श्रीगणेशाय नमः।
महाभारत — खण्ड ५ — पृष्ठ 1351–1360
महाभारत — खण्ड ५ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1351–1360
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योगके आवासस्थान! आपको नमस्कार है । सबके निवासस्थान, वरदायक, यज्ञगर्भ, सुनहरे रंगोंवाले पञ्चयज्ञमय परमेश्वर! आपको नमस्कार है ॥
चतुर्मूर्ते परं धाम लक्ष्म्यावास परार्चित ।
सर्वावास नमस्तेऽस्तु वासुदेव प्रधानकृत् ॥
आप श्रीकृष्ण, बलभद्र, प्रद्युम्न और अनिरुद्ध – इन चार रूपोंवाले, परमधामस्वरूप, लक्ष्मीनिवास, परमपूजित, सबके आवासस्थान और प्रकृतिके भी प्रवर्तक हैं । वासुदेव! आपको नमस्कार है ॥
अजस्त्वमगमः पन्था ह्यमूर्तिर्विश्वमूर्तिधृक् ।
विकर्तः पञ्चकालज्ञ नमस्ते ज्ञानसागर ॥
आप अजन्मा हैं, अगम्य मार्ग हैं, निराकार हैं अथवा जगत्के सम्पूर्ण आकार आप ही धारण करते हैं, आप ही संहारकारी रुद्र हैं । आप प्रातः, सङ्गव, मध्याह्न, अपराह्न और
सायाह्न — इन पाँच कालोंको जाननेवाले हैं । ज्ञानसागर! आपको नमस्कार है ॥
अव्यक्ताद् व्यक्तमुत्पन्नं व्यक्ताद् यस्तु परोऽक्षरः ।
यस्मात् परतरं नास्ति तमस्मि शरणं गतः ॥
जिन अव्यक्त परमात्मासे इस व्यक्त जगत्की उत्पत्ति हुई है, जो व्यक्तसे परे और अविनाशी हैं, जिनसे उत्कृष्ट दूसरी कोई वस्तु नहीं है, उन भगवान् विष्णुकी मैं शरणमें आया हूँ ॥
न प्रधानो न च महान् पुरुषश्चेतनो ह्यजः ।
अनयोर्यः परतरः तमस्मि शरणं गतः ॥
प्रकृति और महत्तत्त्व-ये दोनों जड हैं । पुरुष चेतन और अजन्मा है । इन दोनों क्षर और अक्षर पुरुषोंसे जो उत्कृष्ट और विलक्षण हैं, उन भगवान् पुरुषोत्तमकी मैं शरण लेता हूँ॥
चिन्तयन्तो हि यं नित्यं ब्रह्मेशानादयः प्रभुम् ।
निश्चयं नाधिगच्छन्ति तमस्मि शरणं गतः ॥
ब्रह्मा और शिव आदि देवता जिन भगवान्का सदा चिन्तन करते रहनेपर भी उनके स्वरूपके सम्बन्धमें किसी निश्चयतक नहीं पहुँच पाते, उन परमेश्वरकी मैं शरण लेता हूँ ॥
जितेन्द्रिया महात्मानो ज्ञानध्यानपरायणाः ।
यं प्राप्य न निवर्तन्ते तमस्मि शरणं गतः ॥
ज्ञानी और ध्यानपरायण जितेन्द्रिय महात्मा जिन्हें पाकर फिर इस संसारमें नहीं लौटते हैं, उन भगवान् श्रीहरिकी मैं शरण ग्रहण करता हूँ ॥
एकांशेन जगत् सर्वमवष्टभ्य विभुः स्थितः ।
अग्राह्यो निर्गुणो नित्यस्तमस्मि शरणं गतः ॥
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जो सर्वव्यापी परमेश्वर इस सम्पूर्ण जगत्को अपने एक अंशसे धारण करके स्थित हैं, जो किसी इन्द्रियविशेषके द्वारा ग्रहण नहीं किये जाते तथा जो निर्गुण एवं नित्य हैं, उन परमात्माकी मैं शरणमें जाता हूँ ॥
सोमार्काग्निमयं तेजो या च तारामयी द्युतिः ।
दिवि संजायते योऽयं स महात्मा प्रसीदतु ॥
आकाशमें जो सूर्य और चन्द्रमाका तेज प्रकाशित होता है तथा तारगणोंकी जो ज्योति जगमगाती रहती है, वह सब जिनका ही स्वरूप है, वे परमात्मा मुझपर प्रसन्न हों ॥
गुणादिर्निर्गुणश्चाद्यो लक्ष्मीवांश्चेतनो ह्यजः ।
सूक्ष्मः सर्वगतो योगी स महात्मा प्रसीदतु ॥
जो समस्त गुणोंके आदि कारण और स्वयं निर्गुण हैं, आदि पुरुष, लक्ष्मीवान्, चेतन, अजन्मा, सूक्ष्म, सर्वव्यापी तथा योगी हैं, वे महात्मा श्रीहरि मुझपर प्रसन्न हों ॥
सांख्ययोगाश्च ये चान्ये सिद्धाश्च परमर्षयः ।
यं विदित्वा विमुच्यन्ते स महात्मा प्रसीदतु ॥
ज्ञानयोगी, कर्मयोगी तथा जो दूसरे दूसरे सिद्ध और महर्षि हैं, वे जिन्हें जानकर इस संसारसे मुक्त हो जाते हैं, वे परमात्मा श्रीहरि मुझपर प्रसन्न हों ॥
अव्यक्तः समधिष्ठाता ह्यचिन्त्यः सदसत्परः ।
आस्थितिः प्रकृतिश्रेष्ठः स महात्मा प्रसीदतु ॥
जो अव्यक्त, सबके अधिष्ठाता, अचिन्त्य और सत्- असत्से विलक्षण हैं, आधाररहित एवं प्रकृतिसे श्रेष्ठ हैं, वे महात्मा श्रीहरि मुझपर प्रसन्न हों ॥
क्षेत्रज्ञः पञ्चधा भुङ्क्ते प्रकृतिं पञ्चभिर्मुखैः ।
महान् गुणांश्च यो भुङ्क्ते स महात्मा प्रसीदतु ॥
जो जीवात्मारूपसे पाँच ज्ञानेन्द्रियरूपी मुखोंद्वारा शब्द आदि पाँच विषयोंका उपभोग करते हैं तथा स्वयं महान् होकर भी जो गुणोंका अनुभव करते हैं, वे महात्मा श्रीहरि मुझपर प्रसन्न हों ॥
सूर्यमध्ये स्थितः सोमस्तस्य मध्ये च या स्थिता ।
भूतबाह्याच या दीप्तिः स महात्मा प्रसीदतु ॥
जो सूर्यमण्डलमें सोमरूपसे स्थित होते हैं, उस सोमके भीतर जो अलौकिक दीप्ति है, वह जिनका स्वरूप है, वे परमात्मा श्रीहरि मुझपर प्रसन्न हों ॥
नमस्ते सर्वतः सर्व सर्वतोऽक्षिशिरोमुख ।
निर्विकार नमस्तेऽस्तु साक्षी क्षेत्रे व्यवस्थितः ॥
सर्वस्वरूप परमेश्वर! आपको सब ओरसे नमस्कार है, आपके सब ओर नेत्र, मस्तक और मुख हैं । निर्विकार परमात्मन्! आपको नमस्कार है । आप प्रत्येक क्षेत्र ( शरीर) -में साक्षीरूपसे स्थित हैं ॥
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अतीन्द्रिय नमस्तुभ्यं लिङ्गैर्व्यक्तैर्न मीयसे ।
ये च त्वां नाभिजानन्ति संसारे संसरन्ति ते ॥
इन्द्रियातीत परमेश्वर! आपको नमस्कार है । व्यक्त लिंगोंद्वारा आपका ज्ञान होना असम्भव है । संसारमें जो आपको नहीं जानते, वे जन्म - मृत्युके चक्करमें पड़े रहते हैं ॥
कामक्रोधविनिर्मुक्ता रागद्वेषविवर्जिताः ।
नान्यभक्ता विजानन्ति न पुनर्नारका द्विजाः ॥
जो काम और क्रोधसे मुक्त, राग- द्वेषसे रहित तथा आपके अनन्य भक्त हैं, वे ही आपको जान पाते हैं । जो विषयोंके नरकमें पड़े हुए द्विज हैं, वे आपको नहीं जानते हैं ॥
एकान्तिनो हि निर्द्वन्द्वा निराशीःकर्मकारिणः ।
ज्ञानाग्निदग्धकर्माणस्त्वां विशन्ति विनिश्चिताः ॥
जो आपके अनन्य भक्त, द्वन्द्वोंसे रहित तथा निष्काम कर्म करनेवाले हैं, जिन्होंने ज्ञानमयी अग्निसे अपने समस्त कर्मोंको दग्ध कर दिया है, वे आपके प्रति दृढ़ निष्ठा रखनेवाले पुरुष आपमें ही प्रवेश करते हैं ॥
अशरीरं शरीरस्थं समं सर्वेषु देहिषु ।
पुण्यपापविनिर्मुक्ता भक्तास्त्वां प्रविशन्त्युत ॥
आप शरीरमें रहते हुए भी उससे रहित हैं तथा सम्पूर्ण देहधारियोंमें समभावसे स्थित हैं । जो पुण्य और पापसे मुक्त हैं, वे भक्तजन आपमें ही प्रवेश करते हैं ॥
अव्यक्तं बुद्ध्यहङ्कारमनोभूतेन्द्रियाणि च ।
त्वयि तानि च तेषु त्वं न तेषु त्वं न ते त्वयि ॥
अव्यक्त प्रकृति, बुद्धि ( महत्तत्त्व), अहंकार, मन, पञ्च महाभूत तथा सम्पूर्ण इन्द्रियाँ सभी आपमें हैं और उन सबमें आप हैं, किंतु वास्तवमें न उनमें आप हैं, न आपमें वे हैं ॥
एकत्वान्यत्वनानात्वं ये विदुर्यान्ति ते परम् ।
समोऽसि सर्वभूतेषु न ते द्वेष्योऽस्ति न प्रियः ॥
समत्वमभिकांक्षेऽहं भक्त्या वै नान्यचेतसा । एकत्व, अन्यत्व और नानात्वका रहस्य जो लोग अच्छी तरह जानते हैं, वे आप परमात्माको प्राप्त होते हैं । आप सम्पूर्ण भूतोंमें सम हैं । आपका न कोई द्वेषपात्र है और न प्रिय । मैं अनन्य चित्तसे आपकी भक्तिके द्वारा समत्व पाना चाहता हूँ ॥ चराचरमिदं सर्वं भूतग्रामं चतुर्विधम् ॥ त्वया त्वय्येव तत् प्रोतं सूत्रे मणिगणा इव । चार प्रकारका जो यह चराचर प्राणिसमुदाय है, वह सब आपसे व्याप्त है । जैसे सूतमें मणियाँ पिरोये होते हैं, उसी प्रकार यह सारा जगत् आपमें ही ओत- प्रोत है ॥ स्रष्टा भोक्तासि कूटस्थो ह्यतत्त्वस्तत्त्वसंज्ञितः ॥ अकर्महेतुरचलः पृथगात्मन्यवस्थितः ।
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आप जगत्के स्रष्टा, भोक्ता और कूटस्थ हैं । तत्त्वरूप होकर भी उससे सर्वथा विलक्षण हैं । आप कर्मके हेतु नहीं हैं । अविचल परमात्मा हैं। प्रत्येक शरीरमें पृथक् - पृथक् जीवात्मारूपसे आप ही विद्यमान हैं ॥ न ते भूतेषु संयोगो भूततत्त्वगुणातिगः ॥ अहङ्कारेण बुद्ध्या वा न ते योगस्त्रिभिर्गुणैः ।
वास्तवमें प्राणियोंसे आपका संयोग नहीं है। आप भूत तत्त्व और गुणोंसे परे हैं ।
अहंकार, बुद्धि और तीनों गुणोंसे आपका कोई सम्बन्ध नहीं है ॥
न ते धर्मोऽस्त्यधर्मो वा नारम्भो जन्म वा पुनः ॥
जरामरणमोक्षार्थं त्वां प्रपन्नोऽस्मि सर्वशः । न आपका कोई धर्म है और न कोई अधर्म । न कोई आरम्भ है न जन्म । मैं जरा - मृत्युसे छुटकारा पानेके लिये सब प्रकारसे आपकी शरणमें आया हूँ ॥ ईश्वरोऽसि जगन्नाथ ततः परम उच्यसे ॥ भक्तानां यद्धितं देव तद् ध्याहि त्रिदशेश्वर । जगन्नाथ! आप ईश्वर हैं, इसीलिये परमात्मा कहलाते हैं । देव! सुरेश्वर! भक्तोंके लिये जो हितकी बात हो, उसका मेरे लिये चिन्तन कीजिये ॥ विषयैरिन्द्रियैर्वापि न मे भूयः समागमः ॥
पृथिवीं यातु मे घ्राणं यातु मे रसना जलम् ।
रूपं हुताशनं यातु स्पर्शो यातु च मारुतम् ॥
श्रोत्रमाकाशमप्येतु मनो वैकारिकं पुनः । विषयों और इन्द्रियोंके साथ फिर मेरा कभी समागम न हो । मेरी घ्राणेन्द्रिय पृथ्वी-तत्त्वमें मिल जाय और रसना जलमें, रूप ( नेत्र) अग्निमें, स्पर्श ( त्वचा ) वायुमें, श्रोत्रेन्द्रिय आकाशमें और मन वैकारिक अहंकारमें मिल जाय ॥ इन्द्रियाण्यपि संयान्तु स्वासु स्वासु च योनिषु ॥
पृथिवी यातु सलिलमापोऽग्निमनलोऽनिलम् ।
वायुराकाशमप्येतु मनश्चाकाश एव च ॥
अहङ्कारं मनो यातु मोहनं सर्वदेहिनाम् ।
अहङ्कारस्ततो बुद्धिं बुद्धिरव्यक्तमच्युत ॥
अच्युत! इन्द्रियाँ अपनी- अपनी योनियोंमें मिल जायँ, पृथ्वी जलमें, जल अग्निमें, अग्नि वायुमें, वायु आकाशमें, आकाश मनमें, मन समस्त प्राणियोंको मोहनेवाले अहंकारमें, अहंकार बुद्धि ( महत्तत्त्व) में और बुद्धि अव्यक्त प्रकृतिमें मिल जाय ॥
प्रधाने प्रकृतिं याते गुणसाम्ये व्यवस्थिते ।
वियोगः सर्वकरणैर्गुणभूतैश्च मे भवेत् ॥
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जब प्रधान प्रकृतिको प्राप्त हो जाय और गुणोंकी साम्यावस्थारूप महाप्रलय उपस्थित हो जाय, तब मेरा समस्त इन्द्रियों और उनके विषयोंसे वियोग हो जाय ॥
निष्कैवल्यपदं तात काङ्क्षेऽहं परमं तव ।
एकीभावस्त्वया मेऽस्तु न मे जन्म भवेत् पुनः ॥
तात! मैं तुम्हारे लिये परम मोक्षकी आकांक्षा रखता हूँ । आपके साथ मेरा एकीभाव हो जाय । इस संसारमें फिर मेरा जन्म न हो ॥
त्वद्बुद्धिस्त्वद्गतप्राणस्त्वद्भक्तस्त्वत्परायणः ।
त्वामेवाहं स्मरिष्यामि मरणे पर्युपस्थिते ॥
मृत्युकाल उपस्थित होनेपर मेरी बुद्धि आपमें ही लगी रहे । मेरे प्राण आपमें ही लीन रहें । मेरा आपमें ही भक्तिभाव बना रहे और मैं सदा आपकी ही शरणमें पड़ा रहूँ । इस प्रकार मैं निरन्तर आपका ही स्मरण करता रहूँ ॥
पूर्वदेहकृता ये मे व्याधयः प्रविशन्तु माम् ।
अर्दयन्तु च दुःखानि ऋणं मे प्रतिमुञ्चतु ॥
पूर्व शरीरमें मैंने जो दुष्कर्म किये हों, उनके फलस्वरूप रोग- व्याधि मेरे शरीरमें प्रवेश करें और नाना प्रकारके दुःख मुझे आकर सतावें । इन सबका जो मेरे ऊपर ऋण है, वह उतर जाय ॥
अनुध्यातोऽसि देवेश न मे जन्म भवेत् पुनः ।
तस्माद् ब्रवीमि कर्माणि ऋणं मे न भवेदिति ॥
देवेश्वर! मैंने इसलिये आपका स्मरण किया है कि फिर मेरा जन्म न हो; अतः फिर कहता हूँ कि मेरे कर्म नष्ट हो जायँ और मुझपर किसीका ऋण बाकी न रह जाय ॥
उपतिष्ठन्तु मां सर्वे व्याधयः पूर्वसंचिताः ।
अनृणो गन्तुमिच्छामि तद् विष्णोः परमं पदम् ॥
पूर्व जन्ममें जिन कर्मोंका मेरे द्वारा संचय किया गया है, वे सभी रोग मेरे शरीरमें उपस्थित हो जायँ। मैं सबसे उऋण होकर भगवान् विष्णुके परम धामको जाना चाहता हूँ ॥ श्रीभगवानुवाच
अहं भगवतस्तस्य मम चासौ सनातनः ।
तस्याहं न प्रणश्यामि स च मे न प्रणश्यति ॥
श्रीभगवान् बोले – नारद! मैं उस सौभाग्यशाली भक्तका हूँ और वह भक्त भी मेरा सनातन सखा है । मैं उसके लिये कभी अदृश्य नहीं होता और न वही कभी मेरी दृष्टिसे ओझल होता है ॥ कर्मेन्द्रियाणि संयम्य पञ्च बुद्धीन्द्रियाणि च ।
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दशेन्द्रियाणि मनसि अहङ्कारे तथा मनः ॥ अहङ्कारं तथा बुद्धौ बुद्धिमात्मनि योजयेत् । साधक पाँच कर्मेन्द्रियों तथा पाँच ज्ञानेन्द्रियोंको संयममें रखकर उन दसों इन्द्रियोंको मनमें विलीन करे । मनको अहंकारमें, अहंकारको बुद्धिमें और बुद्धिको आत्मामें लगावे ॥ यतबुद्धीन्द्रियः पश्यन् बुद्ध्या बुद्ध्येत् परात्परम् । ममायमिति यस्याहं येन सर्वमिदं ततम् । पाँचों ज्ञानेन्द्रियोंको संयममें रखकर बुद्धिके द्वारा परात्पर परमात्माका अनुभव करे कि यह परमेश्वर मेरा है और मैं इसका हूँ, तथा इसीने इस सम्पूर्ण जगत्को व्याप्त कर रखा है ॥ आत्मनाऽऽत्मनि संयोज्य परमात्मन्यनुस्मरेत् ॥
ततो बुद्धेः परं बुद्ध्वा लभते न पुनर्भवम् ।
मरणे समनुप्राप्ते यश्चैवं मामनुस्मरेत् ॥
अपि पापसमाचारः स याति परमां गतिम् । स्वयं ही अपने - आपको परमात्माके ध्यानमें लगाकर निरन्तर उनका स्मरण करे, तदनन्तर बुद्धिसे भी परे परमात्माको जानकर मनुष्य फिर इस संसारमें जन्म नहीं लेता । जो मृत्युकाल आनेपर इस प्रकार मेरा स्मरण करता है, वह पुरुष पहलेका पापाचारी रहा हो तो भी परम गतिको प्राप्त होता है ॥ ओं नमो भगवते तस्मै देहिनां परमात्मने । नारायणाय भक्तानामेकनिष्ठाय शाश्वते । समस्त देहधारियोंके परमात्मा तथा भक्तोंके प्रति एकमात्र निष्ठा रखनेवाले उन सनातन भगवान् नारायणको नमस्कार है ॥ इमामनुस्मृतिं दिव्यां वैष्णवीं सुसमाहितः ॥ स्वपन् विबुध्यंश्च पठन् यत्र तत्र समभ्यसेत् । यह दिव्य वैष्णवी- अनुस्मृति विद्या है । मनुष्य एकाग्रचित्त होकर सोते, जागते और स्वाध्याय करते समय जहाँ कहीं भी इसका जप करता रहे ॥ पौर्णमास्याममायां च द्वादश्यां च विशेषतः ॥ श्रावयेच्छ्रद्दधानांश्च मद्भक्तांश्च विशेषतः । पूर्णिमा, अमावास्या तथा विशेषतः द्वादशी तिथिको मेरे श्रद्धालु भक्तोंको इसका श्रवण करावे ॥ यद्यहङ्कारमाश्रित्य यज्ञदानतपःक्रियाः ॥ कुर्वंस्तत्फलमाप्नोति पुनरावर्तनं तु तत् । यदि कोई अहंकारका आश्रय लेकर यज्ञ, दान और तपरूप कर्म करे तो उसका फल उसे मिलता है । परंतु वह आवागमनके चक्करमें डालनेवाला होता है ॥
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अभ्यर्चयन् पितॄन् देवान् पठन् जुह्वन् बलिं ददत् ॥ ज्वलन्नग्निं स्मरेद् यो मां स याति परमां गतिम् । जो देवताओं और पितरोंकी पूजा, पाठ, होम और बलिवैश्वदेव करते तथा अग्निमें आहुति देते समय मेरा स्मरण करता है, वह परम गतिको प्राप्त होता है ॥ यज्ञो दानं तपश्चैव पावनानि मनीषिणाम् ॥ यज्ञं दानं तपस्तस्मात् कुर्यादाशीर्विवर्जितः । यज्ञ, दान और तप —ये मनीषी पुरुषोंको पवित्र करनेवाले हैं; अतः यज्ञ, दान और तपका निष्कामभावसे अनुष्ठान करे ॥ नम इत्येव यो ब्रूयान्मद्भक्तः श्रद्धयान्वितः ॥ तस्याक्षयो भवेल्लोकः श्वपाकस्यापि नारद । नारद! जो मेरा भक्त श्रद्धापूर्वक मेरे लिये केवल नमस्कारमात्र बोल देता है, वह चाण्डाल ही क्यों न हो, उसे अक्षयलोककी प्राप्ति होती है ॥ किं पुनर्ये यजन्ते मां साधका विधिपूर्वकम् ॥ श्रद्धावन्तो यतात्मानस्ते मां यान्ति मदाश्रिताः । फिर जो साधक मन और इन्द्रियोंको संयममें रखकर मेरे आश्रित हो श्रद्धा और विधिके साथ मेरी आराधना करते हैं, वे मुझे ही प्राप्त होते हैं, इसमें तो कहना ही क्या है? ॥ कर्माण्याद्यन्तवन्तीह मद्भक्तो नान्तमश्नुते ॥
मामेव तस्माद् देवर्षे ध्याहि नित्यमतन्द्रितः ।
अवाप्स्यसि ततः सिद्धिं द्रक्ष्यस्येव पदं मम ॥
देवर्षे! सारे कर्म और उनके फल आदि-अन्तवाले हैं; परंतु मेरा भक्त अन्तवान् ( विनाशशील ) फलका उपभोग नहीं करता; अतः तुम सदा आलस्यरहित होकर मेरा ही ध्यान करो । इससे तुम्हें परम सिद्धि प्राप्त होगी और तुम मेरे परमधामका दर्शन कर लोगे ॥
अज्ञानाय च यो ज्ञानं दद्याद् धर्मोपदेशतः ।
कृत्स्नां वा पृथिवीं दद्यात् तेन तुल्यं च तत्फलम् ॥
