अम्बोपाख्यान : भीष्म ने शिखण्डी को क्यों नहीं मारा?
प्रतिज्ञा और धर्म का द्वन्द्व
महाभारतके सन्दर्भ सहित वास्तविक आख्यान — मूल श्लोक और पृष्ठ-सङ्केतके साथ।
महाभारत — खण्ड ३ · उद्योगपर्व · अध्याय 173–196 · पृष्ठ 1099–1228
12,785 शब्द · 64 मिनटका पाठ · 46 श्लोक
सूत ने भृगुनन्दन से कहा
युद्ध की तैयारी के समय दुर्योधन के प्रश्न पर भीष्म द्वारा प्रसङ्ग सुनाना
दुर्योधन ने पूछा— "भरतश्रेष्ठ! जब शिखण्डी धनुष-बाण उठाए समर में आततायी की भाँति आपको मारने आयेगा, उस समय उसे इस रूप में देखकर भी आप क्यों नहीं मारेंगे? महाबाहु गङ्गानन्दन! पितामह! आप पहले तो यह कह चुके हैं कि 'मैं सोमकों सहित पञ्चालों का वध करूँगा', फिर आप शिखण्डी को छोड़ क्यों रहे हैं? यह मुझे बताइये।"
भीष्म ने कहा— "दुर्योधन! मैं जिस कारण से समराङ्गण में प्रहार करते देखकर भी शिखण्डी को नहीं मारूँगा, उसकी कथा कहता हूँ। इन भूमिपालों के साथ सुनो। भरतश्रेष्ठ! मेरे धर्मात्मा पिता लोकविख्यात महाराज शान्तनु का जब निधन हो गया, उस समय अपनी प्रतिज्ञा का पालन करते हुए मैंने भाई चित्राङ्गद को इस महान राज्य पर अभिषिक्त कर दिया। तदनन्तर जब चित्राङ्गद की भी मृत्यु हो गयी; तब माता सत्यवती की सम्मति से मैंने विधिपूर्वक विचित्रवीर्य का राजा के पद पर अभिषेक किया। राजेन्द्र! छोटे होने पर भी मेरे द्वारा अभिषिक्त होकर धर्मात्मा विचित्रवीर्य धर्मतः मेरी ही ओर देखा करते थे, अर्थात् मेरी सम्मति से ही सारा राजकार्य करते थे।"
मयाभिषिक्तो राजेन्द्र यवीयानपि धर्मतः ।
विचित्रवीर्यो धर्मात्मा मामेव समुदैक्षत ॥
राजेन्द्र! छोटे होनेपर भी मेरे द्वारा अभिषिक्त होकर धर्मात्मा विचित्रवीर्य धर्मतः मेरी ही ओर देखा करते थे अर्थात् मेरी सम्मतिसे ही सारा राजकार्य करते थे ।
भीष्म आगे बोले— "तात! तब मैंने अपने योग्य कुल से कन्या लाकर उनका विवाह करने का निश्चय किया। महाबाहो! उन्हीं दिनों मैंने सुना कि काशिराज की तीन कन्याएँ हैं, जो सब की सब अप्रतिम रूप-सौन्दर्य से सुशोभित हैं और वे स्वयंवर-सभामें स्वयं ही पति का चुनाव करने वाली हैं। उनके नाम हैं— अम्बा, अम्बिका और अम्बालिका। भरतश्रेष्ठ! राजेन्द्र! उन तीनों के स्वयंवर के लिये भूमण्डल के सम्पूर्ण नरेश आमन्त्रित किये गये थे। उनमें अम्बा सबसे बड़ी थी, अम्बिका मझली थी और राजकन्या अम्बालिका सबसे छोटी थी। स्वयंवर का समाचार पाकर मैं एक ही रथ के द्वारा काशिराज के नगर में गया।"
"महाबाहो! वहाँ पहुँचकर मैंने वस्त्राभूषणों से अलङ्कृत हुई उन तीनों कन्याओं को देखा। पृथ्वीपते! वहाँ उसी समय आमन्त्रित होकर आये हुए सम्पूर्ण राजाओं पर भी मेरी दृष्टि पड़ी। भरतश्रेष्ठ! तदनन्तर मैंने युद्ध के लिये खड़े हुए उन समस्त राजाओं को ललकारकर उन तीनों कन्याओं को अपने रथ पर बैठा लिया। पराक्रम ही इन कन्याओं का शुल्क है— यह जानकर उन्हें रथ पर चढ़ा लेने के पश्चात् मैंने वहाँ आये हुए समस्त भूपालों से कहा— 'नरश्रेष्ठ राजाओ! शान्तनुपुत्र भीष्म इन राजकन्याओं का अपहरण कर रहा है, तुम सब लोग पूरी शक्ति लगाकर इन्हें छुड़ाने का प्रयत्न करो; क्योंकि मैं तुम्हारे देखते-देखते बलपूर्वक इन्हें लिये जाता हूँ।' इस बात को मैंने बारम्बार दुहराया।"
"फिर तो वे महीपाल कुपित होकर हाथ में हथियार लिये टूट पड़े और अपने सारथियों को— 'रथ तैयार करो, रथ तैयार करो!' इस प्रकार आदेश देने लगे। वे राजा हाथियों के समान विशाल रथों, हाथियों और हृष्ट-पुष्ट अश्वों पर सवार हो अस्त्र-शस्त्र लिये मुझ पर आक्रमण करने लगे। उनमें से कितने ही हाथियों पर सवार होकर युद्ध करने वाले थे। प्रजानाथ! तदनन्तर उन सब नरेशों ने विशाल रथ-समूह द्वारा मुझे सब ओर से घेर लिया। तब मैंने भी बाणों की वर्षा करके चारों ओर से उनकी प्रगति रोक दी और जैसे देवराज इन्द्र दानवों पर विजय पाते हैं, उसी प्रकार मैंने भी उन सब नरेशों को जीत लिया।"
"भरतश्रेष्ठ! जिस समय उन्होंने आक्रमण किया, उसी समय मैंने प्रज्वलित बाणों द्वारा हँसते-हँसते उनके स्वर्णभूषित विचित्र ध्वजों को काट गिराया। फिर एक-एक बाण मारकर मैंने समरभूमि में उनके घोड़ों, हाथियों और सारथियों को भी धराशायी कर दिया। मेरे हाथों की वह फुर्ती देखकर वे पीछे हटने और भागने लगे। वे सब भूपाल नतमस्तक हो गये और मेरी प्रशंसा करने लगे। तत्पश्चात् मैं राजाओं को परास्त करके उन सबको वहीं छोड़ तीनों कन्याओं को साथ ले हस्तिनापुर में आया।"
"महाबाहु भरतनन्दन! फिर मैंने उन कन्याओं को अपने भाई से ब्याहने के लिये माता सत्यवती को सौंप दिया और अपना वह पराक्रम भी उन्हें बताया। भरतश्रेष्ठ! तदनन्तर मैंने वीरजननी दाशराज की कन्या माता सत्यवती के पास जाकर उनके चरणों में प्रणाम करके इस प्रकार कहा— 'माँ! ये काशिराज की कन्याएँ हैं। पराक्रम ही इनका शुल्क था। इसलिये मैं समस्त राजाओं को जीतकर भाई विचित्रवीर्य के लिये इन्हें हर लाया हूँ'।"
"यह सुनकर माता सत्यवती के नेत्रों में हर्ष के आँसू छलक आये। उन्होंने मेरा मस्तक सूँघकर प्रसन्नतापूर्वक कहा— 'बेटा! बड़े सौभाग्य की बात है कि तुम विजयी हुए।' सत्यवती की अनुमति से जब विवाह का कार्य उपस्थित हुआ, तब काशिराज की ज्येष्ठ पुत्री अम्बा ने कुछ लज्जित होकर मुझसे कहा— 'भीष्म! तुम धर्म के ज्ञाता और सम्पूर्ण शास्त्रों के ज्ञान में निपुण हो। मेरी बात सुनकर मेरे साथ धर्मपूर्ण बर्ताव करना चाहिये। मैंने अपने मन से पहले शाल्वराज को अपना पति चुन लिया है और उन्होंने भी एकान्त में मेरा वरण कर लिया है। यह पहले की बात है, जो मेरे पिता को भी ज्ञात नहीं है। भीष्म! मैं दूसरे की कामना करने वाली राजकन्या हूँ। तुम विशेषतः कुरुवंशी होकर राजधर्म का उल्लङ्घन करके मुझे अपने घर में कैसे रखोगे? महाबाहु भरतश्रेष्ठ! अपनी बुद्धि और मन से इस विषय में निश्चित विचार करके तुम्हें जो उचित प्रतीत हो, वही करना चाहिये। प्रजानाथ! शाल्वराज निश्चय ही मेरी प्रतीक्षा करते होंगे; अतः कुरुश्रेष्ठ! तुम्हें मुझे उनकी सेवा में जाने की आज्ञा देनी चाहिये। धर्मात्माओं में श्रेष्ठ! महाबाहु वीर! मुझ पर कृपा करो। मैंने सुना है कि इस पृथ्वी पर तुम सत्यव्रती महात्मा हो'।"
स मां प्रतीक्षते व्यक्तं शाल्वराजो विशाम्पते ।
तस्मान्मां त्वं कुरुश्रेष्ठ समनुज्ञातुमर्हसि ॥
‘ प्रजानाथ! शाल्वराज निश्चय ही मेरी प्रतीक्षा करते होंगे; अतः कुरुश्रेष्ठ! तुम्हें मुझे उनकी सेवामें जानेकी आज्ञा देनी चाहिये ।
"नरेश्वर! तब मैंने माता गन्धवती काली से आज्ञा लेकर मन्त्रियों, ऋत्विजों तथा पुरोहितों से पूछकर बड़ी राजकुमारी अम्बा को जाने की आज्ञा दे दी। आज्ञा पाकर राजकन्या अम्बा वृद्ध ब्राह्मणों के संरक्षण में रहकर शाल्वराज के नगर की ओर गयी। उसके साथ उसकी धाय भी थी। उस मार्ग को लाँघकर वह राजा के यहाँ पहुँच गयी और शाल्वराज से मिलकर इस प्रकार बोली— 'महाबाहो! महामते! मैं तुम्हारे पास ही आयी हूँ। राजन्! मैं सदा तुम्हारे प्रिय और हित में तत्पर रहने वाली हूँ। मुझे अपनाकर आनन्दित करो। मुझे धर्मानुसार ग्रहण करके धर्म के लिये ही अपने चरणों में स्थान दो। मैंने मन-ही-मन सदा तुम्हारा ही चिन्तन किया है और तुमने भी एकान्त में मेरे साथ विवाह का प्रस्ताव किया था'।"
"अम्बा की बात सुनकर शाल्वराज ने मुसकराते हुए कहा— 'सुन्दरी! तुम पहले दूसरे की हो चुकी हो; अतः तुम्हारी जैसी स्त्री के साथ विवाह करने की मेरी इच्छा नहीं है। भद्रे! तुम पुनः वहाँ भीष्म के ही पास जाओ। भीष्म ने तुम्हें बलपूर्वक पकड़ लिया था, अतः अब तुम्हें मैं अपनी पत्नी बनाना नहीं चाहता। भीष्म ने उस महायुद्ध में समस्त भूपालों को हराकर तुम्हें जीता और तुम्हें उठाकर वे अपने साथ ले गये। तुम उस समय उनके साथ प्रसन्न थीं। वरवर्णिनि! जो पहले और की हो चुकी हो, ऐसी स्त्री को मैं अपनी पत्नी बनाऊँ, यह मेरी इच्छा नहीं है। जिस नारी पर पहले किसी दूसरे पुरुष का अधिकार हो गया हो, उसे सारी बातों को ठीक-ठीक जानने वाला मेरे जैसा राजा, जो दूसरों को धर्म का उपदेश करता है, कैसे अपने घर में प्रविष्ट करायेगा? भद्रे! तुम्हारी जहाँ इच्छा हो, चली जाओ। तुम्हारा यह समय यहाँ व्यर्थ न बीते'।"
"यह सुनकर अम्बा शाल्वराज से बोली— 'भूपाल! तुम किसी तरह भी ऐसी बात मुँह से न निकालो। मैं भीष्म के साथ प्रसन्नतापूर्वक नहीं गयी थी। उन्होंने समस्त राजाओं को खदेड़कर बलपूर्वक मेरा अपहरण किया था और मैं रोती हुई ही उनके साथ गयी थी। शाल्वराज! मैं निरपराध अबला हूँ। तुम्हारे प्रति अनुरक्त हूँ। मुझे स्वीकार करो; क्योंकि भक्तों का परित्याग किसी भी धर्म में अच्छा नहीं बताया गया है। युद्ध में कभी पीठ न दिखाने वाले गङ्गानन्दन भीष्म से पूछकर, उनकी आज्ञा लेकर अत्यन्त उत्कण्ठा के साथ मैं यहाँ आयी हूँ। राजन्! महाबाहु भीष्म मुझे नहीं चाहते। उनका यह आयोजन अपने भाई के विवाह के लिये था, ऐसा मैंने सुना है। भीष्म जिन मेरी दो बहिनों— अम्बिका और अम्बालिका को हरकर ले गये थे, उन्हें उन्होंने अपने छोटे भाई विचित्रवीर्य को ब्याह दिया है। पुरुषसिंह शाल्वराज! मैं अपना मस्तक छूकर कहती हूँ; तुम्हारे सिवा दूसरे किसी वर का मैं किसी प्रकार भी चिन्तन नहीं करती हूँ। राजेन्द्र शाल्व! मुझ पर किसी भी दूसरे पुरुष का पहले कभी अधिकार नहीं रहा है। मैं स्वेच्छापूर्वक पहले-पहल तुम्हारी ही सेवा में उपस्थित हुई हूँ। यह मैं सत्य कहती हूँ और इस सत्य के द्वारा ही इस शरीर की शपथ खाती हूँ। विशाल नेत्रों वाले महाराज! मैंने आज से पहले किसी दूसरे पुरुष को अपना पति नहीं समझा है। मैं तुम्हारी कृपा की अभिलाषा रखती हूँ। स्वयं ही अपनी सेवा में उपस्थित हुई मुझ कुमारी कन्या को धर्मपत्नी के रूप में स्वीकार कीजिये'।"
"इस प्रकार अनुनय-विनय करती हुई काशिराज की उस कन्या को शाल्व ने उसी प्रकार त्याग दिया, जैसे सर्प पुरानी केंचुल को छोड़ देता है। नाना प्रकार के वचनों द्वारा बार-बार याचना करने पर भी शाल्वराज ने उस कन्या की बातों पर विश्वास नहीं किया। तब अम्बा क्रोध एवं दुःख से व्याप्त होकर नेत्रों से आँसू बहाती हुई अश्रुगद्गद वाणी में बोली— 'राजन्! यदि मेरी कही बात निश्चित रूप से सत्य हो तो तुमसे परित्यक्त होने पर मैं जहाँ-जहाँ जाऊँ, वहाँ-वहाँ साधु पुरुष मुझे सहारा देने वाले हों'।"
"राजकन्या अम्बा करुण स्वर से विलाप करती हुई इस प्रकार कितनी ही बातें कहती रही; परन्तु शाल्वराज ने उसे सर्वथा त्याग दिया। शाल्व ने बार-बार उससे कहा— 'सुश्रोणि! तुम जाओ, चली जाओ, मैं भीष्म से डरता हूँ। तुम भीष्म के द्वारा ग्रहण की हुई हो।' उस अदूरदर्शी शाल्व के कहने पर अम्बा दीनभाव से रुदन करती हुई उस नगर से निकल गयी। वह दुःखिनी नारी इस प्रकार चिन्ता करने लगी— 'इस पृथ्वी पर कोई भी ऐसी युवती नहीं होगी, जो मेरे समान भारी सङ्कट में पड़ गयी हो। भाई-बन्धुओं से तो दूर हो ही गयी हूँ। राजा शाल्व ने मुझे त्याग दिया है। अब मैं हस्तिनापुर में भी नहीं जा सकती; क्योंकि शाल्व के अनुराग को कारण बताकर मैंने भीष्म से यहाँ आने की आज्ञा ली थी। अब मैं अपनी ही निन्दा करूँ या उस दुर्जय वीर भीष्म को कोसूँ? अथवा अपने मूढ़ पिता को दोष दूँ, जिन्होंने मेरा स्वयंवर किया। मेरे द्वारा सबसे बड़ा दोष यह हुआ है कि पूर्वकाल में जिस समय वह भयङ्कर युद्ध चल रहा था, उसी समय मैं शाल्व के लिये भीष्म के रथ से कूद नहीं पड़ी। इसी का यह फल प्राप्त हुआ है कि मैं एक मूर्ख स्त्री की भाँति भारी आपत्ति में पड़ गयी हूँ। भीष्म को धिक्कार है, विवेकशून्य हृदय वाले मेरे मन्दबुद्धि पिता को भी धिक्कार है, जिन्होंने पराक्रम का शुल्क नियत करके मुझे बाजारू स्त्री की भाँति जनसमूह में निकलने की आज्ञा दी। मुझे धिक्कार है, शाल्वराज को धिक्कार है और विधाता को भी धिक्कार है, जिनकी दुर्नीतियों से मैं इस भारी विपत्ति में फँस गयी हूँ। मनुष्य सर्वथा वही पाता है जो उसके भाग्य में होता है। मुझपर जो यह अन्याय हुआ है, उसका मुख्य कारण शान्तनु नन्दन भीष्म हैं। अतः इस समय तपस्या अथवा युद्ध के द्वारा भीष्म से ही बदला लेना मुझे उचित दिखाई देता है; क्योंकि मेरे दुःख के प्रधान कारण वे ही हैं। परन्तु कौन ऐसा राजा है जो युद्ध के द्वारा भीष्म को परास्त कर सके'।"
सा भीष्मे प्रतिकर्तव्यमहं पश्यामि साम्प्रतम् ।
