श्रीगणेशाय नमः।
महाभारत — खण्ड ४ — पृष्ठ 871–880
महाभारत — खण्ड ४ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 871–880
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यथैव च मम प्रीतिरर्जुने शत्रुसूदने ॥ १५ ॥
तथैव वृष्णिवीरेऽपि सात्वते युद्धदुर्मदे ।
अतिभारे नियुक्तश्च मया शैनेयनन्दनः ॥ १६ ॥
' शत्रुसूदन अर्जुनपर जैसा मेरा प्रेम है, वैसा ही रणदुर्मद वृष्णिवंशी वीर सात्यकिपर भी है । मैंने शिनिवंशका आनन्द बढ़ानेवाले सात्यकिको महान् कार्यभार सौंप रखा था ॥ १५-१६ ॥
स तु मित्रोपरोधेन गौरवात्तु महाबलः ।
प्रविष्टो भारतीं सेनां मकरः सागरं यथा ॥ १७ ॥
‘ उन महाबली सात्यकिने मित्रके अनुरोधसे और अपने लिये गौरवकी बात समझकर समुद्रमें मगरकी भाँति कौरवीसेनामें प्रवेश किया था ॥ १७ ॥
असौ हि श्रूयते शब्दः शूराणामनिवर्तिनाम् ।
मिथः संयुध्यमानानां वृष्णिवीरेण धीमता ॥ १८ ॥
‘ बुद्धिमान् वृष्णिवंशी वीर सात्यकिके साथ परस्पर युद्ध करनेवाले उन शूरवीरोंका वह महान् कोलाहल सुनायी पड़ता है, जो युद्धसे कभी पीछे नहीं हटते हैं ॥ १८ ॥
प्राप्तकालं सुबलवन्निश्चितं बहुधा हि मे ।
तत्रैव पाण्डवेयस्य भीमसेनस्य धन्विनः ॥ १ ९ ॥
गमनं रोचते मह्यं यत्र यातौ महारथौ । ' इस समय जो कर्तव्य प्राप्त है, उसपर मैंने अनेक प्रकारसे प्रबल विचार कर लिया है । जहाँ महारथी अर्जुन और सात्यकि गये हैं, वहीं धनुर्धर वीर पाण्डुनन्दन भीमसेनको भी जाना चाहिये — यही मुझे ठीक जँचता है ॥ १ ९ ३ ॥ न चाप्यसह्यं भीमस्य विद्यते भुवि किंचन ॥ २० ॥
शक्तो ह्येष रणे यत्तः पृथिव्यां सर्वधन्विनाम् ।
स्वबाहुबलमास्थाय प्रतिव्यूहितुमञ्जसा ॥ २१ ॥
'इस भूतलपर कोई ऐसा कार्य नहीं है, जो भीमसेनके लिये असह्य हो । ये अपने बाहुबलका आश्रय ले रणक्षेत्रमें प्रयत्नशील होकर भूमण्डलके समस्त धनुर्धरोंका अनायास ही सामना करनेमें समर्थ हैं ॥ २०-२१ ॥
यस्य बाहुबलं सर्वे समाश्रित्य महात्मनः ।
वनवासान्निवृत्ताः स्म न च युद्धेषु निर्जिताः ॥ २२ ॥
‘ इस महामनस्वी वीरके बाहुबलका आश्रय लेकर हम सब भाई वनवाससे सकुशल लौटे हैं और युद्धोंमें कभी पराजित नहीं हुए हैं ॥ २२ ॥
इतो गते भीमसेने सात्वतं प्रति पाण्डवे ।
सनाथौ भवितारौ हि युधि सात्वतफाल्गुनौ ॥ २३ ॥
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‘ यहाँसे सात्यकिके पथपर पाण्डुपुत्र भीमसेनके जानेपर युद्धस्थलमें डटे हुए सात्यकि और अर्जुन सनाथ हो जायँगे ॥ २३ ॥
