श्रीगणेशाय नमः।
महाभारत — खण्ड ५ — पृष्ठ 1211–1220
महाभारत — खण्ड ५ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1211–1220
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अष्टाशीत्यधिकशततमोऽध्यायः वर्णविभागपूर्वक मनुष्योंकी और समस्त प्राणियोंकी उत्पत्तिका वर्णन भृगुरुवाच
असृजद् ब्राह्मणानेव पूर्वं ब्रह्मा प्रजापतीन् ।
आत्मतेजोभिनिर्वृत्तान् भास्कराग्निसमप्रभान् ॥ १ ॥
भृगुजी कहते हैं - मुने! ब्रह्माजीने सृष्टिके प्रारम्भमें अपने तेजसे सूर्य और अग्निके समान प्रकाशित होनेवाले ब्राह्मणों, मरीचि आदि प्रजापतियोंको ही उत्पन्न किया ॥ १ ॥
ततः सत्यं च धर्मं च तपो ब्रह्म च शाश्वतम् ।
आचारं चैव शौचं च स्वर्गाय विदधे प्रभुः ॥ २ ॥
उसके बाद भगवान् ब्रह्माने स्वर्ग-प्राप्तिके साधनभूत सत्य, धर्म, तप, सनातन वेद, आचार और शौचके नियम बनाये ॥ २ ॥
देवदानवगन्धर्वा दैत्यासुरमहोरगाः ।
यक्षराक्षसनागाश्च पिशाचा मनुजास्तथा ॥ ३ ॥
तदनन्तर देवता, दानव, गन्धर्व, दैत्य, असुर, महान् सर्प, यक्ष, राक्षस, नाग, पिशाच और मनुष्योंको उत्पन्न किया ॥ ३ ॥
ब्राह्मणाः क्षत्रिया वैश्याः शूद्राश्च द्विजसत्तम ।
ये चान्ये भूतसङ्घानां सङ्घास्तांश्चापि निर्ममे ॥ ४ ॥
द्विजश्रेष्ठ! फिर उन्होंने ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र– इन चारों वर्णोंकी रचना की और प्राणिसमूहोंमें जो अन्य समुदाय हैं, उनकी भी सृष्टि की ॥ ४ ॥
ब्राह्मणानां सितो वर्णः क्षत्रियाणां तु लोहितः ।
वैश्यानां पीतको वर्णः शूद्राणामसितस्तथा ॥ ५ ॥
ब्राह्मणोंका रंग श्वेत, क्षत्रियोंका लाल, वैश्योंका पीला तथा शूद्रोंका काला बनाया ॥ ५ ॥
भरद्वाजउवाच
चातुर्वर्ण्यस्य वर्णेन यदि वर्णो विभिद्यते ।
सर्वेषां खलु वर्णानां दृश्यते वर्णसंकरः ॥ ६ ॥
भरद्वाजने पूछा — प्रभो! यदि चारों वर्णोंमेंसे एक वर्णके साथ दूसरे वर्णका रंग - भेद है, तब तो सभी वर्णोंमें विभिन्न रंगके मनुष्य होनेके कारण वर्णसंकरता ही दिखायी देती ॥ ६ ॥
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कामः क्रोधो भयं लोभः शोकश्चिन्ता क्षुधा श्रमः ।
सर्वेषां नः प्रभवति कस्माद् वर्णो विभिद्यते ॥ ७ ॥
काम, क्रोध, भय, लोभ, शोक, चिन्ता, क्षुधा और थकावटका प्रभाव हम सब लोगोंपर समानरूपसे ही पड़ता है; फिर वर्णोंका भेद कैसे सिद्ध होता है? ॥ ७ ॥
स्वेदमूत्रपुरीषाणि श्लेष्मा पित्तं सशोणितम् ।
तनुः क्षरति सर्वेषां कस्माद् वर्णो विभज्यते ॥ ८ ॥
हम सब लोगोंके शरीरसे पसीना, मल, मूत्र, कफ, पित्त और रक्त निकलते हैं । ऐसी दशामें रंगके द्वारा वर्णोंका विभाग कैसे किया जा सकता है? ॥ ८ ॥