तपसा वा युधा वापि दुःखहेतुः स मे मतः ॥
‘ अतः इस समय तपस्या अथवा युद्धके द्वारा भीष्मसे ही बदला लेना मुझे उचित दिखायी देता है; क्योंकि मेरे दुःखके प्रधान कारण वे ही हैं ।
"यह निश्चय करके वह नगर से बाहर चली गयी। उसने पुण्यशील तपस्वी महात्माओं के आश्रम पर जाकर वहीं वह रात बितायी। उस आश्रम में तपस्वी लोगों ने सब ओर से घेरकर उसकी रक्षा की थी। अम्बा ने अपने ऊपर बीता हुआ सारा वृत्तान्त विस्तारपूर्वक उन महात्माओं को बताया— किस प्रकार उसका अपहरण हुआ? कैसे भीष्म से छुटकारा मिला? और फिर किस प्रकार शाल्व ने उसे त्याग दिया? उस आश्रम में कठोर व्रत का पालन करने वाले शैखावत्य नाम से प्रसिद्ध एक तपोवृद्ध श्रेष्ठ ब्राह्मण रहते थे, जो शास्त्र और आरण्यक आदि की शिक्षा देने वाले सद्गुरु थे। महातपस्वी शैखावत्य मुनि ने वहाँ सिसकती हुई उस दुःख-शोकपरायणा सती साध्वी आर्त अबला से कहा— 'भद्रे! महाभागे! ऐसी दशा में इस आश्रम में निवास करने वाले तपः परायण तपोधन महात्मा तुम्हारा क्या सहयोग कर सकते हैं?' तब अम्बा ने उनसे कहा— 'भगवन्! मुझ पर अनुग्रह कीजिये। मैं सन्न्यासियों सा धर्म पालन करना चाहती हूँ। यहाँ रहकर दुष्कर तपस्या करूँगी। मुझ मूढ़ नारी ने अपने पूर्वजन्म के शरीर से जो पापकर्म किये थे, अवश्य ही उन्हीं का यह दुःखदायक फल प्राप्त हुआ है'।"
"निष्पाप तापसगण! मैं चाहती हूँ कि आप देवोपम साधुपुरुष मुझे तपस्या का उपदेश दें, मुझपर आप लोगों की कृपा हो।"
उस राजकन्या के इन वचनों को सुनकर शैखावत्य मुनि ने लौकिक दृष्टान्तों और शास्त्रीय युक्तियों से उसे धैर्य बँधाया। ब्राह्मणों ने मिलकर उसके कार्य-साधन हेतु प्रयत्न करने की प्रतिज्ञा भी की। तदनन्तर, वे सभी धर्मात्मा तपस्वी उस कन्या के विषय में चिन्ता करने लगे कि अब क्या किया जाए? कुछ तपस्वियों का विचार था कि इस राजकन्या को इसके पिता के घर पहुँचा दिया जाए, तो कुछ ने उसे उलाहना देने का निश्चय किया। कुछ लोग यह सम्मति रखने लगे कि शाल्वराज को बाध्य करना चाहिए कि वह इसे स्वीकार कर ले, किन्तु अन्य लोगों का मानना था कि ऐसा सम्भव नहीं है क्योंकि शाल्व ने उसे कोरा उत्तर देकर इन्कार कर दिया है।
तपस्वियों ने अम्बा से कहा— "भद्रे! ऐसी स्थिति में मनीषी तापस क्या कर सकते हैं? तुम घर त्यागकर सन्न्यासियों के बीच रहने की आवश्यकता मत समझो। हमारा हितकर वचन सुनो, तुम्हारा कल्याण होगा। यहाँ से अपने पिता के घर चली जाओ। जो आवश्यक कार्य होगा, उसे तुम्हारे पिता काशिराज स्वयं सोचेगा। कल्याणि! तुम वहाँ सर्वगुण सम्पन्न होकर सुख से रह सकोगी। तुम्हारे लिए पिता का आश्रय लेना ही न्यायसङ्गत है; नारी के लिए पति अथवा पिता ही गति होती है। सङ्कटकाल में पिता का आश्रय उत्तम है। तुम सुकुमारी हो, अतः यहाँ आश्रम में तुम्हारा रहना अनेक दोष प्रकट कर सकता है।"
कुछ अन्य तपस्वियों ने उसे चेतावनी दी— "इस निर्जन गहन वन में तुम्हें अकेली देख कितने ही राजा तुमसे प्रणय-प्रार्थना करेंगे, अतः इस प्रकार तपस्या करने का विचार न करो।"
किन्तु अम्बा के स्वर में दृढ़ता थी। वह बोली— "तापसो! अब मेरे लिये पुनः काशिनगर लौटना असम्भव है; क्योंकि वहाँ मुझे बन्धु-बान्धवों में अपमानित होकर रहना पड़ेगा। मैं बाल्यावस्था में पिता के घर रह चुकी हूँ। अब मैं वहाँ नहीं जाऊँगी जहाँ मेरे पिता होंगे। मैं आप तपस्वी जनों द्वारा सुरक्षित होकर यहाँ तपस्या ही करना चाहती हूँ। हे महर्षि! मैं तपस्या इसलिये करना चाहती हूँ जिससे परलोक में भी मुझे इस प्रकार महान सङ्कट और दुर्भाग्य का सामना न करना पड़े।"
अम्बोवाच न शक्यं काशिनगरं पुनर्गन्तुं पितुर्गृहान् ।
अवज्ञाता भविष्यामि बान्धवानां न संशयः ॥
अम्बा बोली – तापसो! अब मेरे लिये पुनः काशिनगरमें पिताके घर लौट जाना असम्भव है; क्योंकि वहाँ मुझे बन्धु - बान्धवोंमें अपमानित होकर रहना पड़ेगा ।
तभी उस वन में राजर्षि होत्रवाहन पधारे। तपस्वियों ने उनका अतिथि-सत्कार किया। जब वे आसन पर बैठकर विश्राम कर रहे थे, तब कन्या अम्बा की चर्चा सुनकर महातेजस्वी होत्रवाहन का चित्त उद्विग्न हो उठा। वह कन्या उनके नाना थी। यह जानकर वे काँपते हुए उठे और उसे गोद में बिठाकर सान्त्वना देने लगे। अम्बा ने रोते हुए सारा वृत्तान्त उन्हें सुनाया।
दुःख से सन्तप्त होकर उन्होंने कहा— "बेटी! यदि तू पिता के घर नहीं जाना चाहती तो मत जा। मैं तेरा दुःख दूर करूँगा। तू मेरे कहने से जमदग्निनन्दन परशुरामजी के पास जा। वे तेरे इस महान दुःख को अवश्य दूर करेंगे। यदि भीष्म उनकी बात नहीं मानेंगे, तो वे युद्ध में उन्हें मार डालेंगे। भार्गवश्रेष्ठ परसुराम प्रलय-काल की अग्नि के समान तेजस्वी हैं। वे तुझे न्यायोचित मार्ग पर प्रतिष्ठित करेंगे।"
अम्बा ने आँसू बहाते हुए अपने नाना को प्रणाम किया और मधुर स्वर में बोली— "नानाजी! मैं आपकी आज्ञा से वहाँ अवश्य जाऊँगी। परन्तु मैं उन विश्वविख्यात श्रेष्ठ महात्मा का दर्शन कैसे कर सकूँगी? वे मेरे इस दुःसह दुःख का नाश किस प्रकार करेंगे?"
होत्रवाहन ने कहा— "बेटी! परसुराम जी महेन्द्र पर्वत पर उग्र तपस्या कर रहे हैं। तू वहीं जा और पहले उन्हें मेरा नाम लेकर अभिवादन करना, तत्पश्चात् अपना कार्य निवेदन करना। वे मेरे सखा और प्रेमी सुहृद् हैं।"
तभी परशुरामजी के प्रिय सेवक अकृतव्रण वहाँ प्रकट हुए। उन्हें देखते ही सभी मुनि और राजा होत्रवाहन उठकर खड़े हो गए। सबका आदर-सत्कार होने के बाद वे सब मिलकर वार्तालाप करने लगे। अकृतव्रण ने पूछा— "राजर्षे! यह कन्या किसलिए वन में आयी है? यह किसकी पुत्री है?"
होत्रवाहन ने बताया— "प्रभो! यह मेरी दौहित्री है। काशिराज की ज्येष्ठ पुत्री अम्बा है। काशीपुरी के स्वयंवर में महातेजस्वी भीष्म इन तीनों कन्याओं को जीतकर हस्तिनापुर ले आए थे। वहाँ भीष्म ने इन्हें अपने भाई विचित्रवीर्य के विवाह हेतु सौंप दिया था। तब इस कन्या ने मन्त्रियों के बीच कहा था कि उसने शाल्वराज को पति चुना है, अतः भीष्म इसका विवाह न कराएं। भीष्म ने उसे छोड़ दिया और वह शाल्व के पास चली गई।"
अकृतव्रण ने अम्बा से पूछा— "तुम्हें दुःख देने वाले दो कारण हैं— भीष्म और शाल्व। तुम किससे बदला लेना चाहती हो? यदि शाल्व को विवश करना है तो परसुराम उन्हें नियुक्त करेंगे, और यदि भीष्म को पराजित देखना है तो वे उन्हें युद्ध में मार देंगे।"
अम्बा ने उत्तर दिया— "भगवन! भीष्म बिना जाने-बूझे मुझे हर लाये थे। उन्हें पता नहीं था कि मेरा मन शाल्व में है। आप जो उचित समझें, वही करें। मैं चाहती हूँ कि युद्ध में भीष्म का वध हो जाए।"
अम्बोवाच भगवञ्शरणं त्वाद्य प्रपन्नास्मि महाव्रतम् ।
शोकपङ्कार्णवान्मग्नां घोरादुद्धर मां विभो ॥
अम्बा बोली– भगवन्! आप महान् व्रतधारी हैं । आज मैं आपकी शरणमें आयी हूँ । प्रभो! इस भयंकर शोकसागरमें डूबने से मुझे बचाइये ।
वक्त बीतता गया और एक रात बीतने के बाद, जब सूर्योदय हुआ, तब अपने शिष्यों से घिरे हुए जटावल्कलधारी मुनिवर परशुरामजी वहाँ प्रकट हुए। वे अपने तेज से प्रज्वलित थे। उनके हाथों में धनुष, खड्ग और फरसा था। उन्हें देखते ही सभी हाथ जोड़कर खड़े हो गए।
परशुरामजी और होत्रवाहन मित्र थे। वे दोनों बैठकर पुरानी बातें करने लगे। बातचीत के अन्त में होत्रवाहन ने मधुर वाणी में उनसे वह अर्थयुक्त वचन कहे...
‘कार्यसाधनकुशल प्रभो! परशुराम! यह मेरी पुत्री की पुत्री काशिराज की कन्या है। इसका कुछ कार्य है, उसे आप इसी के मुँहसे ठीक-ठीक सुन लें।’
होत्रवाहन ने जब राजकुमारी का परिचय दिया, तब वह प्रज्वलित अग्निके समान तेजस्वी परशुरामजी के पास आयी। उसने उनके कल्याणकारी चरणों को सिर से प्रणाम किया और कमलदल के समान सुशोभित होने वाले दोनों हाथों से उनका स्पर्श करते हुए सामने खड़ी हो गयी। उसके नेत्रों में आँसू भर आये थे; वह शोक से आतुर होकर रोने लगी और सबको शरण देनेवाले भृगुनन्दन परशुरामजी की शरण में चली आयी।
परशुरामजी ने उसे ढाँढस बँधाते हुए कहा, “राजकुमारी! जैसे तू इन सञ्जय की दौहित्री है, उसी प्रकार मेरी भी है। तेरे मन में जो दुःख है, उसे बता। मैं तेरे कथनानुसार सब कार्य करूँगा।”
अम्बा ने अत्यन्त व्याकुल होकर कहा, “भगवन्! आप महान् व्रतधारी हैं। आज मैं आपकी शरण में आयी हूँ। प्रभो! इस भयङ्कर शोकसागर में डूबने से मुझे बचाइये।”
भीष्मजी कहते हैं—राजन्! उसके सुन्दर रूप, तरुण शरीर तथा अत्यन्त सुकुमारता को देखकर परशुरामजी चिन्ता में पड़ गये कि न जाने यह क्या कहेगी? दयाभाव से परिपूर्ण भृगुकुलभूषण परशुराम बहुत देर तक उसी के विषय में चिन्ता करते रहे। तदनन्तर जब उन्होंने पुनः कहा कि तुम अपनी बात कहो, तब उस पवित्र मुस्कान वाली अम्बा ने अपना सब वृत्तान्त ठीक-ठीक बता दिया।
परशुरामजी ने उसका कथन सुनकर निश्चय किया और उस सुन्दरी से बोले, “भाविनि! मैं तुझे कुरुश्रेष्ठ भीष्म के पास भेजूँगा। नरपति भीष्म मेरी आज्ञा का पालन करेगा। भद्रे! यदि गङ्गानन्दन भीष्म मेरी बात नहीं मानेगा, तो मैं युद्ध में अस्त्र-शस्त्रों के तेज से उसे मन्त्रियों सहित भस्म कर डालूँगा। अथवा राजकुमारी! यदि वहाँ जाने का तेरा विचार न हो, तो मैं वीर शाल्वराज को ही पहले इस कार्य में नियुक्त करूँ (उसके साथ तेरा ब्याह करा दूँ)।”
प्रेषयिष्यामि भीष्माय कुरुश्रेष्ठाय भाविनि ।
करिष्यति वचो मह्यं श्रुत्वा च स नराधिपः ॥
परशुरामजी बोले- भाविनि! मैं तुझे कुरुश्रेष्ठ भीष्मके पास भेजूँगा । नरपति भीष्म सुनते ही मेरी आज्ञाका पालन करेगा ।
अम्बा ने अपनी व्यथा प्रकट करते हुए कहा, “भृगुनन्दन! शाल्वराज में मेरा अनुराग है और मैं पहले से ही उन्हें पाना चाहती हूँ। यह सुनते ही भीष्म ने मुझे विदा कर दिया था। तब सौभराज के पास जाकर मैंने उनसे ऐसी बातें कहीं जिन्हें अपने मुँहसे कहना स्त्रीजाति के लिये अत्यन्त दुष्कर होता है; परन्तु मेरे चरित्र पर सन्देह हो जाने के कारण उसने मुझे स्वीकार नहीं किया। भृगुनन्दन! इन सब बातों पर बुद्धिपूर्वक विचार करके जो उचित प्रतीत हो, उसी कार्य की ओर आप ध्यान दें। मेरी इस विपत्ति का मूल कारण महान् व्रतधारी भीष्म हैं, जिन्होंने उस समय बलपूर्वक मुझे उठाकर रथ पर रख लिया और इस प्रकार मुझे वश में करके हस्तिनापुर ले आए। महाबाहु भृगुसिंह! आप भीष्म को ही मार डालिये, जिसके कारण मुझे ऐसा दुःख प्राप्त हुआ है और मैं इस प्रकार विवश होकर अत्यन्त अप्रिय आचरण में प्रवृत्त हुई हूँ। निष्पाप भार्गव! भीष्म लोभी, नीच और विजयोल्लास से परिपूर्ण हैं; अतः आपको उसी से बदला लेना उचित है। प्रभो! भरतवंशी भीष्म ने जबसे मुझे इस दशमें डाल दिया है, तबसे मेरे हृदय में यही सङ्कल्प उठता है कि मैं उस महान् व्रतधारी का वध करा दूँ।”
भीष्मजी कहते हैं—राजन्! अम्बा के ऐसा कहने पर कि “प्रभो! भीष्म को मार डालिये”, परशुरामजी ने रो-रोकर बार-बार प्रेरणा देने वाली उस कन्या से कहा, “सुन्दरी! काशिराजकुमारी! मैं अपनी प्रतिज्ञा के अनुसार किसी वेदवेत्ता ब्राह्मण को आवश्यकता हो तो उसी के लिये शस्त्र उठाता हूँ। वैसा कारण हुए बिना इच्छानुसार हथियार नहीं उठाता। अतः इस प्रतिगा की रक्षा करते हुए मैं तेरा दूसरा कौन-सा कार्य करूँ? राजकन्ये! भीष्म और शाल्व दोनों मेरी आज्ञा के अधीन होंगे। तू शोक न कर; मैं किसी तरह ब्राह्मणों की आज्ञा के बिना हथियार नहीं उठाऊँगा, ऐसी मैंने प्रतिज्ञा कर रखी है।”
एवमुक्तस्तदा रामो जहि भीष्ममिति प्रभो ।
उवाच रुदतीं कन्यां चोदयन्तीं पुनः पुनः ॥
काश्ये न कामं गृह्णामि शस्त्रं वै वरवर्णिनि ।
ऋते ब्रह्मविदां हेतोः किमन्यत् करवाणि ते ॥
भीष्मजी कहते हैं - राजन्! अम्बाके ऐसा कहनेपर कि प्रभो! भीष्मको मार डालिये । परशुरामजीने रो - रोकर बार- बार प्रेरणा देनेवाली उस कन्यासे इस प्रकार कहा — ‘ सुन्दरी! काशिराजकुमारी! मैं अपनी प्रतिज्ञाके अनुसार किसी वेदवेत्ता ब्राह्मणको आवश्यकता हो तो उसीके लिये शस्त्र उठाता हूँ । वैसा कारण हुए बिना इच्छानुसार हथियार नहीं उठाता । अतः इस प्रतिज्ञाकी रक्षा करते हुए मैं तेरा दूसरा कौन -सा कार्य करूँ ।
अम्बा ने फिर आग्रह किया, “भगवन्! आप जैसे हो सके वैसे ही मेरा दुःख दूर करें। वह दुःख भीष्म ने पैदा किया है; अतः प्रभो! उसी का शीघ्र वध कीजिये।”
