श्रीगणेशाय नमः।

महाभारत — खण्ड ४ — पृष्ठ 1761–1770

महाभारत — खण्ड ४ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1761–1770

पृष्ठ 1761

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प्रजानाथ! फिर तो वहाँ हजारों बाण प्रकट होने लगे । माननीय भरतवंशी प्रजापालक नरेश! उस समय कट- कटकर गिरनेवाले ध्वज, धनुष, रथ, पताका, तरकस, जूए, धुरे, पहिये, जोत, बागडोर, कूबर, वरूथ (रथका चर्ममय आवरण ), बाण, घोड़े, प्रास, ऋष्टि, गदा, परिघ, शक्ति, तोमर, पट्टिश, चक्रयुक्त शतघ्नी, बाँह- जाँघ, कण्ठसूत्र, अंगद, केयूर, हार, निष्क, कवच, छत्र, व्यजन और मुकुटसहित मस्तकोंका महान् शब्द युद्धस्थलमें जहाँ- -तहाँ सब ओर सुनायी देने लगा ॥ २८ – ३३३ ॥ सकुण्डलानि स्वक्षीणि पूर्णचन्द्रनिभानि च ॥ ३४ ॥

शिरांस्युर्व्यामदृश्यन्त ताराजालमिवाम्बरे । पृथ्वीपर गिरे हुए कुण्डल और सुन्दर नेत्रोंसे युक्त पूर्ण चन्द्रमाके समान मनोहर मस्तक आकाशमें ताराओंके समूहकी भाँति दिखायी देते थे ॥ ३४३ ॥

सुस्रग्वीणि सुवासांसि चन्दनेनोक्षितानि च ॥ ३५ ॥

शरीराणि व्यदृश्यन्त निहतानां महीतले । वहाँ मारे गये राजाओंके सुन्दर हारोंसे सुशोभित, उत्तम वस्त्रोंसे सम्पन्न तथा चन्दनसे चर्चित शरीर पृथ्वीपर पड़े देखे जाते थे ॥ ३५ ॥

गन्धर्वनगराकारं घोरमायोधनं तदा ॥ ३६ ॥

निहतै राजपुत्रैश्च क्षत्रियैश्च महाबलैः । उस समय वहाँ मारे गये राजकुमारों तथा महाबली क्षत्रियोंकी लाशोंसे वह युद्धस्थल गन्धर्वनगरके समान भयानक जान पड़ता था ॥ ३६३ ॥

हस्तिभिः पतितैश्चैव तुरङ्गैश्चाभवन्मही ॥ ३७ ॥

अगम्यरूपा समरे विशीर्णैरिव पर्वतैः । समरांगणमें टूट- फूटकर गिरे हुए पर्वतोंके समान धराशायी हुए हाथियों और घोड़ोंके कारण वहाँकी भूमिपर चलना-फिरना असम्भव हो गया था ॥ ३७३३ ॥

नासीच्चक्रपथस्तत्र पाण्डवस्य महात्मनः ॥ ३८ ॥

निघ्नतः शात्रवान् भल्लैर्हस्त्यश्वं चास्यतो महत् । अपने भल्लोंसे शत्रुसैनिकों तथा उनके हाथी - घोड़ेके महान् समुदायको मारते -गिराते हुए महामना पाण्डुकुमार अर्जुनके रथके पहियोंके लिये मार्ग नहीं मिलता था ॥ ३८३ ॥

आतङ्कादिव सीदन्ति रथचक्राणि मारिष ॥ ३ ९ ॥ चरतस्तस्य संग्रामे तस्मिंल्लोहितकर्दमे । मान्यवर! उस संग्राममें रक्तकी कीच मच गयी थी । उसमें विचरते हुए अर्जुनके रथके पहिये मानो भयसे शिथिल होते जा रहे थे ॥ ३ ९ ३ ॥ सीदमानानि चक्राणि समूहुस्तुरगा भृशम् ॥ ४० ॥

