श्रीगणेशाय नमः।

महाभारत — खण्ड ३ — पृष्ठ 1301–1310

महाभारत — खण्ड ३ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1301–1310

पृष्ठ 1301

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सर्वमुक्तं यथातत्त्वं तस्माच्छममवाप्नुहि । भारत! यहाँ सूर्यका प्रमाण बताया गया, इन दोनोंसे अधिक विस्तार रखनेके कारण राहु यथासमय इन सूर्य और चन्द्रमाको आच्छादित कर लेता है । महाराज! आपके प्रश्नके अनुसार शास्त्रदृष्टिसे ग्रहोंके विषयमें संक्षेपसे बताया गया । ये सारी बातें मैंने आपके सामने

यथार्थरूपसे उपस्थित की हैं । अतः आप शान्ति धारण कीजिये ॥ ४६-४७३ ॥

यथोद्दिष्टं मया प्रोक्तं सनिर्माणमिदं जगत् ॥ ४८ ॥

तस्मादाश्वस कौरव्य पुत्रं दुर्योधनं प्रति । इस जगत्का स्वरूप कैसा है और इसका निर्माण किस प्रकार हुआ है, ये सब बातें मैंने शास्त्रोक्त रीतिसे बतायी हैं; अतः कुरुनन्दन! आप अपने पुत्र दुर्योधनकी ओरसे निश्चिन्त रहिये ॥ ४८३ ॥

श्रुत्वेदं भरतश्रेष्ठ भूमिपर्व मनोनुगम् ॥ ४ ९ ॥

श्रीमान् भवति राजन्यः सिद्धार्थः साधुसम्मतः ।

आयुर्बलं च कीर्तिश्च तस्य तेजश्च वर्धते ॥ ५० ॥

भरतश्रेष्ठ! जो राजा इस भूमिपर्वको मनोयोगपूर्वक सुनता है, वह श्रीसम्पन्न, सफलमनोरथ तथा श्रेष्ठ पुरुषोंद्वारा सम्मानित होता है और उसके बल, आयु, कीर्ति तथा तेजकी वृद्धि होती है ॥ ४ ९-५० ॥

यः शृणोति महीपाल पर्वणीदं यतव्रतः ।

प्रीयन्ते पितरस्तस्य तथैव च पितामहाः ॥ ५१ ॥

भूपाल! जो मनुष्य दृढ़तापूर्वक संयम एवं व्रतका पालन करते हुए प्रत्येक पर्वके दिन इस प्रसंगको सुनता है, उसके पितर और पितामह पूर्ण तृप्त होते हैं ॥ ५१ ॥

इदं तु भारतं वर्षं यत्र वर्तामहे वयम् ।

पूर्वैः प्रवर्तितं पुण्यं तत् सर्वं श्रुतवानसि ॥ ५२ ॥

राजन्! जिसमें हमलोग निवास करते हैं और जहाँ हमारे पूर्वजोंने पुण्यकर्मोंका

अनुष्ठान किया है, यह वही भारतवर्ष है । आपने इसका पूरा - पूरा वर्णन सुन लिया है ॥

इति श्रीमहाभारते भीष्मपर्वणि भूमिपर्वणि उत्तरद्वीपादिसंस्थानवर्णने द्वादशोऽध्यायः ॥ १२ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत भीष्मपर्वके अन्तर्गत भूमिपर्वमें उत्तरद्वीपादिसंस्थानवर्णनविषयक बारहवाँअध्याय पूरा हुआ ॥ १२ ॥

FUR OFF

पृष्ठ 1302

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( श्रीमद्भगवद्गीतापर्व) त्रयोदशोऽध्यायः संजयका युद्धभूमिसे लौटकर धृतराष्ट्रको भीष्मकी मृत्युका समाचार सुनाना वैशम्पायन उवाच