परशुरामजी बोले, “काशिराज की पुत्री! तू पुनः सोचकर बता। यद्यपि भीष्म तेरे लिये वन्दनीय है, तथापि मेरे कहने से वह तेरे चरणों को अपने सिर पर उठा लेगा।”
अम्बा ने दृढ़ता से कहा, “राम! यदि आप मेरा प्रिय करना चाहते हैं तो युद्ध में आमन्त्रित होकर, असुर के समान गर्जना करने वाले भीष्म को मार डालिये और आपने जो प्रतिज्ञा कर रखी है, उसे भी सत्य कीजिये।”
भीष्मजी कहते हैं—राजन्! जब परशुराम और अम्बा के बीच यह बातचीत हो रही थी, उसी समय परम धर्मात्मा ऋषि अकृतव्रण ने यह बात कही, “महाबाहो! यह कन्या शरण में आयी है; अतः आपको इसका त्याग नहीं करना चाहिये। भृगुनन्दन राम! यदि युद्ध में आपके बुलाने पर भी भीष्म सामने आकर अपनी पराजय स्वीकार कर लें अथवा आपकी बात ही मान लें, तो इस कन्या का कार्य सिद्ध हो जायेगा। मैं उसे देख कर हनिष्यामीति भार्गव। वीरवर भार्गव! आपने समस्त क्षत्रियों को जीतकर ब्राह्मणों के बीच यह प्रतिज्ञा की थी कि यदि कोई ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य अथवा शूद्र ब्राह्मणों से द्वेष करेगा तो मैं उसे निश्चय ही मार डालूँगा। साथ ही, जो युद्ध में एकत्र हुए सम्पूर्ण क्षत्रियों को जीत लेगा, उस तेजस्वी पुरुष का भी मैं वध कर डालूँगा। भृगुनन्दन राम! इस प्रकार कुरुकुल का भार वहन करने वाला भीष्म समस्त क्षत्रियों पर विजय पा चुका है; अतः आप सङ्ग्राम में उसके सामने जाकर युद्ध कीजिये।”
शरणागतां महाबाहो कन्यां न त्यक्तुमर्हसि ।
यदि भीष्मो रणे राम समाहूतस्त्वया मृधे ॥
निर्जितोऽस्मीति वा ब्रूयात् कुर्याद् वा वचनं तव ।
कृतमस्या भवेत् कार्यं कन्याया भृगुनन्दन ॥
' महाबाहो! यह कन्या शरणमें आयी है; अतः आपको इसका त्याग नहीं करना चाहिये । भृगुनन्दन राम! यदि युद्धमें आपके बुलानेपर भीष्म सामने आकर अपनी पराजय स्वीकार करे अथवा आपकी बात ही मान ले तो इस कन्याका कार्य सिद्ध हो जायगा ।
परशुरामजी बोले, “मुनिश्रेष्ठ! मुझे अपनी प्रतिज्ञा का स्मरण है, तथापि मैं ऐसा प्रयत्न करूँगा कि सामनीति से ही काम बन जाये। मैं स्वयं उस कन्या को लेकर वहाँ जाऊँगा जहाँ भीष्म है। यदि युद्ध की स्पृहा रखने वाला भीष्म मेरी बात नहीं मानेगा, तो मैं उस अभिमानी को मार डालूँगा; यह मेरा निश्चित विचार है। मेरे चलाये हुए बाण देहधारियों के शरीर में अटकते नहीं, उन्हें विदीर्ण करके बाहर निकल जाते हैं।”
ऐसा कहकर महातपस्वी परशुरामजी उन ब्रह्मवादी महर्षियों के साथ प्रस्थान करने के लिए उद्यत हो गये। वे रातभर वहीं रहकर प्रातःकाल सन्ध्योपासन, गायत्री-जप और अग्निहोत्र करके उस आश्रम से चले। तत्पश्चात् वे उन वेदवादी मुनियों को साथ लेकर राजकन्या अम्बा के साथ कुरुक्षेत्र में आये। वहाँ भृगुश्रेष्ठ परशुरामजी को आगे करके उन सभी तपस्वी महात्माओं ने सरस्वती नदी के तट पर रात्रि में निवास किया।
भीष्मजी कहते हैं—राजन्! तीसरे दिन एक स्थान पर ठहरकर महान् व्रतधारी परशुरामजी ने मुझे सन्देश दिया, “राजन्! मैं यहाँ आया हूँ। तुम मेरा प्रिय कार्य करो।” तेज के भण्डार और महाबली भगवान परशुराम को अपने राज्य की सीमा पर आया हुआ सुनकर मैं बड़ी प्रसन्नता के साथ वेगपूर्वक उनके पास गया। मैं देवताओं के समान तेजस्वी पुरोहितों के साथ उनकी सेवा में उपस्थित हुआ।
प्रतापी परशुरामजी ने मेरी पूजा स्वीकार की और कहा, “भीष्म! तुमने किस विचार से उस कन्या का अपहरण किया? तुमने इस यशस्विनी राजकुमारी को धर्म से भ्रष्ट कर दिया है। तुम्हारे द्वारा इसका स्पर्श कर लिया गया है, ऐसी दशमें इसे दूसरा कौन ग्रहण कर सकता है? तुम इसे हरकर लाये थे, इसी कारण शाल्वराज ने इसके साथ विवाह करने से इनकार कर दिया। अतः अब तुम मेरी आज्ञा से इसे ग्रहण कर लो। तुम्हें ऐसा करना चाहिये जिससे इस राजकुमारी को स्वधर्मपालन का अवसर प्राप्त हो। अनघ! तुम्हें राजाओं का इस प्रकार अपमान करना उचित नहीं।”
स्वधर्मं पुरुषव्याघ्र राजपुत्री लभत्वियम् ।
न युक्तस्त्ववमानोऽयं राज्ञां कर्तुं त्वयानघ ॥
पुरुषसिंह! तुम्हें ऐसा करना चाहिये, जिससे इस राजकुमारीको स्वधर्मपालनका अवसर प्राप्त हो । अनघ! तुम्हें राजाओंका इस प्रकार अपमान करना उचित नहीं ।
तब मैंने उन्हें उदास देखकर कहा, “ब्रह्मन्! अब मैं इसका विवाह अपने भाई के साथ किसी प्रकार नहीं कर सकता। मैंने इसे पहले ही शाल्व की आज्ञा दे दी थी और यह शाल्वराज के नगर चली गयी। मैं क्षत्रियधर्म का त्याग नहीं कर सकता; यह मेरा स्वीकार किया हुआ व्रत है। आप प्रसन्न हों या न हों, आपको जो कुछ करना हो, शीघ्र कर डालिये।”
परशुरामजी क्रोधित होकर बोले, “तुम यदि मेरी बात नहीं मानोगे तो आज मैं मन्त्रियों सहित तुम्हें मार डालूँगा!” उन्होंने यह बात बार-बार दुहराई। मैंने उन्हें शान्त करने के लिए प्रणाम किया और पूछा, “भगवन्! क्या कारण है कि आप मेरे साथ युद्ध करना चाहते हैं? बाल्यावस्था में आपने ही मुझे चार प्रकार के धनुर्वेद की शिक्षा दी है; मैं तो आपका शिष्य हूँ।”
परशुरामजी ने लाल आँखों से कहा, “महामते भीष्म! तुम मुझे गुरु तो समझते हो, परन्तु इस कन्या को ग्रहण नहीं करते। इसे ग्रहण कर लो और अपने कुल की रक्षा करो; तुम्हारे द्वारा मर्यादा से गिर जाने के कारण इसे पति की प्राप्ति नहीं हो रही है।”
मैंने स्पष्ट कह दिया, “ब्रह्मर्षे! अब फिर ऐसी बात नहीं हो सकती। आप मेरे प्राचीन गुरु हैं, यह सोचकर मैं आपका सम्मान कर रहा हूँ, परन्तु आप गुरु का वैसा बर्ताव नहीं जानते। आप जैसे पुरुष को मैं कैसे मार सकता हूँ? यही सोचकर मैंने आपके तीक्ष्ण बर्ताव को चुपचाप सह लिया। यदि ब्राह्मण क्षत्रिय की भाँति युद्ध में सामने आकर लड़ने लगे और पीठ दिखाकर न भागे, तो उसे मार डालने वाले को ब्रह्महत्या का दोष नहीं लगता। मैं क्षत्रिय हूँ और क्षत्रियों के धर्म में स्थित हूँ। आप कुरुक्षेत्र में चलकर मेरे साथ युद्ध कीजिये। जहाँ आपने अपने पिता को अञ्जलि दान देकर आत्मशुद्धि की थी, वहीं मैं आपको मारकर आत्मशुद्धि करूँगा। आप तुरन्त कुरुक्षेत्र पधारिये, मैं वहीं आकर आपके पुरातन दर्प का दलन करूँगा।”
क्षत्रियाणां स्थितो धर्मे क्षत्रियोऽस्मि तपोधन ॥
‘यदि ब्राह्मण भी क्षत्रियकी भाँति धनुष- बाण उठाकर युद्धमें क्रोधपूर्वक सामने आकर युद्ध करने लगे और पीठ दिखाकर भागे नहीं तो उसे इस दशामें देखकर जो योद्धा मार डालता है, उसे ब्रह्महत्याका दोष नहीं लगता, यह धर्मशास्त्रोंका निर्णय है । तपोधन! मैं क्षत्रिय हूँ और क्षत्रियोंके ही धर्ममें स्थित हूँ ।
मैंने उनसे कहा, “आप कहते हैं कि आपने अकेले ही समस्त क्षत्रियों को जीत लिया था, पर आप तो घास-फूस में ही प्रज्वलित हुए थे। तेजस्वी क्षत्रिय तो पीछे उत्पन्न हुए हैं। महाबाहो! आपकी युद्ध की कामना को नष्ट करने वाला यह भीष्म अब उत्पन्न हुआ है। मैं आपका सारा घमण्ड चूर-चूर कर दूँगा।”
यस्ते युद्धमयं दर्पं कामं च व्यपनाशयेत् ।
सोऽहं जातो महाबाहो भीष्मः परपुरंजयः ।
व्यपनेष्यामि ते दर्पं युद्धे राम न संशयः ॥
' महाबाहो! जो आपकी युद्धविषयक कामना तथा अभिमानको नष्ट कर सके, वह शत्रुनगरीपर विजय पानेवाला यह भीष्म तो अब उत्पन्न हुआ है । राम! मैं युद्धमें आपका सारा घमंड चूर- चूर कर दूँगा, इसमें संशय नहीं है'
'कुरुनन्दन! यह देखो, मैं तुम्हारे साथ युद्ध के लिये कुरुक्षेत्र में चलता हूँ। परन्तप! वहीं आओ। वहीं तुम्हारी माता गङ्गा तुम्हें मेरे हाथ से मरकर सैकड़ों बाणों से व्याप्त और कौओं, कङ्कों तथा गीधों का भोजन बना हुआ देखेगी। राजन्! तुम दीन हो। आज तुम्हें मेरे हाथ से मारा गया देख सिद्ध-चारण सेविता गङ्गादेवी रुदन करें। यद्यपि वे महाभागा भगीरथपुत्री पापहीना गङ्गा यह दुःख देखने के योग्य नहीं हैं, तथापि जिन्होंने तुम-जैसे युद्धकामी, आतुर एवं मूर्ख पुत्र को जन्म दिया है, उन्हें यह कष्ट भोगना ही पड़ेगा।'
अयं गच्छामि कौरव्य कुरुक्षेत्रं त्वया सह ।
भाषितं ते करिष्यामि तत्रागच्छ परंतप ॥
तत्र त्वां निहतं माता मया शरशताचितम् ।
जाह्नवी पश्यतां भीष्म गृध्रकङ्कबलाशनम् ॥
'कुरुनन्दन! यह देखो, मैं तुम्हारे साथ युद्धके लिये कुरुक्षेत्रमें चलता हूँ । परंतप! वहीं आओ । मैं तुम्हारा कथन पूरा करूंगा । वहाँ तुम्हारी माता गंगा तुम्हें मेरे हाथसे मरकर सैकड़ों बाणोंसे व्याप्त और कौओं, कंकों तथा गीधोंका भोजन बना हुआ देखेगी ।
शत्रुओं की नगरी पर विजय पाने वाले परशुराम जी को इस प्रकार क्रोधित देखते हुए मैंने अपना मस्तक झुकाकर उन्हें प्रणाम किया और 'एवमस्तु' कहकर उनकी आज्ञा स्वीकार कर ली। ऐसा कहकर परशुराम जी युद्ध की इच्छा से कुरुक्षेत्र में गये और मैंने नगर में प्रवेश करके सत्यवती को सारा समाचार निवेदन किया।
इति ब्रुवाणं तमहं राम परपुरंजयम् ।
प्रणम्य शिरसा राममेवमस्त्वित्यथाब्रुवम् ॥
शत्रुओंकी नगरीपर विजय पानेवाले परशुरामजीको इस प्रकार कहते देख मैंने मस्तक झुकाकर उन्हें प्रणाम किया और ' एवमस्तु' कहकर उनकी आज्ञा स्वीकार की ।
मैं ब्राह्मणों से पुण्याहवाचन कराकर, उनसे कल्याणकारी आशीर्वाद लेकर एक सुन्दर रजतमय रथ पर आरूढ़ हुआ। उस रथ में श्वेत रङ्ग के घोड़े जुते हुए थे। उसमें सब प्रकार की आवश्यक सामग्री सुन्दर ढङ्ग से रखी गयी थी। उसकी बैठक बहुत सुन्दर थी और रथ के ऊपर व्याघ्रचर्म का आवरण लगाया गया था। वह रथ बड़े-बड़े शस्त्रों तथा समस्त उपकरणों से सम्पन्न था। युद्ध में जिसका कार्य अनेक बार देख लिया गया था, ऐसे सुशिक्षित, कुलीन, वीर तथा अश्वशास्त्र के पण्डित सारथि द्वारा उस रथ का सञ्चालन किया जा रहा था।
उपपन्नं महाशस्त्रैः सर्वोपकरणान्वितम् ।
तत्कुलीनेन वीरेण हयशास्त्रविदा रणे ॥
किया और मैं ब्राह्मणोंसे पुण्याहवाचन करा उनसे कल्याणकारी आशीर्वाद ले सुन्दर रजतमय रथपर आरूढ़ हुआ । उस रथमें श्वेत रंगके घोड़े जुते हुए थे । उसमें सब प्रकारकी आवश्यक सामग्री सुन्दर ढंगसे रखी गयी थी । उसकी बैठक बहुत सुन्दर थी । रथके ऊपर व्याघ्रचर्मका आवरण लगाया गया था । वह रथ बड़े- बड़े शस्त्रों तथा समस्त उपकरणोंसे सम्पन्न था । युद्धमें जिसका कार्य अनेक बार देख लिया गया था, ऐसे सुशिक्षित, कुलीन, वीर तथा अश्वशास्त्रके पण्डित सारथिद्वारा उस रथका संचालन और नियन्त्रण होता था ।
उस समय मेरे मस्तक पर श्वेत छत्र तना हुआ था और मेरे दोनों ओर सफेद रङ्ग के चँवर डुलाये जाते थे। मेरे वस्त्र, मेरी पगड़ी और मेरे समस्त आभूषण श्वेतवर्ण के ही थे। विजयसूचक आशीर्वादों के साथ मेरी स्तुति की जा रही थी। उस अवस्था में मैं हस्तिनापुर से निकलकर कुरुक्षेत्र के समराङ्गण में पहुँचा। मेरे घोड़े मन और वायु के समान वेगशाली थे; सारथि के हाँकने पर उन्होंने बात-की-बात में मुझे उस महान् युद्ध के स्थान पर पहुँचा दिया।
स्तूयमानो जयाशीर्भिर्निष्क्रम्य गजसाह्वयात् ।
कुरुक्षेत्रं रणक्षेत्रमुपायां भरतर्षभ ॥
विजयसूचक आशीर्वादोंके साथ मेरी स्तुति की जा रही थी । भरतभूषण! उस अवस्थामें मैं हस्तिनापुरसे निकलकर कुरुक्षेत्रके समरांगणमें गया ।
वहाँ मैं तथा प्रतापी परशुराम जी दोनों कुरुक्षेत्र में पहुँचकर युद्ध के लिये सहसा एक-दूसरे को पराक्रम दिखाने के लिये उद्यत हो गये। तदनन्तर मैं अत्यन्त तपस्वी परशुराम जी की दृष्टि के सामने खड़ा हुआ और अपने श्रेष्ठ शङ्ख को हाथ में लेकर उसे जोर-जोर से बजाने लगा। उस समय वहाँ बहुत-से ब्राह्मण, वनवासी तपस्वी तथा इन्द्र सहित देवगण उस दिव्य युद्ध को देखने लगे। वहाँ इधर-उधर से दिव्य मालाएँ प्रकट होने लगीं और दिव्य वाद्य बज उठे; साथ ही सब ओर मेघों की घटाएँ छा गयीं। परशुराम जी के साथ आये हुए वे सब तपस्वी उस सङ्ग्रामभूमि को सब ओर से घेरकर दर्शक बन गये।
उस समय समस्त प्राणियों का हित चाहने वाली मेरी माता गङ्गादेवी स्वरूपतः प्रकट हुईं और बोलीं— 'बेटा! यह तू क्या करना चाहता है? कुरुश्रेष्ठ! मैं स्वयं जाकर जमदग्निनन्दन परशुराम जी से बारम्बार याचना करूँगी कि आप अपने शिष्य भीष्म के साथ युद्ध न कीजिये।'
मैंने उन्हें रोकने का प्रयास किया, पर वे बोलीं— 'बेटा! तू ऐसा आग्रह न कर। विप्रवर जमदग्निनन्दन परसुराम के साथ समरभूमि में युद्ध करने का हठ अच्छा नहीं है।' वे मुझे डाँटते हुए कहने लगीं— 'क्षत्रियहणो हरतुल्यपराक्रम:। विदित: पुत्र रामस्ते यतस्तं योद्धुमिच्छसि।' अन्त में उन्होंने कहा— 'बेटा! क्षत्रियहन्ता परसुराम महादेव जी के समान पराक्रमी हैं। क्या तू उन्हें नहीं जानता, जो उनके साथ युद्ध करना चाहता है?'
