श्रीगणेशाय नमः।
महाभारत — खण्ड ५ — पृष्ठ 1441–1450
महाभारत — खण्ड ५ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1441–1450
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जितेन्द्रिय पुरुष किसीके साथ वैर नहीं करता । उसका सबके साथ अच्छा बर्ताव होता है । वह निन्दा और स्तुतिमें समान भाव रखनेवाला, सदाचारी, शीलवान्, प्रसन्नचित्त, धैर्यवान् तथा दोषोंका दमन करनेमें समर्थ होता है । वह इहलोकमें सम्मान पाता और मृत्युके पश्चात् स्वर्गलोकमें जाता है ॥ १२३ ॥
दुर्गमं सर्वभूतानां प्रापयन् मोदते सुखी ॥ १३ ॥
सर्वभूतहिते युक्तो न स्म यो द्विषते जनम् ।
महाह्रद इवाक्षोभ्यः प्रज्ञातृप्तः प्रसीदति ॥ १४ ॥
दमनशील पुरुष समस्त प्राणियोंको दुर्लभ वस्तुएँ देकर– दूसरोंको सुख पहुँचाकर स्वयं सुखी और प्रमुदित होता है । जो सम्पूर्ण प्राणियोंके हितमें लगा रहता और किसीसे द्वेष नहीं करता है, वह बहुत बड़े जलाशयकी भाँति गम्भीर होता है । उसके मनमें कभी क्षोभ नहीं होता तथा वह सदा ज्ञानानन्दसे तृप्त एवं प्रसन्न रहता है ॥ १३-१४ ॥
अभयं यस्य भूतेभ्यः सर्वेषामभयं यतः ।
नमस्यः सर्वभूतानां दान्तो भवति बुद्धिमान् ॥ १५ ॥
जो समस्त प्राणियोंसे निर्भय है तथा जिससे सम्पूर्ण प्राणी निर्भय हो गये हैं, वह दमनशील एवं बुद्धिमान् पुरुष सब जीवोंके लिये वन्दनीय होता है ॥ १५ ॥
न हृष्यति महत्यर्थे व्यसने च न शोचति ।
स वै परिमितप्रज्ञः स दान्तो द्विज उच्यते ॥ १६ ॥
जो बहुत बड़ी सम्पत्ति पाकर हर्षसे फूल नहीं उठता और संकटमें पड़नेपर शोक नहीं करता, वह द्विज सूक्ष्म बुद्धिसे युक्त एवं जितेन्द्रिय कहलाता है ॥ १६ ॥
कर्मभिः श्रुतिसम्पन्नः सद्भिराचरितैः शुचिः ।
सदैव दमसंयुक्तस्तस्य भुङ्क्ते महाफलम् ॥ १७ ॥
जो वेदशास्त्रोंका ज्ञाता और सत्पुरुषोंद्वारा आचरणमें लाये हुए शुभ कर्मोंसे पवित्र है तथा जिसने सदा ही दमका पालन किया है, वह अपने शुभकर्मका महान् फल भोगता है ॥ १७ ॥
अनसूया क्षमा शान्तिः संतोषः प्रियवादिता ।
सत्यं दानमनायासो नैष मार्गे दुरात्मनाम् ॥ १८ ॥
किसीके दोष न देखना, हृदयमें क्षमाभाव रखना, शान्ति, संतोष, मीठे वचन बोलना, सत्य, दान तथा क्रियामें परिश्रमका बोध न होना- से सद्गुण हैं । दुरात्मा पुरुष इस मार्गसे नहीं चलते हैं ॥ १८ ॥
कामक्रोधौ च लोभश्च परस्येर्ष्याविकत्थना ।
कामक्रोधौ वशे कृत्वा ब्रह्मचारी जितेन्द्रियः ॥ १ ९ ॥
विक्रम्य घोरे तपसि ब्राह्मणः संशितव्रतः ।
कालाकाङ्क्षी चरेल्लोकान् निरपाय इवात्मवान् ॥ २० ॥