श्रमेण महता युक्ता मनोमारुतरंहसः ।

पृष्ठ 1762

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मन और वायुके समान वेगशाली घोड़े भी वहाँ धँसते हुए पहियोंको बड़े परिश्रमसे खींच पाते थे ॥ ४० ॥

वध्यमानं तु तत् सैन्यं पाण्डुपुत्रेण धन्विना ॥ ४१ ॥

प्रायशो विमुखं सर्वं नावतिष्ठत भारत । धनुर्धर पाण्डुकुमारकी मार खाकर आपकी वह सारी सेना प्रायः पीठ दिखाकर भाग चली । वहाँ क्षणभरके लिये भी ठहर न सकी ॥ ४१३ ॥

ताञ्जित्वा समरे जिष्णुः संशप्तकगणान् बहून् ॥ ४२ ॥

विरराज तदा पार्थो विधूमोऽग्निरिव ज्वलन् ॥ ४३ ॥

उस समय समरांगणमें उन बहुसंख्यक संशप्तकगणोंको परास्त करके विजयी कुन्तीकुमार अर्जुन धूमरहित प्रज्वलित अग्निके समान शोभा पा रहे थे ॥ ४२-४३ ॥ इति श्रीमहाभारते कर्णपर्वणि संशप्तकजये सप्तविंशोध्यायः ॥ २७ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत कर्णपर्वमें संशप्तकोंकी पराजयविषयक सत्ताईसवाँअध्याय पूरा हुआ ॥ २७ ॥

Fard

पृष्ठ 1763

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अर्जुनके द्वारा मित्रसेनका शिरश्छेद

पृष्ठ 1764

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अष्टाविंशोऽध्यायः युधिष्ठिर और दुर्योधनका युद्ध, दुर्योधनकी पराजय तथा उभयपक्षकी सेनाओंका अमर्यादित भयंकर संग्राम संजय उवाच

युधिष्ठिरं महाराज विसृजन्तं शरान् बहुन् ।

स्वयं दुर्योधनो राजा प्रत्यगृह्णादभीतवत् ॥ १ ॥

संजय कहते हैं — महाराज! बहुत - से बाणोंकी वर्षा करते हुए युधिष्ठिरका स्वयं राजा दुर्योधनने एक निर्भीक वीरकी भाँति सामना किया ॥ १ ॥

तमापतन्तं सहसा तव पुत्रं महारथम् ।

धर्मराजो द्रुतं विद्ध्वा तिष्ठ तिष्ठेति चाब्रवीत् ॥ २ ॥

सहसा आते हुए आपके महारथी पुत्रको धर्मराज युधिष्ठिरने तुरंत ही घायल करके कहा — ' अरे! खड़ा रह, खड़ा रह ' ॥ २ ॥

स तु तं प्रतिविव्याध नवभिर्निशितैः शरैः ।

सारथिं चास्य भल्लेन भृशं क्रुद्धोऽभ्यताडयत् ॥ ३ ॥

इससे दुर्योधनको बड़ा क्रोध हुआ । उसने युधिष्ठिरको नौ तीखे बाणोंसे बेधकर बदला चुकाया और उनके सारथिपर भी एक भल्लका प्रहार किया ॥ ३ ॥

ततो युधिष्ठिरो राजन् स्वर्णपुङ्खाञ्छिलीमुखान् ।

दुर्योधनाय चिक्षेप त्रयोदश शिलाशितान् ॥ ४ ॥

राजन्! तब युधिष्ठिरने सानपर चढ़ाकर तेज किये हुए सुवर्णमय पंखवाले तेरह बाण दुर्योधनपर चलाये ॥ ४ ॥

चतुर्भिश्चतुरो वाहांस्तस्य हत्वा महारथः ।

पञ्चमेन शिरः कायात् सारथेश्च समाक्षिपत् ॥ ५ ॥

महारथी युधिष्ठिरने उनमेंसे चार बाणोंद्वारा दुर्योधनके चारों घोड़ोंको मारकर पाँचवेंसे उसके सारथिका भी मस्तक धड़से काट गिराया ॥ ५ ॥