तब मैंने हाथ जोड़कर गङ्गादेवी को प्रणाम किया और स्वयंवर में जैसी घटना घटित हुई थी, वह सारा वृत्तान्त उन्हें आद्योपान्त सुना दिया। मैंने परशुराम जी से पहले जो-जो बातें कही थीं तथा काशिराज की कन्या की जो पुरानी करतूतें थीं, उन सबको बता दिया। तत्पश्चात् मेरी जन्मदायिनी माता गङ्गा ने भृगुनन्दन परसुराम जी के पास जाकर मेरे लिये उनसे क्षमा माँगी। उन्होंने कहा— 'भीष्म आपका शिष्य है; अतः उसके साथ आप युद्ध न कीजिये।' तब याचना करने वाली मेरी माता से परसुराम जी ने कहा— 'तुम पहले भीष्म को ही युद्ध से निवृत्त करो। वह मेरे इच्छानुसार कार्य नहीं कर रहा है; इसलिये मैंने उस पर चढ़ाई की है।'
जब गङ्गादेवी पुत्र-स्नेहवश पुनः भीष्म के पास आयीं, तब भीष्म के नेत्रों में क्रोध व्याप्त था; अतः उन्होंने माता का कहना नहीं माना। इतने में ही भृगुकुलतिलक ब्राह्मण शिरोमणि महातपस्वी धर्मात्मा परसुराम जी दिखाई दिये। उन्होंने सामने आकर युद्ध के लिये भीष्म को ललकारा।
भीष्म बोले— 'ब्रह्मन्! मैं रथ पर बैठा हूँ और आप भूमि पर खड़े हैं। ऐसी दशा में मैं आपके साथ युद्ध नहीं कर सकता।'
परशुराम जी ने मुस्कराते हुए कहा— 'महाबाहो! वीरवर राम! यदि आप समरभूमि में मेरे साथ युद्ध करना चाहते हैं तो रथ पर आरूढ़ होइये और कवच भी बाँध लीजिये।'
तब परसुराम जी बोले— 'कुरुनन्दन भीष्म! मेरे लिये तो पृथ्वी ही रथ है, चारों वेद ही उत्तम अश्वों के समान मेरे वाहन हैं, वायुदेव ही सारथि हैं और वेदमाताएँ— गायत्री, सावित्री और सरस्वती ही कवच हैं।' ऐसा कहते हुए सत्यपराक्रमी परसुराम ने मुझे अपने बाणों के महान् समुदाय से आवृत कर लिया। मैंने देखा कि जमदग्निनन्दन परसुराम सम्पूर्ण श्रेष्ठ आयुधों से सुशोभित, तेजस्वी एवं अद्भुत दिखायी देने वाले रथ में बैठे हैं। उस पुण्यरथ का विस्तार एक नगर के समान था और उसका निर्माण उन्होंने अपने मानसिक सङ्कल्प से किया था। उस स्वर्णभूषित रथ में दिव्य अश्व जुते थे।
ततो मामब्रवीद् रामः स्मयमानो रणाजिरे ।
रथो मे मेदिनी भीष्म वाहा वेदाः सदश्ववत् ॥
सूतश्च मातरिश्वा वै कवचं वेदमातरः ।
सुसंवीतो रणे ताभिर्योत्स्येऽहं कुरुनन्दन ॥
तब परशुरामजी समरांगणमें किंचित् मुसकराते हुए मुझसे बोले -' कुरुनन्दन भीष्म! मेरे लिये तो पृथ्वी ही रथ है, चारों वेद ही उत्तम अश्वोंके समान मेरे वाहन हैं, वायुदेव ही सारथि हैं और वेदमाताएँ ( गायत्री, सावित्री और सरस्वती ) ही कवच हैं । इन सबसे आवृत एवं सुरक्षित होकर मैं रणक्षेत्रमें युद्ध करूँगा '
परसुराम जी ने एक सुन्दर कवच धारण कर रखा था, जिस पर चन्द्रमा और सूर्य के चिह्न बने हुए थे। उन्होंने हाथ में धनुष लेकर पीठ पर तरकस बाँध रखा था और अङ्गुलियों की रक्षा के लिये गोह के चर्म के दस्ताने पहन रखे थे। उनके प्रिय सखा अकृतव्रण उनके सारथि थे, जो 'आओ, आओ' कहकर बार-बार मेरा आह्वान कर रहे थे। उदयकालीन सूर्य के समान तेजस्वी और क्षत्रियविनाशक परसुराम अकेले ही युद्ध के लिये खड़े थे।
जब वे तीन बार मेरे ऊपर बाणों का प्रहार कर चुके, तब मैंने घोड़ों को रोककर और धनुष रखकर रथ से उतरकर पैदल ही उनके पास जाकर विधिपूर्वक प्रणाम किया और कहा— 'भगवन् परसुराम! आप मेरे समान अथवा मुझसे भी अधिक शक्तिशाली हैं। मेरे धर्मात्मा गुरु हैं। मैं इस रणक्षेत्र में आपके साथ युद्ध करूँगा; अतः आप मुझे विजय के लिये आशीर्वाद दें।'
परसुराम जी ने कहा— 'कुरुश्रेष्ठ! अपनी उन्नतिके चाहने वाले प्रत्येक योद्धा को ऐसा ही करना चाहिये। अपने से विशिष्ट गुरुजनों के साथ युद्ध करने वाले राजाओं का यही धर्म है। यदि तुम इस प्रकार मेरे समीप नहीं आते तो मैं तुम्हें शाप दे देता। मैं तुम्हें विजयसूचक आशीर्वाद नहीं दे सकता, क्योंकि इस समय मैं तुम्हें पराजित करने के लिये खड़ा हूँ। जाओ, धर्मपूर्वक युद्ध करो। तुम्हारे इस शिष्टाचार से मैं बहुत प्रसन्न हूँ।'
न तु ते जयमाशासे त्वां विजेतुमहं स्थितः ।
गच्छ युध्यस्व धर्मेण प्रीतोऽस्मि चरितेन ते ॥
मैं तो तुम्हें विजयसूचक आशीर्वाद नहीं दे सकता; क्योंकि इस समय मैं तुम्हें पराजित करनेके लिये खड़ा हूँ । जाओ, धर्मपूर्वक युद्ध करो । तुम्हारे इस शिष्टाचारसे मैं बहुत प्रसन्न हूँ ।
मैं उन्हें नमस्कार करके शीघ्र ही रथ पर जा बैठा और अपना सुवर्णजटित शङ्ख बजाया। तदनन्तर एक-दूसरे को जीतने की इच्छा से हमारा युद्ध बहुत दिनों तक चलता रहा। उन्होंने पहले मेरे ऊपर नौ सौ साठ बाणों का प्रहार किया, जिससे मेरे चारों घोड़ों और सारथि को भी अवरुद्ध कर दिया गया।
मैंने उनसे कहा— 'विप्रवर! आपके शरीर में जो वेद हैं, जो आपका महान् ब्राह्मणत्व है तथा आपने जो बड़ी भारी तपस्या की है, उन सबके ऊपर मैं बाणों का प्रहार नहीं करता हूँ। राम! आपने जिस क्षत्रियधर्म का आश्रय लिया है, मैं उसी पर प्रहार करूँगा; क्योंकि ब्राह्मण हथियार उठाते ही क्षत्रिय भाव को प्राप्त कर लेता है। अब आप मेरे धनुष की शक्ति और मेरी भुजाओं का बल देखिये।'
प्रहरे क्षत्रधर्मस्य यं राम त्वं समाश्रितः ।
ब्राह्मणः क्षत्रियत्वं हि याति शस्त्रसमुद्यमात् ॥
‘ राम! आपने जिस क्षत्रियधर्मका आश्रय लिया है, मैं उसीपर प्रहार करूँगा; क्योंकि ब्राह्मण हथियार उठाते ही क्षत्रियभावको प्राप्त कर लेता है ।
ऐसा कहकर मैंने उनके ऊपर 'भल्ल' नामक तेज धार वाले बाण का प्रहार किया और उनके धनुष के अग्रभाग को काटकर पृथ्वी पर गिरा दिया। इसी प्रकार मैंने उनके रथ की ओर सौ बाण चलाये। उस समय उनके सारे अङ्ग लहूलुहान हो गये; जैसे मेरु पर्वत वर्षाकाल में गेरु मिश्रित जल की धारा बहाता है, वैसे ही परसुराम जी के अङ्गों से रक्त की धारा बहने लगी। वे लाल फूलों से अलङ्कृत अशोक के वृक्ष के समान शोभा पाने लगे।
क्रोध में भरे परसुराम ने दूसरा धनुष लेकर तीखे बाँणों की वर्षा आरम्भ कर दी। उनके बाण सर्प और अग्नि के समान थे, जिन्होंने मुझे कम्पित कर दिया। मैंने भी उन पर सैकड़ों बाण बरसाये। वे बाण अग्नि और विषधर सर्पों के समान भयङ्कर थे। उनसे पीड़ित होकर परसुराम जी अचेत से हो गये।
तब मैं दया से द्रवित होकर स्वयं को धिक्कारने लगा— 'अहो! मुझ क्षत्रिय ने यह बड़ा भारी पाप कर डाला, जो कि धर्मात्मा एवं ब्राह्मण गुरु को इस प्रकार पीड़ा दी।' इसके बाद मैंने उन पर प्रहार नहीं किया और सूर्य के अस्त होने पर युद्ध बन्द हो गया।
अगले दिन प्रातःकाल जब मैं पुनः रथ पर बैठकर आया, तो उन्होंने मुझ पर भयानक बाण चलाये। मैंने भी तीखी धार वाले 'भल्ल' बाणों से उनके सैकड़ों हजारों बाणों के टुकड़े कर दिये। इसके पश्चात् उन्होंने दिव्यास्त्रों का प्रयोग किया, परन्तु मैंने उन सब दिव्य अस्त्रों का निवारण दिव्यास्त्रों द्वारा ही कर दिया। जब मैंने 'वायव्यास्त्र' चलाया, तो उन्होंने 'गुह्यकास्त्र' से उसे शान्त कर दिया; जब मैंने 'आग्नेयास्त्र' चलाया, तो उन्होंने 'वारुणास्त्र' चलाकर उसका निवारण कर दिया। इस प्रकार मैं उनके दिव्यास्त्रों का निवारण करता और वे मेरे अस्त्रों का। अन्त में क्रोध में भरे परसुराम ने मुझे बाएं लेकर मेरे वक्ष:स्थल को बाण से बींध दिया।
'आग्नेयास्त्र' चलाया, तो उन्होंने 'वारुणास्त्र' चलाकर उसका निवारण कर दिया। इस प्रकार मैं उनके दिव्यास्त्रों का निवारण करता और वे मेरे अस्त्रों का। अन्त में क्रोध में भरे परसुराम ने मुझे बाएं लेकर मेरे वक्ष:स्थल को बाण से बींध दिया।
उस चोट से घायल होकर मैं उस श्रेष्ठ रथ पर बैठ गया। मुझे मूर्च्छित अवस्था में देखकर सारथि शीघ्र ही रथ को अन्यत्र ले गया। भरतश्रेष्ठ! परशुराम जी के बाणों से अत्यन्त पीड़ित होने के कारण मुझे बड़ी व्याकुलता हो रही थी। मैं अत्यन्त घायल और अचेत होकर रणभूमि से दूर हट गया था। भारत! इस अवस्था में मुझे देखकर परसुराम जी के अकृतव्रण आदि सेवक तथा काशिराज की कन्या अम्बा—ये सब अत्यन्त प्रसन्न होकर कोलाहल करने लगे।
इतने ही में मुझे चेतना आई और सब कुछ जानकर मैंने अपने सारथि से कहा— 'सूत! जहाँ परशुराम जी हैं, वहीं चलो। मेरी पीड़ा दूर हो गई है और अब मैं युद्ध के लिए सुसज्जित हूँ।' कुरुनन्दन! तब सारथि ने उन अत्यन्त शोभाशाली अश्वों को चलाया, जो वायु के समान वेग से दौड़ने के कारण नृत्य करते हुए प्रतीत हो रहे थे, और मुझे पुनः युद्धभूमि में पहुँचा दिया।
कौरव! मैंने क्रोध से भरे परसुराम जी के पास पहुँचकर उन्हें जीतने की इच्छा से स्वयं भी कुपित होकर उन पर बाणों की वर्षा प्रारम्भ कर दी। किन्तु परशुराम जी ने सीधे लक्ष्य की ओर आने वाले उन बाणों को आते ही, एक-एक करके तीन-तीन बाणों से तुरन्त काट दिया। इस प्रकार मेरे चलाए हुए वे सैकड़ों और हजारों तीखे बाण उनके सायकों द्वारा कटकर दो-दो टुकड़ों में नष्ट हो गए।
तब मैंने पुनः जमदग्नि नन्दन परसुराम की ओर उन्हें मार डालने की इच्छा से एक कालाग्नि के समान प्रज्वलित और तेजस्वी बाण छोड़ा। उस बाण के वेग को सह न पाने के कारण परसुराम जी युद्धभूमि में मूर्च्छित होकर धरती पर गिर पड़े। कुरुनन्दन! उस समय वे तपोधन और काशिराज की कन्या—सब अत्यन्त उद्विग्न होकर उनके पास दौड़े गए। वे उन्हें हृदय से लगाकर, हाथ फेरकर और शीतल जल छिड़ककर विजयसूचक आशीर्वाद देते हुए सान्त्वना देने लगे।
तत एनं समुद्विग्नाः सर्व एवाभिदुद्रुवुः ।
तपोधनास्ते सहसा काश्या च कुरुनन्दन ॥
तत एनं परिष्वज्य शनैराश्वासयंस्तदा ।
पाणिभिर्जलशीतैश्च जयाशीर्भिश्च कौरव ॥
कुरुनन्दन! उस समय वे तपोधन और काशिराजकी कन्या सब - के - सब अत्यन्त उद्विग्न हो सहसा उनके पास दौड़े गये और उन्हें हृदयसे लगा हाथ फेरकर तथा शीतल जल छिड़ककर विजयसूचक आशीर्वाद देते हुए सान्त्वना देने लगे ।
तदनन्तर कुछ स्वस्थ होने पर परसुराम जी उठ खड़े हुए। उन्होंने धनुष पर बाण चढ़ाया और विह्वल स्वर में बोले— 'भीष्म! खड़े रहो, अब तुम मारे गए!' उस महान युद्ध में उनके धनुष से छूटा हुआ वह बाण तुरन्त मेरी बाईं पसली पर लगा, जिससे मैं अत्यन्त उद्विग्न होकर वृक्ष की भाँति झूमने लगा। फिर तो परशुराम जी ने शीघ्र छोड़े हुए अस्त्रों द्वारा मेरे घोड़ों को मारकर, निर्भय होकर मुझ पर बाणों की वर्षा कर दी।
महाबाहो! तत्पश्चात् मैंने भी शीघ्रतापूर्वक ऐसे अस्त्रों का प्रयोग आरम्भ किया, जो विपक्षी की गति को रोक देने वाले थे। मेरे और परसुराण जी के बाण आकाश में सब ओर फैलकर मध्य में ही ठहर गए; मानो वे मेघों द्वारा अवरुद्ध बादलों की भाँति हो गए हों। उस समय वायु के कम्पन और सूर्य की किरणों से समस्त बाण आपस में टकराने लगे, जिससे वहाँ अग्नि प्रकट हो गई। वे सभी बाण अपने ही सङ्घर्ष से उत्पन्न हुई अग्नि में जलकर भस्म होकर भूमि पर गिर पड़े।
कौरवनरेश! उस समय परसुराम जी ने अत्यन्त क्रुद्ध होकर मेरे ऊपर दस हजार, लाख, दस लाख, अर्बुद और खर्ब—अनगिनत बाणों का प्रहार किया। मैंने रणभूमि में विषधर सर्प के समान भयङ्कर सायकों द्वारा उन सब बाणों को वृक्षों की भाँति भूमि पर काट गिराया। इस प्रकार वह युद्ध चलता रहा और सन्ध्याकाल बीतने पर मेरे गुरु रणभूमि से हट गए।
भरतश्रेष्ठ! दूसरे दिन जब पुनः भेंट हुई, तो अत्यन्त भयङ्कर युद्ध प्रारम्भ हुआ। दिव्यास्त्रों के ज्ञाता और शूरवीर भगवान परसुराम जी प्रतिदिन अनेक अलौकिक अस्त्रों का प्रयोग करने लगे। उस तुमुल युद्ध में अपने प्राणों की परवाह न करते हुए मैंने उनके सभी अस्त्रों का विनाश कर डाला। किन्तु बार-बार अपने अस्त्रों के नष्ट होने पर महातेजस्वी परसुराम जी अत्यन्त कुपित हो उठे।
अस्त्रैरस्त्रेषु बहुधा हतेष्वेव च भारत ।
अक्रुध्यत महातेजास्त्यक्तप्राणः स संयुगे ॥
भरतनन्दन! इस प्रकार बार-बार मेरे अस्त्रोंद्वारा अपने अस्त्रोंके विनष्ट होनेपर महातेजस्वी परशुरामजी उस युद्धमें प्राणोंका मोह छोड़कर अत्यन्त कुपित हो उठे ।
अपने अस्त्रों के अवरोध होने पर उन्होंने काल की छोड़ी हुई प्रज्वलित उल्का के समान एक भयङ्कर शक्ति छोड़ी, जिसका अग्रभाग देदीप्यमान था और जो सम्पूर्ण लोक को व्याप्त कर रहा था। मैंने उस शक्ति को अपनी ओर आते देख अनेक बाणों द्वारा उसके तीन टुकड़े करके भूमि पर गिरा दिया। उसके कट जाने पर परसुराम जी क्रोध से जल उठे और उन्होंने दूसरी-दूसरी बारह भयङ्कर शक्तियाँ छोड़ीं। वे इतनी तेजस्विनी और शीघ्रगामिनी थीं कि उनका वर्णन असम्भव है; वे प्रलयकाल के बारह सूर्यों के समान भयानक थीं।
तस्यां छिन्नायां क्रोधदीप्तोऽथ रामः शक्तीर्घोराः प्राहिणोद् द्वादशान्याः ।
तासां रूपं भारत नोत शक्यं तेजस्वित्वाल्लाघवाच्चैव वक्तुम् ॥
उस शक्तिके कट जानेपर परशुरामजी क्रोधसे जल उठे तथा उन्होंने दूसरी -दूसरी भयंकर बारह शक्तियाँ और छोड़ीं । भारत! वे इतनी तेजस्विनी तथा शीघ्रगामिनी थीं कि उनके स्वरूपका वर्णन करना असम्भव है ।
राजन्! मैंने उन शक्तियों को देखकर अपने बाणों से उन्हें छिन्न-भिन्न कर डाला। तत्पश्चात् महात्मा परसुराम ने स्वर्णमय दण्डों से सुसज्जित ऐसी भयानक शक्तियाँ चलाईं, जो जलती हुई बड़ी-बड़ी उल्काओं के समान प्रतीत होती थीं। मैंने उन भयङ्कर शक्तियों को ढाल और तलवार से काटकर गिरा दिया। फिर मैंने उनके दिव्य घोड़ों और सारथि पर बाणों की वर्षा कर दी।
वे शक्तियाँ केंचुल से निकले सर्पों के समान सुवर्णजटित और विचित्र थीं। उन्हें कटता देख महात्मा परसुराम ने कुपित होकर पुनः अपना दिव्य अस्त्र प्रकट किया। फिर टिड्डियों की पङ्क्तियों के समान प्रज्वलित भयङ्कर बाणों के समूह प्रकट हुए, जिन्होंने मेरे शरीर, रथ, सारथि और घोड़ों को सर्वथा आच्छादित कर दिया। मेरा रथ और उसके अङ्ग उनके बाणों से छिन्न-भिन्न हो गए।