कामं त्वशोचनीयौ तौ रणे सात्वतफाल्गुनौ ।
रक्षितौ वासुदेवेन स्वयं शस्त्रविशारदौ ॥ २४ ॥
‘ निश्चय ही सात्यकि और अर्जुन रणक्षेत्रमें शोकके योग्य नहीं हैं; क्योंकि वे दोनों स्वयं तो शस्त्रविद्यामें कुशल हैं ही, भगवान् श्रीकृष्णके द्वारा भी पूर्णरूपसे सुरक्षित हैं ॥ २४ ॥
अवश्यं तु मया कार्यमात्मनः शोकनाशनम् ।
तस्माद् भीमं नियोक्ष्यामि सात्वतस्य पदानुगम् ॥ २५ ॥
‘ तथापि मुझे अपने मानसिक दुःखको निवारण करनेके लिये ऐसी व्यवस्था अवश्य करनी चाहिये । इसलिये मैं भीमसेनको सात्यकिके मार्गका अनुगामी अवश्य बनाऊँगा ॥ २५ ॥
ततः प्रतिकृतं मन्ये विधानं सात्यकिं प्रति ।
एवं निश्चित्य मनसा धर्मपुत्रो युधिष्ठिरः ॥ २६ ॥
यन्तारमब्रवीद् राजा भीमं प्रति नयस्व माम् । ' ऐसा करके ही मैं समझँगा कि मैंने सात्यकिके प्रति समुचित कर्तव्यका पालन किया है । ' मन-ही- मन ऐसा निश्चय करके धर्मपुत्र राजा युधिष्ठिरने अपने सारथिसे कहा — ' मुझे भीमके पास ले चलो ' ॥ २६ ॥
धर्मराजवचः श्रुत्वा सारथिर्हयकोविदः ॥ २७ ॥
रथं हेमपरिष्कारं भीमान्तिकमुपानयत् । धर्मराजकी बात सुनकर अश्वसंचालनमें कुशल सारथिने उनके सुवर्णभूषित रथको भीमसेनके निकट पहुँचा दिया ॥ २७ ॥
भीमसेनमनुप्राप्य प्राप्तकालमचिन्तयत् ॥ २८ ॥
कश्मलं प्राविशद् राजा बहु तत्र समादिशन् । भीमसेनके पास पहुँचकर राजा युधिष्ठिर समयोचित कर्तव्यका चिन्तन करने लगे और वहाँ बहुत कुछ कहते हुए वे मूर्च्छित- से हो गये ॥ २८३ ॥
स कश्मलसमाविष्टो भीममाहूय पार्थिवः ॥ २ ९ ॥ अब्रवीद् वचनं राजन् कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः । राजन्! इस प्रकार मोहाविष्ट हुए कुन्तीपुत्र राजा युधिष्ठिरने भीमसेनको सम्बोधित करके इस प्रकार कहा— ॥ २ ९ ३ ॥ यः सदेवान् सगन्धर्वान् दैत्यांश्चैकरथोऽजयत् ॥ ३० ॥
तस्य लक्ष्म न पश्यामि भीमसेनानुजस्य ते ।
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‘ भीमसेन! जिन्होंने एकमात्र रथकी सहायतासे देवताओंसहित गन्धर्वों और दैत्योंपर भी विजय पायी थी, उन्हीं तुम्हारे छोटे भाई अर्जुनका आज मुझे कोई चिह्न नहीं दिखायी देता है ' ॥ ३० ॥
ततोऽब्रवीद् धर्मराजं भीमसेनस्तथागतम् ॥ ३१ ॥
नेवाद्राक्षं न चाश्रौषं तव कश्मलमीदृशम् । तब वैसी अवस्थामें पड़े हुए धर्मराज युधिष्ठिरसे भीमसेनने कहा – ' राजन्! आपकी ऐसी घबराहट तो पहले मैंने न कभी देखी थी और न सुनी ही थी ॥ ३१ ॥
पुरातिदुःखदीर्णानां भवान् गतिरभूद्धि नः ॥ ३२ ॥
उत्तिष्ठोत्तिष्ठ राजेन्द्र शाधि किं करवाणि ते । ‘ पहले जब कभी हमलोग अत्यन्त दुःखसे अधीर हो उठते थे, तब आप ही हमें सहारा दिया करते थे । राजेन्द्र! उठिये, उठिये, आज्ञा दीजिये, मैं आपकी क्या सेवा करूँ? ॥ ३२ || न ह्यसाध्यमकार्यं वा विद्यते मम मानद ॥ ३३ ॥
आज्ञापय कुरुश्रेष्ठ मा च शोके मनः कृथाः । ‘ मानद! इस संसारमें ऐसा कोई कार्य नहीं है, जो मेरे लिये असाध्य हो अथवा जिसे मैं आपकी आज्ञा मिलनेपर न करूँ । कुरुश्रेष्ठ! आज्ञा दीजिये । अपने मनको शोकमें न डालिये ' ॥ ३३३ ॥
तमब्रवीदश्रुपूर्णः कृष्णसर्प इव श्वसन् ॥ ३४ ॥
भीमसेनमिदं वाक्यं प्रम्लानवदनो नृपः । तब राजा युधिष्ठिर म्लानमुख हो काले सर्पके समान लंबी साँसें खींचते हुए नेत्रोंमें आँसू भरकर भीमसेनसे इस प्रकार बोले— ॥ ३४३ ॥
यथा शङ्खस्य निर्घोषः पाञ्चजन्यस्य श्रूयते ॥ ३५ ॥
पूरितो वासुदेवेन संरब्धेन यशस्विना ।
नूनमद्य हतः शेते तव भ्राता धनंजयः ॥ ३६ ॥
‘ भैया! इस समय पांचजन्य शंखकी जैसी ध्वनि सुनायी देती है और यशस्वी वासुदेवने क्रोधमें भरकर उस शंखको जिस तरह बजाया है, उससे जान पड़ता है, आज तुम्हारा भाई अर्जुन निश्चय ही मारा जाकर रणभूमिमें सो रहा है ॥ ३५-३६ ॥
तस्मिन् विनिहते नूनं युध्यतेऽसौ जनार्दनः ।
यस्य सत्त्ववतो वीर्यं ह्युपजीवन्ति पाण्डवाः ॥ ३७ ॥
यं भयेष्वभिगच्छन्ति सहस्राक्षमिवामराः ।
स शूरः सैन्धवप्रेप्सुरन्वयाद् भारतीं चमूम् ॥ ३८ ॥
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‘ उसके मारे जानेपर स्वयं भगवान् श्रीकृष्ण ही युद्ध कर रहे हैं । जिस शक्तिशाली वीरके पराक्रमका भरोसा करके हम समस्त पाण्डव जी रहे हैं, भयके अवसरोंपर हम उसी प्रकार जिसका आश्रय लेते हैं, जैसे देवता देवराज इन्द्रका, वही शूरवीर अर्जुन सिंधुराज जयद्रथको अपने वशमें करनेके लिये कौरव सेनामें घुसा है ॥ ३७-३८ ॥
तस्य वै गमनं विद्मो भीम नावर्तनं पुनः ।
श्यामो युवा गुडाकेशो दर्शनीयो महारथः ॥ ३ ९ ॥
‘ भीमसेन! हमें उसके जानेका ही पता है, पुनः लौटनेका नहीं । अर्जुनकी अंगकान्ति श्याम है । वह नवयुवक, निद्रापर विजय पानेवाला, देखनेमें सुन्दर और महारथी है ॥ ३ ९ ॥
व्यूढोरस्को महाबाहुर्मत्तद्विरदविक्रमः ।
चकोरनेत्रस्ताम्रास्यो द्विषतां भयवर्धनः ॥ ४० ॥
‘ उसकी छाती चौड़ी और भुजाएँ बड़ी- बड़ी हैं । उसका पराक्रम मतवाले हाथीके समान है, आँखें चकोरके नेत्रोंके समान विशाल हैं और उसके मुख एवं ओष्ठ लाल- लाल हैं । वह शत्रुओंका भय बढ़ाता है ॥ ४० ॥
( मम प्रियहितार्थं च शक्रलोकादिहागतः ।
वृद्धोपसेवी धृतिमान् कृतज्ञः सत्यसङ्गरः ॥
प्रविष्टो महतीं सेनामपर्यन्तां धनंजयः ।
प्रविष्टे च चमूं घोरामर्जुने शत्रुनाशने ॥
प्रेषितः सात्वतो वीरः फाल्गुनस्य पदानुगः । तस्याभिगमनं जाने भीम नावर्तनं पुनः ॥ ) ‘ अर्जुन मेरे प्रिय और हितके लिये इन्द्रलोकसे यहाँ आया है । वह वृद्धजनोंका सेवक, धैर्यवान्, कृतज्ञ तथा सत्यप्रतिज्ञ है । वह धनंजय शत्रुओंकी विशाल एवं अपार सेनामें घुसा है । शत्रुनाशन अर्जुनके उस भयंकर सेनामें प्रवेश करनेपर मैंने सात्वतवीर सात्यकिको उसके चरणोंका अनुगामी बनाकर भेजा है । भीमसेन! सात्यकिके भी मुझे जानेका ही पता है, लौटनेका नहीं ।
तदिदं मम भद्रं ते शोकस्थानमरिंदम ।
अर्जुनार्थे महाबाहो सात्वतस्य च कारणात् ॥ ४१ ॥
वर्धते हविषेवाग्निरिध्यमानः पुनः पुनः ।
तस्य लक्ष्म न पश्यामि तेन विन्दामि कश्मलम् ॥ ४२ ॥
' शत्रुदमन महाबाहु भीम! तुम्हारा कल्याण हो । यही मेरे शोकका कारण है । अर्जुन और सात्यकिके लिये ही मैं दुःखी हो रहा हूँ । जैसे बारंबार घी डालनेसे आग प्रज्वलित हो उठती है, उसी प्रकार मेरी शोकाग्नि बढ़ती जाती है । मैं अर्जुनका कोई चिह्न नहीं देखता, इसीसे मुझपर मोह छा रहा है ॥ ४१-४२ ॥ तं विद्धि पुरुषव्याघ्रं सात्वतं च महारथम् ।
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स तं महारथं पश्चादनुयातस्तवानुजम् ॥ ४३ ॥
‘उन सात्वतवंशी पुरुषसिंह महारथी सात्यकिका भी पता लगाओ । वे तुम्हारे छोटे भाई महारथी अर्जुनके पीछे गये हैं ॥ ४३ ॥
तमपश्यन्महाबाहुमहं विन्दामि कश्मलम् ।
पार्थे तस्मिन् हते चैव युध्यते नूनमग्रणीः ॥ ४४ ॥
‘ उन महाबाहु सात्यकिको न देखनेके कारण भी मैं भारी घबराहटमें पड़ गया हूँ ।
पार्थके मारे जानेपर अवश्य ही सात्यकि भी आगे होकर युद्ध कर रहे हैं ॥ ४४ ॥
सहायोनास्य वै कश्चित् तेन विन्दामि कश्मलम् ।
तस्मिन् कृष्णो हते नूनं युध्यते युद्धकोविदः ॥ ४५ ॥
‘ उनका कोई दूसरा सहायक नहीं है । इससे मुझे बड़ी घबराहट हो रही है । निश्चय ही उनके मारे जानेपर युद्धकलाकोविद भगवान् श्रीकृष्ण युद्ध कर रहे हैं ॥ ४५ ॥
न हि मे शुध्यते भावस्तयोरेव परंतप ।
स तत्र गच्छ कौन्तेय यत्र यातो धनंजयः ॥ ४६ ॥
सात्यकिश्च महावीर्यः कर्तव्यं यदि मन्यसे ।
वचनं मम धर्मज्ञ भ्राता ज्येष्ठो भवामि ते ॥ ४७ ॥
न तेऽर्जुनस्तथा ज्ञेयो ज्ञातव्यः सात्यकिर्यथा ।
चिकीर्षुर्मत्प्रियं पार्थ स यातः सव्यसाचिनः ।
पदवीं दुर्गमां घोरामगम्यामकृतात्मभिः ॥ ४८ ॥
‘ परंतप! अर्जुन और सात्यकिके जीवनके विषयमें जो मेरे मनमें संशय उत्पन्न हो गया है, वह दूर नहीं हो रहा है । अतः कुन्तीनन्दन! तुम वहीं जाओ, जहाँ अर्जुन और महापराक्रमी सात्यकि गये हैं। धर्मज्ञ! मैं तुम्हारा बड़ा भाई हूँ। यदि तुम मेरी आज्ञाका पालन करना उचित मानते हो तो ऐसा ही करो । तुम्हें अर्जुनकी उतनी खोज नहीं करनी है, जितनी सात्यकिकी । पार्थ! सात्यकिने मेरा प्रिय करनेकी इच्छासे सव्यसाची अर्जुनके उस दुर्गम एवं भयंकर पथका अनुसरण किया है, जो अजितात्मा पुरुषोंके लिये अगम्य है ॥ ४६–४८ ॥
दृष्ट्वा कुशलिनौ कृष्णौ सात्वतं चैव सात्यकिम् ।
संविदं चैव कुर्यास्त्वं सिंहनादेन पाण्डव ॥ ४९ ॥
‘ पाण्डुनन्दन! जब तुम भगवान् श्रीकृष्ण, अर्जुन तथा सात्वतवंशी वीर सात्यकिको सकुशल देखना, तब उच्च स्वरसे सिंहनाद करके मुझे इसकी सूचना दे देना ' ॥ इति श्रीमहाभारते द्रोणपर्वणि जयद्रथवधपर्वणि युधिष्ठिरचिन्तायां षड्विंशत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १२६ ॥
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इस प्रकार श्रीमहाभारत द्रोणपर्वके अन्तर्गत जयद्रथवधपर्वमें युधिष्ठिरकी चिन्ताविषयक एक सौ छब्बीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १२६ ॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठके ३ श्लोक मिलाकर कुल ५२ श्लोक हैं । ) Face
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सप्तविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः भीमसेनका कौरव सेनामें प्रवेश, द्रोणाचार्यके सारथिसहित रथका चूर्ण कर देना तथा उनके द्वारा धृतराष्ट्रके ग्यारह पुत्रोंका वध, अवशिष्ट पुत्रोंसहित सेनाका पलायन भीमसेन उवाच
ब्रह्मेशानेन्द्रवरुणानवहद् यः पुरा रथः ।
तमास्थाय गतौ कृष्णौ न तयोर्विद्यते भयम् ॥ १ ॥
भीमसेनने कहा – महाराज! जो रथ पहले ब्रह्मा, महादेव, इन्द्र और वरुणकी सवारीमें आ चुका है, उसीपर बैठकर श्रीकृष्ण और अर्जुन युद्धके लिये गये हैं । अतः उनके लिये तनिक भी भय नहीं है ॥ १ ॥
आज्ञां तु शिरसा बिभ्रदेष गच्छामि मा शुचः ।
समेत्य तान् नरव्याघ्रांस्तव दास्यामि संविदम् ॥ २ ॥
