श्रीगणेशाय नमः।
महाभारत — खण्ड ३ — पृष्ठ 1111–1120
महाभारत — खण्ड ३ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1111–1120
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उसने पुण्यशील तपस्वी महात्माओंके आश्रमपर जाकर वहीं वह रात बितायी । उस आश्रममें तपस्वी - लोगोंने सब ओरसे घेरकर उसकी रक्षा की थी ॥ ३६ ॥
आचख्यौ च यथावृत्तं सर्वमात्मनि भारत ।
विस्तरेण महाबाहो निखिलेन शुचिस्मिता ।
हरणं च विसर्गं च शाल्वेन च विसर्जनम् ॥ ३७ ॥
महाबाहु भरतनन्दन! पवित्र मुसकानवाली अम्बाने अपने ऊपर बीता हुआ सारा वृत्तान्त विस्तारपूर्वक उन महात्माओंसे बताया । किस प्रकार उसका अपहरण हुआ? कैसे भीष्मसे छुटकारा मिला? और फिर किस प्रकार शाल्वने उसे त्याग दिया, ये सारी बातें उसने कह सुनायीं ॥ ३७ ॥
ततस्तत्र महानासीद् ब्राह्मणः संशितव्रतः ।
शैखावत्यस्तपोवृद्धः शास्त्रे चारण्यके गुरुः ॥ ३८ ॥
उस आश्रममें कठोर व्रतका पालन करनेवाले शैखावत्य नामसे प्रसिद्ध एक तपोवृद्ध श्रेष्ठ ब्राह्मण रहते थे, जो शास्त्र और आरण्यक आदिकी शिक्षा देनेवाले सद्गुरु थे ॥ ३८ ॥
आर्तां तामाह स मुनिः शैखावत्यो महातपाः ।
निःश्वसन्तीं सतीं बालां दुःखशोकपरायणाम् ॥ ३ ९ ॥
महातपस्वी शैखावत्य मुनिने वहाँ सिसकती हुई उस दुःखशोकपरायणा सती साध्वी आर्त अबलासे कहा— ॥ ३ ९ ॥
एवं गते तु किं भद्रे शक्यं कर्तुं तपस्विभिः ।
आश्रमस्थैर्महाभागे तपोयुक्तैर्महात्मभिः ॥ ४० ॥
' भद्रे! महाभागे! ऐसी दशामें इस आश्रममें निवास करनेवाले तपः परायण तपोधन महात्मा तुम्हारा क्या सहयोग कर सकते हैं? ' ॥ ४० ॥
सा त्वेनमब्रवीद् राजन् क्रियतां मदनुग्रहः ।
प्राव्राज्यमहमिच्छामि तपस्तप्स्यामि दुश्चरम् ॥ ४१ ॥
राजन्! तब अम्बाने उनसे कहा– ' भगवन्! मुझपर अनुग्रह कीजिये । मैं संन्यासियोंका - सा धर्म पालन करना चाहती हूँ। यहाँ रहकर दुष्कर तपस्या करूँगी ॥ ४१ ॥
मयैव यानि कर्माणि पूर्वदेहे तु मूढया ।
कृतानि नूनं पापानि तेषामेतत् फलं ध्रुवम् ॥ ४२ ॥
' मुझ मूढ़ नारीने अपने पूर्वजन्मके शरीरसे जो पापकर्म किये थे, अवश्य ही उन्हींका यह दुःखदायक फल प्राप्त हुआ है ॥ ४२ ॥
नोत्सहे तु पुनर्गन्तुं स्वजनं प्रति तापसाः ।
प्रत्याख्याता निरानन्दा शाल्वेन च निराकृता ॥ ४३ ॥
‘तपस्वी महात्माओ! अब मैं अपने स्वजनोंके यहाँ फिर नहीं लौट सकती; क्योंकि राजा शाल्वने मुझे कोरा उत्तर देकर त्याग दिया है, उससे मेरा सारा जीवन आनन्दशून्य
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(दुःखमय) हो गया है ॥ ४३ ॥