अथ गावल्गणिर्विद्वान् संयुगादेत्य भारत ।

प्रत्यक्षदर्शी सर्वस्य भूतभव्यभविष्यवित् ॥ १ ॥

ध्यायते धृतराष्ट्राय सहसोत्पत्य दुःखितः ।

आचष्ट निहतं भीष्मं भरतानां पितामहम् ॥२ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं - भरतनन्दन! तदनन्तर एक दिनकी बात है कि भूत, वर्तमान और भविष्यके ज्ञाता एवं सब घटनाओंको प्रत्यक्ष देखनेवाले गवल्गणपुत्र विद्वान् संजयने युद्धभूमिसे लौटकर सहसा चिन्तामग्न धृतराष्ट्रके पास जा अत्यन्त दुःखी होकर भरतवंशियोंके पितामह भीष्मके युद्धभूमिमें मारे जानेका समाचार बताया ॥ १-२ ॥ संजय उवाच

संजयोऽहं महाराज नमस्ते भरतर्षभ ।

हतो भीष्मः शान्तनवो भरतानां पितामहः ॥ ३ ॥

संजय बोले — महाराज! भरतश्रेष्ठ! आपको नमस्कार है । मैं संजय आपकी सेवामें उपस्थित हूँ । भरतवंशियोंके पितामह और महाराज शान्तनुके पुत्र भीष्मजी आज युद्धमें मारे गये ॥ ३ ॥

ककुदं सर्वयोधानां धाम सर्वधनुष्मताम् ।

शरतल्पगतः सोऽद्य शेते कुरुपितामहः ॥ ४ ॥

जो समस्त योद्धाओंके ध्वजस्वरूप और सम्पूर्ण धनुर्धरोंके आश्रय थे, वे ही कुरुकुलपितामह भीष्म आज बाणशय्यापर सो रहे हैं ॥ ४ ॥

यस्य वीर्यं समाश्रित्य द्यूतं पुत्रस्तवाकरोत् ।

स शेते निहतो राजन् संख्ये भीष्मः शिखण्डिना ॥ ५ ॥

राजन्! आपके पुत्र दुर्योधनने जिनके बाहुबलका भरोसा करके जूएका खेल किया था, वे भीष्म शिखण्डीके हाथों मारे जाकर रणभूमिमें शयन करते हैं ॥ ५ ॥

पृष्ठ 1303

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यः सर्वान् पृथिवीपालान् समवेतान् महामृधे ।

जिगायैकरथेनैव काशिपूर्यां महारथः ॥ ६ ॥

जामदग्न्यं रणे रामं योऽयुध्यदपसम्भ्रमः ।

न हतो जामदग्न्येन स हतोऽद्य शिखण्डिना ॥ ७ ॥

जिन महारथी वीर भीष्मने काशिराजकी नगरीमें एकत्र हुए समस्त भूपालोंको अकेला ही रथपर बैठकर महान् युद्धमें पराजित कर दिया था, जिन्होंने रणभूमिमें जमदग्निनन्दन परशुरामजीके साथ निर्भय होकर युद्ध किया था और जिन्हें परशुरामजी भी मार न सके, वे ही भीष्म आज शिखण्डीके हाथसे मारे गये ॥ ६-७ ॥

महेन्द्रसदृशः शौर्ये स्थैर्ये च हिमवानिव ।

समुद्र इव गाम्भीर्ये सहिष्णुत्वे धरासमः ॥ ८ ॥

जो शौर्यमें देवराज इन्द्रके समान, स्थिरतामें हिमालयके समान, गम्भीरतामें समुद्रके समान और सहनशीलतामें पृथ्वीके समान थे ॥ ८ ॥

शरदंष्ट्रो धनुर्वक्त्रः खड्गजिह्वो दुरासदः ।

नरसिंहः पिता तेऽद्य पाञ्चाल्येन निपातितः ॥ ९ ॥

जो मनुष्योंमें सिंह थे, बाण ही जिनकी दाढ़ें थीं, धनुष जिनका फैला हुआ मुख था, तलवार ही जिनकी जिह्वा थी और इसीलिये जिनके पास पहुँचना किसीके लिये भी अत्यन्त कठिन था, वे ही आपके पिता भीष्म आज पांचालराजकुमार शिखण्डीके द्वारा मार गिराये गये ॥ ९ ॥

