवे प्रहारे सम्मर्दे सर्व एवातिमानुषाः ।
सर्वैर्जिता महीपाला दिग्जये भरतर्षभ ॥ १० ॥
भरतश्रेष्ठ! वे वेग, प्रहार और संघर्षमें अमानुषिक शक्तिसे सम्पन्न हैं । उन सबने दिग्विजयके समय बहुत से राजाओंपर विजय पायी है ॥ १० ॥
न चैषां पुरुषाः केचिदायुधानि गदाः शरान् ।
विषहन्ति सदा कर्तुमधिज्यान्यपि कौरव ॥ ११ ॥
उद्यन्तुं वा गदा गुर्वीः शरान् वा क्षेप्तुमाहवे ।
जवे लक्ष्यस्य हरणे भोज्ये पांसुविकर्षणे ॥ १२ ॥
बालैरपि भवन्तस्तैः सर्व एव विशेषिताः । कुरुनन्दन! इनके आयुधों गदाओं और बाणोंका आघात कोई भी नहीं सह सकते हैं । इसके सिवा न तो कोई इनके धनुषपर प्रत्यंचा ही चढ़ा पाते हैं, न युद्धमें इनकी भारी गदाको ही उठा सकते हैं और न इनके बाणोंका ही प्रयोग कर सकते हैं । वेगसे चलने, लक्ष्य - भेद करने, खाने - पीने तथा धूलि -क्रीड़ा करने आदिमें उन सबने बाल्यावस्थामें भी तुम्हें पराजित कर दिया था ॥ ११-१२३ ॥ एतत् सैन्यं समासाद्य सर्व एव बलोत्कटाः ॥ १३ ॥
विध्वंसयिष्यन्ति रणे मा स्म तैः सह सङ्गमः । इस सेनामें आकर वे सभी उत्कट बलशाली हो गये हैं । युद्धमें आनेपर वे तुम्हारी
सेनाका विध्वंस कर डालेंगे । मैं चाहता हूँ उनसे कहीं भी तुम्हारी मुठभेड़ न हो ॥
एकैकशस्ते सम्मर्दे हन्युः सर्वान् महीक्षितः ॥ १४ ॥
प्रत्यक्षं तव राजेन्द्र राजसूये यथाभवत् । उनमेंसे एक- एकमें इतनी शक्ति है कि वे समस्त राजाओंका युद्धमें संहार कर सकते हैं । राजेन्द्र! राजसूय - यज्ञमें जैसा जो कुछ हुआ था, वह सब तुमने अपनी आँखों देखा था ॥ १४३ ॥
द्रौपद्याश्च परिक्लेशं द्यूते च परुषा गिरः ॥ १५ ॥
ते स्मरन्तश्च संग्रामे चरिष्यन्ति च रुद्रवत् ।
पृष्ठ 1085
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
द्यूतक्रीड़ाके समय द्रौपदीको जो महान् क्लेश दिया गया और पाण्डवोंके प्रति कठोर बातें सुनायी गयीं, उन सबको याद करके वे संग्रामभूमिमें रुद्रके समान विचरेंगे ॥ १५३ ॥
लोहिताक्षो गुडाकेशो नारायणसहायवान् ॥ १६ ॥
उभयोः सेनयोर्वीरो रथो नास्तीति तादृशः । लाल नेत्रोंवाले निद्राविजयी अर्जुनके सखा और सहायक नारायणस्वरूप भगवान् श्रीकृष्ण हैं । कौरव - पाण्डव दोनों सेनाओंमें अर्जुनके समान वीर रथी दूसरा कोई नहीं है ॥ १६ ॥
न हि देवेषु सर्वेषु नासुरेषूरगेषु च ॥ १७ ॥
राक्षसेष्वथ यक्षेषु नरेषु कुत एव तु ।
भूतोऽथवा भविष्यो वा रथः कश्चिन्मया श्रुतः ॥ १८ ॥
समस्त देवताओं, असुरों, नागों, राक्षसों तथा यक्षोंमें भी अर्जुनके समान कोई नहीं है; फिर मनुष्योंमें तो हो ही कैसे सकता है? भूत या भविष्यमें भी कोई ऐसा रथी मेरे सुननेमें नहीं आया है ॥ १७-१८ ॥
समायुक्तो महाराज रथः पार्थस्य धीमतः ।
वासुदेवश्च संयन्ता योद्धा चैव धनंजयः ॥ १ ९ ॥
