श्रीगणेशाय नमः।

महाभारत — खण्ड ३ — पृष्ठ 1291–1300

महाभारत — खण्ड ३ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1291–1300

पृष्ठ 1291

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रत्नाकरास्तथा नद्यस्तेषां नामानि मे शृणु । संजय बोले — राजन्! शाकद्वीपमें भी मणियोंसे विभूषित सात पर्वत हैं । वहाँ रत्नोंकी

बहुत - सी खानें तथा नदियाँ भी हैं । उनके नाम मुझसे सुनिये ॥ १३३ ॥

अतीव गुणवत् सर्वं तत्र पुण्यं जनाधिप ॥ १४ ॥

देवर्षिगन्धर्वयुतः प्रथमो मेरुरुच्यते ।

प्रागायतो महाराज मलयो नाम पर्वतः ॥ १५ ॥

जनेश्वर! वहाँका सब कुछ परम पवित्र और अत्यन्त गुणकारी है । वहाँका प्रधान पर्वत है मेरु, जो देवर्षियों तथा गन्धर्वोंसे सेवित है । महाराज! दूसरे पर्वतका नाम मलय है, जो पूर्वसे पश्चिमकी ओर फैला हुआ है ॥ १४-१५ ॥

ततो मेघाः प्रवर्तन्ते प्रभवन्ति च सर्वशः ।

ततः परेण कौरव्य जलधारो महागिरिः ॥ १६ ॥

मेघ वहींसे उत्पन्न होते हैं, फिर वे सब ओर फैलकर जलकी वर्षा करनेमें समर्थ होते हैं । कुरुनन्दन! उसके बाद जलधार नामक महान् पर्वत है ॥ १६ ॥

ततो नित्यमुपादत्ते वासवः परमं जलम् ।

ततो वर्षं प्रभवति वर्षकाले जनेश्वर ॥ १७ ॥

जनेश्वर! इन्द्र वहींसे सदा उत्तम जल ग्रहण करते हैं । इसीलिये वर्षाकालमें वे यथेष्ट जल बरसानेमें समर्थ होते हैं ॥ १७ ॥

उच्चैर्गरी रैवतको यत्र नित्यं प्रतिष्ठिता ।

रेवती दिवि नक्षत्रं पितामहकृतो विधिः ॥ १८ ॥

उसी द्वीपमें उच्चतम रैवतक पर्वत है, जहाँ आकाशमें रेवती नामक नक्षत्र नित्य प्रतिष्ठित है । यह ब्रह्माजीका रचा हुआ विधान है ॥ १८ ॥

उत्तरेण तु राजेन्द्र श्यामो नाम महागिरिः ।

नवमेघप्रभः प्रांशुः श्रीमानुज्ज्वलविग्रहः ॥ १ ९ ॥

राजेन्द्र! उसके उत्तर भागमें श्याम नामक महान् पर्वत है, जो नूतन मेघके समान श्याम शोभासे युक्त है । उसकी ऊँचाई बहुत है । उसका कान्तिमान् कलेवर परम उज्ज्वल है ॥ १ ९ ॥

यतः श्यामत्वमापन्नाः प्रजा जनपदेश्वर ।

जनपदेश्वर! वहाँ रहनेसे ही वहाँकी प्रजा श्यामताको प्राप्त हुई है ॥ १ ९ ३ ॥

धृतराष्ट्रउवाच

सुमहान् संशयो मेऽद्य प्रोक्तोऽयं संजय त्वया ।

प्रजाः कथं सूतपुत्र सम्प्राप्ताः श्यामतामिह ॥ २० ॥

पृष्ठ 1292

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धृतराष्ट्र बोले- सूतपुत्र संजय! यह तो तुमने आज मुझसे महान् संशयकी बात कही है । भला, वहाँ रहनेमात्रसे प्रजा श्यामताको कैसे प्राप्त हो गयी? ॥ २० ॥