पाण्डवानां महासैन्यं यं दृष्ट्वोद्यतमाहवे ।

प्रावेपत भयोद्विग्नं सिंहं दृष्ट्वेव गोगणः ॥ १० ॥

परिरक्ष्य स सेनां ते दशरात्रमनीकहा ।

जगामास्तमिवादित्यः कृत्वा कर्म सुदुष्करम् ॥ ११ ॥

जैसे गौओंका झुंड सिंहके देखते ही भयसे व्याकुल हो उठता है, उसी प्रकार जिन्हें युद्धमें हथियार उठाये देख पाण्डवोंकी विशाल वाहिनी भयसे उद्विग्न होकर थरथर काँपने लगती थी, वे ही शत्रुसैन्यसंहारक भीष्म दस दिनोंतक आपकी सेनाका संरक्षण करके अत्यन्त दुष्कर पराक्रम प्रकट करते हुए अन्तमें सूर्यकी भाँति अस्ताचलको चले गये ॥ १०-११ ॥

यः स शक्र इवाक्षोभ्यो वर्षन् बाणान् सहस्रशः ।

जघान युधि योधानामर्बुदं दशभिर्दिनैः ॥ १२ ॥

स शेते निहतो भूमौ वातभग्न इव द्रुमः ।

तव दुर्मन्त्रिते राजन् यथा नार्हः स भारत ॥ १३ ॥

जिन्होंने इन्द्रकी भाँति क्षोभरहित होकर हजारों बाणोंकी वर्षा करते हुए दस दिनोंमें शत्रुपक्षके दस करोड़ योद्धाओंका संहार कर डाला, वे ही आज आँधीके उखाड़े हुए वृक्षकी

पृष्ठ 1304

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भाँति मारे जाकर युद्धभूमिमें सो रहे हैं। भरतवंशी नरेश! यह सब आपकी कुमन्त्रणाका फल है; नहीं तो भीष्मजी इस दुर्दशाके योग्य नहीं थे ॥ १२-१३ ॥ इति श्रीमहाभारते भीष्मपर्वणि श्रीमद्भगवद्गीतापर्वणि भीष्ममृत्युश्रवणे त्रयोदशोऽध्यायः ॥ १३ ॥

इसप्रकार श्रीमहाभारत भीष्मपर्वके अन्तर्गत श्रीमद्भगवद्गीतापर्वमें भीष्ममृत्युश्रवणविषयक तेरहवाँFara अध्यायFatal पूरा हुआ ॥ १३ ॥

पृष्ठ 1305

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चतुर्दशोऽध्यायः धृतराष्ट्रका विलाप करते हुए भीष्मजीके मारे जानेकी घटनाको विस्तारपूर्वक जाननेके लिये संजयसे प्रश्न करना धृतराष्ट्रउवाच

कथं कुरूणामृषभो हतो भीष्मः शिखण्डिना ।

कथं रथात् स न्यपतत् पिता मे वासवोपमः ॥ १ ॥

धृतराष्ट्र बोले- संजय! कुरुकुलके श्रेष्ठतम पुरुष मेरे पितृतुल्य भीष्म शिखण्डीके हाथसे कैसे मारे गये? वे इन्द्रके समान पराक्रमी थे, वे रथसे कैसे गिरे? ॥ १ ॥

कथमाचक्ष्व मे योधा हीना भीष्मेण संजय ।

बलिना देवकल्पेन गुर्वर्थे ब्रह्मचारिणा ॥ २ ॥

संजय! जिन्होंने अपने पिताके संतोषके लिये आजीवन ब्रह्मचर्यका पालन किया और जो देवताओंके समान बलवान् थे, उन्हीं भीष्मसे रहित होकर आज हमारे सैनिकोंकी कैसी अवस्था हुई है? यह बताओ ॥ २ ॥

