श्रीगणेशाय नमः।

महाभारत — खण्ड ३ — पृष्ठ 651–660

महाभारत — खण्ड ३ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 651–660

पृष्ठ 651

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वैशम्पायनजी कहते हैं -जनमेजय! तदनन्तर अर्जुनके मित्र भगवान् श्रीकृष्णने पुत्रोंकी चिन्ताओंमें डूबकर शोक करती हुई अपनी बुआ कुन्तीको इस प्रकार आश्वासन दिया ॥ ९ ० ॥ वासुदेव उवाच

का तु सीमन्तिनी त्वादृक् लोकेष्वस्ति पितृष्वसः ।

शूरस्य राज्ञो दुहिता आजमीढकुलं गता ॥ ९ १ ॥

भगवान् वासुदेव बोले- बुआ! संसारमें तुम जैसी सौभाग्यशालिनी नारी दूसरी कौन है? तुम राजा शूरसेनकी पुत्री हो और महाराज अजमीढके कुलमें ब्याहकर आयी हो ॥ ९ १ ॥

महाकुलीना भवती ह्रदाद् ह्रदमिवागता ।

ईश्वरी सर्वकल्याणी भर्त्रा परमपूजिता ॥ ९ २ ॥

तुम एक उच्च कुलकी कन्या हो और दूसरे उच्च कुलमें ब्याही गयी हो; मानो कमलिनी एक सरोवरसे दूसरे सरोवरमें आयी हो । एक दिन तुम सर्वकल्याणी महारानी थीं; तुम्हारे पतिदेवने सदा तुम्हारा विशेष सम्मान किया है ॥ ९ २ ॥

वीरसूर्वीरपत्नी त्वं सर्वैः समुदिता गुणैः ।

सुखदुःखे महाप्राज्ञे त्वादृशी सोढुमर्हति ॥ ९ ३ ॥

तुम वीरपत्नी, वीरजननी तथा समस्त सद्गुणोंसे सम्पन्न हो । महाप्राज्ञे! तुम्हारी जैसी विवेकशील स्त्रीको सुख और दुःख चुपचाप सहने चाहिये ॥ ९ ३ ॥

निद्रातन्द्रे क्रोधहर्षी क्षुत्पिपासे हिमातपौ ।

एतानि पार्था निर्जित्य नित्यं वीरसुखे रताः ॥ ९ ४ ॥

तुम्हारे सभी पुत्र निद्रा, तन्द्रा ( आलस्य ), क्रोध, हर्ष, भूख- प्यास तथा सर्दी -गरमी इन सबको जीतकर सदा वीरोचित सुखका उपभोग करते हैं ॥ ९ ४ ॥

त्यक्तग्राम्यसुखाः पार्था नित्यं वीरसुखप्रियाः ।

न तु स्वल्पेन तुष्येयुर्महोत्साहा महाबलाः ॥ ९ ५ ॥

तुम्हारे पुत्रोंने ग्राम्यसुखको त्याग दिया है, वीरोचित सुख ही उन्हें सदा प्रिय है । वे महान् उत्साही और महाबली हैं; अतः थोड़े - से ऐश्वर्यसे संतुष्ट नहीं हो सकते ॥ ९ ५ ॥

अन्तं धीरा निषेवन्ते मध्यं ग्राम्यसुखप्रियाः ।

उत्तमांश्च परिक्लेशान् भोगांश्चातीव मानुषान् ॥ ९ ६ ॥

अन्तेषु रेमिरे धीरा न ते मध्येषु रेमिरे ।

अन्तप्राप्तिं सुखं प्राहुर्दुःखमन्तरमेतयोः ॥ ९ ७ ॥

धीर पुरुष भोगोंकी अन्तिम स्थितिका सेवन करते हैं । ग्राम्य विषयभोगोंमें आसक्त पुरुष भोगोंकी मध्य स्थितिका ही सेवन करते हैं । वे धीर पुरुष कर्तव्यपालनके रूपमें प्राप्त बड़े - से - बड़े क्लेशोंको सहर्ष सहन करके अन्तमें मनुष्यातीत भोगोंमें रमण करते हैं ।

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महापुरुषोंका कहना है कि अन्तिम ( सुख-दुःखसे अतीत) स्थितिकी प्राप्ति ही वास्तविक सुख है तथा सुख- दुःखके बीचकी स्थिति ही दुःख है ॥ ९ ६- ९ ७ ॥

