श्रीगणेशाय नमः।

महाभारत — खण्ड ५ — पृष्ठ 1421–1430

महाभारत — खण्ड ५ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1421–1430

पृष्ठ 1421

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महाप्राज्ञ जनक अध्यात्मतत्त्वके ज्ञाता होनेके कारण निष्कामभावसे यज्ञ, दान, होम और पृथ्वीका पालन करते हुए भी उस अध्यात्मज्ञानमें ही तन्मय रहते थे ॥

स तस्य हृदि संकल्पं ज्ञातुमैच्छत् स्वयं प्रभुः ।

सर्वलोकाधिपस्तत्र द्विजरूपेण संयुतः ॥

मिथिलायां महाबुद्धिर्व्यलीकं किंचिदाचरन् ।

स गृहीत्वा द्विजश्रेष्ठैर्नृपाय प्रतिवेदितः ॥

अपराधं समुद्दिश्य तं राजा प्रत्यभाषत ॥

एक समय सम्पूर्ण लोकोंके अधिपति साक्षात् भगवान् नारायणने राजा जनकके मनोभावकी परीक्षा लेनेका विचार किया; अतः वे ब्राह्मणरूपसे वहाँ आये । उन परम बुद्धिमान् श्रीहरिने मिथिलानगरी में कुछ प्रतिकूल आचरण किया। तब वहाँके श्रेष्ठ द्विजोंने उन्हें पकड़कर राजाको सौंप दिया । ब्राह्मणके अपराधको लक्ष्य करके राजाने उनसे इस प्रकार कहा ॥ जनक उवाच

न त्वां ब्राह्मण दण्डेन नियोक्ष्यामि कथंचन ।

मम राज्याद् विनिर्गच्छ यावत् सीमा भुवो मम ॥

जनकने कहा —ब्राह्मण! मैं तुम्हें किसी प्रकार दण्ड नहीं दूँगा, तुम मेरे राज्यसे, जहाँतक मेरी राज्यभूमिकी सीमा है, उससे बाहर निकल जाओ ॥

इत्युक्तः स तथा तेन मैथिलेन द्विजोत्तमः ।

अब्रवीत् तं महात्मानं राजानं मन्त्रिभिर्वृतम् ॥

मिथिलानरेशके ऐसा कहनेपर उन श्रेष्ठ ब्राह्मणने मन्त्रियोंसे घिरे हुए उन महात्मा राजा जनकसे इस प्रकार कहा— ॥

त्वमेवं पद्मनाभस्य नित्यं पक्षपदाहितः ।

अहो सिद्धार्थरूपोऽसि गमिष्ये स्वस्ति तेऽस्तु वै ॥

‘ महाराज! आप सदा पद्मनाभ भगवान् नारायणके चरणोंमें अनुराग रखनेवाले और उन्हींके शरणागत हैं । अहो! आप कृतार्थरूप हैं, आपका कल्याण हो! अब मैं चला जाऊँगा ' ॥

इत्युक्त्वा प्रययौ विप्रस्तज्जिज्ञासुर्द्विजोत्तमः ।

अदहच्चाग्निना तस्य मिथिलां भगवान् स्वयम् ॥

ऐसा कहकर वे ब्राह्मण वहाँसे चल दिये । जाते - जाते राजाकी परीक्षा लेनेके लिये उन श्रेष्ठ ब्राह्मणरूपधारी भगवान् श्रीहरिने स्वयं ही मिथिलानगरीमें आग लगा दी ॥

प्रदीप्यमानां मिथिलां दृष्ट्वा राजा न कम्पितः ।

जनैः स परिपृष्टस्तु वाक्यमेतदुवाच ह ॥

पृष्ठ 1422

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मिथिलाको जलती हुई देखकर राजा तनिक भी विचलित नहीं हुए। लोगोंके पूछनेपर उन्होंने उनसे यह बात कही - ॥

अनन्तं बत मे वित्तं भाव्यं मे नास्ति किंचन ।

मिथिलायां प्रदीप्तायां न मे किंचन दह्यते ॥

‘ मेरे पास आत्मज्ञानरूप अनन्त धन है; अतः अब मेरे लिये कुछ भी प्राप्त करना शेष नहीं है, इस मिथिला - नगरीके जल जानेपर भी मेरा कुछ नहीं जलता है ' ॥