तस्मिन् हते महाप्राज्ञे महेचासे महाबले ।

महासत्त्वे नरव्याघ्रे किमु आसीन्मनस्तव ॥ ३ ॥

महाज्ञानी, महाधनुर्धर, महाबली और महान् धैर्यशाली नरश्रेष्ठ भीष्मजीके मारे जानेपर तुम्हारे मनकी कैसी अवस्था हुई? ॥ ३ ॥

आर्तिं परामाविशति मनः शंससि मे हतम् ।

कुरूणामृषभं वीरमकम्पं पुरुषर्षभम् ॥ ४ ॥

संजय! तुम कहते हो, अकम्प्य वीर पुरुषसिंह, कुरुकुलशिरोमणि भीष्मजी मारे गये— इसे सुनकर मेरे हृदयमें बड़ी पीड़ा हो रही है ॥ ४ ॥

के तं यान्तमनुप्राप्ताः के वास्यासन् पुरोगमाः ।

केऽतिष्ठन् के न्यवर्तन्त केऽन्ववर्तन्त संजय ॥ ५ ॥

संजय! जिस समय वे युद्धके लिये अग्रसर हुए थे, उस समय इनके पीछे कौन गये थे अथवा उनके आगे कौन- कौन वीर थे? कौन उनके साथ युद्धमें डटे रहे? कौन युद्ध छोड़कर भाग गये? और किन लोगोंने सर्वथा उनका अनुसरण किया था? ॥ ५ ॥

शूरा रथशार्दूलमद्भुतं क्षत्रियर्षभम् ।

तथानीकं गाहमानं सहसा पृष्ठतोऽन्वयुः ॥ ६ ॥

किन शूरवीरोंने शत्रुसेनामें प्रवेश करते समय रथियोंमें सिंहके समान अद्भुत पराक्रमी, क्षत्रियशिरोमणि भीष्मजीके पास सहसा पहुँचकर सदा उनके पृष्ठभागका अनुसरण

पृष्ठ 1306

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किया? ॥ ६ ॥

यस्तमोऽर्क इवापोहन् परसैन्यममित्रहा ।

सहस्ररश्मिप्रतिमः परेषां भयमादधत् ॥ ७ ॥

जैसे सूर्य अन्धकारको नष्ट कर देता है, उसी प्रकार शत्रुसूदन भीष्म शत्रुसेनाका नाश करते थे । जिनका तेज सहस्र किरणोंवाले सूर्यके समान था, जिन्होंने शत्रुओंको भयभीत कर रखा था ॥ ७ ॥

अकरोद् दुष्करं कर्म रणे पाण्डुसुतेषु यः ।

ग्रसमानमनीकानि य एनं पर्यवारयन् ॥ ८ ॥

कृतिनं तं दुराधर्षं संजयास्य त्वमन्तिके ।

कथं शान्तनवं युद्धे पाण्डवाः प्रत्यवारयन् ॥ ९ ॥

जिन्होंने युद्धमें पाण्डवोंपर दुष्कर पराक्रम किया था तथा जो उनकी सेनाका निरन्तर संहार कर रहे थे, उन अस्त्रविद्याके ज्ञाता दुर्जय वीर भीष्मजीको जिन्होंने रोका है, वे कौन हैं? संजय! तुम तो उनके पास ही थे, पाण्डवोंने युद्धमें शान्तनुनन्दन भीष्मको किस प्रकार आगे बढ़नेसे रोका? ॥ ८ - ९ ॥

निकृन्तन्तमनीकानि शरदंष्ट्रं मनस्विनम् ।

चापव्यात्ताननं घोरमसिजिह्वं दुरासदम् ॥ १० ॥

अनर्हं पुरुषव्याघ्रं ह्रीमन्तमपराजितम् ।

पातयामास कौन्तेयः कथं तमजितं युधि ॥ ११ ॥

जो शत्रुपक्षकी सेनाओंका निरन्तर उच्छेद करते थे, बाण ही जिनकी दाढ़ें थीं, धनुष ही खुला हुआ मुख था, तलवार ही जिनकी जिह्वा थी, उन भयंकर एवं दुर्धर्ष पुरुषसिंह भीष्मको कुन्तीनन्दन अर्जुनने युद्धमें कैसे मार गिराया? मनस्वी भीष्म इस प्रकार पराजयके योग्य नहीं थे । वे लज्जाशील और पराजय- शून्य थे ॥