तथापि आपकी आज्ञा शिरोधार्य करके यह मैं जा रहा हूँ । आप शोक या चिन्ता न करें । मैं उन पुरुषसिंहोंसे मिलकर आपको सूचना दूँगा ॥ २ ॥
संजय उवाच
एतावदुक्त्वा प्रययौ परिदाय युधिष्ठिरम् ।
धृष्टद्युम्नाय बलवान् सुहृद्भयश्च पुनः पुनः ॥ ३ ॥
संजय कहते हैं - राजन्! ऐसा कहकर बलवान् भीमसेन राजा युधिष्ठिरको धृष्टद्युम्न तथा अन्य सुहृदोंकी देख - रेखमें सौंपकर वहाँसे चल दिये ॥ ३ ॥
धृष्टद्युम्नं चेदमाह भीमसेनो महाबलः ।
विदितं ते महाबाहो यथा द्रोणो महारथः ॥ ४ ॥
ग्रहणे धर्मराजस्य सर्वोपायेन वर्तते । जाते समय महाबली भीमसेनने धृष्टद्युम्नसे इस प्रकार कहा – ' महाबाहो! तुम्हें तो यह मालूम ही है कि महारथी द्रोण सारे उपाय करके किस प्रकार धर्मराजको पकड़नेपर तुले हुए हैं ॥ ४३ ॥
न च मे गमने कृत्यं तादृक् पार्षत विद्यते ॥ ५ ॥
यादृशं रक्षणे राज्ञः कार्यमात्ययिकं हि नः ।
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' अतः द्रुपदनन्दन! मेरे लिये वहाँ जानेकी वैसी आवश्यकता नहीं है, जैसी यहाँ रहकर राजाकी रक्षा करनेकी है । यही हमलोगोंके लिये सबसे महान् कार्य है ॥ ५३ ॥
एवमुक्तोऽस्मि पार्थेन प्रतिवक्तुं न चोत्सहे ॥ ६ ॥
प्रयास्ये तत्र यत्रासौ मुमूर्षुः सैन्धवः स्थितः ।
धर्मराजस्य वचने स्थातव्यमविशङ्कया ॥ ७ ॥
' परंतु जब कुन्तीनन्दन महाराजने इस प्रकार मुझे वहाँ जानेकी आज्ञा दे दी है, तब मैं उन्हें कोरा जवाब नहीं दे सकता - उनकी आज्ञा टाल नहीं सकता । अतः जहाँ मरणासन्न जयद्रथ खड़ा है, वहीं मैं जाऊँगा । मुझे बिना किसी संशयके धर्मराज युधिष्ठिरकी आज्ञाके अधीन रहना चाहिये ॥ ६-७ ॥
यास्यामि पदवीं भ्रातुः सात्वतस्य च धीमतः ।
सोऽद्य यत्तो रणे पार्थं परिरक्ष युधिष्ठिरम् ॥ ८ ॥
एतद्धि सर्वकार्याणां परमं कृत्यमाहवे । ' अतः अब मैं भाई अर्जुन तथा बुद्धिमान् सात्यकिके पथका अनुसरण करूँगा । अब तुम सावधान हो प्रयत्नपूर्वक रणभूमिमें कुन्तीकुमार राजा युधिष्ठिरकी रक्षा करो । इस युद्धस्थलमें यही हमारे लिये सब कार्योंसे बढ़कर महान् कार्य है ' ॥ ८३ ॥
तमब्रवीन्महाराज धृष्टद्युम्नो वृकोदरम् ॥ ९ ॥
ईप्सितं ते करिष्यामि गच्छ पार्थाविचारयन् । महाराज! यह सुनकर धृष्टद्युम्नने भीमसेनसे कहा – ' कुन्तीनन्दन! तुम कुछ भी सोच- विचार न करके जाओ । मैं तुम्हारी इच्छाके अनुसार सब कार्य करूँगा ॥ ९ ३ ॥ नाहत्वा समरे द्रोणो धृष्टद्युम्नं कथञ्चन ॥ १० ॥