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उनमें तो काम, क्रोध, लोभ, दूसरोंके प्रति डाह और अपनी झूठी प्रशंसा आदि दुर्गुण ही भरे रहते हैं; इसलिये उत्तम एवं कठोर व्रतका पालन करनेवाले ब्राह्मणको चाहिये कि वह जितेन्द्रिय होकर काम और क्रोधको वशमें करे तथा ब्रह्मचर्यपालनपूर्वक उत्साहके साथ घोर तपस्यामें संलग्न हो जाय एवं मृत्युकालकी प्रतीक्षा करता हुआ विघ्न - बाधाओंसे रहित हो धैर्यपूर्वक सम्पूर्ण जगत्में विचरे ॥ १ ९ -२० ॥ इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि दमप्रशंसायां विंशत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २२० ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें दमकी प्रशंसाविषयक दो सौ बीसवाँअध्याय पूरा हुआ ॥ २२० ॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठका १०८३ श्लोक मिलाकर कुल १२८३ श्लोक हैं ) OF FURD * ‘चष्टे इति चक्षुः ’ — जो देखता है, वह चक्षु है । इस व्युत्पत्तिके अनुसार सर्वद्रष्टा परमात्मा ही चक्षुः पदका वाच्यार्थ है ।
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एकविंशत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः व्रत, तप, उपवास, ब्रह्मचर्य तथा अतिथिसेवा आदिका विवेचन तथा यज्ञशिष्ट अन्नका भोजन करनेवालेको परम उत्तम गतिकी प्राप्तिका कथन युधिष्ठिर उवाच
द्विजातयो व्रतोपेता यदिदं भुञ्जते हविः ।
अन्नं ब्राह्मणकामाय कथमेतत् पितामह ॥ १ ॥
युधिष्ठिरने पूछा — पितामह! व्रतयुक्त द्विजगण वेदोक्त सकामकर्मोंके फलकी इच्छासे हविष्यान्नका भोजन करते हैं, उनका यह काय उचित है या नहीं? ॥ भीष्म उवाच
अवेदोक्तव्रतोपेता भुञ्जानाः कार्यकारिणः ।
वेदोक्तेषु च भुञ्जाना व्रतलुब्धा युधिष्ठिर ॥ २ ॥
भीष्मजीने कहा— युधिष्ठिर! जो लोग अवैदिक व्रतका आश्रय ले हविष्यान्नका भोजन करते हैं, वे स्वेच्छाचारी हैं और जो वेदोका व्रतोंमें प्रवृत्त हो सकाम यज्ञ करते और उसमें खाते हैं, वे भी उस व्रतके फलोंके प्रति लोलुप कहे जाते हैं ( अतः उन्हें भी बारंबार इस संसारमें आना पड़ता है ) ॥ २ ॥
युधिष्ठिर उवाच
यदिदं तप इत्याहुरुपवासं पृथग्जनाः ।
एतत् तपो महाराज उताहो किं तपो भवेत् ॥ ३ ॥
युधिष्ठिरने पूछा— महाराज! संसारके साधारण लोग जो उपवासको ही तप कहते हैं, क्या वास्तवमें यही तप है या दूसरा । यदि दूसरा है तो उस तपका क्या स्वरूप है? ॥ ३ ॥
भीष्म उवाच
मासपक्षोपवासेन मन्यन्ते यत् तपो जनाः ।
आत्मतन्त्रोपघातस्तु न तपस्तत्सतां मतम् ॥ ४ ॥
भीष्मजीने कहा- राजन्! साधारण जन जो महीने - पंद्रह दिन उपवास करके उसे तप मानते हैं, उनका वह कार्य धर्मके साधनभूत शरीरका शोषण करनेवाला है; अतः श्रेष्ठ पुरुषोंके मतमें वह तप नहीं है ॥ ४ ॥
त्यागश्च संनतिश्चैव शिष्यते तप उत्तमम् ।
सदोपवासी च भवेद् ब्रह्मचारी सदा भवेत् ॥ ५ ॥
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उनके मतमें तो त्याग और विनय ही उत्तम तप है । इनका पालन करनेवाला मनुष्य नित्य उपवासी और सदा ब्रह्मचारी है ॥ ५ ॥
मुनिश्च स्यात् सदा विप्रो दैवतं च सदा भवेत् ।
कुटुम्बिको धर्मकामः सदास्वप्नश्च भारत ॥ ६ ॥
भरतनन्दन! त्यागी और विनयी ब्राह्मण सदा मुनि और सर्वदा देवता समझा जाता है । वह कुटुम्बके साथ रहकर भी निरन्तर धर्मपालनकी इच्छा रखे और निद्रा तथा आलस्यको कभी पास न आने दे ॥ ६ ॥
अमांसादी सदा च स्यात् पवित्रश्च सदा भवेत् ।
अमृताशी सदा च स्याद् देवतातिथिपूजकः ॥ ७ ॥
मांस कभी न खाय, सदा पवित्र रहे, वैश्वदेव आदि यज्ञसे बचे हुए अमृतमय अन्नका भोजन तथा देवता और अतिथियोंकी पूजा करे ॥ ७ ॥
विघसाशी सदा च स्यात् सदा चैवातिथिव्रतः ।
श्रद्दधानः सदा च स्याद् देवताद्विजपूजकः ॥ ८ ॥
उसे सदा यज्ञशिष्ट अन्नका भोक्ता, अतिथिसेवाका व्रती, श्रद्धालु तथा देवता और ब्राह्मणोंका पूजक होना चाहिये ॥ ८ ॥
युधिष्ठिरउवाच
कथं सदोपवासी स्याद् ब्रह्मचारी कथं भवेत् ।
विघसाशी कथं च स्यात् सदा चैवातिथिव्रतः ॥ ९ ॥
युधिष्ठिरने पूछा — पितामह! मनुष्य नित्य उपवास करनेवाला कैसे हो सकता है? वह सतत ब्रह्मचारी कैसे रह सकता है? वह किस प्रकार अन्न ग्रहण करे, जिससे सदा यज्ञशिष्ट अन्नका भोक्ता हो सके तथा वह निरन्तर अतिथिसेवाका व्रत भी कैसे निभा सकता है? ॥ ९ ॥
भीष्म उवाच
अन्तरा प्रातराशं च सायमाशं तथैव च ।
सदोपवासी स भवेद् यो न भुङ्क्तेऽन्तरा पुनः ॥ १० ॥
भीष्मजीने कहा – युधिष्ठिर! जो प्रतिदिन प्रातःकालके सिवा फिर शामको ही भोजन करे और बीचमें कुछ न खाय, वह नित्य उपवास करनेवाला होता है ॥ १० ॥
भार्यां गच्छन् ब्रह्मचारी ऋतौ भवति वै द्विजः ।
ऋतवादी भवेन्नित्यं ज्ञाननित्यश्च यो नरः ॥ ११ ॥
जो द्विज केवल ऋतुस्नानके समय ही पत्नीके साथ समागम करता, सदा सत्य बोलता और नित्य ज्ञानमें स्थित रहता है, वह सदा ब्रह्मचारी ही होता है ॥ ११ ॥
न भक्षयेत् तथा मांसममांसाशी भवत्यपि ।
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दाननित्यः पवित्रश्च अस्वप्नश्च दिवाऽस्वपन् ॥ १२ ॥
तथा जो कभी मांस न खाय, वह अमांसाहारी होता है । जो नित्य दान करनेवाला है, वह पवित्र माना जाता है । जो दिनमें कभी नहीं सोता, वह सदा जागनेवाला समझा जाता ॥ १२ ॥
भृत्यातिथिषु यो भुङ्क्ते भुक्तवत्सु सदा सदा ।
अमृतं केवलं भुङ्क्ते इति विद्धि युधिष्ठिर ॥ १३ ॥
युधिष्ठिर! जो सदा भरण- पोषण करनेके योग्य पिता-माता आदि कुटुम्बीजनों, सेवकों तथा अतिथियोंके भोजन कर लेनेपर ही खाता है, वह केवल अमृत भोजन करता है; ऐसा समझो ॥ १३ ॥
( अदत्त्वा योऽतिथिभ्योऽन्नं न भुङ्क्ते सोऽतिथिप्रियः । अदत्त्वान्नं दैवतेभ्यो यो न भुङ्क्ते स दैवतम् ॥ ) जो अतिथियोंको अन्न दिये बिना स्वयं भी नहीं खाता, वह अतिथिप्रिय है तथा जो देवताओंको अन्न दिये बिना भोजन नहीं करता, वह देवभक्त है ॥
अभुक्तवत्सु नाश्नानः सततं यस्तु वै द्विजः ।
अभोजनेन तेनास्य जितः स्वर्गो भवत्युत ॥ १४ ॥
जो द्विज भृत्यों और अतिथियोंके भोजन न करनेपर स्वयं भी कभी अन्न ग्रहण नहीं करता, वह भोजन न करनेके उस पुण्यसे स्वर्गलोकपर विजय पा लेता है ॥ १४ ॥
देवताभ्यः पितृभ्यश्च भृत्येभ्योऽतिथिभिः सह ।
अवशिष्टं तु योऽश्नाति तमाहुर्विघसाशिनम् ॥ १५ ॥
देवगण, पितृगण, माता- पिता तथा अतिथियों सहित भृत्यवर्गसे अवशिष्ट अन्नको ही जो भोजन करता है, उसे विघसाशी ( यज्ञशिष्ट अन्नका भोक्ता कहते हैं ॥ १५ ॥
तेषां लोका ह्यपर्यन्ताः सदने ब्रह्मणा सह ।
उपस्थिताश्चाप्सरोभिः परियान्ति दिवौकसः ॥ १६ ॥
ऐसे पुरुषोंको अक्षयलोक प्राप्त होते हैं । ब्रह्माजी तथा अप्सराओंसहित समस्त देवता उनके घरपर आकर उनकी परिक्रमा किया करते हैं ॥ १६ ॥
देवताभिश्च ये सार्धं पितृभिश्चोपभुञ्जते ।
रमन्ते पुत्रपौत्रैश्च तेषां गतिरनुत्तमा ॥ १७ ॥
जो देवताओं और पितरोंके साथ ( अर्थात् उन्हें उनका भाग अर्पण करके ) भोजन करते हैं, वे इस लोकमें पुत्र- पौत्रोंके साथ रहकर आनन्द भोगते हैं और परलोकमें भी उन्हें परम उत्तम गति प्राप्त होती है ॥ इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि अमृतप्राशनिको नाम एकविंशत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २२१ ॥
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इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें अमृतभोजन- सम्बन्धीदो सौ इक्कीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २२१ ॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठका १ श्लोक मिलाकर कुल १८ श्लोक: हैं ) Fara
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द्वाविंशत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः सनत्कुमारजीका ऋषियोंको भगवत्स्वरूपका उपदेश देना युधिष्ठिर उवाच
केचिदाहुर्द्विजा लोके त्रिधा राजन्ननेकधा ।
न प्रत्ययो न चान्यच्च दृश्यते ब्रह्म नैव तत् ॥
नानाविधानि शास्त्राणि युक्ताश्चैव पृथग्विधाः ।
किमधिष्ठाय तिष्ठामि तन्मे ब्रूहि पितामह ॥
युधिष्ठिरने पूछा— राजन्! जगत्में कुछ विद्वान् जड और चेतन अथवा प्रकृति और पुरुष दो तत्त्वोंका प्रतिपादन करते हैं । कुछ लोग जीव, ईश्वर और प्रकृति —इन तीन तत्त्वोंका वर्णन करते हैं और कितने ही विद्वान् अनेक तत्त्वोंका निरूपण करते रहते हैं; अतः कहीं न विश्वास किया जा सकता है, न अविश्वास । इसके सिवा वह परब्रह्म परमात्मा दिखायी नहीं देता है । नाना प्रकारके शास्त्र हैं और भिन्न -भिन्न प्रकारसे उनका वर्णन किया गया है; इसलिये पितामह! मैं किस सिद्धान्तका आश्रय लेकर रहूँ, यह मुझे बताइये ॥ भीष्म उवाच
स्वे स्वे युक्ता महात्मानः शास्त्रेषु प्रभविष्णवः ।
वर्तन्ते पण्डिता लोके को विद्वान् कश्च पण्डितः ॥
भीष्मजीने कहा- राजन्! शास्त्रोंके विचारमें प्रभावशाली सभी महात्मा अपने - अपने सिद्धान्तके प्रतिपादनमें स्थित हैं । ऐसे पण्डित इस जगत् में बहुत हैं; परंतु उनमें वास्तवमें कौन तत्त्वको जाननेवाला विद्वान् है और कौन शास्त्रचर्चामें पण्डित है? यह कहना कठिन है ॥
सर्वेषां तत्त्वमज्ञाय यथारुचि तथा भवेत् ।
अस्मिन्नर्थे पुराभूतमितिहासं पुरातनम् ॥
महाविवादसंयुक्तमृषीणां भावितात्मनाम् । सबके तत्त्वको भलीभाँति समझकर जैसी रुचि हो, उसीके अनुसार आचरण करे । इस विषयमें एक प्राचीन इतिहास प्रसिद्ध है । एक समय बहुत से भावितात्मा मुनियोंका इसी विषयको लेकर आपसमें बड़ा भारी वाद - विवाद हुआ था ॥ हिमवत्पार्श्व आसीना ऋषयः संशितव्रताः ॥ षण्णां तानि सहस्राणि ऋषीणां गणमाहितम् । हिमालय पर्वतके पार्श्वभागमें कठोर व्रतका पालन करनेवाले छः हजार ऋषियोंकी एक बैठक हुई थी ॥
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तत्र केचिद् ध्रुवं विश्वं सेश्वरं तु निरीश्वरम् ।
प्राकृतं कारणं नास्ति सर्वं नैवमिदं जगत् ॥
उनमेंसे कुछ लोग इस जगत्को ध्रुव ( सदा रहनेवाला) बताते थे, कुछ इसे ईश्वरसहित कहते थे और कुछ लोग बिना ईश्वरके ही जगत्की उत्पत्तिका प्रतिपादन करते थे । कुछ लोगोंका कहना था कि इसका कोई प्राकृत कारण नहीं है तथा कुछ लोगोंका मत यह था कि वास्तवमें इस सम्पूर्ण जगत्की सत्ता है ही नहीं ॥
अनेन चापरे विप्राः स्वभावं कर्म चापरे ।
पौरुषं कर्म दैवं च यत् स्वभावादिरेव तम् ॥
इसी प्रकार दूसरे ब्राह्मणोंमेंसे कुछ लोग स्वभावको, कितने ही कर्मको, बहुतेरे पुरुषार्थको, दूसरे लोग दैवको और अन्य बहुत-से लोग स्वभाव- कर्म आदि सभीको जगत्का कारण बताते थे ॥
नानाहेतुशतैर्युक्ता नानाशास्त्रप्रवर्तकाः ।
स्वभावाद् ब्राह्मणा राजञ्जिगीषन्तः परस्परम् ॥
वे नाना प्रकारके शास्त्रोंके प्रवर्तक थे तथा अनेक प्रकारकी सैकड़ों युक्तियोंद्वारा अपने मतका पोषण करते थे । राजन्! वे सभी ब्राह्मण स्वभावसे ही इस शास्त्रार्थमें एक दूसरेको पराजित करनेकी इच्छा करते थे ॥
ततस्तु मूलमुद्भूतं वादिप्रत्यर्थिसंयुतम् ।
पात्रदण्डविघातं च वल्कलाजिनवाससाम् ॥
एके मन्युसमापन्नास्ततः शान्ता द्विजोत्तमाः ।
वशिष्ठमब्रुवन् सर्वे त्वं नो ब्रूहि सनातनम् ॥
नाहं जानामि विप्रेन्द्राः प्रत्युवाच स तान् प्रभुः । तदनन्तर उन वादी और प्रतिवादियोंमें मूलभूत प्रश्नको लेकर बड़ा भारी वाद - विवाद खड़ा हो गया । उनमेंसे कितने ही क्रोधमें भरकर एक दूसरेके पात्र, दण्ड, वल्कल, मृगचर्म और वस्त्रोंको भी नष्ट करने लगे । तत्पश्चात् शान्त होनेपर वे सभी श्रेष्ठ ब्राह्मण महर्षि वशिष्ठसे बोले — ' प्रभो! आप ही हमें सनातन तत्त्वका उपदेश करें। ' यह सुनकर वशिष्ठने उत्तर दिया — ' विप्रवरो! मैं उस सनातन तत्त्वके विषयमें कुछ नहीं जानता ' ॥ ते सर्वे सहिता विप्रा नारदमृषिमब्रुवन् ॥ त्वं नो ब्रूहि महाभाग तत्त्वविच्च भवानसि । तब वे सब ब्राह्मण एक साथ नारदमुनिसे बोले - ' महाभाग! आप ही हमें सनातन तत्त्वका उपदेश करें; क्योंकि आप तत्त्ववेत्ता हैं ' ॥ नाहं द्विजा विजानामि क्व हि गच्छाम संगताः ॥
इति तानाह भगवांस्ततः प्राह च स द्विजान् ।
को विद्वानिह लोकेऽस्मिन्नमोहोऽमृतमद्भुतम् ॥
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तब भगवान् नारदने उन ब्राह्मणोंसे कहा — ' विप्रगण! मैं उस तत्त्वको नहीं जानता । हम सब लोग मिलकर कहीं और चलें । इस जगत् में कौन ऐसा विद्वान् है, जिसमें मोह न हो तथा जो उस अद्भुत अमृततत्त्वके प्रतिपादनमें समर्थ हो ' ॥
तच्च ते शुश्रुवुर्वाक्यं ब्राह्मणा ह्यशरीरिणः ।
सनद्धाम द्विजा गत्वा पृच्छध्वं स च वक्ष्यति ॥
यह बातचीत हो ही रही थी कि उन ब्राह्मणोंने किसी अदृश्य देवताकी बात सुनी ——ब्राह्मणो! सनत्कुमारके आश्रमपर जाकर पूछो । वे तुम्हें तत्त्वज्ञानका उपदेश करेंगे ' ॥ तमाह कश्चिद् द्विजवर्यसत्तमो विभाण्डको मण्डितवेदराशिः । कस्त्वं भवानर्थविभेदमध्ये न दृश्यसे वाक्यमुदीरयंश्च ॥ उस समय वेदराशिके ज्ञानसे सुशोभित विभाण्डक नामक किन्हीं ब्राह्मणशिरोमणिने उस अदृश्य देवतासे पूछा— ' हम लोगोंमें तत्त्वके विषयमें मतभेद उत्पन्न हो गया है; ऐसी स्थितिमें आप कौन हैं, जो बात तो कर रहे हैं, किंतु दीखते नहीं हैं ' ॥ अथाहेदं तं भगवान् सनन्तं महामुने विद्धि मां पण्डितोऽसि । ऋषिं पुराणं सततैकरूपं यमक्षयं वेदविदो वदन्ति । ( भीष्मजी कहते हैं - राजन्! ) तब भगवान् सनत्कुमारने उनसे कहा - ' महामुने! तुम तो पण्डित हो । तुम मुझे सदा एकरूपसे ही विचरण करनेवाला पुरातन ऋषि सनत्कुमार समझो । मैं वही हूँ, जिसे वेदवेत्ता पुरुष अक्षय बताते हैं ' ॥ पुनस्तमाहेदमसौ महात्मा स्वरूपसंस्थं वद आह पार्थ । त्वमेकोऽस्मदृषिपुङ्गवाद्य न सत्स्वरूपमथवा पुनः किम् ॥ कुन्तीनन्दन! तब उन महात्मा विभाण्डकने पुनः उनसे कहा- ' आदिमुनिप्रवर! आप अपने स्वरूपका परिचय दीजिये । केवल आप ही हमसे विलक्षण जान पड़ते हैं, आपका स्वरूप हमारे सामने प्रत्यक्ष नहीं है । अथवा यदि आपका भी कोई स्वरूप है तो वह कैसा है? ' ॥ अथाह गम्भीरतरानुपादं वाक्यं महात्मा ह्यशरीर आदिः । न ते मुने श्रोत्रमुखेऽपि चास्यं न पादहस्तौ प्रपदात्मकेन ॥
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तब उस अदृश्य आदि-महात्माने गम्भीर स्वरमें यह बात कही-' मुने! तुम्हारे न तो कान है, न मुख है, न हाथ है, न पैर है और न पैरोंके पंजे ही हैं ' ॥ ब्रुवन् मुनीन् सत्यमथो निरीक्ष्य स्वमाह विद्वान् मनसा निगम्य । ऋषे कथं वाक्यमिदं ब्रवीषि न चास्य मन्ता न च विद्यते चेत् ॥
न शुश्रुवुस्ततस्तत् तु प्रतिवाक्यं द्विजोत्तमाः ।
निरीक्ष्यमाणा आकाशं प्रहसन्तस्ततस्ततः ॥
मुनियोंसे बातचीत करते हुए विद्वान् विभाण्डकने अपने विषयमें जब यह सब सत्य देखा तो मन- ही- मन विचार करके कहा-'ऋषे! आप ऐसी बात क्यों कहते हैं? यदि इसको जाननेवाला या न जाननेवाला कोई न रहे, तब क्या होगा? ' परंतु इसका उत्तर उन श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको फिर नहीं सुनायी दिया । वे हँसते हुए आकाशकी ओर देखते ही रह गये ॥
आश्चर्यमिति मत्वा ते ययुर्हेमं महागिरिम् ।
सनत्कुमारसंकाशं सगणा मुनिसत्तमाः ॥
'यह तो बड़े आश्चर्यकी बात है' ऐसा मानकर वे सभी मुनिश्रेष्ठ दल- बलसहित सुवर्णमय महागिरि मेरुपर सनत्कुमारजीके पास गये ॥
तं पर्वतं समारुह्य ददृशुर्ध्यानमाश्रिताः ।
कुमारं देवमर्हन्तं वेदपाराविवर्जितम् ॥
उस पर्वतपर आरूढ़ हो ध्यानका आश्रय ले उन ऋषियोंने पूजनीय देव सनत्कुमारको देखा, जो निरन्तर वेदके पारायणमें लगे हुए थे ॥
ततः संवत्सरे पूर्णे प्रकृतिस्थं महामुनिम् ।
सनत्कुमारं राजेन्द्र प्रणिपत्य द्विजाः स्थिताः ॥
आगतान् भगवानाह ज्ञाननिर्धूतकल्मषः ।
ज्ञातं मया मुनिगणा वाक्यं तदशरीरिणः ॥
कार्यमद्य यथाकामं पृच्छध्वं मुनिपुङ्गवाः । राजेन्द्र! एक वर्ष पूर्ण होनेपर जब महामुनि सनत्कुमार प्रकृतिस्थ हुए, तब वे ब्राह्मण उन्हें प्रणाम करके खड़े हो गये । ज्ञानसे जिनके सारे पाप धुल गये थे, उन भगवान् सनत्कुमारने वहाँ पधारे हुए ऋषियोंसे कहा - ' मुनिगण! अदृश्य देवताने जो बात कही है, वह मुझे ज्ञात है; अतः आज आपलोगोंके प्रश्नोंका उत्तर देना है । मुनिवरो! आप इच्छानुसार प्रश्न करें || तमब्रुवन् प्राञ्जलयो महामुनिं द्विजोत्तमं ज्ञाननिधिं सुनिर्मलम् । कथं वयं ज्ञाननिधिं वरेण्यं