संजय उवाच

सर्वेष्वेव महाराज द्वीपेषु कुरुनन्दन ।

गौरः कृष्णश्च वर्णौ द्वौ तयोर्वर्णान्तरं नृप ॥ २१ ॥

श्यामो यस्मात् प्रवृत्तो वै तत् ते वक्ष्यामि भारत ।

आस्तेऽत्र भगवान् कृष्णस्तत्कान्त्या श्यामतां गतः ॥ २२ ॥

संजयने कहा - महाराज कुरुनन्दन! सम्पूर्ण द्वीपोंमें गौर, कृष्ण तथा इन दोनों वर्णोंका सम्मिश्रण देखा जाता है । भारत! यह पर्वत जिस कारणसे श्याम होकर दूसरोंमें भी श्यामता उत्पन्न करनेवाला हुआ, वह आपको बताता हूँ । यहाँ भगवान् श्रीकृष्ण निवास करते हैं; अतः उन्हींकी कान्तिसे यह (स्वयं भी ) श्यामताको प्राप्त हुआ है ( और अपने समीप रहनेवाली प्रजामें भी श्यामता उत्पन्न कर देता है ) ॥ २१-२२ ॥

ततः परं कौरवेन्द्र दुर्गशैलो महोदयः ।

केसरः केसरयुतो यतो वातः प्रवर्तते ॥ २३ ॥

कौरवराज! श्यामगिरिके बाद बहुत ऊँचा दुर्ग शैल है । उसके बाद केसर पर्वत है, जहाँसे चली हुई वायु केसरकी सुगन्ध लिये बहती है ॥ २३ ॥

तेषां योजनविष्कम्भो द्विगुणः प्रविभागशः ।

वर्षाणि तेषु कौरव्य सप्तोक्तानि मनीषिभिः ॥ २४ ॥

इन सब पर्वतोंका विस्तार दूना होता गया है । कुरुनन्दन! मनीषी पुरुषोंने उन पर्वतोंके समीप सात वर्ष बताये हैं ॥ २४ ॥

महामेरुर्महाकाशो जलदः कुमुदोत्तरः ।

जलधारो महाराज सुकुमार इति स्मृतः ॥ २५ ॥

महामेरु पर्वतके समीप महाकाशवर्ष है, जलद या मलयके निकट कुमुदोत्तरवर्ष है ।

महाराज! जलधार गिरिका पार्श्ववर्ती वर्ष सुकुमार बताया गया है ॥ २५ ॥

रेवतस्य तु कौमारः श्यामस्य मणिकाञ्चनः ।

केसरस्याथ मोदाकी परेण तु महापुमान् ॥ २६ ॥

रैवतक पर्वतका कुमारवर्ष तथा श्यामगिरिका मणिकांचनवर्ष है । इसी प्रकार केसरके

समीपवर्ती वर्षको मोदाकी कहते हैं । उसके आगे महापुमान् नामक एक पर्वत है ॥ २६ ॥

परिवार्य तु कौरव्य दैर्घ्यं ह्रस्वत्वमेव च ।

जम्बूद्वीपेन संख्यातस्तस्य मध्ये महाद्रुमः ॥ २७ ॥

शाको नाम महाराज प्रजा तस्य सदानुगा ।

तत्र पुण्या जनपदाः पूज्यते तत्र शंकरः ॥ २८ ॥

पृष्ठ 1293

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वह उस द्वीपकी लंबाई और चौड़ाई सबको घेरकर खड़ा है । महाराज! उसके बीचमें शाक नामक एक बड़ा भारी वृक्ष है, जो जम्बूद्वीपके समान ही विशाल है । महाराज! वहाँकी प्रजा सदा उस शाकवृक्षके ही आश्रित रहती है । वहाँ बड़े पवित्र जनपद हैं । उस द्वीपमें भगवान् शंकरकी आराधना की जाती है ॥ २७-२८ ॥

तत्र गच्छन्ति सिद्धाश्च चारणा दैवतानि च ।

धार्मिकाश्च प्रजा राजंश्चत्वारोऽतीव भारत ॥ २ ९ ॥

राजन्! भरतनन्दन! वहाँ सिद्ध, चारण और देवता जाते हैं । वहाँके चारों वर्णोंकी प्रजा अत्यन्त धार्मिक होती है ॥ २ ९ ॥

वर्णाः स्वकर्मनिरता न च स्तेनोऽत्र दृश्यते ।

दीर्घायुषो महाराज जरामृत्युविवर्जिताः ॥ ३० ॥

सभी वर्णके लोग वहाँ अपने - अपने वर्णाश्रमोचित कर्मका पालन करते हैं । वहाँ कोई चोर नहीं दिखायी देता । महाराज! उस द्वीपके निवासी दीर्घायु तथा जरा और मृत्युसे रहित होते हैं ॥ ३० ॥

