श्रीगणेशाय नमः।

महाभारत — खण्ड ५ — पृष्ठ 151–160

महाभारत — खण्ड ५ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 151–160

पृष्ठ 151

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तमब्रवीत् समागम्य स राजा धर्मवित्तमम् ।

किमागमनमाचक्ष्व भगवन् कृतमेव तत् ॥ ३० ॥

राजाने उन धर्मज्ञ मुनिसे मिलकर पूछा — ' भगवन्! आपका शुभागमन किस उद्देश्यसे हुआ है? यह बताइये और उसे पूरा हुआ ही समझिये ' ॥ ३० ॥

एवमुक्तः स विप्रर्षिः सुद्युम्नमिदमब्रवीत् ।

प्रतिश्रुत्य करिष्येति श्रुत्वा तत् कर्तुमर्हसि ॥ ३१ ॥

- उनके इस तरह कहनेपर विप्रर्षि लिखितने सुद्युम्नसे यों कहा– ' राजन्! पहले यह प्रतिज्ञा कर लो कि ' हम करेंगे' उसके बाद मेरा उद्देश्य सुनो और सुनकर उसे तत्काल पूरा करो ॥ ३१ ॥

अनिसृष्टानि गुरुणा फलानि मनुजर्षभ ।

भक्षितानि महाराज तत्र मां शाधि मा चिरम् ॥ ३२ ॥

‘नरश्रेष्ठ! मैंने बड़े भाईके दिये बिना ही उनके बगीचेसे फल लेकर खा लिये हैं; महाराज! इसके लिये मुझे शीघ्र दण्ड दीजिये ' ॥ ३२ ॥

सुद्युम्नउवाच

प्रमाणं चेन्मतो राजा भवतो दण्डधारणे ।

अनुज्ञायामपि तथा हेतुः स्याद् ब्राह्मणर्षभ ॥ ३३ ॥

सुद्युम्नने कहा-ब्राह्मणशिरोमणे! यदि आप दण्ड देनेमें राजाको प्रमाण मानते हैं तो वह क्षमा करके आपको लौट जानेकी आज्ञा दे दे, इसका भी उसे अधिकार है ॥ ३३ ॥

स भवानभ्यनुज्ञातः शुचिकर्मा महाव्रतः ।

ब्रूहि कामानतोऽन्यांस्त्वं करिष्यामि हि ते वचः ॥ ३४ ॥

आप पवित्र कर्म करनेवाले और महान् व्रतधारी हैं । मैंने अपराधको क्षमा करके आपको जानेकी आज्ञा दे दी । इसके सिवा, यदि दूसरी कामनाएँ आपके मनमें हों तो उन्हें बताइये, मैं आपकी आज्ञाका पालन करूँगा ॥ व्यास उवाच

संछन्द्यमानो ब्रह्मर्षिः पार्थिवेन महात्मना ।

नान्यं स वरयामास तस्माद् दण्डादृते वरम् ॥ ३५ ॥

व्यासजीने कहा – महामना राजा सुद्युम्नके बारंबार आग्रह करनेपर भी ब्रह्मर्षि लिखितने उस दण्डके सिवा दूसरा कोई वर नहीं माँगा ॥ ३५ ॥

ततः स पृथिवीपालो लिखितस्य महात्मनः ।

करौ प्रच्छेदयामास धृतदण्डो जगाम सः ॥ ३६ ॥

तब उन भूपालने महामना लिखितके दोनों हाथ कटवा दिये । दण्ड पाकर लिखित वहाँसे चले गये ॥ ३६ ॥

पृष्ठ 152

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स गत्वा भ्रातरं शंखमार्तरूपोऽब्रवीदिदम् ।

धृतदण्डस्य दुर्बुद्धेर्भवांस्तत् क्षन्तुमर्हति ॥ ३७ ॥

अपने भाई शंखके पास जाकर लिखितने आर्त होकर कहा–' भैया! मैंने दण्ड पा लिया । मुझ दुर्बुद्धिके उस अपराधको आप क्षमा कर दें ' ॥ ३७ ॥

