श्रीगणेशाय नमः।
महाभारत — खण्ड ४ — पृष्ठ 1741–1750
महाभारत — खण्ड ४ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1741–1750
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दृष्ट्वा सेनापतिं यान्तं पञ्चालानां रथव्रजान् ॥ ५५ ॥
प्रजानाथ! कौरव- सेनापति कर्णको पांचाल रथियोंकी ओर जाते देख पाण्डव-सैनिकोंमें महान् कोलाहल मच गया ॥ ५५ ॥
तत्राकरोन्महाराज कदनं सूतनन्दनः ।
मध्यं प्राप्ते दिनकरे चक्रवद् विचरन् प्रभुः ॥ ५६ ॥
महाराज! दोपहर होते - होते शक्तिशाली सूतनन्दन कर्णने चक्रके समान चारों ओर विचरण करते हुए वहाँ पाण्डव - सैनिकोंका महान् संहार मचा दिया ॥ ५६ ॥
भग्नचक्रै रथैः कांश्चिच्छिन्नध्वजपताकिभिः ।
हताश्वैर्हतसूतैश्च भग्नाक्षैश्चैव मारिष ॥ ५७ ॥
ह्रियमाणानपश्याम पञ्चालानां रथव्रजान् । माननीय नरेश! उस समय हमलोगोंने कितने ही रथियोंको ऐसी अवस्थामें देखा कि उनके रथके पहिये टूट गये हैं, ध्वजा, पताकाएँ छिन्न-भिन्न हो गयी हैं, घोड़े और सारथि मारे गये हैं और उन रथोंके धुरे भी खण्डित हो गये हैं । उस अवस्थामें समूह- के - समूह पांचाल महारथी हमें भागते दिखायी दिये ॥ ५७३ ॥
तत्र तत्र च सम्भ्रान्ता विचेरुर्मत्तकुञ्जराः ॥ ५८ ॥
दावाग्निपरिदग्धाङ्गा यथैव स्युर्महावने । बहुत - से मतवाले हाथी वहाँ बड़ी घबराहटमें पड़कर इधर- उधर चक्कर काट रहे थे, मानो किसी बड़े भारी जंगलमें दावानलसे उनके सारे अंग झुलस गये हों ॥ ५८३ ॥
भिन्नकुम्भार्द्ररुधिराश्छिन्नहस्ताश्च वारणाः ॥ ५ ९ ॥
छिन्नगात्रावराश्चैव च्छिन्नवालधयोऽपरे ।
छिन्नाभ्राणीव सम्पेतुर्हन्यमाना महात्मना ॥ ६० ॥
कितने ही हाथियोंके कुम्भस्थल फट गये थे और वे खूनसे भींग गये थे । कितनोंकी सूँड़ें कट गयी थीं, कितनोंके कवच छिन्न- भिन्न हो गये थे, बहुतोंकी पूँछें कट गयी थीं और कितने ही हाथी महामना कर्णकी मार खाकर खण्डित हुए मेघोंके समान पृथ्वीपर गिर गये थे ॥ ५ ९ -६० ॥
अपरे त्रासिता नागा नाराचशरतोमरैः ।
तमेवाभिमुखं जग्मुः शलभा इव पावकम् ॥ ६१ ॥
दूसरे बहुत - से गजराज कर्णके नाराचों, शरों और तोमरोंसे संत्रस्त हो जैसे पतंगे आगमें कूद पड़ते हैं, उसी प्रकार कर्णके सम्मुख चले जाते थे ॥ ६१ ॥
अपरे निष्टनन्तश्च व्यदृश्यन्त महाद्विपाः ।
क्षरन्तः शोणितं गात्रैर्नगा इव जलस्रवाः ॥ ६२ ॥
अन्य बहुत - से बड़े - बड़े हाथी झरने बहानेवाले पर्वतोंके समान अपने अंगोंसे रक्तकी धारा बहाते और आर्तनाद करते दिखायी देते थे ॥ ६२ ॥
