श्रीगणेशाय नमः।
महाभारत — खण्ड ४ — पृष्ठ 1971–1980
महाभारत — खण्ड ४ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1971–1980
पृष्ठ 1971
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
शल्य बोले — कर्ण! क्रोधमें भरे हुए पाण्डुनन्दन महाबाहु भीमसेनको देखो, जो दीर्घकालसे संचित किये हुए क्रोधको आज तुम्हारे ऊपर छोड़नेका दृढ़ निश्चय किये हुए हैं ॥ १५ ॥
ईदृशं नास्य रूपं मे दृष्टपूर्वं कदाचन ।
अभिमन्यौ हते कर्ण राक्षसे च घटोत्कचे ॥ १६ ॥
कर्ण! अभिमन्यु तथा घटोत्कच राक्षसके मारे जानेपर भी पहले कभी मैंने इनका ऐसा रूप नहीं देखा था ॥ १६ ॥
त्रैलोक्यस्य समस्तस्य शक्तः क्रुद्धो निवारणे ।
बिभर्ति सदृशं रूपं युगान्ताग्निसमप्रभम् ॥ १७ ॥
ये इस समय कुपित हो समस्त त्रिलोकीको रोक देनेमें समर्थ हैं; क्योंकि प्रलयकालके अग्निके समान तेजस्वी रूप धारण कर रहे हैं ॥ १७ ॥
संजय उवाच
इति ब्रुवति राधेयं मद्राणामीश्वरे नृप ।
अभ्यवर्तत वै कर्णं क्रोधदीप्तो वृकोदरः ॥ १८ ॥
संजय कहते हैं - नरेश्वर! मद्रराज शल्य राधापुत्र कर्णसे ऐसी बातें कह ही रहे थे कि क्रोधसे प्रज्वलित हुए भीमसेन उसके सामने आ पहुँचे ॥ १८ ॥
अथागतं तु सम्प्रेक्ष्य भीमं युद्धाभिनन्दिनम् ।
अब्रवीद् वचनं शल्यं राधेयः प्रहसन्निव ॥ १ ९ ॥
युद्धका अभिनन्दन करनेवाले भीमसेनको सामने आया देख हँसते हुए- से राधापुत्र कर्णने शल्यसे इस प्रकार कहा- ॥ १ ९ ॥
यदुक्तं वचनं मेऽद्य त्वया मद्रजनेश्वर ।
भीमसेनं प्रति विभो तत् सत्यं नात्र संशयः ॥ २० ॥
‘ मद्रराज! प्रभो! आज तुमने भीमसेनके विषयमें मेरे सामने जो बात कही है, वह सर्वथा सत्य है — इसमें संशय नहीं है ॥ २० ॥
एष शूरश्च वीरश्च क्रोधनश्च वृकोदरः ।
निरपेक्षः शरीरे च प्राणतश्च बलाधिकः ॥ २१ ॥
‘ ये भीमसेन शूरवीर, क्रोधी, अपने शरीर और प्राणों का मोह न करनेवाले तथा अधिक बलशाली हैं ॥ २१ ॥
अज्ञातवासं वसता विराटनगरे तदा ।
द्रौपद्याः प्रियकामेन केवलं बाहुसंश्रयात् ॥ २२ ॥
गूढभावं समाश्रित्य कीचकः सगणो हतः ।
पृष्ठ 1972
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
‘ विराटनगरमें अज्ञातवास करते समय इन्होंने द्रौपदीका प्रिय करनेकी इच्छासे छिपे-छिपे जाकर केवल बाहुबलसे कीचकको उसके साथियोंसहित मार डाला था ॥ २२ ॥
सोऽद्य संग्रामशिरसि संनद्धः क्रोधमूर्च्छितः ॥ २३ ॥
