श्रीगणेशाय नमः।

महाभारत — खण्ड ५ — पृष्ठ 141–150

महाभारत — खण्ड ५ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 141–150

पृष्ठ 141

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कुन्तीनन्दन! इस प्रकार सम्पूर्ण जीव उस -उस धर्मका उसी -उसी प्रकारसे जब ठीक-ठीक पालन करते हैं, तब स्वयं आत्मासे परमात्माका साक्षात्कार कर लेते हैं; अतः भरतनन्दन! इस समय तुम अपना कर्तव्य समझो ॥ ६ ॥

अन्ये साम प्रशंसन्ति व्यायाममपरे जनाः ।

नैकं न चापरं केचिदुभयं च तथापरे ॥ ७ ॥

कुछ लोग साम ( प्रेमपूर्ण बर्ताव) की प्रशंसा करते हैं और कोई व्यायाम ( यत्न और परिश्रम ) के गुण गाते हैं । कोई इन दोनोंमेंसे एक ( साम ) की प्रशंसा नहीं करते हैं तो कोई दूसरे ( व्यायाम) की, तथा कुछ लोग दोनोंकी ही बड़ी प्रशंसा करते हैं ॥ ७ ॥

यज्ञमेव प्रशंसन्ति संन्यासमपरे जनाः ।

दानमेके प्रशंसन्ति केचिच्चैव प्रतिग्रहम् ॥ ८ ॥

कोई यज्ञको ही अच्छा बताते हैं तो दूसरे लोग संन्यासकी ही सराहना करते हैं । कोई दान देनेके प्रशंसक हैं तो कोई दान लेनेके ॥ ८ ॥

केचित् सर्वं परित्यज्य तूष्णीं ध्यायन्त आसते ।

राज्यमेके प्रशंसन्ति प्रजानां परिपालनम् ॥ ९ ॥

हत्वा छित्त्वा च भित्त्वा च केचिदेकान्तशीलिनः । कोई सब छोड़कर चुपचाप भगवान्‌के ध्यानमें लगे रहते हैं और कुछ लोग मार- काट मचाकर शत्रुओंकी सेनाको विदीर्ण करके राज्य पानेके अनन्तर प्रजापालनरूपी धर्मकी प्रशंसा करते हैं तथा दूसरे लोग एकान्तमें रहकर आत्मचिन्तन करना अच्छा समझते हैं ॥ ९ ३ ॥ एतत् सर्वं समालोक्य बुधानामेष निश्चयः ॥ १० ॥

अद्रोहेणैव भूतानां यो धर्मः स सतां मतः । इन सब बातोंपर विचार करके विद्वानोंने ऐसा निश्चय किया है कि किसी भी प्राणीसे द्रोह न करके जिस धर्मका पालन होता है, वही साधु पुरुषोंकी रायमें उत्तम धर्म है ॥ १०३ || अद्रोहः सत्यवचनं संविभागो दया दमः ॥ ११ ॥

प्रजनं स्वेषु दारेषु मार्दवं ह्रीरचापलम् ।

एवं धर्मं प्रधानेष्टं मनुः स्वायम्भुवोऽब्रवीत् ॥ १२ ॥

किसीसे द्रोह न करना, सत्य बोलना, ( बलिवैश्वदेव कर्मद्वारा ) समस्त प्राणियोंको यथायोग्य उनका भाग समर्पित करना, सबके प्रति दयाभाव बनाये रखना, मन और इन्द्रियोंका संयम करना, अपनी ही पत्नीसे संतान उत्पन्न करना तथा मृदुता, लज्जा एवं अचंचलता आदि गुणोंको अपनाना- ये श्रेष्ठ एवं अभीष्ट धर्म हैं - ऐसा स्वायम्भुव मनुका कथन है ॥ ११-१२ ॥ तस्मादेतत् प्रयत्नेन कौन्तेय प्रतिपालय ।

पृष्ठ 142

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यो हि राज्ये स्थितः शश्वद् वशी तुल्यप्रियाप्रियः ॥ १३ ॥

