श्रीगणेशाय नमः।

महाभारत — खण्ड ४ — पृष्ठ 1961–1970

महाभारत — खण्ड ४ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1961–1970

पृष्ठ 1961

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ततो बाह्वोर्ललाटे च हृदि चैव युधिष्ठिरः ।

चतुर्भिस्तोमरैः कर्णं ताडयित्वानदन्मुदा ॥ ४६ ॥

तत्पश्चात् युधिष्ठिरने कर्णकी दोनों भुजाओं, ललाट और छातीमें चार तोमरोंका प्रहार करके सानन्द सिंहनाद किया ॥ ४६ ॥

उद्भिन्नरुधिरः कर्णः क्रुद्धः सर्प इव श्वसन् ।

ध्वजं चिच्छेद भल्लेन त्रिभिर्विव्याध पाण्डवम् ॥ ४७ ॥

इषुधी चास्य चिच्छेद रथं च तिलशोऽच्छिनत् । कर्णके शरीरसे रक्त बहने लगा । फिर तो क्रोधमें भरे हुए सर्पके समान फुफकारते हुए कर्णने एक भल्लसे युधिष्ठिरकी ध्वजा काट डाली और तीन बाणोंसे उन पाण्डुपुत्रको भी घायल कर दिया । उनके दोनों तरकस काट दिये और रथके भी तिल- तिल करके टुकड़े-टुकड़े कर डाले ॥ ४७ ॥

(एतस्मिन्नन्तरे शूराः पाण्डवानां महारथाः ।

ववृषुः शरवर्षाणि राधेयं प्रति भारत ॥

भारत! इसी बीचमें शूरवीर पाण्डव महारथी राधापुत्र कर्णपर बाणोंकी वर्षा करने लगे ।

सात्यकिः पञ्चविंशत्या शिखण्डी नवभिः शरैः ।

अवर्षतां महाराज राधेयं शत्रुकर्शनम् ॥

महाराज! सात्यकिने शत्रुसूदन राधापुत्रपर पचीस और शिखण्डीने नौ बाणोंकी वर्षा की ।

शैनेयं तु ततः क्रुद्धः कर्णः पञ्चभिरायसैः ।

विव्याध समरे राजंस्त्रिभिश्चान्यैः शिलीमुखैः ॥

राजन्! तब क्रोधमें भरे हुए कर्णने समरांगणमें सात्यकिको पहले लोहेके बने हुए पाँच बाणोंसे घायल करके फिर दूसरे तीन बाणोंद्वारा उन्हें बींध डाला ।

दक्षिणं तु भुजं तस्य त्रिभिः कर्णोऽप्यविध्यत ।

सव्यं षोडशभिर्बाणैर्यन्तारं चास्य सप्तभिः ॥

इसके बाद कर्णने सात्यकिकी दाहिनी भुजाको तीन, बायीं भुजाको सोलह और सारथिको सात बाणों से क्षत - विक्षत कर दिया ।

अथास्य चतुरो वाहांश्चतुर्भिर्निशितैः शरैः ।

सूतपुत्रोऽनयत् क्षिप्रं यमस्य सदनं प्रति ॥

तदनन्तर चार पैने बाणोंसे सूतपुत्रने सात्यकिके चारों घोड़ोंको भी तुरंत ही यमलोक पहुँचा दिया ।

अपरेणाथ भल्लेन धनुश्छित्त्वा महारथः ।

सारथेः सशिरस्त्राणं शिरः कायादपाहरत् ॥

पृष्ठ 1962

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फिर दूसरे भल्लसे महारथी कर्णने उनका धनुष काटकर उनके सारथिके शिरस्त्राणसहित मस्तकको शरीरसे अलग कर दिया ।

हताश्वसूते तु रथे स्थितः स शिनिपुङ्गवः ।

शक्तिं चिक्षेप कर्णाय वैडूर्यमणिभूषिताम् ॥

जिसके घोड़े और सारथि मारे गये थे, उसी रथपर खड़े हुए शिनिप्रवर सात्यकिने कर्णके ऊपर वैदूर्यमणिसे विभूषित शक्ति चलायी ।