प्रजास्तत्र विवर्धन्ते वर्षास्विव समुद्रगाः ।

नद्यः पुण्यजलास्तत्र गङ्गा च बहुधा गता ॥ ३१ ॥

जैसे वर्षा -ऋतुमें समुद्रगामिनी नदियाँ बढ़ जाती हैं, उसी प्रकार वहाँकी समस्त प्रजा सदा वृद्धिको प्राप्त होती रहती है । उस द्वीपमें अनेक पवित्र जलवाली नदियाँ बहती हैं । वहाँ गंगा भी अनेक धाराओंमें विभक्त देखी जाती हैं ॥ ३१ ॥

सुकुमारी कुमारी च शीताशी वेणिका तथा ।

महानदी च कौरव्य तथा मणिजला नदी ॥ ३२ ॥

चक्षुर्वर्धनिका चैव नदी भरतसत्तम ।

तत्र प्रवृत्ताः पुण्योदा नद्यः कुरुकुलोद्वह ॥ ३३ ॥

कुरुनन्दन! भरतश्रेष्ठ! उस द्वीपमें सुकुमारी, कुमारी, शीताशी, वेणिका, महानदी, मणिजला तथा चक्षुर्वर्धनिका आदि पवित्र जलवाली नदियाँ बहती हैं ॥ ३२-३३ ॥

सहस्राणां शतान्येव यतो वर्षति वासवः ।

न तासां नामधेयानि परिमाणं तथैव च ॥ ३४ ॥

शक्यन्ते परिसंख्यातुं पुण्यास्ता हि सरिद्वराः ।

तव पुण्या जनपदाश्चत्वारो लोकसम्मताः ॥ ३५ ॥

वहाँ लाखों ऐसी नदियाँ हैं, जिनसे जल लेकर इन्द्र वर्षा करते हैं । उनके नाम और परिमाणकी संख्या बताना कठिन ही नहीं, असम्भव है । वे सभी श्रेष्ठ नदियाँ परम पुण्यमयी हैं । उस द्वीपमें लोकसम्मानित चार पवित्र जनपद हैं ॥ ३४-३५ ॥

मङ्गाश्च मशकाश्चैव मानसा मन्दगास्तथा ।

मङ्गा ब्राह्मणभूयिष्ठाः स्वकर्मनिरता नृप ॥ ३६ ॥

पृष्ठ 1294

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उनके नाम इस प्रकार हैं - मंग, मशक, मानस तथा मन्दग । नरेश्वर! उनमेंसे मंग जनपदमें अधिकतर ब्राह्मण निवास करते हैं । वे सब - के - सब अपने कर्तव्यके पालनमें तत्पर रहते हैं ॥ ३६ ॥

मशकेषु तु राजन्या धार्मिकाः सर्वकामदाः ।

मानसाश्च महाराज वैश्यधर्मोपजीविनः ॥ ३७ ॥

सर्वकामसमायुक्ताः शूरा धर्मार्थनिश्चिताः । महाराज! मशक जनपदमें सम्पूर्ण कामनाओंके देनेवाले धर्मात्मा क्षत्रिय निवास करते हैं । मानस जनपदके निवासी वैश्यवृत्तिसे जीवन- निर्वाह करते हैं । वे सर्वभोगसम्पन्न, शूरवीर, धर्म और अर्थको समझनेवाले एवं दृढ़निश्चयी होते हैं ॥ ३७३ ॥

शूद्रास्तु मन्दगा नित्यं पुरुषा धर्मशीलिनः ॥ ३८ ॥

मन्दग जनपदमें शूद्र रहते हैं । वे भी धर्मात्मा होते हैं ॥ ३८ ॥

न तत्र राजा राजेन्द्र न दण्डो न च दण्डिकः ।

स्वधर्मेणैव धर्मज्ञास्ते रक्षन्ति परस्परम् ॥ ३ ९ ॥

राजेन्द्र! वहाँ न कोई राजा है, न दण्ड है और न दण्ड देनेवाला है । वहाँके लोग धर्मके ज्ञाता हैं और स्वधर्मपालनके ही प्रभावसे एक- दूसरेकी रक्षा करते हैं ॥ ३ ९ ॥