जो धर्मोपदेशके द्वारा अज्ञानी पुरुषको ज्ञान प्रदान करता है अथवा जो किसीको समूची पृथ्वीका दान कर देता है तो उस ज्ञानदानका फल इस पृथ्वीदानके बराबर ही माना जाता है ॥
तस्मात् प्रदेयं साधुभ्यो जन्मबन्धभयापहम् ।
एवं दत्त्वा नरश्रेष्ठ श्रेयो वीर्यं च विन्दति ॥
नरश्रेष्ठ नारद! इसलिये साधु पुरुषोंको जन्म और बन्धनके भयको दूर करनेवाला ज्ञान ही देना चाहिये । इस प्रकार ज्ञान देकर मनुष्य कल्याण और बल प्राप्त करता है ॥ अश्वमेधसहस्राणां सहस्रं यः समाचरेत् ।
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नासौ पदमवाप्नोति मद्भक्तैर्यदवाप्यते ॥ जो दस लाख अश्वमेध यज्ञोंका अनुष्ठान कर ले, वह भी उस पदको नहीं पा सकता, जो मेरे भक्तोंको प्राप्त हो जाता है ॥ भीष्म उवाच
एवं पृष्टः पुरा तेन नारदेन सुरर्षिणा ।
यदुवाच तदा शम्भुस्तदुक्तं तव सुव्रत ॥
भीष्मजी कहते हैं - सुव्रत! इस प्रकार पूर्वकालमें देवर्षि नारदके पूछनेपर कल्याणमय भगवान् विष्णुने उस समय जो कुछ कहा था, वह सब तुम्हें बता दिया ॥
त्वमप्येकमना भूत्वा ध्याहि ध्येयं गुणातिगम् ।
भजस्व सर्वभावेन परमात्मानमव्ययम् ॥
तुम भी एकचित्त होकर उन गुणातीत परमात्माका ध्यान करो और सम्पूर्ण भक्तिभावसे उन्हीं अविनाशी परमात्माका भजन करो ॥
श्रुत्वैतन्नारदो वाक्यं दिव्यं नारायणेरितम् ।
अत्यन्त भक्तिमान् देव एकान्तत्वमुपेयिवान् ॥
भगवान् नारायणका कहा हुआ यह दिव्य वचन सुनकर अत्यन्त भक्तिमान् देवर्षि नारद भगवान्के प्रति एकाग्रचित्त हो गये ॥
नारायणमृषिं देवं दशवर्षाण्यनन्यभाक् ।
इदं जपन् वै प्राप्नोति तद् विष्णोः परमं पदम् ॥
जो पुरुष अनन्यभावसे दस वर्षोंतक ऋषि-प्रवर नारायणदेवका ध्यान करते हुए इस मन्त्रका जप करता है, वह भगवान् विष्णुके परम पदको प्राप्त कर लेता है ॥
किं तस्य बहुभिर्मन्त्रैर्भक्तिर्यस्य जनार्दने ।
नमो नारायणायेति मन्त्रः सर्वार्थसाधकः ॥
जिसकी भगवान् जनार्दनमें भक्ति है, उसे बहुत - से मन्त्रोंद्वारा क्या लेना है? ‘ॐ नमो नारायणाय ' यह एकमात्र मन्त्र ही सम्पूर्ण मनोरथोंकी सिद्धि करनेवाला है ॥ इमां रहस्यां परमामनुस्मृति- मधीत्य बुद्धिं लभते च नैष्ठिकीम् । विहाय दुःखान्यवमुच्य सङ्कटात् स वीतरागो विचरेन्महीमिमाम् II ) इस परम गोपनीय अनुस्मृति विद्याका स्वाध्याय करके मनुष्य भगवान्के प्रति दृढ़ निष्ठा रखनेवाली बुद्धि प्राप्त कर लेता है । वह सारे दुःखों को दूर करके संकटसे मुक्त एवं वीतराग हो इस पृथ्वीपर सर्वत्र विचरण करता है ॥