तामापतन्तीं सहसा द्विधा चिच्छेद भारत ।

कर्णो वै धन्विनां श्रेष्ठस्तांश्च सर्वानवारयत् ॥

ततस्तान् निशितैर्बाणैः पाण्डवानां महारथान् ।

न्यवारयदमेयात्मा शिक्षया च बलेन च ॥

भारत! धनुर्धरोंमें श्रेष्ठ कर्णने अपने ऊपर आती हुई उस शक्तिके सहसा दो टुकड़े कर डाले और उन सब महारथियोंको आगे बढ़नेसे रोक दिया, फिर अमेय आत्मबलसे सम्पन्न कर्णने अपनी शिक्षा और बलके प्रभावसे तीखे बाणोंद्वारा उन सभी पाण्डव- महारथियोंकी गति अवरुद्ध कर दी ।

अर्दयित्वा शरैस्तांस्तु सिंहः क्षुद्रमृगानिव ।

पीडयन् धर्मराजानं शरैः संनतपर्वभिः ॥

अभ्यद्रवत राधेयो धर्मपुत्रं शितैः शरैः । ) जैसे सिंह छोटे मृगोंको पीड़ा देता है, उसी प्रकार राधापुत्र कर्णने उन महारथियोंको बाणोंसे पीड़ित करके झुकी हुई गाँठवाले तीखे बाणोंसे चोट पहुँचाते हुए वहाँ धर्मराज

धर्मपुत्र युधिष्ठिरपर पुनः आक्रमण किया ।

कालवालास्तु ये पार्थं दन्तवर्णावहन् हयाः ॥ ४८ ॥

तैर्युक्तं रथमास्थाय प्रायाद् राजा पराङ्मुखः । उस समय दाँतोंके समान सफेद रंग और काली पूँछवाले जो घोड़े युधिष्ठिरकी सवारीमें थे, उन्हींसे जुते हुए दूसरे रथपर बैठकर राजा युधिष्ठिर रणभूमिसे विमुख हो शिविरकी ओर चल दिये ॥ ४८३ ॥

एवं पार्थोऽभ्यपायात् स निहतः पार्ष्णिसारथिः ॥ ४ ९ ॥ अशक्नुवन् प्रमुखतः स्थातुं कर्णस्य दुर्मनाः । युधिष्ठिरका पृष्ठरक्षक पहले ही मार दिया गया था । उनका मन बहुत दुःखी था, इसलिये वे कर्णके सामने ठहर न सके और युद्धस्थल से हट गये ॥ ४ ९ ॥ अभिद्रुत्य तु राधेयः पाण्डुपुत्रं युधिष्ठिरम् ॥ ५० ॥

वज्रच्छत्रांकुशैर्मत्स्यैर्ध्वजकूर्माम्बुजादिभिः ।

लक्षणैरुपपन्नेन पाण्डुना पाण्डुनन्दनम् ॥ ५१ ॥

पवित्रीकर्तुमात्मानं स्कन्धे संस्पृश्य पाणिना ।

पृष्ठ 1963

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ग्रहीतुमिच्छन् स बलात् कुन्तीवाक्यं च सोऽस्मरत् ॥ ५२ ॥

उस समय राधापुत्र कर्ण पाण्डुनन्दन युधिष्ठिरका पीछा करके वज्र, छत्र, अंकुश, मत्स्य, ध्वज, कूर्म और कमल आदि शुभ लक्षणोंसे सम्पन्न गोरे हाथसे उनका कंधा छूकर, मानो अपने - आपको पवित्र करनेके लिये उन्हें बलपूर्वक पकड़नेकी इच्छा करने लगा । उसी समय उसे कुन्तीदेवीको दिये हुए अपने वचनका स्मरण हो आया ॥ ५०–५२ ॥

तं शल्यः प्राह मा कर्ण गृहीथाः पार्थिवोत्तमम् ।

गृहीतमात्र हत्वा त्वां मा करिष्यति भस्मसात् ॥ ५३ ॥

उस समय राजा शल्यने कहा- ' कर्ण! इन नृपश्रेष्ठ युधिष्ठिरको हाथ न लगाना, अन्यथा वे पकड़ते ही तुम्हारा वध करके अपनी क्रोधाग्निसे तुम्हें भस्म कर डालेंगे ' ॥