जङ्गमानामसंख्येयाः स्थावराणां च जातयः ।
तेषां विविधवर्णानां कुतो वर्णविनिश्चयः ॥ ९ ॥
पशु, पक्षी, मनुष्य आदि जंगम प्राणियों तथा वृक्ष आदि स्थावर जीवोंकी असंख्य जातियाँ हैं । उनके रंग भी नाना प्रकारके हैं, अतः उनके वर्णोंका निश्चय कैसे हो सकता है? ॥ ९ ॥
भृगुरुवाच
न विशेषोऽस्ति वर्णानां सर्व ब्राह्ममिदं जगत् ।
ब्रह्मणा पूर्वसृष्टं हि कर्मभिर्वर्णतां गतम् ॥ १० ॥
भृगुजीने कहा - मुने! पहले वर्णोंमें कोई अन्तर नहीं था, ब्रह्माजीसे उत्पन्न होनेके कारण यह सारा जगत् ब्राह्मण ही था । पीछे विभिन्न कर्मोंके कारण उनमें वर्णभेद हो गया ॥ १० ॥
कामभोगप्रियास्तीक्ष्णाः क्रोधनाः प्रियसाहसाः ।
त्यक्तस्वधर्मा रक्ताङ्गास्ते द्विजाः क्षत्रतां गताः ॥ ११ ॥
जो अपने ब्राह्मणोचित धर्मका परित्याग करके विषयभोगके प्रेमी, तीखे स्वभाववाले, क्रोधी और साहसका काम पसंद करनेवाले हो गये और इन्हीं कारणोंसे जिनके शरीरका रंग लाल हो गया, वे ब्राह्मण क्षत्रिय भावको प्राप्त हुए- क्षत्रिय कहलाने लगे ॥ ११ ॥
गोभ्यो वृत्तिं समास्थाय पीताः कृष्युपजीविनः ।
स्वधर्मान् नानुतिष्ठन्ति ते द्विजा वैश्यतां गताः ॥ १२ ॥
जिन्होंने गौओंसे तथा कृषिकर्मके द्वारा जीविका चलानेकी वृत्ति अपना ली और उसीके कारण जिनके रंग पीले पड़ गये तथा जो ब्राह्मणोचित धर्मको छोड़ बैठे, वे ही ब्राह्मण वैश्यभावको प्राप्त हुए ॥ १२ ॥
हिंसानृतप्रिया लुब्धाः सर्वकर्मोपजीविनः ।
कृष्णाः शौचपरिभ्रष्टास्ते द्विजाः शूद्रतां गताः ॥ १३ ॥
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जो शौच और सदाचारसे भ्रष्ट होकर हिंसा और असत्यके प्रेमी हो गये, लोभवश व्याधोंके समान सभी तरहके निन्द्य कर्म करके जीविका चलाने लगे और इसीलिये जिनके शरीरका रंग काला पड़ गया, वे ब्राह्मण शूद्रभावको प्राप्त हो गये ॥ १३ ॥
इत्येतैः कर्मभिर्व्यस्ता द्विजा वर्णान्तरं गताः ।
धर्मो यज्ञक्रिया तेषां नित्यं न प्रतिषिध्यते ॥ १४ ॥
इन्हीं कर्मोंके कारण ब्राह्मणत्वसे अलग होकर वे सभी ब्राह्मण दूसरे- दूसरे वर्णके हो गये, किंतु उनके लिये नित्यधर्मानुष्ठान और यज्ञकर्मका कभी निषेध नहीं किया गया है ॥ १४ ॥
इत्येते चतुरो वर्णा येषां ब्राह्मी सरस्वती ।
विहिता ब्रह्मणा पूर्वं लोभात् त्वज्ञानतां गताः ॥ १५ ॥
इस प्रकार ये चार वर्ण हुए, जिनके लिये ब्रह्माजीने पहले ब्राह्मी सरस्वती ( वेदवाणी ) प्रकट की । परंतु लोभविशेषके कारण शूद्र अज्ञानभावको प्राप्त हुए — वेदाध्ययनके अनधिकारी हो गये ॥ १५ ॥
ब्राह्मणा ब्रह्मतन्त्रस्थास्तपस्तेषां न नश्यति ।
ब्रह्म धारयतां नित्यं व्रतानि नियमांस्तथा ॥ १६ ॥
जो ब्राह्मण वेदकी आज्ञाके अधीन रहकर सारा कार्य करते, वेदमन्त्रोंको स्मरण रखते और सदा व्रत एवं नियमोंका पालन करते हैं, उनकी तपस्या कभी नष्ट नहीं होती ॥ १६ ॥
ब्रह्म चैव परं सृष्टं ये न जानन्ति तेऽद्विजाः ।
तेषां बहुविधास्त्वन्यास्तत्र तत्र हि जातयः ॥ १७ ॥
जो इस सारी सृष्टिको परब्रह्म परमात्माका रूप नहीं जानते हैं, वे द्विज कहलानेके अधिकारी नहीं हैं । ऐसे लोगोंको नाना प्रकारकी दूसरी -दूसरी योनियोंमें जन्म लेना पड़ता है ॥ १७ ॥
पिशाचा राक्षसाः प्रेता विविधा म्लेच्छजातयः ।
प्रणष्टज्ञानविज्ञानाः स्वच्छन्दाचारचेष्टिता ॥ १८ ॥
वे ज्ञान- विज्ञानसे हीन और स्वेच्छाचारी लोग पिशाच, राक्षस, प्रेत तथा नाना प्रकारकी म्लेच्छ-जातिके होते हैं ॥ १८ ॥
प्रजा ब्राह्मणसंस्काराः स्वकर्मकृतनिश्चयाः ।
ऋषिभिः स्वेन तपसा सृज्यन्ते चापरे परैः ॥ १ ९ ॥
पीछेसे ऋषियोंने अपनी तपस्याके बलसे कुछ ऐसी प्रजा उत्पन्न की, जो वैदिक संस्कारोंसे सम्पन्न तथा अपने धर्म - कर्ममें दृढ़तापूर्वक डटी रहनेवाली थी । इस प्रकार प्राचीन ऋषियोंद्वारा अर्वाचीन ऋषियोंकी सृष्टि होने लगी ॥ १ ९ ॥
आदिदेवसमुद्भूता ब्रह्ममूलाक्षयाव्यया ।
सा सृष्टिर्मानसी नाम धर्मतन्त्रपरायणा ॥ २० ॥
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किंतु जो सृष्टि आदिदेव ब्रह्माके मनसे उत्पन्न हुई है, जिसके जड़ - मूल केवल ब्रह्माजी ही हैं तथा जो अक्षय, अविकारी एवं धर्ममें तत्पर रहनेवाली है, वह सृष्टि मानसी कहलाती है ॥ २० ॥
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि भृगुभरद्वाजसंवादे वर्णविभागकथने अष्टाशीत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १८८ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें भृगु- भरद्वाजके प्रसंगमें वर्णोंके विभागका वर्णनविषयक एक सौ अट्ठासीवाँअध्याय पूरा हुआ ॥ १८८ ॥
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एकोननवत्यधिकशततमोऽध्यायः चारों वर्णोंके अलग - अलग कर्मोंका और सदाचारका वर्णन तथा वैराग्यसे परब्रह्मकी प्राप्ति भरद्वाज उवाच
ब्राह्मणः केन भवति क्षत्रियो वा द्विजोत्तम ।
वैश्यः शूद्रश्च विप्रर्षे तद् ब्रूहि वदतां वर ॥ १ ॥
भरद्वाजने पूछा — वक्ताओंमें श्रेष्ठ ब्रह्मर्षे! द्विजोत्तम! अब मुझे यह बताइये कि मनुष्य कौन - सा कर्म करनेसे ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य अथवा शूद्र होता है? ॥ १ ॥
भृगुरुवाच
जातकर्मादिभिर्यस्तु संस्कारैः संस्कृतः शुचिः ।
वेदाध्ययनसम्पन्नः षट्सु कर्मस्ववस्थितः ॥ २ ॥
शौचाचारस्थितः सम्यग्विघसाशी गुरुप्रियः ।
नित्यव्रती सत्यपरः स वै ब्राह्मण उच्यते ॥ ३ ॥
भृगुजीने कहा- जो जाति, कर्म आदि संस्कारोंसे सम्पन्न, पवित्र तथा वेदोंके स्वाध्यायमें संलग्न है, ( यजन- याजन, अध्ययनाध्यापन और दान - प्रतिग्रह – इन) छः कर्मोंमें स्थित रहता है, शौच एवं सदाचारका पालन तथा परम उत्तम यज्ञशिष्ट अन्नका भोजन करता है, गुरुके प्रति प्रेम रखता, नित्य व्रतका पालन करता तथा सत्यमें तत्पर रहता है, वही ब्राह्मण कहलाता है ॥ २-३ ॥
सत्यं दानमथाद्रोह आनृशंस्यं त्रपा घृणा ।
तपश्च दृश्यते यत्र स ब्राह्मण इति स्मृतः ॥ ४ ॥
जिसमें सत्य, दान, द्रोह न करनेका भाव, क्रूरताका अभाव, लज्जा, दया और तप--ये सद्गुण देखे जाते हैं, वह ब्राह्मण माना गया है ॥ ४ ॥
क्षत्रजं सेवते कर्म वेदाध्ययनसंगतः ।
दानादानरतिर्यस्तु स वै क्षत्रिय उच्यते ॥ ५ ॥
जो क्षत्रियोचित युद्ध आदि कर्मका सेवन करता है, वेदोंके अध्ययनमें लगा रहता है, ब्राह्मणोंको दान देता है और प्रजासे कर लेकर उसकी रक्षा करता है, वह क्षत्रिय कहलाता है ॥ ५ ॥
वणिज्या पशुरक्षा च कृष्यादानरतिः शुचिः ।
वेदाध्ययनसम्पन्नः स वैश्य इति संज्ञितः ॥ ६ ॥
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इसी प्रकार जो वेदाध्ययनसे सम्पन्न होकर व्यापार, पशुपालन और खेतीका काम करके अन्न संग्रह करनेकी रुचि रखता है और पवित्र रहता है, वह वैश्य कहलाता है ॥
सर्वभक्षरतिर्नित्यं सर्वकर्मकरोऽशुचिः ।
त्यक्तवेदस्त्वनाचारः स वै शूद्र इति स्मृतः ॥ ७ ॥
किंतु जो वेद और सदाचारका परित्याग करके सदा सब कुछ खानेमें अनुरक्त रहता है और सब तरहके काम करता है, साथ ही बाहर- भीतरसे अपवित्र रहता है, वह शूद्र कहा गया है ॥ ७ ॥
शूद्रे चैतद्भवेल्लक्ष्यं द्विजे तच्च न विद्यते ।
न वै शूद्रो भवेच्छूद्रो ब्राह्मणो न च ब्राह्मणः ॥ ८ ॥
उपर्युक्त सत्य आदि सात गुण यदि शूद्रमें दिखायी दें और ब्राह्मणमें न हों तो वह शूद्र शूद्र नहीं है और वह ब्राह्मण ब्राह्मण नहीं है ॥ ८ ॥
सर्वोपायैस्तु लोभस्य क्रोधस्य च विनिग्रहः ।
एतत् पवित्रं ज्ञानानां तथा चैवात्मसंयमः ॥ ९ ॥
सभी उपायोंसे लोभ और क्रोधको जीतना चाहिये । यही ज्ञानोंमें पवित्र ज्ञान है और यही आत्मसंयम है ॥
वार्यौ सर्वात्मना तौ हि श्रेयोघातार्थमुच्छ्रितौ ।
नित्यं क्रोधाच्छ्रियं रक्षेत् तपो रक्षेच्च मत्सरात् ॥ १० ॥
विद्यां मानापमानाभ्यामात्मानं तु प्रमादतः । क्रोध और लोभ मनुष्यके कल्याणमें बाधा डालनेके लिये सदा उद्यत रहते हैं; अतः पूरी शक्ति लगाकर इन दोनोंका निवारण करना चाहिये । धन- सम्पत्तिको क्रोधके आघातसे बचाना चाहिये, तपको मात्सर्यके आघातसे बचाना चाहिये, विद्याको मान- अपमानसे और अपने- आपको प्रमादके आक्रमणके बचाना चाहिये ॥ १० ॥
यस्य सर्वे समारम्भा निराशीर्बन्धना द्विज ॥ ११ ॥
त्यागे यस्य हुतं सर्वं स त्यागी च स बुद्धिमान् । ब्रह्मन्! जिसके सभी कार्य कामनाओंके बन्धनसे रहित होते हैं तथा जिसने त्यागकी अतामें सब कुछ होम दिया है, वही त्यागी और वही बुद्धिमान् है ॥ ११३ ॥
अहिंस्रः सर्वभूतानां मैत्रायणगतश्चरेत् ॥ १२ ॥
परिग्रहान् परित्यज्य भवेद् बुद्धया जितेन्द्रियः ।
अशोकं स्थानमातिष्ठेदिह चामुत्र चाभयम् ॥ १३ ॥
किसी भी प्राणीकी हिंसा न करे, सबके साथ मैत्रीपूर्ण बर्ताव करे। स्त्री- पुत्र आदिकी ममता एवं आसक्तिको त्यागकर बुद्धिके द्वारा इन्द्रियोंको वशमें करे और उस स्थितिको प्राप्त करे, जो इहलोक और परलोकमें भी निर्भय एवं शोकरहित है ॥ १२-१३ ॥ तपोनित्येन दान्तेन मुनिना संयतात्मना ।
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अजितं जेतुकामेन भाव्यं सङ्गेष्वसङ्गिना ॥ १४ ॥
नित्य तप करे, मननशील होकर इन्द्रियोंका दमन और मनका संयम करे । आसक्तिके आश्रयभूत देह - गेह आदिमें आसक्त न होकर अजित ( परमात्मा ) को जीतने ( प्राप्त करने ) की इच्छा रक्खे ॥ १४ ॥
इन्द्रियैर्गृह्यते यद् यत् तत्तद् व्यक्तमिति स्थितिः ।
अव्यक्तमिति विज्ञेयं लिङ्गग्राह्यमतीन्द्रियम् ॥ १५ ॥
इन्द्रियोंसे जिसका ग्रहण होता है, वह सब व्यक्त, कहलाता है । जो इन्द्रियातीत होनेके कारण अनुमानसे ही जाना जाय, उसे अव्यक्त समझना चाहिये ॥ १५ ॥
अविस्रम्भे न गन्तव्यं विस्रम्भे धारयेन्मनः ।
मनः प्राणे निगृह्णीयात् प्राणं ब्रह्मणि धारयेत् ॥ १६ ॥
जो विश्वासके योग्य नहीं है, उस मार्गपर न चले और जो विश्वास करनेयोग्य है, उसमें मन लगावे । मनको प्राणमें और प्राणको ब्रह्ममें स्थापित करे ॥ १६ ॥
निर्वेदादेव निर्वाणं न च किञ्चिद् विचिन्तयेत् ।
सुखं वै ब्राह्मणो ब्रह्म निर्वेदेनाधिगच्छति ॥ १७ ॥
वैराग्यसे ही निर्वाणपद (मोक्ष ) प्राप्त होता है। उसे पाकर मनुष्य किसी अनात्मपदार्थका चिन्तन नहीं करता है । ब्राह्मण संसारसे वैराग्य होनेपर सुखस्वरूप परब्रह्म परमात्माको प्राप्त कर लेता है ॥ १७ ॥
शौचेन सततं युक्तः सदाचारसमन्वितः ।
सानुक्रोशश्च भूतेषु तद् द्विजातिषु लक्षणम् ॥ १८ ॥
सर्वदा शौच और सदाचारका पालन करे और समस्त प्राणियोंपर दयाभाव बनाये रक्खे; यह ब्राह्मणका प्रधान लक्षण है ॥ १८ ॥
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि भृगुभरद्वाजसंवादे वर्णस्वरूपकथने एकोननवत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १८ ९ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें भृगु- भरद्वाजसंवादके प्रसंगमें वर्णोंके स्वरूपका कथनविषयक एक सौ नवासीवाँअध्याय पूरा हुआ ॥ १८९ ॥
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नवत्यधिकशततमोऽध्यायः सत्यकी महिमा, असत्यके दोष तथा लोक और परलोकके सुख -दुःखका विवेचन भृगुरुवाच
सत्यं ब्रह्म तपः सत्यं सत्यं विसृजते प्रजाः ।
सत्येन धार्यते लोकः स्वर्गं सत्येन गच्छति ॥ १ ॥
भृगुजी कहते हैं - मुने! सत्य ही ब्रह्म है, सत्य ही तप है, सत्य ही प्रजाकी सृष्टि करता है, सत्यके ही आधारपर संसार टिका हुआ है और सत्यके ही प्रभावसे मनुष्य स्वर्गमें जाता है ॥ १ ॥
अनृतं तमसो रूपं तमसा नीयते ह्यथः ।
तमोग्रस्ता न पश्यन्ति प्रकाशं तमसाऽऽवृताः ॥ २ ॥
असत्य अन्धकारका रूप है । वह मनुष्यको नीचे गिराता है । अज्ञानारन्धकारसे घिरे हुए मनुष्य तमोगुणसे ग्रस्त होकर ज्ञानके प्रकाशको नहीं देख पाते हैं ॥ २ ॥
स्वर्गः प्रकाश इत्याहुर्नरकं तम एव च ।
सत्यानृतं तदुभयं प्राप्यते जगतीचरैः ॥ ३ ॥
स्वर्ग प्रकाशमय है और नरक अन्धकारमय है, ऐसा कहते हैं । सत्य और अनृतसे युक्त जो मानव- योनि है, वह ज्ञान और अज्ञान दोनोंके सम्मिश्रणसे जगत्के जीवोंको प्राप्त होती है ॥ ३ ॥
तत्राप्येवंविधा लोके वृत्तिः सत्यानृते भवेत् ।
धर्माधरर्मौ प्रकाशश्च तमो दुःखं सुखं तथा ॥ ४ ॥
उसमें भी लोकमें ऐसी वृत्ति जाननी चाहिये, जो सत्य और अनृत हैं, वे ही धर्म और अधर्म, प्रकाश और अन्धकार तथा दुःख और सुख हैं ॥ ४ ॥
तत्र यत् सत्यं स धर्मो यो धर्मः स प्रकाशो यः प्रकाशस्तत् सुखमिति । तत्र यदनृतं सोऽधर्मो योऽधर्मस्तत् तमो यत् तमस्तद् दुःखमिति ॥ ५ ॥
वहाँ जो सत्य है, वही धर्म है, जो धर्म है वही प्रकाश है और जो प्रकाश है, वही सुख है । इसी प्रकार वहाँ जो अनृत अर्थात् असत्य है, वही अधर्म है और जो अधर्म है, वही अन्धकार है और जो अन्धकार है, वही दुःख है ॥ ५ ॥
अत्रोच्यते- शारीरैर्मानसैर्दुःखैः सुखैश्चाप्यसुखोदयैः ।
लोकसृष्टिं प्रपश्यन्तो न मुह्यन्ति विचक्षणाः ॥ ६ ॥
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इस विषयमें ऐसा कहा जाता है - संसारकी सृष्टि शारीरिक और मानसिक क्लेशोंसे युक्त है । इसमें जो सुख हैं, वे भी अन्तमें दुःख ही उत्पन्न करनेवाले हैं । ऐसी दृष्टि रखनेवाले विद्वान् पुरुष कभी मोहमें नहीं पड़ते हैं ॥ ६ ॥