निग्रहं धर्मराजस्य प्रकरिष्यति संयुगे । 'द्रोणाचार्य संग्राममें धृष्टद्युम्नका वध किये बिना किसी प्रकार धर्मराजको कैद नहीं कर सकेंगे ' ॥ १०३ ॥
ततो निक्षिप्य राजानं धृष्टद्युम्ने च पाण्डवम् ॥ ११ ॥
अभिवाद्य गुरुं ज्येष्ठं प्रययौ येन फाल्गुनः । तब भीमसेन पाण्डुपुत्र राजा युधिष्ठिरको धृष्टद्युम्नके हाथमें सौंपकर अपने बड़े भाईको प्रणाम करके जिस मार्गसे अर्जुन गये थे, उसीपर चल दिये ॥ ११३ || परिष्वक्तश्च कौन्तेयो धर्मराजेन भारत ॥ १२ ॥
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आघ्रातश्च तथा मूर्ध्नि श्रावितश्चाशिषः शुभाः । भारत! उस समय धर्मराज युधिष्ठिरने कुन्तीकुमार भीमसेनको गलेसे लगाया, उसका सिर सूँघा और उन्हें शुभ आशीर्वाद सुनाये ॥ १२३ ॥
कृत्वा प्रदक्षिणान् विप्रानर्चितांस्तुष्टमानसान् ॥ १३ ॥
आलभ्य मङ्गलान्यष्टौ पीत्वा कैरातकं मधु ।
द्विगुणद्रविणो वीरो मदरक्तान्तलोचनः ॥ १४ ॥
तदनन्तर पूजित एवं संतुष्टचित्त हुए ब्राह्मणोंकी परिक्रमा करके आठ* प्रकारकी मांगलिक वस्तुओंका स्पर्श करनेके पश्चात् भीमसेनने कैरातक मधुका पान किया । फिर तो वीर भीमसेनका बल और उत्साह दुगुना हो गया, उनके नेत्र मदसे लाल हो गये थे ॥ १३-१४ ॥
विप्रैः कृतस्वस्त्ययनो विजयोत्पादसूचितः ।
पश्यन्नेवात्मनो बुद्धिं विजयानन्दकारिणीम् ॥ १५ ॥
उस समय ब्राह्मणोंने स्वस्तिवाचन किया, जिससे विजय - लाभ सूचित होता था । उन्हें अपनी बुद्धि विजयानन्दका अनुभव करती - सी दिखायी दी ॥ १५ ॥
अनुलोमानिलैश्चाशु प्रदर्शितजयोदयः ।
भीमसेनो 'महाबाहुः कवची शुभकुण्डली ॥ १६ ॥
साङ्गदः सतलत्राणः सरथो रथिनां वरः । अनुकूल हवा चलकर उन्हें शीघ्र ही अवश्यम्भावी विजयकी सूचना देने लगी । रथियोंमें श्रेष्ठ महाबाहु भीमसेन कवच, सुन्दर कुण्डल, बाजूबन्द और तलत्राण ( दस्ताने ) धारण करके रथपर आरूढ़ हो गये ॥ १६३ ॥
तस्य कार्ष्णायसं वर्म हेमचित्रं महर्द्धिमत् ॥ १७ ॥
विबभौ सर्वतः श्लिष्टं सविद्युदिव तोयदः । उनका काले लोहेका बना हुआ सुवर्णजटित बहुमूल्य कवच उनके सारे अंगोंमें सटकर बिजलीसहित मेघके समान सुशोभित हो रहा था ॥ १७ ॥
पीतरक्तासितसितैर्वासोभिश्च सुवेष्टितः ॥ १८ ॥
कण्ठत्राणेन च बभौ सेन्द्रायुध इवाम्बुदः । लाल, पीले, काले और सफेद वस्त्रोंसे अपने शरीरको सुसज्जित करके कण्ठत्राण पहनकर वे इन्द्रधनुषयुक्त मेघके समान शोभा पा रहे थे ॥ १८ ॥