ततोऽभ्रान्ते रथे तिष्ठन् रामः प्रहरतां वरः ।
ववर्ष शरजालानि मयि मेघ इवाचले ॥
तत्पश्चात् योद्धाओंमें श्रेष्ठ परशुरामजी स्थिर रथपर खड़े हो जैसे मेघ पर्वतपर जलकी बौछार करता है, उसी प्रकार मेरे ऊपर बाणसमूहोंकी वर्षा करने लगे ।
जब उनकी वर्षा समाप्त हुई, तब मैंने भी गुरुदेव पर बाणों की बौछार कर दी। वे ब्रह्मराशि महात्मा मेरे बाणों से क्षत-विक्षत होकर रक्त की धारा बहाने लगे। जिस प्रकार वे मेरे प्रहारों से सन्तप्त थे, उसी प्रकार मैं भी उनके बाणों से घायल हो रहा था। सन्ध्याकाल में सूर्य के अस्ताचल जाने पर युद्ध थम गया।
ततोऽहं तामिषुभिर्दीप्यमानां समायान्तीमन्तकालार्कदीप्ताम् ।
छित्त्वा त्रिधा पातयामास भूमौ ततो ववौ पवनः पुण्यगन्धिः ॥
तब मैंने प्रलयकालके सूर्यकी भाँति प्रज्वलित होनेवाली उस देदीप्यमान शक्तिको अपनी ओर आती देख अनेक बाणोंद्वारा उसके तीन टुकड़े करके उसे भूमिपर गिरा दिया । फिर तो पवित्र सुगन्धसे युक्त मन्द मन्द वायु चलने लगी ।
राजेन्द्र! प्रातःकाल जब सूर्य उदित हुआ, तो युद्ध पुनः प्रारम्भ हुआ। परसुराम जी स्थिर रथ पर खड़े होकर मुझ पर बाणों की ऐसी वर्षा करने लगे जैसे मेघ पर्वत पर जल बरसाते हैं। उस समय मेरा प्रिय सारथि बाणों के प्रहार से पीड़ित होकर रथ की बैठक से नीचे गिर गया और अचेत हो गया। देखते ही देखते उसने प्राण त्याग दिए।
उस सारथि की मृत्यु के कारण मैं अत्यन्त व्याकुल था। उसी क्षण परसुराम जी ने अपने सुदृढ़ धनुष को जोर से खींचकर मुझ पर एक गहरा आघात किया। वह रक्त पीने वाला बाण मेरी दोनों भुजाओं के बीच, वक्ष:स्थल में लगा और मैं पृथ्वी पर गिर पड़ा। मुझे मारा गया जानकर परसुराम जी मेघ के समान गम्भीर स्वर में गर्जना करने लगे और हर्षित होकर अपने अनुयायियों के साथ कोलाहल करने लगे।
मत्वा तु निहतं रामस्ततो मां भरतर्षभ ।
मेघवद् विननादोच्चैर्जहृषे च पुनः पुनः ॥
भरतश्रेष्ठ! उस समय मुझे मारा गया जानकर परशुरामजी मेघके समान गम्भीर स्वरसे गर्जना करने लगे । उनके शरीरमें बार - बार हर्षजनित रोमांच होने लगा ।
वहाँ मेरे पार्श्व में खड़े कुरुवंशी क्षत्रियगण और युद्ध देखने आए लोग, मेरे गिरने पर अत्यन्त दुखी हुए। गिरते समय मैंने देखा कि सूर्य और अग्नि के समान तेजस्वी आठ ब्राह्मण आए और उन्होंने मुझे अपनी भुजाओं पर धारण कर लिया। उन ब्राह्मणों ने मुझ पर जल छिड़ककर कहा— 'तुम्हारा कल्याण हो। तुम भयभीत न हो।' उनके वचनों से तृप्त होकर मैं उठ खड़ा हुआ और देखा कि मेरे रथ पर सारथि के स्थान में माता गङ्गा बैठी थीं।
उस महान नदी की देवी ने मेरे घोड़ों की बागडोर पकड़ रखी थी। मैंने माता के चरणों को स्पर्श कर और पितरों के निमित्त मस्तक नवाकर रथ पर स्थान लिया। माता ने मेरे रथ और उपकरणों की रक्षा की, जिसके बाद मैंने हाथ जोड़कर उन्हें विदा किया। तदनन्तर, मैं पुनः उन वायु के समान वेगशाली घोड़ों को काबू में करके परसुराम जी के साथ युद्ध करने लगा।
उस समरभूमि में मैंने परसुराम जी की ओर एक अत्यन्त प्रबल और हृदय को विदीर्ण कर देने वाला बाण चलाया। अनेक सहस्र ब्राह्मणों को दान करने वाले परसुराम जी के धराशायी होने पर, आकाश में काले बादलों ने छाया कर ली और बिजली की गड़गड़ाहट के समान सैकड़ों उल्कापात होने लगे। भूकम्प आया और सूर्य को राहु ने घेर लिया। तीव्र वायु चलने लगी और धरती डोलने लगी।
महात्मा परसुराम के मूर्च्छित होकर पृथ्वी पर गिरते ही ये समस्त भयङ्कर अपशकुन होने लगे। तब दयालु महर्षियों ने उन्हें रोका। वह बाण कालाग्नि के समान था, किन्तु मुनियों के कहने पर परसुराम जी ने उस बाण का उपसंहार कर दिया। तदनन्तर सूर्य मन्द किरणों के साथ अस्ताचल की ओर चला गया और रात्रि आ गई। शीतल वायु चलने लगी और हमने युद्ध समाप्त कर दिया।
इस प्रकार प्रतिदिन सन्ध्या में युद्ध बन्द होता और प्रातःकाल पुनः भयङ्कर सङ्ग्राम छिड़ जाता था। इस प्रकार हमारे युद्ध के तेईस दिन बीत गए।
"राजेन्द्र! तदनन्तर मैं रात के समय एकान्त में शय्या पर जाकर ब्राह्मणों, पितरों, देवताओं, निशाचरों, भूतों तथा राजर्षिगणों को मस्तक झुकाकर प्रणाम करने के पश्चात् मन ही मन इस प्रकार चिन्ता करने लगा— आज बहुत दिन हो गये, जमदग्निनन्दन परशुरामजी के साथ यह मेरा अत्यन्त भयङ्कर और महान् अनिष्टकारक युद्ध चल रहा है। परन्तु मैं महाबली, महापराक्रमी विप्रवर परशुरामजी को समरभूमि में युद्ध के मुहाने पर किसी तरह जीत नहीं सकता। यदि प्रतापी जमदग्निकुमार को जीतना मेरे लिये सम्भव हो, तो प्रसन्न हुए देवगण रात्रि में मुझे दर्शन दें।"
यदि शक्यो मया जेतुं जामदग्न्यः प्रतापवान् ।
दैवतानि प्रसन्नानि दर्शयन्तु निशां मम ॥
यदि प्रतापी जमदग्निकुमारको जीतना मेरे लिये सम्भव हो तो प्रसन्न हुए देवगण रात्रिमें मुझे दर्शन दें ।
"राजेन्द्र! ऐसी प्रार्थना करके बाणों से क्षत-विक्षत हुआ मैं रात्रि के अन्त में प्रभात के समय दाहिनी करवट से सो गया। महाराज! कुरुश्रेष्ठ! तत्पश्चात् जिन ब्राह्मणशिरोमणियों ने रथ से गिरने पर मुझे थाम लिया था तथा 'डरो मत' ऐसा कहकर सान्त्वना दी थी, उन्हीं लोगों ने मुझे सपने में दर्शन दे मेरे चारों ओर खड़े होकर जो बात कही थी, उसे बताता हूँ, सुनो—"
"गङ्गानन्दन! उठो! भयभीत न होओ। तुम्हें कोई भय नहीं है। कुरुनन्दन! हम तुम्हारी रक्षा करते हैं, क्योंकि तुम हमारे ही स्वरूप हो। जमदग्निकुमार परशुराम तुम्हें किसी प्रकार युद्ध में जीत नहीं सकेंगे। भरतभूषण! तुम्हीं रणक्षेत्र में परशुराम पर विजय पाओगे। भारत! यह 'प्रस्वाप' नामक अस्त्र है, जिसके देवता प्रजापति हैं। विश्वकर्माण इसका आविष्कार किया है। यह तुम्हें भी परम प्रिय है; इसकी प्रयोगविधि तुम्हें स्वतः ज्ञात हो जाएगी, क्योंकि पूर्वशरीर में तुम्हें भी इसका पूर्ण ज्ञान था। परशुरामजी भी इस अस्त्र को नहीं जानते हैं। इस पृथ्वी पर कहीं किसी भी पुरुष को इसका ज्ञान नहीं है। महाबाहो! इस अस्त्र का स्मरण करो और विशेष रूप से इसी का प्रयोग करो। निष्पाप राजेन्द्र! यह अस्त्र स्वयं ही तुम्हारी सेवा में उपस्थित हो जाएगा। कुरुनन्दन! उसके प्रभाव से तुम सम्पूर्ण महापराक्रमी नरेशों पर शासन करोगे। राजन्! उस अस्त्र से परशुराम का नाश नहीं होगा, इसलिये मानद! तुम्हें कभी इसके द्वारा पाप से संयोग नहीं होगा। तुम्हारे अस्त्र के प्रभाव से पीड़ित होकर जमदग्नि कुमार परशुराम चुपचाप सो जाएंगे। भीष्म! तदनन्तर अपने उस प्रिय अस्त्र के द्वारा युद्ध में विजयी होकर तुम्हीं उन्हें सम्बोधनास्त्र द्वारा पुनः जगाकर उठाओगे। कुरुनन्दन! प्रातःकाल रथ पर बैठकर तुम ऐसा ही करो; क्योंकि हम लोग सोये अथवा मरे हुए को समान ही समझते हैं। राजन्! परशुराम की कभी मृत्यु नहीं हो सकती; अतः इस प्राप्त हुए प्रस्वाप नामक अस्त्र का प्रयोग करो।"
"इत्युक्त्वान्तर्हिता राजन् सर्व एव द्विजोत्तमाः। अष्टौ सदृशरूपास्ते सर्वे भासुरमूर्तयः॥"
"राजन्! ऐसा कहकर वे वसुस्वरूप सभी श्रेष्ठ ब्राह्मण अदृश्य हो गये। वे आठों समान रूप वाले थे। उन सबके शरीर तेजोमय प्रतीत हो रहे थे। इस प्रकार श्रीमहाभारतउद्योगपर्व के अन्तर्गत अम्बोपाख्यानपर्व में भीष्म को प्रस्वापनास्त्र की प्राप्ति विषयक एक सौ तिरासीवाँ अध्याय पूरा हुआ।"
"भीष्मजी कहते हैं— भारत! तदनन्तर रात बीतने पर जब मेरी नींद खुली, तब उस स्वप्न की बात को सोचकर मुझे बड़ा हर्ष प्राप्त हुआ। मेरा और परशुरामजी का भयङ्कर युद्ध छिड़ गया, जो समस्त प्राणियों के रोंगटे खड़े कर देने वाला और अद्भुत था। उस समय भृगुनन्दन परशुरामजी ने मुझ पर बाणों की झड़ी लगा दी। तब मैंने अपने सायकसमूहों से उस बाणवर्षा को रोक दिया। महातपस्वी परशुराम पुनः मुझ पर अत्यन्त कुपित हो गये। पहले दिन का कोप था ही, उससे प्रेरित होकर उन्होंने मेरे ऊपर शक्ति चलाई। उसका स्पर्श इन्द्र के वज्र के समान भयङ्कर था। उसकी प्रभा यमदण्ड के समान थी और उस सङ्ग्राम में अग्निके समान प्रज्वलित हुई वह शक्ति मानो सब ओर से रक्त चाट रही थी।"
"भरतश्रेष्ठ! कुरुकुलरत्न! फिर आकाशवर्ती नक्षत्र के समान प्रकाशित होने वाली उस शक्ति ने तुरन्त आकर मेरे गले की हँसली पर आघात किया। लाल नेत्रों वाले महाबाहु दुर्योधन! परशुरामजी के द्वारा किये हुए उस गहरे आघात से भयङ्कर रक्त की धारा बह चली; मानो पर्वत से गैरिक धातु मिश्रित जल का झरना झर रहा हो। तब मैंने भी अत्यन्त कुपित होकर सर्पविष के समान भयङ्कर मृत्यु तुल्य बाण लेकर परशुरामजी के ऊपर चलाया। उस बाण ने विप्रवर वीर परशुरामजी के ललाट में चोट पहुँचाई; उसके कारण वे शिखरयुक्त पर्वत के समान शोभा पाने लगे।"
"तब उन्होंने भी रोष में आकर काल और यम के समान भयङ्कर शत्रुनाशक बाण को हाथ में लेकर धनुष को बलपूर्वक खींचकर उसके ऊपर रखा। राजन्! उनका चलाया हुआ वह भयङ्कर बाण फुफकारते हुए सर्प के समान सनसनाता हुआ मेरी छाती पर आकर लगा। उससे लहूलुहान होकर मैं पृथ्वी पर गिर पड़ा। वह शक्ति उन ब्राह्मणशिरोमणियों की दोनों भुजाओं के ठीक बीच में जाकर लगी। राजन्! इससे वे विह्वल हो गये और उनके शरीर में कँपकँपी आ गयी। तब उनके महातपस्वी मित्र अकृतव्रण ने उन्हें हृदय से लगाकर सुन्दर वचनों द्वारा अनेक प्रकार से आश्वासन दिया।"
"तदनन्तर महाव्रती परसाहु परशुरामजी धैर्ययुक्त होकर क्रोध और अमर्ष में भर गये और उन्होंने परम उत्तम ब्रह्मास्त्र का प्रयोग किया। तब उस अस्त्र का निवारण करने के लिये मैंने भी उत्तम ब्रह्मास्त्र का ही प्रयोग किया। मेरा वह अस्त्र प्रलयकाल का दृश्य उपस्थित करता हुआ प्रज्वलित हो उठा। भरतवंशशिरोमणे! वे दोनों ब्रह्मास्त्र मेरे तथा परशुरामजी के पास न पहुँचकर बीच में ही एक-दूसरे से भिड़ गये। प्रजानाथ! फिर तो आकाश में केवल आग की ही ज्वाला प्रकट होने लगी। इससे समस्त प्राणियों को बड़ी पीड़ा हुई। उन ब्रह्मास्त्रों के तेज से पीड़ित होकर ऋषि, गन्धर्व तथा देवता भी अत्यन्त सन्तप्त हो उठे। पर्वत, वन और वृक्षों सहित सारी पृथ्वी डोलने लगी; भूतल के समस्त प्राणी सन्तप्त होकर अत्यन्त विषाद करने लगे। राजन्! उस समय आकाश जल रहा था और सम्पूर्ण दिशाओं में धूम व्याप्त हो रही थी; आकाशचारी प्राणी भी आकाश में ठहर न सके।"
तयोर्ब्रह्मास्त्रयोरासीदन्तरा वै समागमः ।
असम्प्राप्यैव रामं च मां च भारतसत्तम ॥
भरतवंशशिरोमणे! वे दोनों ब्रह्मास्त्र मेरे तथा परशुरामजीके पास न पहुँचकर बीचमें ही एक - दूसरे से भिड़ गये ।
"इस प्रकार श्रीमहाभारत उद्योगपर्व के अन्तर्गत अम्बोपाख्यानपर्व में परस्पर ब्रह्मास्त्रयोग विषयक एक सौ चौरासीवाँ अध्याय पूरा हुआ।"
"भाविनि! यह सब लोगोंने प्रत्यक्ष देखा है कि मैंने तेरे लिये पूरी शक्ति लगाकर युद्ध किया और महान् पुरुषार्थ दिखाया है, परन्तु इस प्रकार उत्तमोत्तम अस्त्र प्रकट करके भी मैं शस्त्रधारियों में श्रेष्ठ भीष्म से अपनी अधिक विशिष्टता नहीं दिखा सका। मेरी अधिक-से-अधिक शक्ति और बल इतना ही है। भद्रे! अब तेरी जहाँ इच्छा हो, चली जा, अथवा बता, तेरा दूसरा कौन-सा कार्य सिद्ध करूँ? अब तू भीष्म की ही शरण ले। तेरे लिये दूसरी कोई गति नहीं है; क्योंकि महान् अस्त्रों का प्रयोग करके भीष्म ने मुझे जीत लिया है।"
महामना परशुराम लम्बी साँस खींचते हुए मौन हो गए। तब राजकन्या अम्बा ने उन भृगुनन्दन की ओर देखा और कहा— "भगवन्! आपका कहना ठीक है। वास्तव में ये उदारबुद्धि भीष्म युद्ध में देवताओं के लिये भी अजेय हैं। आपने अपनी पूरी शक्ति लगाकर पूर्ण उत्साह के साथ मेरा कार्य किया है। युद्ध में ऐसा पराक्रम दिखाया है, जिसे भीष्म के सिवा दूसरा कोई रोक नहीं सकता था। आपने नाना प्रकार के दिव्यास्त्र भी प्रकट किये हैं; परन्तु अन्ततोगत्वा आप युद्ध में उनकी अपेक्षा अपनी विशेष्यता स्थापित न कर सके। मैं भी अब किसी प्रकार पुनः भीष्म के पास नहीं जाऊँगी। हे भृगुश्रेष्ठ तपोधन! अब मैं वहीं जाऊँगी, जहाँ ऐसी बन सकूँ कि समरभूमि में स्वयं ही भीष्म को मार गिराऊँ।"
गमिष्यामि तु तत्राहं यत्र भीष्मं तपोधन ।
समरे पातयिष्यामि स्वयमेव भृगूद्वह ॥
' भृगुश्रेष्ठ तपोधन! अब मैं वहीं जाऊँगी, जहाँ ऐसी बन सकूँ कि समरभूमिमें स्वयं ही भीष्मको मार गिराऊँ'
रोषभरे नेत्रों वाली वह राजकन्या अपने वध के उपाय का चिन्तन करने लगी और कठोर तपस्या का सङ्कल्प लेकर वहाँ से चली गई। तदनन्तर भृगुश्रेष्ठ परशुरामजी उन महर्षियों के साथ वैसे ही विदा होकर महेन्द्र पर्वत पर चले गए जैसे वे आए थे।
महाराज! तत्पश्चात् मैंने ब्राह्मण के मुख से अपनी प्रशंसा सुनते हुए रथ पर आरूढ़ होकर हस्तिनापुर में आकर माता सत्यवती से सब समाचार यथार्थ रूप से निवेदन किया। माता ने भी मेरा अभिनन्दन किया। इसके बाद मैंने कुछ बुद्धिमान पुरुषों को उस कन्या के वृत्तान्त का पता लगाने के कार्य में नियुक्त कर दिया। मेरे लगाये हुए गुप्तचर सदा मेरे प्रिय और हित में संलग्न रहने वाले थे; वे प्रतिदिन उस कन्या की गतिविधि, बोलचाल और चेष्टा का समाचार मेरे पास पहुँचाया करते थे। जिस दिन वह कन्या तपस्या का निश्चय करके वन में गयी, उसी दिन मैं व्यथित, दीन और अचेत सा हो गया।
तात! जो तपस्या के द्वारा कठोर व्रत का पालन करने वाले हैं, उन ब्रह्मज्ञ ब्राह्मण परशुरामजी को छोड़कर कोई भी क्षत्रिय अब तक युद्ध में मुझे पराजित नहीं कर सका है। राजन्! मैंने यह वृत्तान्त देवर्षि नारद और महर्षि व्यास से भी निवेदन किया था। उस समय उन दोनों ने मुझसे कहा— "भीष्म! तुम्हें काशिराज की कन्या के विषय में तनिक भी विषाद नहीं करना चाहिये। दैव के विधान को पुरुषार्थ के द्वारा कौन टाल सकता है?"