शंखउवाच न कुप्ये तव धर्मज्ञ न त्वं दूषयसे मम ।

सुनिर्मलं कुलं ब्रह्मन्नस्मिन् जगति विश्रुतम् ।

धर्मस्तु ते व्यतिक्रान्तस्ततस्ते निष्कृतिः कृता ॥ ३८ ॥

शंख बोले- धर्मज्ञ! मैं तुमपर कुपित नहीं हूँ । तुम मेरा कोई अपराध नहीं करते हो । ब्रह्मन्! हम दोनोंका कुल इस जगत्में अत्यन्त निर्मल एवं निष्कलंक रूपमें विख्यात है । तुमने धर्मका उल्लंघन किया था, अतः उसीका प्रायश्चित्त किया है ॥ ३८ ॥

त्वं गत्वा बाहुदां शीघ्रं तर्पयस्व यथाविधि ।

देवानृषीन् पितॄंश्चैवं मा चाधर्मे मनः कृथाः ॥ ३ ९ ॥

अब तुम शीघ्र ही बाहुदा नदीके तटपर जाकर विधिपूर्वक देवताओं, ऋषियों और पितरोंका तर्पण करो । भविष्यमें फिर कभी अधर्मकी ओर मन न ले जाना ॥

तस्य तद् वचनं श्रुत्वा शंखस्य लिखितस्तदा ।

अवगाह्यापगां पुण्यामुदकार्थं प्रचक्रमे ॥ ४० ॥

प्रादुरास्तां ततस्तस्य करौ जलजसंनिभौ । शंखकी वह बात सुनकर लिखितने उस समय पवित्र नदी बाहुदामें स्नान किया और पितरोंका तर्पण करनेके लिये चेष्टा आरम्भ की । इतनेहीमें उनके कमल - सदृश सुन्दर दो हाथ प्रकट हो गये ॥ ४० ॥

ततः स विस्मितो भ्रातुर्दर्शयामास तौ करौ ॥ ४१ ॥

ततस्तमब्रवीच्छंखस्तपसेदं कृतं मया ।

मा च तेऽत्र विशंकाभूद् दैवमत्र विधीयते ॥ ४२ ॥

तदनन्तर लिखितने चकित होकर अपने भाईको वे दोनों हाथ दिखाये । तब शंखने उनसे कहा — ‘ भाई! इस विषयमें तुम्हें शंका नहीं होनी चाहिये । मैंने तपस्यासे तुम्हारे हाथ उत्पन्न किये हैं । यहाँ दैवका विधान ही सफल हुआ है ॥ ४१-४२ ॥ लिखितउवाच

किं तु नाहं त्वया पूतः पूर्वमेव महाद्युते ।

यस्य ते तपसो वीर्यमीदृशं द्विजसत्तम ॥ ४३ ॥

तब लिखितने पूछा— महातेजस्वी द्विजश्रेष्ठ! जब आपकी तपस्याका ऐसा बल है तो आपने पहले ही मुझे पवित्र क्यों नहीं कर दिया? ॥ ४३ ॥

पृष्ठ 153

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शंखउवाच

एवमेतन्मया कार्यं नाहं दण्डधरस्तव ।

स च पूतो नरपतिस्त्वं चापि पितृभिः सह ॥ ४४ ॥

शंख बोले — भाई! यह ठीक है, मैं ऐसा कर सकता था; परंतु मुझे तुम्हें दण्ड देनेका अधिकार नहीं है । दण्ड देनेका कार्य तो राजाका ही है । इस प्रकार दण्ड देकर राजा सुद्युम्न और उस दण्डको स्वीकार करके तुम पितरोंसहित पवित्र हो गये ॥ ४४ ॥

व्यास उवाच

स राजा पाण्डवश्रेष्ठ श्रेयान् वै तेन कर्मणा ।

प्राप्तवान् परमां सिद्धिं दक्षः प्राचेतसो यथा ॥ ४५ ॥

व्यासजी कहते हैं— पाण्डवश्रेष्ठ युधिष्ठिर! उस दण्ड -प्रदानरूपी कर्मसे राजा सुद्युम्न उच्चतम पदको प्राप्त हुए। उन्होंने प्रचेताओंके पुत्र दक्षकी भाँति परम सिद्धि प्राप्त की थी ॥ ४५ ॥