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उरश्छदैर्वियुक्तांश्च वालबन्धैश्च वाजिनः ।
राजतैश्च तथा कांस्यैः सौवर्णैश्चैव भूषणैः ॥ ६३ ॥
नांश्चाभरणैश्चैव खलीनैश्च विवर्जितान् ।
चामरैश्च कुथाभिश्च तूणीरैः पतितैरपि ॥ ६४ ॥
निहतैः सादिभिश्चैव शूरैराहवशोभितैः ।
अपश्याम रणे तत्र भ्राम्यमाणान् हयोत्तमान् ॥ ६५ ॥
कितने ही घोड़ोंके उनकी छातीको छिपानेवाले कवच कटकर गिर गये थे, बालाबन्ध छिन्न - भिन्न हो गये थे, सोने, चाँदी और कांस्यके आभूषण नष्ट हो गये थे, दूसरे साज - बाज भी चौपट हो गये थे, उनके मुखोंसे लगाम भी निकल गये थे, चँवर, झूल और तरकस धराशायी हो गये थे तथा संग्रामभूमिमें शोभा पानेवाले उनके शूरवीर सवार भी मारे जा चुके थे । ऐसी दशामें रणभूमिमें भ्रान्त होकर भटकते हुए बहुत- से उत्तम घोड़ोंको हमने देखा था ॥ ६३–६५ ॥
प्रासैः खड्गैश्च रहितानृष्टिभिश्चापि भारत ।
हयसादीनपश्याम कञ्चुकोष्णीषधारिणः ॥ ६६ ॥
निहतान् वध्यमानांश्च वेपमानांश्च भारत ।
नानाङ्गावयवैर्हीनांस्तत्र तत्रैव भारत ॥ ६७ ॥
भारत! कवच और पगड़ी धारण करनेवाले कितने ही घुड़सवारोंको हमने प्रास, खड्ग और ऋष्टि आदि अस्त्र- शस्त्रोंसे रहित होकर मारा गया देखा । कितने ही कर्णके बाणोंकी मार खाते हुए थरथर काँप रहे थे और बहुत- से अपने शरीरके विभिन्न अवयवोंसे रहित हो यत्र- तत्र मरे पड़े थे ॥ ६६-६७ ॥
रथान् हेमपरिष्कारान् संयुक्ताञ्जवनैर्हयैः ।
भ्राम्यमाणानपश्याम हतेषु रथिषु द्रुतम् ॥ ६८ ॥
वेगशाली घोड़ोंसे जुते हुए कितने ही सुवर्णभूषित रथ सारथि और रथियोंके मारे जानेसे वेगपूर्वक दौड़ते दिखायी देते थे ॥ ६८ ॥
भग्नाक्षकूबरान् कांश्चिद् भग्नचक्रांश्च भारत ।
विपताकध्वजांश्चान्याञ्छिन्नेषादण्डबन्धुरान् ॥ ६ ९ ॥
भरतनन्दन! कितने ही रथोंके धुरे और कूबर टूट गये थे, पहिये टूक - टूक हो गये थे, पताका और ध्वज खण्डित हो गये थे तथा ईषादण्ड और बन्धुरोंके टुकड़े -टुकड़े हो गये थे ॥ ६ ९ ॥
विहतान् रथिनस्तत्र धावमानांस्ततस्ततः ।
सूतपुत्रशरैस्तीक्ष्णैर्हन्यमानान् विशाम्पते ॥ ७० ॥
विशस्त्रांश्च तथैवान्यान् सशस्त्रांश्च हतान् बहून् ।
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प्रजानाथ! सूतपुत्रके तीखे बाणोंसे हताहत होकर बहुतेरे रथी वहाँ इधर- उधर भागते देखे गये । कितने ही रथी शस्त्रहीन होकर तथा दूसरे बहुत - से सशस्त्र रहकर ही मारे गये थे ॥ ७०३ ॥