क्षत्रियो यज्ञशिष्टाशी राजा शास्त्रार्थतत्त्ववित् ।

असाधुनिग्रहरतः साधूनां प्रग्रहे रतः ॥ १४ ॥

धर्मवर्त्मनि संस्थाप्य प्रजा वर्तेत धर्मतः ।

पुत्रसंक्रामितश्रीश्च वने वन्येन वर्तयन् ॥ १५ ॥

विधिना श्रावणेनैव कुर्यात् कर्माण्यतन्द्रितः ।

य एवं वर्तते राजन् स राजा धर्मनिश्चितः ॥ १६ ॥

कुन्तीनन्दन! अतः तुम भी प्रयत्नपूर्वक इस धर्मका पालन करो । जो क्षत्रियनरेश राज्यसिंहासनपर स्थित हो अपनी सम्पूर्ण इन्द्रियोंको सदा अपने अधीन रखता है, प्रिय और अप्रियको समानदृष्टिसे देखता है, यज्ञसे बचे हुए अन्नका भोजन करता है, शास्त्रोंके यथार्थ रहस्यको जानता है, दुष्टोंका दमन और साधु पुरुषोंका पालन करता है, समस्त प्रजाको धर्मके मार्गमें स्थापित करके स्वयं भी धर्मानुकूल बर्ताव करता है, वृद्धावस्थामें राजलक्ष्मीको पुत्रके अधीन करके वनमें जाकर जंगली फल- मूलोंका आहार करते हुए जीवन बिताता है तथा वहाँ भी शास्त्र- श्रवणसे ज्ञात हुए शास्त्रविहित कर्मोंका आलस्य छोड़कर पालन करता है, ऐसा बर्ताव करनेवाला वह राजा ही धर्मको निश्चितरूपसे जानने और माननेवाला है ॥

तस्यायं च परश्चैव लोकः स्यात् सफलोदयः ।

निर्वाणं हि सुदुष्प्राप्यं बहुविघ्नं च मे मतम् ॥ १७ ॥

उसका यह लोक और परलोक दोनों सफल हो जाते हैं, मेरा यह विश्वास है कि संन्यासके द्वारा निर्वाण प्राप्त करना अत्यन्त दुष्कर एवं दुर्लभ है; क्योंकि उसमें बहुत - से विघ्न आते हैं ॥ १७ ॥

एवं धर्ममनुक्रान्ताः सत्यदानतपःपराः ।

आनृशंस्यगुणैर्युक्ताः कामक्रोधविवर्जिताः ॥ १८ ॥

प्रजानां पालने युक्ता धर्ममुत्तममास्थिताः ।

गोब्राह्मणार्थे युध्यन्तः प्राप्ता गतिमनुत्तमाम् ॥ १ ९ ॥

इस प्रकार धर्मका अनुसरण करनेवाले, सत्य, दान और तपमें संलग्न रहनेवाले, दया आदि गुणोंसे युक्त, काम-क्रोध आदि दोषोंसे रहित, प्रजापालन- परायण, उत्तम धर्मसेवी तथा गौओं और ब्राह्मणोंकी रक्षाके लिये युद्ध करनेवाले नरेशोंने परम उत्तम गति प्राप्त की है ॥ १८-१९ ॥ एवं रुद्राः सवसवस्तथाऽऽदित्याः परंतप ।

साध्या राजर्षिसंघाश्च धर्ममेतं समाश्रिताः ।

अप्रमत्तास्ततः स्वर्गं प्राप्ताः पुण्यैः स्वकर्मभिः ॥ २० ॥

पृष्ठ 143

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शत्रुओंको संताप देनेवाले युधिष्ठिर! इसी प्रकार रुद्र, वसु, आदित्य, साध्यगण तथा राजर्षिसमूहोंने सावधान होकर इस धर्मका आश्रय लिया है । फिर उन्होंने अपने पुण्यकर्मोंद्वारा स्वर्गलोक प्राप्त किया है ॥ २० ॥

इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि राजधर्मानुशासनपर्वणि देवस्थानवाक्ये एकविंशोऽध्यायः ॥ २१ ॥

इसप्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत राजधर्मानुशासनपर्वमें देवस्थानवाक्यविषयक इक्कीसवाँ अध्याय पूराहुआ ॥ २१ ॥

पृष्ठ 144

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द्वाविंशोऽध्यायः क्षत्रियधर्मकी प्रशंसा करते हुए अर्जुनका पुनः राजा युधिष्ठिरको समझाना वैशम्पायन उवाच