एष धर्मः क्षत्रियाणां प्रजानां परिपालनम् ।

उत्पथोऽन्यो महाराज मा स्म शोके मनः कृथाः ॥ ४६ ॥

महाराज! प्रजाजनोंका पूर्णरूपसे पालन करना ही क्षत्रियोंका मुख्य धर्म है । दूसरा काम उसके लिये कुमार्गके तुल्य है; अतः तुम मनको शोकमें न डुबाओ ॥

भ्रातुरस्य हितं वाक्यं शृणु धर्मज्ञ सत्तम ।

दण्ड एव हि राजेन्द्र क्षत्रधर्मो न मुण्डनम् ॥ ४७ ॥

धर्मके ज्ञाता सत्पुरुष! तुम अपने भाईकी हितकर बात सुनो । राजेन्द्र! दण्ड- धारण ही क्षत्रिय - धर्मके अन्तर्गत है, मूँड़ मुड़ाकर संन्यासी बनना नहीं ॥ ४७ ॥

इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि राजधर्मानुशासनपर्वणि व्यासवाक्ये त्रयोविंशोऽध्यायः ॥ २३ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत राजधर्मानुशासनपर्वमें व्यासवाक्यविषयक तेईसवाँ अध्याय पूराहुआ ॥ २३ ॥

Papa

पृष्ठ 154

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चतुर्विंशोऽध्यायः व्यासजीका युधिष्ठिरको राजा हयग्रीवका चरित्र सुनाकर उन्हें राजोचित कर्तव्यका पालन करनेके लिये जोर देना वैशम्पायन उवाच

पुनरेव महर्षिस्तं कृष्णद्वैपायनो मुनिः ।

अजातशत्रुं कौन्तेयमिदं वचनमब्रवीत् ॥ १ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! श्रीकृष्णद्वैपायन महर्षि व्यासजीने अजातशत्रु कुन्तीकुमार युधिष्ठिरसे पुनः इस प्रकार कहा- ॥ १ ॥

अरण्ये वसतां तात भ्रातॄणां ते मनस्विनाम् ।

मनोरथा महाराज ये तत्रासन् युधिष्ठिर ॥ २ ॥

तानिमे भरतश्रेष्ठ प्राप्नुवन्तु महारथाः । ‘ तात! महाराज युधिष्ठिर! वनमें रहते समय तुम्हारे मनस्वी भाइयोंके मनमें जो-जो मनोरथ उत्पन्न हुए थे, भरतश्रेष्ठ! उन्हें ये महारथी वीर प्राप्त करें ॥ २३ ॥

प्रशाधि पृथिवीं पार्थ ययातिरिव नाहुषः ॥ ३ ॥

अरण्ये दुःखवसतिरनुभूता तपस्विभिः ।

दुःखस्यान्ते नरव्याघ्र सुखान्यनुभवन्तु वै ॥ ४ ॥

' कुन्तीनन्दन! तुम नहुषपुत्र ययातिके समान इस पृथिवीका पालन करो । तुम्हारे इन तपस्वी भाइयोंने वनवासके समय बड़े दुःख उठाये हैं । नरव्याघ्र! अब ये उस दुःखके बाद सुखका अनुभव करें ॥ ३-४ ॥

धर्ममर्थं च कामं च भ्रातृभिः सह भारत ।

अनुभूय ततः पश्चात् प्रस्थातासि विशाम्पते ॥ ५ ॥

‘ भरतनन्दन! प्रजानाथ! इस समय भाइयोंके साथ तुम धर्म, अर्थ और कामका उपभोग करो । पीछे वनमें चले जाना ॥ ५ ॥

अर्थिनां च पितॄणां च देवतानां च भारत ।

आनृण्यं गच्छ कौन्तेय तत् सर्वं च करिष्यसि ॥ ६ ॥

‘ भरतनन्दन! कुन्तीकुमार! पहले याचकों, पितरों और देवताओंके ऋणसे उऋण हो लो, फिर वह सब करना ॥