षष्ठेन तु ध्वजं राज्ञः सप्तमेन तु कार्मुकम् ।

अष्टमेन तथा खड्गं पातयामास भूतले ॥ ६ ॥

फिर छठे बाणसे राजा दुर्योधनके ध्वजको, सातवेंसे उसके धनुषको और आठवेंसे उसकी तलवारको भी पृथ्वीपर गिरा दिया ॥ ६ ॥

पञ्चभिर्नृपतिं चापि धर्मराजोऽर्दयद् भृशम् ।

तदनन्तर पाँच बाणोंसे धर्मराजने राजा दुर्योधनको भी गहरी चोट पहुँचायी ॥ ६३ ॥

पृष्ठ 1765

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हताश्वात्तु रथात्तस्मादवप्लुत्य सुतस्तव ॥ ७ ॥

उत्तमं व्यसनं प्राप्तो भूमावेवावतिष्ठत । उस अश्वहीन रथसे कूदकर आपका पुत्र भारी संकटमें पड़नेपर भी वहाँ पृथ्वीपर ही खड़ा रहा ( युद्ध छोड़कर भागा नहीं) ॥ ७३ ॥

तं तु कृच्छ्रगतं दृष्ट्वा कर्णद्रौणिकृपादयः ॥ ८ ॥

अभ्यवर्तन्त सहसा परीप्सन्तो नराधिपम् । उसे संकटमें पड़ा देख कर्ण, अश्वत्थामा तथा कृपाचार्य आदि वीर अपने राजाकी रक्षा चाहते हुए सहसा युधिष्ठिरके सामने आ पहुँचे ॥ ८३ ॥

अथ पाण्डुसुताः सर्वे परिवार्य युधिष्ठिरम् ॥ ९ ॥

अन्वयुः समरे राजंस्ततो युद्धमवर्तत । राजन्! तत्पश्चात् समस्त पाण्डव भी युधिष्ठिरको सब ओरसे घेरकर उनका अनुसरण करने लगे; फिर तो दोनों दलोंमें भारी युद्ध छिड़ गया ॥ ९ ३ ॥ ततस्तूर्यसहस्राणि प्रावाद्यन्त महामृधे ॥ १० ॥

ततः किलकिलाशब्दाः प्रादुरासन् महीपते । भूपाल! तदनन्तर उस महासमरमें सहस्रों बाजे बजने लगे और वहाँ किलकिलाहटकी आवाज गूँज उठी ॥ १० ॥

यत्राभ्यगच्छन् समरे पञ्चालाः कौरवैः सह ॥ ११ ॥

नरा नरैः समाजग्मुर्वारणा वरवारणैः ।

रथाश्च रथिभिः सार्धं हयाश्च हयसादिभिः ॥ १२ ॥

उस युद्धमें समस्त पांचाल कौरवोंके साथ भिड़ गये । पैदल पैदलोंके, हाथी हाथियोंके, रथी रथियोंके और घुड़सवार घुड़सवारोंके साथ युद्ध करने लगे ॥ ११-१२ ॥

द्वन्द्वान्यासन् महाराज प्रेक्षणीयानि संयुगे ।

विविधान्यप्यचिन्त्यानि शस्त्रवन्त्युत्तमानि च ॥ १३ ॥

महाराज! उस रणभूमिमें होनेवाले नाना प्रकारके अचिन्तनीय, शस्त्रयुक्त तथा उत्तम द्वन्द्वयुद्ध देखने ही योग्य थे ॥ १३ ॥

ते शूराः समरे सर्वे चित्रं लघु च सुष्ठु च ।

अयुध्यन्त महावेगाः परस्परवधैषिणः ॥ १४ ॥

वे महान् वेगशाली समस्त शूरवीर समरांगणमें एक- दूसरेके वधकी इच्छासे विचित्र, शीघ्रतापूर्ण तथा सुन्दर रीतिसे युद्ध करने लगे ॥ १४ ॥

अन्योन्यं समरे जघ्नुर्योधव्रतमनुष्ठिताः ।

न हि ते समरं चक्रुः पृष्ठतो वै कथञ्चन ॥ १५ ॥

वीर योद्धा व्रतका पालन करते हुए युद्धस्थलमें एक- दूसरेको मारते थे । उन्होंने किसी तरह भी युद्धमें पीठ नहीं दिखायी ॥ १५ ॥