किं करोद्यतदण्डेन मृत्युनापि व्रजेद् रणम् । ' वे ही आज क्रोधसे आतुर हो कवच बाँधकर युद्धके मुहानेपर उपस्थित हैं; परंतु क्या ये दण्ड धारण किये यमराजके साथ भी युद्धके लिये रणभूमिमें उतर सकते हैं? ' ॥ २३३ || चिरकालाभिलषितो मामयं तु मनोरथः ॥ २४ ॥
अर्जुनं समरे हन्यां मां वा हन्याद् धनंजयः ।
स मे कदाचिदद्यैव भवेद् भीमसमागमात् ॥ २५ ॥
‘ मेरे हृदयमें दीर्घकालसे यह अभिलाषा बनी हुई है कि समरांगणमें अर्जुनका वध करूँ अथवा वे ही मुझे मार डालें । कदाचित् भीमसेनके साथ समागम होनेसे मेरी वह इच्छा आज ही पूरी हो जाय ॥ २४-२५ ॥
निहते भीमसेने वा यदि वा विरथीकृते ।
अभियास्यति मां पार्थस्तन्मे साधु भविष्यति ॥ २६ ॥
अत्र यन्मन्यसे प्राप्तं तच्छीघ्रं सम्प्रधारय । ' यदि भीमसेन मारे गये अथवा रथहीन कर दिये गये तो अर्जुन अवश्य मुझपर आक्रमण करेंगे, जो मेरे लिये अधिक अच्छा होगा । तुम जो यहाँ उचित समझते हो, वह शीघ्र निश्चय करके बताओ ' ॥ २६३ ॥
एतच्छ्रुत्वा तु वचनं राधेयस्यामितौजसः ॥ २७ ॥
उवाच वचनं शल्यः सूतपुत्रं तथागतम् । अमित शक्तिशाली राधापुत्र कर्णका यह वचन सुनकर राजा शल्यने सूतपुत्रसे उस अवसरके लिये उपयुक्त वचन कहा— ॥ २७३ ॥
अभियाहि महाबाहो भीमसेनं महाबलम् ॥ २८ ॥
निरस्य भीमसेनं तु ततः प्राप्स्यसि फाल्गुनम् । ' महाबाहो! तुम महाबली भीमसेनपर चढ़ाई करो । भीमसेनको परास्त कर देनेपर निश्चय ही अर्जुनको अपने सामने पा जाओगे ॥ २८३ ॥
यस्ते कामोऽभिलषितश्चिरात् प्रभृति हृद्गतः ॥ २१ ॥
स वै सम्पत्स्यते कर्ण सत्यमेतद् ब्रवीमि ते । ‘ कर्ण! तुम्हारे हृदयमें चिरकालसे जो अभीष्ट मनोरथ संचित है, वह निश्चय ही सफल होगा, यह मैं तुमसे सत्य कहता हूँ' ॥ २ ९ ३ ॥ एवमुक्ते ततः कर्णः शल्यं पुनरभाषत ॥ ३० ॥
पृष्ठ 1973
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
हन्ताहमर्जुनं संख्ये मां वा हन्याद् धनंजयः ।
युद्धे मनः समाधाय याहि यत्र वृकोदरः ॥ ३१ ॥
उनके ऐसा कहनेपर कर्णने शल्यसे फिर कहा - ' मद्रराज! मैं युद्धमें अर्जुनको मारूँ या अर्जुन ही मुझे मार डालें । इस उद्देश्यसे युद्धमें मन लगाकर जहाँ भीमसेन हैं, उधर ही चलो ' ॥ ३०-३१ ॥ संजय उवाच
ततः प्रायाद् रथेनाशु शल्यस्तत्र विशाम्पते ।
यत्र भीमो महेष्वासो व्यद्रावयत वाहिनीम् ॥ ३२ ॥
संजय कहते हैं – प्रजानाथ! तदनन्तर शल्य रथके द्वारा तुरंत ही वहाँ जा पहुँचे, जहाँ महाधनुर्धर भीमसेन आपकी सेनाको खदेड़ रहे थे ॥ ३२ ॥
ततस्तूर्यनिनादश्च भेरीणां च महास्वनः ।