महाराज! बुद्धिमान् अर्जुनका रथ जुता हुआ है । भगवान् श्रीकृष्ण उसके सारथि और युद्धकुशल धनंजय रथी हैं ॥ १ ९ ॥
गाण्डीवं च धनुर्दिव्यं ते चाश्वा वातरंहसः ।
अभेद्यं कवचं दिव्यमक्षय्यौ च महेषुधी ॥ २० ॥
दिव्य गाण्डीव धनुष है, वायुके समान वेगशाली अश्व हैं, अभेद्य दिव्य कव ४च है तथा अक्षय बाणोंसे भरे हुए दो महान् तरकस हैं ॥ २० ॥
अस्त्रग्रामश्च माहेन्द्रो रौद्रः कौबेर एव च ।
याम्यश्च वारुणश्चैव गदाश्चोग्रप्रदर्शनाः ॥ २१ ॥
उस रथमें अस्त्रोंके समुदाय - महेन्द्र, रुद्र, कुबेर, यम एवं वरुणसम्बन्धी अस्त्र हैं, भयंकर दिखायी देनेवाली गदाएँ हैं ॥ २१ ॥
वज्रादीनि च मुख्यानि नानाप्रहरणानि च ।
दानवानां सहस्राणि हिरण्यपुरवासिनाम् ॥ २२ ॥
हतान्येकरथेनाजौ कस्तस्य सदृशो रथः । वज्र आदि भाँति - भाँतिके श्रेष्ठ आयुध भी उस रथमें विद्यमान हैं । अर्जुनने युद्धमें एकमात्र उस रथकी सहायतासे हिरण्यपुरमें निवास करनेवाले सहस्रों दानवोंका संहार किया है । उसके समान दूसरा कौन रथ हो सकता है? ॥ एष हन्याद्धि संरम्भी बलवान् सत्यविक्रमः ॥ २३ ॥
तव सेनां महाबाहुः स्वां चैव परिपालयन् ।
पृष्ठ 1086
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
ये बलवान्, सत्यपराक्रमी, महाबाहु अर्जुन क्रोधमें आकर तुम्हारी सेनाका संहार करेंगे और अपनी सेनाकी रक्षामें संलग्न रहेंगे ॥ २३३ ॥
अहं चैनं प्रत्युदियामाचार्यो वा धनंजयम् ॥ २४ ॥
न तृतीयोऽस्ति राजेन्द्र सेनयोरुभयोरपि ।
य एनं शरवर्षाणि वर्षन्तमुदियाद् रथी ॥ २५ ॥
मैं अथवा द्रोणाचार्य ही धनंजयका सामना कर सकते हैं । राजेन्द्र! दोनों सेनाओंमें तीसरा कोई ऐसा रथी नहीं है, जो बाणोंकी वर्षा करते हुए अर्जुनके सामने जा सके ॥ २४-२५ ॥ जीमूत एव घर्मान्ते महावातसमीरितः ।
समायुक्तस्तु कौन्तेयो वासुदेवसहायवान् ।
तरुणश्च कृती चैव जीर्णावावामुभावपि ॥ २६ ॥
ग्रीष्म ऋतुके अन्तमें प्रचण्ड वायुसे प्रेरित महामेघकी भाँति श्रीकृष्णसहित अर्जुन युद्धके लिये तैयार है । वह अस्त्रोंका विद्वान् और तरुण भी है । इधर हम दोनों वृद्ध हो चले हैं ॥ २६ ॥
वैशम्पायन उवाच
एतच्छ्रुत्वा तु भीष्मस्य राज्ञां दध्वंसिरे तदा ।
काञ्चनाङ्गदिनः पीना भुजाश्चन्दनरूषिताः ॥ २७ ॥
मनोभिः सह संवेगैः संस्मृत्य च पुरातनम् ।
सामर्थ्यं पाण्डवेयानां यथा प्रत्यक्षदर्शनात् ॥ २८ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं— जनमेजय! भीष्मकी यह बात सुनकर पाण्डवोंके पुरातन बल- पराक्रमको प्रत्यक्ष देखनेकी भाँति स्मरण करके राजाओंकी सुवर्णमय भुजबंदोंसे विभूषित चन्दनचर्चित स्थूल भुजाएँ एवं मन भी आवेगयुक्त होकर शिथिल हो गये ॥ २७-२८ ॥ इति श्रीमहाभारते उद्योगपर्वणि रथातिरथसंख्यानपर्वणि पाण्डवरथातिरथसंख्यायां एकोनसप्तत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १६ ९ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत उद्योगपर्वके अन्तर्गत रथातिरथसंख्यानपर्वमें पाण्डवपक्षके रथियों और अतिरथियोंका संख्याविषयक एक सौ उनहत्तरवाँअध्याय पूरा हुआ ॥ १६ ९ ॥
