श्रीगणेशाय नमः।
महाभारत — खण्ड ४ — पृष्ठ 1951–1960
महाभारत — खण्ड ४ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1951–1960
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राजेन्द्र! विजयकी अभिलाषा रखनेवाले इन प्रमुख वीरों तथा दूसरोंने भी उस महासमरमें महाधनुर्धर सूतपुत्र कर्णको बाणोंद्वारा पीड़ित कर दिया ॥ ५५ ॥
तान् सूतपुत्रो विशिखैर्दशभिर्दशभिः शरैः ।
रथेनानुचरन् वीरः प्रत्यविध्यदरिंदमः ॥ ५६ ॥
रथसे विचरनेवाले शत्रुदमन वीर सूतपुत्र कर्णने भी उन सबको दस - दस बाणोंसे घायल कर दिया ॥ ५६ ॥
तत्रास्त्रवीर्यं कर्णस्य लाघवं च महात्मनः ।
अपश्याम महाभाग तदद्भुतमिवाभवत् ॥ ५७ ॥
महाभाग! हमने महामना कर्णके अस्त्र बल और फुर्तीको वहाँ अपनी आँखों देखा था ।
वह सब कुछ अद्भुत - सा प्रतीत होता था ॥ ५७ ॥
न ह्याददानं ददृशुः संदधानं च सायकान् ।
विमुञ्चन्तं च संरम्भादपश्यन्त हतानरीन् ॥ ५८ ॥
वह कब तरकससे बाण निकालता है, कब धनुषपर रखता है और कब क्रोधपूर्वक शत्रुओंपर छोड़ देता है, यह सब किसीने नहीं देखा । सब लोग मारे जाते हुए शत्रुओंको ही देखते थे ॥ ५८ ॥
( प्रतीच्यां दिशि तं दृष्ट्वा प्राच्यां पश्याम लाघवात् ।
न तं पश्याम राजेन्द्र क्व नु कर्णोऽधितिष्ठति ॥
राजेन्द्र! हमलोग एक ही क्षणमें कर्णको पश्चिम दिशामें देखकर उसकी फुर्तीके कारण उसे पूर्व दिशामें भी देखते थे । इस समय कर्ण कहाँ खड़ा है, यह हमलोग नहीं देख पाते थे । इषूनेव स्म पश्यामो विनिकीर्णान् समन्ततः । छादयानान् दिशो राजञ्शलभानामिव व्रजान् ॥ ) राजन्! सब ओर बिखरे हुए उसके बाण ही हमें दिखायी देते थे, जो टिड्डीदलोंके समान सम्पूर्ण दिशाओंको आच्छादित किये रहते थे ।
द्यौर्वियद्भूर्दिशश्चैव प्रपूर्णा निशितैः शरैः ।
अरुणाभ्रावृताकारं तस्मिन् देशे बभौ वियत् ॥ ५ ९ ॥
द्युलोक, आकाश, भूमि और सम्पूर्ण दिशाएँ पैने बाणोंसे खचाखच भर गयी थीं । उस प्रदेशमें आकाश अरुण रंगके बादलोंसे ढका हुआ - सा जान पड़ता था ॥ ५ ९ ॥
नृत्यन्निव हि राधेयश्चापहस्तं प्रतापवान् ।
यैर्विद्धः प्रत्यविद्ध्यत् तानेकैकं त्रिगुणैः शरैः ॥ ६० ॥
प्रतापी राधापुत्र कर्ण हाथमें धनुष लेकर नृत्य- सा कर रहा था । जिन -जिन योद्धाओंने उसे एक बाणसे घायल किया, उनमेंसे प्रत्येकको उसने तीन गुने बाणोंसे बींध डाला ॥ ६० ॥
दशभिर्दशभिश्चैतान् पुनर्विद्ध्वा ननाद च ।
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साश्वसूतरथच्छत्रांस्ततस्ते विवरं ददुः ॥ ६१ ॥
