श्रीगणेशाय नमः।
महाभारत — खण्ड ५ — पृष्ठ 1201–1210
महाभारत — खण्ड ५ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1201–1210
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अग्निके वेगसे बहता हुआ प्राण गुदाके निकट जाकर प्रतिहत हो जाता है; फिर ऊपरकी ओर लौटकर समीपवर्ती अग्निको भी ऊपर उठा देता है ॥ १३ ॥
पक्वाशयस्त्वधो नाभ्यामूर्ध्वमामाशयः स्थितः नाभिमध्ये शरीरस्य सर्वे प्राणाश्च संस्थिताः ॥ १४ ॥
नाभिसे नीचे पक्वाशय और ऊपर आमाशय स्थित है तथा नाभिके मध्यभागमें शरीरसम्बन्धी सभी प्राण स्थित हैं ॥ १४ ॥
प्रस्थिता हृदयात् सर्वे तिर्यगूर्ध्वमधस्तथा ।
वहन्त्यन्नरसात् नाड्यो दश प्राणप्रचोदिताः ॥ १५ ॥
वे समस्त प्राण हृदयसे इधर- उधर और ऊपर- नीचे प्रस्थान करते हैं; इसलिये दस * प्राणोंसे परिचालित होकर सारी नाड़ियाँ अन्नका रस वहन करती हैं ॥ १५ ॥
एष मार्गोऽथ योगानां येन गच्छन्ति तत्पदम् ।
जितक्लमाः समा धीरा मूर्धन्यात्मानमादधन् ॥ १६ ॥
यह मुखसे लेकर गुदातकका जो महान् स्रोत है, वह योगियोंका मार्ग है । उससे वे योगी परमपदको प्राप्त होते हैं, जिन्होंने सारे क्लेशोंको जीत लिया है, जो सर्वत्र समदर्शी और धीर हैं तथा जिन महात्माओंने सुषुम्णा नाड़ीके द्वारा मस्तकमें पहुँचकर वहीं अपने - आपको स्थित कर दिया है ॥ १६ ॥
एवं सर्वेषु विहितः प्राणापानेषु देहिनाम् ।
तस्मिन् समिध्यते नित्यमग्निः स्थाल्यामिवाहितः ॥ १७ ॥
प्राणियोंके प्राण, अपान आदि सभी वायुओंमें स्थापित हुई जठराग्नि शरीरमें ही रहकर सदा अग्नि-कुण्डमें रखी हुई अग्निकी भाँति प्रज्वलित होती रहती है ॥ १७ ॥
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि पञ्चाशीत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १८५ ॥ इसप्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें एक सौपचासीवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १८५ ॥
* प्राणवायुके दस भेद इस प्रकार हैं-प्राण, अपान, व्यान, उदान और समान तथा नाग, कूर्म, कृकल, देवदत्त और धनंजय ।
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षडशीत्यधिकशततमोऽध्यायः जीवकी सत्तापर नाना प्रकारकी युक्तियोंसे शंका उपस्थित करना भरद्वाज उवाच
यदि प्राणयते वायुर्वायुरेव विचेष्टते ।
श्वसित्याभाषते चैव तस्माज्जीवो निरर्थकः ॥ १ ॥
भरद्वाजने पूछा — भगवन्! यदि वायु ही प्राणीको जीवित रखती है, वायु ही शरीरको चेष्टाशील बनाती है, वही साँस लेती और वही बोलती भी है, तब तो इस शरीरमें जीवकी सत्ता स्वीकार करना व्यर्थ ही है ॥ १ ॥
यद्यूष्मभाव आग्नेयो वह्निना पच्यते यदि ।
अग्निर्जरयते चैतत् तस्माज्जीवो निरर्थकः ॥ २ ॥
यदि शरीरमें गर्मी अग्निका अंश है, यदि अग्निसे ही खाये हुए अन्नका परिपाक होता है, यदि अग्नि ही सबको जीर्ण करती है, तब तो जीवकी सत्ता मानना व्यर्थ ही है ॥ २ ॥
जन्तोः प्रमीयमाणस्य जीवो नैवोपलभ्यते ।
वायुरेव जहात्येनमूष्मभावश्च नश्यति ॥ ३ ॥
जब किसी प्राणीकी मृत्यु होती है; तब वहाँ जीवकी उपलब्धि नहीं होती । प्राणवायु ही इस प्राणीका परित्याग करती है और शरीरकी गर्मी नष्ट हो जाती है ॥ ३ ॥
यदि वायुमयो जीवः संश्लेषो यदि वायुना ।
वायुमण्डलवद् दृश्यो गच्छेत् सह मरुद्गणैः ॥ ४ ॥
यदि जीव वायुमय है, यदि वायुसे उसका घनिष्ठ सम्पर्क है, तब तो वायुमण्डलके समान उसे प्रत्यक्ष अनुभवमें आना चाहिये । वह मृत्युके पश्चात् वायुके साथ ही जाता हुआ दिखायी देना चाहिये ॥ ४ ॥
संश्लेषो यदि वातेन यदि तस्मात् प्रणश्यति ।
महार्णवविमुक्तत्वादन्यत् सलिलभाजनम् ॥ ५ ॥
यदि वायुके साथ जीवका दृढ़ संयोग है और उसीके कारण वह वायुके साथ ही नष्ट हो जाता है, तब तो जैसे जलपात्रमें पत्थर भरकर उसे कोई समुद्रमें डाल दे और वह डूब जाय, उसी प्रकार वायुके सम्पर्कसे ही जीवका विनाश मानना पड़ेगा । उस दशामें जैसे प्रस्तरसे पृथक् जलपात्रकी उपलब्धि होती है, उसी प्रकार प्राणवायुसे पृथक् जीवकी उपलब्धि होनी चाहिये ॥ ५ ॥
कूपे वा सलिलं दद्यात् प्रदीपं वा हुताशने ।
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क्षिप्रं प्रविश्य नश्येत यथा नश्यत्यसौ तथा ॥ ६ ॥
पञ्चधारणके ह्यस्मिन् शरीरे जीवितं कुतः ।
तेषामन्यतराभावाच्चतुर्णं नास्ति संशयः ॥ ७ ॥
अथवा जैसे कुआँमें जल गिराया जाय या जलती आगमें जला हुआ दीपक डाल दिया जाय, तो वे दोनों शीघ्र ही उनमें प्रविष्ट होकर अपना पृथक् अस्तित्व खो बैठते हैं । उसी प्रकार पांचभौतिक शरीरका नाश होनेपर जीव भी पाँचों तत्त्वमें विलीन होकर अपने पृथक् अस्तित्वसे रहित हो जाना चाहिये, ऐसा मान लेनेपर तो पाँच भूतोंसे धारण किये हुए इस शरीरमें जीव है ही कहाँ? अतः यह सिद्ध हुआ कि पांचभौतिक संघातसे भिन्न जीव नहीं है; उन पाँच तत्त्वोंमेंसे किसी एकका अभाव होनेपर शेष चारोंका भी अभाव हो जाता है--इसमें संशय नहीं है ॥ ६-७ ॥
नश्यन्त्यापो ह्यनाहाराद् वायुरुच्छ्वासनिग्रहात् ।
नश्यते कोष्ठभेदात् खमग्निर्नश्यत्यभोजनात् ॥ ८ ॥
जलका सर्वथा त्याग करनेसे शरीरके जलीय अंशका नाश हो जाता है, श्वास रुक जानेसे वायुका नाश होता है । उदरका भेदन होनेसे आकाशतत्त्व नष्ट होता है और भोजन बंद कर देनेसे शरीरके अग्नितत्त्वका नाश हो जाता है ॥ ८ ॥
व्याधिव्रणपरिक्लेशैर्मेदिनी चैव शीर्यते ।
पीडितेऽन्यतरे ह्येषां संघातो याति पञ्चधा ॥ ९ ॥
ज्वर आदि रोग, घाव तथा अन्यान्य प्रकारके क्लेशोंसे शरीरका पृथ्वीतत्त्व बिखर जाता है । इन पाँचों तत्त्वोंमेंसे एक तत्त्वको भी यदि हानि पहुँची तो इनका सारा संघात ही पंचत्वको प्राप्त हो जाता है ॥ ९ ॥
तस्मिन् पञ्चत्वमापन्ने जीवः किमनुधावति ।
किं वेदयति वा जीवः किं शृणोति ब्रवीति च ॥ १० ॥
पांचभौतिक संघात ( शरीर ) के नष्ट होनेपर यदि जीव है तो वह किसके पीछे दौड़ता है? क्या अनुभव करता है? क्या सुनता है और क्या बोलता है? ॥ १० ॥
एषा गौः परलोकस्थं तारयिष्यति मामिति ।
यो दत्त्वा म्रियते जन्तुः सा गौः कं तारयिष्यति ॥ ११ ॥
मृत्युके समय लोग इस आशासे गोदान करते हैं कि यह गौ परलोकमें जानेपर मुझे तार देगी; परंतु जीव तो गोदान करके मर जाता है; फिर वह गौ किसको तारेगी? ॥ ११ ॥
गौश्च प्रतिग्रहीता च दाता चैव समं यदा ।
इहैव विलयं यान्ति कुतस्तेषां समागमः ॥ १२ ॥
गौ, गोदान करनेवाला मनुष्य तथा उसको लेनेवाला ब्राह्मण – ये तीनों जब यहीं मर जाते हैं, तब परलोकमें उनका कैसे समागम होता है? ॥ १२ ॥
विहगैरुपभुक्तस्य शैलाग्रात् पतितस्य च ।
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अग्निना चोपयुक्तस्य कुतः संजीवनं पुनः ॥ १३ ॥
इनमेंसे जो मरता है, उसे या तो पक्षी खा जाते हैं या वह पर्वतके शिखरसे गिरकर चूर-चूर हो जाता है अथवा आगमें जलकर भस्म हो जाता है । ऐसी दशामें उनका पुनः जीवित होना कैसे सम्भव है? ॥ १३ ॥
छिन्नस्य यदि वृक्षस्य न मूलं प्रतिरोहति ।
बीजान्यस्य प्रवर्तन्ते मृतः क्व पुनरेष्यति ॥ १४ ॥
यदि जड़से कटे हुए वृक्षका मूल फिर अंकुरित नहीं होता है, केवल उसके बीज ही जमते हैं, तब मरा हुआ मनुष्य फिर कहाँसे आ जायगा? ॥ १४ ॥
बीजमात्रं पुरा सृष्टं यदेतत् परिवर्तते ।
मृतामृताः प्रणश्यन्ति बीजाद् बीजं प्रवर्तते ॥ १५ ॥
पूर्वकालमें बीजमात्रकी सृष्टि हुई थी, जिससे यह जगत् चलता आ रहा है । जो लोग मर जाते हैं, वे तो नष्ट हो जाते हैं और बीजसे बीज पैदा होता रहता है ॥ १५ ॥
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि जीवस्वरूपाक्षेपे षडशीत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १८६ ॥
इसप्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें जीवके स्वरूपपर आक्षेपविषयक एक सौछियासीवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १८६ ॥
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सप्ताशीत्यधिकशततमोऽध्यायः जीवकी सत्ता तथा नित्यताको युक्तियोंसे सिद्ध करना भृगुरुवाच
न प्रणाशोऽस्ति जीवस्य दत्तस्य च कृतस्य च ।
याति देहान्तरं प्राणी शरीरं तु विशीर्यते ॥ १ ॥
भृगुजीने कहा - ब्रह्मन्! जीवका तथा उसके दिये हुए दान एवं किये हुए कर्मका कभी नाश नहीं होता है । जीव तो दूसरे शरीरमें चला जाता है, केवल उसका छोड़ा हुआ शरीर ही यहाँ नष्ट होता है ॥ १ ॥
न शरीराश्रितो जीवस्तस्मिन् नष्टे प्रणश्यति ।
समिधामिव दग्धानां यथाग्निर्दृश्यते तथा ॥ २ ॥
शरीरके आश्रयसे रहनेवाला जीव उसके नष्ट होनेपर भी नष्ट नहीं होता है । जैसे समिधाओंके आश्रित हुई आग उनके जल जानेपर भी देखी जाती है, उसी प्रकार जीवकी सत्ताका भी प्रत्यक्ष अनुभव होता है ॥ २ ॥
भरद्वाज उवाच
अग्नेर्यथा तथा तस्य यदि नाशो न विद्यते ।
इन्धनस्योपयोगान्ते स चाग्निर्नोपलभ्यते ॥ ३ ॥
भरद्वाजने पूछा— भगवन्! यदि अग्निके समान जीवका नाश नहीं होता तो ईंधनके जल जानेपर वह भी तो बुझ ही जाती है; फिर उसकी तो उपलब्धि नहीं होती है ॥ ३ ॥
नश्यतीत्येव जानामि शान्तमग्निमनिन्धनम् ।
गतिर्यस्य प्रमाणं वा संस्थानं वा न विद्यते ॥ ४ ॥
अतः मैं ईंधनरहित बुझी हुई आगको यही समझता हूँ कि वह नष्ट हो गयी; क्योंकि जिसकी गति, प्रमाण अथवा स्थिति नहीं है, उसका नाश भी मानना पड़ता है । यही दशा जीवकी भी है ॥ ४ ॥
भृगुरुवाच
समिधामुपयोगान्ते यथाग्निर्नोपलभ्यते ।
आकाशानुगतत्वाद्धि दुर्ग्राह्यो हि निराश्रयः ॥ ५ ॥
- भृगुजीने कहा –मुने! समिधाओंके जल जानेपर अग्निका नाश नहीं होता । वह आकाशमें अव्यक्तरूपसे स्थित हो जाती है, इसलिये उसकी उपलब्धि नहीं होती; क्योंकि
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बिना किसी आश्रयके अग्निका ग्रहण होना अत्यन्त कठिन है ॥ ५ ॥
तथा शरीरसंत्यागे जीवो ह्याकाशवत् स्थितः ।
न गृह्यते तु सूक्ष्मत्वाद् यथा ज्योतिर्न संशयः ॥ ६ ॥
उसी प्रकार शरीरको त्याग देनेपर जीव आकाशकी भाँति स्थित होता है । वह अत्यन्त सूक्ष्म होनेके कारण बुझी हुई आगके समान अनुभवमें नहीं आता, परंतु रहता अवश्य है; इसमें संशय नहीं है ॥ ६ ॥
प्राणान् धारयते ह्यग्निः स जीव उपधार्यताम् ।
वायुसंधारणो ह्यग्निर्नश्यत्युच्छ्वासनिग्रहात् ॥ ७ ॥
अग्नि प्राणोंको धारण करती है । जीवको उस अग्निके समान ही ज्योतिर्मय समझो । उस अग्निको वायु देहके भीतर धारण किये रहती है । श्वास रुक जानेपर वायुके साथ - साथ अग्नि भी नष्ट हो जाती है ॥ ७ ॥
तस्मिन् नष्टे शरीराग्नौ ततो देहमचेतनम् ।
पतितं याति भूमित्वमयनं तस्य हि क्षितिः ॥ ८ ॥
जङ्गमानां हि सर्वेषां स्थावराणां तथैव च ।
आकाशं पवनोऽन्वेति ज्योतिस्तमनुगच्छति ।
तेषां त्रयाणामेकत्वाद् द्वयं भूमौ प्रतिष्ठितम् ॥ ९ ॥
उस शरीराग्निके नष्ट होनेपर अचेतन शरीर पृथ्वीपर गिरकर पार्थिवभावको प्राप्त हो जाता है; क्योंकि पृथ्वी ही उसका आधार है । समस्त स्थावरों और जंगमोंकी प्राणवायु आकाशको प्राप्त होती है और अग्नि भी उस वायुका ही अनुसरण करती है । इस प्रकार आकाश, वायु और अग्नि-ये तीन तत्त्व एकत्र हो जाते हैं और जल तथा पृथ्वी – दो तत्त्व भूमिपर ही रह जाते हैं ॥ ८ - ९ ॥
यत्र खं तत्र पवनस्तत्राग्निर्यत्र मारुतः ।
अमूर्तयस्ते विज्ञेया मूर्तिमन्तः शरीरिणाम् ॥ १० ॥
जहाँ आकाश होता है, वहीं वायुकी स्थिति होती है और जहाँ वायु होती है, वहीं अग्नि भी रहती है । ये तीनों तत्त्व यद्यपि निराकार हैं तथापि देहधारियोंके शरीरोंमें स्थित होकर मूर्तिमान् समझे जाते हैं ॥ १० ॥
भरद्वाज उवाच
यद्यग्निमारुतौ भूमिः खमापश्च शरीरिषु ।
जीवः किंलक्षणस्तत्रेत्येतदाचक्ष्व मेऽनघ ॥ ११ ॥
भरद्वाजने पूछा— निष्पाप मुनिवर! यदि देह- धारियोंके शरीरोंमें केवल अग्नि, वायु, भूमि, आकाश और जल तत्त्व ही विद्यमान है तो उनमें रहनेवाले जीवके क्या लक्षण हैं? यह मुझे बताइये ॥ ११ ॥
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पञ्चात्मके पञ्चरतौ पञ्चविज्ञानचेतने ।
शरीरे प्राणिनां जीवं वेत्तुमिच्छामि यादृशम् ॥ १२ ॥
प्राणियोंका शरीर पांचभौतिक है । पाँच विषयोंमें इसकी रति है । इसमें पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ और चित्त उपलब्ध होते हैं । इसमें रहनेवाले जीवका स्वरूप कैसा है; इस बातको मैं जानना चाहता हूँ ॥ १२ ॥
मांसशोणितसंघाते मेदः स्नाय्वस्थिसंचये ।
भिद्यमाने शरीरे तु जीवो नैवोपलभ्यते ॥ १३ ॥
रक्त और मांसके समूह, चर्बी, नाड़ी और हड्डियोंके संग्रहरूपी इस शरीरको चीरने-फाड़नेपर इसके भीतर कोई जीव नहीं उपलब्ध होता ॥ १३ ॥
यद्यजीवं शरीरं तु पञ्चभूतसमन्वितम् ।
शारीरे मानसे दुःखे कस्तां वेदयते रुजम् ॥ १४ ॥
यदि इस पांचभौतिक शरीरको जीवरहित मान लिया जाय, तब प्रश्न यह होता है कि शरीर अथवा मनमें पीड़ा होनेपर उसके कष्टका अनुभव कौन करता है? ॥ १४ ॥
शृणोति कथितं जीवः कर्णाभ्यां न शृणोति तत् ।
महर्षे मनसि व्यग्रे तस्माज्जीवो निरर्थकः ॥ १५ ॥
महर्षे! जीव किसीकी कही हुई बातको पहले दोनों कानोंसे सुनता है; परंतु यदि मनमें व्यग्रता रही तो वह सुनकर भी नहीं सुनता; इसलिये मनके अतिरिक्त किसी जीवकी सत्ता मानना व्यर्थ है ॥ १५ ॥
सर्वं पश्यति यद् दृश्यं मनोयुक्तेन चक्षुषा ।
मनसि व्याकुले चक्षुः पश्यन्नपि न पश्यति ॥ १६ ॥
जो भी दृश्य पदार्थ है, उसे प्राणी तभी देख पाता है जब कि उसकी दृष्टिके साथ मनका संयोग हो । यदि मन व्याकुल हो तो उसकी आँख देखती हुई भी नहीं देख पाती है ॥ १६ ॥
न पश्यति न चाघ्राति न शृणोति न भाषते ।
न च स्पर्शरसौ वेत्ति निद्रावशगतः पुनः ॥ १७ ॥
निद्राके वशमें पड़ा हुआ पुरुष ( सम्पूर्ण इन्द्रियोंके होते हुए भी ) न देखता है, न सूँघता है, न सुनता है, न बोलता है और न स्पर्श तथा रसका ही अनुभव करता है ॥ १७ ॥
हृष्यति क्रुद्धयते कोऽत्र शोचत्युद्विजते च कः ।
इच्छति ध्यायति द्वेष्टि वाचमीरयते च कः ॥ १८ ॥
अतः यह जिज्ञासा होती है कि इस शरीरके अंदर कौन हर्ष और कौन क्रोध करता है? किसे शोक और उद्वेग होता है? इच्छा, ध्यान, द्वेष और बातचीत कौन करता है? ॥ १८ ॥
भृगुरुवाच
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न पञ्चसाधारणमत्र किंचि- च्छरीरमेको वहतेऽन्तरात्मा । स वेत्ति गन्धांश्च रसान् श्रुतीश्च स्पर्शं च रूपं च गुणांश्च येऽन्ये ॥ १ ९ ॥ भृगुजीने कहा — मुने! मन भी पांचभौतिक ही है; अतः वह पाँचों भूतोंसे भिन्न कोई दूसरा तत्त्व नहीं है । एकमात्र अन्तरात्मा ही इस शरीरका भार वहन करता है, वही रूप, रस, गन्ध, स्पर्श तथा शब्दका और दूसरे भी जो गुण हैं, उनका अनुभव करता है ॥ १ ९ ॥ पञ्चात्मके पञ्चगुणप्रदर्शी स सर्वगात्रानुगतोऽन्तरात्मा । स वेत्ति दुःखानि सुखानि चात्र तद्विप्रयोगात् तु न वेत्ति देहः ॥ २० ॥
वह अन्तरात्मा पाँचों इन्द्रियोंके गुणोंको धारण करनेवाले मनका द्रष्टा है और वही इस पाञ्चभौतिक शरीरके सम्पूर्ण अवयवोंमें व्याप्त होकर सुख-दुःखका अनुभव करता है । जब उसका शरीरके साथ सम्बन्ध छूट जाता है, तब इस शरीरको सुख- दुःखका भान नहीं होता है ( इससे मनके अतिरिक्त उसके साक्षी आत्माकी सत्ता स्वतः सिद्ध हो जाती है ) ॥ २० ॥
यदा न रूपं न स्पर्शो नोष्मभावश्च पञ्चके ।
तदा शान्ते शरीराग्नौ देहत्यागे न नश्यति ॥ २१ ॥
जब पाञ्चभौतिक शरीरमें रूप, स्पर्श और गर्मीका भान नहीं होता, उस अवस्थामें शरीरस्थित अग्निके शान्त हो जानेपर जीवात्मा इस शरीरको त्यागकर भी नष्ट नहीं होता ॥ २१ ॥
आपोमयमिदं सर्वमापो मूर्तिः शरीरिणाम् ।
तत्रात्मा मानसो ब्रह्मा सर्वभूतेषु लोककृत् ॥ २२ ॥
यह सब प्रपंच जलमय है, प्राणियोंका यह शरीर भी प्रायः जलमय ही है । उसमें मनमें रहनेवाला आत्मा विद्यमान है । वही सम्पूर्ण भूतोंमें लोकस्रष्टा ब्रह्माके नामसे विख्यात है; क्योंकि समस्त जीवोंके संघातका ही नाम ब्रह्मा है ॥ २२ ॥
आत्मा क्षेत्रज्ञ इत्युक्तः संयुक्तः प्राकृतैर्गुणैः ।
तैरेव तु विनिर्मुक्तः परमात्मेत्युदाहृतः ॥ २३ ॥
आत्मा जब प्राकृत गुणोंसे युक्त होता है, तब उसे क्षेत्रज्ञ कहते हैं और उन्हीं गुणोंसे जब वह मुक्त हो जाता है, तब परमात्मा कहलाता है ॥ २३ ॥
आत्मानं तं विजानीहि सर्वलोकहितात्मकम् ।
तस्मिन् यः संश्रितो देहे ह्यब्बिन्दुरिव पुष्करे ॥ २४ ॥
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तुम क्षेत्रज्ञको आत्मा ही समझो । वह सर्वलोक-हितकारी है । इस शरीरमें रहकर भी वह कमल - पत्रपर पड़े हुए जलबिन्दुकी तरह वास्तवमें इससे पृथक् ही है ॥ २४ ॥
क्षेत्रज्ञं तं विजानीहि नित्यं लोकहितात्मकम् ।
तमो रजश्च सत्त्वं च विद्धि जीवगुणानिमान् ॥ २५ ॥
उस क्षेत्रज्ञको सदा आत्मा ही जानो । वह सम्पूर्ण जगत्का हितस्वरूप है । तमोगुण, रजोगुण और सत्त्वगुण- इन तीनों प्राकृत गुणोंको प्रकृति -स्थित होनेके कारण जीवके गुण समझो ॥ २५ ॥