पृष्ठ 1766

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मुहूर्तमेव तद् युद्धमासीन्मधुरदर्शनम् ।

तत उन्मत्तवद् राजन् निर्मर्यादमवर्तत ॥ १६ ॥

राजन्! दो ही घड़ीतक वह युद्ध देखनेमें मधुर जान पड़ा । फिर तो वहाँ उन्मत्तके समान मर्यादाशून्य बर्ताव होने लगा ॥ १६ ॥

रथी नागं समासाद्य दारयन् निशितैः शरैः ।

प्रेषयामास कालाय शरैः संनतपर्वभिः ॥ १७ ॥

रथी हाथीका सामना करके झुकी हुई गाँठवाले तीखे बाणोंद्वारा उसे विदीर्ण करते हुए कालके गालमें भेजने लगे ॥ १७ ॥

नागा हयान् समासाद्य विक्षिपन्तो बहून् रणे ।

दारयामासुरत्युग्रं तत्र तत्र तदा तदा ॥ १८ ॥

हाथी बहुत- से घोड़ोंको पकड़- पकड़कर रणभूमिमें इधर- उधर फेंकने और विदीर्ण करने लगे । उससे वहाँ उस समय बड़ा भयंकर दृश्य उपस्थित हो गया ॥ १८ ॥

हयारोहाश्च बहवः परिवार्य गजोत्तमान् ।

तलशब्दरवांश्चक्रुः सम्पतन्तस्ततस्ततः ॥ १ ९ ॥

धावमानांस्ततस्तांस्तु द्रवमाणान् महागजान् ।

पार्श्वतः पृष्ठतश्चैव निजघ्नुर्हयसादिनः ॥ २० ॥

बहुत - से घुड़सवार उत्तम गजराजोंको चारों ओर से घेरकर इधर - उधर दौड़ने और ताली पीटने लगे । इससे जब वे विशालकाय हाथी दौड़ने और भागने लगते, तब वे घुड़सवार अगल- बगलसे और पीछेकी ओरसे उनपर बाणोंकी चोट करते थे ॥ १ ९ -२० ॥

विद्राव्य च बहूनश्वान् नागा राजन् मदोत्कटाः ।

विषाणैश्चापरे जघ्नुर्ममृदुश्चापरे भृशम् ॥ २१ ॥

राजन्! कितने ही मदोन्मत्त हाथी भी बहुत- से घोड़ोंको खदेड़कर उन्हें दाँतोंसे दबाकर मार डालते अथवा वेगपूर्वक पैरोंसे कुचल डालते थे ॥ २१ ॥

साश्वारोहांश्च तुरगान् विषाणैर्विव्यधू रुषा ।

अपरे चिक्षिपुर्वेगात् प्रगृह्यातिबलास्तदा ॥ २२ ॥

कितने ही हाथियोंने रोषमें भरकर सवारोंसहित घोड़ोंको अपने दाँतोंसे विदीर्ण कर डाला तथा कुछ अत्यन्त बलवान् गजराजोंने उन घोड़ोंको पकड़कर वेगपूर्वक दूर फेंक दिया ॥ २२ ॥

पादातैराहता नागा विवरेषु समन्ततः ।

चक्रुरार्तस्वरं घोरं दुद्रुवुश्च दिशो दश ॥ २३ ॥

प्रहारका अवसर मिलनेपर पैदल सैनिक भी चारों ओरसे हाथियोंको गहरी चोट पहुँचाते और वे घोर आर्तनाद करते हुए सम्पूर्ण दिशाओंकी ओर भाग जाते थे ॥ २३ ॥

पदातीनां तु सहसा प्रद्रुतानां महाहवे ।

पृष्ठ 1767

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उत्सृज्याभरणं तूर्णमवप्लुत्य रणाजिरे ॥ २४ ॥