सर्वमेधाश्वमेधाभ्यां यजस्व कुरुनन्दन ।

ततः पश्चान्महाराज गमिष्यसि परां गतिम् ॥ ७ ॥

पृष्ठ 155

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‘ कुरुनन्दन! महाराज! पहले सर्वमेध और अश्वमेध यज्ञोंका अनुष्ठान करो । उससे परम गतिको प्राप्त करोगे ॥

भ्रातॄंश्च सर्वान् क्रतुभिः संयोज्य बहुदक्षिणैः ।

सम्प्राप्तः कीर्तिमतुलां पाण्डवेय भविष्यसि ॥ ८ ॥

‘ पाण्डुपुत्र! अपने समस्त भाइयोंको बहुत- सी दक्षिणावाले यज्ञोंमें लगाकर तुम अनुपम कीर्ति प्राप्त कर लोगे ॥ ८ ॥

विद्मस्ते पुरुषव्याघ्र वचनं कुरुसत्तम ।

शृणुष्वैवं यथा कुर्वन् न धर्माच्च्यवसे नृप ॥ ९ ॥

‘ कुरुश्रेष्ठ! पुरुषसिंह नरेश्वर! मैं तो तुम्हारी बात समझता हूँ । अब तुम मेरा यह वचन सुनो, जिसके अनुसार कार्य करनेपर धर्मसे च्युत नहीं होओगे ॥ ९ ॥

आददानस्य विजयं विग्रहं च युधिष्ठिर ।

समानधर्मकुशलाः स्थापयन्ति नरेश्वर ॥ १० ॥

' राजा युधिष्ठिर! विषम भावसे रहित धर्ममें कुशल पुरुष विजय पानेकी इच्छावाले राजाके लिये संग्रामकी ही स्थापना करते हैं ॥ १० ॥

( प्रत्यक्षमनुमानं च उपमानं तथाऽऽगमः ।

अर्थापत्तिस्तथैतिह्यं संशयो निर्णयस्तथा ॥

आकारो हीङ्गितश्चैव गतिश्चेष्टा च भारत ।

प्रतिज्ञा चैव हेतुश्च दृष्टान्तोपनयौ तथा ॥

उक्तं निगमनं तेषां प्रमेयं च प्रयोजनम् ।

एतानि साधनान्याहुर्बहुवर्गप्रसिद्धये ॥

‘ भरतनन्दन! प्रत्यक्ष, अनुमान, उपमान, आगम, अर्थापत्ति, ऐतिह्य, संशय, निर्णय, आकृति, संकेत, गति, चेष्टा, प्रतिज्ञा, हेतु, उदाहरण, उपनय और निगमन –इन सबका प्रयोजन है प्रमेयकी सिद्धि । बहुत- से वर्गोंकी प्रसिद्धिके लिये इन सबको साधन बताया गया है ॥

प्रत्यक्षमनुमानं च सर्वेषां योनिरिष्यते ।

प्रमाणज्ञो हि शक्नोति दण्डनीतौ विचक्षणः ॥

अप्रमाणवतां नीतो दण्डो हन्यान्महीपतिम् । ) ' इनमेंसे प्रत्यक्ष और अनुमान ये दो सभीके लिये निर्णयके आधार माने गये हैं । प्रत्यक्ष आदि प्रमाणोंको जाननेवाला पुरुष दण्डनीतिमें कुशल हो सकता है । जो प्रमाणशून्य हैं, उनके द्वारा प्रयोगमें लाया हुआ दण्ड राजाका विनाश कर सकता है ॥

देशकालप्रतीक्षी यो दस्यून् मर्षयते नृपः ।

शास्त्रजां बुद्धिमास्थाय युज्यते नैनसा हि सः ॥ ११ ॥

पृष्ठ 156

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' देश और कालकी प्रतीक्षा करनेवाला जो राजा शास्त्रीय बुद्धिका आश्रय ले लुटेरोंके अपराधको धैर्यपूर्वक सहन करता है अर्थात् उनको दण्ड देनेमें जल्दी नहीं करता, समयकी प्रतीक्षा करता है, वह पापसे लिप्त नहीं होता ॥