एतावदेव शक्यं तु तत्र द्वीपे प्रभाषितुम् ।

एतदेव च श्रोतव्यं शाकद्वीपे महौजसि ॥ ४० ॥

महाराज! उस महान् तेजोमय शाकद्वीपके सम्बन्धमें इतना ही कहा जा सकता है और इतना ही सुनना चाहिये ॥ ४० ॥

इति श्रीमहाभारते भीष्मपर्वणि भूमिपर्वणि शाकद्वीपवर्णने एकादशोऽध्यायः ॥ ११ || इस प्रकार श्रीमहाभारत भीष्मपर्वके अन्तर्गत भूमिपर्वमें शाकद्वीपवर्णनविषयक ग्यारहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ११ ॥

पृष्ठ 1295

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द्वादशोऽध्यायः कुश, क्रौंच और पुष्कर आदि द्वीपोंका तथा राहु, सूर्य एवं चन्द्रमाके प्रमाणका वर्णन संजय उवाच

उत्तरेषु च कौरव्य द्वीपेषु श्रूयते कथा ।

एवं तत्र महाराज ब्रुवतश्च निबोध मे ॥ १ ॥

संजय बोले- महाराज! कुरुनन्दन! इसके बादवाले द्वीपोंके विषयमें जो बातें सुनी जाती हैं, वे इस प्रकार हैं; उन्हें आप मुझसे सुनिये ॥ १ ॥

घृततोयः समुद्रोऽत्र दधिमण्डोदकोऽपरः ।

सुरोदः सागरश्चैव तथान्यो जलसागरः ॥ २ ॥

क्षीरोद समुद्रके बाद घृतोद समुद्र है । फिर दधिमण्डोदक समुद्र है । इनके बाद सुरोद समुद्र है, फिर मीठे पानीका सागर है ॥ २ ॥

परस्परेण द्विगुणाः सर्वे द्वीपा नराधिप ।

पर्वताश्च महाराज समुद्रैः परिवारिताः ॥ ३ ॥

महाराज! इन समुद्रोंसे घिरे हुए सभी द्वीप और पर्वत उत्तरोत्तर दुगुने विस्तारवाले हैं ॥ ३ ॥

गौरस्तु मध्यमे द्वीपे गिरिर्मानः शिलो महान् ।

पर्वतः पश्चिमे कृष्णो नारायणसखो नृप ॥ ४ ॥

नरेश्वर! इनमेंसे मध्यम द्वीपमें मनःशिला ( मैनसिल) - का एक बहुत बड़ा पर्वत है; जो ' गौर ' नामसे विख्यात है । उसके पश्चिममें ' कृष्ण' पर्वत है, जो नारायणको विशेष प्रिय ॥ ४ ॥

तत्र रत्नानि दिव्यानि स्वयं रक्षति केशवः ।

प्रसन्नश्चाभवत् तत्र प्रजानां व्यदधत् सुखम् ॥ ५ ॥

स्वयं भगवान् केशव ही वहाँ दिव्य रत्नोंको रखते और उनकी रक्षा करते हैं । वे वहाँकी प्रजापर प्रसन्न हुए थे, इसलिये उनको सुख पहुँचानेकी व्यवस्था उन्होंने स्वयं की है ॥ ५ ॥

कुशस्तम्बः कुशद्वीपे मध्ये जनपदैः सह ।

सम्पूज्यते शाल्मलिश्च द्वीपे शाल्मलिके नृप ॥ ६ ॥

नरेश्वर! कुशद्वीपमें कुशोंका एक बहुत बड़ा झाड़ है, जिसकी वहाँके जनपदोंमें रहनेवाले लोग पूजा करते हैं । उसी प्रकार शाल्मलिद्वीपमें शाल्मलि ( सेंमर) वृक्षकी पूजा की जाती है ॥ ६ ॥

पृष्ठ 1296

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क्रौञ्चद्वीपे महाक्रौञ्चो गिरी रत्नचयाकरः ।

सम्पूज्यते महाराज चातुर्वर्ण्येन नित्यदा ॥ ७ ॥

क्रौंचद्वीपमें महाक्रौंच नामक एक महान् पर्वत है, जो रत्नराशिकी खान है । महाराज! वहाँ चारों वर्णोंके लोग सदा उसीकी पूजा करते हैं ॥ ७ ॥