अब्रवीत् प्रहसन् राजन् कुत्सयन्निव पाण्डवम् ।

कथं नाम कुले जातः क्षत्रधर्मे व्यवस्थितः ॥ ५४ ॥

प्रजह्यात् समरं भीतः प्राणान् रक्षन् महाहवे ।

न भवान् क्षत्रधर्मेषु कुशलो हीति मे मतिः ॥ ५५ ॥

राजन्! तब कर्ण जोर- जोरसे हँस पड़ा और पाण्डुपुत्र युधिष्ठिरकी निन्दा- सा करता हुआ बोला — ' युधिष्ठिर! जो क्षत्रिय कुलमें उत्पन्न हो, क्षत्रिय धर्ममें तत्पर रहता हो, वह महासमरमें प्राणोंकी रक्षाके लिये भयभीत हो युद्ध छोड़कर भाग कैसे सकता है? मेरा तो ऐसा विश्वास है कि तुम क्षत्रिय धर्ममें निपुण नहीं हो ॥ ५४-५५ ॥

ब्राह्मे बले भवान् युक्तः स्वाध्याये यज्ञकर्मणि ।

मा स्म युद्ध्यस्व कौन्तेय मा स्म वीरान् समासदः ॥ ५६ ॥

‘ कुन्तीकुमार! तुम ब्राह्मबल, स्वाध्याय एवं यज्ञ- कर्ममें ही कुशल हो; अतः न तो युद्ध किया करो और न वीरोंके सामने ही जाओ ॥ ५६ ॥

मा चैतानप्रियं ब्रूहि मा वै व्रज महारणम् ।

वक्तव्या मारिषान्ये तु न वक्तव्यास्तु मादृशाः ॥ ५७ ॥

' माननीय नरेश! न इन वीरोंसे कभी अप्रिय वचन बोलो और न महान् युद्धमें पैर ही रखो । यदि अप्रिय वचन बोलना ही हो तो दूसरोंसे बोलना; मेरे - जैसे वीरोंसे नहीं ॥

मादृशान् विब्रुवन् युद्धे एतदन्यच्च लप्स्यसे ।

स्वगृहं गच्छ कौन्तेय यत्र तौ केशवार्जुनौ ॥ ५८ ॥

न हि त्वां समरे राजन् हन्यात् कर्णः कथञ्चन । ' युद्धमें मेरे-जैसे लोगोंसे अप्रिय वचन बोलनेपर तुम्हें यही तथा दूसरा कुफल भी भोगना पड़ेगा । अतः कुन्तीनन्दन! अपने घर चले जाओ अथवा जहाँ श्रीकृष्ण और अर्जुन हों वहीं पधारो । राजन्! कर्ण समरांगणमें किसी तरह भी तुम्हारा वध नहीं करेगा ' ॥ ५८३ || एवमुक्त्वा ततः पार्थं विसृज्य च महाबलः ॥ ५ ९ ॥

पृष्ठ 1964

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न्यहनत् पाण्डवीं सेनां वज्रहस्त इवासुरीम् । महाबली कर्णने युधिष्ठिरसे ऐसा कहकर फिर उन्हें छोड़ दिया और जैसे वज्रधारी इन्द्र असुरसेनाका संहार करते हैं, उसी प्रकार पाण्डव- सेनाका विनाश आरम्भ कर दिया ॥ ५ ९ ¾ ॥ ततोऽपायाद् द्रुतं राजन् व्रीडन्निव नरेश्वरः ॥ ६० ॥

अथापयातं राजानं मत्वान्वीयुस्तमच्युतम् ।

चेदिपाण्डवपाञ्चालाः सात्यकिश्च महारथः ॥ ६१ ॥

द्रौपदेयास्तथा शूरा माद्रीपुत्रौ च पाण्डवौ । राजन्! तब राजा युधिष्ठिर लजाते हुए - से तुरंत रणभूमिसे भाग गये । राजाको रणक्षेत्रसे हटा हुआ जानकर चेदि, पाण्डव और पांचाल वीर, महारथी सात्यकि, द्रौपदीके शूरवीर पुत्र तथा पाण्डुनन्दन माद्रीकुमार नकुल सहदेव भी धर्म- मर्यादासे कभी च्युत न होनेवाले युधिष्ठिरके पीछे- पीछे चल दिये ॥ ६०-६१ ॥ ततो युधिष्ठिरानीकं दृष्ट्वा कर्णः पराङ्मुखम् ॥ ६२ ॥

कुरुभिः सहितो वीरः प्रहृष्टः पृष्ठतोऽन्वगात् । तदनन्तर युधिष्ठिरकी सेनाको युद्धसे विमुख हुई देख हर्षमें भरे हुए वीर कर्णने कौरव-सैनिकोंको साथ लेकर कुछ दूरतक उसका पीछा किया ॥ ६२३ ॥