तदस्य भाषमाणस्य श्रुत्वा श्रुत्वा हृदि स्थितम् ।

पुनः संजीवयामास मिथिलां तां द्विजोत्तमः ॥

राजा जनकके इस प्रकार कहनेपर उन द्विजश्रेष्ठने भी उनकी बात सुनी और उनके मनोभावको समझा; फिर उन्होंने मिथिलानगरीको पूर्ववत् सजीव एवं दाह - रहित कर दिया ॥

आत्मानं दर्शयामास वरं चास्मै ददौ पुनः ।

धर्मे तिष्ठतु सद्भावो बुद्धिस्तेऽर्थे नराधिप ॥

सत्ये तिष्ठस्व निर्विण्णः स्वस्ति तेऽस्तु व्रजाम्यहम् । साथ ही उन्होंने राजाको अपने साक्षात् स्वरूपका दर्शन कराया और उन्हें वर देते हुए पुनः कहा— ‘ नरेश्वर! तुम्हारा मन सद्भावपूर्वक धर्ममें लगा रहे और बुद्धि तत्त्वज्ञानमें परिनिष्ठित हो । सदा विषयोंसे विरक्त रहकर तुम सत्यके मार्गपर डटे रहो । तुम्हारा कल्याण हो । अब मैं जाता हूँ' ॥ इत्युक्त्वा भगवांश्चैनं तत्रैवान्तरधीयत । एतत् ते कथितं राजन् किं भूयः श्रोतुमिच्छसि ॥ ) उनसे ऐसा कहकर भगवान् श्रीहरि वहीं अन्तर्धान हो गये । राजन्! यह प्रसंग तुम्हें सुना दिया । अब और क्या सुनना चाहते हो? ॥ इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि पञ्चशिखवाक्यं नाम एकोनविंशत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २१ ९ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें पंचशिखकाउपदेशनामक दो सौ उन्नीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २१९ ॥

( दाक्षिणात्य अधिक पाठके १५ श्लोक मिलाकर कुल ६७ श्लोक हैं ) * ' ये दोनों ज्ञान अथवा अज्ञानके विषय नहीं होते, इस कथनका अभिप्राय यों समझना चाहिये - जो श्रवणकालमें शब्दका अनुभव करता है, वह उसके साथ ही श्रोत्र और आकाशका अनुभव नहीं करता है । साथ ही उसे इन दोनोंका अज्ञान भी नहीं रहता; क्योंकि शब्दका श्रवणेन्द्रिय और आकाश दोनोंसे सम्बन्ध है । इन दोनोंके बिना शब्दका अनुभव हो ही नहीं सकता ।

पृष्ठ 1423

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विंशत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः श्वेतकेतु और सुवर्चलाका विवाह, दोनों पति - पत्नीका अध्यात्मविषयक संवाद तथा गार्हस्थ्य - धर्मका पालन करते हुए ही उनका परमात्माको प्राप्त होना एवं दमकी महिमाका वर्णन (युधिष्ठिर उवाच

अस्ति कश्चिद् यदि विभो सदारो नियतो गृहे ।

अतीतसर्वसंसारः सर्वद्वन्द्वविवर्जितः ॥

तं ब्रूहि महाप्राज्ञ दुर्लभः पुरुषो महान् । युधिष्ठिरने कहा — महाप्राज्ञ! प्रभो! यदि कोई ऐसा पुरुष हो, जो गृहस्थ आश्रममें पत्नीसहित संयम- नियमके साथ रहता हो, समस्त सांसारिक बन्धनोंको पार कर चुका हो और सम्पूर्ण द्वन्द्वोंसे दूर रहकर उन्हें धैर्यपूर्वक सहन करता हो तो उसका मुझे परिचय दीजिये, क्योंकि ऐसा महापुरुष दुर्लभ होता है ॥ भीष्म उवाच