उपदिष्टमिहेच्छामि तापस्यं वीतकल्मषाः ।
युष्माभिर्देवसंकाशैः कृपा भवतु वो मयि ॥ ४४ ॥
‘निष्पाप तापसगण! मैं चाहती हूँ कि आप देवोपम साधुपुरुष मुझे तपस्याका उपदेश दें, मुझपर आपलोगोंकी कृपा हो' ॥ ४४ ॥
स तामाश्वासयत् कन्यां दृष्टान्तागमहेतुभिः ।
सान्त्वयामास कार्यं च प्रतिजज्ञे द्विजैः सह ॥ ४५ ॥
तब शैखावत्य मुनिने लौकिक दृष्टान्तों, शास्त्रीय वचनों तथा युक्तियोंद्वारा उस कन्याको आश्वासन देकर धैर्य बँधाया और ब्राह्मणोंके साथ मिलकर उसके कार्य- साधनके लिये प्रयत्न करनेकी प्रतिज्ञा की ॥ ४५ ॥
इति श्रीमहाभारते उद्योगपर्वणि अम्बोपाख्यानपर्वणि शैखावत्याम्बासंवादे पञ्चसप्तत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १७५ ॥
इसप्रकार श्रीमहाभारत उद्योगपर्वके अन्तर्गत अम्बोपाख्यानपर्वमें शैखावत्य तथा अम्बाका संवादविषयक एक सौ पचहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १७५ ॥
[ दाक्षिणात्य अधिक पाठके १३ श्लोक मिलकर कुल ४६३ श्लोक हैं । ] 0
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षट्सप्तत्यधिकशततमोऽध्यायः तापसोंके आश्रममें राजर्षि होत्रवाहन और अकृतव्रणका आगमन तथा उनसे अम्बाकी बातचीत भीष्म उवाच
ततस्ते तापसाः सर्वे कार्यवन्तोऽभवंस्तदा ।
तां कन्यां चिन्तयन्तस्ते किं कार्यमिति धर्मिणः ॥ १ ॥
भीष्मजी कहते हैं - राजन्! तदनन्तर वे सब धर्मात्मा तपस्वी उस कन्याके विषयमें चिन्ता करते हुए यह सोचने लगे कि अब क्या करना चाहिये? उस समय वे उसके लिये कुछ करनेको उद्यत थे ॥ १ ॥
केचिदाहुः पितुर्वेश्म नीयतामिति तापसाः ।
केचिदस्मदुपालम्भे मतिं चक्रुर्हि तापसाः ॥ २ ॥
कुछ तपस्वी यह कहने लगे कि इस राजकन्याको इसके पिताके घर पहुँचा दिया जाय ।
कुछ तापसोंने मुझे उलाहना देनेका निश्चय किया ॥ २ ॥
केचिच्छाल्वपतिं गत्वा नियोज्यमिति मेनिरे ।
नेति केचिद् व्यवस्यन्ति प्रत्याख्याता हि तेन सा ॥ ३ ॥
कुछ लोग यह सम्मति प्रकट करने लगे कि चलकर शाल्वराजको बाध्य करना चाहिये कि वह इसे स्वीकार कर ले और कुछ लोगोंने यह निश्चय प्रकट किया था कि ऐसा होना सम्भव नहीं है; क्योंकि उसने इस कन्याको कोरा उत्तर देकर ग्रहण करनेसे इन्कार कर दिया है ॥ ३ ॥
एवं गते तु किं शक्यं भद्रे कर्तुं मनीषिभिः ।
पुनरूचुश्च तां सर्वे तापसाः संशितव्रताः ॥ ४ ॥
‘ भद्रे! ऐसी स्थितिमें मनीषी तापस क्या कर सकते हैं? ' ऐसा कहकर वे कठोर व्रतका पालन करनेवाले सभी तापस उस राजकन्यासे फिर बोले— ॥ ४ ॥