निमित्तं मन्यमानास्तु परिणाम्य महागजाः ।

जगृहुर्बिभिदुश्चैव चित्राण्याभरणानि च ॥ २५ ॥

पैदल सैनिक युद्धस्थलमें अपने आभूषण त्यागकर तुरंत उछल-उछलकर बड़े वेगसे भागने लगे । उस समय सहसा भागते हुए उन पैदलोंके उन विचित्र आभूषणोंको अपने ऊपर प्रहार होनेमें निमित्त मानकर हाथी उन्हें सूँड़से उठा लेते और फिर दाँतोंसे दबाकर फोड़ डालते थे ॥ २४-२५ ॥

तांस्तु तत्र प्रसक्तान् वै परिवार्य पदातयः ।

हस्त्यारोहान् निजघ्नुस्ते महावेगा बलोत्कटाः ॥ २६ ॥

इस प्रकार आभूषणोंमें उलझे हुए उन हाथियों और उनके सवारोंको चारों ओरसे घेरकर महान् वेगशाली तथा बलोन्मत्त पैदल योद्धा मार डालते थे ॥ २६ ॥

अपरे हस्तिभिर्हस्तैः खं विक्षिप्ता महाहवे ।

निपतन्तो विषाणाग्रैर्भृशं विद्धाः सुशिक्षितैः ॥ २७ ॥

कितने ही पैदल सैनिक उस महासमरमें सुशिक्षित हाथियोंकी सूँड़ोंसे आकाशमें फेंक दिये जाते और उधरसे गिरते समय उन हाथियोंके दन्ताग्रभागोंद्वारा अत्यन्त विदीर्ण कर दिये जाते थे ॥ २७ ||

अपरे सहसा गृह्य विषाणैरेव सूदिताः ।

सेनान्तरं समासाद्य केचित् तत्र महागजैः ॥ २८ ॥

क्षुण्णगात्रा महाराज विक्षिप्य च पुनः पुनः ।

अपरे व्यजनानीव विभ्राम्य निहता मृधे ॥ २ ९ ॥

कितने ही योद्धा हाथियोंद्वारा पकड़े जाकर उनके दाँतोंसे ही मार डाले गये । महाराज! बहुत- से विशालकाय गजराज सेनाके भीतर घुसकर कितने ही पैदलोंको सहसा पकड़कर उनके शरीरोंको बारंबार पटक- झटककर चूर-चूर कर देते और कितनोंको व्यजनोंके समान घुमाकर युद्धमें मार डालते थे ॥ २८-२९ ॥

पुरःसराश्च नागानामपरेषां विशाम्पते ।

शरीराण्यतिविद्धानि तत्र तत्र रणाजिरे ॥ ३० ॥

प्रजानाथ! जो हाथियोंके आगे चलनेवाले पैदल थे, वे दूसरे पक्षके हाथियोंके शरीरोंको जहाँ - तहाँ रणभूमिमें अत्यन्त घायल कर देते थे ॥ ३० ॥

प्रतिमानेषु कुम्भेषु दन्तवेष्टेषु चापरे ।

निगृहीता भृशं नागाः प्रासतोमरशक्तिभिः ॥ ३१ ॥

कहीं- कहीं पैदल सैनिक प्रास, तोमर और शक्तिद्वारा शत्रुपक्षके हाथियोंके दोनों दाँतोंके बीचके स्थानमें, कुम्भस्थलमें और ओठोंके ऊपर प्रहार करके उन्हें अत्यन्त काबूमें कर लेते थे ॥ ३१ ॥

पृष्ठ 1768

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निगृह्य च गजाः केचित् पार्श्वस्थैर्भृशदारुणैः ।

रथाश्वसादिभिस्तत्र सम्भिन्ना न्यपतन् भुवि ॥ ३२ ॥

कितने ही हाथियोंको अवरुद्ध करके पार्श्वभागमें खड़े हुए अत्यन्त भयंकर रथी और घुड़सवार उन्हें बाणोंसे विदीर्ण कर डालते, जिससे वे हाथी वहीं पृथ्वीपर गिर जाते थे ॥ ३२ ॥