आदाय बलिषड्भागं यो राष्ट्रं नाभिरक्षति ।

प्रतिगृह्णाति तत् पापं चतुर्थांशेन भूमिपः ॥ १२ ॥

' जो प्रजाकी आयका छठा भाग करके रूपमें लेकर भी राष्ट्रकी रक्षा नहीं करता है, वह राजा उसके चौथाई पापको मानो ग्रहण कर लेता है ॥ १२ ॥

निबोध च यथाऽऽतिष्ठन् धर्मान्न च्यवते नृपः ।

निग्रहाद् धर्मशास्त्राणामनुरुद्ध्यन्नपेतभीः ॥ १३ ॥

' मेरी वह बात सुनो, जिसके अनुसार चलनेवाला राजा धर्मसे नीचे नहीं गिरता । धर्मशास्त्रोंकी आज्ञाका उल्लंघन करनेसे राजाका पतन हो जाता है और यदि धर्मशास्त्रका अनुसरण करता है तो वह निर्भय होता है ॥

कामक्रोधावनादृत्य पितेव समदर्शनः ।

शास्त्रजां बुद्धिमास्थाय युज्यते नैनसा हि सः ॥ १४ ॥

'जो काम और क्रोधकी अवहेलना करके शास्त्रीय विधिका आश्रय ले सर्वत्र पिताके समान समदृष्टि रखता है, वह कभी पापसे लिप्त नहीं होता ॥ १४ ॥

दैवेनाभ्याहतो राजा कर्मकाले महाद्युते ।

न साधयति यत् कर्म न तत्राहुरतिक्रमम् ॥ १५ ॥

‘ महातेजस्वी युधिष्ठिर! दैवका मारा हुआ राजा कार्य करनेके समय जिस कार्यको नहीं सिद्ध कर पाता, उसमें उसका कोई दोष या अपराध नहीं बताया जाता है ॥

तरसा बुद्धिपूर्वं वा निग्राह्या एव शत्रवः ।

पापैः सह न संदध्याद् राज्यं पण्यं न कारयेत् ॥ १६ ॥

‘ शत्रुओंको अपने बल और बुद्धिसे काबू में कर ही लेना चाहिये । पापियोंके साथ कभी

मेल नहीं करना चाहिये । अपने राज्यको बाजारका सौदा नहीं बनाना चाहिये ॥

शूराश्चार्याश्च सत्कार्या विद्वांसश्च युधिष्ठिर ।

गोमिनो धनिनश्चैव परिपाल्या विशेषतः ॥ १७ ॥

' युधिष्ठिर! शूरवीरों, श्रेष्ठ पुरुषों तथा विद्वानोंका सत्कार करना बहुत आवश्यक है । अधिक- से - अधिक गौएँ रखनेवाले धनी वैश्योंकी विशेषरूपसे रक्षा करनी चाहिये ॥ १७ ॥

व्यवहारेषु धर्मेषु योक्तव्याश्च बहुश्रुताः ।

(प्रमाणज्ञा महीपाल न्यायशास्त्रावलम्बिनः ।

वेदार्थतत्त्वविद् राजंस्तर्कशास्त्रबहुश्रुताः ॥

मन्त्रे च व्यवहारे च नियोक्तव्या विजानता ।

पृष्ठ 157

महाभारत — खण्ड ५, पृष्ठ 157 का मूल पृष्ठ
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' जो बहुज्ञ विद्वान् हों, उन्हींको धर्म तथा शासन- कार्योंमें लगाना चाहिये । भूपाल! जो प्रमाणोंके ज्ञाता, न्यायशास्त्रका अवलम्बन करनेवाले, वेदोंके तत्त्वज्ञ तथा तर्कशास्त्रके बहुश्रुत विद्वान् हों, उन्हींको विज्ञ पुरुष मन्त्रणा तथा शासन - कार्यमें लगाये ॥ तर्कशास्त्रकृता बुद्धिर्धर्मशास्त्रकृता च या ॥ दण्डनीतिकृता चैव त्रैलोक्यमपि साधयेत् । ‘ तर्कशास्त्र, धर्मशास्त्र तथा दण्डनीतिसे प्रभावित हुई बुद्धि तीनों लोकोंकी भी सिद्धि कर सकती है ॥ नियोज्या वेदतत्त्वज्ञा यज्ञकर्मसु पार्थिव ॥ वेदज्ञा ये च शास्त्रज्ञास्ते च राजन् सुबुद्धयः । ‘ राजन्! भूपाल! जो वेदोंके तत्त्वज्ञ, वेदज्ञ, शास्त्रज्ञ तथा उत्तम बुद्धिसे सम्पन्न हों, उन्हें यज्ञकर्मोंमें नियुक्त करना चाहिये ॥ आन्वीक्षिकीत्रयीवार्तादण्डनीतिषु पारगाः । ते तु सर्वत्र योक्तव्यास्ते च बुद्धेः परं गताः ॥ ) गुणयुक्तेऽपि नैकस्मिन् विश्वसेत विचक्षणः ॥ १८ ॥

‘ आन्वीक्षिकी ( वेदान्त ), वेदत्रयी, वार्ता तथा दण्डनीतिके जो पारंगत विद्वान् हों, उन्हें सभी कार्योंमें नियुक्त करना चाहिये; क्योंकि वे बुद्धिकी पराकाष्ठाको पहुँचे हुए होते हैं । एक व्यक्ति कितना ही गुणवान् क्यों न हो, विद्वान् पुरुषको उसपर विश्वास नहीं करना चाहिये ॥ १८ ॥

अरक्षिता दुर्विनीतो मानी स्तब्धोऽभ्यसूयकः ।

एनसा युज्यते राजा दुर्दान्त इति चोच्यते ॥ १ ९ ॥

‘ जो राजा प्रजाकी रक्षा नहीं करता, जो उद्दण्ड, मानी, अकड़ रखनेवाला और दूसरोंके दोष देखनेवाला है, वह पापसे संयुक्त होता है और लोग उसे दुर्दान्त कहते हैं ॥ १ ९ ॥

येऽरक्ष्यमाणा हीयन्ते दैवेनाभ्याहता नृप ।

तस्करैश्चापि हीयन्ते सर्वं तद् राजकिल्बिषम् ॥ २० ॥

‘नरेश्वर! जो लोग राजाकी ओरसे सुरक्षित न होनेके कारण अनावृष्टि आदि दैवी आपत्तियोंसे तथा चोरोंके उपद्रवसे नष्ट हो जाते हैं, उनके इस विनाशका सारा पाप राजाको ही लगता है ॥ २० ॥

सुमन्त्रिते सुनीते च सर्वतश्चोपपादिते ।

पौरुषे कर्मणि कृते नास्त्यधर्मो युधिष्ठिर ॥ २१ ॥

‘ युधिष्ठिर! अच्छी तरह मन्त्रणा की गयी हो, सुन्दर नीतिसे काम लिया गया हो और सब ओरसे पुरुषार्थपूर्वक प्रयत्न किये गये हों ( उस अवस्थामें यदि प्रजाको कोई कष्ट हो जाय ) तो राजाको उसका पाप नहीं लगता ॥ २१ ॥

विच्छिद्यन्ते समारब्धा सिद्ध्यन्ते चापि दैवतः ।

पृष्ठ 158

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कृते पुरुषकारे तु नैनः स्पृशति पार्थिवम् ॥ २२ ॥

‘ आरम्भ किये हुए कार्य दैवकी प्रतिकूलतासे नष्ट हो जाते हैं और उसके अनुकूल होनेपर सिद्ध भी हो जाते हैं; परंतु अपनी ओरसे ( यथोचित ) पुरुषार्थ कर देनेपर ( यदि कार्यकी सिद्धि नहीं भी हुई तो ) राजाको पापका स्पर्श नहीं प्राप्त होता है ॥ २२ ॥

अत्र ते राजशार्दूल वर्तयिष्ये कथामिमाम् ।

यद् वृत्तं पूर्वराजर्षेर्हयग्रीवस्य पाण्डव ॥ २३ ॥

' राजसिंह पाण्डुकुमार! इस विषयमें मैं तुम्हें एक कथा सुना रहा हूँ, जो पूर्वकालवर्ती राजर्षि हयग्रीवके जीवनका वृत्तान्त है ॥ २३ ॥