महाराज! फिर वह कन्या आश्रम मण्डल में पहुँचकर यमुना के तटका का आश्रय लेकर ऐसी कठोर तपस्या करने लगी, जो मानवीय शक्ति से परे थी। उसने भोजन छोड़ दिया; वह दुबली और रुक्ष हो गयी। उसके सिर पर केशों की जटा बन गयी और शरीर में मैल और कीचड़ जम गया। वह तपोधना कन्या छः महीनों तक केवल वायु पीकर, ठूंठे काठ की भाँति निश्चल भाव से खड़ी रही। फिर एक वर्ष तक यमुनाजी के जल में घुसकर, बिना कुछ खाए-पिए वह भाविनी राजकन्या जल में ही रहकर तपस्या करती रही। तत्पश्चात् तीव्र क्रोध से युक्त हुई अम्बा ने पैर के अँगूठे के अग्रभाग पर खड़ी होकर, केवल एक सूखा पत्ता खाकर अपना एक वर्ष व्यतीत किया।
"द्वादश वर्षाणि तापयामास रोदसी। निवर्त्यमानापि च सा ज्ञातिभिर्नैव शक्यते॥"
इस प्रकार बारह वर्षों तक कठोर तपस्या में संलग्न होकर उसने पृथ्वी और आकाश को सन्तप्त कर दिया। उसके जातिवालोंने आकर उसे उस कठोर व्रत से निवृत्त करने की चेष्टा की, परन्तु उन्हें सफलता न मिल सकी। तदनन्तर वह सिद्धों और चारणों द्वारा सेवित वत्सदेश की भूमि में गयी और वहाँ पुण्यशील तपस्वी महात्माओं के आश्रमों में विचरने लगी। वह काशिराज की कन्या दिन-रात वहाँ के पुण्य तीर्थों में स्नान करती और अपनी इच्छा के अनुसार सर्वत्र विचरती रहती थी।
महाराज! शुभकारक नन्दाश्रम, उलूकाश्रम, च्यवनाश्रम, ब्रह्मस्थान, देवताओं के यज्ञस्थान प्रयाग, देवारण्य, भोगवती, कौशिकाश्रम, माण्डव्याश्रम, दिलीपाश्रम, रामह्रद और पैलगर्गाश्रम— क्रमशः इन सभी तीर्थों में उन दिनों उस कन्या ने कठोर व्रत का आश्रय ले स्नान किया।
कुरुनन्दन! उस समय मेरी माता गङ्गा ने जल में प्रकट होकर अम्बा से कहा— "भद्रे! तू किस लिये शरीर को इतना क्लेश देती है? मुझे ठीक-ठीक बता।"
राजन्! तब साध्वी अम्बा ने हाथ जोड़कर गङ्गाजी से कहा— "चारुलोचने! भीष्म ने युद्ध में परशुरामजी को परास्त कर दिया; फिर दूसरा कौन ऐसा राजा है, जो धनुष-बाराण लेकर खड़े हुए भीष्म को युद्ध में परास्त कर सके? अतः मैं भीष्म के विनाश के लिये अत्यन्त कठोर तपस्या कर रही हूँ। हे देवी! मैं इस भूतल पर विभिन्न तीर्थों में इसी लिये विचर रही हूँ कि योग्य बनकर मैं स्वयं ही भीष्म को मार सकूँ। भगवति! इस जगत् में मेरे व्रत और तपस्या का यही सर्वोत्तम फल है, जैसा मैंने आपको बताया है।"
विचरामि महीं देवि यथा हन्यामहं नृपम् ।
एतद् व्रतफलं देवि परमस्मिन् यथा हि मे ॥
‘ देवि! मैं इस भूतलपर विभिन्न तीर्थोंमें इसीलिये विचर रही हूँ कि योग्य बनकर मैं स्वयं ही भीष्मको मार सकूँ । भगवति! इस जगत्में मेरे व्रत और तपस्याका यही सर्वोत्तम फल है, जैसा मैंने आपको बताया है '
तब सतरगामिनी गङ्गानदी ने उससे कहा— "भाविनि! तू कुटिल आचरण कर रही है। सुन्दर अङ्गों वाली अबले! तेरा यह मनोरथ कभी पूर्ण नहीं हो सकता। यदि भीष्म के विनाश के लिये तू प्रयत्न कर रही है और व्रत में स्थित रहकर ही यदि तू अपना शरीर छोड़ेगी, तो शुभे! तुझे टेढ़ी-मेढ़ी नदी होना पड़ेगा। केवल बरसात में ही तेरे भीतर जल दिखाई देगा। तेरे भीतर तीर्थ या स्नान की सुविधा बड़ी कठिनाई से होगी। तू केवल बरसात की नदी समझी जाएगी; शेष आठ महीनों में तेरा पता नहीं लगेगा। भीमग्राहवती घोरा सर्वभूतभयङ्करी॥"
एवम् कहकर वह राज्ञी लौट गयी। राजन्! काशिराज की कन्या से ऐसा कहकर मेरी परम सौभाग्यशालिनी माता गङ्गा देवी मुस्कुराती हुई लौट गयीं। तदनन्तर वह सुन्दरी कन्या पुनः कठोर तपस्या में प्रवृत्त हुई और कभी आठवें तो कभी दसवें महीने तक जल भी नहीं पीती थी।
कुरुनन्दन! वह कन्या तीर्थ सेवन के लोभ से वत्सदेश की भूमि पर इधर-उधर दौड़ती फिरती थी। "सा नदी वत्सभूम्यां तु प्रथिताम्बेति भारत॥"
कुछ काल के पश्चात् वह वत्सदेश की भूमि में 'अम्बा' नाम से प्रसिद्ध नदी हुई, जो केवल बरसात में जल से भरी रहती थी। उसमें बहुत-से ग्राह निवास करते थे और उसके भीतर उतरना अत्यन्त कठिन था। वह नदी टेढ़ी-मेढ़ी होकर बहती थी। राजन्! वह कन्या तपस्या के प्रभाव से आधे शरीर से अम्बा नाम की नदी हो गयी और आधे अङ्ग से वत्सदेश में ही एक कन्या के रूप में प्रकट हुई।
इस प्रकार श्रीमहाभारत उद्योगपर्व के अन्तर्गत अम्बोपाख्यानपर्व में अम्बा का तपस्या विषयक एक सौ छियासीवाँ अध्याय पूरा हुआ।
तदनन्तर राजा द्रुपद ने अपनी पुत्री को लेखन-शिक्षा और शिल्प-शिक्षा आदि सभी कार्यों की योग्यता प्राप्त कराने के लिये विशेष प्रयत्न किया। राजेन्द्र! धनुर्विद्या के लिये शिखण्डी द्रोणाचार्य का शिष्य हुआ।
शिखण्डी की सुन्दरी माता ने राजा द्रुपद को प्रेरित किया कि वे उसके पुत्र के लिये बहू ला दें; वह अपनी कन्या का पुत्र के समान ब्याह करना चाहती थी। द्रुपद ने देखा, मेरी यह बेटी जवान हो गयी, तो भी अबतक स्त्री ही बनी हुई है—वरदान के अनुसार पुरुष नहीं हो सकी। इससे पत्नी सहित उनके मन में बड़ी चिन्ता हुई।
द्रुपद बोले— "देवि! मेरी यह कन्या युवावस्था को प्राप्त होकर मेरा शोक बढ़ा रही है। मैंने भगवान् शङ्कर के कथन पर विश्वास करके अबतक इसके कन्याभाव को छिपा रखा था।"
कन्या ममेयं सम्प्राप्ता यौवनं शोकवर्धिनी ।
मया प्रच्छादिता चेयं वचनाच्छूलपाणिनः ॥
द्रुपद बोले - देवि! मेरी यह कन्या युवावस्थाको प्राप्त होकर मेरा शोक बढ़ा रही है । मैंने भगवान् शंकरके कथनपर विश्वास करके अबतक इसके कन्याभावको छिपा रखा था ।
रानी ने कहा— "महाराज! भगवान् शिव का दिया हुआ वर किसी तरह मिथ्या नहीं होगा। भला, तीनों लोकों की सृष्टि करने वाले भगवान् झूठी बात कैसे कह सकते हैं? राजन्! यदि आपको अच्छा लगे तो कहूँ। मेरी बात सुनिये। मेरा तो यह दृढ़ विश्वास है कि भगवान् का वचन सत्य होगा। अतः आप प्रयत्नपूर्वक शास्त्रीय विधिके अनुसार इसका कन्या के साथ विवाह कर दें।"
क्रियतामस्य यत्नेन विधिवद् दारसंग्रहः ।
भविता तद्वचः सत्यमिति मे निश्चिता मतिः ॥
मेरा तो यह दृढ़ विश्वास है कि भगवान्का वचन सत्य होगा । अतः आप प्रयत्नपूर्वक शास्त्रीय विधिके अनुसार इसका कन्याके साथ विवाह कर दें ।
इस प्रकार विवाह का निश्चय करके दोनों पति-पत्नी ने दशार्णराज की पुत्री का अपने पुत्र के लिये वरण किया। तदनन्तर राजाओं में श्रेष्ठ द्रुपद ने समस्त राजाओं के कुल आदिका परिचय सुनकर दशार्णराज की ही पुत्री का शिखण्डी के लिये वरण किया। दशार्णदेश का वह राजा हिरण्यवर्मा महान् दुर्जय और दुर्धर्ष वीर था। उसके पास विशाल सेना थी और उसका हृदय भी विशाल था।
ततो राजा द्रुपदो राजसिंहः सर्वान् राज्ञ कुलतः संनिशाम्य ।
दाशार्णकस्य नृपतेस्तनूजां शिखण्डिने वरयामास दारान् ॥
तदनन्तर राजाओंमें श्रेष्ठ द्रुपदने समस्त राजाओंके कुल आदिका परिचय सुनकर दशार्णराजकी ही पुत्रीका शिखण्डीके लिये वरण किया ।
हिरण्यवर्मा की पुत्री भी युवावस्था को प्राप्त थी और इधर द्रुपद की कन्या शिखण्डिनी भी पूर्ण युवती हो गयी थी। विवाह कार्य सम्पन्न हो जाने पर पत्नी सहित शिखण्डी पुनः काम्पिल्य नगर में आया। दशार्णराज की कन्या ने कुछ ही दिनों में यह समझ लिया कि शिखण्डी तो स्त्री है। हिरण्यवर्मा की पुत्री ने शिखण्डी के यथार्थ स्वरूप को जानकर अपनी धाय तथा सखियों से लजाते-लजाते यह गुप्त बात कह दी कि— "पाञ्चालराज के पुत्र शिखण्डी वास्तव में पुरुष नहीं, स्त्री हैं।"
हिरण्यवर्मणः कन्या ज्ञात्वा तां तु शिखण्डिनीम् ।
धात्रीणां च सखीनां च व्रीडमाना न्यवेदयत् ।
कन्यां पञ्चालराजस्य सुतां तां वै शिखण्डिनीम् ॥
हिरण्यवर्माकी पुत्रीने शिखण्डीके यथार्थ स्वरूपको जानकर अपनी धाय तथा सखियोंसे लजाते - लजाते यह गुप्त बात कह दी कि पांचालराजके पुत्र शिखण्डी वास्तवमें पुरुष नहीं, स्त्री हैं ।
यह सुनकर दशार्णदेश की धायों को बड़ा दुःख हुआ। उन्होंने यह समाचार सूचित करने के लिये बहुत सी दासियों को दशार्णराज के यहाँ भेजा। वे सब दासियाँ दशार्णराज से सब बातें ठीक-ठीक बताती हुई बोलीं कि— "राजा द्रुपद ने बहुत बड़ा धोखा दिया है।" यह सुनकर दशार्णराज अत्यन्त कुपित हो उठे। शिखण्डी भी उस राजपरिवार में पुरुष की भाँति आनन्दपूर्वक घूमता-फिरता था, पर उसे अपना स्त्रीत्व अच्छा नहीं लगता था।
ततो दशार्णाधिपतेः प्रेष्याः सर्वा न्यवेदयन् ।
विप्रलम्भं यथावृत्तं स च चुक्रोध पार्थिवः ॥
वे सब दासियाँ दशार्णराजसे सब बातें ठीक -ठीक बताती हुई बोलीं कि ' राजा द्रुपदने बहुत बड़ा धोखा दिया है' । यह सुनकर दशार्णराज अत्यन्त कुपित हो उठे ।
तदनन्तर कुछ दिनों में उसके स्त्री होने का समाचार सुनकर हिरण्यवर्मा क्रोध से पीड़ित हो गया। हिरण्यवर्मा का दूत द्रुपद के पास पहुँचा और एकान्त में सबको हटाकर केवल राजा से बोला— "निष्पाप नरेश! आपने दशार्णराज को धोखा दिया है। आपके द्वारा किये गये अपमान से उनका क्रोध बहुत बढ़ गया है। उन्होंने आपसे कहने के लिये यह सन्देश भेजा है— 'नरेश्वर! तुमने जो मेरा अपमान किया है, वह निश्चय ही तुम्हारे खोटे विचार का परिचय है। तुमने मोहवश अपनी पुत्री के लिये मेरी पुत्री का वरण किया था। दुर्मते! उस ठगी और वञ्चना का फल अब तुम्हें शीघ्र ही प्राप्त होगा, धीरज रखो। मैं अभी सेवकों और मन्त्रियों सहित तुम्हें जड़मूल सहित उखाड़ फेंकता हूँ'।"
अवमन्यसे मां नृपते नूनं दुर्मन्त्रितं तव ।
यन्मे कन्यां स्वकन्यार्थे मोहाद् याचितवानसि ॥
तस्याद्य विप्रलम्भस्य फलं प्राप्नुहि दुर्मते ।
एष त्वां सजनामात्यमुद्धरामि स्थिरो भव ॥
‘ नरेश्वर! तुमने जो मेरा अपमान किया है, वह निश्चय ही तुम्हारे खोटे विचारका परिचय है । तुमने मोहवश अपनी पुत्रीके लिये मेरी पुत्रीका वरण किया था । दुर्मते! उस ठगी और वंचनाका फल अब तुम्हें शीघ्र ही प्राप्त होगा, धीरज रखो । मैं अभी सेवकों और मन्त्रियोंसहित तुम्हें जड़मूलसहित उखाड़ फेकता हूँ'
दूत के ऐसे कहने पर पकड़े गये चोर की भाँति राजा द्रुपद के मुख से सहसा कोई बात नहीं निकली। उन्होंने मधुरभाषी दूतों द्वारा यह सन्देश देकर अपने सम्बन्धी को मनाने का दुष्कर प्रयत्न किया कि— "ऐसी बात नहीं है, आपको धोखा नहीं दिया गया है।" किन्तु जब राजा हिरण्यवर्मा ने पुनः पता लगाया तो उसे पक्का ज्ञान हो गया कि पाञ्चालराज की पुत्री शिखण्डिनी कन्या ही है। इससे रुष्ट होकर उन्होंने बड़ी उतावली के साथ द्रुपद पर आक्रमण करने का निश्चय किया।
ततः समुदयं कृत्वा बलानां राजसत्तमः ।
अभियाने मतिं चक्रे द्रुपदं प्रति भारत ॥
भारत! इसके बाद नृपश्रेष्ठ हिरण्यवर्माने सैन्य- संग्रह करके राजा द्रुपदके ऊपर चढ़ाई करनेका निश्चय किया ।
राजा हिरण्यवर्मा ने अपने मन्त्रियों के साथ बैठकर परामर्श किया कि मुझे पाञ्चाल नरेश के साथ कैसा बर्ताव करना चाहिये। वहाँ राजाओं ने यह निश्चय घोषित किया— "यदि यह सत्य सिद्ध हुआ कि शिखण्डी वास्तव में पुत्र नहीं कन्या है, तब हम लोग पाञ्चालराज को कैद करके अपने घर ले आयेंगे और शिखण्डी सहित द्रुपद को मरवा डालेंगे।"
भीष्म कहते हैं— राजा द्रुपद उन दिनों स्वभाव से ही भीरु थे और उनके द्वारा अपराध भी कर दिया गया था। अतः उन्होंने बड़ा भारी भय का अनुभव किया। उन्होंने शोक से अधीर होकर एकान्त स्थान में अपनी पत्नी से मिलकर इस विषय में बातचीत करने की इच्छा की। पाञ्चालराज के हृदय में बड़ा भारी भय समा गया था। वे अपनी पत्नी शिखण्डी की माता से बोले—
स हि प्रकृत्या वै भीतः किल्विषी च नराधिपः ।
भयं तीव्रमनुप्राप्तो द्रुपदः पृथिवीपतिः ॥
भीष्म कहते हैं - राजा द्रुपद उन दिनों स्वभावसे ही भीरु थे । फिर उनके द्वारा अपराध भी बन गया था । अतः उन्होंने बड़े भारी भयका अनुभव किया ।