अलं प्रव्रजितेनेह भद्रे शृणु हितं वचः ।
इतो गच्छस्व भद्रं ते पितुरेव निवेशनम् ॥ ५ ॥
प्रतिपत्स्यति राजा स पिता ते यदनन्तरम् ।
तत्र वत्स्यसि कल्याणि सुखं सर्वगुणान्विता ॥ ६ ॥
‘ भद्रे! घर त्यागकर संन्यासियोंके से धर्माचरणमें संलग्न होनेकी आवश्यकता नहीं है । तुम हमारा हितकर वचन सुनो, तुम्हारा कल्याण हो । यहाँसे पिताके घरको ही चली जाओ ।
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इसके बाद जो आवश्यक कार्य होगा, उसे तुम्हारे पिता काशिराज सोचे - समझेंगे । कल्याणि! तुम वहाँ सर्वगुणसम्पन्न होकर सुखसे रह सकोगी ॥ ५-६ ॥
न च तेऽन्या गतिर्न्याय्या भवेद् भद्रे यथा पिता ।
पतिर्वापि गतिर्नार्याः पिता वा वरवर्णिनि ॥ ७ ॥
‘ भद्रे! तुम्हारे लिये पिताका आश्रय लेना जैसा न्यायसंगत है, वैसा दूसरा कोई सहारा नहीं है । वरवर्णिनि! नारीके लिये पति अथवा पिता ही गति ( आश्रय ) है ॥ ७ ॥
गतिः पतिः समस्थाया विषमे च पिता गतिः ।
प्रव्रज्या हि सुदुःखेयं सुकुमार्या विशेषतः ॥ ८ ॥
' सुखकी परिस्थितिमें नारीके लिये पति आश्रय होता है और संकटकालमें उसके लिये पिताका आश्रय लेना उत्तम है । विशेषतः तुम सुकुमारी हो, अतः तुम्हारे लिये यह प्रव्रज्या ( गृहत्याग ) अत्यन्त दुःखसाध्य है ॥ ८ ॥
राजपुत्र्याः प्रकृत्या च कुमार्यास्तव भामिनि ।
भद्रे दोषा हि विद्यन्ते बहवो वरवर्णिनि ॥ ९ ॥
आश्रमे वै वसन्त्यास्ते न भवेयुः पितुर्गृहे । ‘ भामिनि! एक तो तुम राजकुमारी और दूसरे स्वभावतः सुकुमारी हो, अतः सुन्दरी! यहाँ आश्रममें तुम्हारे रहनेसे अनेक दोष प्रकट हो सकते हैं । पिताके घरमें वे दोष नहीं प्राप्त होंगे' ॥ ९ ३ ॥ ततस्त्वन्येऽब्रुवन् वाक्यं तापसास्तां तपस्विनीम् ॥ १० ॥
त्वामिहैकाकिनीं दृष्ट्वा निर्जने गहने वने ।
प्रार्थयिष्यन्ति राजानस्तस्मान्मैवं मनः कृथाः ॥ ११ ॥
तदनन्तर दूसरे तापसोंने उस तपस्विनीसे कहा- ' इस निर्जन गहन वनमें तुम्हें अकेली देख कितने ही राजा तुमसे प्रणय-प्रार्थना करेंगे, अतः तुम इस प्रकार तपस्या करनेका विचार न करो ' ॥ १०-११ ॥ अम्बोवाच
न शक्यं काशिनगरं पुनर्गन्तुं पितुर्गृहान् ।
अवज्ञाता भविष्यामि बान्धवानां न संशयः ॥ १२ ॥
अम्बा बोली – तापसो! अब मेरे लिये पुनः काशिनगरमें पिताके घर लौट जाना असम्भव है; क्योंकि वहाँ मुझे बन्धु - बान्धवोंमें अपमानित होकर रहना पड़ेगा ॥ १२ ॥
उषितास्मि तथा बाल्ये पितुर्वेश्मनि तापसाः ।
नाहं गमिष्ये भद्रं वस्तत्र यत्र पिता मम ।
तपस्तप्तुमभीप्सामि तापसैः परिरक्षिता ॥ १३ ॥