उग्रधन्वानमुग्रेषु वर्तमानं रथोत्तमे ।

परेषामुत्तमाङ्गानि प्रचिन्वन्तमथेषुभिः ॥ १२ ॥

जो उत्तम रथपर बैठकर भयंकर धनुष और भयानक बाण लिये शत्रुओंके मस्तकोंको सायकोंद्वारा काट- काटकर उनके ढेर लगा रहे थे ॥ १२ ॥

पाण्डवानां महत् सैन्यं यं दृष्ट्वोद्यतमाहवे ।

कालाग्निमिव दुर्धर्षं समचेष्टत नित्यशः ॥ १३ ॥

पाण्डवोंकी विशाल सेना दुर्धर्ष कालाग्निके समान जिन्हें युद्धके लिये उद्यत देख सदा काँपने लगती थी ॥ १३ ॥

परिकृष्य स सेनां तु दशरात्रमनीकहा ।

जगामास्तमिवादित्यः कृत्वा कर्म सुदुष्करम् ॥ १४ ॥

पृष्ठ 1307

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वे ही शत्रुसूदन भीष्म दस दिनोंतक शत्रुओंकी सेनाका संहार करते हुए अत्यन्त दुष्कर पराक्रम दिखाकर सूर्यकी भाँति अस्त हो गये ॥ १४ ॥

यः स शक्र इवाक्षय्यं वर्षं शरमयं क्षिपन् ।

जघान युधि योधानामर्बुदं दशभिर्दिनैः ॥ १५ ॥

स शेते निहतो भूमौ वातभग्न इव द्रुमः ।

मम दुर्मन्त्रितेनाजौ यथा नार्हति भारत ॥ १६ ॥

जिन्होंने इन्द्रके समान युद्धमें दस दिनोंतक अक्षय बाणोंकी वर्षा करके दस करोड़ विपक्षी सेनाओंका संहार कर डाला, वे ही भरतवंशी वीर भीष्म मेरी कुमन्त्रणाके कारण आँधीसे उखाड़े गये वृक्षकी भाँति युद्धमें मारे जाकर पृथ्वीपर शयन कर रहे हैं, वे कदापि इसके योग्य नहीं थे ॥ १५-१६ ॥

कथं शान्तनवं दृष्ट्वा पाण्डवानामनीकिनी ।

प्रहर्तुमशकत् तत्र भीष्मं भीमपराक्रमम् ॥ १७ ॥

शान्तनुनन्दन भीष्म तो बड़े भयंकर पराक्रमी थे, उन्हें सामने देखकर पाण्डवसेना उनपर प्रहार कैसे कर सकी? ॥ १७ ॥

कथं भीष्मेण संग्रामं प्राकुर्वन् पाण्डुनन्दनाः ।

कथं च नाजयद् भीष्मो द्रोणे जीवति संजय ॥ १८ ॥

संजय! पाण्डवोंने भीष्मके साथ संग्राम कैसे किया? द्रोणाचार्यके जीते - जी भीष्म विजयी कैसे नहीं हो सके? ॥ १८ ॥

कृपे संनिहिते तत्र भरद्वाजात्मजे तथा ।

भीष्मः प्रहरतां श्रेष्ठः कथं स निधनं गतः ॥ १ ९ ॥

उस युद्धमें कृपाचार्य तथा भरद्वाजपुत्र द्रोणाचार्य दोनों ही उनके निकट थे, तो भी योद्धाओंमें श्रेष्ठ भीष्म कैसे मारे गये? ॥ १ ९ ॥

कथं चातिरथस्तेन पाञ्चाल्येन शिखण्डिना ।

भीष्मो विनिहतो युद्धे देवैरपि दुरासदः ॥ २० ॥

भीष्म तो युद्धमें देवताओंके लिये भी दुर्जय एवं अतिरथी थे, फिर पांचालराजकुमार शिखण्डीके हाथसे वे किस प्रकार मारे गये? ॥ २० ॥