फिर दस - दस बाणोंसे घोड़ों, सारथि, रथ और छत्रोंसहित इन सबको घायल करके कर्णने सिंहके समान दहाड़ना आरम्भ किया । फिर तो उन शत्रुओंने उसे आगे बढ़नेके लिये जगह दे दी ॥ ६१ ॥
तान् प्रमथ्य महेष्वासान् राधेयः शरवृष्टिभिः ।
राजानीकमसम्बाधं प्राविशच्छत्रुकर्शनः ॥ ६२ ॥
शत्रुओंका संहार करनेवाले राधापुत्र कर्णने अपने बाणोंकी वर्षाद्वारा उन महाधनुर्धरोंको रौंदकर राजा युधिष्ठिरकी सेनामें बेरोक- टोक प्रवेश किया ॥ ६२ ॥
स रथांस्त्रिशतं हत्वा चेदीनामनिवर्तिनाम् ।
राधेयो निशितैर्बाणैस्ततोऽभ्यार्च्छद् युधिष्ठिरम् ॥ ६३ ॥
उसने युद्धसे पीछे न हटनेवाले तीन सौ चेदिदेशीय रथियोंको अपने पैने बाणोंद्वारा मारकर युधिष्ठिरपर आक्रमण किया ॥ ६३ ॥
ततस्ते पाण्डवा राजन् शिखण्डी च ससात्यकिः ।
राधेयात् परिरक्षन्तो राजानं पर्यवारयन् ॥ ६४ ॥
राजन्! तब पाण्डवों, शिखण्डी और सात्यकिने राधापुत्र कर्णसे राजा युधिष्ठिरकी रक्षा करनेके लिये उन्हें चारों ओरसे घेर लिया ॥ ६४ ॥
तथैव तावकाः सर्वे कर्णं दुर्वारणं रणे ।
यत्ताः शूरा महेष्वासाः पर्यरक्षन्त सर्वशः ॥ ६५ ॥
इसी प्रकार आपके सभी महाधनुर्धर शूरवीर योद्धा रणमें अनिवार्य गतिसे विचरनेवाले कर्णकी सब ओरसे प्रयत्नपूर्वक रक्षा करने लगे ॥ ६५ ॥
नानावादित्रघोषाश्च प्रादुरासन् विशाम्पते ।
सिंहनादश्च संजज्ञे शूराणामभिगर्जताम् ॥ ६६ ॥
प्रजानाथ! उस समय नाना प्रकारके रणवाद्योंकी ध्वनि होने लगी और सब ओरसे गर्जना करनेवाले शूरवीरोंका सिंहनाद सुनायी देने लगा ॥ ६६ ॥
ततः पुनः समाजग्मुरभीताः कुरुपाण्डवाः ।
युधिष्ठिरमुखाः पार्थाः सूतपुत्रमुखा वयम् ॥ ६७ ॥
तदनन्तर पुनः कौरव और पाण्डव योद्धा निर्भय होकर एक- दूसरे से भिड़ गये । एक ओर युधिष्ठिर आदि कुन्तीपुत्र थे और दूसरी ओर कर्ण आदि हमलोग ॥ इति श्रीमहाभारते कर्णपर्वणि संकुलयुद्धे अष्टचत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ४८ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत कर्णपर्वमें संकुलयुद्धविषयक अड़तालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ४८ ॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठके ५३ श्लोक मिलाकर कुल ७२ श्लोक हैं )
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एकोनपञ्चाशत्तमोऽध्यायः कर्ण और युधिष्ठिरका संग्राम, कर्णकी मूर्च्छा, कर्णद्वारा युधिष्ठिरकी पराजय और तिरस्कार तथा पाण्डवोंके हजारों योद्धाओंका वध और रक्त- नदीका वर्णन तथा पाण्डव महारथियोंद्वारा कौरव सेनाका विध्वंस और उसका पलायन संजय उवाच