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तापसो! मैं बाल्यावस्थामें पिताके घर रह चुकी हूँ । आपका कल्याण हो । अब मैं वहाँ नहीं जाऊँगी, जहाँ मेरे पिता होंगे। मैं आप तपस्वी जनोंद्वारा सुरक्षित होकर यहाँ तपस्या करनेकी ही इच्छा रखती हूँ ॥ १३ ॥
यथा परे s पि मे लोके न स्यादेवं महात्ययः ।
दौर्भाग्यं तापसश्रेष्ठास्तस्मात् तप्स्याम्यहं तपः ॥ १४ ॥
तापसश्रेष्ठ महर्षियो! मैं तपस्या इसलिये करना चाहती हूँ, जिससे परलोकमें भी मुझे इस प्रकार महान् संकट एवं दुर्भाग्यका सामना न करना पड़े । अतः मैं तपस्या ही करूँगी ॥ १४ ॥
भीष्म उवाच
इत्येवं तेषु विप्रेषु चिन्तयत्सु यथातथम् ।
राजर्षिस्तद् वनं प्राप्तस्तपस्वी होत्रवाहनः ॥ १५ ॥
भीष्मजी कहते हैं - इस प्रकार वे ब्राह्मण जब यथावत् चिन्तामें मग्न हो रहे थे, उसी समय तपस्वी राजर्षि होत्रवाहन उस वनमें आ पहुँचे ॥ १५ ॥
ततस्ते तापसाः सर्वे पूजयन्ति स्म तं नृपम् ।
पूजाभिः स्वागताद्याभिरासनेनोदकेन च ॥ १६ ॥
तब उन सब तापसोंने स्वागत, कुशल प्रश्न, आसन- समर्पण और जल -दान आदि अतिथि- सत्कारके उपचारोंद्वारा राजा होत्रवाहनका समादर किया ॥ १६ ॥
तस्योपविष्टस्य सतो विश्रान्तस्योपशृण्वतः ।
पुनरेव कथां चक्रुः कन्यां प्रति वनौकसः ॥ १७ ॥
जब वे आसनपर बैठकर विश्राम कर चुके, उस समय उनके सुनते हुए ही वे वनवासी तपस्वी पुनः उस कन्याके विषयमें बातचीत करने लगे ॥ १७ ॥
अम्बायास्तां कथां श्रुत्वा काशिराज्ञश्च भारत ।
राजर्षिः स महातेजा बभूवोद्विग्नमानसः ॥ १८ ॥
भारत! अम्बा और काशिराजकी यह चर्चा सुनकर महातेजस्वी राजर्षि होत्रवाहनका चित्त उद्विग्न हो उठा ॥ १८ ॥
तां तथावादिनीं श्रुत्वा दृष्ट्वा च स महातपाः ।
राजर्षिः कृपयाऽऽविष्टो महात्मा होत्रवाहनः ॥ १ ९ ॥
पूर्वोक्त रूपसे दीनतापूर्वक अपना दुःख निवेदन करनेवाली राजकन्या अम्बाकी बातें सुनकर महातपस्वी, महात्मा राजर्षि होत्रवाहन दयासे द्रवित हो गये ॥ १ ९ ॥
स वेपमान उत्थाय मातुस्तस्याः पिता तदा ।
तां कन्यामङ्कमारोप्य पर्यश्वासयत प्रभो ॥ २० ॥
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वे अम्बाके नाना थे । राजन्! वे काँपते हुए उठे और उस राजकन्याको गोदमें बिठाकर उसे सान्त्वना देने लगे ॥ २० ॥
स तामपृच्छत् कार्त्स्न्येन व्यसनोत्पत्तिमादितः ।
सा च तस्मै यथावृत्तं विस्तरेण न्यवेदयत् ॥ २१ ॥
उन्होंने उसपर संकट आनेकी सारी बातें आरम्भसे ही पूछी और अम्बाने भी जो कुछ जैसे - जैसे हुआ था, वह सारा वृत्तान्त उनसे विस्तारपूर्वक बताया ॥ २१ ॥