भेरीशङ्खमृदङ्गानां कार्मुकाणां च निःस्वनः ॥ ६३ ॥

बभूव धार्तराष्ट्राणां सिंहनादरवस्तथा । उस समय भेरी, शंख, मृदंग और धनुषोंकी ध्वनि सब ओर फैल रही थी तथा दुर्योधनके सैनिक सिंहके समान दहाड़ रहे थे ॥ ६३३ ॥

युधिष्ठिरस्तु कौरव्य रथमारुह्य सत्वरम् ॥ ६४ ॥

श्रुतकीर्तेर्महाराज दृष्टवान् कर्णविक्रमम् । कुरुवंशी महाराज! युधिष्ठिरके घोड़े थक गये थे; अतः उन्होंने तुरंत ही श्रुतकीर्तिके रथपर आरूढ़ हो कर्णके पराक्रमको देखा ॥ ६४ ॥

काल्यमानं बलं दृष्ट्वा धर्मराजो युधिष्ठिरः ॥ ६५ ॥

स्वान् योधानब्रवीत् क्रुद्धो निघ्नतैतान् किमासत । अपनी सेनाको खदेड़ी जाती हुई देख धर्मराज युधिष्ठिरने कुपित हो अपने पक्षके योद्धाओंसे कहा — ‘ अरे! क्यों चुप बैठे हो? इन शत्रुओंको मार डालो ' ॥ ततो राज्ञाभ्यनुज्ञाताः पाण्डवानां महारथाः ॥ ६६ ॥

भीमसेनमुखाः सर्वे पुत्रांस्ते प्रत्युपाद्रवन् । राजाकी यह आज्ञा पाते ही भीमसेन आदि समस्त पाण्डव महारथी आपके पुत्रोंपर टूट पड़े ॥ ६६ ॥

पृष्ठ 1965

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अभवत् तुमुलः शब्दो योधानां तत्र भारत ॥ ६७ ॥

रथहस्त्यश्वपत्तीनां शस्त्राणां च ततस्ततः । भारत! फिर तो वहाँ इधर- उधर सब ओर रथी, हाथीसवार, घुड़सवार और पैदल योद्धाओं एवं अस्त्र- शस्त्रोंका भयंकर शब्द गूँजने लगा ॥ ६७३ ॥

उत्तिष्ठत प्रहरत प्रैताभिपततेति च ॥ ६८ ॥

इति ब्रुवाणा ह्यन्योन्यं जघ्नुर्योधा महारणे । ' उठो, मारो, आगे बढ़ो, टूट पड़ो' इत्यादि वाक्य बोलते हुए सब योद्धा उस महासमरमें एक- दूसरेको मारने लगे ॥ ६८३ ॥

अभ्रच्छायेव तत्रासीच्छरवृष्टिभिरम्बरे ॥ ६ ९ ॥ समावृतैर्नरवरैर्निघ्नद्भिरितरेतरम् । उस समय वहाँ अस्त्रोंसे आवृत हो परस्पर आघात करनेवाले नरश्रेष्ठ वीरोंके चलाये हुए बाणोंकी वृष्टिसे आकाशमें मेघोंकी छाया- सी छा रही थी ॥ ६ ९ ३ ॥ विपताकध्वजच्छत्रा व्यश्वसूतायुधा रणे ॥ ७० ॥

व्यङ्गाङ्गावयवाः पेतुः क्षितौ क्षीणाः क्षितीश्वराः । कितने ही घायल नरेश पताका, ध्वज, छत्र, अश्व, सारथि, आयुध, शरीर तथा उसके अवयवोंसे रहित हो रणभूमिमें गिर पड़े ॥ ७० ॥

प्रवणादिव शैलानां शिखराणि द्विपोत्तमाः ॥ ७१ ॥

सारोहा निहताः पेतुर्वज्रभिन्ना इवाद्रयः । जैसे पर्वतोंके शिखर टूटकर निम्न देशसे लुढ़कते हुए नीचे गिर पड़ते हैं तथा जैसे वज्रसे विदीर्ण किये हुए पर्वत धराशायी हो जाते हैं, उसी प्रकार वहाँ मारे गये हाथी अपने सवारोंसहित पृथ्वीपर गिर पड़े ॥ ७१३ ॥