तारकाजालसंछन्नान् वरघण्टाविशोभितान् ॥ ७१ ॥
नानावर्णविचित्राभिः पताकाभिरलंकृतान् ।
वारणाननुपश्याम धावमानान् समन्ततः ॥ ७२ ॥
नक्षत्रसमूहोंके चिह्नवाले कवचोंसे आच्छादित, उत्तम घंटोंसे सुशोभित तथा अनेक रंगकी विचित्र ध्वजा - पताकाओंसे अलंकृत हाथियोंको हमने चारों ओर भागते देखा था ॥
शिरांसि बाहूनूरूंश्च च्छिन्नानन्यंस्तथैव च ।
कर्णचापच्युतैर्बाणैरपश्याम समन्ततः ॥ ७३ ॥
हमने यह भी देखा कि कर्णके धनुषसे छूटे हुए बाणोंद्वारा योद्धाओंके मस्तक, भुजाएँ और जाँघें कट- कटकर चारों ओर गिर रही हैं ॥ ७३ ॥
महान् व्यतिकरो रौद्रो योधानामन्वपद्यत ।
कर्णसायकनुन्नानां युध्यतां च शितैः शरैः ॥ ७४ ॥
कर्णके बाणोंसे आहत हो तीखे बाणोंसे युद्ध करते हुए योद्धाओंमें वहाँ अत्यन्त भयंकर और महान् संग्राम मच गया था ॥ ७४ ॥
ते वध्यमानाः समरे सूतपुत्रेण सृञ्जयाः ।
तमेवाभिमुखं यान्ति पतङ्गा इव पावकम् ॥ ७५ ॥
समरांगणमें सृ॑जयोंपर कर्णके बाणोंकी मार पड़ रही थी, तो भी पतंगे जैसे अग्निपर टूट पड़ते हैं, उसी प्रकार वे कर्णके ही सम्मुख बढ़ते जा रहे थे ॥ ७५ ॥
तं दहन्तमनीकानि तत्र तत्र महारथम् ।
क्षत्रिया वर्जयामासुर्युगान्ताग्निमिवोल्बणम् ॥ ७६ ॥
महारथी कर्ण प्रलयकालके प्रचण्ड अग्निके समान जहाँ - तहाँ पाण्डव- सेनाओंको दग्ध कर रहा था । उस समय क्षत्रिय लोग उसे छोड़कर दूर हट जाते थे ॥ ७६ ॥
हतशेषास्तु ये वीराः पञ्चालानां महारथाः ।
तान् प्रभग्नान् द्रुतान् वीरः पृष्ठतो विकिरञ्छरैः ॥ ७७ ॥
अभ्यधावत तेजस्वी विशीर्णकवचध्वजान् ।
तापयामास तान् बाणैः सूतपुत्रो महाबलः ।
मध्यंदिनमनुप्राप्तो भूतानीव तमोनुदः ॥ ७८ ॥
पांचालोंके जो वीर महारथी मरनेसे बच गये थे, उन्हें भागते देख तेजस्वी वीर कर्ण पीछेसे उनपर बाणोंकी वर्षा करता हुआ उनकी ओर दौड़ा । उन योद्धाओंके कवच और ध्वज छिन्न - भिन्न हो गये थे । जैसे मध्याह्नकालका सूर्य सम्पूर्ण प्राणियोंको अपनी
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किरणोंद्वारा तपाता है, उसी प्रकार महाबली सूतपुत्र अपने बाणोंसे उन शत्रुसैनिकोंको संतप्त करने लगा ॥ इति श्रीमहाभारते कर्णपर्वणि कर्णयुद्धे चतुर्विंशोऽध्यायः ॥ २४ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत कर्णपर्वमें कर्णका युद्धविषयक चौबीसवाँअध्याय पूरा हुआ ॥ २४ ॥