तत्र दुःखविमोक्षार्थं प्रयतेत विचक्षणः ।
सुखं ह्यनित्यं भूतानामिहलोके परत्र च ॥ ७ ॥
अतः विज्ञ एवं बुद्धिमान् मनुष्यको चाहिये कि सदा दुःखसे छूटनेके लिये प्रयत्न करे । इहलोक और परलोकमें भी प्राणियोंको जो सुख मिलता है, वह अनित्य है ॥ ७ ॥
राहुग्रस्तस्य सोमस्य यथा ज्योत्स्ना न भासते ।
तथा तमोऽभिभूतानां भूतानां नश्यते सुखम् ॥ ८ ॥
जैसे राहुसे ग्रस्त होनेपर चन्द्रमाकी चाँदनी प्रकाशमें नहीं आती, उसी प्रकार तम ( अज्ञान एवं दुःख) से पीड़ित हुए प्राणियोंका सुख नष्ट हो जाता है ॥ ८ ॥
तत् खलु द्विविधं सुखमुच्यते शारीरं मानसं च । इह खल्वमुष्मिंश्च लोके वस्तुप्रवृत्तयः सुखार्थ- मभिधीयन्ते । न ह्यतः परं त्रिवर्गफलं विशिष्टतरमस्ति स एव काम्यो - गुणविशेष धर्मार्थगुणारम्भस्तद्धेतुर स्योत्पत्तिः सुखप्रयोजनार्थ आरम्भः ॥ ९ ॥
सुख दो प्रकारका बताया जाता है - शारीरिक और मानसिक । इहलोक और परलोकमें जो वस्तुओंकी प्राप्तिके लिये प्रवृत्तियाँ हैं, वे सुखके लिये ही बतायी जाती हैं । इस सुखसे बढ़कर त्रिवर्ग ( धर्म, अर्थ और काम ) का और कोई अत्यन्त विशिष्ट फल नहीं है । वह सुख ही प्राणीका वाञ्छनीय गुणविशेष है । धर्म और अर्थ जिसके अंग हैं, उस सुखके लिये ही कर्मोंका आस्मभ किया जाता है; क्योंकि सुखकी उत्पत्तिमें उद्यम ही हेतु हैं; अतः सुखके उद्देश्यसे ही कर्मोंका आरम्भ किया जाता है ॥ ९ ॥
भरद्वाजउवाच यदेतद् भवताभिहितं सुखानां परमा स्थितिरिति न तदुपगृह्णीमो न ह्येषामृषीणां महति स्थितानामप्राप्य एष काम्यो गुणविशेषो न चैनमभिलषन्ति च तपसि श्रूयते त्रिलोककृद् ब्रह्मा प्रभुरेकाकी तिष्ठति । ब्रह्मचारी न कामसुखेष्वात्मानमवदधाति । अपि च भगवान् विश्वेश्वर उमापतिः काममभिवर्तमानमनङ्गत्वेन शममनयत् । तस्माद् ब्रूमो न तु महात्मभिरयं प्रतिगृहीतो न त्वेषां तावद्विशिष्टो गुणविशेष इति । नैतद् भगवतः प्रत्येमि भगवता तूक्तं सुखान्न परमस्तीति लोकप्रवादो हि द्विविधः फलोदयः सुकृतात् सुखमवाप्यते दुष्कृताद् दुःखमिति ॥ १० ॥
भरद्वाजने पूछा — प्रभो! आपने जो यह बताया है कि सुखोंका ही सबसे ऊँचा स्थान है — सुखसे बढ़कर त्रिवर्गका और कोई फल नहीं है, आपकी यह बात हमारे मनमें ठीक नहीं जँचती है; क्योंकि जो महान् तपमें स्थित ऋषिगण हैं, उनके लिये यह वाञ्छनीय
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गुणविशेष सुख यद्यपि प्राप्त हो सकता है, तो भी वे इसे नहीं चाहते हैं । सुना जाता है कि तीनों लोकोंकी सृष्टि करनेवाले भगवान् ब्रह्मा अकेले ही रहते हैं, ब्रह्मचर्यका पालन करते हैं और कामसुखमें कभी मन नहीं लगाते हैं । भगवती उमाके प्राणवल्लभ भगवान् विश्वनाथने भी अपने सामने आये हुए कामको जलाकर शान्त कर दिया और उसे अनंग बना दिया; इसलिये हम कहते हैं कि महात्मा पुरुषोंने कभी इसे स्वीकार नहीं किया है । उनके लिये यह कामसुख अर्थात् सांसारिक भोगोंका सुख सबसे बढ़कर सुखविशेष नहीं है; परंतु आपकी बातोंसे मुझे ऐसी प्रतीति नहीं होती है । आपने तो यह कहा है कि इस सुखसे बढ़कर दूसरा
कोई फल नहीं है । लोकमें ऐसा कहा जाता है कि फलकी उत्पत्ति दो प्रकारकी होती है ।
पुण्यकर्मसे सुख प्राप्त होता है और पापकर्मसे दुःख ॥ १० ॥
भृगुरुवाच अत्रोच्यते - अनृतात् खलु तमः प्रादुर्भूतं ततस्तमो ग्रस्ता अधर्ममेवानुवर्तन्ते न धर्मं क्रोधलोभहिंसानृता- दिभिरवच्छन्ना न खल्वस्मिँल्लोके नामुत्र सुखमाप्नुवन्ति । वधबन्धन - परिक्लेशादिभिश्च Iविविधव्याधिरुजोपतापैरवकीर्यन्ते क्षुत्पिपासाश्रमकृतैरुपतापैरुप-तप्यन्ते । वर्षवातात्युष्णातिशीतकृतैश्च प्रतिभयैः शारीरैर्दुःखैरुपतप्यन्ते । बन्धुधनविनाशविप्रयोगकृतैश्च मानसैः शोकैरभिभूयन्ते जरामृत्युकृतैश्चान्यैरिति ॥ ११ ॥
भृगुजीने कहा – मुने! असत्यसे अज्ञानकी उत्पत्ति हुई है; अतः तमोग्रस्त मनुष्य अधर्मके ही पीछे चलते हैं; धर्मका अनुसरण नहीं करते हैं । जो लोग क्रोध, लोभ, हिंसा और असत्य आदिसे आच्छादित हैं, वे न तो इस लोकमें सुखी होते हैं और न परलोकमें ही । वे नाना प्रकारके रोग, व्याधि और तापसे संतप्त होते रहते हैं । वध और बन्धन आदिके क्लेशोंसे तथा भूख, प्यास और थकावटके कारण होनेवाले संतापोंसे भी पीड़ित होते हैं । इतना ही नहीं, उन्हें आँधी, पानी, अत्यन्त गर्मी और अधिक सर्दीसे उत्पन्न हुए भयंकर शारीरिक कष्ट भी सहन करने पड़ते हैं । बन्धु - बान्धवोंकी मृत्यु, धनके नाश और प्रेमीजनोंके वियोगके कारण होनेवाले मानसिक शोक भी उन्हें सताते रहते हैं । बुढ़ापा और मृत्युके कारण भी बहुत - से दूसरे- दूसरे क्लेश भी उन्हें पीड़ा देते रहते हैं ॥ यस्त्वेतैः शारीरमानसैर्दुःखैर्न संस्पृश्यते स सुखं वेद । न चैते दोषाः स्वर्गे
प्रादुर्भवन्ति । तत्र खलु भवन्ति ॥ १२ ॥
जो इन शारीरिक और मानसिक दुःखोंके सम्बन्धसे रहित है, उसीको सुखका अनुभव होता है । स्वर्गलोकमें ये पूर्वोक्त दुःखरूप दोष नहीं उत्पन्न होते हैं। वहाँ निम्नांकित बातें होती हैं ॥ १२ ॥
सुमुखः पवनः स्वर्गे गन्धश्च सुरभिस्तथा ।
क्षुत्पिपासा श्रमो नास्ति न जरा न च पापकम् ॥ १३ ॥