गोमन्तः पर्वतो राजन् सुमहान् सर्वधातुकः ।

यत्र नित्यं निवसति श्रीमान् कमललोचनः ॥ ८ ॥

मोक्षिभिः संस्तुतो नित्यं प्रभुर्नारायणो हरिः । राजन्! वहीं गोमन्त नामक विशाल पर्वत है, जो सम्पूर्ण धातुओंसे सम्पन्न है । वहाँ मोक्षकी इच्छा रखनेवाले उपासकोंके मुखसे अपनी स्तुति सुनते हुए सबके स्वामी श्रीमान् कमलनयन भगवान् नारायण नित्य निवास करते हैं ॥ ८३ ॥

कुशद्वीपे तु राजेन्द्र पर्वतो विद्रुमैश्चितः ॥ ९ ॥

सुधामा नाम दुर्धर्षो द्वितीयो हेमपर्वतः । राजेन्द्र! कुशद्वीपमें सुधामा नामसे प्रसिद्ध दूसरा सुवर्णमय पर्वत है, जो मूँगोंसे भरा हुआ और दुर्गम है ॥ ९ ३ ॥ द्युतिमान् नाम कौरव्य तृतीयः कुमुदो गिरिः ॥ १० ॥

चतुर्थः पुष्पवान् नाम पञ्चमस्तु कुशेशयः ।

षष्ठो हरिगिरिर्नाम षडेते पर्वतोत्तमाः ॥ ११ ॥

कौरव्य! वहीं परम कान्तिमान् कुमुद नामक तीसरा पर्वत है । चौथा पुष्पवान्, पाँचवाँ

कुशेशय और छठा हरिगिरि है । ये छः कुशद्वीपके श्रेष्ठ पर्वत हैं ॥ १०-११ ॥

तेषामन्तरविष्कम्भो द्विगुणः सर्वभागशः ।

औद्भिदं प्रथमं वर्षं द्वितीयं वेणुमण्डलम् ॥ १२ ॥

इन पर्वतोंके बीचका विस्तार सब ओरसे उत्तरोत्तर दूना होता गया है । कुशद्वीपके पहले

वर्षका नाम उद्भिद् है । दूसरेका नाम वेणुमण्डल है ॥ १२ ॥

तृतीयं सुरथाकारं चतुर्थं कम्बलं स्मृतम् ।

धृतिमत् पञ्चमं वर्षं षष्ठं वर्षं प्रभाकरम् ॥ १३ ॥

तीसरेका नाम सुरथाकार, चौथेका कम्बल, पाँचवेंका धृतिमान् और छठे वर्षका नाम प्रभाकर है ॥ १३ ॥

सप्तमं कापिलं वर्षं सप्तैते वर्षलम्भकाः ।

एतेषु देवगन्धर्वाः प्रजाश्च जगतीश्वर ॥ १४ ॥

विहरन्ते रमन्ते च न तेषु म्रियते जनः ।

न तेषु दस्यवः सन्ति म्लेच्छजात्योऽपि वा नृप ॥ १५ ॥

सातवाँ वर्ष कापिल कहलाता है । ये सात वर्षसमुदाय हैं । पृथ्वीपते! इन सबमें देवता, गन्धर्व तथा मनुष्य सानन्द विहार करते हैं । उनमेंसे किसीकी मृत्यु नहीं होती है । नरेश्वर!

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वहाँ लुटेरे अथवा म्लेच्छ- जातिके लोग नहीं हैं ॥ १४-१५ ॥

गौरप्रायो जनः सर्वः सुकुमारश्च पार्थिव ।

अवशिष्टेषु सर्वेषु वक्ष्यामि मनुजेश्वर ॥ १६ ॥

मनुजेश्वर! इन वर्षोंके सभी लोग प्रायः गोरे और सुकुमार होते हैं । अब मैं शेष सम्पूर्ण द्वीपोंके विषयमें बताता हूँ ॥ १६ ॥