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पञ्चविंशोऽध्यायः युयुत्सु और उलूकका युद्ध, युयुत्सुका पलायन, शतानीक और धृतराष्ट्रपुत्र श्रुतकर्माका तथा सुतसोम और शकुनिका घोर युद्ध एवं शकुनिद्वारा पाण्डव सेनाका विनाश संजय उवाच
युयुत्सुं तव पुत्रस्य द्रावयन्तं बलं महत् ।
उलूको न्यपतत्तूर्णं तिष्ठ तिष्ठेति चाब्रवीत् ॥ १ ॥
संजय कहते हैं - महाराज! दूसरी ओर युयुत्सु आपके पुत्रकी विशाल सेनाको खदेड़ रहा था । यह देख उलूक तुरंत वहाँ आ धमका और युयुत्सुसे बोला – ' अरे! खड़ा रह, खड़ा रह' ॥ १ ॥
युयुत्सुश्च ततो राजन् शितधारेण पत्रिणा ।
उलूकं ताडयामास वज्रेणेन्द्र इवाचलम् ॥ २ ॥
राजन्! तब युयुत्सुने तीखी धारवाले बाणसे महाबली उलूकको उसी प्रकार पीट दिया, जैसे इन्द्र पर्वतपर वज्रका प्रहार करते हैं ॥ २ ॥
उलूकस्तु ततः क्रुद्धस्तव पुत्रस्य संयुगे ।
क्षुरप्रेण धनुश्छित्त्वा ताडयामास कर्णिना ॥ ३ ॥
इससे उलूकको बड़ा क्रोध हुआ । उसने युद्धस्थलमें एक क्षुरप्रके द्वारा आपके पुत्रका धनुष काटकर उसपर कर्णी नामक बाणका प्रहार किया ॥ ३ ॥
तदपास्य धनुश्छिन्नं युयुत्सुर्वेगवत्तरम् ।
अन्यदादत्त सुमहच्चापं संरक्तलोचनः ॥ ४ ॥
युयुत्सुने उस कटे हुए धनुषको फेंककर क्रोधसे आँखें लाल करके दूसरा अत्यन्त वेगशाली एवं विशाल धनुष हाथमें लिया ॥ ४ ॥
शाकुनिं तु ततः षष्ट्या विव्याध भरतर्षभ ।
सारथिं त्रिभिरानर्छत्तं च भूयो व्यविध्यत ॥ ५ ॥
भरतश्रेष्ठ! उसने शकुनिपुत्र उलूकको साठ बाणोंसे बेध दिया और तीन बाणोंसे उसके
सारथिको पीड़ित किया । तत्पश्चात् उसे और भी घायल कर दिया ॥ ५ ॥
उलूकस्तं तु विंशत्या विद्ध्वा स्वर्णविभूषितैः ।
अथास्य समरे क्रुद्धो ध्वजं चिच्छेद काञ्चनम् ॥ ६ ॥
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तब उलूकने संग्रामभूमिमें कुपित हो स्वर्णभूषित बीस बाणोंसे युयुत्सुको घायल करके उनके सुवर्णमय ध्वजको भी काट डाला ॥ ६ ॥
सच्छिन्नयष्टिः सुमहान् शीर्यमाणो महाध्वजः ।
पपात प्रमुखे राजन् युयुत्सोः काञ्चनध्वजः ॥ ७ ॥
राजन्! ध्वजका दण्ड कट जानेपर युयुत्सुका वह विशाल कांचनध्वज छिन्न - भिन्न हो उसके सामने ही गिर पड़ा ॥ ७ ॥
ध्वजमुन्मथितं दृष्ट्वा युयुत्सुः क्रोधमूर्च्छितः ।
उलूकं पञ्चभिर्बाणैराजघान स्तनान्तरे ॥ ८ ॥
अपने ध्वजका यह विध्वंस देखकर युयुत्सु क्रोधसे मूर्च्छित- सा हो गया और उसने पाँच बाणोंसे उलूककी छाती छेद डाली ॥ ८ ॥
उलूकस्तस्य समरे तैलधौतेन मारिष ।