उदतिष्ठच्च राजेन्द्र कर्णभीमसमागमे ॥ ३३ ॥
राजेन्द्र! कर्ण और भीमसेनका संघर्ष उपस्थित होनेपर फिर तूर्य और भेरियोंकी गम्भीर ध्वनि होने लगी ॥ ३३ ॥
भीमसेनोऽथ संक्रुद्धस्तस्य सैन्यं दुरासदम् ।
नाराचैर्विमलैस्तीक्ष्णैर्दिशः प्राद्रावयद् बली ॥ ३४ ॥
बलवान् भीमसेनने अत्यन्त कुपित होकर चमचमाते हुए तीखे नाराचोंसे आपकी दुर्जय सेनाको सम्पूर्ण दिशाओंमें खदेड़ दिया ॥ ३४ ॥
स संनिपातस्तुमुलो घोररूपो विशाम्पते ।
आसीद् रौद्रो महाराज कर्णपाण्डवयोर्मृधे ॥ ३५ ॥
प्रजानाथ! महाराज! कर्ण और भीमसेनके उस युद्धमें बड़ी भयंकर, भीषण और घोर मार- काट हुई ॥
ततो मुहूर्ताद् राजेन्द्र पाण्डवः कर्णमाद्रवत् ।
समापतन्तं सम्प्रेक्ष्य कर्णो वैकर्तनो वृषः ॥ ३६ ॥
आजघान सुसंक्रुद्धो नाराचेन स्तनान्तरे ।
पुनश्चैनममेयात्मा शरवर्षैरवाकिरत् ॥ ३७ ॥
राजेन्द्र! पाण्डुपुत्र भीमसेनने दो ही घड़ीमें कर्णपर आक्रमण कर दिया । उन्हें अपनी ओर आते देख अत्यन्त क्रोधमें भरे हुए धर्मात्मा वैकर्तन कर्णने एक नाराचद्वारा उनकी छातीमें प्रहार किया । फिर अमेय आत्मबलसे सम्पन्न उस वीरने उन्हें अपने बाणोंकी वर्षासे ढक दिया ॥ ३६-३७ ॥
स विद्धः सूतपुत्रेण छादयामास पत्रिभिः ।
विव्याध निशितैः कर्णं नवभिर्नतपर्वभिः ॥ ३८ ॥
पृष्ठ 1974
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
सूतपुत्रके द्वारा घायल होनेपर उन्होंने भी उसे बाणोंसे आच्छादित कर दिया और झुकी हुई गाँठवाले नौ तीखे बाणोंसे कर्णको बीध डाला ॥ ३८ ॥
तस्य कर्णो धनुर्मध्ये द्विधा चिच्छेद पत्रिभिः ।
अथैनं छिन्नधन्वानं प्रत्यविध्यत् स्तनान्तरे ॥ ३ ९ ॥
नाराचेन सुतीक्ष्णेन सर्वावरणभेदिना । तब कर्णने कई बाण मारकर भीमसेनके धनुषके बीचसे ही दो टुकड़े कर दिये । धनुष कट जानेपर उनकी छातीमें समस्त आवरणोंका भेदन करनेवाले अत्यन्त तीखे नाराचसे गहरी चोट पहुँचायी ॥ ३ ९ ३ ॥ सोऽन्यत् कार्मुकमादाय सूतपुत्रं वृकोदरः ॥ ४० ॥
राजन् मर्मसु मर्मज्ञो विव्याध निशितैः शरैः ।
ननाद बलवन्नादं कम्पयन्निव रोदसी ॥ ४१ ॥
राजन्! मर्मज्ञ भीमसेनने दूसरा धनुष लेकर सूतपुत्रके मर्मस्थानोंमें पैने बाणोंद्वारा प्रहार किया और पृथ्वी तथा आकाशको कँपाते हुए- से उन्होंने बड़े जोरसे गर्जना की ॥ ४०-४१ ॥
तं कर्णः पञ्चविंशत्या नाराचेन समार्पयत् ।
मदोत्कटं वने दृप्तमुल्काभिरिव कुञ्जरम् ॥ ४२ ॥
कर्णने भीमसेनको पचीस नाराच मारे, मानो किसी शिकारीने वनमें दर्पयुक्त मदोन्मत्त गजराजपर उल्काओंद्वारा प्रहार किया हो ॥ ४२ ॥