यः स्पर्धते रणे नित्यं जामदग्न्यं महाबलम् ।

अजितं जामदग्न्येन शक्रतुल्यपराक्रमम् ॥ २१ ॥

तं हतं समरे भीष्मं महारथकुलोदितम् ।

संजयाचक्ष्व मे वीरं येन शर्म न विद्महे ॥ २२ ॥

जो रणभूमिमें महाबली जमदग्निनन्दन परशुरामसे भी टक्कर लेनेकी सदा इच्छा रखते थे, जिनका पराक्रम इन्द्रके समान था और परशुरामजी भी जिन्हें पराजित न कर सके थे;

पृष्ठ 1308

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संजय! महारथियोंके कुलमें प्रकट हुए वे महावीर भीष्म समरभूमिमें किस प्रकार मारे गये, यह मुझे बताओ; क्योंकि मुझे शान्ति नहीं मिल रही है ॥ २१-२२ ॥

मामकाः के महेष्वासा नाजहुः संजयाच्युतम् ।

दुर्योधनसमादिष्टाः के वीराः पर्यवारयन् ॥ २३ ॥

संजय! कभी युद्धसे पीछे न हटनेवाले भीष्मजीका मेरे पक्षके किन महाधनुर्धरोंने साथ नहीं छोड़ा? दुर्योधनकी आज्ञा पाकर किन- किन वीरोंने उन्हें सब ओरसे घेर रखा था? ॥ २३ ॥

यच्छिखण्डिमुखाः सर्वे पाण्डवा भीष्ममभ्ययुः ।

कच्चित् ते कुरवः सर्वे नाजहुः संजयाच्युतम् ॥ २४ ॥

संजय! जब शिखण्डी आदि समस्त पाण्डव वीरोंने भीष्मपर आक्रमण किया, उस समय समस्त कौरवोंने कहीं अच्युत भीष्मका साथ छोड़ तो नहीं दिया था? ॥ २४ ॥

अश्मसारमयं नूनं हृदयं सुदृढं मम ।

यच्छ्रुत्वा पुरुषव्याघ्रं हतं भीष्मं न दीर्यते ॥ २५ ॥

अवश्य ही मेरा यह हृदय लोहेके समान सुदृढ़ है, तभी तो पुरुषसिंह भीष्मको मारा गया सुनकर विदीर्ण नहीं होता है! ॥ २५ ॥

यस्मिन् सत्यं च मेधा च नीतिश्च भरतर्षभे ।

अप्रमेयाणि दुर्धर्षे कथं स निहतो युधि ॥ २६ ॥

जिन दुर्जय वीर भरतभूषण भीष्ममें सत्य, मेधा और नीति- ये तीन अप्रमेय शक्तियाँ थीं, वे युद्धमें कैसे मारे गये? ॥ २६ ॥

मौर्वीघोषस्तनयित्नुः पृषत्कपृषतो महान् ।

धनुर्ह्रादमहाशब्दो महामेघ इवोन्नतः ॥ २७ ॥

वे युद्धमें महान् मेघके समान ऊँचे उठे हुए थे । धनुषकी टंकार ही उनकी गर्जना थी, बाण ही उनके लिये वर्षाकी बूँदें थीं और धनुषका महान् शब्द ही बिजलीकी गड़गड़ाहटका भयंकर शब्द था ॥ २७ ॥

योऽभ्यवर्षत कौन्तेयान् सपाञ्चालान् ससृजयान् ।

निघ्नन् पररथान् वीरो दानवानिव वज्रभृत् ॥ २८ ॥

वीरवर भीष्मने शत्रुपक्षके रथियों- कुन्तीकुमारों, पांचालों तथा सृजयोंको मारते हुए उनके ऊपर उसी प्रकार बाणोंकी बौछार की, जैसे वज्रधारी इन्द्र दानवोंपर बाणवर्षा करते हैं ॥ २८ ॥