शिरश्चिच्छेद भल्लेन यन्तुर्भरतसत्तम ॥ ९ ॥
माननीय भरतभूषण! उलूकने तेलसे साफ किये हुए भल्लके द्वारा युयुत्सुके सारथिका मस्तक काट डाला ॥
तच्छिन्नमपतद् भूमौ युयुत्सोः सारथेस्तदा ।
तारारूपं यथा चित्रं निपपात महीतले ॥ १० ॥
उस समय युयुत्सुके सारथिका वह कटा हुआ मस्तक पृथ्वीपर उसी भाँति गिरा, मानो आकाशसे भूतलपर कोई विचित्र तारा टूट पड़ा हो ॥ १० ॥
जघान चतुरोऽश्वांश्च तं च विव्याध पञ्चभिः ।
सोऽतिविद्धो बलवता प्रत्यपायाद् रथान्तरम् ॥ ११ ॥
तत्पश्चात् उलूकने युयुत्सुके चारों घोड़ोंको भी मार डाला और पाँच बाणोंसे उसे भी घायल कर दिया । उस बलवान् वीरके द्वारा अत्यन्त घायल हो युयुत्सु दूसरे रथपर आरूढ़ हो वहाँसे भाग गया ॥ ११ ॥
तं निर्जित्य रणे राजन्नुलूकस्त्वरितो ययौ ।
पञ्चालान् सृञ्जयांश्चैव विनिघ्नन् निशितैः शरैः ॥ १२ ॥
राजन्! रणभूमिमें युयुत्सुको पराजित करके उलूक तुरंत ही पांचालों और सृजयोंकी ओर चला गया और उन्हें तीखे बाणोंसे मारने लगा ॥ १२ ॥
शतानीकं महाराज श्रुतकर्मा सुतस्तव ।
व्यश्वसूतरथं चक्रे निमेषार्धादसम्भ्रमः ॥ १३ ॥
महाराज! दूसरी ओर आपके पुत्र श्रुतकर्माने बिना किसी घबराहटके आधे निमेषमें ही शतानीकके रथको घोड़ों और सारथिसे शून्य कर दिया ॥ १३ ॥
हताश्वे तु रथे तिष्ठन् शतानीको महारथः ।
गदां चिक्षेप संक्रुद्धस्तव पुत्रस्य मारिष ॥ १४ ॥
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मान्यवर! महारथी शतानीकने कुपित होकर अपने अश्वहीन रथपर खड़े रहकर ही आपके पुत्रके ऊपर गदाका प्रहार किया ॥ १४ ॥
सा कृत्वा स्यन्दनं भस्म हयांश्चैव ससारथीन् ।
पपात धरणीं तूर्णं दारयन्तीव भारत ॥ १५ ॥
भारत! वह गदा तुरंत ही श्रुतकर्माके रथ, घोड़ों और सारथिको भस्म करके पृथ्वीको विदीर्ण करती हुई - सी गिर पड़ी ॥ १५ ॥
तावुभौ विरथौ वीरौ कुरूणां कीर्तिवर्धनौ ।
व्यपाक्रमेतां युद्धात्तु प्रेक्षमाणौ परस्परम् ॥ १६ ॥
कुरुकुलकी कीर्ति बढ़ानेवाले वे दोनों वीर रथहीन हो एक-दूसरेको देखते हुए युद्धस्थलसे हट गये ॥ १६ ॥
पुत्रस्तु तव सम्भ्रान्तो विवित्सो रथमारुहत् ।
शतानीकोऽपि त्वरितः प्रतिविन्ध्यरथं गतः ॥ १७ ॥
आपका पुत्र श्रुतकर्मा घबरा गया था । वह विवित्सुके रथपर जा चढ़ा और शतानीक भी तुरंत ही प्रतिविन्ध्यके रथपर चला गया ॥ १७ ॥
सुतसोमं तु शकुनिर्विद्ध्वा तु निशितैः शरैः ।
नाकम्पयत संक्रुद्धो वार्योघ इव पर्वतम् ॥ १८ ॥