ततः सायकभिन्नाङ्गः पाण्डवः क्रोधमूर्च्छितः ।
संरम्भामर्षताम्राक्षः सूतपुत्रवधेप्सया ॥ ४३ ॥
स कार्मुके महावेगं भारसाधनमुत्तमम् ।
गिरीणामपि भेत्तारं सायकं समयोजयत् ॥ ४४ ॥
फिर कर्णके बाणोंसे सारा शरीर घायल हो जानेके कारण पाण्डुपुत्र भीमसेन क्रोधसे मूर्च्छित हो उठे । रोष और अमर्षसे उनकी आँखें लाल हो गयीं । उन्होंने सूतपुत्रके वधकी इच्छासे अपने धनुषपर एक अत्यन्त वेगशाली, भारसाधनमें समर्थ, उत्तम और पर्वतोंको भी विदीर्ण कर देनेवाले बाणका संधान किया ॥ ४३-४४ ॥
विकृष्य बलवच्चापमाकर्णादतिमारुतिः ।
तं मुमोच महेष्वासः क्रुद्धः कर्णजिघांसया ॥ ४५ ॥
फिर हनुमान्जीसे भी अधिक पराक्रम प्रकट करनेवाले महाधनुर्धर भीमसेनने धनुषको जोर- जोरसे कानतक खींचकर कर्णको मार डालनेकी इच्छासे उस बाणको क्रोधपूर्वक छोड़ दिया ॥ ४५ ॥
स विसृष्टो बलवता बाणो वज्राशनिस्वनः ।
अदारयद् रणे कर्णं वज्रवेगो यथाचलम् ॥ ४६ ॥
पृष्ठ 1975
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
बलवान् भीमसेनके हाथसे छूटकर वज्र और विद्युत् के समान शब्द करनेवाले उस बाणने रणभूमिमें कर्णको चीर डाला, मानो वज्रके वेगने पर्वतको विदीर्ण कर दिया हो ॥
स भीमसेनाभिहतः सूतपुत्रः कुरूद्वह ।
निषसाद रथोपस्थे विसंज्ञः पृतनापतिः ॥ ४७ ॥
कुरुश्रेष्ठ! भीमसेनकी गहरी चोट खाकर सेनापति सूतपुत्र कर्ण अचेत हो रथकी बैठकमें धम्मसे बैठ गया ॥
( रुधिरेणावसिक्ताङ्गो गतासुवदरिंदमः ।
एतस्मिन्नन्तरे दृष्ट्वा मद्रराजो वृकोदरम् ॥
जिह्वां छेत्तुं समायान्तं सान्त्वयन्निदमब्रवीत् । उसका सारा शरीर रक्तसे सिंच गया । शत्रुओंका दमन करनेवाला वह वीर प्राणहीन- सा हो गया था । इसी समय भीमसेनको कर्णकी जीभ काटनेके लिये आते देख मद्रराज शल्यने उन्हें सान्त्वना देते हुए इस प्रकार कहा । शल्य उवाच
भीमसेन महाबाहो यत् त्वां वक्ष्यामि तच्छृणु ।
वचनं हेतुसम्पन्नं श्रुत्वा चैतत् तथा कुरु ॥
शल्य बोले — महाबाहु भीमसेन! मैं तुमसे जो युक्तियुक्त वचन कह रहा हूँ, उसे सुनो
और सुनकर उसका पालन करो ।
अर्जुनेन प्रतिज्ञातो वधः कर्णस्य शुष्मिणः ॥