प्रयाते भीमसेने तु तव सैन्यं युयुत्सया ॥ १ ९ ॥ पाञ्चजन्यरवो घोरः पुनरासीद् विशाम्पते । प्रजानाथ! जब भीमसेन युद्धकी इच्छासे आपकी सेनाकी ओर प्रस्थित हुए, उस समय पुनः पांचजन्य शंखकी भयंकर ध्वनि प्रकट हुई ॥ १ ९ ३ ॥
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तं श्रुत्वा निनदं घोरं त्रैलोक्यत्रासनं महत् ॥ २० ॥
पुनर्भीमं महाबाहुं धर्मपुत्रोऽभ्यभाषत । त्रिलोकीको डरा देनेवाले उस घोर एवं महान् सिंहनादको सुनकर धर्मपुत्र युधिष्ठिरने ( जाते हुए ) महाबाहु भीमसेनसे पुनः इस प्रकार कहा – ॥ २०३३ ॥
एष वृष्णिप्रवीरेण ध्मातः सलिलजो भृशम् ॥ २१ ॥
पृथिवीं चान्तरिक्षं च विनादयति शङ्खराट् ।
नूनं व्यसनमापन्ने सुमहत् सव्यसाचिनि ॥ २२ ॥
कुरुभिर्युध्यते सार्धं सर्वैश्चक्रगदाधरः । ' भीम! देखो, यह वृष्णिवंशके प्रमुख वीर भगवान् श्रीकृष्णने बड़े जोरसे शंख बजाया है । यह शंखराज इस समय पृथ्वी और आकाश दोनोंको अपनी ध्वनिसे परिपूर्ण किये देता है । निश्चय ही सव्यसाची अर्जुनके भारी संकटमें पड़ जानेपर चक्र और गदा धारण करनेवाले भगवान् श्रीकृष्ण समस्त कौरवोंके साथ युद्ध कर रहे हैं ॥ २१-२२ ॥ आह कुन्ती नूनमार्या पापमद्य निदर्शनम् ॥ २३ ॥
द्रौपदी च सुभद्रा च पश्यन्त्यौ सह बन्धुभिः । ' आज अवश्य ही माता कुन्ती किसी दुःखद अपशकुनकी चर्चा करती होंगी । बन्धुओंसहित द्रौपदी और सुभद्रा भी कोई असगुन देख रही होंगी ॥ २३ || स भीम त्वरया युक्तो याहि यत्र धनंजयः ॥ २४ ॥
ह्यन्तीव हि मे सर्वा धनंजयदिदृक्षया ।
दिशश्च प्रदिशः पार्थ सात्वतस्य च कारणात् ॥ २५ ॥
‘ अतः भीम! तुम तुरंत ही जहाँ अर्जुन हैं, वहाँ जाओ । आज अर्जुनको देखनेके लिये मेरी सारी दिशाएँ मोहाच्छन्न- सी हो रही हैं । सात्यकिको न देख पानेके कारण भी मेरे लिये सारी दिशाओंमें अँधेरा छा गया है ' ॥ २४-२५ ॥
गच्छ गच्छेति गुरुणा सोऽनुज्ञातो वृकोदरः ।
ततः पाण्डुसुतो राजन् भीमसेनः प्रतापवान् ॥ २६ ॥
बद्धगोधाङ्गुलित्राणः प्रगृहीतशरासनः ।
ज्येष्ठेन प्रहितो भ्रात्रा भ्राता भ्रातुः प्रियंकरः ॥ २७ ॥
राजन्! इस प्रकार ‘ जाओ, जाओ ' कहकर बड़े भाईके आज्ञा देनेपर उदरमें वृक नामक अग्निको धारण करनेवाले प्रतापी पाण्डुपुत्र भीमसेन गोहके चमड़ेके बने हुए दस्ताने पहनकर हाथमें धनुष ले वहाँसे जानेके लिये तैयार हुए । वे भाईका प्रिय करनेवाले भाई थे और बड़े भाईके भेजनेसे ही वहाँसे जानेको उद्यत हुए थे ॥ २६-२७ ॥