ततः स राजर्षिरभूद् दुःखशोकसमन्वितः ।
कार्यं च प्रतिपेदे तन्मनसा सुमहातपाः ॥ २२ ॥
तब उन महातपस्वी राजर्षिने दुःख और शोकसे संतप्त हो मन-ही- मन आवश्यक कर्तव्यका निश्चय किया ॥ २२ ॥
अब्रवीद् वेपमानश्च कन्यामार्तां सुदुःखितः ।
मागाः पितुर्गृहं भद्रे मातुस्ते जनको ह्यहम् ॥ २३ ॥
और अत्यन्त दुःखी हो काँपते हुए ही उन्होंने उस दुःखिनी कन्यासे इस प्रकार कहा -'भद्रे! ( यदि ) तू पिताके घर ( नहीं जाना चाहती हो तो) न जा । मैं तेरी माँका पिता ॥ २३ ॥
दुःखं छिन्द्यामहं ते वै मयि वर्तस्व पुत्रिके ।
पर्याप्तं ते मनो वत्से यदेवं परिशुष्यसि ॥ २४ ॥
' बेटी! मैं तेरा दुःख दूर करूँगा, तू मेरे पास रह । वत्से! तेरे मनमें बड़ा संताप है, तभी तो इस प्रकार सूखी जा रही है ॥ २४ ॥
गच्छ मद्वचनाद् रामं जामदग्न्यं तपस्विनम् ।
रामस्ते समुहद् दुःखं शोकं चैवापनेष्यति ॥ २५ ॥
‘ तू मेरे कहनेसे तपस्यापरायण जमदग्निनन्दन परशुरामजीके पास जा । वे तेरे महान् दुःख और शोकको अवश्य दूर करेंगे ॥ २५ ॥
हनिष्यति रणे भीष्मं न करिष्यति चेद् वचः ।
तं गच्छ भार्गवश्रेष्ठं कालाग्निसमतेजसम् ॥ २६ ॥
' यदि भीष्म उनकी बात नहीं मानेंगे तो वे युद्धमें उन्हें मार डालेंगे । भार्गवश्रेष्ठ परशुराम
प्रलय- कालकी अग्निके समान तेजस्वी हैं । तू उन्हींकी शरणमें जा ॥ २६ ॥
प्रतिष्ठापयिता स त्वां समे पथि महातपाः ।
ततस्तु सुस्वरं बाष्पमुत्सृजन्ती पुनः पुनः ॥ २७ ॥
अब्रवीत् पितरं मातुः सा तदा होत्रवाहनम् ।
अभिवादयित्वा शिरसा गमिष्ये तव शासनात् ॥ २८ ॥
' वे महातपस्वी राम तुझे न्यायोचित मार्गपर प्रतिष्ठित करेंगे । ' यह सुनकर अम्बा बारंबार आँसू बहाती हुई अपने नाना होत्रवाहनको मस्तक नवाकर प्रणाम करके मधुर
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स्वरमें इस प्रकार बोली- ' नानाजी! मैं आपकी आज्ञासे वहाँ अवश्य जाऊँगी ॥ २७-२८ ॥ अपि नामाद्य पश्येयमार्यं तं लोकविश्रुतम् ।
कथं च तीव्रं दुःखं मे नाशयिष्यति भार्गवः ।
एतदिच्छाम्यहं ज्ञातुं यथा यास्यामि तत्र वै ॥ २ ९ ॥
' परंतु मैं आज उन विश्वविख्यात श्रेष्ठ महात्माका दर्शन कैसे कर सकूँगी और वे भृगुनन्दन परशुरामजी मेरे इस दुःसह दुःखका नाश किस प्रकार करेंगे? मैं यह सब जानना चाहती हूँ, जिससे वहाँ जा सकूँ ' ॥ २ ९ ॥ होत्रवाहन उवाच
रामं द्रक्ष्यसि भद्रे त्वं जामदग्न्यं महावने ।
उग्रे तपसि वर्तन्तं सत्यसंधं महाबलम् ॥ ३० ॥