तां तथा कुरु भद्रं ते प्रतिज्ञां सव्यसाचिनः । अर्जुनने पराक्रमी कर्णके वधकी प्रतिज्ञा की है । तुम्हारा कल्याण हो । तुम सव्यसाची अर्जुनके उस प्रतिज्ञाको सफल करो । भीम उवाच दृढव्रतत्वं पार्थस्य जानामि नृपसत्तम । राज्ञस्तु धर्षणं पापः कृतवान् मम संनिधौ । ततः कोपाभिभूतेन शेषं न गणितं मया । भीमसेनने कहा –नृपश्रेष्ठ! मैं अर्जुनकी दृढ़ - प्रतिज्ञाको जानता हूँ; परंतु इस पापी कर्णने मेरे समीप ही राजा युधिष्ठिरका तिरस्कार किया है, अतः क्रोधके वशीभूत होकर मैंने
और किसी बातकी परवा नहीं की है ।
पतिते चापि राधेये न मे मन्युः शमं गतः ॥
जिह्वोद्धरणमेवास्य प्राप्तकालं मतं मम । यद्यपि` राधापुत्र कर्ण गिर गया है तो भी मेरा क्रोध अभी शान्त नहीं हुआ है । मैं तो इस समय इसकी जीभ खींच लेना ही उचित समझता हूँ ।
पृष्ठ 1976
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
अनेन सुनृशंसेन समवेतेषु राजसु ॥
अस्माकं शृण्वतां कृष्णा यानि वाक्यानि मातुल ।
असह्यानि च नीचेन बहूनि श्रावितानि भोः ॥
नूनं चैतत् परिज्ञातं दूरस्थस्यापि पार्थिव ।
छेदनं चास्य जिह्वायास्तदेवाकाङ्क्षितं मया ॥
मामाजी! इस नीच नृशंसने जहाँ बहुत- से राजा एकत्र हुए थे, वहाँ हमारे सुनते हुए द्रौपदीके प्रति बहुत - से असह्य कटुवचन सुनाये थे । राजन्! आप दूर होनेपर भी निश्चय ही यह समझ गये हैं कि मेरे द्वारा इसकी जीभ काटी जानेवाली है । वास्तवमें इस समय मैंने इसकी जीभ काटनेकी ही इच्छा की थी ।
राज्ञस्तु प्रियकामेन कालोऽयं परिपालितः ।
भवता तु यदुक्तोऽस्मि वाक्यं हेत्वर्थसंहितम् ॥
तद् गृहीतं महाराज कटुकस्थमिवौषधम् । केवल राजा युधिष्ठिरका प्रिय करनेके लिये मैंने आजतक प्रतीक्षा की है । महाराज! आपने जो युक्तियुक्त बात मुझसे कही है, उसे कड़वी दवाके समान मैंने ग्रहण कर लिया है । प्रतिज्ञो बीभत्सुर्न हि जीवेत कर्हिचित् ॥ अस्मिन् विनष्टे नष्टाः स्मः सर्व एव सकेशवाः । क्योंकि यदि अर्जुनकी प्रतिज्ञा भंग हो जायगी तो वे कभी जीवित नहीं रह सकेंगे;
उनके नष्ट होनेपर श्रीकृष्णसहित हम सब लोग भी नष्ट ही हो जायँगे ।
अद्य चैव नृशंसात्मा पापः पापकृतां वरः ॥
गमिष्यति पराभावं दृष्टमात्रः किरीटिना । आज किरीटधारी अर्जुनकी दृष्टि पड़ते ही यह पापाचारियोंमें श्रेष्ठ पापात्मा क्रूर कर्ण
पराभवको प्राप्त हो जायगा ।
युधिष्ठिरस्य कोपेन पूर्वं दग्धो नृशंसकृत् ॥
त्वया संरक्षितस्त्वस्य मत्समीपादुपायतः ॥ ) यह नृशंस कर्ण महाराज युधिष्ठिरके क्रोधसे पहले ही दग्ध हो चुका था । आज आपने उचित उपायद्वारा मेरे निकटसे इसकी रक्षा कर ली है ।
ततो मद्राधिपो दृष्ट्वा विसंज्ञं सूतनन्दनम् ।
अपोवाह रथेनाजौ कर्णमाहवशोभिनम् ॥ ४८ ॥