विदार्य कर्णस्तां सेनां युधिष्ठिरमथाद्रवत् ।
रथहस्त्यश्वपत्तीनां सहस्रैः परिवारितः ॥ १ ॥
संजय कहते हैं— राजन्! सहस्रों रथ, हाथी, घोड़े और पैदलोंसे घिरे हुए कर्णने उस सेनाको विदीर्ण करके युधिष्ठिरपर धावा किया ॥ १ ॥
नानायुधसहस्राणि प्रेरितान्यरिभिर्वृषः ।
छित्त्वा बाणशतैरुग्रैस्तानविध्यदसम्भ्रमात् ॥ २ ॥
धर्मात्मा कर्णने शत्रुओंके चलाये हुए नाना प्रकारके हजारों अस्त्र - शस्त्रोंको काटकर उन सबको सैकड़ों उग्र बाणोंद्वारा बिना किसी घबराहटके बींध डाला ॥ २ ॥
निचकर्त शिरांस्येषां बाहूनूरूंश्च सूतजः ।
ते हता वसुधां पेतुर्भग्नाश्चान्ये विदुद्रुवुः ॥ ३ ॥
सूतपुत्रने पाण्डव- सैनिकोंके मस्तकों, भुजाओं और जाँघोंको काट डाला । वे मरकर पृथ्वीपर गिर पड़े और दूसरे बहुत- से योद्धा घायल होकर भाग गये ॥ ३ ॥
द्राविडास्तु निषादास्तु पुनः सात्यकिचोदिताः ।
अभ्यद्रवञ्जिघांसन्तः पत्तयः कर्णमाहवे ॥ ४ ॥
तब सात्यकिसे प्रेरित होकर द्रविड और निषाद देशोंके पैदल सैनिक कर्णको युद्धमें मार डालनेकी इच्छासे पुनः उसपर टूट पड़े ॥ ४ ॥
ते विबाहुशिरस्त्राणाः प्रहताः कर्णसायकैः ।
पेतुः पृथिव्यां युगपच्छिन्नं शालवनं यथा ॥ ५ ॥
परंतु कर्णके बाणोंसे घायल होकर बाहु, मस्तक और कवच आदिसे रहित हो वे कटे हुए शालवनके समान एक साथ ही पृथ्वीपर गिर पड़े ॥ ५ ॥
एवं योधशतान्याजौ सहस्राण्ययुतानि च ।
हतानीयुर्महीं देहैर्यशसा पूरयन् दिशः ॥ ६ ॥
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इस प्रकार युद्धस्थलमें मारे गये सैकड़ों, हजार और दस हजार योद्धा शरीरसे तो इस पृथ्वीपर गिर पड़े, किंतु अपने यशसे उन्होंने सम्पूर्ण दिशाओंको पूर्ण कर दिया ॥
अथ वैकर्तनं कर्णं रणे क्रुद्धमिवान्तकम् ।
रुरुधुः पाण्डुपाञ्चाला व्याधिं मन्त्रौषधैरिव ॥ ७ ॥
तदनन्तर रणक्षेत्रमें कुपित हुए यमराजके समान वैकर्तन कर्णको पाण्डवों और पांचालोंने अपने बाणोंद्वारा उसी प्रकार रोक दिया, जैसे चिकित्सक मन्त्रों और औषधोंसे रोगोंकी रोकथाम कर लेते हैं ॥ ७ ॥
स तान् प्रमृद्याभ्यपतत् पुनरेव युधिष्ठिरम् ।
मन्त्रौषधिक्रियातीतो व्याधिरत्युल्बणो यथा ॥ ८ ॥
परंतु मन्त्र और ओषधियोंकी क्रियासे असाध्य भयानक रोगकी भाँति कर्णने उन सबको रौंदकर पुनः युधिष्ठिरपर ही आक्रमण किया ॥ ८ ॥