होत्रवाहन बोले- भद्रे! जमदग्निनन्दन परशुराम एक महान् वनमें उग्र तपस्या कर रहे हैं । वे महान् शक्तिशाली और सत्यप्रतिज्ञ हैं । तुझे अवश्य ही उनका दर्शन प्राप्त होगा ॥ ३० ॥
महेन्द्रं वै गिरिश्रेष्ठं रामो नित्यमुपास्ति ह ।
ऋषयो वेदविद्वांसो गन्धर्वाप्सरसस्तथा ॥ ३१ ॥
परशुरामजी सदा पर्वतश्रेष्ठ महेन्द्रपर रहा करते हैं । वहाँ वेदवेत्ता महर्षि, गन्धर्व तथा अप्सराओंका भी निवास है ॥ ३१ ॥
तत्र गच्छस्व भद्रं ते ब्रूयाश्चैनं वचो मम ।
अभिवाद्य च तं मूर्ध्ना तपोवृद्धं दृढव्रतम् ॥ ३२ ॥
बेटी! तेरा कल्याण हो । तू वहीं जा और उन दृढव्रती तपोवृद्ध महात्माको अभिवादन करके पहले उनसे मेरी बात कहना ॥ ३२ ॥
ब्रूयाश्चैनं पुनर्भद्रे यत् ते कार्यं मनीषितम् ।
मयि संकीर्तिते रामः सर्वं तत् ते करिष्यति ॥ ३३ ॥
भद्रे! तत्पश्चात् तेरे मनमें जो अभीष्ट कार्य है वह सब उनसे निवेदन करना । मेरा नाम लेनेपर परशुरामजी तेरा सब कार्य करेंगे ॥ ३३ ॥
मम रामः सखा वत्मे प्रीतियुक्तः सुहृच्च मे ।
जमदग्निसुतो वीरः सर्वशस्त्रभृतां वरः ॥ ३४ ॥
वत्से! सम्पूर्ण शस्त्रधारियोंमें श्रेष्ठ जमदग्निनन्दन वीरवर परशुराम मेरे सखा और प्रेमी सुहृद् हैं ॥ ३४ ॥
एवं ब्रुवति कन्यां तु पार्थिवे होत्रवाहने ।
अकृतव्रणः प्रादुरासीद् रामस्यानुचरः प्रियः ॥ ३५ ॥
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राजा होत्रवाहन जब राजकन्या अम्बासे इस प्रकार कह रहे थे, उसी समय परशुरामजीके प्रिय सेवक अकृतव्रण वहाँ प्रकट हुए ॥ ३५ ॥
ततस्ते मुनयः सर्वे समुत्तस्थुः सहस्रशः ।
स च राजा वयोवृद्धः सृञ्जयो होत्रवाहनः ॥ ३६ ॥
उन्हें देखते ही वे सहस्रों मुनि तथा सृजयवंशी वयोवृद्ध राजा होत्रवाहन सभी उठकर खड़े हो गये ॥
ततो दृष्ट्वा कृतातिथ्यमन्योन्यं ते वनौकसः ।
सहिता भरतश्रेष्ठ निषेदुः परिवार्य तम् ॥ ३७ ॥
भरतश्रेष्ठ! तदनन्तर उनका आदर-सत्कार किया गया; फिर वे वनवासी महर्षि एक-दूसरेकी ओर देखते हुए एक साथ उन्हें घेरकर बैठे ॥ ३७ ॥
ततस्ते कथयामासुः कथास्तास्ता मनोरमाः ।
धन्या दिव्याश्च राजेन्द्र प्रीतिहर्षमुदा युताः ॥ ३८ ॥
राजेन्द्र! तत्पश्चात् वे सब लोग प्रेम और हर्षके साथ दिव्य, धन्य एवं मनोरम वार्तालाप करने लगे ॥ ३८ ॥
ततः कथान्ते राजर्षिर्महात्मा होत्रवाहनः ।
रामं श्रेष्ठं महर्षीणामपृच्छदकृतव्रणम् ॥ ३ ९ ॥
बातचीत समाप्त होनेपर राजर्षि महात्मा होत्रवाहन ने महर्षियोंमें श्रेष्ठ परशुरामजीके विषयमें अकृतव्रणसे पूछा— ॥ ३ ९ ॥
क्व सम्प्रति महाबाहो जामदग्न्यः प्रतापवान् ।
अकृतव्रण शक्यो वै द्रष्टुं वेदविदां वरः ॥ ४० ॥