तदनन्तर मद्रराज शल्य संग्राममें शोभा पानेवाले सूतपुत्र कर्णको अचेत हुआ देख रथके द्वारा युद्धस्थलसे दूर हटा ले गये ॥ ४८ ॥
ततः पराजिते कर्णे धातराष्ट्रीं महाचमूम् ।
व्यद्रावयद् भीमसेनो यथेन्द्रो दानवान् पुरा ॥ ४ ९ ॥
पृष्ठ 1977
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
कर्णके पराजित हो जानेपर भीमसेन दुर्योधनकी विशाल सेनाको पुनः खदेड़ने ल् ठीक वैसे ही, जैसे पूर्वकालमें इन्द्रने दानवोंको मार भगाया था ॥ ४ ९ ॥ इति श्रीमहाभारते कर्णपर्वणि कर्णापयाने पञ्चाशत्तमोऽध्यायः ॥ ५० ॥
इसप्रकार श्रीमहाभारत कर्णपर्वमें कर्णका पलायनविषयक पचासवाँअध्याय पूरा हुआ ॥ ५० ॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठके १३ श्लोक मिलाकर कुल ६२ श्लोक हैं ) OFF FUEL
पृष्ठ 1978
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
एकपञ्चाशत्तमोऽध्यायः भीमसेनके द्वारा धृतराष्ट्रके छः पुत्रोंका वध, भीम और कर्णका युद्ध, भीमके द्वारा गजसेना, रथसेना और घुड़सवारोंका संहार तथा उभयपक्षकी सेनाओंका घोर युद्ध धृतराष्ट्रउवाच
सुदुष्करमिदं कर्म कृतं भीमेन संजय ।
येन कर्णो महाबाहू रथोपस्थे निपातितः ॥ १ ॥
धृतराष्ट्र बोले — संजय! भीमसेनने तो यह अत्यन्त दुष्कर कर्म कर डाला कि महाबाहु कर्णको रथकी बैठकमें गिरा दिया ॥ १ ॥
कर्णो ह्येको रणे हन्ता पाण्डवान् सृञ्जयैः सह ।
इति दुर्योधनः सूत प्राब्रवीन्मां मुहुर्मुहुः ॥ २ ॥
सूत! दुर्योधन मुझसे बारंबार कहा करता था कि ' कर्ण अकेला ही रणभूमिमें सृजयोंसहित समस्त पाण्डवोंका वध कर सकता है ' ॥ २ ॥
पराजितं तु राधेयं दृष्ट्वा भीमेन संयुगे ।
ततः परं किमकरोत् पुत्रो दुर्योधनो मम ॥ ३ ॥
परंतु उस दिन युद्धस्थलमें राधापुत्र कर्णको भीमसेनके द्वारा पराजित हुआ देखकर मेरे पुत्र दुर्योधनने क्या किया? ॥ ३ ॥
संजय उवाच
विमुखं प्रेक्ष्य राधेयं सूतपुत्रं महाहवे ।
पुत्रस्तव महाराज सोदर्यान् समभाषत ॥ ४ ॥
संजयने कहा — महाराज! सूतपुत्र राधाकुमार कर्णको महासमरमें पराङ्मुख हुआ देख आपका पुत्र अपने भाइयोंसे बोला- ॥ ४ ॥
शीघ्रं गच्छत भद्रं वो राधेयं परिरक्षत ।
भीमसेनभयागाधे मज्जन्तं व्यसनार्णवे ॥ ५ ॥
' तुम्हारा कल्याण हो । तुमलोग शीघ्र जाओ और राधापुत्र कर्णकी रक्षा करो । वह भीमसेनके भयसे भरे हुए संकटके अगाध महासागरमें डूब रहा है ' ॥ ५ ॥
ते तु राज्ञा समादिष्टा भीमसेनं जिघांसवः ।