शत्रून् हत्वा हतस्याजौ शूरस्याक्लिष्टकर्मणः ।

असहायस्य संग्रामे निर्जितस्य युधिष्ठिर ॥ २४ ॥

' हयग्रीव बड़े शुरवीर और अनायास ही महान् कर्म करनेवाले थे । युधिष्ठिर! उन्होंने युद्धमें शत्रुओंको मार गिराया था; परंतु पीछे असहाय हो जानेपर वे संग्राममें परास्त हुए और शत्रुओंके हाथसे मारे गये ॥ २४ ॥

यत् कर्म वै निग्रहे शात्रवाणां योगश्चाग्र्यः पालने मानवानाम् । कृत्वा कर्म प्राप्य कीर्तिं स युद्धाद् वाजिग्रीवो मोदते स्वर्गलोके ॥ २५ ॥

‘ उन्होंने शत्रुओंको परास्त करनेमें जो पराक्रम दिखाया था, मानवीय प्रजाके पालनमें जिस श्रेष्ठ उद्योग एवं एकाग्रताका परिचय दिया था, वह अद्भुत था । उन्होंने पुरुषार्थ करके युद्धसे उत्तम कीर्ति पायी और इस समय वे राजा हयग्रीव स्वर्गलोकमें आनन्द भोग रहे हैं ॥ २५ ॥

संयुक्तात्मा समरेष्वाततायी शस्त्रैश्छिन्नो दस्युभिर्वध्यमानः । अश्वग्रीवः कर्मशीलो महात्मा संसिद्धार्थो मोदते स्वर्गलोके ॥ २६ ॥

‘ वे अपने मनको वशमें करके समरांगणमें हथियार लेकर शत्रुओंका वध कर रहे थे; परंतु डाकुओंने उन्हें अस्त्र- शस्त्रोंसे छिन्न- भिन्न करके मार डाला । इस समय कर्मपरायण महामनस्वी हयग्रीव पूर्णमनोरथ होकर स्वर्गलोकमें आनन्द कर रहे हैं ॥ २६ ॥

धनुर्यूपो रशना ज्या शरः स्रुक्

स्रुवः खड्गो रुधिरं यत्र चाज्यम् ।

रथो वेदी कामगो युद्धमग्नि- श्चातुर्होत्रं चतुरो वाजिमुख्याः ॥ २७ ॥

हुत्वा तस्मिन् यज्ञवह्नावथारीन्

पृष्ठ 159

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पापान्मुक्तो राजसिंहस्तरस्वी । प्राणान् हुत्वा चावभृथे रणे स वाजिग्रीवो मोदते देवलोके ॥ २८ ॥

'उनका धनुष ही यूप था, करधनी प्रत्यञ्चाके समान थी, बाण स्रुक् और तलवार सुवाका काम दे रही थी, रक्त ही घृतके तुल्य था, इच्छानुसार विचरनेवाला रथ ही वेदी था, युद्ध अग्नि था और चारों प्रधान घोड़े ही ब्रह्मा आदि चारों ऋत्विज् थे । इस प्रकार वे वेगशाली राजसिंह हयग्रीव उस यज्ञरूपी अग्निमें शत्रुओंकी आहुति देकर पापसे मुक्त हो गये तथा अपने प्राणोंको होमकर युद्धकी समाप्तिरूपी अवभृथ स्नान करके वे इस समय देवलोकमें आनन्दित हो रहे हैं ॥ २७-२८ ॥ राष्ट्रं रक्षन् बुद्धिपूर्वं नयेन संत्यक्तात्मा यज्ञशीलो महात्मा । सर्वाल्लोँकान् व्याप्य कीर्त्या मनस्वी वाजिग्रीवो मोदते देवलोके ॥ २ ९ ॥ ‘ यज्ञ करना उन महामना नरेशका स्वभाव बन गया था । वे नीतिके द्वारा बुद्धिपूर्वक राष्ट्रकी रक्षा करते हुए शरीरका परित्याग करके मनस्वी हयग्रीव सम्पूर्ण जगत्में अपनी कीर्ति फैलाकर इस समय देवलोकमें आनन्दित हो रहे हैं ॥ २ ९ ॥ दैवीं सिद्धिं मानुषीं दण्डनीतिं योगन्यासैः पालयित्वा महीं च । तस्माद् राजा धर्मशीलो महात्मा वाजिग्रीवो मोदते देवलोके ॥ ३० ॥