'महाबाहु अकृतव्रण! इस समय वेदवेत्ताओंमें श्रेष्ठ और प्रतापी जमदग्निनन्दन परशुरामजीका दर्शन कहाँ हो सकता है? ' ॥ ४० ॥
अकृतव्रणउवाच
भवन्तमेव सततं रामः कीर्तयति प्रभो ।
सृञ्जयो मे प्रियसखो राजर्षिरिति पार्थिव ॥ ४१ ॥
अकृतव्रणने कहा — राजन्! परशुरामजी तो सदा आपकी ही चर्चा किया करते हैं ।
उनका कहना है कि सृ॑जयवंशी राजर्षि होत्रवाहन मेरे प्रिय सखा हैं ॥ ४१ ॥
इह रामः प्रभाते श्वो भवितेति मतिर्मम ।
द्रष्टास्येनमिहायान्तं तव दर्शनकाङ्क्षया ॥ ४२ ॥
मेरा विश्वास है कि कल सबेरेतक परशुरामजी यहाँ उपस्थित हो जायँगे । वे आपसे ही
मिलनेके लिये आ रहे हैं । अतः आप यहीं उनका दर्शन कीजियेगा ॥
इयं च कन्या राजर्षे किमर्थं वनमागता ।
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कस्य चेयं तव च का भवतीच्छामि वेदितुम् ॥ ४३ ॥
राजर्षे! मैं यह जानना चाहता हूँ कि यह कन्या किसलिये वनमें आयी है? यह किसकी पुत्री है और आपकी क्या लगती है? ॥ ४३ ॥
होत्रवाहन उवाच
दौहित्रीयं मम विभो काशिराजसुता प्रिया ।
ज्येष्ठा स्वयंवरे तस्थौ भगिनीभ्यां सहानघ ॥ ४४ ॥
इयमम्बेति विख्याता ज्येष्ठा काशिपतेः सुता ।
अम्बिकाम्बालिके कन्ये कनीयस्यौ तपोधन ॥ ४५ ॥
होत्रवाहन बोले – प्रभो! यह मेरी दौहित्री ( पुत्रीकी पुत्री ) है । अनघ! काशिराजकी परमप्रिय ज्येष्ठ पुत्री अपनी दो छोटी बहिनोंके साथ स्वयंवरमें उपस्थित हुई थी । उनमेंसे यही अम्बा नामसे विख्यात काशिराजकी ज्येष्ठ पुत्री है । तपोधन! इसकी दोनों छोटी बहिनें अम्बिका और अम्बालिका कहलाती हैं ॥ ४४-४५ ॥
समेतं पार्थिवं क्षत्रं काशिपुर्यां ततोऽभवत् ।
कन्यानिमित्तं विप्रर्षे तत्रासीदुत्सवो महान् ॥ ४६ ॥
ब्रह्मर्षे! काशीपुरीमें इन्हीं कन्याओंके लिये भूमण्डलका समस्त क्षत्रियसमुदाय एकत्र हुआ था । उस अवसरपर वहाँ महान् स्वयंवरोत्सवका आयोजन किया गया था ॥ ४६ ॥
ततः किल महावीर्यो भीष्मः शान्तनवो नृपान् ।
अधिक्षिप्य महातेजास्तिस्रः कन्या जहार ताः ॥ ४७ ॥
कहते हैं उस अवसरपर महातेजस्वी और महा- पराक्रमी शान्तनुनन्दन भीष्म सब राजाओंको जीतकर इन तीनों कन्याओंको हर लाये ॥ ४७ ॥
निर्जित्य पृथिवीपालानथ भीष्मो गजाह्वयम् ।
आजगाम विशुद्धात्मा कन्याभिः सह भारतः ॥ ४८ ॥
भरतनन्दन भीष्मका हृदय इन कन्याओंके प्रति सर्वथा शुद्ध था । वे समस्त भूपालोंको परास्त करके कन्याओंको साथ लिये हस्तिनापुरमें आये ॥ ४८ ॥
सत्यवत्यै निवेद्याथ विवाहं समनन्तरम् ।
भ्रातुर्विचित्रवीर्यस्य समाज्ञापयत प्रभुः ॥ ४ ९ ॥