अस्मिन्नेवान्तरे वाक्यं पुनरेवार्जुनोऽब्रवीत् ।

निर्विण्णमनसं ज्येष्ठमिदं भ्रातरमच्युतम् ॥ १ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं - जनमेजय! इसी बीचमें देवस्थानका भाषण समाप्त होते ही अर्जुनने खिन्नचित्त होकर बैठे हुए तथा कभी धर्मसे च्युत न होनेवाले अपने बड़े भाई युधिष्ठिरसे इस प्रकार कहा— ॥ १ ॥

क्षत्रधर्मेण धर्मज्ञ प्राप्य राज्यं सुदुर्लभम् ।

जित्वा चारीन् नरश्रेष्ठ तप्यते किं भृशं भवान् ॥ २ ॥

‘ धर्मके ज्ञाता नरश्रेष्ठ! आप क्षत्रियधर्मके अनुसार इस परम दुर्लभ राज्यको पाकर और शत्रुओंको जीतकर इतने अधिक संतप्त क्यों हो रहे हैं? ॥ २ ॥

क्षत्रियाणां महाराज संग्रामे निधनं मतम् ।

विशिष्टं बहुभिर्यज्ञैः क्षत्रधर्ममनुस्मर ॥ ३ ॥

‘महाराज! आप क्षत्रियधर्मको स्मरण तो कीजिये, क्षत्रियोंके लिये संग्राममें मर जाना तो बहुसंख्यक यज्ञोंसे भी बढ़कर माना गया है ॥ ३ ॥

ब्राह्मणानां तपस्त्यागः प्रेत्य धर्मविधिः स्मृतः ।

क्षत्रियाणां च निधनं संग्रामे विहितं प्रभो ॥ ४ ॥

‘प्रभो! तप और त्याग ब्राह्मणोंके धर्म हैं जो मृत्युके पश्चात् परलोकमें धर्मजनित फल देनेवाले हैं । क्षत्रियोंके लिये संग्राममें प्राप्त हुई मृत्यु ही पारलौकिक पुण्यफलकी प्राप्ति करानेवाली है ॥ ४ ॥

क्षात्रधर्मो महारौद्रः शस्त्रनित्य इति स्मृतः ।

वधश्च भरतश्रेष्ठ काले शस्त्रेण संयुगे ॥ ५ ॥

‘ भरतश्रेष्ठ! क्षत्रियोंका धर्म बड़ा भयंकर है । उसमें सदा शस्त्रसे ही काम पड़ता है और समय आनेपर युद्धमें शस्त्रद्वारा उनका वध भी हो जाता है ( अतः उनके लिये शोक करनेका कोई कारण नहीं है ) ॥ ५ ॥

ब्राह्मणस्यापि चेद् राजन् क्षत्रधर्मेण वर्ततः ।

प्रशस्तं जीवितं लोके क्षत्रं हि ब्रह्मसम्भवम् ॥ ६ ॥

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' राजन्! ब्राह्मण भी यदि क्षत्रियधर्मके अनुसार जीवन निर्वाह करता हो तो लोकमें उसका जीवन उत्तम ही माना गया है; क्योंकि क्षत्रियकी उत्पत्ति ब्राह्मणसे ही हुई है ॥ ६ ॥

न त्यागो न पुनर्यज्ञो न तपो मनुजेश्वर ।

क्षत्रियस्य विधीयन्ते न परस्वोपजीवनम् ॥ ७ ॥

‘ नरेश्वर! क्षत्रियके लिये त्याग, यज्ञ, तप और दूसरेके धनसे जीवन -निर्वाहका विधान नहीं है ॥ ७ ॥

स भवान् सर्वधर्मज्ञो धर्मात्मा भरतर्षभ ।

राजा मनीषी निपुणो लोके दृष्टपरावरः ॥ ८ ॥

‘ भरतश्रेष्ठ! आप तो सम्पूर्ण धर्मोंके ज्ञाता, धर्मात्मा, राजा, मनीषी, कर्मकुशल और संसारमें आगे - पीछेकी सब बातोंपर दृष्टि रखनेवाले हैं ॥ ८ ॥