‘ योग ( कर्मविषयक उत्साह ) और न्यास ( अहंकार आदिके त्याग) सहित दैवी सिद्धि, मानुषी सिद्धि, दण्डनीति तथा पृथ्वीका पालन करके धर्मशील महात्मा राजा हयग्रीव उसीके पुण्यसे इस समय देवलोकमें सुख भोगते हैं ॥ ३० ॥

विद्वांस्त्यागी श्रद्दधानः कृतज्ञ- स्त्यक्त्वा लोकं मानुषं कर्म कृत्वा । मेधाविनां विदुषां सम्मतानां तनुत्यजां लोकमाक्रम्य राजा ॥ ३१ ॥

' वे विद्वान्, त्यागी, श्रद्धालु और कृतज्ञ राजा हयग्रीव अपने कर्तव्यका पालन करके मनुष्यलोकको त्यागकर मेधावी, सर्वसम्मानित, ज्ञानी एवं पुण्य तीर्थोंमें शरीरका त्याग करनेवाले पुण्यात्माओंके लोकमें जाकर स्थित हुए हैं ॥ ३१ ॥

सम्यग् वेदान् प्राप्य शास्त्राण्यधीत्य सम्यग् राज्यं पालयित्वा महात्मा । चातुर्वर्ण्यं स्थापयित्वा स्वधर्मे

पृष्ठ 160

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वाजिग्रीवो मोदते देवलोके ॥ ३२ ॥

‘ वेदोंका ज्ञान पाकर, शास्त्रोंका अध्ययन करके, राज्यका अच्छी तरह पालन करते हुए महामना राजा हयग्रीव चारों वर्णोंके लोगोंको अपने - अपने धर्ममें स्थापित करके इस समय देवलोकमें आनन्द भोग रहे हैं ॥ ३२ ॥

जित्वा संग्रामान् पालयित्वा प्रजाश्च सोमं पीत्वा तर्पयित्वा द्विजाग्र्यान् । युक्त्या दण्डं धारयित्वा प्रजानां युद्धे क्षीणो मोदते देवलोके ॥ ३३ ॥

‘ राजा हयग्रीव अनेकों युद्ध जीतकर प्रजाका पालन करके, यज्ञोंमें सोमरस पीकर, श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको दक्षिणा आदिसे तृप्त करके युक्तिसे प्रजाजनोंकी रक्षाके लिये दण्ड धारण करते हुए युद्धमें मारे गये और अब देवलोकमें सुख भोगते हैं ॥ ३३ ॥

वृत्तं यस्य श्लाघनीयं मनुष्याः सन्तो विद्वांसोऽर्हयन्त्यर्हणीयम् । स्वर्गं जित्वा वीरलोकानवाप्य सिद्धिं प्राप्तः पुण्यकीर्तिर्महात्मा ॥ ३४ ॥

‘ साधु एवं विद्वान् पुरुष उनके स्पृहणीय एवं आदरणीय चरित्रकी सदा भूरि- भूरि प्रशंसा करते हैं । पुण्यकीर्ति महामना हयग्रीवने स्वर्गलोक जीतकर वीरोंको मिलनेवाले लोकोंमें पहुँचकर उत्तम सिद्धि प्राप्त कर ली ' ॥ ३४ ॥

इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि राजधर्मानुशासनपर्वणि व्यासवाक्ये चतुर्विंशोऽध्यायः ॥ २४ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत राजधर्मानुशासनपर्वमें व्यासवाक्यविषयक चौबीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २४ ॥

( दाक्षिणात्य अधिक पाठके ९ श्लोक मिलाकर कुल ४३ श्लोक हैं। )