अभ्यवर्तन्त संक्रुद्धाः पतङ्गाः पावकं यथा ॥ ६ ॥
राजा दुर्योधनकी आज्ञा पाकर आपके पुत्र अत्यन्त कुपित हो भीमसेनको मार डालनेकी इच्छासे उनके सामने गये, मानो पतंग आगके समीप जा पहुँचे हों ॥
पृष्ठ 1979
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
श्रुतर्वा दुर्धरः क्राथो विवित्सुर्विकटः समः ।
निषङ्गी कवची पाशी तथा नन्दोपनन्दकौ ॥ ७ ॥
दुष्प्रधर्षः सुबाहुश्च वातवेगसुवर्चसौ ।
धनुर्ग्राहो दुर्मदश्च जलसंधः शलः सहः ॥ ८ ॥
एते रथैः परिवृता वीर्यवन्तो महाबलाः ।
भीमसेनं समासाद्य समन्तात् पर्यवारयन् ॥ ९ ॥
श्रुतर्वा, दुर्धर, क्राथ (क्रथन ), विवित्सु, विकट ( विकटानन ), सम, निषंगी, कवची, पाशी, नन्द, उपनन्द, दुष्प्रधर्ष, सुबाहु, वातवेग, सुवर्चा, धनुग्रह, दुर्मद, जलसन्ध, शल और सह — ये महाबली और पराक्रमी आपके पुत्रगण, बहुसंख्यक रथोंसे घिरकर भीमसेनके पास जा पहुँचे और उन्हें सब ओरसे घेरकर खड़े हो गये ॥ ७ – ९ ॥
ते व्यमुञ्चञ्छरव्रातान् नानालिङ्गान् समन्ततः ।
स तैरभ्यर्द्यमानस्तु भीमसेनो महाबलः ॥ १० ॥
तेषामापततां क्षिप्रं सुतानां ते जनाधिप ।
रथैः पञ्चाशता सार्धं पञ्चाशदहनद् रथान् ॥ ११ ॥
वे चारों ओरसे नाना प्रकारके चिह्नोंसे युक्त बाण- समूहोंकी वर्षा करने लगे । नरेश्वर! उनसे पीड़ित होकर महाबली भीमसेनने पचास रथोंके साथ आये हुए आपके पुत्रोंके उन पचासों रथियोंको शीघ्र ही नष्ट कर दिया ॥
विवित्सोस्तु ततः क्रुद्धो भल्लेनापाहरच्छिरः ।
भीमसेनो महाराज तत् पपात हतं भुवि ॥ १२ ॥
सकुण्डलशिरस्त्राणं पूर्णचन्द्रोपमं तथा ।
पृष्ठ 1980
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
महाराज! तत्पश्चात् कुपित हुए भीमसेनने एक भल्लसे विवित्सुका सिर काट लिया । उसका वह कुण्डल और शिरस्त्राणसहित कटा हुआ मस्तक पूर्ण चन्द्रमाके समान पृथ्वीपर गिर पड़ा ॥ १२३ ॥
तं दृष्ट्वा निहतं शूरं भ्रातरः सर्वतः प्रभो ॥ १३ ॥
अभ्यद्रवन्त समरे भीमं भीमपराक्रमम् । प्रभो! उस शूरवीरको मारा गया देख उसके भाई समरभूमिमें भयंकर पराक्रमी भीमसेनपर सब ओरसे टूट पड़े ॥ १३३ ॥
ततोऽपराभ्यां भल्लाभ्यां पुत्रयोस्ते महाहवे ॥ १४ ॥
जहार समरे प्राणान् भीमो भीमपराक्रमः । तब भयानक पराक्रमसे सम्पन्न भीमसेनने उस महायुद्धमें दूसरे दो भल्लोंद्वारा रणभूमिमें आपके दो पुत्रोंके प्राण हर लिये ॥ १४३ ॥
तौ धरामन्वपद्येतां वातरुग्णाविव द्रुमौ ॥। १५ ॥ विकटश्च समश्चोभौ देवपुत्रोपमौ नृप ।