अभिवादयन्ति भवतीं पाण्डवाः सह कृष्णया ।

आत्मानं च कुशलिनं निवेद्याहुरनामयम् ॥ ९ ८ ॥

बुआ! द्रौपदीसहित पाण्डवोंने तुम्हें प्रणाम कहलाया है और अपनेको सकुशल बताकर अपनी स्वस्थता भी सूचित की है ॥ ९ ८ ॥

अरोगान् सर्वसिद्धार्थान् क्षिप्रं द्रक्ष्यसि पाण्डवान् ।

ईश्वरान् सर्वलोकस्य हतामित्रान् श्रिया वृतान् ॥ ९९ ॥

तुम शीघ्र ही देखोगी; पाण्डव नीरोग अवस्थामें तुम्हारे सामने उपस्थित हैं, उनके सम्पूर्ण मनोरथ सिद्ध हो गये हैं और वे अपने शत्रुओंका संहार करके साम्राज्य - लक्ष्मीसे संयुक्त हो सम्पूर्ण जगत्के शासकपदपर प्रतिष्ठित हैं ॥ ९९ ॥

एवमाश्वासिता कुन्ती प्रत्युवाच जनार्दनम् ।

पुत्रादिभिरभिध्वस्ता निगृह्याबुद्धिजं तमः ॥ १०० ॥

इस प्रकार आश्वासन पाकर पुत्रों आदिसे दूर पड़ी हुई कुन्तीदेवीने अज्ञानजनित मोहका निरोध करके भगवान् जनार्दनसे कहा ॥ १०० ॥

कुन्त्युवाच

यद् यत् तेषां महाबाहो पथ्यं स्यान्मधुसूदन ।

यथा यथा त्वं मन्येथाः कुर्याः कृष्ण तथा तथा ॥ १०१ ॥

कुन्ती बोली - महाबाहु मधुसूदन श्रीकृष्ण! जो पाण्डवोंके लिये हितकर हो तथा जैसे - जैसे कार्य करना तुम्हें उचित जान पड़े, वैसे - वैसे करो ॥ १०१ ॥

अविलोपेन धर्मस्य अनिकृत्या परंतप ।

प्रभावज्ञास्मि ते कृष्ण सत्यस्याभिजनस्य च ॥ १०२ ॥

परंतप श्रीकृष्ण! धर्मका लोप न करते हुए, छल और कपटसे दूर रहकर समयोचित कार्य करना चाहिये । मैं तुम्हारी सत्यपरायणता और कुल- मर्यादाका भी प्रभाव जानती हूँ ॥ १०२ ॥

व्यवस्थायां च मित्रेषु बुद्धिविक्रमयोस्तथा ।

त्वमेव नः कुले धर्मस्त्वं सत्य त्वं तपो महत् ॥ १०३ ॥

त्वं त्राता त्वं महद् ब्रह्म त्वयि सर्वं प्रतिष्ठितम् ।

यथैवात्थ तथैवैतत् त्वयि सत्यं भविष्यति ॥ १०४ ॥

प्रत्येक कार्यकी व्यवस्थामें, मित्रोंके संग्रहमें तथा बुद्धि और पराक्रममें भी जो तुम्हारा अद्भुत प्रभाव है, उससे मैं परिचित हूँ । हमारे कुलमें तुम्हीं धर्म हो, तुम्हीं सत्य हो, तुम्हीं

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महान् तप हो, तुम्हीं रक्षक और तुम्हीं परब्रह्म परमात्मा हो । सब कुछ तुममें ही प्रतिष्ठित है । तुम जो कुछ कहते हो, वह सब तुम्हारे संनिधानमें सत्य होकर ही रहेगा ॥ १०३-१०४ ॥

( कुरूणां पाण्डवानां च लोकानां चापराजित ।

सर्वस्यैतस्य वार्ष्णेय गतिस्त्वमसि माधव ॥

प्रभावो बुद्धिवीर्यं च तादृशं तव केशव । ) किसीसे पराजित न होनेवाले वृष्णिनन्दन माधव! कौरवोंके, पाण्डवोंके तथा इस सम्पूर्ण जगत्के तुम्हीं आश्रय हो । केशव! तुम्हारा प्रभाव तथा तुम्हारा बुद्धिबल भी तुम्हारे अनुरूप ही है । वैशम्पायन उवाच