यथाश्रुतं महाराज तदव्यग्रमनाः शृणु ।

क्रौञ्चद्वीपे महाराज क्रौञ्चो नाम महागिरिः ॥ १७ ॥

महाराज! मैंने जैसा सुन रखा है, वैसा ही सुनाऊँगा । आप शान्तचित्त होकर सुनिये ।

क्रौंचद्वीपमें क्रौंच नामक विशाल पर्वत है ॥ १७ ॥

क्रौञ्चात् परो वामनको वामनादन्धकारकः ।

अन्धकारात् परो राजन् मैनाकः पर्वतोत्तमः ॥ १८ ॥

मैनाकात् परतो राजन् गोविन्दो गिरिरुत्तमः ।

गोविन्दात् परतो राजन् निबिडो नाम पर्वतः ॥ १ ९ ॥

राजन्! क्रौंचके बाद वामन पर्वत है, वामनके बाद अन्धकार और अन्धकारके बाद मैनाक नामक श्रेष्ठ पर्वत है । प्रभो! मैनाकके बाद उत्तम गोविन्द गिरि है । गोविन्दके बाद निबिड नामक पर्वत है ॥ १८-१९ ॥

परस्तु द्विगुणस्तेषां विष्कम्भो वंशवर्धन ।

देशांस्तत्र प्रवक्ष्यामि तन्मे निगदतः शृणु ॥ २० ॥

कुरुवंशकी वृद्धि करनेवाले महाराज! इन पर्वतोंके बीचका विस्तार उत्तरोत्तर दूना होता गया है । उनमें जो देश बसे हुए हैं, उनका परिचय देता हूँ; सुनिये ॥ २० ॥

क्रौञ्चस्य कुशलो देशो वामनस्य मनोनुगः ।

मनोनुगात् परश्चोष्णो देशः कुरुकुलोद्वह ॥ २१ ॥

क्रौंचपर्वतके निकट कुशल नामक देश है । वामन-पर्वतके पास मनोनुग देश है ।

कुरुकुलश्रेष्ठ! मनोनुगके बाद उष्ण देश आता है ॥ २१ ॥

उष्णात् परः प्रावरकः प्रावारादन्धकारकः ।

अन्धकारकदेशात् तु मुनिदेशः परः स्मृतः ॥ २२ ॥

उष्णके बाद प्रावरक, प्रावरकके बाद अन्धकारक और अन्धकारकके बाद उत्तम मुनिदेश बताया गया है ॥ २२ ॥

मुनिदेशात् परश्चैव प्रोच्यते दुन्दुभिस्वनः ।

सिद्धचारणसंकीर्णो गौरप्रायो जनाधिप ॥ २३ ॥

एते देशा महाराज देवगन्धर्वसेविताः ।

पृष्ठ 1298

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मुनिदेशके बाद जो देश है, उसे दुन्दुभिस्वन कहते हैं । वह सिद्धों और चारणोंसे भरा हुआ है । जनेश्वर! वहाँके लोग प्रायः गोरे होते हैं । महाराज! इन सभी देशोंमें देवता और गन्धर्व निवास करते हैं ॥ २३३ ॥

पुष्करे पुष्करो नाम पर्वतो मणिरत्नवान् ॥ २४ ॥

पुष्करद्वीपमें पुष्कर नामक पर्वत है, जो मणियों तथा रत्नोंसे भरा हुआ है ॥ २४ ॥

तत्र नित्यं प्रभवति स्वयं देवः प्रजापतिः ।

तं पर्युपासते नित्यं देवाः सर्वे महर्षयः ॥ २५ ॥

वाग्भिर्मनोऽनुकूलाभिः पूजयन्तो जनाधिप । वहाँ स्वयं प्रजापति भगवान् ब्रह्मा नित्य निवास करते हैं । जनेश्वर! सम्पूर्ण देवता और महर्षि मनोनुकूल वचनोंद्वारा प्रतिदिन उनकी पूजा करते हुए सदा उन्हींकी उपासनामें लगे रहते हैं ॥ २५३ ॥

जम्बूद्वीपात् प्रवर्तन्ते रत्नानि विविधान्युत ॥ २६ ॥

द्वीपेषु तेषु सर्वेषु प्रजानां कुरुसत्तम ।

ब्रह्मचर्येण सत्येन प्रजानां हि दमेन च ॥ २७ ॥

आरोग्यायुःप्रमाणाभ्यां द्विगुणं द्विगुणं ततः । जम्बूद्वीपसे अनेक प्रकारके रत्न अन्यान्य सब द्वीपोंमें वहाँकी प्रजाओंके उपयोगके लिये भेजे जाते हैं । कुरुश्रेष्ठ! ब्रह्मचर्य, सत्य और इन्द्रियसंयमके प्रभावसे उन सब द्वीपोंकी प्रजाओंके आरोग्य और आयुका प्रमाण जम्बूद्वीपकी अपेक्षा उत्तरोत्तर दूना माना गया है ॥