छिन्नभिन्नविपर्यस्तैर्वर्मालङ्कारभूषणैः ॥ ७२ ॥

सारोहास्तुरगाः पेतुर्हतवीराः सहस्रशः । टूटे - फूटे और अस्त- व्यस्त हुए कवच, अलंकार एवं आभूषणोंसहित सहस्रों घोड़े अपने बहादुर सवारोंके मारे जानेपर उनके साथ ही गिर पड़ते थे ॥ ७२ ॥

विप्रविद्धायुधाङ्गाश्च द्विरदाश्वरथैर्हताः ॥ ७३ ॥

प्रतिवीरैश्च सम्मर्दे पत्तिसंघाः सहस्रशः । उस संघर्षमें विपक्षी वीरों, हाथियों, घोड़ों तथा रथोंद्वारा मारे गये सहस्रों पैदल योद्धाओंके समुदाय रणभूमिमें सो रहे थे । उनके अस्त्र- शस्त्र और शरीरके अवयव क्षत-विक्षत होकर बिखर गये थे ॥ ७३ ॥

विशालायतताम्राक्षैः पद्मेन्दुसदृशाननैः ॥ ७४ ॥

शिरोभिर्युद्धशौण्डानां सर्वतः संवृता मही ।

पृष्ठ 1966

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यथा भुवि तथा व्योम्नि निःस्वनं शुश्रुवुर्जनाः ॥ ७५ ॥

विमानैरप्सरःसङ्गैर्गीतवादित्रनिःस्वनैः । युद्धकुशल वीरोंके विशाल, विस्तृत एवं लाल- लाल आँखों और कमल तथा चन्द्रमाके समान मुखवाले मस्तकोंसे सारी युद्धभूमि सब ओरसे ढक गयी थी । भूतलपर जैसा कोलाहल हो रहा था, वैसा ही आकाशमें भी लोगोंको सुनायी देता था । वहाँ विमानोंपर बैठी हुई झुंड- की - झुंड अप्सराएँ गीत और वाद्योंकी मधुर ध्वनि फैला रही भीं ॥ ७४-७५ ॥ हतानभिमुखान् वीरान् वीरैः शतसहस्रशः ॥ ७६ ॥

आरोप्यारोप्य गच्छन्ति विमानेष्वप्सरोगणाः । वीरोंके द्वारा सम्मुख लड़कर मारे गये लाखों वीरोंको अप्सराएँ विमानोंपर बिठा-बिठाकर स्वर्गलोकमें ले जाती थीं ॥ ७६ ॥

तद् दृष्ट्वा महदाश्चर्यं प्रत्यक्षं स्वर्गलिप्सया ॥ ७७ ॥

प्रहृष्टमनसः शूराः क्षिप्रं जघ्नुः परस्परम् । यह महान् आश्चर्यकी बात प्रत्यक्ष देखकर हर्ष और उत्साहमें भरे हुए शूरवीर स्वर्गकी लिप्सासे एक- दूसरेको शीघ्रतापूर्वक मारने लगे ॥ ७७ ॥

रथिनो रथिभिः सार्धं चित्रं युयुधुराहवे ॥ ७८ ॥

पत्तयः पत्तिभिर्नागाः सह नागैर्हयैर्हयाः । युद्धस्थलमें रथियोंके साथ रथी, पैदलोंके साथ पैदल, हाथियोंके साथ हाथी और घोड़ोंके साथ घोड़े विचित्र युद्ध करते थे ॥ ७८३ ॥

एवं प्रवृत्ते संग्रामे गजवाजिनरक्षये ॥ ७ ९ ॥ सैन्येन रजसा व्याप्ते स्वे स्वाञ्जघ्नुः परे परान् । इस प्रकार हाथी, घोड़ों और मनुष्योंका संहार करनेवाले उस संग्रामके आरम्भ होनेपर सैनिकोंद्वारा उड़ायी हुई धूलसे वहाँका सारा प्रदेश आच्छादित हो जानेपर अपने और शत्रुपक्षके योद्धा अपने ही पक्षवालोंका संहार करने लगे ॥ ७ ९ ३ ॥ कचाकचि युद्धमासीद् दन्तादन्ति नखानखि ॥ ८० ॥