स राजगृद्धि भी रुद्धः पाण्डुपाञ्चालकेकयैः ।
नाशकत् तानतिक्रान्तुं मृत्युर्ब्रह्मविदो यथा ॥ ९ ॥
राजाकी रक्षा चाहनेवाले पाण्डवों, पांचालों और केकयोंने पुनः कर्णको रोक दिया । जैसे मृत्यु ब्रह्मवेत्ताओंको नहीं लाँघ सकती, उसी प्रकार कर्ण उन सबको लाँघकर आगे न बढ़ सका ॥ ९ ॥
ततो युधिष्ठिरः कर्णमदूरस्थं निवारितम् ।
अब्रवीत् परवीरघ्नं क्रोधसंरक्तलोचनः ॥ १० ॥
उस समय युधिष्ठिरने क्रोधसे लाल आँखें करके शत्रुवीरोंका संहार करनेवाले कर्णसे जो पास ही रोक दिया गया था, इस प्रकार कहा— ॥ १० ॥
कर्ण कर्ण वृथादृष्टे सूतपुत्र वचः शृणु ।
सदा स्पर्धसि संग्रामे फाल्गुनेन तरस्विना ॥ ११ ॥
तथास्मान् बाधसे नित्यं धार्तराष्ट्रमते स्थितः । ‘ कर्ण! कर्ण! मिथ्यादर्शी सूतपुत्र! मेरी बात सुनो । तुम संग्राममें वेगशाली वीर अर्जुनके साथ सदा डाह रखते और दुर्योधनके मतमें रहकर सर्वदा हमें बाधा पहुँचाते हो ॥ ११३ ॥
यद् बलं यच्च ते वीर्यं प्रद्वेषो यस्तु पाण्डुषु ॥ १२ ॥
तत् सर्वं दर्शयस्वाद्य पौरुषं महदास्थितः ।
युद्धश्रद्धां च तेऽद्याहं विनेष्यामि महाहवे ॥ १३ ॥
‘ परंतु आज तुम्हारे पास जितना बल हो, जो पराक्रम हो तथा पाण्डवोंके प्रति तुम्हारे मनमें जो विद्वेष हो, वह सब महान् पुरुषार्थका आश्रय लेकर दिखाओ । आज महासमरमें मैं तुम्हारा युद्धका हौसला मिटा दूँगा' ॥ १२-१३ ॥
एवमुक्त्वा महाराज कर्णं पाण्डुसुतस्तदा ।
सुवर्णपुङ्खैर्दशभिर्विव्याधायस्मयैः शरैः ॥ १४ ॥
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महाराज! ऐसा कहकर पाण्डुपुत्र युधिष्ठिरने लोहेके बने हुए सुवर्णपंखयुक्त दस बाणोंद्वारा कर्णको बींध डाला ॥
तं सूतपुत्रो दशभिः प्रत्यविध्यदरिंदमः ।
वत्सदन्तैर्महेष्वासः प्रहसन्निव भारत ॥ १५ ॥
भारत! तब शत्रुओंका दमन करनेवाले महाधनुर्धर सूतपुत्रने हँसते हुए- से वत्सदन्त नामक दस बाणोंद्वारा युधिष्ठिरको घायल कर दिया ॥ १५ ॥
सोऽवज्ञाय तु निर्विद्धः सूतपुत्रेण मारिष ।
प्रजज्वाल ततः क्रोधाद्धविषेव हुताशनः ॥ १६ ॥
माननीय नरेश! सूतपुत्रके द्वारा अवज्ञापूर्वक घायल किये जानेपर फिर राजा युधिष्ठिर घीकी आहुतिसे प्रज्वलित हुई अग्निके समान क्रोधसे जल उठे ॥ १६ ॥
ज्वालामालापरिक्षिप्तो राज्ञो देहो व्यदृश्यत ।
युगान्ते दग्धुकामस्य संवर्ताग्नेरिवापरः ॥ १७ ॥
ज्वालामालाओंसे घिरा हुआ युधिष्ठिरका शरीर प्रलयकालमें जगत्को दग्ध करनेकी इच्छावाले द्वितीय संवर्तक अग्निके समान दिखायी देता था ॥ १७ ॥