एको जनपदो राजन् द्वीपेष्वेतेषु भारत ।

उक्ता जनपदा येषु धर्मश्चैकः प्रदृश्यते ॥ २८ ॥

भरतवंशी नरेश! वास्तवमें इन देशोंमें एक ही जनपद है । जिन द्वीपोंमें अनेक जनपद बताये गये हैं, उनमें भी एक प्रकारका ही धर्म देखा जाता है ॥ २८ ॥

ईश्वरो दण्डमुद्यम्य स्वयमेव प्रजापतिः ।

द्वीपानेतान् महाराज रक्षंस्तिष्ठति नित्यदा ॥ २ ९ ॥

महाराज! सबके ईश्वर प्रजापति ब्रह्मा स्वयं ही दण्ड लेकर इन द्वीपोंकी रक्षा करते हुए इनमें नित्य निवास करते हैं ॥ २ ९ ॥

स राजा स शिवो राजन् स पिता प्रपितामहः ।

गोपायति नरश्रेष्ठ प्रजाः सजडपण्डिताः ॥ ३० ॥

नरश्रेष्ठ! प्रजापति ही वहाँके राजा हैं । वे कल्याणस्वरूप होकर सबका कल्याण करते हैं । राजन्! वे ही पिता और प्रपितामह हैं। जडसे लेकर चेतनतक समस्त प्रजाकी वे ही रक्षा करते हैं ॥ ३० ॥

भोजनं चात्र कौरव्य प्रजाः स्वयमुपस्थितम् ।

सिद्धमेव महाबाहो तद्धि भुञ्जन्ति नित्यदा ॥ ३१ ॥

पृष्ठ 1299

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महाबाहु कुरुनन्दन! यहाँकी प्रजाओंके पास सदा पका पकाया भोजन स्वयं उपस्थित हो जाता है और उसीको खाकर वे लोग रहते हैं ॥ ३१ ॥

ततः परं समा नाम दृश्यते लोकसंस्थितिः ।

चतुरस्रं महाराज त्रयस्त्रिंशत् तु मण्डलम् ॥ ३२ ॥

उसके बाद समानामवाली लोगोंकी बस्ती देखी जाती है । महाराज! वह चौकोर बसी हुई है । उसमें तैंतीस मण्डल हैं ॥ ३२ ॥

तत्र तिष्ठन्ति कौरव्य चत्वारो लोकसम्मताः ।

दिग्गजा भरतश्रेष्ठ वामनैरावतादयः ॥ ३३ ॥

कुरुनन्दन! भरतश्रेष्ठ! वहाँ लोकविख्यात वामन, ऐरावत, सुप्रतीक और अंजन — ये चार दिग्गज रहते हैं ॥

सुप्रतीकस्तथा राजन् प्रभिन्नकरटामुखः ।

तस्याहं परिमाणं तु न संख्यातुमिहोत्सहे ॥ ३४ ॥

असंख्यातः स नित्यं हि तिर्यगूर्ध्वमधस्तथा । राजन्! इनमेंसे सुप्रतीक नामक गजराज, जिसके गण्डस्थलसे मदकी धारा बहती रहती है, उसका परिमाण कैसा और कितना है, यह मैं नहीं बता सकता । वह नीचे -ऊपर

तथा अगल - बगलमें सब ओर फैला हुआ है । वह अपरिमित है ॥ ३४ ॥

तत्र वै वायवो वान्ति दिग्भ्यः सर्वाभ्य एव हि ॥ ३५ ॥

असम्बद्धा महाराज तान् निगृह्णन्ति ते गजाः ।

पुष्करैः पद्मसंकाशैर्विकसद्भिर्महाप्रभैः ॥ ३६ ॥

शतधा पुनरेवाशु ते तान् मुञ्चन्ति नित्यशः ।

श्वसद्भिर्मुच्यमानास्तु दिग्गजैरिह मारुताः ॥ ३७ ॥

आगच्छन्ति महाराज ततस्तिष्ठन्ति वै प्रजाः । वहाँ सब दिशाओंसे खुली हुई हवा आती है । उसे वे चारों दिग्गज ग्रहण करके रोक रखते हैं । फिर वे विकसित कमलसदृश परम कान्तिमान् शुण्डदण्डके अग्रभागसे उस हवाको सैकड़ों भागोंमें करके तुरंत ही सब ओर छोड़ते हैं, यह उनका नित्यका काम है । महाराज! साँस लेते हुए उन दिग्गजोंके मुखसे मुक्त होकर जो वायु यहाँ आती है, उसीसे सारी प्रजा जीवन धारण करती है ॥ धृतराष्ट्रउवाच परो वै विस्तरोऽत्यर्थं त्वया संजय कीर्तितः ॥ ३८ ॥