"इस समय हम दोनों क्या करें? इस कन्या के प्रश्न को लेकर हम लोग किङ्कर्तव्यविमूढ़ हो रहे हैं। सम्बन्धी के मन में यह शङ्का दृढ़ हो गयी है कि तुम्हारा पुत्र शिखण्डी वास्तव में कन्या है। वे सोचने लगे हैं कि मेरे साथ धोखा किया गया है और इसलिए वे अपने मित्रों, सैनिकों तथा सेवकों सहित आकर मुझे यत्नपूर्वक उखाड़ फेंकना चाहते हैं। सुश्रोणि! यहाँ क्या सच है और क्या झूठ? इस बात को तुम्हीं बताओ। तुम्हारे मुख से निकले शुभ वचनों को सुनकर मैं वैसा ही करूँगा। रानी! मेरा जीवन संशय में पड़ गया है। यह शिखण्डिनी भी बालिका ही है। तुम भी महान् सङ्कट में फँस गयी हो। मैं पूछ रहा हूँ, सबको सङ्कट से छुड़ाने के लिये कोई यथार्थ उपाय बताओ।"
महारानी ने उत्तर दिया— "सुन्दर अङ्गों वाली महारानी! आप भय मत करो। मैं दया करके वही कार्य करूँगी जो वस्तुतः हितकारक होगा। मैं स्वयं पुत्रधर्म से वञ्चित हो गयी हूँ। मैंने दशार्णराज को राजा से वञ्चित किया है, अतः महाभागे! इस अवसर पर आपकी दृष्टि में जो हितकारक हो, उसे बताओ। मैं उसका अनुष्ठान करूँगी।"
यद्यपि राजा द्रुपद सब कुछ जानते थे, फिर भी अपनी निर्दोषता सिद्ध करने के लिये उन्होंने महारानी से स्पष्ट पूछा। रानी ने यथार्थ रहस्य बताते हुए कहा— "यह पुत्र शिखण्डी नहीं, शिखण्डिनी नाम वाली कन्या है। पुत्ररहित होने के कारण मैंने अपनी सौतों के भय से इसे पुत्र ही बताया था। आपने भी प्रेमवश मेरे इस कथन का अनुमोदन किया और इसका पुत्रोचित संस्कार किया। महादेव जी ने कहा था कि पहले कन्या होगी, फिर वही पुत्र हो जायेगा; इसीलिये इस सङ्कट की उपेक्षा की गयी।"
यह सुनकर राजा द्रुपद ने मन्त्रियों को सब बातें बता दीं। प्रजा की रक्षा के लिये उन्होंने गुप्त मन्त्रणा की। यद्यपि उन्होंने स्वयं वञ्चना की थी, तथापि सम्बन्ध बनाये रखने की इच्छा से वे एक निश्चय पर पहुँचे। नगर सुरक्षित था, फिर भी उन्होंने उसकी रक्षा के लिये विशेष व्यवस्था की।
अपने सम्बन्धी के साथ युद्ध की आशङ्का से राजा द्रुपद बहुत कष्ट में थे। अपने मन-ही-मन चिन्तन करते हुए उन्होंने देवताओं की अर्चना कर दी। महारानी ने उन्हें प्रेरित किया— "देवताओं की आराधना साधु पुरुषों के लिये सदा उत्तम है। आप गुरुजनों और सम्पूर्ण देवताओं का पूजन करें, ब्राह्मणों को दक्षिणा दें और दशार्णराज के लौट जाने के लिये अग्नियों में होम करें। मन-ही-मन यह चिन्तन कीजिये कि दशार्णराज बिना युद्ध किये ही लौट जायें।"
इन दोनों को इस प्रकार शोकमग्न देख उनकी पुत्री शिखण्डिनी लज्जित होकर सोचने लगी— 'ये मेरे माता और पिता दोनों मेरे ही कारण दुःखी हो रहे हैं।' ऐसा सोचकर उसने प्राण त्याग देने का निश्चय किया और घर छोड़कर एक निर्जन एवं गहन वन में चली गयी। वह वन यक्ष स्थूणाकर्ण द्वारा सुरक्षित था, जिसके भय से लोग वहाँ नहीं आते थे। उस वन में उसका एक विशाल भवन था जो मिट्टी और चूने से लीपा गया था और जिसमें खस की जड़ की सुगन्ध फैली थी।
एवं संभाषमाणौ तु दृष्ट्वा शोकपरायणौ ।
शिखण्डिनी तदा कन्या व्रीडितेव तपस्विनी ॥
ततः सा चिन्तयामास मत्कृते दुःखितावुभौ ।
इमाविति ततश्चक्रे मतिं प्राणविनाशने ॥
इन दोनोंको इस प्रकार शोकमग्न होकर बातचीत करते देख उनकी तपस्विनी पुत्री शिखण्डिनी लज्जित -सी होकर इस प्रकार चिन्ता करने लगी- ' ये मेरे माता और पिता दोनों मेरे ही कारण दुःखी हो रहे हैं । ' ऐसा सोचकर उसने प्राण त्याग देनेका विचार किया ।
वहाँ पहुँचकर शिखण्डिनी ने कई दिनों तक उपवास करके अपने शरीर को सुखा लिया। स्थूणाकर्ण यक्ष ने जब उसे इस अवस्था में देखा, तो उसके हृदय में कोमल भाव जागे। उसने पूछा— "भद्रे! तुम्हारा यह उपवास व्रत किस लिये है? अपना प्रयोजन शीघ्र बताओ।"
शिखण्डिनी ने कहा— "यह तुम्हारे लिये असम्भव है।" तब यक्ष ने उत्तर दिया— "मैं तुम्हारा मनोरथ अवश्य पूर्ण कर दूँगा। राजकुमारी! मैं कुबेर का सेवक हूँ। मुझमें वर देने की शक्ति है, जो भी इच्छा हो बताओ।"
तब शिखण्डिनी ने अपना सारा वृत्तान्त विस्तारपूर्वक बताया— "यक्ष! मेरे पुत्रहीन पिता अब शीघ्र ही नष्ट हो जायेंगे; क्योंकि दशार्णराज कुपित होकर उन पर आक्रमण करेंगे। वे सुवर्णमय कवच से युक्त महाबली नरेश हैं। हे यक्ष! तुम मेरे माता-पिता की और मेरी भी उनसे रक्षा करो।"
शिखण्डिनी की बात सुनकर उस दैवपीड़ित यक्ष ने मन ही मन कुछ सोचा और फिर कहा— "भद्रे! तुम जैसा कहती हो, वैसा ही होगा; परन्तु यह मेरे दुःख का कारण बनेगा, तथापि मैं तुम्हारी इच्छा पूर्ण करूँगा। इस विषय में मेरी एक शर्त है, उसे सुनो। मैं तुम्हें अपना पुरुषत्व दूँगा और तुम्हारा स्त्रीत्व स्वयं धारण करूँगा; किन्तु यह केवल कुछ ही काल के लिए होगा। उस निश्चित समय के भीतर ही तुम्हें मेरा पुरुषत्व लौटाने के लिए यहाँ आना होगा। क्या तुम मुझे यह सच्चा वचन देती हो?"
शिखण्डिनी ने उत्तर दिया— "भगवन्! मैं आपका यह पुरुषत्व समय पर लौटा दूँगी। हे निशाचर! आप कुछ ही समय के लिए मेरा स्त्रीत्व धारण कर लीजिए। जब दशार्णदेश के स्वामी राजा हिरण्यवर्मा लौट जाएँगे, तब मैं फिर से कन्या हो जाऊँगी और आप पूर्ववत पुरुष बन जाएँगे।"
इस प्रकार उन दोनों ने परस्पर प्रतिज्ञा कर ली और एक-दूसरे के शरीर में अपने पुरुषत्व और स्त्रीत्व का सङ्क्रमण करा दिया। स्थूणाकर्ण यक्ष ने शिखण्डिनी का स्त्रीत्व धारण कर लिया और शिखण्डिनी ने उस यक्ष का प्रकाशमान पुरुषत्व प्राप्त कर लिया।
पुरुषत्व पाकर पाञ्चाल राजकुमार शिखण्डी बड़े हर्ष के साथ अपने नगर पहुँचे और अपने पिता राजा द्रुपद से मिले। उन्होंने जो भी वृत्तान्त सुनाया, उसे सुनकर राजा द्रुपद को अपार हर्ष हुआ। उन्हें भगवान महेश्वर द्वारा दिए गए उस वरदान का स्मरण हो आया कि उनका पुत्र पुरुष ही होगा। तदनन्तर राजा द्रुपद ने दशार्णराज के पास एक दूत भेजा और कहा— "दूत! मेरे कहने के अनुसार उस पाञ्चाल नरेश से कहना कि मैंने अपनी कन्या के लिए उसे चुना था, परन्तु वह मुझे ठगा गया है। तुम स्वयं आकर परीक्षा कर लो, यह कुमार वास्तव में पुत्र है, कन्या नहीं।"
आगमः क्रियतां व्यक्तः कुमारोऽयं सुतो मम ।
मिथ्यैतदुक्तं केनापि तदश्रद्धेयमित्युत ॥
‘ राजन्! आप आकर स्पष्टरूपसे परीक्षा कर लें । मेरा यह कुमार पुत्र है ( कन्या नहीं ) । आपसे किसीने झूठे ही उसके कन्या होनेकी बात कह दी है, जो विश्वास करनेके योग्य नहीं है '
राजा हिरण्यवर्मा ने जब यह सुना, तो उन्होंने सत्य जानने के लिए कुछ श्रेष्ठ युवतियों को भेजा। उन युवतियों ने वास्तविकता जानकर राजा को बताया कि शिखण्डी वास्तव में एक प्रभावशाली पुरुष है। यह जानकर हिरण्यवर्मा अत्यन्त प्रसन्न हुए और उन्होंने अपने जामाता शिखण्डी को बहुत सारा धन, हाथी, घोड़े और दासियाँ देकर बड़े हर्ष के साथ प्रस्थान किया।
उधर, स्थूणाकर्ण यक्ष का भवन विचित्र हारों से सजा हुआ था और वहाँ धूप की सुगन्ध फैली थी। जब धनाध्यक्ष कुबेर ने उस सुसज्जित भवन को देखा, तो उन्होंने अपने सेवकों से पूछा— "अमित पराक्रमी यक्ष! स्थूणाकर्ण का यह भवन तो पूरी तरह सजा हुआ है, जिससे सिद्ध होता है कि वह घर में ही है। फिर वह मूर्ख मेरे पास आता क्यों नहीं? वह मन्दबुद्धि यक्ष मुझे आया हुआ जानकर भी निकट नहीं आ रहा है; इसलिए उसे महान दण्ड मिलना चाहिए।"
यक्षों ने कुबेर को उत्तर दिया— "महाराज! राजा द्रुपद की कन्या शिखण्डिनी ने किसी विशेष कारणवश अपना स्त्रीत्व इस यक्ष को दे दिया है और वह स्वयं पुरुषत्व पाकर स्त्री रूप में घर में ही रहती है। इसी लज्जा के कारण वह आपके सामने उपस्थित नहीं हो रहा है। आप उचित समझें तो अपना विमान यहीं ठहर जाने दें।"
यह सुनकर कुबेर ने आदेश दिया— "स्थूणाकर्ण को यहाँ बुला लाओ, मैं उसे दण्ड दूँगा!" जब उसे बार-बार बुलाया गया, तब वह यक्ष सेवा में आया और स्त्री स्वरूप होने के कारण लज्जावश उनके सामने खड़ा हो गया। उसे इस रूप में देखकर कुबेर अत्यन्त कुपित हुए और शाप देते हुए बोले— "हे पापी स्थूणाकर्ण! यह स्त्रीत्व अब ऐसा ही बना रहे!"
यक्षराज ने दुखी होकर कुबेर से अनुनय-विनय की, परन्तु कुबेर अडिग थे। अन्ततः कुबेर ने कहा— "शिखण्डी के मारे जाने पर ही यह स्थूणाकर्ण अपना पूर्व रूप प्राप्त कर सकेगा।" इस शाप को पाकर स्थूणाकर्ण वहीं रहने लगा। नियत समय आने पर शिखण्डी तुरन्त उसके पास पहुँचा। यक्ष ने प्रसन्न होकर उसे सारा वृत्तान्त सुनाया और कहा— "राजकुमार! तुम्हारे कारण ही मुझे यह शाप मिला है, अब तुम जाओ और संसार में सुखपूर्वक विचरो।"
स्थूणस्तु शापं सम्प्राप्य तत्रैव न्यवसत् तदा ।
समये चागमत् तूर्णं शिखण्डी तं क्षपाचरम् ॥
उस समय कुबेरका शाप पाकर स्थूणाकर्ण वहीं रहने लगा । शिखण्डी पूर्वनिश्चित समयपर उस निशाचर स्थूणाकर्णके पास तुरंत आ गया ।
शिखण्डी के हर्षित होकर लौटने पर राजा द्रुपद ने देवताओं, ब्राह्मणों और वृक्षों का पूजन किया। इसके पश्चात उन्होंने अपने पुत्र शिखण्डी को धनुर्वेद की शिक्षा के लिए द्रोणाचार्य के पास भेज दिया। शिखण्डी और धृष्टद्युम्न ने मिलकर युद्ध कला का अध्ययन किया।
भीष्म कहते हैं— राजा द्रुपद ने मेरे पास गुप्तचर नियुक्त किए थे, जो गूँगे, अन्धे और बहरे बनकर रहते थे। उन्हीं के माध्यम से मुझे पता चला कि शिखण्डी वास्तव में पहले स्त्री था और अब पुरुष बना है। भीष्म ने कहा— "जब वह हाथ में धनुष लेकर युद्ध के लिए मेरे सामने आएगा, तब मैं उस पर बाण नहीं चलाऊँगा। मेरा यह व्रत प्रसिद्ध है कि जो स्त्री होकर पुरुष बना हो, उस पर मैं प्रहार नहीं कर सकता। यदि मैं स्त्री का वध करूँगा, तो साधु पुरुष इसकी निन्दा करेंगे।"
दुर्योधन ने जब यह सुना, तो उसने भीष्म के इस निर्णय को स्वीकार कर लिया। युद्ध की पूर्व सन्ध्या पर दुर्योधन ने भीष्म से पूछा— "हे गङ्गानन्दन! पाण्डवों की यह सेना समुद्र की भाँति दुर्धर्ष है। आप इसे कितने समय में नष्ट कर सकते हैं?"
भीष्म ने उत्तर दिया— "कुरुश्रेष्ठ! यदि मैं अपने महान अस्त्रों का प्रयोग करूँ, तो एक मास में पाण्डवों की पूरी सेना को नष्ट कर सकता हूँ।" यह सुनकर द्रोणाचार्य ने भी कहा— "जैसे भीष्म एक मास में शत्रु का विनाश कर सकते हैं, वैसे ही मैं भी कर सकता हूँ। यही मेरा परम बल है।"
वैशम्पायनजी कहते हैं— भरतश्रेष्ठ जनमेजय! कौरव सेना में जो बातचीत हुई थी, उसका समाचार पाकर कुन्तीनन्दन युधिष्ठिर ने अपने सब भाइयों को एकान्त में बुलाया।
युधिष्ठिर बोले— "धृतराष्ट्र की सेना में जो मेरे गुप्तचर नियुक्त हैं, उन्होंने मुझे यह समाचार दिया है कि इसी विगत रात्रि में दुर्योधन ने महान् व्रतधारी गङ्गानन्दन भीष्म से यह प्रश्न किया था कि प्रभो! आप पाण्डवों की सेना का कितने समय में संहार कर सकते हैं? भीष्मजी ने धृतराष्ट्र के पुत्र दुर्बुद्धि दुर्योधन को यह उत्तर दिया कि मैं एक महीने में पाण्डव-सेना का विनाश कर सकता हूँ। द्रोणाचार्य ने भी उतने ही समय में वैसा करने की प्रतिज्ञा की। कृपाचार्य ने दो महीने का समय बताया। यह बात हमारे सुनने में आयी है तथा महान् अस्त्रवेत्ता अश्वत्थामा ने दस ही दिनों में पाण्डव-सेना के संहार की प्रतिगा की है। दिव्यस्त्रवेत्ता कर्ण से जब कौरव सभा में पूछा गया, तब उसने पाँच ही दिनों में हमारी सेना को नष्ट करने की प्रतिज्ञा कर ली। अतः अर्जुन! मैं भी तुम्हारी बात सुनना चाहता हूँ। फाल्गुन! तुम कितने समय में शत्रुओं को नष्ट कर सकते हो?"