सचेतनं जीवगुणं वदन्ति स चेष्टते चेष्टयते च सर्वम् । अतः परं क्षेत्रविदो वदन्ति प्रावर्तयद् यो भुवनानि सप्त ॥ २६ ॥
चेतन जीवके सम्बन्धसे उपर्युक्त जीवके गुणोंको चेतनायुक्त कहते हैं । वह जीव स्वयं चेष्टा करता है और सबसे चेष्टा करवाता है । शरीरके तत्त्वको जाननेवाले पुरुष इस क्षेत्रज्ञ आत्मासे उस परमात्माको श्रेष्ठ बताते हैं, जिसने भूः भुवः आदि सातों लोकोंको उत्पन्न किया है ॥ २६ ॥
न जीवनाशोऽस्ति हि देहभेदे मिथ्यैतदाहुर्मृत इत्यबुद्धाः । जीवस्तु देहान्तरितः प्रयाति दशार्धतैवास्य शरीरभेदः ॥ २७ ॥
देहका नाश होनेपर भी जीवका नाश नहीं होता । जो जीवकी मृत्यु बताते हैं, वे अज्ञानी हैं और उनका वह कथन मिथ्या है । जीव तो इस मृत देहका त्याग करके दूसरे शरीरमें चला जाता है । शरीरके पाँच तत्त्वोंका अलग- अलग हो जाना ही शरीरका नाश है ॥ २७ ॥
एवं सर्वेषु भूतेषु गूढश्चरति संवृतः ।
दृश्यते त्वग्र्यया बुद्धया सूक्ष्मया तत्त्वदर्शिभिः ॥ २८ ॥
इस प्रकार आत्मा सम्पूर्ण प्राणियोंके भीतर उनकी हृदयगुफामें गूढ़भावसे छिपा रहता है । वह तत्त्वदर्शी पुरुषोंद्वारा तीक्ष्ण एवं सूक्ष्म बुद्धिसे साक्षात् किया जाता है ॥ तं पूर्वापररात्रेषु युञ्जानः सततं बुधः लघ्वाहारो विशुद्धात्मा पश्यत्यात्मानमात्मनि ॥ २ ९ ॥ जो विद्वान् परिमित आहार करके रातके पहले और पिछले पहरमें सदा ध्यानयोगका अभ्यास करता है, वह अन्तःकरण शुद्ध होनेपर अपने हृदयमें ही उस आत्माका साक्षात्कार कर लेता है ॥ २ ९ ॥
चित्तस्य हि प्रसादेन हित्वा कर्म शुभाशुभम् ।
प्रसन्नात्माऽऽत्मनि स्थित्वा सुखमानन्त्यमश्नुते ॥ ३० ॥
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चित्त शुद्ध होनेपर वह शुभाशुभ कर्मोंसे अपना सम्बन्ध हटाकर प्रसन्नचित्त हो आत्मस्वरूपमें स्थित हो जाता है और अनन्त आनन्दका अनुभव करने लगता है ॥ ३० ॥
मानसोऽग्निः शरीरेषु जीव इत्यभिधीयते ।
सृष्टिः प्रजापतेरेषा भूताध्यात्मविनिश्चये ॥ ३१ ॥
समस्त शरीरोंमें मनके भीतर रहनेवाला जो अग्निके समान प्रकाशस्वरूप चैतन्य है, उसीको समष्टि जीवस्वरूप प्रजापति कहते हैं । उसी प्रजापतिसे यह सृष्टि उत्पन्न हुई है । यह बात अध्यात्मतत्त्वका निश्चय करके कही गयी है ॥ ३१ ॥
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि भृगुभरद्वाजसंवादे जीवस्वरूपनिरूपणे सप्ताशीत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १८७ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें भृगु- भरद्वाजके संवादके प्रसंगमें जीवके स्वरूपका निरूपणविषयक एक सौ सतासीवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १८७ ॥
* जैसे लोहा दाहक एवं दीप्तिमान् हो उठता है, उसी प्रकार चेतन जीवके संसर्गसे उसके सत्त्वादि गुणको भी चैतन्ययुक्त कहते हैं ।