सहसा सादिनस्तत्र तोमरेण महामृधे ।

भूमावमृद्नन् वेगेन सचर्माणं पदातिनम् ॥ ३३ ॥

उस महासमरमें कितने ही हाथीसवार सहसा तोमरका प्रहार करके ढालसहित पैदल योद्धाको गिराकर उसे वेगपूर्वक धरतीपर रौंद डालते थे ॥ ३३ ॥

तथा सावरणान् कांश्चित्तत्र तत्र विशाम्पते ।

रथान् नागाः समासाद्य परिगृह्य च मारिष ॥ ३४ ॥

व्याक्षिपन् सहसा तत्र घोररूपे भयानके ।

नाराचैर्निहताश्चापि गजाः पेतुर्महाबलाः ॥ ३५ ॥

पर्वतस्येव शिखरं वज्ररुग्णं महीतले । माननीय नरेश! उस घोर एवं भयानक युद्धमें कितने ही हाथी निकट आकर अपनी सूँड़ोंसे कुछ आवरणयुक्त रथोंको पकड़ लेते और उन्हें वेगपूर्वक खींचकर सहसा दूर फेंक देते थे । फिर वे महाबली हाथी भी नाराचोंसे मारे जाकर वज्रके तोड़े हुए पर्वत - शिखरकी भाँति पृथ्वीपर गिर पड़ते थे ॥ ३४-३५३ ॥ योधा योधान् समासाद्य मुष्टिभिर्व्यहनन् युधि ॥ ३६ ॥

केशेष्वन्योन्यमाक्षिप्य चिक्षिपुर्बिभिदुश्च ह । बहुत - से पैदल योद्धा दूसरे योद्धाओंको निकट पाकर युद्धस्थलमें उनपर मुक्कोंसे प्रहार करने लगते थे । कितने ही एक- दूसरेकी चुटिया पकड़कर परस्पर झटकते- फेंकते और एक-दूसरेको घायल करते थे ॥ ३६३ ॥

उद्यम्य च भुजावन्यो निक्षिप्य च महीतले ॥ ३७ ॥

पदा चोरः समाक्रम्य स्फुरतोऽपाहरच्छिरः । दूसरा योद्धा अपनी दोनों भुजाओंको उठाकर उनके द्वारा शत्रुको पृथ्वीपर पटक देता और एक पैरसे उसकी छातीको दबाकर उसके छटपटाते रहनेपर भी उसका सिर काट लेता था ॥ ३७ ॥

पततश्चापरो राजन् विजहारासिना शिरः ॥ ३८ ॥

जीवतश्च तथैवान्यः शस्त्रं काये न्यमज्जयत् । राजन्! दूसरा सैनिक किसी गिरते हुए योद्धाका सिर अपनी तलवारसे काट लेता था और कोई जीवित शत्रुके ही शरीरमें अपना शस्त्र घुसेड़ देता था ॥ ३८३ ॥

मुष्टियुद्धं महच्चासीद् योधानां तत्र भारत ॥ ३ ९ ॥

पृष्ठ 1769

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तथा केशग्रहश्चग्रो बाहुयुद्धं च भैरवम् । भारत! वहाँ योद्धाओंमें बहुत बड़ा मुष्टियुद्ध हो रहा था। साथ ही भयंकर केशग्रहण और भयानक बाहुयुद्ध भी चालू था ॥ ३ ९ ३ ॥ समासक्तस्य चान्येन अविज्ञातस्तथापरः ॥ ४० ॥

जहार समरे प्राणान् नानाशस्त्रैरनेकधा । कोई- कोई योद्धा दूसरेके साथ उलझे हुए सैनिकसे स्वयं अपरिचित रहकर नाना प्रकारके अनेक अस्त्र- शस्त्रोंद्वारा युद्धमें उसके प्राण हर लेता था ॥ ४० ॥

संसक्तेषु च योधेषु वर्तमाने च संकुले ॥ ४१ ॥

कबन्धान्युत्थितानि स्युः शतशोऽथ सहस्रशः । इस प्रकार जब सभी योद्धा युद्धमें लगे थे और तुमुल संग्राम चल रहा था, उस समय सैकड़ों और हजारों कबन्ध ( धड़) उठ खड़े हुए थे ॥ ४१३ ॥