ततो विस्फार्य सुमहच्चापं हेमपरिष्कृतम् ।
समाधत्त शितं बाणं गिरीणामपि दारणम् ॥ १८ ॥
तदनन्तर उन्होंने अपने सुवर्णभूषित विशाल धनुषको फैलाकर उसपर पर्वतोंको भी विदीर्ण कर देनेवाले तीखे बाणका संधान किया ॥ १८ ॥
ततः पूर्णायतोत्कृष्टं यमदण्डनिभं शरम् ।
मुमोच त्वरितो राजा सूतपुत्रजिघांसया ॥ १ ९ ॥
तत्पश्चात् राजा युधिष्ठिरने सूतपुत्रको मार डालनेकी इच्छासे तुरंत ही धनुषको पूर्णरूपसे खींचकर वह यमदण्डके समान बाण उसके ऊपर छोड़ दिया ॥ १ ९ ॥
स तु वेगवता मुक्तो बाणो वज्राशनिस्वनः ।
विवेश सहसा कर्णं सव्ये पार्श्वे महारथम् ॥ २० ॥
वेगवान् युधिष्ठिरका छोड़ा हुआ वज्र और बिजलीके समान शब्द करनेवाला वह बाण सहसा महारथी कर्णकी बायीं पसलीमें घुस गया ॥ २० ॥
स तु तेन प्रहारेण पीडितः प्रमुमोह वै ।
स्रस्तगात्रो महाबाहुर्धनुरुत्सृज्य स्यन्दने ॥ २१ ॥
उस प्रहारसे पीड़ित हो महाबाहु कर्ण धनुष छोड़कर रथपर ही मूर्च्छित हो गया ।
उसका सारा शरीर शिथिल हो गया था ॥ २१ ॥
गतासुरिव निश्चेताः शल्यस्याभिमुखोऽपतत् ।
राजापि भूयो नाजघ्ने कर्णं पार्थहितेप्सया ॥ २२ ॥
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वह शल्यके सामने ही अचेत होकर ऐसे गिर पड़ा, मानो उसके प्राण निकल गये हों ।
राजा युधिष्ठिरने अर्जुनके हितकी इच्छासे कर्णपर पुनः प्रहार नहीं किया ॥ २२ ॥
ततो हाहाकृतं सर्वं धार्तराष्ट्रबलं महत् ।
विवर्णमुखभूयिष्ठं कर्णं दृष्ट्वा तथागतम् ॥ २३ ॥
तब कर्णको उस अवस्थामें देखकर दुर्योधनकी सारी विशाल सेनामें हाहाकार मच गया और अधिकांश सैनिकोंके मुखका रंग विषादसे फीका पड़ गया ॥ २३ ॥
सिंहनादश्च संजज्ञे क्ष्वेलाः किलकिलास्तथा ।
पाण्डवानां महाराज दृष्ट्वा राज्ञः पराक्रमम् ॥ २४ ॥
महाराज! राजाका वह पराक्रम देखकर पाण्डव - सैनिकोंमें सिंहनाद, आनन्द, कलरव और किलकिल शब्द होने लगा ॥ २४ ॥
प्रतिलभ्य तु राधेयः संज्ञां नातिचिरादिव ।
दधे राजविनाशाय मनः क्रूरपराक्रमः ॥ २५ ॥
तब क्रूर पराक्रमी राधापुत्र कर्णने थोड़ी ही देरमें होशमें आकर राजा युधिष्ठिरको मार डालने का विचार किया ॥
स हेमविकृतं चापं विस्फार्य विजयं महत् ।
अवाकिरदमेयात्मा पाण्डवं निशितैः शरैः ॥ २६ ॥
उस अमेय आत्मबलसे सम्पन्न वीरने विजय नामक अपने विशाल सुवर्णजटित धनुषको खींचकर पाण्डुपुत्र युधिष्ठिरको पैने बाणोंसे ढक दिया ॥ २६ ॥
ततः क्षुराभ्यां पाञ्चाल्यौ चक्ररक्षौ महात्मनः ।