तामामन्त्र्य च गोविन्दः कृत्वा चाभिप्रदक्षिणम् ।

प्रातिष्ठत महाबाहुर्दुर्योधनगृहान् प्रति ॥ १०५ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! तदनन्तर महाबाहु गोविन्द कुन्तीदेवीकी परिक्रमा करके उनसे आज्ञा ले दुर्योधनके घरकी ओर चल दिये ॥ १०५ ॥

इति श्रीमहाभारते उद्योगपर्वणि भगवद्यानपर्वणि कृष्णकुन्तीसंवादे नवतितमोऽध्यायः ॥ ९ ० ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत उद्योगपर्वके अन्तर्गत भगवद्यानपर्वमें श्रीकृष्ण-कुन्ती- संवादविषयक नब्बेवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ९० ॥

[दाक्षिणात्य अधिक पाठके १३ श्लोक मिलाकर कुल १०६३श्लोक हैं । ] Fara O FURU

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एकनवतितमोऽध्यायः श्रीकृष्णका दुर्योधनके घर जाना एवं उसके निमन्त्रणको अस्वीकार करके विदुरजीके घरपर भोजन करना वैशम्पायन उवाच

पृथामामन्त्र्य गोविन्दः कृत्वा चाभिप्रदक्षिणम् ।

दुर्योधनगृहं शौरिरभ्यगच्छदरिंदमः ॥ १ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! शत्रुओंका दमन करनेवाले शूरनन्दन श्रीकृष्ण कुन्तीकी परिक्रमा करके एवं उनकी आज्ञा ले दुर्योधनके घर गये ॥ १ ॥

लक्ष्म्या परमया युक्तं पुरन्दरगृहोपमम् ।

विचित्रैरासनैर्युक्तं प्रविवेश जनार्दनः ॥ २ ॥

वह घर इन्द्रभवनके समान उत्तम शोभासे सम्पन्न था । उसमें यथास्थान विचित्र आसन सजाकर रखे गये थे । श्रीकृष्णने उस गृहमें प्रवेश किया ॥ २ ॥

तस्य कक्ष्या व्यतिक्रम्य तिस्रो द्वाःस्थैरवारितः ।

ततोऽभ्रघनसंकाशं गिरिकूटमिवोच्छ्रितम् ॥ ३ ॥

श्रिया ज्वलन्तं प्रासादमारुरोह महायशाः । द्वारपालोंने रोक-टोक नहीं की । उस राजभवनकी तीन ड्योढ़ियाँ पार करके महायशस्वी श्रीकृष्ण एक ऐसे प्रासादपर आरूढ़ हुए, जो आकाशमें छाये हुए शरद् ऋतुके बादलोंके समान श्वेत, पर्वतशिखरके समान ऊँचा तथा अपनी अद्भुत प्रभासे प्रकाशमान था ॥ ३३ ॥

तत्र राजसहस्रैश्च कुरुभिश्चाभिसंवृतम् ॥ ४ ॥

धार्तराष्ट्रं महाबाहुं ददर्शासीनमासने । वहाँ उन्होंने सिंहासनपर बैठे हुए धृतराष्ट्रपुत्र महाबाहु दुर्योधनको देखा, जो सहस्रों राजाओं तथा कौरवोंसे घिरा हुआ था ॥ ४३ ॥

दुःशासनं च कर्णं च शकुनिं चापि सौबलम् ॥ ५ ॥

दुर्योधनसमीपे तानासनस्थान् ददर्श सः ।

दुर्योधनके पास ही दुःशासन, कर्ण तथा सुबलपुत्र शकुनि – ये भी आसनोंपर बैठे थे ।

श्रीकृष्णने उनको भी देखा ॥ ५३ ॥

अभ्यागच्छति दाशार्हे धार्तराष्ट्रो महायशाः ॥ ६ ॥

उदतिष्ठत् सहामात्यः पूजयन् मधुसूदनम् ।

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दशार्हनन्दन श्रीकृष्णके आते ही महायशस्वी दुर्योधन मधुसूदनका सम्मान करते हुए मन्त्रियोंसहित उठकर खड़ा हो गया ॥ ६३ ॥

समेत्य धार्तराष्ट्रेण सहामात्येन केशवः ॥ ७ ॥

राजभिस्तत्र वार्ष्णेयः समागच्छद् यथावयः । मन्त्रियोंसहित दुर्योधनसे मिलकर वृष्णिकुलभूषण केशव अवस्थाके अनुसार वहाँ सभी राजाओंसे यथायोग्य मिले ॥ ७३ ॥

तत्र जाम्बूनदमयं पर्यङ्कं सुपरिष्कृतम् ॥ ८ ॥

विविधास्तरणास्तीर्णमभ्युपाविशदच्युतः । उस राजसभामें सुन्दर रत्नोंसे विभूषित एक सुवर्णमय पर्यंक रखा हुआ था, जिसपर

भाँति- भाँतिके बिछौने बिछे हुए थे । भगवान् श्रीकृष्ण उसीपर विराजमान हुए ॥ ८३ ॥

तस्मिन् गां मधुपर्कं चाप्युदकं च जनार्दने ॥ ९ ॥

निवेदयामास तदा गृहान् राज्यं च कौरवः । उस समय कुरुराजने जनार्दनकी सेवामें गौ, मधुपर्क, जल, गृह तथा राज्य सब कुछ निवेदन कर दिया ॥ ९ ३ ॥ तत्र गोविन्दमासीनं प्रसन्नादित्यवर्चसम् ॥ १० ॥

उपासांचक्रिरे सर्वे कुरवो राजभिः सह ।

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उस पर्यंकपर बैठे हुए भगवान् गोविन्द निर्मल सूर्यके समान तेजस्वी प्रतीत हो रहे थे । उस समय राजाओंसहित समस्त कौरव उनके पास आकर बैठ गये ॥ १०३ ॥

ततो दुर्योधनो राजा वार्ष्णेयं जयतां वरम् ॥ ११ ॥

न्यमन्त्रयद् भोजनेन नाभ्यनन्दच्च केशवः । तदनन्तर राजा दुर्योधनने विजयी वीरोंमें श्रेष्ठ श्रीकृष्णको भोजनके लिये निमन्त्रित किया; परंतु केशवने उस निमन्त्रणको स्वीकार नहीं किया ॥ ११३ ॥

ततो दुर्योधनः कृष्णमब्रवीत् कुरुसंसदि ॥ १२ ॥

मृदुपूर्वं शठोदर्कं कर्णमाभाष्य कौरवः । तब कुरुराज दुर्योधनने कर्णसे सलाह लेकर कौरवसभामें श्रीकृष्णसे पूछा । पूछते समय उसकी वाणीमें पहले तो मृदुता थी, परंतु अन्तमें शठता प्रकट होने लगी थी ॥ १२३ || कस्मादन्नानि पानानि वासांसि शयनानि च ॥ १३ ॥

त्वदर्थमुपनीतानि नाग्रहीस्त्वं जनार्दन । ( दुर्योधन बोला - ) जनार्दन! आपके लिये अन्न, जल, वस्त्र और शय्या आदि जो वस्तुएँ प्रस्तुत की गयीं, उन्हें आपने ग्रहण क्यों नहीं किया? ॥ १३३ ॥

उभयोश्चाददाः साह्यमुभयोश्च हिते रतः ॥ १४ ॥

सम्बन्धी दयितश्चासि धृतराष्ट्रस्य माधव ।

त्वं हि गोविन्द धर्मार्थौ वेत्थ तत्त्वेन सर्वशः ।

तत्र कारणमिच्छामि श्रोतुं चक्रगदाधर ॥ १५ ॥

आपने तो दोनों पक्षोंको ही सहायता दी है, आप उभयपक्षके हित- साधनमें तत्पर हैं । माधव! महाराज धृतराष्ट्रके आप प्रिय सम्बन्धी भी हैं । चक्र और गदा धारण करनेवाले गोविन्द! आपको धर्म और अर्थका सम्पूर्णरूपसे यथार्थ ज्ञान भी है; फिर मेरा आतिथ्य ग्रहण न करनेका क्या कारण है; यह मैं सुनना चाहता हूँ ॥ १४-१५ ॥ वैशम्पायन उवाच

स एवमुक्तो गोविन्दः प्रत्युवाच महामनाः ।

उद्यन्मेघस्वनः काले प्रगृह्य विपुलं भुजम् ॥ १६ ॥

अलघूकृतमग्रस्तमनिरस्तमसंकुलम् ।

राजीवनेत्रो राजानं हेतुमद् वाक्यमुत्तमम् ॥ १७ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं - राजन्! इस प्रकार पूछे जानेपर उस समय महामनस्वी कमलनयन श्रीकृष्णने अपनी विशाल भुजा ऊपर उठाकर राजा दुर्योधनको सजल जलधरके समान गम्भीर वाणीमें उत्तर देना आरम्भ किया । उनका वह वचन परम उत्तम,

पृष्ठ 657

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युक्तिसंगत, दैन्य - रहित प्रत्येक अक्षरकी स्पष्टतासे सुशोभित तथा स्थान- भ्रष्टता एवं संकीर्णता आदि दोषोंसे रहित था ॥ १६-१७ ॥

कृतार्था भुञ्जते दूताः पूजां गृह्णन्ति चैव ह ।

कृतार्थं मां सहामात्यं समर्चिष्यसि भारत ॥ १८ ॥

' भारत! ऐसा नियम है कि दूत अपना प्रयोजन सिद्ध होनेपर ही भोजन और सम्मान स्वीकार करते हैं । तुम भी मेरा उद्देश्य सिद्ध हो जानेपर ही मेरा और मेरे मन्त्रियोंका सत्कार करना' ॥ १८ ॥

एवमुक्तः प्रत्युवाच धार्तराष्ट्रो जनार्दनम् ।

न युक्तं भवतास्मासु प्रतिपत्तुमसाम्प्रतम् ॥ १९ ॥

यह सुनकर दुर्योधनने जनार्दनसे कहा - ' आपको हमलोगोंके साथ ऐसा अनुचित बर्ताव नहीं करना चाहिये ' ॥ १ ९ ॥

कृतार्थं वाकृतार्थं च त्वां वयं मधुसूदन ।

यतामहे पूजयितुं दाशार्ह न च शक्नुमः ॥ २० ॥

'दशार्हनन्दन मधुसूदन! आपका उद्देश्य सफल हो या न हो, हमलोग तो आपके सम्मानका प्रयत्न करते ही हैं; किंतु हमें सफलता नहीं मिल रही है ॥ २० ॥

न च तत् कारणं विद्मो यस्मिन् नो मधुसूदन ।

पूजां कृतां प्रीयमाणैर्नामंस्थाः पुरुषोत्तम ॥ २१ ॥

‘ मधुदैत्यका विनाश करनेवाले पुरुषोत्तम! हमें ऐसा कोई कारण नहीं जान पड़ता, जिसके होनेसे आप हमारी प्रेमपूर्वक अर्पित की हुई पूजा ग्रहण न कर सकें ॥ २१ ॥

वैरं नो नास्ति भवता गोविन्द न च विग्रहः ।

स भवान् प्रसमीक्ष्यैतन्नेदृशं वक्तुमर्हति ॥ २२ ॥

‘ गोविन्द! आपके साथ हमलोगोंका न तो कोई वैर है और न झगड़ा ही है । इन सब बातोंका विचार करके आपको ऐसी बात नहीं कहनी चाहिये ' ॥ २२ ॥

वैशम्पायन उवाच

एवमुक्तः प्रत्युवाच धार्तराष्ट्रं जनार्दनः ।

अभिवीक्ष्य सहामात्यं दाशार्हः प्रहसन्निव ॥ २३ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं-राजन्! यह सुनकर दशार्हकुलभूषण जनार्दनने मन्त्रियोंसहित दुर्योधनकी ओर देखकर हँसते हुए- से उत्तर दिया ॥ २३ ॥

नाहं कामान्न संरम्भान्न द्वेषान्नार्थकारणात् ।

न हेतुवादाल्लोभाद् वा धर्मं जह्यां कथंचन ॥ २४ ॥

' राजन्! मैं कामसे, क्रोधसे, द्वेषसे, स्वार्थवश, बहानेबाजी अथवा लोभसे भी किसी प्रकार धर्मका त्याग नहीं कर सकता ॥ २४ ॥

पृष्ठ 658

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सम्प्रीतिभोज्यान्यन्नानि आपद्भोज्यानि वा पुनः ।

न च सम्प्रीयसे राजन् न चैवापद्गता वयम् ॥ २५ ॥

‘ किसीके घरका अन्न या तो प्रेमके कारण भोजन किया जाता है या आपत्तिमें पड़नेपर । नरेश्वर! प्रेम तो तुम नहीं रखते और किसी आपत्तिमें हम नहीं पड़े हैं ॥ २५ ॥

अकस्माद् द्वेष्टि वै राजन् जन्मप्रभृति पाण्डवान् ।

प्रियानुवर्तिनो भ्रातॄन् सर्वैः समुदितान् गुणैः ॥ २६ ॥

' राजन्! पाण्डव तुम्हारे भाई ही हैं, वे अपने प्रेमियोंका साथ देनेवाले और समस्त सद्गुणोंसे सम्पन्न हैं, तथापि तुम जन्मसे ही उनके साथ अकारण ही द्वेष करते हो ॥ २६ ॥

अकस्माच्चैव पार्थानां द्वेषणं नोपपद्यते ।

धर्मे स्थिताः पाण्डवेयाः कस्तान् किं वक्तुमर्हति ॥ २७ ॥

‘ बिना कारण ही कुन्तीपुत्रोंके साथ द्वेष रखना तुम्हारे लिये कदापि उचित नहीं है । पाण्डव सदा अपने धर्ममें स्थित रहते हैं, अतः उनके विरुद्ध कौन क्या कह सकता है? ॥ २७ ॥

यस्तान् द्वेष्टि स मां द्वेष्टि यस्ताननु स मामनु ।

ऐकात्म्यं मां गतं विद्धि पाण्डवैर्धर्मचारिभिः ॥ २८ ॥

' जो पाण्डवोंसे द्वेष करता है, वह मुझसे भी द्वेष करता है और जो उनके अनुकूल है, वह मेरे भी अनुकूल है । तुम मुझे धर्मात्मा पाण्डवोंके साथ एकरूप हुआ ही समझो ॥ २८ ॥

कामक्रोधानुवर्ती हि यो मोहाद् विरुरुत्सति ।

गुणवन्तं च यो द्वेष्टि तमाहुः पुरुषाधमम् ॥ २ ९ ॥

‘जो काम और क्रोधके वशीभूत होकर मोहवश किसी गुणवान् पुरुषके साथ विरोध करना चाहता है, उसे पुरुषोंमें अधम कहा गया है ॥ २ ९ ॥

यः कल्याणगुणान् ज्ञातीन् मोहाल्लोभाद् दिदृक्षते ।

सोऽजितात्माजितक्रोधो न चिरं तिष्ठति श्रियम् ॥ ३० ॥

‘ जो कल्याणमय गुणोंसे युक्त अपने कुटुम्बीजनोंको मोह और लोभ की दृष्टिसे देखना चाहता है, वह अपने मन और क्रोधको न जीतनेवाला पुरुष दीर्घकालतक राजलक्ष्मीका उपभोग नहीं कर सकता ॥ ३० ॥

अथ यो गुणसम्पन्नान् हृदयस्याप्रियानपि ।

प्रियेण कुरुते वश्यांश्चिरं यशसि तिष्ठति ॥ ३१ ॥

' जो अपने मनको प्रिय न लगनेवाले गुणवान् व्यक्तियोंको भी अपने प्रिय व्यवहारद्वारा वशमें कर लेता है, वह दीर्घकालतक यशस्वी बना रहता है ॥ ३१ ॥

(द्विषदन्नं न भोक्तव्यं द्विषन्तं नैव भोजयेत् ।

पृष्ठ 659

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पाण्डवान् द्विषसे राजन् मम प्राणा हि पाण्डवाः ) 'जो द्वेष रखता हो, उसका अन्न नहीं खाना चाहिये । द्वेष रखनेवालेको खिलाना भी नहीं चाहिये । राजन्! तुम पाण्डवोंसे द्वेष रखते हो और पाण्डव मेरे प्राण हैं ।

सर्वमेतन्न भोक्तव्यमन्नं दुष्टाभिसंहितम् ।

क्षत्तुरेकस्य भोक्तव्यमिति मे धीयते मतिः ॥ ३२ ॥

' तुम्हारा यह सारा अन्न दुर्भावनासे दूषित है । अतः मेरे भोजन करनेयोग्य नहीं है । मेरे लिये तो यहाँ केवल विदुरका ही अन्न खानेयोग्य है । यह मेरी निश्चित धारणा है ' ॥ ३२ ॥

एवमुक्त्वा महाबाहुर्दुर्योधनममर्षणम् ।

निश्चक्राम ततः शुभ्राद् धार्तराष्ट्रनिवेशनात् ॥ ३३ ॥

अमर्षशील दुर्योधनसे ऐसा कहकर महाबाहु श्रीकृष्ण उसके भव्य भवनसे बाहर निकले ॥ ३३ ॥

निर्याय च महाबाहुर्वासुदेवो महामनाः ।

निवेशाय ययौ वेश्म विदुरस्य महात्मनः ॥ ३४ ॥

वहाँसे निकलकर महामना महाबाहु भगवान् वासुदेव ठहरनेके लिये महात्मा विदुरके भवनमें गये ॥ ३४ ॥

तमभ्यगच्छद् द्रोणश्च कृपो भीष्मोऽथ बाह्लिकः ।

कुरवश्च महाबाहुं विदुरस्य गृहे स्थितम् ॥ ३५ ॥

त ऊचुर्माधवं वीरं कुरवो मधुसूदनम् ।

निवेदयामो वार्ष्णेय सरत्नांस्ते गृहान् वयम् ॥ ३६ ॥

उस समय द्रोणाचार्य, कृपाचार्य, भीष्म, बाह्लीक तथा अन्य कौरवोंने भी महाबाहु श्रीकृष्णका अनुसरण किया । विदुरके घरमें ठहरे हुए यदुवंशी वीर मधुसूदनसे वे सब कौरव बोले– ' वृष्णिनन्दन! हमलोग रत्न- धनसे सम्पन्न अपने घरोंको आपकी सेवामें समर्पित करते हैं ' ॥ ३५-३६ ॥

तानुवाच महातेजाः कौरवान् मधुसूदनः ।

सर्वे भवन्तो गच्छन्तु सर्वा मेऽपचितिः कृता ॥ ३७ ॥

तब महातेजस्वी मधुसूदनने कौरवोंसे कहा - ' आप सब लोग अपने घरोंको जायँ; आपके द्वारा मेरा सारा सम्मान सम्पन्न हो गया ' ॥ ३७ ॥

यातेषु कुरुषु क्षत्ता दाशार्हमपराजितम् ।

अभ्यर्चयामास तदा सर्वकामैः प्रयत्नवान् ॥ ३८ ॥

कौरवोंके चले जानेपर विदुरजीने कभी पराजित न होनेवाले दशार्हनन्दन श्रीकृष्णको समस्त मनोवांछित वस्तुएँ समर्पित करके प्रयत्नपूर्वक उनका पूजन किया ॥

पृष्ठ 660

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ततः क्षत्तान्नपानानि शुचीनि गुणवन्ति च ।

उपाहरदनेकानि केशवाय महात्मने ॥ ३ ९ ॥

तदनन्तर उन्होंने अनेक प्रकारके पवित्र एवं गुणकारक अन्न -पान महात्मा केशवको अर्पित किये ॥

तैस्तर्पयित्वा प्रथमं ब्राह्मणान् मघुसूदनः ।

वेदविद्भयो ददौ कृष्णः परमद्रविणान्यपि ॥ ४० ॥

मधुसूदनने उस अन्न- पानसे पहले ब्राह्मणोंको तृप्त किया, फिर उन्होंने उन वेदवेत्ताओंको श्रेष्ठ धन भी दिया ॥ ४० ॥

ततोऽनुयायिभिः सार्धं मरुद्भिरिव वासवः ।

विदुरान्नानि बुभुजे शुचीनि गुणवन्ति च ॥ ४१ ॥

तदनन्तर देवताओंसहित इन्द्रकी भाँति अनुचरोंसहित भगवान् श्रीकृष्णने विदुरजीके पवित्र एवं गुणकारक अन्न- पान ग्रहण किये ॥ ४१ ॥

इति श्रीमहाभारते उद्योगपर्वणि भगवद्यानपर्वणि श्रीकृष्णदुर्योधनसंवादे एकनवतितमोऽध्यायः ॥ ९ १ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत उद्योगपर्वके अन्तर्गत भगवद्यानपर्वमें श्रीकृष्ण-दुर्योधन- संवादविषयक इक्यानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ९ १ ॥