शोणितैः सिच्यमानानि शस्त्राणि कवचानि च ॥ ४२ ॥

महारागानुरक्तानि वस्त्राणीव चकाशिरे । खूनसे भीगे हुए शस्त्र और कवच गाढ़े रंगमें रँगे हुए वस्त्रोंके समान सुशोभित होते थे ॥ ४२ ॥

एवमेतन्महद् युद्धं दारुणे शस्त्रसंकुलम् ॥ ४३ ॥

उन्मत्तगङ्गाप्रतिमं शब्देनापूरयज्जगत् । इस प्रकार अस्त्र - शस्त्रोंसे परिपूर्ण यह महाभयानक युद्ध बढ़ी हुई गंगाके समान जगत्को कोलाहलसे परिपूर्ण कर रहा था ॥ ४३३ ॥

नैव स्वे न परे राजन् विज्ञायन्ते शरातुराः ॥ ४४ ॥

योद्धव्यमिति युध्यन्ते राजानो जयगृद्धिनः । राजन्! बाणोंकी चोटसे व्याकुल हुए अपने और पराये योद्धा पहचानमें नहीं आते थे । विजयकी अभिलाषा रखनेवाले राजालोग– ' युद्ध करना अपना कर्तव्य है ' यह समझकर जूझ रहे थे ॥ ४४३ ॥

स्वान् स्वे जघ्नुर्महाराज परांश्चैव समागतान् ॥ ४५ ॥

उभयोः सेनयोर्वीरैर्व्याकुलं समपद्यत । महाराज! सामने आये हुए अपने और शत्रुपक्षके योद्धाओंको भी अपने ही पक्षके लोग मार डालते थे । दोनों सेनाओंके वीर मर्यादाशून्य युद्धमें प्रवृत्त हो गये थे ॥ ४५३ ॥

रथैर्भग्नैर्महाराज वारणैश्च निपातितैः ॥ ४६ ॥

हयैश्च पतितैस्तत्र नरैश्च विनिपातितैः ।

अगम्यरूपा पृथिवी क्षणेन समपद्यत ॥ ४७ ॥

पृष्ठ 1770

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राजेन्द्र! टूटे हुए रथों, धराशायी हुए हाथियों, मरकर गिरे हुए घोड़ों और गिराये गये पैदल सैनिकोंसे क्षणभरमें यह पृथ्वी ऐसी हो गयी कि वहाँ चलना- फिरना असम्भव हो गया ॥ ४६-४७ ॥

क्षणेनासीन्महीपाल क्षतजैघिप्रवर्तिनी ।

पञ्चालानहनत् कर्णस्त्रिगर्तांश्च धनंजयः ॥ ४८ ॥

भूपाल! क्षणभरमें वहाँ भूतलपर खूनकी नदी बह चली। कर्णने पंचालोंका और अर्जुनने त्रिगर्तोंका संहार कर डाला ॥ ४८ ॥

भीमसेनः कुरून् राजन् हस्त्यनीकं च सर्वशः ।

एवमेष क्षयो वृत्तः कुरुपाण्डवसेनयोः ।

अपराह्णे गते सूर्ये काङ्क्षतां विपुलं यशः ॥ ४ ९ ॥

राजन्! भीमसेनने कौरवों तथा आपकी गजसेनाको सर्वथा नष्ट कर दिया । इस प्रकार सूर्यदेवके अपराह्नकालमें जाते -जाते कौरव और पाण्डव दोनों सेनाओंमें महान् यशकी अभिलाषा रखनेवाले वीरोंका यह विनाश- कार्य सम्पन्न हुआ ॥ ४ ९ ॥ इति श्रीमहाभारते कर्णपर्वणि संकुलयुद्धे अष्टाविंशोऽध्यायः ॥ २८ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत कर्णपर्वमें संकुल-युद्धविषयक अट्ठाईसवाँअध्याय पूरा हुआ ॥ २८ ॥