पृष्ठ 1087
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
सप्तत्यधिकशततमोऽध्यायः पाण्डवपक्षके रथियों और महारथियोंका वर्णन तथा विराट और द्रुपदकी प्रशंसा भीष्म उवाच
द्रौपदेया महाराज सर्वे पञ्च महारथाः ।
वैराटिरुत्तरश्चैव रथोदारो मतो मम ॥ १ ॥
भीष्मजी कहते हैं - महाराज! द्रौपदीके जो पाँच पुत्र हैं, वे सब--के - सब महारथी हैं । विराटपुत्र उत्तरको मैं उदार रथी मानता हूँ ॥ १ ॥
अभिमन्युर्महाबाहू रथयूथपयूथपः ।
समः पार्थेन समरे वासुदेवेन चारिहा ॥ २ ॥
लब्धास्त्रश्चित्रयोधी च मनस्वी च दृढव्रतः संस्मरन् वै परिक्लेशं स्वपितुर्विक्रमिष्यति ॥ ३ ॥
महाबाहु अभिमन्यु रथ- यूथपतियोंका भी यूथपति है । वह शत्रुनाशक वीर समरभूमिमें अर्जुन और श्रीकृष्णके समान पराक्रमी है । उसने अस्त्रविद्याकी विधिवत् शिक्षा प्राप्त की है । वह युद्धकी विचित्र कलाएँ जानता है तथा दृढ़तापूर्वक व्रतका पालन करनेवाला और मनस्वी है । वह अपने पिताके क्लेशको याद करके अवश्य पराक्रम दिखायेगा ॥ २-३ ॥
सात्यकिर्माधवः शूरो रथयूथपयूथपः ।
एष वृष्णिप्रवीराणाममर्षी जितसाध्वसः ॥ ४ ॥
मधुवंशी शूरवीर सात्यकि भी रथ -यूथपतियोंके भी यूथपति हैं। वृष्णिवंशके प्रमुख
वीरोंमें ये सात्यकि बड़े ही अमर्षशील हैं । इन्होंने भयको जीत लिया है ॥ ४ ॥
उत्तमौजास्तथा राजन् रथोदारो मतो मम ।
युधामन्युश्च विक्रान्तो रथोदारो मतो मम ॥ ५ ॥
राजन्! उत्तमौजाको भी मैं उदार रथी मानता हूँ । पराक्रमी युधामन्यु भी मेरे मतमें एक श्रेष्ठ रथी हैं ॥ ५ ॥
एतेषां बहुसाहस्रा रथा नागा हयास्तथा ।
योत्स्यन्ते ते तनुंस्त्यक्त्वा कुन्तीपुत्रप्रियेप्सया ॥ ६ ॥
इनके कई हजार रथ, हाथी और घोड़े हैं, जो कुन्तीपुत्र युधिष्ठिरका प्रिय करनेकी इच्छासे अपने शरीरको निछावर करके युद्ध करेंगे ॥ ६ ॥
पाण्डवैः सह राजेन्द्र तव सेनासु भारत ।
अग्निमारुतवद् राजन्नाह्वयन्तः परस्परम् ॥ ७ ॥
पृष्ठ 1088
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
भारत! राजेन्द्र! वे पाण्डवोंके साथ तुम्हारी सेनामें प्रवेश करके एक- दूसरेका आह्वान करते हुए अग्नि और वायुकी भाँति विचरेंगे ॥ ७ ॥
अजेयौ समरे वृद्धौ विराटद्रुपदौ तथा ।
महारथौ महावीर्यौ मतौ मे पुरुषर्षभौ ॥ ८ ॥
वृद्ध राजा विराट और द्रुपद भी युद्धमें अजेय हैं । इन दोनों महापराक्रमी नरश्रेष्ठ वीरोंको मैं महारथी मानता हूँ ॥ ८ ॥
वयोवृद्धावपि हि तौ क्षत्रधर्मपरायणौ ।
यतिष्येते परं शक्त्या स्थितौ वीरगते पथि ॥ ९ ॥