दर्शितं द्वीपसंस्थानमुत्तरं ब्रूहि संजय । धृतराष्ट्र बोले- संजय! तुमने द्वीपोंकी स्थितिके विषयमें तो बड़े विस्तारके साथ वर्णन किया है । अब जो अन्तिम विषय- सूर्य, चन्द्रमा तथा राहुका प्रमाण बताना शेष रह गया है,

पृष्ठ 1300

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उसका वर्णन करो ॥ ३८३ ॥

संजय उवाच उक्त द्वीपा महाराज ग्रहं वै शृणु तत्त्वतः ॥ ३ ९ ॥

स्वर्भानोः कौरवश्रेष्ठ यावदेव प्रमाणतः ।

परिमण्डलो महाराज स्वर्भानुः श्रूयते ग्रहः ॥ ४० ॥

संजय बोले- महाराज! मैंने द्वीपोंका वर्णन तो कर दिया । अब ग्रहोंका यथार्थ वर्णन सुनिये । कौरव- श्रेष्ठ! राहुकी जितनी बड़ी लंबाई-चौड़ाई सुननेमें आती है, वह आपको बताता हूँ । महाराज! सुना है कि राहु ग्रह मण्डलाकार है ॥ ३ ९ -४० ॥

योजनानां सहस्राणि विष्कम्भो द्वादशास्य वै ।

परिणाहेन षट्त्रिंशद् विपुलत्वेन चानघ ॥ ४१ ॥

निष्पाप नरेश! राहु ग्रहका व्यासगत विस्तार बारह हजार योजन है और उसकी परिधिका विस्तार छत्तीस हजार योजन है ॥ ४१ ॥

षष्टिमाहुः शतान्यस्य बुधाः पौराणिकास्तथा ।

चन्द्रमास्तु सहस्राणि राजन्नेकादश स्मृतः ॥ ४२ ॥

पौराणिक विद्वान् उसकी विपुलता ( मोटाई ) छः हजार योजनकी बताते हैं । राजन्! चन्द्रमाका व्यास ग्यारह हजार योजन है ॥ ४२ ॥

विष्कम्भेण कुरुश्रेष्ठ त्रयस्त्रिंशत् तु मण्डलम् ।

एकोनषष्टिविष्कम्भं शीतरश्मेर्महात्मनः ॥ ४३ ॥

कुरुश्रेष्ठ! उनकी परिधि या मण्डलका विस्तार तैंतीस हजार योजन बताया गया है और महामना शीतरश्मि चन्द्रमाका वैपुल्यगत विस्तार ( मोटाई ) उनसठ सौ योजन है ॥ ४३ ॥

सूर्यस्त्वष्टौ सहस्राणि द्वे चान्ये कुरुनन्दन ।

विष्कम्भेण ततो राजन् मण्डलं त्रिंशता समम् ॥ ४४ ॥

अष्टपञ्चाशतं राजन् विपुलत्वेन चानघ ।

श्रूयते परमोदारः पतगोऽसौ विभावसुः ॥ ४५ ॥

कुरुनन्दन! सूर्यका व्यासगत विस्तार दस हजार योजन है और उनकी परिधि या मण्डलका विस्तार तीस हजार योजन है तथा उनकी विपुलता अट्ठावन सौ योजनकी है । अनघ! इस प्रकार शीघ्रगामी परम उदार भगवान् सूर्यके त्रिविध विस्तारका वर्णन सुना जाता है ॥ ४४-४५ ॥

एतत् प्रमाणमर्कस्य निर्दिष्टमिह भारत ।

स राहुश्छादयत्येतौ यथाकालं महत्तया ॥ ४६ ॥

चन्द्रादित्यौ महाराज संक्षेपोऽयमुदाहृतः ।

इत्येतत् ते महाराज पृच्छतः शास्त्रचक्षुषा ॥ ४७ ॥