त्यक्त्वा संतापजं शोकं दंशितो भव कर्मणि ।

क्षत्रियस्य विशेषेण हृदयं वज्रसंनिभम् ॥ ९ ॥

‘ आप यह शोक- संताप छोड़कर क्षत्रियोचित कर्म करनेके लिये तैयार हो जाइये ।

क्षत्रियका हृदय तो विशेषरूपसे वज्रके तुल्य कठोर होता है ॥ ९ ॥

जित्वारीन् क्षत्रधर्मेण प्राप्य राज्यमकण्टकम् ।

विजितात्मा मनुष्येन्द्र यज्ञदानपरो भव ॥ १० ॥

‘ नरेन्द्र! आपने क्षत्रियधर्मके अनुसार शत्रुओंको जीतकर निष्कण्टक राज्य प्राप्त किया है । अब अपने मनको वशमें करके यज्ञ और दानमें संलग्न हो जाइये ॥ १० ॥

इन्द्रो वै ब्रह्मणः पुत्रः क्षत्रियः कर्मणाभवत् ।

ज्ञातीनां पापवृत्तीनां जघान नवतीर्नव ॥ ११ ॥

‘ देखिये । इन्द्र ब्राह्मणके पुत्र हैं, किंतु कर्मसे क्षत्रिय हो गये हैं । उन्होंने पापमें प्रवृत्त हुए अपने ही भाई- बन्धुओं ( दैत्यों ) - मेंसे आठ सौ दस व्यक्तियोंको मार डाला ॥ ११ ॥

तच्चास्य कर्म पूज्यं च प्रशस्यं च विशाम्पते ।

तेनेन्द्रत्वं समापेदे देवानामिति नः श्रुतम् ॥ १२ ॥

‘ प्रजानाथ! उनका वह कर्म पूजनीय एवं प्रशंसाके योग्य माना गया । उन्होंने उसी कर्मसे देवेन्द्रपद प्राप्त कर लिया, ऐसा हमने सुना है ॥ १२ ॥

स त्वं यज्ञैर्महाराज यजस्व बहुदक्षिणैः ।

यथैवेन्द्रो मनुष्येन्द्र चिराय विगतज्वरः ॥ १३ ॥

'महाराज! नरेन्द्र । आप भी इन्द्रके समान ही चिन्ता और शोकसे रहित हो दीर्घ कालतक बहुत - सी दक्षिणावाले यज्ञोंका अनुष्ठान करते रहिये ॥ १३ ॥

मा त्वमेवं गते किंचिच्छोचेथाः क्षत्रियर्षभ ।

गतास्ते क्षत्रधर्मेण शस्त्रपूताः परां गतिम् ॥ १४ ॥

पृष्ठ 146

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‘ क्षत्रियशिरोमणे! ऐसी अवस्थामें आप तनिक भी शोक न कीजिये । युद्धमें मारे गये वे सभी वीर क्षत्रियधर्मके अनुसार शस्त्रोंसे पवित्र होकर परम गतिको प्राप्त हो गये हैं ॥ १४ ॥

भवितव्यं तथा तच्च यद् वृत्तं भरतर्षभ ।

दिष्टं हि राजशार्दूल न शक्यमतिवर्तितुम् ॥ १५ ॥

‘ भरतश्रेष्ठ! जो कुछ हुआ है, वह उसी रूपमें होनेवाला था । राजसिंह! दैवके विधानका उल्लंघन नहीं किया जा सकता ॥ १५ ॥

इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि राजधर्मानुशासनपर्वणि अर्जुनवाक्ये द्वाविंशोऽध्यायः ॥ २२ ॥

इसप्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत राजधर्मानुशासनपर्वमें अर्जुनवाक्यविषयक बाईसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २२ ॥

पृष्ठ 147

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त्रयोविंशोऽध्यायः व्यासजीका शंख और लिखितकी कथा सुनाते हुए राजा सुद्युम्नके दण्डधर्मपालनका महत्त्व सुनाकर युधिष्ठिरको राजधर्ममें ही दृढ़ रहनेकी आज्ञा देना वैशम्पायन उवाच

एवमुक्तस्तु कौन्तेयो गुडाकेशेन पाण्डवः ।

नोवाच किंचित् कौरव्यस्ततो द्वैपायनोऽब्रवीत् ॥ १ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं -राजन्! निद्राविजयी अर्जुनके ऐसा कहनेपर भी कुरुकुलनन्दन पाण्डुपुत्र कुन्तीकुमार युधिष्ठिर जब कुछ न बोले, तब द्वैपायन व्यासजीने इस प्रकार कहा ॥ १ ॥

व्यास उवाच

बीभत्सोर्वचनं सौम्य सत्यमेतद् युधिष्ठिर ।

शास्त्रदृष्टः परो धर्मः स्थितो गार्हस्थ्यमाश्रितः ॥ २ ॥

व्यासजी बोले- सौम्य युधिष्ठिर! अर्जुनने जो बात कही है, वह ठीक है । शास्त्रोक्त परमधर्म गृहस्थ - आश्रमका ही आश्रय लेकर टिका हुआ है ॥ २ ॥

स्वधर्मं चर धर्मज्ञ यथाशास्त्रं यथाविधि ।

न हि गार्हस्थ्यमुत्सृज्य तवारण्यं विधीयते ॥ ३ ॥

धर्मज्ञ युधिष्ठिर! तुम शास्त्रके कथनानुसार विधिपूर्वक स्वधर्मका ही आचरण करो ।

तुम्हारे लिये गृहस्थ- आश्रमको छोड़कर वनमें जानेका विधान नहीं है ॥ ३ ॥

गृहस्थं हि सदा देवाः पितरोऽतिथयस्तथा ।

भृत्याश्चैवोपजीवन्ति तान् भरस्व महीपते ॥ ४ ॥

पृथ्वीनाथ! देवता, पितर, अतिथि और भृत्यगण सदा गृहस्थका ही आश्रय लेकर जीवन - निर्वाह करते हैं; अतः तुम उनका भरण- पोषण करो ॥ ४ ॥

वयांसि पशवश्चैव भूतानि च जनाधिप ।

गृहस्थैरेव धार्यन्ते तस्माच्छ्रेष्ठो गृहाश्रमी ॥ ५ ॥

जनेश्वर! पशु, पक्षी तथा अन्य प्राणी भी गृहस्थोंसे ही पालित होते हैं; अतः गृहस्थ ही सबसे श्रेष्ठ है ॥ ५ ॥

सोऽयं चतुर्णामेतेषामाश्रमाणां दुराचरः ।

तं चराद्य विधिं पार्थ दुश्चरं दुर्बलेन्द्रियैः ॥ ६ ॥

पृष्ठ 148

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युधिष्ठिर! चारों आश्रमोंमें यह गृहस्थाश्रम ही ऐसा है, जिसका ठीक- ठीक पालन करना बहुत कठिन है । जिनकी इन्द्रियाँ दुर्बल हैं, उनके द्वारा गृहस्थ धर्मका आचरण दुष्कर है । तुम अब उसी दुष्कर धर्मका पालन करो ॥ ६ ॥

वेदज्ञानं च ते कृत्स्नं तपश्चाचरितं महत् ।

पितृपैतामहं राज्यं धुर्यवद् वोढुमर्हसि ॥ ७ ॥

तुम्हें वेदका पूरा - पूरा ज्ञान है, तुमने बड़ी भारी तपस्या की है । इसलिये अपने पिता-पितामहोंके इस राज्यका भार तुम्हें एक धुरन्धर पुरुषकी भाँति वहन करना चाहिये ॥ ७ ॥

तपो यज्ञस्तथा विद्या भैक्ष्यमिन्द्रियसंयमः ।

ध्यानमेकान्तशीलत्वं तुष्टिर्ज्ञानं च शक्तितः ॥ ८ ॥

ब्राह्मणानां महाराज चेष्टा संसिद्धिकारिका । महाराज! तप, यज्ञ, विद्या, भिक्षा, इन्द्रियसंयम, ध्यान, एकान्तवासका स्वभाव, संतोष और यथाशक्ति शास्त्रज्ञान –ये सब गुण तथा चेष्टाएँ ब्राह्मणोंके लिये सिद्धि प्रदान करनेवाली हैं ॥ ८३ ॥

क्षत्रियाणां तु वक्ष्यामि तवापि विदितं पुनः ॥ ९ ॥

यज्ञो विद्या समुत्थानमसंतोषः श्रयं प्रति ।

दण्डधारणमुग्रत्वं प्रजानां परिपालनम् ॥ १० ॥

वेदज्ञानं तथा कृत्स्नं तपः सुचरितं तथा ।

द्रविणोपार्जनं भूरि पात्रे च प्रतिपादनम् ॥ ११ ॥

एतानि राज्ञां कर्माणि सुकृतानि विशाम्पते ।

इमं लोकममुं चैव साधयन्तीति नः श्रुतम् ॥ १२ ॥

प्रजानाथ! अब मैं पुनः क्षत्रियोंके धर्म बता रहा हूँ, यद्यपि वह तुम्हें भी ज्ञात है । यज्ञ, विद्याभ्यास, शत्रुओंपर चढ़ाई करना, राजलक्ष्मीकी प्राप्तिसे कभी संतुष्ट न होना, दुष्टोंको दण्ड देनेके लिये उद्यत रहना, क्षत्रियतेजसे सम्पन्न रहना, प्रजाकी सब ओरसे रक्षा करना, समस्त वेदोंका ज्ञान प्राप्त करना, तप, सदाचार, अधिक द्रव्योपार्जन और सत्पात्रको दान देना — ये सब राजाओंके कर्म हैं, जो सुन्दर ढंगसे किये जानेपर उनके इहलोक और परलोक दोनोंको सफल बनाते हैं, ऐसा हमने सुना है ॥ ९ –१२ ॥

एषां ज्यायस्तु कौन्तेय दण्डधारणमुच्यते ।

बलं हि क्षत्रिये नित्यं बले दण्डः समाहितः ॥ १३ ॥

कुन्तीनन्दन! इनमें भी दण्ड धारण करना राजाका प्रधान धर्म बताया जाता है; क्योंकि क्षत्रियमें बलकी नित्य स्थिति है और बलमें ही दण्ड प्रतिष्ठित होता है ॥ १३ ॥

एता विद्याः क्षत्रियाणां राजन् संसिद्धिकारिकाः ।

अपि गाथामिमां चापि बृहस्पतिरगायत ॥ १४ ॥

पृष्ठ 149

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राजन्! ये विद्याएँ ( धार्मिक क्रियाएँ) क्षत्रियोंको सदा सिद्धि प्रदान करनेवाली हैं । इस विषयमें बृहस्पतिजीने इस गाथाका भी गान किया है ॥ १४ ॥

भूमिरेतौ निगिरति सर्पे बिलशयानिव ।

राजानं चाविरोद्धारं ब्राह्मणं चाप्रवासिनम् ॥ १५ ॥

‘ जैसे साँप बिलमें रहनेवाले चूहे आदि जीवोंको निगल जाता है, उसी प्रकार विरोध न करनेवाले राजा और परदेशमें न जानेवाले ब्राह्मण– इन दो व्यक्तियोंको भूमि निगल जाती है ॥ १५ ॥

सुद्युम्नश्चापि राजर्षिः श्रूयते दण्डधारणात् ।

प्राप्तवान् परमां सिद्धिं दक्षः प्राचेतसो यथा ॥ १६ ॥

सुना जाता है कि राजर्षि सुद्युम्नने दण्डधारणके द्वारा ही प्रचेताकुमार दक्षके समान परम सिद्धि प्राप्त कर ली ॥ युधिष्ठिर उवाच

भगवन् कर्मणा केन सुद्युम्नो वसुधाधिपः ।

संसिद्धिं परमां प्राप्तः श्रोतुमिच्छामि तं नृपम् ॥ १७ ॥

युधिष्ठिरने पूछा — भगवन्! पृथिवीपति सुद्युम्नने किस कर्मसे परम सिद्धि प्राप्त कर ली थी । मैं उन नरेशका चरित्र सुनना चाहता हूँ ॥ १७ ॥

व्यास उवाच

अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् ।

शंखश्च लिखितश्चास्तां भ्रातरौ संशितव्रतौ ॥ १८ ॥

व्यासजीने कहा – युधिष्ठिर! इस विषयमें लोग इस प्राचीन इतिहासका उदाहरण दिया करते हैं — शंख और लिखित नामवाले दो भाई थे । दोनों ही कठोर व्रतका पालन करनेवाले तपस्वी थे ॥ १८ ॥