शृणु राजन् यथावृत्तं यन्मां त्वं पृष्टवानसि ।

इतिहासमिमं शुद्धं संसारभयभेषजम् ॥

भीष्मजीने कहा- राजन्! तुमने मुझसे जो विषय पूछा है, उसे यथावत्रूपसे सुनो ।

यह विशुद्ध इतिहास जन्म- मरणरूप रोगका भय दूर करनेके लिये उत्तम औषध है ॥

देवलो नाम विप्रर्षिः सर्वशास्त्रार्थकोविदः ।

क्रियावान् धार्मिको नित्यं देवब्राह्मणपूजकः ॥

ब्रह्मर्षि देवलका नाम सर्वत्र प्रसिद्ध है । वे सम्पूर्ण शास्त्रोंके ज्ञानमें निपुण, क्रियानिष्ठ, धार्मिक तथा देवताओं और ब्राह्मणोंकी सदा पूजा करनेवाले थे ॥

सुता सुवर्चला नाम तस्य कल्याणलक्षणा ।

नातिह्रस्वा नातिकृशा नातिदीर्घा यशस्विनी ॥

उनके एक पुत्री थी, जो सुवर्चलाके नामसे पुकारी जाती थी । वह यशस्विनी कन्या सभी शुभ लक्षणोंसे सम्पन्न थी । वह न तो अधिक नाटी थी और न अधिक लंबी, वह विशेष दुबली भी नहीं थी ॥ प्रदानसमयं प्राप्ता पिता तस्य ह्यचिन्तयत् ॥

पृष्ठ 1424

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अस्याः पतिः कुतो वेति ब्राह्मणः श्रोत्रियः परः ।

विद्वान् विप्रो ह्यकुटुम्बः प्रियवादी महातपाः ॥

धीरे - धीरे उसकी विवाहके योग्य अवस्था हो गयी । उसके पिता सोचने लगे, मेरी इस पुत्रीका पति श्रेष्ठ श्रोत्रिय ब्राह्मण होना चाहिये, जो विद्वान् होनेके साथ ही प्रिय वचन बोलनेवाला, महातपस्वी और अविवाहित हो; परंतु ऐसा पुरुष कहाँसे सुलभ हो सकता है? ॥ इत्येवं चिन्तयानं तं रहस्याह सुवर्चला ।

अन्धाय मां महाप्राज्ञ देह्यनन्धाय वै पितः ।

एवं स्मर सदा विद्वन् ममेदं प्रार्थितं मुने ॥

एकान्तमें बैठकर ऐसी ही चिन्तामें पड़े हुए पिताके पास जाकर सुवर्चलाने इस प्रकार कहा — ‘ पिताजी! आप परम बुद्धिमान्, विद्वान् और मुनि हैं । आप मुझे ऐसे पतिके हाथमें सौंपियेगा, जो अन्धा भी हो और आँखवाला भी हो । मेरी इस प्रार्थनाको सदा याद रखियेगा ' ॥ पितोवाच

न शक्यं प्रार्थितं वत्से त्वयाद्य प्रतिभाति मे ।

अन्धतानन्धता चेति विकारो मम जायते ॥

उन्मत्तेवाशुभं वाक्यं भाषसे शुभलोचने । पिता बोले- बेटी! तुम्हारी यह प्रार्थना पूर्ण हो सके, ऐसा तो मुझे नहीं प्रतीत होता है; क्योंकि एक ही व्यक्ति अन्धा भी हो और अन्धा न भी हो, यह कैसे सम्भव है? तुम्हारी यह बात सुनकर मेरे मनमें खेद होता है । शुभलोचने! तुम पगली- सी होकर अशुभ बात मुँहसे निकाल रही हो ॥ सुवर्चलोवाच

नाहमुन्मत्तभूताद्य बुद्धिपूर्वं ब्रवीमि ते ।

विद्यते चेत् पतिस्तादृक् स मां भरति वेदवित् ॥

सुवर्चला बोली- पिताजी! मैं पगली नहीं हूँ । खूब सोच- समझकर आपसे ऐसी बात कह रही हूँ। यदि ऐसा कोई वेदवेत्ता पति प्राप्त हो जाय तो वह मेरा भरण - पोषण कर सकता है ॥

येभ्यस्त्वं मन्यसे दातुं मामिहानय तान् द्विजान् ।

तादृशं तं पतिं तेषु वरयिष्ये यथातथम् ॥

आप जिन ब्राह्मणोंके हाथमें मुझे देना चाहते हैं, उन सबको यहाँ बुलवा लीजिये । मैं उन्हींमेंसे अपनी पसंदके अनुसार योग्य पतिका वरण कर लूँगी ॥ तथेति चोक्त्वा तां कन्यामृषिः शिष्यानुवाच ह ।

पृष्ठ 1425

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ब्राह्मणान् वेदसम्पन्नान् योनिगोत्रविशोधितान् ।

मातृतः पितृतः शुद्धान् शुद्धानाचारतः शुभान् ।

अरोगान् बुद्धिसम्पन्नान् शीलसत्त्वगुणान्वितान् ॥

असंकीर्णाश्च गोत्रेषु वेदव्रतसमन्वितान् ।

ब्राह्मणान् स्नातकान् शीघ्रं मातापितृसमन्वितान् ॥

निवेष्टुकामान् कन्यां मे दृष्ट्वाऽऽनयत शिष्यकाः । तब अपनी पुत्रीसे ‘ तथास्तु' कहकर ऋषिने शिष्योंसे कहा - ' शिष्यगण! जो वेदविद्यासे सम्पन्न, निष्कलंक माता- पितासे उत्पन्न, निर्दोष कुलके बालक, शुद्ध आचार-विचारवाले, शुभ लक्षणोंसे युक्त, नीरोग, बुद्धिमान्, शील और सत्त्वसे सम्पन्न, गोत्रोंमें वर्णसंकरताके दोषसे रहित, वेदोक्त व्रतके पालनमें तत्पर, स्नातक, जीवित माता- पितावाले तथा मेरी कन्यासे विवाहकी इच्छा रखनेवाले श्रेष्ठ ब्राह्मण हों, उन सबको देखकर तुमलोग यहाँ शीघ्र बुला ले आओ ॥ '

तच्छ्रुत्वा त्वरिताः शिष्या ह्याश्रमेषु ततस्ततः ।

ग्रामेषु च ततो गत्वा ब्राह्मणेभ्यो न्यवेदयन् ॥

मुनिकी यह बात सुनकर उनके शिष्योंने तुरंत इधर- उधर आश्रमों तथा गाँवोंमें जाकर ब्राह्मणोंको इसकी सूचना दी ॥

ऋषेः प्रभावं मत्वा ते कन्यायाश्च द्विजोत्तमाः ।

अनेकमुनयो राजन् सम्प्राप्ता देवलाश्रमम् ॥

राजन्! ऋषि और उस कन्याके प्रभावको जानकर अनेक श्रेष्ठ ब्राह्मण महर्षि देवलके आश्रमपर आये ॥

अनुमान्य यथान्यायं मुनीन् मुनिकुमारकान् ।

अभ्यर्च्य विधिवत् तत्र कन्यामाह पिता महान् ॥

कन्याके महान् पिता देवलने वहाँ आये हुए ऋषियों तथा ऋषिकुमारोंका यथायोग्य सम्मान तथा विधिपूर्वक पूजन करके अपनी पुत्रीसे कहा—

एतेऽपि मुनयो वत्से स्वपुत्रैकमता इह ।

वेदवेदाङ्गसम्पन्नाः कुलीनाः शीलसम्मताः ॥

येऽमी तेषु वरं भद्रे त्वमिच्छसि महाव्रतम् ।

तं कुमारं वृणीष्वाद्य तस्मै दास्याम्यहं शुभे ॥

‘ बेटी! ये मुनि जो यहाँ पधारे हैं, वेद- वेदांगोंसे सम्पन्न, कुलीन और शीलवान् हैं । ये मेरे लिये अपने पुत्रके समान प्रिय हैं । भद्रे! इन लोगोंमेंसे तुम जिस महान् व्रतधारी ऋषिकुमारको पति बनाना चाहो, उसे आज चुन लो, शुभे! मैं उसीके साथ तुम्हारा विवाह कर दूँगा ' ॥ तथेति चोक्त्वा कल्याणी तप्तहेमनिभा तदा ।

पृष्ठ 1426

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सर्वलक्षणसम्पन्ना वाक्यमाह यशस्विनी ॥ विप्राणां समितीर्दृष्ट्त्वा प्रणिपत्य तपोधनान् । तब ‘ तथास्तु ' कहकर तपाये हुए सुवर्णके समान कान्तिवाली, समस्त शुभलक्षणोंसे सम्पन्न, यशस्विनी, कल्याणमयी सुवर्चला ब्राह्मणोंके उस समुदायको देखकर सम्पूर्ण तपोधनोंको प्रणाम करके इस प्रकार बोली- ॥ सुवर्चलोवाच यद्यस्ति समितौ विप्रो ह्यन्धोऽनन्धः स मे वरः ॥ सुवर्चलाने कहा – इस ब्राह्मण- सभामें वही मेरा पति हो सकता है, जो अन्धा हो और अन्धा न भी हो ॥

तच्छ्रुत्वा मुनयस्तत्र वीक्षमाणाः परस्परम् ।

नोचुर्विप्रा महाभागाः कन्यां मत्वा ह्यवेदिकाम् ॥

उस कन्याकी यह बात सुनकर सब मुनि एक- दूसरेका मुँह देखने लगे । वे महाभाग ब्राह्मण उस कन्याको अबोध जानकर कुछ बोले नहीं ॥ कुत्सयित्वा मुनिं तत्र मनसा मुनिसत्तमाः ॥

यथागतं ययुः क्रुद्धा नानादेशनिवासिनः ।

कन्या च संस्थिता तत्र पितृवेश्मनि भामिनी ॥

नाना देशोंमें निवास करनेवाले वे श्रेष्ठ मुनि कुपित हो मन- ही-मन देवल ऋषिकी निन्दा करते हुए जैसे आये थे, वैसे ही लौट गये और वह मानिनी कन्या वहाँ पिताके ही घरमें रह गयी ।

ततः कदाचिद् ब्रह्मण्यो विद्वान् न्यायविशारदः ।

ऊहापोहविधानज्ञो ब्रह्मचर्यसमन्वितः ॥

वेदविद् वेदतत्त्वज्ञः क्रियाकल्पविशारदः ।

आत्मतत्त्वविभागज्ञः पितृमान् गुणसागरः ॥

श्वेतकेतुरिति ख्यातः श्रुत्वा वृत्तान्तमादरात् ।

कन्यार्थं देवलं चापि शीघ्रं तत्रागतोऽभवत् ॥

तदनन्तर किसी समय विद्वान्, ब्राह्मणभक्त, न्यायविशारद, ऊहापोह करनेमें कुशल, ब्रह्मचर्यसे सम्पन्न, वेदवेत्ता, वेदतत्त्वज्ञ, कर्मकाण्डविशारद, आत्मतत्त्वको विवेकपूर्वक जाननेवाले, जीवित पितावाले तथा सद्गुणोंके सागर श्वेतकेतु ऋषि सारा वृत्तान्त सुनकर उस कन्याको प्राप्त करनेके लिये शीघ्रतापूर्वक आदरसहित देवल ऋषिके आश्रमपर आये ॥

उद्दालकसुतं दृष्ट्वा श्वेतकेतुं महाव्रतम् ।

यथान्यायं च सम्पूज्य देवलः प्रत्यभाषत ॥

पृष्ठ 1427

महाभारत — खण्ड ५, पृष्ठ 1427 का मूल पृष्ठ
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उद्दालकके पुत्र महान् व्रतधारी श्वेतकेतुको आया देख देवलने उनकी यथायोग्य पूजा करके अपनी पुत्रीसे कहा– ॥

कन्ये एष महाभागे प्राप्तो ऋषिकुमारकः ।

वरयैनं महाप्राज्ञं वेदवेदाङ्गपारगम् ॥

‘ महान् सौभाग्यशालिनी कन्ये! ये ऋषिकुमार श्वेतकेतु पधारे हैं । ये बड़े भारी पण्डित

और वेद- वेदांगोंके पारंगत विद्वान् हैं । तुम इनका वरण कर लो ' ॥

तच्छ्रुत्वा कुपिता कन्या ऋषिपुत्रमुदैक्षत ।

तां कन्यामाह विप्रर्षिः सोऽहं भद्रे समागतः ॥

पिताकी यह बात सुनकर कन्याने कुपित हो ऋषिकुमार श्वेतकेतुकी ओर देखा । तब ब्रह्मर्षि श्वेतकेतुने उस कन्यासे कहा- ' भद्रे! मैं वही हूँ ( जिसे तुम चाहती हो ), तुम्हारे लिये ही यहाँ आया हूँ ॥

अन्धोऽहमत्र तत्त्वं हि तथा मन्ये च सर्वदा ।

विशालनयनं विद्धि तथा मां हीनसंशयम् ॥

वृणीष्व मां वरारोहे भजे च त्वामनिन्दिते । ‘ मैं अन्ध हूँ, यह यथार्थ है । मैं अपने मनमें सदा ऐसा ही मानता भी हूँ। साथ ही मैं संदेहरहित होनेके कारण विशाल नेत्रोंसे युक्त भी हूँ । ऐसा ही तुम मुझे समझो । श्रेष्ठ अंगोंवाली अनिन्द्य सुन्दरी! तुम मुझे अंगीकार करो । मैं तुम्हारी अभीष्ट सिद्धि करूँगा ॥ येनेदं वीक्षते नित्यं वृणोति स्पृशतेऽथ वा ॥

घ्रायते वक्ति सततं येनेदं रसते पुनः ।

येनेदं मन्यते तत्त्वं येन बुध्यति वा पुनः ॥

न चक्षुर्विद्यते ह्येतत् स वै भूतान्ध उच्यते । ‘ जिस परमात्माकी शक्तिसे जीवात्मा सदा यह सब कुछ देखता है, ग्रहण करता है, स्पर्श करता है, सूँघता है, बोलता है, निरन्तर विभिन्न वस्तुओंका स्वाद लेता है, तत्त्वका मनन करता और बुद्धिद्वारा निश्चय करता है, वह परमात्मा ही चक्षु* कहलाता है । जो इस चक्षुसे रहित है, वही प्राणियोंमें अन्धा कहलाता है ( और परमात्मारूपी चक्षुसे युक्त होनेके कारण मैं अनन्ध — नेत्रवाला भी हूँ) ॥ यस्मिन् प्रवर्तते चेदं पश्यन् शृण्वन् स्पृशन्नपि ॥

जिघ्रंश्च रसयंस्तद्वद् वर्तते येन चक्षुषा ।

तन्मे नास्ति ततो ह्यन्धो वृणु भद्रेऽद्य मामतः ॥

‘ जिस परमात्माके भीतर ही यह सम्पूर्ण जगत् व्यवहारमें प्रवृत्त होता है । यह जगत् जिस आँखसे देखता, कानसे सुनता, त्वचासे स्पर्श करता, नासिकासे सूँघता, रसनासे रस लेता एवं जिस लौकिक चक्षुसे यह सारा बर्ताव करता है, उससे मेरा कोई सम्बन्ध नहीं है, इसलिये मैं अन्ध हूँ; अतः भद्रे! तुम मेरा वरण करो ॥

पृष्ठ 1428

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लोकदृष्ट्या करोमीह नित्यनैमित्तिकादिकम् ।

आत्मदृष्ट्या च तत् सर्वं विलिप्यामि च नित्यशः ॥

' मैं लोकसंग्रहकी दृष्टिसे ही यहाँ नित्य नैमित्तिक आदि कर्म करता हूँ तथा नित्य आत्मदृष्टि रखनेके कारण उन सब कर्मोंसे लिप्त नहीं होता हूँ ॥

स्थितोऽहं निर्भरः शान्तः कार्यकारणभावनः ।

अविद्यया तरन् मृत्युं विद्यया तं तथामृतम् ॥

यथाप्राप्तं तु संदृश्य वसामीह विमत्सरः । ‘ कार्य- कारणरूप परमात्माका चिन्तन करता हुआ मैं सदा शान्तभावसे उन्हींपर निर्भर रहता हूँ। कर्मोंके अनुष्ठानसे मृत्युको पार करके ज्ञानके द्वारा अमृतमय परमात्माका साक्षात्कार कर चुका हूँ और प्रारब्धवश जो कुछ प्रिय - अप्रिय पदार्थ प्राप्त होता है, उसको समानभावसे देखता हुआ मैं ईर्ष्या - द्वेषसे रहित होकर यहाँ निवास करता हूँ ॥ क्रीते व्यवसितं भद्रे भर्ताहं ते वृणीष्व माम् ॥ ततः सुवर्चला दृष्ट्वा प्राह तं द्विजसत्तमम् । ' भद्रे! मैं तुम्हारा उचित शुल्क चुकानेका निश्चय कर चुका हूँ और तुम्हारा भरण- पोषण करनेमें समर्थ हूँ; अतः तुम मेरा वरण करो । ' यह सुनकर सुवर्चलाने द्विजश्रेष्ठ श्वेतकेतुकी ओर देखकर कहा ॥ सुवर्चलोवाच

मनसासि वृतो विद्वन् शेषकर्ता पिता मम ।

वृणीष्व पितरं मह्यमेष वेदविधिक्रमः ॥

सुवर्चला बोली- विद्वन्! मैंने अपने हृदयसे आपका वरण कर लिया । शास्त्रमें कथित शेष कार्योंकी पूर्ति करनेवाले मेरे पिताजी हैं । आप उनसे मुझे माँग लीजिये । यही वेदविहित मर्यादा है ॥ भीष्म उवाच

तद् विज्ञाय पिता तस्या देवलो मुनिसत्तमः ।

श्वेतकेतुं च सम्पूज्य तथैवोद्दालकेन तम् ॥

मुनीनामग्रतः कन्यां प्रददौ जलपूर्वकम् । भीष्मजी कहते हैं - राजन्! यह सब वृत्तान्त जानकर सुवर्चलाके पिता मुनिश्रेष्ठ देवलने उद्दालकसहित श्वेतकेतुकी पूजा करके मुनियोंके सामने जलसे संकल्प करके अपनी कन्या श्वेतकेतुको दे दी ॥ उदाहरन्ति वै तत्र श्वेतकेतुं निरीक्ष्य तम् ॥

हृत्पुण्डरीकनिलयः सर्वभूतात्मको हरिः ।

श्वेतकेतुस्वरूपेण स्थितोऽसौ मधुसूदनः ॥

पृष्ठ 1429

महाभारत — खण्ड ५, पृष्ठ 1429 का मूल पृष्ठ
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वहाँ श्वेतकेतुको देखकर ऋषिगण इस प्रकार कहने लगे- मानो यहाँ श्वेतकेतुके रूपमें सबके हृदय कमलमें निवास करनेवाले, सर्वभूतस्वरूप श्रीहरि भगवान् मधुसूदन ही विराजमान हैं ॥ देवलउवाच

प्रीयतां माधवो देवः पत्नी चेयं सुता मम ।

प्रतिपादयामि ते कन्यां सहधर्मचरीं शुभाम् ॥

देवल बोले — वररूपमें विराजमान ये भगवान् लक्ष्मीपति प्रसन्न हों । यह मेरी पुत्री इन्हें पत्नीरूपसे समर्पित है । प्रभो! मैं आपको कल्याणमयी सहधर्मिणीके रूपमें अपनी यह कन्या दे रहा हूँ ॥ भीष्म उवाच

इत्युक्त्वा प्रददौ तस्मै देवलो मुनिपुङ्गवः ।

प्रतिगृह्य च तां कन्यां श्वेतकेतुर्महायशाः ॥

उपयम्य यथान्यायमत्र कृत्वा यथाविधि ।

समाप्य तन्त्रं मुनिभिर्वैवाहिकमनुत्तमम् ॥

स गार्हस्थ्ये वसन् धीमान् भार्यां तामिदमब्रवीत् ॥

भीष्मजी कहते हैं - राजन्! ऐसा कहकर मुनिवर देवलने उन्हें कन्यादान कर दिया । महायशस्वी श्वेतकेतुने उस कन्याको लेकर उसके साथ यथोचितरूपसे विधि - पूर्वक विवाह किया । फिर मुनियोंद्वारा कराये हुए परम उत्तम वैवाहिक विधानको पूर्ण करके गृहस्थ-आश्रममें रहते हुए बुद्धिमान्श्वेतकेतुने अपनी उस धर्मपत्नीसे इस प्रकार कहा ॥ श्वेतकेतुरुवाच

यानि चोक्तानि वेदेषु तत् सर्वं कुरु शोभने ।

मया सह यथान्यायं सहधर्मचरी मम ॥

श्वेतकेतुने कहा -शोभने! वेदोंमें जिन शुभ कर्मोंका विधान है, मेरे साथ रहकर उन सबका यथोचितरूपसे अनुष्ठान करो और यथार्थरूपसे मेरी सहधर्मचारिणी बनो ॥

अहमित्येव भावेन स्थितोऽहं त्वं तथैव च ।

तस्मात् कर्माणि कुर्वीथाः कुर्यां ते च ततः परम् ॥

मैं इसी भावसे स्थित हूँ । तुम भी इसी भावसे स्थित रहना, अतः मेरी आज्ञाके अनुसार सारे कर्म करो, फिर मैं भी तुम्हारा प्रिय कार्य करूँगा ॥

न ममेति च भावेन ज्ञानाग्निनिलयेन च ।

अनन्तरं तथा कुर्यास्तानि कर्माणि भस्मसात् ॥

एवं त्वया च कर्तव्यं सर्वदादुर्भगा मया ।

पृष्ठ 1430

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यद् यदाचरति श्रेष्ठः तत् तदेवेतरो जनः ॥ तस्माल्लोकस्य सिद्धयर्थं कर्तव्यं चात्मसिद्धये ॥ तदनन्तर ‘ ये सब कर्म मेरे नहीं हैं और मैं इनका कर्ता नहीं हूँ' इस भावसे ज्ञानाग्निद्वारा उन सब कर्मोंको भस्म कर डालो, तुम परम सौभाग्यवती हो । तुम्हें सदा इसी तरह ममता और अहंकारसे रहित होकर कर्म करना चाहिये और मुझे भी ऐसा ही करना चाहिये । श्रेष्ठ पुरुष जो-जो आचरण करता है वैसे ही दूसरे लोग भी करते हैं, अतः लोकव्यवहारकी सिद्धि तथा आत्मकल्याणके लिये हम दोनोंको कर्मोंका अनुष्ठान करते रहना चाहिये ॥ भीष्म उवाच

उक्त्वैवं स महाप्राज्ञः सर्वज्ञानैकभाजनः ।

पुत्रानुत्पाद्य तस्यां च यज्ञैः संतर्प्य देवताः ॥

आत्मयोगपरो नित्यं निर्द्वन्द्वो निष्परिग्रहः । भीष्मजी कहते हैं - राजन्! ऐसा उपदेश देकर सम्पूर्ण ज्ञानके एकमात्र निधि महाज्ञानी श्वेतकेतुने सुवर्चलाके गर्भसे अनेक पुत्र उत्पन्न किये । यज्ञोंद्वारा देवताओंको संतुष्ट किया; फिर आत्मयोगमें नित्य तत्पर रहकर वे निर्द्वन्द्व एवं परिग्रहशून्य हो गये ॥

भार्यां तां सदृशीं प्राप्य बुद्धिं क्षेत्रज्ञयोरिव ।

लोकमन्यमनुप्राप्तौ भार्या भर्ता तथैव च ॥

साक्षिभूतौ जगत्यस्मिंश्चरमाणौ मुदान्वितौ । अपने अनुरूप पत्नीको पाकर श्वेतकेतु उसी प्रकार सुशोभित होते थे, जैसे बुद्धिको पाकर क्षेत्रज्ञ । वे दोनों पति- पत्नी लोकान्तरमें भी पहुँच जाते थे और इस जगत्में साक्षीकी भाँति स्थित होकर प्रसन्नतापूर्वक विचरते थे ॥ ततः कदाचिद् भर्तारं श्वेतकेतुं सुवर्चला ।

पप्रच्छ को भवानत्र ब्रूहि मे तद् द्विजोत्तम ।

तामाह भगवान् वाग्मी त्वया ज्ञातो न संशयः ॥

द्विजोत्तमेति मामुक्त्वा पुनः कमनुपृच्छसि । तदनन्तर एक दिन सुवर्चलाने अपने पति श्वेतकेतुसे पूछा- ' द्विजश्रेष्ठ! आप कौन हैं, यह मुझे बताइये! ' उस समय प्रवचन- कुशल भगवान्श्वेतकेतुने उससे कहा — ‘ देवि! तुमने मेरे विषयमें जान ही लिया है, इसमें संदेह नहीं है । तुमने द्विजश्रेष्ठ कहकर मुझे सम्बोधित भी किया है; फिर उस द्विजश्रेष्ठके सिवा और किसको पूछ रही हो? ' ॥ सा तमाह महात्मानं पृच्छामि हृदि शायिनम् ॥ तब सुवर्चलाने अपने महात्मा पतिसे कहा– ' नाथ! मैं हृदय- गुफामें शयन करनेवाले आत्माको पूछती हूँ' ॥ तच्छ्रुत्वा प्रत्युवाचैनां स न वक्ष्यति भामिनि ।