यद्यपि वे दोनों अवस्थाकी दृष्टिसे बहुत बूढ़े हैं, तथापि क्षत्रिय धर्मका आश्रय ले वीरोंके मार्गमें स्थित हो अपनी शक्तिभर युद्ध करनेका प्रयत्न करेंगे ॥ ९ ॥
सम्बन्धकेन राजेन्द्र तौ तु वीर्यबलान्वयात् ।
आर्यवृत्तौ महेष्वासौ स्नेहपाशसितावुभौ ॥ १० ॥
राजेन्द्र! वे दोनों नरेश वीर्य और बलसे संयुक्त श्रेष्ठ पुरुषोंके समान सदाचारी और महान् धनुर्धर हैं । पाण्डवोंके साथ सम्बन्ध होनेके कारण वे दोनों उनके स्नेह- बन्धनमें बँधे हुए हैं ॥ १० ॥
कारणं प्राप्य तु नराः सर्व एव महाभुजाः ।
शूरा वा कातरा वापि भवन्ति कुरुपुङ्गव ॥ ११ ॥
कुरुश्रेष्ठ! कोई कारण पाकर प्रायः सभी महाबाहु मानव शूर अथवा कायर हो जाते ॥ ११ ॥
एकायनगतावेतौ पार्थिवौ दृढधन्विनौ ।
प्राणांस्त्यक्त्वा परं शक्त्या घट्टितारौ परंतप ॥ १२ ॥
परंतप! दृढ़तापूर्वक धनुष धारण करनेवाले राजा विराट और द्रुपद एकमात्र वीरपथका आश्रय ले चुके हैं । वे अपने प्राणोंका त्याग करके भी पूरी शक्तिसे तुम्हारी सेनाके साथ टक्कर लेंगे ॥ १२ ॥
पृथगक्षौहिणीभ्यां तावुभौ संयति दारुणौ ।
सम्बन्धिभावं रक्षन्तौ महत् कर्म करिष्यतः ॥ १३ ॥
वे दोनों युद्धमें बड़े भयंकर हैं, अतः अपने सम्बन्धकी रक्षा करते हुए पृथक् - पृथक् अक्षौहिणी सेना साथ लिये महान् पराक्रम करेंगे ॥ १३ ॥
लोकवीरौ महेष्वासौ त्यक्तात्मानौ च भारत ।
प्रत्ययं परिरक्षन्तौ महत् कर्म करिष्यतः ॥ १४ ॥
भारत! महान् धनुर्धर तथा जगत्के सुप्रसिद्ध वीर वे दोनों नरेश अपने विश्वास और सम्मानकी रक्षा करते हुए शरीरकी परवा न करके युद्धभूमिमें महान् पुरुषार्थ प्रकट करेंगे ॥ १४ ॥
पृष्ठ 1089
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
इति श्रीमहाभारते उद्योगपर्वणि रथातिरथसंख्यानपर्वणि सप्तत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १७० ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत उद्योगपर्वके अन्तर्गत रथातिरथसंख्यानपर्वमें एक सौ सत्तरवाँ अध्याय पूराहुआ ॥ १७० ॥
पृष्ठ 1090
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
एकसप्तत्यधिकशततमोऽध्यायः पाण्डवपक्षके रथी, महारथी एवं अतिरथी आदिका वर्णन भीष्म उवाच
पञ्चालराजस्य सुतो राजन् परपुरंजयः ।
शिखण्डी रथमुख्यो मे मतः पार्थस्य भारत ॥ १ ॥
भीष्मजी कहते हैं - राजन्! भरतनन्दन! पांचालराज द्रुपदका पुत्र शिखण्डी शत्रुओंकी नगरीपर विजय पानेवाला है, मैं उसे युधिष्ठिरकी सेनाका एक प्रमुख रथी मानता हूँ ॥ १ ॥
एष योत्स्यति संग्रामे नाशयन् पूर्वसंस्थितम् ।
परं यशो विप्रथयंस्तव सेनासु भारत ॥ २ ॥
भारत! वह तुम्हारी सेनामें प्रवेश करके अपने पूर्व अपयशका नाश तथा उत्तम सुयशका विस्तार करता हुआ बड़े उत्साहसे युद्ध करेगा ॥ २ ॥
एतस्य बहुलाः सेनाः पञ्चालाश्च प्रभद्रकाः ।
तेनासौ रथवंशेन महत् कर्म करिष्यति ॥ ३ ॥