इष्वस्त्रसागरं घोरं बाणग्राहं दुरासदम् ।

कार्मुकोर्मिणमक्षय्यमद्वीपं चलमप्लवम् ॥ २ ९ ॥

उनका धनुष- बाण आदि अस्त्रसमूह भयंकर एवं दुर्गम समुद्रके समान था, बाण ही उसमें ग्राह थे, धनुष लहरोंके समान जान पड़ता था, वह अक्षय, द्वीपरहित, चंचल तथा

पृष्ठ 1309

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नौका आदि तैरनेके साधनोंसे शून्य था ॥ २९ ॥

गदासिमकरावासं हयावर्तं गजाकुलम् ।

पदातिमत्स्यकलिलं शङ्खदुन्दुभिनिःस्वनम् ॥ ३० ॥

गदा और खड्ग आदि ही उसमें मगरके समान थे । वह अश्वरूपी भँवरोंसे भयावह प्रतीत होता था, उसमें हाथी जलहस्तीके समान प्रतीत होते थे, पैदल सेना उसमें भरे हुए मत्स्योंके समान जान पड़ती थी तथा शंख और दुन्दुभियोंकी ध्वनि ही उस समुद्रकी गर्जना थी ॥ ३० ॥

हयान् गजपदातींश्च रथांश्च तरसा बहून् ।

निमज्जयन्तं समरे परवीरापहारिणम् ॥ ३१ ॥

भीष्मजी उस समुद्रमें शत्रुपक्षके हाथियों, घोड़ों, पैदलों तथा बहुसंख्यक रथोंको वेगपूर्वक डुबो रहे थे । वे समरभूमिमें शत्रुवीरोंके प्राणोंका अपहरण करनेवाले थे ॥ ३१ ॥

विदह्यमानं कोपेन तेजसा च परंतपम् ।

वेलेव मकरावासं के वीराः पर्यवारयन् ॥ ३२ ॥

अपने क्रोध और तेजसे दग्ध एवं प्रज्वलित- से होते हुए शत्रुसंतापी भीष्मको जैसे तट समुद्रको रोक देता है उसी प्रकार किन वीरोंने आगे बढ़नेसे रोका था ॥ ३२ ॥

भीष्मो यदकरोत् कर्म समरे संजयारिहा ।

दुर्योधनहितार्थाय के तस्यास्य पुरोऽभवन् ॥ ३३ ॥

केऽरक्षन् दक्षिण चक्रं भीष्मस्यामिततेजसः ।

पृष्ठतः के परान् वीरानपासेधन् यतव्रताः ॥ ३४ ॥

शत्रुहन्ता भीष्मने दुर्योधनके हितके लिये समरभूमिमें जो पराक्रम किया था, वह अनुपम है । उस समय कौन - कौनसे योद्धा उनके आगे थे? किन - किन वीरोंने अमिततेजस्वी भीष्मके रथके दाहिने पहियेकी रक्षा की थी? किन लोगोंने दृढ़तापूर्वक व्रतका पालन करते हुए उनके पीछेकी ओर रहकर शत्रुपक्षके वीरोंको आगे बढ़नेसे रोका था? ॥ ३३-३४ ॥

के पुरस्तादवर्तन्त रक्षन्तो भीष्ममन्तिके ।

केऽरक्षन्नुत्तरं चक्रं वीरा वीरस्य युध्यतः ॥ ३५ ॥

कौन - कौनसे वीर निकटसे भीष्मकी रक्षा करते हुए उनके आगे खड़े थे? और किन वीरोंने युद्धमें लगे हुए शूरशिरोमणि भीष्मके बायें पहियेकी रक्षा की थी? ॥ ३५ ॥

वामे चक्रे वर्तमानाः केऽघ्नन् संजय सृजयान् ।

अग्रतोऽग्र्यमनीकेषु केऽभ्यरक्षन् दुरासदम् ॥ ३६ ॥

संजय! उनके बायें चक्रकी रक्षामें तत्पर होकर किन - किन योद्धाओंने सृजयवंशियोंका विनाश किया था? तथा किन्होंने आगे रहकर सेनाके अग्रणी दुर्जय वीर भीष्मकी सब ओरसे रक्षा की थी? ॥ ३६ ॥

पार्श्वतः केऽभ्यरक्षन्त गच्छन्तो दुर्गमां गतिम् ।

पृष्ठ 1310

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समूहे के परान् वीरान् प्रत्ययुध्यन्त संजय ॥ ३७ ॥

संजय! किन लोगोंने दुर्गम संग्राममें आगे बढ़ते हुए उनके पार्श्वभागका संरक्षण किया था? और किन्होंने उस सैन्यसमूहमें आगे रहकर वीरतापूर्वक शत्रुयोद्धाओंका डटकर सामना किया था? ॥ ३७ ॥

रक्ष्यमाणः कथं वीरैर्गोप्यमानाश्च तेन ते ।

दुर्जयानामनीकानि नाजयंस्तरसा युधि ॥ ३८ ॥

जब मेरे पक्षके बहुत - से वीर उनकी रक्षा करते थे और वे भी उन वीरोंकी रक्षामें दत्तचित्त थे, तब भी उन सब लोगोंने मिलकर शत्रुपक्षकी दुर्जय सेनाओंको कैसे वेगपूर्वक परास्त नहीं कर दिया? ॥ ३८ ॥

सर्वलोकेश्वरस्येव परमेष्ठिप्रजापतेः ।

कथं प्रहर्तुमपि ते शेकुः संजय पाण्डवाः ॥ ३ ९ ॥

संजय! भीष्मजी सम्पूर्ण लोकोंके स्वामी परमेष्ठी प्रजापति ब्रह्माजीके समान अजेय थे; फिर पाण्डव उनके ऊपर कैसे प्रहार कर सके? ॥ ३ ९ ॥

यस्मिन् द्वीपे समाश्वस्य युध्यन्ते कुरवः परैः ।

तं निमग्नं नरव्याघ्रं भीष्मं शंससि संजय ॥ ४० ॥

संजय! जिन द्वीपस्वरूप भीष्मजीके आश्रयमें निर्भय एवं निश्चिन्त होकर समस्त कौरव शत्रुओंके साथ युद्ध करते थे, उन्हीं नरश्रेष्ठ भीष्मको तुम मारा गया बता रहे हो, यह कितने दुःखकी बात है? ॥ ४० ॥

यस्य वीर्यं समाश्रित्य मम पुत्रो बृहद्बलः ।

न पाण्डवानगणयत् कथं स निहतः परैः ॥ ४१ ॥

जिनके पराक्रमका आश्रय लेकर विशाल सेनाओंसे सम्पन्न मेरा पुत्र पाण्डवोंको कुछ नहीं गिनता था, वे शत्रुओंद्वारा किस प्रकार मारे गये? ॥ ४१ ॥

यः पुरा विबुधैः सर्वैः सहाये युद्धदुर्मदः ।

काङ्क्षितो दानवान् घ्नद्भिः पिता मम महाव्रतः ॥ ४२ ॥

यस्मिञ्जाते महावीर्ये शान्तनुलोकविश्रुतः ।

शोकं दैन्यं च दुःखं च प्राजहात् पुत्रलक्ष्मणि ॥ ४३ ॥

प्रोक्तं परायणं प्राज्ञं स्वधर्मनिरतं शुचिम् ।

वेदवेदाङ्गतत्त्वज्ञं कथं शंससि मे हतम् ॥ ४४ ॥

पहलेकी बात है, दानवोंका संहार करनेवाले सम्पूर्ण देवताओंने जिन मेरे महान् व्रतधारी पिता रणदुर्मद भीष्मजीको अपना सहायक बनानेकी अभिलाषा की थी, जिन महापराक्रमी पुत्ररत्नके जन्म लेनेपर लोकविख्यात महाराज शान्तनुने शोक, दीनता और दुःखका सदाके लिये त्याग कर दिया था, जो सबके आश्रयदाता, बुद्धिमान्, स्वधर्मपरायण,