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इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि अन्तर्भूमिविक्रीडनं नाम नवाधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २० ९ ॥ इसप्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें भूमिके भीतर भगवान् वाराहकीक्रीड़ानामक दो सौ नवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २०१ ॥
( दाक्षिणात्य अधिक पाठके ८६३ श्लोक मिलाकर कुल १२२३ श्लोक हैं) इस श्लोकमें वर्णित भावके अनुसार सनातन शब्दकी व्युत्पत्ति इस प्रकार समझनी चाहिये —नादनेन सहितः सनादनः । दकारस्थाने तकारो छान्दसः । जो नादके साथ हो, वह ' सनादन ' कहलाता है । सनादनके दकारके स्थानमें तकार हो जानेसे ' सनातन ' बनता है । १. आश्रावय, २. अस्तु श्रौषट् ३. यज, ४. ये यजामहे, ५. वषट्।
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दशाधिकद्विशततमोऽध्यायः गुरु - शिष्यके संवादका उल्लेख करते हुए श्रीकृष्ण - सम्बन्धी अध्यात्मतत्त्वका वर्णन युधिष्ठिर उवाच
योगं मे परमं तात मोक्षस्य वद भारत ।
तमहं तत्त्वतो ज्ञातुमिच्छामि वदतां वर ॥ १ ॥
युधिष्ठिरने कहा — वक्ताओंमें श्रेष्ठ तात भरतनन्दन! आप मुझे मोक्षके साधनभूत परम
योगका उपदेश कीजिये । मैं उसे यथार्थरूपसे जानना चाहता हूँ ॥ १ ॥
भीष्म उवाच
अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् ।
संवादं मोक्षसंयुक्तं शिष्यस्य गुरुणा सह ॥ २ ॥
भीष्मजी बोले – राजन्! इस विषयमें एक शिष्यका गुरुके साथ जो मोक्षसम्बन्धी संवाद हुआ था, उसी प्राचीन इतिहासका उदाहरण दिया जाता है ॥ २ ॥
कश्चिद् ब्राह्मणमासीनमाचार्यमृषिसत्तमम् ।
तेजोराशिं महात्मानं सत्यसंधं जितेन्द्रियम् ॥ ३ ॥
शिष्यः परममेधावी श्रेयोऽर्थी सुसमाहितः ।
चरणावुपसंगृह्य स्थितः प्राञ्जलिरब्रवीत् ॥ ४ ॥
किसी समयकी बात है, एक विद्वान् ब्राह्मण श्रेष्ठ आसनपर विराजमान थे । वे आचार्यकोटिके पण्डित और श्रेष्ठतम महर्षि थे । देखनेमें महान् तेजकी राशि जान पड़ते थे । बड़े महात्मा, सत्यप्रतिज्ञ और जितेन्द्रिय थे । एक दिन उनकी सेवामें कोई परम मेधावी कल्याणकामी एवं समाहितचित्त शिष्य आया (जो चिरकालतक उनकी शुश्रूषा कर चुका था), वह उनके दोनों चरणोंमें प्रणाम करके हाथ जोड़ सामने खड़ा हो इस प्रकार बोला ॥ ३-४ ॥ उपासनात् प्रसन्नोऽसि यदि वै भगवन् मम ।
संशयो मे महान् कश्चित् तन्मे व्याख्यातुमर्हसि ।
कुतश्चाहं कुतश्च त्वं तत् सम्यग्ब्रूहि यत्परम् ॥ ५ ॥
‘ भगवन्! यदि आप मेरी सेवासे प्रसन्न हैं तो मेरे मनमें जो एक बड़ा भारी संदेह है, उसे दूर करनेकी कृपा करें— मेरे प्रश्नकी विशद व्याख्या करें । मैं इस संसारमें कहाँसे आया हूँ