मुष्टियुद्धं नियुद्धं च देहपाप्मासुनाशनम् । दोनों दलोंके सैनिक एक-दूसरेके केश पकड़कर खींचते, दाँतोंसे काटते, नखोंसे बखोटते, मुक्कोंसे मारते और परस्पर मल्लयुद्ध करने लगते थे । इस प्रकार वह युद्ध सैनिकोंके शरीर, प्राण और पापोंका विनाश करनेवाला हो रहा था ॥ ८०३३ ॥

तथा वर्तति संग्रामे गजवाजिनरक्षये ॥ ८१ ॥

नराश्वनागदेहेभ्यः प्रसृता लोहितापगा ।

गजाश्वनरदेहान् सा व्युवाह पतितान् बहून् ॥ ८२ ॥

पृष्ठ 1967

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हाथी, घोड़े और मनुष्योंका विनाश करनेवाला वह संग्राम उसी रूपमें चलने लगा । मनुष्यों, घोड़ों और हाथियोंके शरीरोंसे खूनकी नदी बह चली, जो अपने भीतर पड़े हुए हाथी, घोड़े और मनुष्योंकी बहुसंख्यक लाशोंको बहाये जा रही थी ॥ ८१-८२ ॥

नराश्वगजसम्बाधे नराश्वगजसादिनाम् ।

लोहितोदा महाघोरा मांसशोणितकर्दमा ॥ ८३ ॥

नराश्वगजदेहान् सा वहन्ती भीरुभीषणा । मनुष्य, घोड़े और हाथियोंसे भरे हुए युद्धस्थलमें मनुष्य, अश्व, हाथी और सवारोंके रक्त ही उस नदीके जल थे । उनका मांस और गाढ़ा खून उस नदीकी कीचड़के समान जान पड़ता था । मनुष्य, घोड़े और हाथियोंके शरीरोंको बहाती हुई वह महाभयंकर नदी भीरु मनुष्योंको भयभीत कर रही थी ॥ ८३ ॥

तस्याः पारमपारं च व्रजन्ति विजयैषिणः ॥ ८४ ॥

गाधेन चाप्लवन्तश्च निमज्ज्योन्मज्य चापरे । विजयकी अभिलाषा रखनेवाले कितने ही वीर जहाँ थोड़ा रक्तमय जल था वहाँ तैरकर और जहाँ अथाह था वहाँ गोते लगा- लगाकर उसके दूसरे पार पहुँच जाते थे ॥ ८४३ ॥

ते तु लोहितदिग्धाङ्गा रक्तवर्मायुधाम्बराः ॥ ८५ ॥

सस्नुस्तस्यां पपुश्चास्यां मम्लुश्च भरतर्षभ । उन सबके शरीर रक्तसे रँग गये थे । कवच, आयुध और वस्त्र भी रक्तरंजित हो गये थे । भरतश्रेष्ठ! कितने ही योद्धा उसमें नहा लेते, कितनोंके मुँहमें रक्तकी घूँट चली जाती और कितने ही ग्लानिसे भर जाते थे ॥ ८५३ ॥

रथानश्वान् नरान् नागानायुधाभरणानि च ॥ ८६ ॥

वसनान्यथ वर्माणि वध्यमानान् हतानपि ।

भूमिं खं द्यां दिशश्चैव प्रायः पश्याम लोहिताः ॥ ८७ ॥

मारे गये तथा मारे जाते हुए हाथी, घोड़े, रथ, मनुष्य, अस्त्र-शस्त्र, आभूषण, वस्त्र, कवच, पृथ्वी, आकाश, द्युलोक और सम्पूर्ण दिशाएँ — ये सब हमें प्रायः लाल - ही- लाल दिखायी देते थे ॥ ८६-८७ ॥

लोहितस्य तु गन्धेन स्पर्शेन च रसेन च ।

रूपेण चातिरक्तेन शब्देन च विसर्पता ॥ ८८ ॥

विषादः सुमहानासीत् प्रायः सैन्यस्य भारत । भारत! सब ओर फैली और बढ़ी हुई उस रक्त - राशिकी गन्धसे, स्पर्शसे, रससे, रूपसे और शब्दसे भी प्रायः सारी सेनाके मनमें बड़ा विषाद हो रहा था ॥ ८८३ ॥

तत् तु विप्रहतं सैन्यं भीमसेनमुखास्तदा ॥ ८ ९ ॥ भूयः समाद्रवन् वीराः सात्यकिप्रमुखास्तदा ।