जघान चन्द्रदेवं च दण्डधारं च संयुगे ॥ २७ ॥
तत्पश्चात् दो क्षुरोंसे महात्मा युधिष्ठिरके चक्ररक्षक दो पांचाल वीर चन्द्रदेव और दण्डधारको युद्धस्थलमें मार डाला ॥ २७ ॥
तावुभौ धर्मराजस्य प्रवीरौ परिपार्श्वतः ।
रथाभ्याशे चकाशेते चन्द्रस्येव पुनर्वसू ॥ २८ ॥
धर्मराजके रथके समीप पार्श्वभागमें वे दोनों प्रमुख पांचाल वीर चन्द्रमाके पास रहनेवाले दो पुनर्वसु नामक नक्षत्रोंके समान प्रकाशित हो रहे थे ॥ २८ ॥
युधिष्ठिरः पुनः कर्णमविद्ध्यत् त्रिंशता शरैः ।
सुषेणं सत्यसेनं च त्रिभिस्त्रिभिरताडयत् ॥ २ ९ ॥
युधिष्ठिरने पुनः तीस बाणोंसे कर्णको बींध डाला तथा सुषेण और सत्यसेनको भी तीन- तीन बाणोंसे घायल कर दिया ॥ २ ९ ॥
शल्यं नवत्या विव्याध त्रिसप्तत्या च सूतजम् ।
तांस्तस्य गोप्तॄन् विव्याध त्रिभिस्त्रिभिरजिह्मगैः ॥ ३० ॥
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उन्होंने शल्यको नब्बे और सूतपुत्र कर्णको तिहत्तर बाण मारे । साथ ही उनके रक्षकोंको सीधे जानेवाले तीन-तीन बाणोंसे बेध दिया ॥ ३० ॥
ततः प्रहस्याधिरथिर्विधुन्वानः स कार्मुकम् ।
भित्त्वा भल्लेन राजानं विद्ध्वा षष्ट्यानदत्तदा ॥ ३१ ॥
तब अधिरथपुत्र कर्णने अपने धनुषको हिलाते हुए हँसकर एक भल्लद्वारा राजा युधिष्ठिरके धनुषको काट दिया और उन्हें भी साठ बाणोंसे घायल करके सिंहके समान गर्जना की ॥ ३१ ॥
ततः प्रवीराः पाण्डूनामभ्यधावन्नमर्षिताः ।
युधिष्ठिरं परीप्सन्तः कर्णमभ्यर्दयञ्छरैः ॥ ३२ ॥
तदनन्तर अमर्षमें भरे हुए प्रमुख पाण्डव वीर युधिष्ठिरकी रक्षाके लिये दौड़े आये और कर्णको अपने बाणोंसे पीड़ित करने लगे ॥ ३२ ॥
सात्यकिश्चेकितानश्च युयुत्सुः पाण्ड्य एव च ।
धृष्टद्युम्नः शिखण्डी च द्रौपदेयाः प्रभद्रकाः ॥ ३३ ॥
यमौ च भीमसेनश्च शिशुपालस्य चात्मजः ।
कारूषा मत्स्यशेषाश्च केकयाः काशिकोसलाः ॥ ३४ ॥
एते च त्वरिता वीरा वसुषेणमताडयन् । सात्यकि, चेकितान, युयुत्सु पाण्ड्य धृष्टद्युम्न, शिखण्डी, द्रौपदीके पाँचों पुत्र, प्रभद्रकगण, नकुल- सहदेव, भीमसेन और शिशुपालपुत्र एवं करूष, मत्स्य, केकय, काशि और कोसल - देशोंके योद्धा - ये सभी वीर सैनिक तुरंत ही वसुषेण ( कर्ण ) को घायल करने लगे ॥ ३३-३४३ ॥ जनमेजयश्च पाञ्चाल्यः कर्णं विव्याध सायकैः ॥ ३५ ॥
वाराहकर्णनाराचैर्नालीकैर्निशितैः शरैः ।
वत्सदन्तैर्विपाठैश्च क्षुरप्रेश्चटकामुखैः ॥ ३६ ॥
नानाप्रहरणैश्चोग्रै रथहस्त्यश्वसादिभिः ।
सर्वतोऽभ्यद्रवत् कर्णं परिवार्य जिघांसया ॥ ३७ ॥