तयोरावसथावास्तां रमणीयौ पृथक् पृथक् ।

नित्यपुष्पफलैर्वृक्षैरुपेतौ बाहुदामनु ॥ १ ९ ॥

बाहुदा नदीके तटपर उन दोनोंके अलग- अलग परम सुन्दर आश्रम थे, जो सदा फल-फूलोंसे लदे रहनेवाले वृक्षोंसे सुशोभित थे ॥ १ ९ ॥

ततः कदाचिल्लिखितः शंखस्याश्रममागतः ।

यदृच्छयाथ शंखोऽपि निष्क्रान्तोऽभवदाश्रमात् ॥ २० ॥

एक दिन लिखित शंखके आश्रमपर आये । दैवेच्छासे शंख भी उसी समय आश्रमसे बाहर निकल गये थे ॥

सोऽभिगम्याश्रमं भ्रातुः शंखस्य लिखितस्तदा ।

फलानि पातयामास सम्यक्परिणतान्युत ॥ २१ ॥

पृष्ठ 150

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तान्युपादाय विस्रब्धो भक्षयामास स द्विजः । भाई शंखके आश्रममें जाकर लिखितने खूब पके हुए बहुत- से फल तोड़कर गिराये और उन सबको लेकर वे ब्रह्मर्षि बड़ी निश्चिन्तताके साथ खाने लगे ॥ २१ ॥

तस्मिंश्च भक्षयत्येव शंखोऽप्याश्रममागतः ॥ २२ ॥

भक्षयन्तं तु तं दृष्ट्वा शंखो भ्रातरमब्रवीत् ।

कुतः फलान्यवाप्तानि हेतुना केन खादसि ॥ २३ ॥

वे खा ही रहे थे कि शंख भी आश्रमपर लौट आये । भाईको फल खाते देख शंखने उनसे पूछा — ' तुमने ये फल कहाँसे प्राप्त किये हैं और किसलिये तुम इन्हें खा रहे हो? ' ॥ २२-२३ ॥

सोऽब्रवीद् भ्रातरं ज्येष्ठमुपसृत्याभिवाद्य च ।

इत एव गृहीतानि मयेति प्रहसन्निव ॥ २४ ॥

लिखितने निकट जाकर बड़े भाईको प्रणाम किया और हँसते हुए- से इस प्रकार कहा -' भैया! मैंने ये फल यहींसे लिये हैं ' ॥ २४ ॥

तमब्रवीत् तथा शंखस्तीव्ररोषसमन्वितः ।

स्तेयं त्वया कृतमिदं फलान्याददता स्वयम् ॥ २५ ॥

तब शंखने तीव्र रोषमें भरकर कहा - ' तुमने मुझसे पूछे बिना स्वयं ही फल लेकर यह चोरी की है ॥ २५ ॥

गच्छ राजानमासाद्य स्वकर्म कथयस्व वै ।

अदत्तादानमेवं हि कृतं पार्थिवसत्तम ॥ २६ ॥

स्तेनं मां त्वं विदित्वा च स्वधर्ममनुपालय ।

शीघ्रं धारय चौरस्य मम दण्डं नराधिप ॥ २७ ॥

‘ अतः तुम राजाके पास जाओ और अपनी करतूत उन्हें कह सुनाओ । उनसे कहना —'नृपश्रेष्ठ! मैंने इस प्रकार बिना दिये हुए फल ले लिये हैं, अतः मुझे चोर समझकर अपने धर्मका पालन कीजिये । नरेश्वर! चोरके लिये जो नियत दण्ड हो, वह शीघ्र मुझे प्रदान कीजिये ' ॥

इत्युक्तस्तस्य वचनात् सुद्युम्नं स नराधिपम् ।

अभ्यगच्छन्महाबाहो लिखितः संशितव्रतः ॥ २८ ॥

महाबाहो! बड़े भाईके ऐसा कहनेपर उनकी आज्ञासे कठोर व्रतका पालन करनेवाले लिखित मुनि राजा सुद्युम्नके पास गये ॥ २८ ॥

सुद्युम्नस्त्वन्तपालेभ्यः श्रुत्वा लिखितमागतम् ।

अभ्यगच्छत् सहामात्यः पद्भ्यामेव जनेश्वरः ॥ २ ९ ॥

सुद्युम्नने द्वारपालोंसे जब यह सुना कि लिखित मुनि आये हैं तो वे नरेश अपने मन्त्रियोंके साथ पैदल ही उनके निकट गये ॥ २ ९ ॥