पृष्ठ 1968

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भीमसेन तथा सात्यकि आदि वीरोंने विशेषरूपसे विनष्ट हुई उस' कौरव - सेनापर पुनः बड़े वेगसे आक्रमण किया ॥ ८ ९ ३ ॥ तेषामापततां वेगमविषह्यं निरीक्ष्य च ॥ ९ ० ॥ पुत्राणां ते महासैन्यमासीद् राजन् पराङ्मुखम् । राजन्! उन आक्रमणकारी वीरोंके असह्य वेगको देखकर आपके पुत्रोंकी विशाल सेना युद्धसे विमुख होकर भाग चली ॥ ९ ०३ ॥ तत् प्रकीर्णरथाश्वेभं नरवाजिसमाकुलम् ॥ ९ १ ॥ विध्वस्तवर्मकवचं प्रविद्धायुधकार्मुकम् ।

व्यद्रवत् तावकं सैन्यं लोड्यमानं समन्ततः ।

सिंहार्दितमिवारण्ये यथा गजकुलं तथा ॥ ९ २ ॥

जैसे जंगलमें सिंहसे पीड़ित हुआ हाथियोंका यूथ व्याकुल होकर भागता है, उसी प्रकार शत्रुओंद्वारा सब ओरसे रौंदी जाती हुई मनुष्यों और घोड़ोंसे परिपूर्ण आपकी विशाल सेना भाग चली । उसके रथ, हाथी और घोड़े तितर - बितर हो गये, आवरण और कवच नष्ट हो गये तथा अस्त्र- शस्त्र और धनुष छिन्न - भिन्न होकर पृथ्वीपर पड़े थे ॥ इति श्रीमहाभारते कर्णपर्वणि संकुलयुद्धे एकोनपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ॥ ४ ९ ॥ इसप्रकार श्रीमहाभारत कर्णपर्वमें संकुलयुद्धविषयक उनचासवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ४ ९ ॥ ( दाक्षिणात्य अधिक पाठके १ ९ ३ श्लोक मिलाकर कुल १११३ श्लोक हैं) Filed

पृष्ठ 1969

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पञ्चाशत्तमोऽध्यायः कर्ण और भीमसेनका युद्ध तथा कर्णका पलायन संजय उवाच

तानभिद्रवतो दृष्ट्वा पाण्डवांस्तावकं बलम् ।

दुर्योधनो महाराज वारयामास सर्वशः ॥ १ ॥

योधांश्च स्वबलं चैव समन्ताद् भरतर्षभ ।

क्रोशतस्तव पुत्रस्य न स्म राजन् न्यवर्तत ॥ २ ॥

संजय कहते हैं - महाराज! पाण्डवोंको आपकी सेनापर आक्रमण करते देख दुर्योधनने सब ओरसे सब प्रकारके प्रयत्नोंद्वारा उन योद्धाओंको रोकने तथा अपनी सेनाको भी स्थिर करनेका प्रयत्न किया । भरतश्रेष्ठ! नरेश्वर! आपके पुत्रके बहुत चीखने - चिल्लानेपर भी भागती हुई सेना पीछे न लौटी ॥ १-२ ॥

ततः पक्षः प्रपक्षश्च शकुनिश्चापि सौबलः ।

तदा सशस्त्राः कुरवो भीममभ्यद्रवन् रणे ॥ ३ ॥

तदनन्तर व्यूहके पक्ष और प्रपक्षभागमें खड़े हुए सैनिक, सुबलपुत्र शकुनि तथा सशस्त्र कौरववीर उस समय रणक्षेत्रमें भीमसेनपर टूट पड़े ॥ ३ ॥

कर्णोऽपि दृष्ट्वा द्रवतो धार्तराष्ट्रान् सराजकान् ।

मद्रराजमुवाचेदं याहि भीमरथं प्रति ॥ ४ ॥

उधर कर्णने भी राजा दुर्योधन और उसके सैनिकोंको भागते देख मद्रराज शल्यसे कहा —'भीमसेनके रथके समीप चलो ' ॥ ४ ॥

एवमुक्तश्च कर्णेन शल्यो मद्राधिपस्तदा ।

हंसवर्णान् हयानग्रयान् प्रैषीद् यत्र वृकोदरः ॥ ५ ॥

कर्णके ऐसा कहनेपर मद्रराज शल्यने हंसके समान श्वेत वर्णवाले श्रेष्ठ घोड़ोंको उधर ही हाँक दिया, जहाँ भीमसेन खड़े थे ॥ ५ ॥