वहाँ आकर शक्तिशाली भीष्मने सत्यवतीको ये कन्याएँ सौंप दीं और इनके साथ अपने छोटे भाई विचित्रवीर्यका विवाह करनेकी आज्ञा दे दी ॥ ४ ९ ॥
तं तु वैवाहिकं दृष्ट्वा कन्येयं समुपार्जितम् ।
अब्रवीत् तत्र गाङ्गेयं मन्त्रिमध्ये द्विजर्षभ ॥ ५० ॥
द्विजश्रेष्ठ! वहाँ वैवाहिक आयोजन आरम्भ हुआ देख यह कन्या मन्त्रियोंके बीचमें गंगानन्दन भीष्मसे बोली- ॥ ५० ॥
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मया शाल्वपतिर्वीरो मनसाभिवृतः पतिः ।
न मामर्हसि धर्मज्ञ दातुं भ्रात्रेऽन्यमानसाम् ॥ ५१ ॥
‘ धर्मज्ञ! मैंने मन- ही -मन वीरवर शाल्वराजको अपना पति चुन लिया है; अतः मेरा मन अन्यत्र अनुरक्त होनेके कारण आपको अपने भाईके साथ मेरा विवाह नहीं करना चाहिये ' ॥ ५१ ॥
तच्छ्रुत्वा वचनं भीष्मः सम्मन्त्र्य सह मन्त्रिभिः ।
निश्चित्य विससर्जेमां सत्यवत्या मते स्थितः ॥ ५२ ॥
अम्बाका यह वचन सुनकर भीष्मने मन्त्रियोंके साथ सलाह करके माता सत्यवतीकी सम्मति प्राप्त करके एक निश्चयपर पहुँचकर इस कन्याको छोड़ दिया ॥ ५२ ॥
अनुज्ञाता तु भीष्मेण शाल्वं सौभपतिं ततः ।
कन्येयं मुदिता तत्र काले वचनमब्रवीत् ॥ ५३ ॥
भीष्मकी आज्ञा पाकर यह कन्या मन-ही- मन अत्यन्त प्रसन्न हो सौभ विमानके स्वामी शाल्वके यहाँ गयी और वहाँ उस समय इस प्रकार बोली- ॥ ५३ ॥
विसर्जितास्मि भीष्मेण धर्मं मां प्रतिपादय ।
मनसाभिवृतः पूर्वं मया त्वं पार्थिवर्षभ ॥ ५४ ॥
'नृपश्रेष्ठ! भीष्मने मुझे छोड़ दिया है; क्योंकि पूर्वकालमें मैंने अपने मनसे आपको ही पति चुन लिया था, अतः आप मुझे धर्मपालनका अवसर दें ' ॥ ५४ ॥
प्रत्याचख्यौ च शाल्वोऽस्याश्चारित्रस्याभिशङ्कितः ।
सेयं तपोवनं प्राप्ता तापस्येऽभिरता भृशम् ॥ ५५ ॥
शाल्वराजको इसके चरित्रपर संदेह हुआ; अतः उसने इसके प्रस्तावको ठुकरा दिया है ।
इस कारण तपस्यामें अत्यन्त अनुरक्त होकर यह इस तपोवनमें आयी है ॥ ५५ ॥
मया च प्रत्यभिज्ञाता वंशस्य परिकीर्तनात् ।
अस्य दुःखस्य चोत्पत्तिं भीष्ममेवेह मन्यते ॥ ५६ ॥
इसके कुलका परिचय प्राप्त होनेसे मैंने इसे पहचाना है । यह अपने इस दुःखकी प्राप्तिमें भीष्मको ही कारण मानती है ॥ ५६ ॥
अम्बोवाच
भगवन्नेवमेवेह यथाऽऽह पृथिवीपतिः ।
शरीरकर्ता मातुर्मे सृञ्जयो होत्रवाहनः ॥ ५७ ॥
अम्बा बोली — भगवन्! जैसा कि मेरी माताके पिता सृजयवंशी महाराज होत्रवाहनने कहा है, ठीक ऐसी ही मेरी परिस्थिति है ॥ ५७ ॥
न ह्युत्सहे स्वनगरं प्रतियातुं तपोधन ।
अपमानभयाच्चैव व्रीडया च महामुने ॥ ५८ ॥