दूसरी ओर शकुनि अत्यन्त कुपित हो अपने तीखे बाणोंसे सुतसोमको घायल करके भी उसे विचलित न कर सका । ठीक उसी तरह जैसे जलका प्रवाह पर्वतको नहीं हिला सकता ॥ १८ ॥
सुतसोमस्तु तं दृष्ट्वा पितुरत्यन्तवैरिणम् ।
शरैरनेकसाहस्रैश्छादयामास भारत ॥ १ ९ ॥
भरतनन्दन! सुतसोमने अपने पिताके अत्यन्त वैरी शकुनिको सामने देखकर उसे कई हजार बाणोंसे आच्छादित कर दिया ॥ १ ९ ॥
ताञ्शराञ्शकुनिस्तूर्णं चिच्छेदान्यैः पतत्रिभिः ।
लघ्वस्त्रश्चित्रयोधी च जितकाशी च संयुगे ॥ २० ॥
निवार्य समरे चापि शरांस्तान् निशितैः शरैः ।
आजघान सुसंक्रुद्धः सुतसोमं त्रिभिः शरैः ॥ २१ ॥
परंतु शकुनिने तुरंत ही दूसरे बाणोंद्वारा सुतसोमके बाणोंको काट डाला । वह शीघ्रतापूर्वक अस्त्र चलानेवाला, विचित्र युद्धमें कुशल और युद्धस्थलमें विजयश्रीसे सुशोभित होनेवाला था । उसने समरांगणमें अपने तीखे बाणोंसे सुतसोमके बाणोंका निवारण करके अत्यन्त कुपित हो तीन बाणोंद्वारा सुतसोमको भी घायल कर दिया ॥ २०-२१ ॥ तस्याश्वान् केतनं सूतं तिलशो व्यधमच्छरैः ।
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स्यालस्तव महाराज तत उच्चुक्रुशुर्जनाः ॥ २२ ॥
महाराज! आपके सालेने सुतसोमके घोड़ोंको तथा ध्वज और सारथिको भी अपने बाणोंसे तिल- तिल करके काट डाला; इससे सब लोग हर्षसूचक कोलाहल करने लगे ॥ २२ ॥
हताश्वो विरथश्चैव छिन्नकेतुश्च मारिष ।
धन्वी धनुर्वरं गृह्य रथाद् भूमावतिष्ठत ॥ २३ ॥
मान्यवर! घोड़े, रथ और ध्वजके नष्ट हो जानेपर धनुर्धर सुतसोम अपने हाथमें श्रेष्ठ धनुष लिये रथसे उतरकर धरतीपर खड़ा हो गया ॥ २३ ॥
व्यसृजत् सायकांश्चैव स्वर्णपुङ्खान् शिलाशितान् ।
छादयामास समरे तव स्यालस्य तं रथम् ॥ २४ ॥
फिर उसने शिलापर तेज किये हुए सुवर्णमय पंखवाले बहुत- से बाण छोड़े । उन बाणोंद्वारा समरभूमिमें उसने आपके सालेके रथको ढक दिया ॥ २४ ॥
शलभानामिव व्राताञ्शरव्रातान् महारथः ।
रथोपगान् समीक्ष्यैवं विव्यथे नैव सौबलः ॥ २५ ॥
प्रममाथ शरांस्तस्य शरव्रातैर्महायशाः । उसके बाणसमूह टिड्डीदलोंके समान जान पड़ते थे । उन्हें अपने रथके समीप देखकर भी महारथी सुबलपुत्र शकुनिके मनमें तनिक भी व्यथा नहीं हुई । उस महायशस्वी वीरने अपने बाणसमूहोंद्वारा सुतसोमके सारे बाणोंको पूर्णतया मथ डाला ॥ २५३ ॥
तत्रातुष्यन्त योधाश्च सिद्धाश्चापि दिवि स्थिताः ॥ २६ ॥
सुतसोमस्य तत् कर्म दृष्ट्वा श्रद्धेयमद्भुतम् ।
रथस्थं शकुनिं यस्तु पदातिः समयोधयत् ॥ २७ ॥