धार्तराष्ट्रस्य सैन्येषु ये चारपुरुषा मम ।
ते प्रवृत्तिं प्रयच्छन्ति ममेमां व्युषितां निशाम् ॥
दुर्योधनः किलापृच्छदापगेयं महाव्रतम् ।
केन कालेन पाण्डूनां हन्याः सैन्यमिति प्रभो ॥
युधिष्ठिर बोले - धृतराष्ट्रकी सेनामें जो मेरे गुप्तचर नियुक्त हैं, उन्होंने मुझे यह समाचार दिया है कि इसी विगत रात्रिमें दुर्योधनने महान् व्रतधारी गंगानन्दन भीष्मसे यह प्रश्न किया था कि प्रभो! आप पाण्डवोंकी सेनाका कितने समयमें संहार कर सकते हैं ।
राजा युधिष्ठिर के इस प्रकार पूछने पर निद्राविजयी अर्जुन ने भगवान श्रीकृष्ण की ओर देखकर यह बात कही— "महाराज! निःसन्देह ये सभी महामना योद्धा अस्त्रविद्या के विद्वान् तथा विचित्र प्रकार से युद्ध करने वाले हैं। अतः उतने दिनों में शत्रु सेना को मार सकते हैं, इसमें संशय नहीं है। परन्तु इससे आपके मन में सन्ताप नहीं होना चाहिये। आपका मनस्ताप तो दूर ही हो जाना चाहिये। मैं जो सत्य बात कहने जा रहा हूँ, उस पर ध्यान दीजिये। मैं भगवान श्रीकृष्ण की सहायता से युक्त हुआ एकमात्र रथ को लेकर ही देवताओंसहित तीनों लोकों, सम्पूर्ण चराचर प्राणियों तथा भूत, वर्तमान और भविष्य को भी पलक मारते-मारते नष्ट कर सकता हूँ— ऐसा मेरा विश्वास है। भगवान पशुपति ने किरातवेष में द्वन्द्वयुद्ध करते समय मुझे जो अपना भयङ्कर महास्त्र प्रदान किया था, वह मेरे पास मौजूद है। पुरुषसिंह! प्रलयकाल में समस्त प्राणियों का संहार करते समय भगवान पशुपति जिस अस्त्र का प्रयोग करते हैं, वही यह मेरे पास विद्यमान है। राजन्! इसे न तो गङ्गानन्दन भीष्म जानते हैं, न द्रोणाचार्य जानते हैं, न कृपाचार्य जानते हैं और न द्रोणपुत्र अश्वत्थामा को ही इसका पता है; फिर सूतपुत्र कर्ण तो इसे जान ही कैसे सकता है? परन्तु युद्ध में साधारण जनों को दिव्यास्त्रों द्वारा मारना कदापि उचित नहीं है; अतः हम लोग सरलतापूर्ण युद्ध के द्वारा ही शत्रुओं को जीतेंगे। राजन्! ये सभी पुरुषसिंह जो हमारे सहायक हैं, दिव्यास्त्रों का ज्ञान रखते हैं और सभी युद्ध की अभिलाषा रखने वाले हैं। इन सबने वेदाध्ययन समाप्त करके यज्ञान्त स्नान किया है। ये सभी कभी परास्त न होने वाले वीर हैं। पाण्डुनन्दन! ये लोग समरभूमि में देवताओं की सेना को भी नष्ट कर सकते— शिखण्डी, सात्यकि, द्रुपदकुमार, धृष्टद्युम्न, भीमसेन, दोनों भाई नकुल-सहदेव, युधामन्यु, उत्तमौजा तथा राजा विराट और द्रुपद भी युद्ध में भीष्म और द्रोणाचार्य की समानता करने वाले हैं। महाबाहु शङ्ख, महाबली घटोत्कच, महान् बल और पराक्रम से सम्पन्न घटोत्कचपुत्र अञ्जनपर्वा तथा सङ्ग्राम कुशल महाबाहु सात्यकि— ये सभी आपके सहायक हैं। बलवान् अभिमन्यु और द्रौपदी के पाँचों पुत्र तो आपके साथ हैं ही। आप स्वयं भी तीनों लोकों का संहार करने में समर्थ हैं। इन्द्र के समान तेजस्वी कुरुनन्दन! आप क्रोधपूर्वक जिस पुरुष को देख लें वह शीघ्र ही नष्ट हो जायेगा। आपके इस प्रभाव को मैं जानता हूँ।"
अपैतु ते मनस्तापो यथा सत्यं ब्रवीम्यहम् ।
हन्यामेकरथेनैव वासुदेवसहायवान् ॥
सामरानपि लोकांस्त्रीन् सर्वान् स्थावरजङ्गमान् ।
भूतं भव्यं भविष्यं च निमेषादिति मे मतिः ॥
‘ परंतु इससे आपके मनमें संताप नहीं होना चाहिये । आपका मनस्ताप तो दूर ही हो जाना चाहिये । मैं जो सत्य बात कहने जा रहा हूँ, उसपर ध्यान दीजिये । मैं भगवान् श्रीकृष्णकी सहायतासे युक्त हुआ एकमात्र रथको लेकर ही देवताओंसहित तीनों लोकों, सम्पूर्ण चराचर प्राणियों तथा भूत, वर्तमान और भविष्यको भी पलक मारते - मारते नष्ट कर सकता हूँ । ऐसा मेरा विश्वास है ।
इस प्रकार अध्याय पूरा हुआ। तदनन्तर निर्मल प्रभातकाल में धृतराष्ट्रपुत्र दुर्योधन से प्रेरित होकर सब राजा पाण्डवों से युद्ध करने के लिये चले। चलने के पहले उन सबने स्नान करके शुद्ध होकर श्वेत वस्त्र धारण किये, पुष्पों की मालाएँ पहनीं, ब्राह्मणों से स्वस्तिवाचन कराया, अग्नि में आहुतियाँ दीं, फिर ध्वजा फहराते हुए हाथों में अस्त्र-शस्त्र लेकर रणभूमि की ओर प्रस्थित हुए। वे महाबली वीर युद्ध में पराक्रम दिखाकर उत्तम लोकों पर विजय पाना चाहते थे। उन सबका चित्त एकाग्र था और वे सभी एक-दूसरे पर विश्वास करते थे।
आहवेषु पराँल्लोकान् जिगीषन्तो महाबलाः ।
एकाग्रमनसः सर्वे श्रद्दधानाः परस्परम् ॥
वे महाबली वीर युद्धमें पराक्रम दिखाकर उत्तम लोकोंपर विजय पाना चाहते थे । उन सबका चित्त एकाग्र था और वे सभी एक- दूसरेपर विश्वास करते थे ।
अवन्ती देश के राजकुमार विन्द और अनुविन्द, बाह्लीक देशीय सैनिकों के साथ केकयराजकुमार— ये सब द्रोणाचार्य को आगे करके चले। अश्वत्थामा, भीष्म, सिन्धुराज जयद्रथ, दाक्षिणात्य नरेश, पाश्चात्त्य भूपाल और पर्वतीय भूपाल, गान्धारराज शकुनि तथा पूर्व और उत्तर दिशा के नरेश, शक, किरात, यवन, शिबि और वसाति भूपालगण— ये सभी महारथी लोग अपनी-अपनी सेनाओं के साथ महारथी भीष्म को सब ओर से घेरकर दूसरे सैन्य दल के रूप में सुसज्जित होकर निकले।
सेना सहित कृतवर्मा, महारथी त्रिगर्त, भाइयों से घिरा हुआ महाराज दुर्योधन, शल, भूरिश्रवा, शल्य तथा कोसलराज बृहद्रथ— ये दुर्योधन को आगे करके उसके पीछे-पीछे तृतीय सैन्य दल में चले। धृतराष्ट्र के वे महाबली पुत्र रणक्षेत्र में जाकर कवच आदि से सुसज्जित होकर कुरुक्षेत्र के पश्चिम भाग में यथोचित रूप से खड़े हुए।
भारत! दुर्योधन ने पहले से ही ऐसा निवास स्थान बनवा रखा था, जो दूसरे हस्तिनापुर की भाँति सजा हुआ था। राजेन्द्र! नगर में निवास करने वाले चतुर मनुष्य भी उस शिविर तथा हस्तिनापुर नामक नगर में क्या अन्तर है, यह नहीं समझ पाते थे। अन्य राजाओं के लिये भी कुरुवंशी भूपाल ने वैसे ही सैकड़ों तथा सहस्रों दुर्ग बनवाये थे। समराङ्गण के लिये पाँच योजन का घेरा छोड़कर सैनिकों के ठहरने के लिये सौ-सौ की सङ्ख्या में कितनी ही श्रेणीबद्ध छावनियाँ डाली गयी थीं। उन्हीं बहुमूल्य आवश्यक सामग्रियों से सम्पन्न हजारों छावनियों में वे भूपाल अपने बल और उत्साह के अनुरूप युद्ध के लिये उद्यत होकर रहते थे। राजा दुर्योधन सवारियों और सैनिकों सहित उन महामना नरेशों को परम उत्तम भक्ष्य-भोज्य पदार्थ देता था। हाथियों, अश्वों, पैदल मनुष्यों, शिल्प-जीवियों, अन्य अनुगामियों तथा सूत, मागध और बन्दीजनों को भी राजा की ओर से भोजन प्राप्त होता था। वहाँ जो वणिक्, गणिकाएँ, गुप्तचर तथा दर्शक मनुष्य आते थे, उन सबकी कुरराज दुर्योधन विधिपूर्वक देखभाल करता था।
इसी प्रकार कुन्तीपुत्र राजा युधिष्ठिर ने धृष्टद्युम्न आदि वीरों को युद्ध के लिये जाने की आज्ञा दी। चेदि, काशि और करूष देशों के अधिनायक दृढ़ पराक्रमी शत्रुनाशक सेनापति धृष्टकेतु को भी प्रस्थान करने का आदेश दिया। विराट, द्रुपद, सात्यकि, शिखण्डी, महाधनुर्धर पाञ्चाल वीर युधामन्यु और उत्तमौजा को भी राजा का आदेश प्राप्त हुआ। वे महाधनुर्धर शूरवीर विचित्र कवच और तपाये हुए सोने के कुण्डल धारण किये, वेदी पर घी की आहुति से प्रज्वलित हुए अग्निदेव के समान तथा आकाश में प्रकाशित होने वाले ग्रहों की भाँति शोभा पा रहे थे।
चेदिकाशिकरूषाणां नेतारं दृढविक्रमम् ।
सेनापतिममित्रघ्नं धृष्टकेतुमथादिशत् ॥
चेदि, काशि और करूषदेशोंके अधिनायक दृढ़ पराक्रमी शत्रुनाशक सेनापति धृष्टकेतुको भी प्रस्थान करनेका आदेश दिया ।
तदनन्तर योग्यतानुसार सम्पूर्ण सेना का समादर करके नरश्रेष्ठ राजा युधिष्ठिर ने उन सैनिकों को प्रस्थान करने की आज्ञा दी और सेना तथा सवारियों सहित उन महामना नरेशों को उत्तमोत्तम खाने-पीने की वस्तुएँ देने की आज्ञा दी। उनके साथ जो भी हाथी, घोड़े, मनुष्य और शिल्पजीवी पुरुष थे, उन सबके लिये भोजन प्रस्तुत करने का आदेश दिया। पाण्डुनन्दन युधिष्ठिर ने धृष्टद्युम्न को आगे करके अभिमन्यु, बृहन्त तथा द्रौपदी के पाँचों पुत्र— इन सबको प्रथम सेनादल के साथ भेजा।
वहाँ हर्ष में भरे हुए कुछ योद्धा सवारियों पर युद्ध की सामग्री चढ़ाते, कुछ इधर- उधर जाते और कुछ लोग कार्यवश दौड़-धूप करते थे। उन सबका कोलाहल मानो स्वर्गलोक को छूने लगा। तत्पश्चात् राजा विराट और द्रुपद को साथ ले अन्यान्य भूपालों सहित स्वयं राजा युधिष्ठिर चले। भयङ्कर धनुर्धरों से भरी हुई और धृष्टद्युम्न के द्वारा सुरक्षित होकर कहीं ठहरती और कहीं आगे बढ़ती हुई वह पाण्डव सेना, कहीं निश्चल और कहीं प्रवाहशील जल से भरी गङ्गा के समान दिखायी देती थी।
थोड़ी दूर जाकर बुद्धिमान् राजा युधिष्ठिर ने धृतराष्ट्र के पुत्रों के बौद्धिक निश्चय में भ्रम उत्पन्न करने के लिये अपनी सेना का दुबारा सङ्गठन किया। बीच के दल में राजा ने विराट, जयत्सेन तथा पाञ्चाल देशीय महारथी युधामन्यु और उत्तमौजा को रखा। हाथों में गदा और धनुष धारण किये ये दोनों वीर बड़े पराक्रमी और मनस्वी थे। उस समय इन सबके मध्यभाग में भगवान श्रीकृष्ण और अर्जुन सेना के पीछे-पीछे जा रहे थे।
उस समय जो योद्धा पहले कभी युद्ध कर चुके थे, वे आवेश में भरे हुए थे। उनमें बीस हजार घोड़े ऐसे थे जिनकी पीठ पर शौर्य-सम्पन्न वीर बैठे हुए थे। इन घुड़सवारों के साथ पाँच हजार गजारोही तथा बहुत-से रथी भी थे। धनुष, बाण, खड्ग और गदा धारण करने वाले जो पैदल सैनिक थे, वे सहस्रों की सङ्ख्या में सेना के आगे और पीछे चलते थे। जिस सैन्य-समुद्र में स्वयं राजा युधिष्ठिर थे, उसमें बहुत-से भूमिपाल उन्हें चारों ओर से घेरकर चलते थे।
भारत! उसमें एक हजार हाथीसवार, दस हजार घुड़सवार, एक हजार रथी और कई सहस्र पैदल सैनिक थे। अपनी विशाल सेना के साथ चेकितान तथा चेदिराज धृष्टकेतु भी उन्हीं के साथ जा रहे थे। वृष्णिवंश के प्रमुख महारथी महान् धनुर्धर बलवान् सात्यकि एक लाख रथियों से घिरकर गर्जना करते हुए आगे बढ़ रहे थे। क्षत्रदेव और ब्रह्मदेव ये दोनों पुरुषरत्न रथ पर बैठकर सेना के पिछले भाग की रक्षा करते हुए पीछे-पीछे जा रहे थे।
क्षत्रदेवब्रह्मदेवौ रथस्थी पुरुषर्षभौ ।
जघनं पालयन्तौ च पृष्ठतोऽनुप्रजग्मतुः ॥
क्षत्रदेव और ब्रह्मदेव ये दोनों पुरुषरत्न रथपर बैठकर सेनाके पिछले भागकी रक्षा करते हुए पीछे - पीछे जा रहे थे ।
इनके सिवा भी बहुत-से छकड़े, दूकानें, वेश-भूषा के सामान, सवारियाँ, सामान ढोने की गाड़ी, एक सहस्र हाथी, अनेक अयुत घोड़े, अन्य छोटी-मोटी वस्तुएँ, स्त्रियाँ, कृश और दुर्बल मनुष्य, कोश-सङ्ग्रह और उनके ढोने वाले लोग तथा कोष्ठागार आदि सब कुछ सङ्ग्रह करके राजा युधिष्ठिर धीरे-धीरे गजसेना के साथ यात्रा कर रहे थे। उनके पीछे सुचित्त के पुत्र रणदुर्मद सत्यधृति, श्रेणिमान, वसुदान तथा काशिराज के सामर्थ्यशाली पुत्र जा रहे थे। इन सबका अनुगमन करने वाले बीस हजार रथी, घुँघुरुओं से सुशोभित दस करोड़ घोड़े, ईषादण्ड के समान दाँतवाले, प्रहारकुशल, अच्छी जाति में उत्पन्न, मदस्रावी और मेघों की घटा के समान चलने वाले बीस हजार हाथी जा रहे थे।
शकटापणवेशाश्च यानं युग्यं च सर्वशः ।
तत्र नागसहस्राणि हयानामयुतानि च ।
फल्गु सर्वं कलत्रं च यत्किञ्चित् कृशदुर्बलम् ॥
कोशसंचयवाहांश्च कोष्ठागारं तथैव च ।
गजानीकेन संगृह्य शनैः प्रायाद् युधिष्ठिरः ॥
इनके सिवा और भी बहुत- से छकड़े, दूकानें, वेश- भूषाके सामान, सवारियाँ, सामान ढोनेकी गाड़ी, एक सहस्र हाथी, अनेक अयुत घोड़े, अन्य छोटी- मोटी वस्तुएँ, स्त्रियाँ, कृश और दुर्बल मनुष्य, कोश- संग्रह और उनके ढोनेवाले लोग तथा कोष्ठागार आदि सब कुछ संग्रह करके राजा युधिष्ठिर धीरे - धीरे गजसेनाके साथ यात्रा कर रहे थे ।
भारत! इनके सिवा महात्मा युधिष्ठिर के पास निजी तौर पर सत्तर हजार हाथी और थे, जो जल बरसाने वाले बादलों की भाँति अपने गण्डस्थल से मद की धारा बहाते थे। वे सब-के-सब जङ्गम पर्वतों की भाँति राजा युधिष्ठिर का अनुसरण कर रहे थे। इस प्रकार बुद्धिमान कुन्तीपुत्र के पास भयङ्कर एवं विशाल सेना थी, जिसका आश्रय लेकर वे धृतराष्ट्रपुत्र दुर्योधन से लोहा ले रहे थे। इन सबके अतिरिक्त पीछे-पीछे लाखों पैदल मनुष्य तथा उनकी सहस्रों सेनाएँ गर्जना करती हुई आगे बढ़ रही थीं। उस समय रणक्षेत्र में लाखों मनुष्य हर्ष और उत्साह में भरकर हजारों भेरियों तथा शङ्खों की ध्वनि कर रहे थे।
एवं तस्य बलं भीमं कुन्तीपुत्रस्य धीमतः ।
यदाश्रित्याथ युयुधे धार्तराष्ट्रं सुयोधनम् ॥
इस प्रकार बुद्धिमान् कुन्तीपुत्रके पास भयंकर एवं विशाल सेना थी, जिसका आश्रय लेकर वे धृतराष्ट्रपुत्र दुर्योधनसे लोहा ले रहे थे ।
In English
Bhishma's Abduction of the Kashi Princesses
Bhishma abducts Amba, Ambika, and Ambalika from their father's palace to provide wives for his brother Vichitravirya. Amba later seeks refuge with her lover Shalva, but he rejects her because she was taken by Bhishma. Distraught and rejected by everyone, Amba laments her misfortune.
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