पांचालवीर जनमेजयने रथ, हाथी और घुड़सवारोंकी सेना साथ लेकर सब ओरसे कर्णपर धावा किया और उसे मार डालनेकी इच्छासे घेरकर बाण, वाराहकर्ण, नाराच, नालीक, पैने बाण, वत्सदन्त, विपाठ, क्षुरप्र, चटकामुख तथा नाना प्रकारके भयंकर अस्त्र- शस्त्रोंद्वारा चोट पहुँचाना आरम्भ किया ॥ ३५–३७ ॥
स पाण्डवानां प्रवरैः सर्वतः समभिद्रुतः ।
उदीरयन् ब्राह्ममस्त्रं शरैरापूरयद् दिशः ॥ ३८ ॥
पाण्डवपक्षके प्रमुख वीरोंद्वारा सब ओरसे आक्रान्त होनेपर कर्णने ब्रह्मास्त्र प्रकट करके बाणोंद्वारा सम्पूर्ण दिशाओंको आच्छादित कर दिया ॥ ३८ ॥
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( ततः पुनरमेयात्मा चेदीनां प्रवरान् दश ।
न्यहनद् भरतश्रेष्ठ कर्णो वैकर्तनस्तदा ॥
भरतश्रेष्ठ! तदनन्तर अप्रमेय आत्मबलसे सम्पन्न वैकर्तन कर्णने चेदिदेशके दस प्रधान वीरोंको पुनः मार डाला ।
तस्य बाणसहस्राणि सम्प्रपन्नानि मारिष ।
दृश्यन्ते दिक्षु सर्वासु शलभानामिव व्रजाः ॥
माननीय नरेश! कर्णके गिरते हुए सहस्रों बाण सम्पूर्ण दिशाओंमें टिड्डीदलोंके समान दिखायी देते थे ।
कर्णनामाङ्किता बाणाः स्वर्णपुङ्खाः सुतेजनाः ।
नराश्वकायान् निर्भिद्य पेतुरुर्व्यां समन्ततः ॥
उसके नामसे अंकित सुवर्णमय पंखवाले तेज बाण मनुष्यों और घोड़ोंके शरीरोंको विदीर्ण करके सब ओरसे पृथ्वीपर गिरने लगे ।
कर्णेनैकेन समरे चेदीनां प्रवरा रथाः ।
सृजयानां च सर्वेषां शतशो निहता रणे ॥
समरांगणमें अकेले कर्णने चेदिदेशके प्रधान रथियोंका तथा सम्पूर्ण सृजयोंके सैकड़ों योद्धाओंका भी संहार कर डाला ।
कर्णस्य शरसंछन्नं बभूव विपुलं तमः ।
नाज्ञायत ततः किञ्चित् परेषामात्मनोऽपि वा ॥
कर्णके बाणोंसे सारी दिशाएँ ढक जानेके कारण वहाँ महान् अन्धकार छा गया । उस समय शत्रुपक्षकी तथा अपने पक्षकी भी कोई वस्तु पहचानी नहीं जाती थी । तस्मिंस्तमसि भूते च क्षत्रियाणां भयंकरे । विचचार महाबाहुर्निर्दहन् क्षत्रियान् बहून् ॥ ) शत्रुओंके लिये भयदायक उस घोर अन्धकारमें महाबाहु कर्ण बहुसंख्यक राजपूतोंको दग्ध करता हुआ विचरने लगा ।
ततः शरमहाज्वालो वीर्योष्मा कर्णपावकः ।
निर्दहन् पाण्डववनं वीरः पर्यचरद् रणे ॥ ३ ९ ॥
उस समय वीर कर्ण अग्निके समान हो रहा था। बाण ही उसकी ऊँचेतक उठती हुई ज्वालाओंके समान थे, पराक्रम ही उसका ताप था और वह पाण्डवरूपी वनको दग्ध करता हुआ रणभूमिमें विचर रहा था ॥ ३ ९ ॥
( ततस्तेषां महाराज पाण्डवानां महारथाः ।
सृञ्जयानां च सर्वेषां शतशोऽथ सहस्रशः ॥
अस्त्रैः कर्णं महेष्वासं समन्तात् पर्यवारयन् । )
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महाराज! तब सम्पूर्ण सृजयों और पाण्डवोंके सैकड़ों- हजारों महारथियोंने महाधनुर्धर कर्णपर बाणोंकी वर्षा करते हुए उसे चारों ओरसे घेर लिया ।
स संधाय महास्त्राणि महेष्वासा महामनाः ।
प्रहस्य पुरुषेन्द्रस्य शरैश्चिच्छेद कार्मुकम् ॥ ४० ॥
महाधनुर्धर महामना कर्णने हँसकर महान् अस्त्रोंका संधान किया और अपने बाणोंसे महाराज युधिष्ठिरका धनुष काट दिया ॥ ४० ॥
ततः संधाय नवतिं निमेषान्नतपर्वणाम् ।
बिभेद कवचं राज्ञो रणे कर्णः शितैः शरैः ॥ ४१ ॥
तत्पश्चात् पलक मारते - मारते झुकी हुई गाँठवाले नब्बे बाणोंका संधान करके कर्णने उन पैने बाणोंद्वारा रणभूमिमें राजा युधिष्ठिरके कवचको छिन्न - भिन्न कर डाला ॥ ४१ ॥
तद् वर्म हेमविकृतं रत्नचित्रं बभौ पतत् ।
सविद्युदभ्रं सवितुः श्लिष्टं वातहतं यथा ॥ ४२ ॥
उनका वह सुवर्णभूषित रत्नजटित कवच गिरते समय ऐसी शोभा पा रहा था, मानो सूर्यसे सटा हुआ बिजलीसहित बादल वायुका आघात पाकर नीचे गिर रहा हो ॥ ४२ ॥
तदङ्गात् पुरुषेन्द्रस्य भ्रष्टं वर्म व्यरोचत ।
रत्नैरलंकृतं चित्रैर्व्यभ्रं निशि यथा नभः ॥ ४३ ॥
छिन्नवर्मा शरैः पार्थो रुधिरेण समुक्षितः । जैसे रात्रिमें बिना बादलका आकाश नक्षत्रमण्डलसे विचित्र शोभा धारण करता है, उसी प्रकार नरेन्द्र युधिष्ठिरके शरीरसे गिरा हुआ वह कवच विभिन्न रत्नोंसे अलंकृत होनेके कारण अद्भुत शोभा पा रहा था । बाणोंसे कवच कट जानेपर कुन्तीपुत्र युधिष्ठिर रक्तसे भीग गये ॥ ४३ ||
(बभासे पुरुषश्रेष्ठ उद्यन्निव दिवाकरः ।
स शराचितसर्वाङ्गश्छिन्नवर्माथ संयुगे ॥
क्षत्रधर्मं समास्थाय सिंहनादमकुर्वत । ) उस समय युद्धस्थलमें पुरुषश्रेष्ठ युधिष्ठिर उगते हुए सूर्यके समान लाल दिखायी देते थे । उनके सारे अंगोंमें बाण धँसे हुए थे और कवच छिन्न-भिन्न हो गया था, तो भी वे क्षत्रिय-धर्मका आश्रय लेकर वहाँ सिंहके समान दहाड़ रहे थे । ततः सर्वायसीं शक्तिं चिक्षेपाधिरथिं प्रति ॥ ४४ ॥
तां ज्वलन्तीमिवाकाशे शरैश्चिच्छेद सप्तभिः ।
सा छिन्ना भूमिमगमन्महेष्वासस्य सायकैः ॥ ४५ ॥
उन्होंने अधिरथपुत्र कर्णपर सम्पूर्णतः लोहेकी बनी हुई शक्ति चलायी, परंतु उसने सात बाणोंद्वारा उस प्रज्वलित शक्तिको आकाशमें ही काट डाला । महाधनुर्धर कर्णके सायकोंसे कटी हुई वह शक्ति पृथ्वीपर गिर पड़ी ॥ ४४-४५ ॥