सुतसोम जो वहाँ पैदल होकर भी रथपर बैठे हुए शकुनिके साथ युद्ध कर रहा था । उसके इस अविश्वसनीय और अद्भुत कर्मको देखकर वहाँ खड़े हुए समस्त योद्धा तथा आकाशमें स्थित हुए सिद्धगण भी बहुत संतुष्ट हुए ॥ २६-२७ ॥
तस्य तीक्ष्णैर्महावेगैर्भल्लैः संनतपर्वभिः ।
व्यहनत् कार्मुकं राजंस्तूणीरांश्चैव सर्वशः ॥ २८ ॥
राजन्! उस समय शकुनिने अत्यन्त वेगशाली और झुकी हुई गाँठवाले तीखे भल्लोंद्वारा सुतसोमके धनुष, तरकस तथा अन्य सब उपकरणोंको भी नष्ट कर दिया ॥
स च्छिन्नधन्वा विरथः खड्गमुद्यम्य चानदत् ।
वैदूर्योत्पलवर्णाभं दन्तिदन्तमयत्सरुम् ॥ २ ९ ॥
रथ तो नष्ट हो ही चुका था, जब धनुष भी कट गया, तब सुतसोमने वैदूर्यमणि तथा नील कमलके समान श्याम रंगवाले, हाथीके दाँतकी बनी हुई मूठसे युक्त खड्गको ऊपर उठाकर बड़े जोरसे गर्जना की ॥
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भ्राम्यमाणं ततस्तं तु विमलाम्बरवर्चसम् ।
कालदण्डोपमं मेने सुतसोमस्य धीमतः ॥ ३० ॥
बुद्धिमान् सुतसोमके उस निर्मल आकाशके समान कान्तिवाले खड्गको घुमाया जाता देख शकुनिने उसे अपने लिये कालदण्डके समान माना ॥ ३० ॥
सोऽचरत् सहसा खड्गी मण्डलानि समन्ततः ।
चतुर्दश महाराज शिक्षाबलसमन्वितः ॥ ३१ ॥
महाराज! सुतसोम शिक्षा और बल दोनोंसे सम्पन्न था, वह खड्ग लेकर सहसा उसके चौदह मण्डल ( पैंतरे ) दिखाता हुआ रणभूमिमें सब ओर विचरने लगा ॥ ३१ ॥
भ्रान्तमुद्भ्रान्तमाविद्धमाप्लुतं विप्लुतं सृतम् ।
सम्पातसमुदीर्णे च दर्शयामास संयुगे ॥ ३२ ॥
उसने युद्धस्थलमें भ्रान्त, उद्भ्रान्त, आविद्ध, आप्लुत, प्लुत, सृत, सम्पात और समुदीर्ण आदि गतियोंको दिखाया ॥ ३२ ॥
सौबलस्तु ततस्तस्य शरांश्चिक्षेप वीर्यवान् ।
तानापतत एवाशु चिच्छेद परमासिना ॥ ३३ ॥
तब पराक्रमी सुबलपुत्रने सुतसोमपर बहुत - से बाण चलाये; परंतु उसने अपने उत्तम खड्गसे निकट आते ही उन सब बाणोंको काट गिराया ॥ ३३ ॥
ततः क्रुद्धो महाराज सौबलः परवीरहा ।
प्राहिणोत् सुतसोमाय शरानाशीविषोपमान् ॥ ३४ ॥
महाराज! इससे शत्रुवीरोंका संहार करनेवाले सुबलपुत्र शकुनिको बड़ा क्रोध हुआ ।
उसने सुतसोमपर विषधर सर्पोंके समान बाणोंकी वर्षा आरम्भ कर दी ॥ ३४ ॥
चिच्छेद तांस्तु खड्गेन शिक्षया च बलेन च ।
दर्शयँल्लाघवं युद्धे तार्क्ष्यतुल्यपराक्रमः ॥ ३५ ॥
परंतु गरुड़के तुल्य पराक्रमी सुतसोमने अपनी शिक्षा और बलके अनुसार युद्धमें फुर्ती दिखाते हुए खड्गसे उन सब बाणोंके टुकड़े -टुकड़े कर डाले ॥ ३५ ॥
