श्रीगणेशाय नमः।

महाभारत — खण्ड ५ — पृष्ठ 1561–1570

महाभारत — खण्ड ५ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1561–1570

पृष्ठ 1561

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जलरूपमिवाकाशे तथैवात्मनि पश्यति ।

अपां व्यतिक्रमे चास्य वह्निरूपं प्रकाशते ॥ १ ९ ॥

वह सम्पूर्ण आकाशमें जल-ही-जल-सा देखता है तथा आत्माको भी जलरूप अनुभव करता है ( यह अनुभव जलतत्त्वकी धारणा करते समय होता है ) । फिर जलका लय हो जानेपर अग्नितत्त्वकी धारणा करते समय उसे सर्वत्र अग्नि प्रकाशित दिखायी देती है ॥ १ ९ ॥

तस्मिन्नुपरतेऽजोऽस्य पीतशस्त्रः प्रकाशते ।

ऊर्णारूपसवर्णस्य तस्य रूपं प्रकाशते ॥ २० ॥

उसके भी लय हो जानेपर योगीको आकाशमें सर्वत्र फैले हुए वायुका ही अनुभव होता है । उस समय वृक्ष और पर्वत आदि अपने समस्त शस्त्रोंको पी जानेके कारण वायुकी ' पीतशस्त्र' संज्ञा हो जाती है अर्थात् पृथ्वी, जल और तेजरूप समस्त पदार्थोंको निगलकर वायु केवल आकाशमें ही आन्दोलित होता रहता है और साधक स्वयं भी ऊनके धागेके समान अत्यन्त छोटा और हलका होकर अपनेको निराधार आकाशमें वायुके साथ ही स्थित मानता है ॥ २० ॥

अथश्वेतां गतिं गत्वा वायव्यं सूक्ष्ममप्युत ।

अशुक्लं चेतसः सौक्ष्म्यमप्युक्तं ब्राह्मणस्य वै ॥ २१ ॥

तदनन्तर तेजका संहार और वायु तत्त्वपर विजय प्राप्त होनेके पश्चात् वायुका सूक्ष्म रूप स्वच्छ आकाशमें लीन हो जाता है और केवल नीलाकाशमात्र शेष रह जाता है । उस अवस्थामें ब्रह्मभावको प्राप्त होनेकी इच्छा रखनेवाले योगीका चित्त अत्यन्त सूक्ष्म हो जाता है, ऐसा बताया गया है । ( उसे अपने स्थूल रूपका तनिक भी भान नहीं रहता । यही वायुका लय और आकाशतत्त्वपर विजय कहलाता है ) ॥ २१ ॥

एतेष्वपि हि जातेषु फलजातानि मे शृणु ।

जातस्य पार्थिवैश्वर्यैः सृष्टिरत्र विधीयते ॥ २२ ॥

इन सब लक्षणोंके प्रकट हो जानेपर योगीको जो- जो फल प्राप्त होते हैं, उन्हें मुझसे सुनो । पार्थिव ऐश्वर्यकी सिद्धि हो जानेपर योगीमें सृष्टि करनेकी शक्ति आ जाती है ॥ २२ ॥

प्रजापतिरिवाक्षोभ्यः शरीरात् सृजते प्रजाः ।

अङ्गुल्यङ्गुष्ठमात्रेण हस्तपादेन वा तथा ॥ २३ ॥

पृथिवीं कम्पयत्येको गुणो वायोरिति श्रुतिः ।

पृष्ठ 1562

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वह प्रजापतिके समान क्षोभरहित होकर अपने शरीरसे प्रजाकी सृष्टि कर सकता है । जिसको वायुतत्त्व सिद्ध हो जाता है, वह बिना किसीकी सहायताके हाथ - पैर, अँगूठे अथवा अंगुलिमात्रसे दबाकर पृथ्वीको कम्पित कर सकता है— ऐसा सुननेमें आया है ॥ २३३ ॥

आकाशभूतश्चाकाशे सवर्णत्वात् प्रकाशते ॥ २४ ॥

वर्णतो गुह्यते चापि कामात् पिबति चाशयान् । आकाशको सिद्ध करनेवाला पुरुष आकाशमें आकाशके ही समान सर्वव्यापी हो जाता है । वह अपने शरीरको अन्तर्धान करनेकी शक्ति प्राप्त कर लेता है । जिसका जलतत्त्वपर अधिकार होता है, वह इच्छा करते ही बड़े - बड़े जलाशयोंको पी जाता है ॥ २४३ ॥

न चास्य तेजसा रूपं दृश्यते शाम्यते तथा ।

अहङ्कारेऽस्य विजिते पञ्चैते स्युर्वशानुगाः ॥ २५ ॥

अग्नितत्त्वको सिद्ध कर लेनेपर वह अपने शरीरको इतना तेजस्वी बना लेता है कि कोई उसकी ओर आँख उठाकर देख भी नहीं सकता और न उसके तेजको बुझा ही सकता है । अहंकारको जीत लेनेपर पाँचों भूत योगीके वशमें हो जाते हैं ॥ २५ ॥

षण्णामात्मनि बुद्धौ च जितायां प्रभवत्यथ ।

निर्दोषप्रतिभा ह्येनं कृत्स्ना समभिवर्तते ॥ २६ ॥

पञ्चभूत और अहंकार- इन छः तत्त्वोंका आत्मा है बुद्धि । उसको जीत लेनेपर सम्पूर्ण ऐश्वर्योंकी प्राप्ति हो जाती है तथा उस योगीको निर्दोष प्रतिभा ( विशुद्ध तत्त्वज्ञान) पूर्ण रूपसे प्राप्त हो जाती है ॥ २६ ॥

तथैव व्यक्तमात्मानमव्यक्तं प्रतिपद्यते ।

यतो निःसरते लोको भवति व्यक्तसंज्ञकः ॥ २७ ॥

उपर्युक्त सप्त पदार्थोंका कार्यभूत व्यक्त जगत् अव्यक्त परमात्मामें ही विलीन हो जाता है, क्योंकि उन्हीं परमात्मासे यह जगत् उत्पन्न होता है और व्यक्त नाम धारण करता है ॥ २७ ॥

तत्राव्यक्तमयीं विद्यां शृणु त्वं विस्तरेण मे ।

तथा व्यक्तमयं चैव सांख्ये पूर्वं निबोध मे ॥ २८ ॥

वत्स! तुम सांख्यदर्शनमें वर्णित अव्यक्तविद्याका विस्तारपूर्वक मुझसे श्रवण करो । सर्वप्रथम सांख्यशास्त्रमें कथित व्यक्तविद्याको मुझसे समझो ॥ २८ ॥

पञ्चविंशति तत्त्वानि तुल्यान्युभयतः समम् ।

योगे सांख्येऽपि च तथा विशेषं तत्र मे शृणु ॥ २ ९ ॥

पृष्ठ 1563

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सांख्य और पातञ्जलयोग— इन दोनों दर्शनोंमें समानभावसे पचीस तत्त्वोंका प्रतिपादन किया गया है* । इस विषयमें जो विशेष बात है, वह मुझसे सुनो ॥ २ ९ ॥

प्रोक्तं तद् व्यक्तमित्येव जायते वर्धते च यत् ।

जीर्यते म्रियते चैव चतुर्भिर्लक्षणैर्युतम् ॥ ३० ॥

जन्म, वृद्धि, जरा और मरण- इन चार लक्षणोंसे युक्त जो तत्त्व है, उसीको व्यक्त कहते हैं ॥ ३० ॥

विपरीतमतो यत् तु तदव्यक्तमुदाहृतम् ।

द्वावात्मानौ च वेदेषु सिद्धान्तेष्वप्युदाहृतौ ॥ ३१ ॥

जो तत्त्व इसके विपरीत हैं अर्थात् जिसमें जन्म आदि चारों विकार नहीं हैं, उसे अव्यक्त कहा गया है । वेदों और सिद्धान्तप्रतिपादक शास्त्रोंमें उस अव्यक्तके दो भेद बताये गये हैं- जीवात्मा और परमात्मा ॥ ३१ ॥

चतुर्लक्षणजं त्वाद्यं चतुर्वर्गं प्रचक्षते ।

व्यक्तमव्यक्तजं चैव तथा बुद्धमथेतरत् ।

सत्त्वं क्षेत्रज्ञ इत्येतद् द्वयमप्यनुदर्शितम् ॥ ३२ ॥

द्वावात्मानौ च वेदेषु विषयेष्वनुरज्यतः ।

विषयात् प्रतिसंहारः सांख्यानां सिद्धि लक्षणम् ॥ ३३ ॥

अव्यक्त होते हुए भी जीवात्मा व्यक्तके सम्पर्कसे जन्म, वृद्धि, जरा और मृत्यु –इन चार लक्षणोंसे युक्त तथा धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष— इन चार पुरुषार्थोंसे सम्बन्धित कहा जाता है । दूसरा अव्यक्त परमात्मा ज्ञानस्वरूप है । व्यक्त ( जडवर्ग ) की उत्पत्ति उसी अव्यक्त ( परमात्मा ) से होती है । व्यक्तको सत्त्व ( जडवर्ग— क्षेत्र) तथा अव्यक्त जीवात्माको क्षेत्रज्ञ कहा जाता है । इस प्रकार इन दोनोंहीका वर्णन किया गया है । वेदोंमें भी पूर्वोक्त दो आत्मा बताये गये हैं । विषयोंमें आसक्त हुआ जीवात्मा जब आसक्तिरहित होकर विषयोंसे निवृत्त हो जाता है, तब वह मुक्त कहलाता है । सांख्यवादियोंके मतमें यही मोक्षका लक्षण है ॥ ३२-३३ ॥

निर्ममश्चानहङ्कारो निर्द्वन्द्वश्छिन्नसंशयः ।

नैव क्रुद्धयति न द्वेष्टि नानृता भाषते गिरः ॥ ३४ ॥

आक्रुष्टस्ताडितश्चैव मैत्रेण ध्याति नाशुभम् ।

वाग्दण्डकर्ममनसां त्रयाणां च निवर्तकः ