श्रीगणेशाय नमः।

महाभारत — खण्ड ३ — पृष्ठ 1801–1810

महाभारत — खण्ड ३ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1801–1810

पृष्ठ 1801

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भीष्मके उस सुवर्णभूषित रथपर सात्यकि, भीमसेन तथा द्रुपदकुमार धृष्टद्युम्नने एक साथ ही धावा किया ॥ १०७ ॥

परिवार्य तु ते सर्वे गाङ्गेयं तरसा रणे ।

त्रिभिस्त्रिभिः शरैर्घोरै र्भीष्ममानछुरोजसा ॥ १०८ ॥

उन सब लोगोंने रणक्षेत्रमें गंगानन्दन भीष्मको वेगपूर्वक घेरकर तीन- तीन भयंकर बाणोंद्वारा उन्हें यथाशक्ति पीड़ा पहुँचायी ॥ १०८ ॥

प्रत्यविध्यत तान् सर्वान् पिता देवव्रतस्तव ।

यतमानान् महेष्वासांस्त्रिभिस्त्रिभिरजिह्मगैः ॥ १० ९ ॥

उस समय आपके पितृतुल्य भीष्मने वहाँ युद्धके लिये प्रयत्न करनेवाले उन सभी महाधनुर्धर योद्धाओं को सीधे जानेवाले तीन- तीन बाणोंसे बींधकर बदला चुकाया ॥ १० ९ ॥

ततः शरसहस्रेण संनिवार्य महारथान् ।

हयान् काञ्चनसंनाहान् भीमस्य न्यहनच्छरैः ॥ ११० ॥

तदनन्तर सहस्रों बाणोंकी वर्षा करके उन तीनों महारथियोंको रोककर सोनेके साज-बाज धारण करनेवाले भीमसेनके घोड़ोंको भीष्मने अपने बाणोंसे मार डाला ॥ ११० ॥

हताश्वे स रथे तिष्ठन् भीमसेनः प्रतापवान् ।

शक्तिं चिक्षेप तरसा गाङ्गेयस्य रथं प्रति ॥ १११ ॥

अश्वोंके मारे जानेपर भी उसी रथपर खड़े हुए प्रतापी भीमसेनने भीष्मजीके रथपर बड़े वेगसे शक्ति चलायी ॥ १११ ॥

अप्राप्तामथ तां शक्तिं पिता देवव्रतस्तव ।

त्रिधा चिच्छेद समरे सा पृथिव्यामशीर्यत ॥ ११२ ॥

वह शक्ति अभी पासतक पहुँची ही न थी कि आपके पितृतुल्य भीष्मने समरभूमिमें उसके तीन टुकड़े कर डाले और वह भूतलपर बिखर गयी ॥ ११२ ॥

ततः शैक्यायसीं गुर्वीं प्रगृह्य बलवान् गदाम् ।

भीमसेनस्ततस्तूर्णं पुप्लुवे मनुजर्षभ ॥ ११३ ॥

नरश्रेष्ठ! तब बलवान् भीमसेन पूर्णतः लोहेके सारतत्त्व ( फौलाद ) - की बनी हुई भारी गदा हाथमें लेकर तुरंत उस रथसे कूद पड़े ॥ ११३ ॥

सात्यकोऽपि ततस्तूर्णं भीमस्य प्रियकाम्यया ।

गाङ्गेयसारथिं तूर्णं पातयामास सायकैः ॥ ११४ ॥

इधर सात्यकिने भी भीमसेनका प्रिय करनेकी इच्छासे भीष्मके सारथिको तुरंत ही अपने सायकोंद्वारा मार गिराया ॥ ११४ ॥

भीष्मस्तु निहते तस्मिन् सारथौ रथिनां वरः ।

वातायमानैस्तैरश्वैरपनीतो रणाजिरात् ॥ ११५ ॥

पृष्ठ 1802

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रथियोंमें श्रेष्ठ भीष्म सारथिके मारे जानेपर हवाके समान भागनेवाले घोड़ोंके द्वारा रणभूमिसे बाहर कर दिये गये ॥ ११५ ॥

भीमसेनस्ततो राजन्नपयाते महाव्रते प्रजज्वाल यथा वह्निर्दहन् कक्षमिवेधितः ॥ ११६ ॥

राजन्! महान् व्रतधारी भीष्मके रणभूमिसे हट जानेपर भीमसेन घास- फूसके ढेरमें लगी हुई आगके समान अपने तेजसे प्रज्वलित हो रहे थे ॥ ११६ ॥

स हत्वा सर्वकालिङ्गान् सेनामध्ये व्यतिष्ठत ।

नैनमभ्युत्सहन् केचित् तावका भरतर्षभ ॥ ११७ ॥

भरतश्रेष्ठ! भीमसेन सम्पूर्ण कलिंगोंका संहार करके सेनाके मध्यभागमें ही खड़े थे, परंतु आपके सैनिकोंमेंसे कोई भी उनके पास जानेका साहस न कर सके ॥ ११७ ॥

धृष्टद्युम्नस्तमारोप्य स्वरथे रथिनां वरः ।

पश्यतां सर्वसैन्यानामपोवाह यशस्विनम् ॥ ११८ ॥

तत्पश्चात् रथियोंमें श्रेष्ठ धृष्टद्युम्न यशस्वी भीमसेनको अपने रथपर चढ़ाकर सब सैनिकोंके देखते -देखते अपने दलमें ले गये ॥ ११८ ॥

सम्पूज्यमानः पाञ्चाल्यैर्मत्स्यैश्च भरतर्षभ ।

धृष्टद्युम्नं परिष्वज्य समेयादथ सात्यकिम् ॥ ११ ९ ॥

भरतश्रेष्ठ! वहाँ पांचालों तथा मत्स्यदेशीय नरेशोंसे पूजित हो भीमसेन धृष्टद्युम्न और सात्यकिको भुजाओंमें भरकर दोनोंसे प्रसन्नतापूर्वक मिले ॥ ११ ९ ॥

अथाब्रवीद् भीमसेनं सात्यकिः सत्यविक्रमः ।

प्रहर्षयन् यदुव्याघ्रो धृष्टद्युम्नस्य पश्यतः ॥ १२० ॥

उस समय सत्यपराक्रमी यदुकुलसिंह सात्यकिने धृष्टद्युम्नके सामने ही भीमसेनका हर्ष बढ़ाते हुए उनसे इस प्रकार कहा- ॥ १२० ॥

दिष्ट्या कलिङ्गराजश्च राजपुत्रश्च केतुमान् ।

शक्रदेवश्च कालिङ्गः कलिङ्गाश्च मृधे हताः ॥ १२१ ॥

‘ वीरवर! बड़े सौभाग्यकी बात है कि कलिंगराज भानुमान्, राजकुमार केतुमान्, कलिंगवीर शक्रदेव तथा अन्य बहुसंख्यक कलिंग - सैनिक आपके द्वारा युद्धमें मारे गये ॥

स्वबाहुबलवीर्येण नागाश्वरथसंकुलः ।

महापुरुषभूयिष्ठो धीरयोधनिषेवितः ॥ १२२ ॥

महाव्यूहः कलिङ्गानामेकेन मृदितस्त्वया । ‘ आपने अकेले अपनी ही भुजाओंके बल और पराक्रमसे कलिंगोंके उस महान् व्यूहको रौंदकर मिट्टीमें मिला दिया, जिसमें बहुत- से हाथी, घोड़े और रथ भरे हुए थे । उसके अधिकांश सैनिक संसारके महान् पुरुषोंमें गिने जानेयोग्य थे । अगणित धीर - वीर योद्धा उस महान् व्यूहका सेवन करते थे ' ॥ १२२ ॥

पृष्ठ 1803

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एवमुक्त्वा शिनेर्नप्ता दीर्घबाहुररिंदम ॥ १२३ ॥

रथाद् रथमभिद्रुत्य पर्यष्वजत पाण्डवम् । शत्रुओंका दमन करनेवाले नरेश! ऐसा कहकर बड़ी भुजाओंवाले सात्यकि अपने रथसे कूदकर भीमसेनके रथपर जा चढ़े और उनको हृदयसे लगा लिया ॥ १२३३ ॥

ततः स्वरथमास्थाय पुनरेव महारथः ।

तावकानवधीत् क्रुद्धो भीमस्य बलमादधत् ॥ १२४ ॥

तत्पश्चात् क्रोधमें भरे हुए महारथी सात्यकिने पुनः अपने रथपर बैठकर भीमसेनका बल बढ़ाते हुए आपके सैनिकोंका संहार आरम्भ किया ॥ १२४ ॥

इति श्रीमहाभारते भीष्मपर्वणि भीष्मवधपर्वणि द्वितीययुद्धदिवसे कलिङ्गराजवधे चतुष्पञ्चाशत्तमोऽध्यायः ॥ ५४ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत भीष्मपर्वके अन्तर्गत भीष्मवधपर्वमेंद्वितीय दिनके युद्धमें कलिंगराजका वधविषयक चौवनवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ५४ ॥

OFara FULL * तलवारको मण्डलाकार घुमाना ' भ्रान्त ' कहलाता है । यही अधिक परिश्रमसाध्य होनेपर ' आविद्ध ' कहा गया है । ‘ भ्रान्त ’ की क्रिया यदि ऊपर उठते हुए की जाय तो उसे ' उद्भ्रान्त ' कहते हैं । तलवार चलाते हुए ऊपर उछलना ‘ आप्लुत ’ है । सब दिशाओंमें फैलावका नाम ' प्रसृत ' है । तलवार चलाते हुए एक ही दिशामें आगे बढ़ना ' प्लुत ' है । वेगको ‘ सम्पात’ कहते हैं । समस्त शत्रुओंको मारने या चोट पहुँचानेके उद्यमको ' समुदीर्ण' कहा गया है ।

पृष्ठ 1804

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पञ्चपञ्चाशत्तमोऽध्यायः अभिमन्यु और अर्जुनका पराक्रम तथा दूसरे दिनके युद्धकी समाप्ति संजय उवाच

गतपूर्वाह्णभूयिष्ठे तस्मिन्नहनि भारत ।

रथनागाश्वपत्तीनां सादिनां च महाक्षये ॥ १ ॥

द्रोणपुत्रेण शल्येन कृपेण च महात्मना ।

समसज्जत पाञ्चाल्यस्त्रिभिरेतैर्महारथैः ॥ २ ॥

संजय कहते हैं - भारत! उस दूसरे दिन जब पूर्वाह्नका अधिक भाग व्यतीत हो गया और बहुसंख्यक रथ, हाथी, घोड़े, पैदल और सवारोंका महान् संहार होने लगा, उस समय पांचालराजकुमार धृष्टद्युम्न अकेला ही द्रोणपुत्र अश्वत्थामा, शल्य तथा महामनस्वी कृपाचार्य – इन तीनों महारथियोंके साथ युद्ध करने लगा ॥ १-२ ॥

स लोकविदितानश्वान् निजघान महाबलः ।

द्रौणेः पाञ्चालदायादः शितैर्दशभिराशुगैः ॥ ३ ॥

महाबली पांचालराजकुमारने दस शीघ्रगामी पैने बाण मारकर अश्वत्थामाके विश्वविख्यात घोड़ोंको मार डाला ॥ ३ ॥

ततः शल्यरथं तूर्णमास्थाय हतवाहनः ।

द्रौणिः पाञ्चालदायादमभ्यवर्षदथेषुभिः ॥ ४ ॥

वाहनोंके मारे जानेपर अश्वत्थामा तुरंत ही शल्यके रथपर चढ़ गया और वहींसे धृष्टद्युम्नपर बाणोंकी वर्षा करने लगा ॥ ४ ॥

धृष्टद्युम्नं तु संयुक्तं द्रौणिना वीक्ष्य भारत ।

सौभद्रोऽभ्यपतत् तूर्णं विकिरन् निशितान् शरान् ॥ ५ ॥

भरतनन्दन! धृष्टद्युम्नको अश्वत्थामाके साथ भिड़ा हुआ देख सुभद्रानन्दन अभिमन्यु भी पैने बाण बिखेरता हुआ तुरंत वहाँ आ पहुँचा ॥ ५ ॥

स शल्यं पञ्चविंशत्या कृपं च नवभिः शरैः ।

अश्वत्थामानमष्टाभिर्विव्याध पुरुषर्षभः ॥ ६ ॥

उस पुरुषरत्न अभिमन्युने शल्यको पचीस, कृपाचार्यको नौ और अश्वत्थामाको आठ बाणोंसे बींध डाला ॥ ६ ॥

आर्जुनिं तु ततस्तूर्णं द्रौणिर्विव्याध पत्रिणा ।

शल्योऽथ दशभिश्चैव कृपश्च निशितैस्त्रिभिः ॥ ७ ॥

पृष्ठ 1805

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तब अश्वत्थामाने शीघ्र ही एक बाणसे अभिमन्युको घायल कर दिया । तत्पश्चात् शल्यने दस और कृपाचार्यने तीन पैने बाण उसे मारे ॥ ७ ॥

लक्ष्मणस्तव पौत्रस्तु सौभद्रं समवस्थितम् ।

अभ्यवर्तत संहृष्टस्ततो युद्धमवर्तत ॥ ८ ॥

तदनन्तर आपके पौत्र लक्ष्मणने सुभद्राकुमार अभिमन्युको सामने खड़ा देख हर्ष और

उत्साहमें भरकर उसपर आक्रमण किया । फिर तो दोनोंमें युद्ध आरम्भ हो गया ॥ ८ ॥

दौर्योधनिः सुसंक्रुद्धः सौभद्रं परवीरहा ।

विव्याध समरे राजंस्तदद्भुतमिवाभवत् ॥ ९ ॥

राजन्! शत्रुवीरोंका संहार करनेवाले दुर्योधनके पुत्र लक्ष्मणने अत्यन्त कुपित हो समरभूमिमें ( अनेक बाणोंसे ) अभिमन्युको बींध डाला। वह एक अद्भुत - सी बात हुई ॥ ९ ॥

अभिमन्युः सुसंक्रुद्धो भ्रातरं भरतर्षभ ।

शरैः पञ्चाशता राजन् क्षिप्रहस्तोऽभ्यविध्यत ॥ १० ॥

महाराज! भरतश्रेष्ठ! यह देख शीघ्रतापूर्वक हाथ चलानेवाला वीर अभिमन्यु अत्यन्त कुपित हो उठा और अपने भाई लक्ष्मणको उसने पचास बाणोंसे घायल कर दिया ॥ १० ॥

लक्ष्मणोऽपि पुनस्तस्य धनुश्चिच्छेद पत्रिणा मुष्टिदेशे महाराज ततस्ते चुक्रुशुर्जनाः ॥ ११ । राजन्! तब लक्ष्मणने भी पुनः एक बाण मारकर उसके धनुषको, जहाँ मुट्ठी रखी जाती

है, वहींसे काट दिया । यह देख आपके सैनिक हर्षसे कोलाहल कर उठे ॥

तद् विहाय धनुश्छिन्नं सौभद्रः परवीरहा ।

अन्यदादत्तवांश्चित्रं कार्मुकं वेगवत्तरम् ॥ १२ ॥

शत्रुवीरोंका संहार करनेवाले सुभद्राकुमारने उस कटे हुए धनुषको फेंककर दूसरा विचित्र धनुष हाथमें लिया, जो अत्यन्त वेगशाली था ॥ १२ ॥

तौ तत्र समरे युक्तौ कृतप्रतिकृतैषिणौ ।

अन्योन्यं विशिखैस्तीक्ष्णैर्जघ्नतुः पुरुषर्षभौ ॥ १३ ॥

वे दोनों पुरुषरत्न वहाँ एक- दूसरेके अस्त्रोंका निवारण अथवा प्रतीकार करनेकी इच्छा रखकर युद्धमें संलग्न थे और पैने बाणोंद्वारा एक- दूसरेको घायल कर रहे थे ॥ १३ ॥

ततो दुर्योधनो राजा दृष्ट्वा पुत्रं महारथम् ।

पीडितं तव पौत्रेण प्रायात् तत्र प्रजेश्वरः ॥ १४ ॥

तब प्रजाजनोंका स्वामी राजा दुर्योधन अपने महारथी पुत्रको आपके पौत्र अभिमन्युसे पीड़ित देख वहाँ स्वयं जा पहुँचा ॥ १४ ॥

संनिवृत्ते तव सुते सर्व एव जनाधिपाः ।

आर्जुनिं रथवंशेन समन्तात् पर्यवारयन् ॥ १५ ॥

पृष्ठ 1806

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आपके पुत्र दुर्योधनके उधर लौटनेपर कौरव पक्षके सभी नरेशोंने विशाल रथ- सेनाके द्वारा अर्जुनकुमार अभिमन्युको सब ओरसे घेर लिया ॥ १५ ॥

स तैः परिवृतः शूरैः शूरो युधि सुदुर्जयैः ।

न स्म प्रव्यथते राजन् कृष्णतुल्यपराक्रमः ॥ १६ ॥

राजन्! अभिमन्युका पराक्रम भगवान् श्रीकृष्णके समान था । वह युद्धमें अत्यन्त दुर्जय उन शूरवीरोंसे घिर जानेपर भी व्यथित या चिन्तित नहीं हुआ ॥ १६ ॥

सौभद्रमथ संसकं दृष्ट्वा तत्र धनंजयः ।

अभिदुद्राव वेगेन त्रातुकामः स्वमात्मजम् ॥ १७ ॥

इसी समय अर्जुन सुभद्राकुमारको वहाँ युद्धमें संलग्न देख अपने पुत्रकी रक्षाके लिये बड़े वेगसे दौड़े आये ॥ १७ ॥

ततः सरथनागाश्वा भीष्मद्रोणपुरोगमाः ।

अभ्यवर्तन्त राजानः सहिताः सव्यसाचिनम् ॥ १८ ॥

यह देख भीष्म और द्रोण आदि सभी कौरव- पक्षीय नरेश रथ, हाथी और घोड़ोंकी सेनासहित एक साथ अर्जुनपर चढ़ आये ॥ १८ ॥

उद्भूतं सहसा भौमं नागाश्वरथपत्तिभिः ।

दिवाकररथं प्राप्य रजस्तीव्रमदृश्यत ॥ १ ९ ॥

उस समय हाथी, घोड़े, रथ और पैदल सैनिकोंद्वारा उड़ायी हुई धरतीकी तीव्र धूल सहसा सूर्यके रथतक पहुँचकर सब ओर व्याप्त दिखायी देने लगी ॥ १९ ॥

तानि नागसहस्राणि भूमिपालशतानि च ।

तस्य बाणपथं प्राप्य नाभ्यवर्तन्त सर्वशः ॥ २० ॥

प्रणेदुः सर्वभूतानि बभूवुस्तिमिरा दिशः । इधर सहस्रों हाथी और सैकड़ों भूमिपाल अर्जुनके बाणोंके पथमें आकर किसी प्रकार आगे न बढ़ सके । समस्त प्राणी आर्तनाद करने लगे और सम्पूर्ण दिशाओंमें अन्धकार छा गया ॥ २० ॥

कुरूणां चानयस्तीव्रः समदृश्यत दारुणः ॥ २१ ॥

नाप्यन्तरिक्षं न दिशो न भूमिर्न च भास्करः ।

प्रजज्ञे भरतश्रेष्ठ शस्त्रसङ्घैः किरीटिनः ॥ २२ ॥

भरतश्रेष्ठ! उस समय कौरवोंको अपने दुःसह एवं भयंकर अन्यायका परिणाम प्रत्यक्ष दिखायी देने लगा । किरीटधारी अर्जुनके शस्त्रसमूहोंसे सब कुछ आच्छादित हो जानेके कारण आकाश, दिशा, पृथ्वी और सूर्य किसीका भी भान नहीं होता था ॥ २१-२२ ॥

सादिता रथनागाश्च हताश्वा रथिनो रणे ।

विप्रद्रुतरथाः केचिद् दृश्यन्ते रथयूथपाः ॥ २३ ॥

पृष्ठ 1807

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उस रणभूमिमें कितने ही रथ टूट गये, बहुतेरे हाथी नष्ट हो गये, कितने ही रथियोंके घोड़े मार डाले गये और कितने ही रथ - यूथपतियोंके रथ भागते दिखायी दिये ॥ २३ ॥

विरथा रथिनश्चान्ये धावमानाः समन्ततः ।

तत्र तत्रैव दृश्यन्ते सायुधाः साङ्गदैर्भुजैः ॥ २४ ॥

अन्यान्य बहुत - से रथी रथहीन होकर अंगदभूषित भुजाओंमें आयुध धारण किये जहाँ-तहाँ चारों ओर दौड़ते देखे जाते थे ॥ २४ ॥

हयारोहा हयांस्त्यक्त्वा गजारोहाश्च दन्तिनः ।

अर्जुनस्य भयाद् राजन् समन्ताद् विप्रदुद्रुवुः ॥ २५ ॥

महाराज! अर्जुनके भयसे घुड़सवार घोड़ोंको और हाथीसवार हाथियोंको छोड़कर सब ओर भाग चले ॥ २५ ॥

रथेभ्यश्च गजेभ्यश्च हयेभ्यश्च नराधिपाः ।

पतिताः पात्यमानाश्च दृश्यन्तेऽर्जुनसायकैः ॥ २६ ॥

वहाँ बहुत - से नरेश अर्जुनके सायकोंसे कटकर रथों, हाथियों और घोड़ोंसे गिरे और गिराये जाते हुए दृष्टिगोचर हो रहे थे ॥ २६ ॥

सगदानुद्यतान् बाहून् सखड्गांश्च विशाम्पते ।

सप्रासांश्च सतूणीरान् सशरान् सशरासनान् ॥ २७ ॥

साङ्कुशान् सपताकांश्च तत्र तत्रार्जुनो नृणाम् ।

निचकर्त शरैरुग्रै रौद्रं वपुरधारयत् ॥ २८ ॥

प्रजानाथ! अर्जुनने उस रणक्षेत्रमें अत्यन्त भयंकर रूप धारण किया था । उन्होंने अपने उग्र बाणोंद्वारा योद्धाओंकी ऊपर उठी हुई भुजाओंको, जिनमें गदा, खड्ग, प्रास, तूणीर, धनुष - बाण, अंकुश और ध्वजा- पताका आदि शोभा पा रहे थे, काट गिराया ॥ २७-२८ ॥

परिघाणां प्रदीप्तानां मुद्गराणां च मारिष ।

प्रासानां भिन्दिपालानां निस्त्रिंशानां च संयुगे ॥ २ ९ ॥

परश्वधानां तीक्ष्णानां तोमराणां च भारत ।

वर्मणां चापविद्धानां काञ्चनानां च भूमिप ॥ ३० ॥

ध्वजानां चर्मणां चैव व्यजनानां च सर्वशः ।

छत्राणां हेमदण्डानां तोमराणां च भारत ॥ ३१ ॥

प्रतोदानां च योक्त्राणां कशानां चैव मारिष ।

राशयः स्मात्र दृश्यन्ते विनिकीर्णा रणक्षितौ ॥ ३२ ॥

आर्य! भरतनन्दन! भूपाल! उस रणभूमिमें गिरे हुए उद्दीप्त परिघ, मुद्गर, प्रास, भिन्दिपाल, खड्ग, फरसे, तीखे तोमर, सुवर्णमय कवच, ध्वज, ढाल, सोनेके डंडोंसे विभूषित छत्र, व्यजन, चाबुक, जोते, कोड़े और अंकुश ढेर के ढेर बिखरे दिखायी देते थे ॥ २ ९ –३२ ॥

पृष्ठ 1808

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नासीत् तत्र पुमान् कश्चित् तव सैन्यस्य भारत ।

योऽर्जुनं समरे शूरं प्रत्युद्यायात् कथंचन ॥ ३३ ॥

भारत! उस समय आपकी सेनामें कोई भी ऐसा पुरुष नहीं था, जो समरमें शूरवीर अर्जुनका सामना करनेके लिये किसी प्रकार आगे बढ़ सके ॥ ३३ ॥

यो यो हि समरे पार्थं प्रत्युद्याति विशाम्पते ।

स संख्ये विशिखैस्तीक्ष्णैः परलोकाय नीयते ॥ ३४ ॥

प्रजानाथ! उस युद्धभूमिमें जो - जो वीर अर्जुनकी ओर बढ़ता था, वही वही उनके पैने बाणोंद्वारा परलोक पहुँचा दिया जाता था ॥ ३४ ॥

तेषु विद्रवमाणेषु तव योधेषु सर्वशः ।

अर्जुनो वासुदेवश्च दध्मतुर्वारिजोत्तमौ ॥ ३५ ॥

तदनन्तर आपके सब योद्धा सब ओर भागने लगे । यह देख अर्जुन और भगवान् श्रीकृष्णने अपने श्रेष्ठ शंख बजाये ॥ ३५ ॥

तत् प्रभग्नं बलं दृष्ट्वा पिता देवव्रतस्तव ।

अब्रवीत् समरे शूरं भारद्वाजं स्मयन्निव ॥ ३६ ॥

कौरव- सेनाको इस प्रकार भागती देख समरभूमिमें खड़े हुए आपके ताऊ भीष्मने वीरवर आचार्य द्रोणसे मुसकराते हुए - से कहा— ॥ ३६ ॥

एष पाण्डुसुतो वीरः कृष्णेन सहितो बली ।

तथा करोति सैन्यानि यथा कुर्याद् धनंजयः ॥ ३७ ॥

‘ यह श्रीकृष्णसहित बलवान् वीर पाण्डुकुमार अर्जुन कौरव सेनाकी वही दशा कर रहा है, जैसी उसे करनी चाहिये ॥ ३७ ॥

न ह्येष समरे शक्यो विजेतुं हि कथंचन ।

यथास्य दृश्यते रूपं कालान्तकयमोपमम् ॥ ३८ ॥

‘ यह किसी प्रकार भी समरभूमिमें जीता नहीं जा सकता; क्योंकि इसका रूप इस समय प्रलयकालके यमराज - सा दिखायी दे रहा है ॥ ३८ ॥

न निवर्तयितुं चापि शक्येयं महती चमूः ।

अन्योन्यप्रेक्षया पश्य द्रवतीयं वरूथिनी ॥ ३ ९ ॥

' यह विशाल सेना इस समय पीछे नहीं लौटायी जा सकती । देखिये, सारे सैनिक एक-दूसरेकी देखा - देखी भागे जा रहे हैं ॥ ३ ९ ॥

एष चास्तं गिरिश्रेष्ठं भानुमान् प्रतिपद्यते ।

चक्षूंषि सर्वलोकस्य संहरन्निव सर्वथा ॥ ४० ॥

‘ इधर ये भगवान् सूर्य सम्पूर्ण जगत् के नेत्रोंकी ज्योति सर्वथा समेटते हुए- से गिरिश्रेष्ठ अस्ताचलको जा पहुँचे हैं ॥ ४० ॥

तत्रावहारं सम्प्राप्तं मन्येऽहं पुरुषर्षभ ।

पृष्ठ 1809

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श्रान्ता भीताश्च नो योधा न योत्स्यन्ति कथंचन ॥ ४१ ॥

‘ अतः नरश्रेष्ठ! मैं इस समय समस्त सैनिकोंको युद्धसे हटा लेना ही उचित समझता हूँ । हमारे सभी योद्धा थके - माँदे और डरे हुए हैं; अतः इस समय किसी तरह युद्ध नहीं कर सकेंगे ' ॥ ४१ ॥

एवमुक्त्वा ततो भीष्मो द्रोणमाचार्यसत्तमम् ।

अवहारमथो चक्रे तावकानां महारथः ॥ ४२ ॥

आचार्यप्रवर द्रोणसे ऐसा कहकर महारथी भीष्मने आपके समस्त सैनिकोंको युद्धभूमिसे लौटा लिया ॥ ४२ ॥

( ततः सरथनागाश्वा जयं प्राप्य ससोमकाः ।

पञ्चालाः पाण्डवाश्चैव प्रणेदुश्च पुनः पुनः ॥

प्रययुः शिबिरायैव धनंजयपुरस्कृताः । वादित्रघोषैः संहृष्टाः प्रनृत्यन्तो महारथाः ॥ ) तदनन्तर रथ, हाथी और घोड़ोंसहित सोमक, पांचाल तथा पाण्डववीर विजय पाकर बारंबार सिंहनाद करने लगे । वे सभी महारथी विजयसूचक वाद्योंकी ध्वनिके साथ अत्यन्त हर्षमें भरकर नाचने लगे और अर्जुनको आगे करके शिविरकी ओर चल दिये ।

ततोऽवहारः सैन्यानां तव तेषां च भारत ।

अस्तं गच्छति सूर्येऽभूत् संध्याकाले च वर्तति ॥ ४३ ॥

भारत! इस प्रकार सूर्यके अस्ताचलको चले जानेपर संध्याके समय आपकी और पाण्डवोंकी सेनाएँ लौट आयीं ॥ ४३ ॥

इति श्रीमहाभारते भीष्मपर्वणि भीष्मवधपर्वणि द्वितीययुद्धदिवसावहारे पञ्चपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ॥ ५५ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत भीष्मपर्वके अन्तर्गत भीष्मवधपर्वमें द्वितीय युद्धदिवसमें सेनाको लौटानेसे सम्बन्ध रखनेवाला पचपनवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ५५ ॥

[ दाक्षिणात्य अधिक पाठके २ श्लोक मिलाकर कुल ४५ श्लोक हैं । ]

पृष्ठ 1810

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षट्पञ्चाशत्तमोऽध्यायः तीसरे दिन - कौरव पाण्डवोंकी व्यूह रचना तथा युद्धका आरम्भ संजय उवाच

प्रभातायां च शर्वर्यां भीष्मः शान्तनवस्तदा ।

अनीकान्यनुसंयाने व्यादिदेशाथ भारत ॥ १ ॥

संजयने कहा — भारत! जब रात बीती और प्रभात हुआ, तब शान्तनुनन्दन भीष्मने अपनी सेनाओंको युद्धभूमिमें चलनेका आदेश दिया ॥ १ ॥

गारुडं च महाव्यूहं चक्रे शान्तनवस्तदा ।

पुत्राणां ते जयाकाङ्क्षी भीष्मः कुरुपितामहः ॥ २ ॥

उस समय कुरुकुलके पितामह शान्तनुकुमार भीष्मने आपके पुत्रोंको विजय दिलानेकी इच्छासे महान् गरुड़व्यूहकी रचना की ॥ २ ॥

गरुडस्य स्वयं तुण्डे पिता देवव्रतस्तव ।

चक्षुषी च भरद्वाजः कृतवर्मा च सात्वतः ॥ ३ ॥

स्वयं आपके ताऊ भीष्म उस व्यूहके अग्रभागमें चोंचके स्थानपर खड़े हुए । आचार्य द्रोण और यदुवंशी कृतवर्मा दोनों नेत्रोंके स्थानपर स्थित हुए ॥ ३ ॥

अश्वत्थामा कृपश्चैव शीर्षमास्तां यशस्विनौ ।

त्रैगर्तैरथ कैकेयैर्वाटधानैश्च संयुगे ॥ ४ ॥

यशस्वी वीर अश्वत्थामा और कृपाचार्य शिरोभागमें खड़े हुए। इनके साथ त्रिगर्त, केकय और वाटधान भी युद्धभूमिमें उपस्थित थे ॥ ४ ॥

भूरिश्रवाः शलः शल्यो भगदत्तश्च मारिष ।

मद्रकाः सिन्धुसौवीरास्तथा पाञ्चनदाश्च ये ॥ ५ ॥

जयद्रथेन सहिता ग्रीवायां संनिवेशिताः । आर्य! भूरिश्रवा, शल, शल्य और भगदत्त - ये जयद्रथके साथ ग्रीवाभागमें खड़े किये गये । इन्हींके साथ मद्र, सिंधु, सौवीर तथा पंचनद देशके योद्धा भी थे ॥ ५३ ॥

पृष्ठे दुर्योधनो राजा सोदर्यैः सानुगैर्वृतः ॥ ६ ॥

विन्दानुविन्दावावन्त्यौ काम्बोजाश्च शकैः सह ।

पुच्छ्मासन् महाराज शूरसेनाश्च सर्वशः ॥ ७ ॥

अपने सहोदर भाइयों और अनुचरोंके साथ राजा दुर्योधन पृष्ठभागमें स्थित हुआ । महाराज! अवन्तिदेशके राजकुमार विन्द और अनुविन्द तथा कम्बोज, शक एवं