तस्य संचरतो राजन् मण्डलावर्तने तदा ।
क्षुरप्रेण सुतीक्ष्णेन खड्गं चिच्छेद सुप्रभम् ॥ ३६ ॥
राजन्! सुतसोम जब अपनी चमकीली तलवारको मण्डलाकार घुमा रहा था, उसी समय शकुनिने तीखे क्षुरप्रसे उसके दो टुकड़े कर दिये ॥ ३६ ॥
स च्छिन्नः सहसा भूमौ निपपात महानसिः ।
अर्धमस्य स्थितं हस्ते सुत्सरोस्तत्र भारत ॥ ३७ ॥
वह महान् खड्ग कटकर सहसा पृथ्वीपर गिर पड़ा। भारत! सुन्दर मूठवाले उस खड्गका आधा भाग सुतसोमके हाथमें ही रह गया ॥ ३७ ॥
छिन्नमाज्ञाय निस्त्रिंशमवप्लुत्य पदानि षट् ।
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प्राविध्यत ततः शेषं सुतसोमो महारथः ॥ ३८ ॥
अपने उस खड्गको कटा हुआ जान महारथी सुतसोमने छः पग ऊँचे उछलकर उसके शेष भागको ही शकुनिपर दे मारा ॥ ३८ ॥
तच्छित्त्वा सगुणं चापं रणे तस्य महात्मनः ।
पपात धरणीं तूर्णं स्वर्णवज्रविभूषितम् ॥ ३ ९ ॥
वह स्वर्ण और हीरेसे विभूषित कटा हुआ खड्ग रणभूमिमें महामना शकुनिके धनुषको प्रत्यंचासहित काटकर तुरंत ही पृथ्वीपर गिर पड़ा ॥ ३ ९ ॥
सुतसोमस्ततोऽगच्छच्छ्रतकीर्तेर्महारथम् ।
सौबलोऽपि धनुर्गृह्य घोरमन्यत् सुदुर्जयम् ॥ ४० ॥
अभ्ययात् पाण्डवानीकं निघ्नञ्शत्रुगणान् बहून् । तत्पश्चात् सुतसोम श्रुतकीर्तिके विशाल रथपर चढ़ गया । उधर शकुनि भी दूसरा अत्यन्त दुर्जय एवं भयंकर धनुष लेकर बहुत से शत्रुओंका संहार करता हुआ पाण्डव-सेनाकी ओर चल दिया ॥ ४० ॥
तत्र नादो महानासीत् पाण्डवानां विशाम्पते ॥ ४१ ॥
सौबलं समरे दृष्ट्वा विचरन्तमभीतवत् । प्रजानाथ! सुबलपुत्र शकुनिको समरभूमिमें निर्भयसे विचरते देख पाण्डव- दलमें महान् सिंहनाद होने लगा ॥ ४१३ ॥
तान्यनीकानि दृप्तानि शस्त्रवन्ति महान्ति च ॥ ४२ ॥
द्राव्यमाणान्यदृश्यन्त सौबलेन महात्मना । महामना शकुनिने घमंडमें भरे हुए उन शस्त्रसम्पन्न महान् सैनिकोंको भगा दिया । यह सब हमने अपनी आँखों देखा ॥ ४२ ॥
यथा दैत्यचमूं राजन् देवराजो ममर्द ह ।
तथैव पाण्डवीं सेनां सौबलेयो व्यनाशयत् ॥ ४३ ॥
राजन्! जिस प्रकार देवराज इन्द्रने दैत्योंकी सेनाको कुचल दिया था, उसी प्रकार सुबलपुत्र शकुनिने पाण्डव सेनाका विनाश कर डाला ॥ ४३ ॥
इति श्रीमहाभारते कर्णपर्वणि सुतसोमसौबलयुद्धे पञ्चविंशोऽध्यायः ॥ २५ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत कर्णपर्वमें सुतसोम और शकुनिका युद्धविषयक पचीसवाँ अध्याय पूराहुआ ॥ २५ ॥