ते प्रेरिता महाराज शल्येनाहवशोभिना ।

भीमसेनरथं प्राप्य समसज्जन्त वाजिनः ॥ ६ ॥

महाराज! संग्राममें शोभा पानेवाले शल्यसे संचालित हो वे घोड़े भीमसेनके रथके समीप जाकर पाण्डव सेनामें मिल गये ॥ ६ ॥

दृष्ट्वा कर्णं समायान्तं भीमः क्रोधसमन्वितः ।

मतिं चक्रे विनाशाय कर्णस्य भरतर्षभ ॥ ७ ॥

भरतश्रेष्ठ! कर्णको आते देख क्रोधमें भरे हुए भीमसेनने उसके विनाशका विचार किया ॥ ७ ॥

पृष्ठ 1970

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सोऽब्रवीत् सात्यकिं वीरं धृष्टद्युम्नं च पार्षतम् ।

यूयं रक्षत राजानं धर्मात्मानं युधिष्ठिरम् ॥ ८ ॥

संशयान्महतो मुक्तं कथंचित् प्रेक्षतो मम । उन्होंने वीर सात्यकि तथा द्रुपदकुमार धृष्टद्युम्नसे कहा– ' तुमलोग धर्मात्मा राजा युधिष्ठिरकी रक्षा करो । वे अभी - अभी मेरे देखते -देखते किसी प्रकार महान् प्राण- संकटसे मुक्त हुए हैं ॥ ८३ ॥

अग्रतो मे कृतो राजा छिन्नसर्वपरिच्छदः ॥ ९ ॥

दुर्योधनस्य प्रीत्यर्थं राधेयेन दुरात्मना । 'दुरात्मा राधापुत्र कर्णने दुर्योधनकी प्रसन्नताके लिये मेरे सामने ही धर्मराजकी समस्त युद्ध- सामग्रीको छिन्न- भिन्न कर डाला है ॥ ९ ३ ॥ अन्तमद्य गमिष्यामि तस्य दुःखस्य पार्षत ॥ १० ॥

हन्तास्म्यद्य रणे कर्णं स वा मां निहनिष्यति ।

संग्रामेण सुघोरेण सत्यमेतद् ब्रवीमि ते ॥ ११ ॥

' द्रुपदकुमार! इससे मुझे बड़ा दुःख हुआ है; अतः अब मैं उसका बदला लूँगा । आज रणभूमिमें अत्यन्त घोर संग्राम करके या तो मैं ही कर्णको मार डालूँगा या वही मेरा वध करेगा; यह मैं तुमसे सच्ची बात कहता हूँ ॥ १०-११ ॥

राजानमद्य भवतां न्यासभूतं ददानि वै ।

तस्य संरक्षणे सर्वे यतध्वं विगतज्वराः ॥ १२ ॥

‘ इस समय राजाको धरोहरके रूपमें मैं तुम्हें सौंप रहा हूँ। तुम सब लोग निश्चिन्त होकर इनकी रक्षाके लिये पूर्ण प्रयत्न करना ' ॥ १२ ॥

एवमुक्त्वा महाबाहुः प्रायादाधिरथिं प्रति ।

सिंहनादेन महता सर्वाः संनादयन् दिशः ॥ १३ ॥

ऐसा कहकर महाबाहु भीमसेन अपने महान् सिंहनादसे सम्पूर्ण दिशाओंको प्रतिध्वनित करते हुए सूतपुत्र कर्णकी ओर बढ़े ॥ १३ ॥

दृष्ट्वा त्वरितमायान्तं भीमं युद्धाभिनन्दिनम् ।

सूतपुत्रमथोवाच मद्राणामीश्वरो विभुः ॥ १४ ॥

युद्धका अभिनन्दन करनेवाले भीमसेनको बड़ी उतावलीके साथ आते देख मद्रदेशके स्वामी शक्तिशाली शल्यने सूतपुत्र कर्णसे कहा ॥ १४ ॥

शल्य उवाच

पश्य कर्ण महाबाहुं संक्रुद्धं पाण्डुनन्दनम् ।

दीर्घकालार्जितं क्रोधं मोक्तुकामं त्वयि ध्रुवम् ॥ १५ ॥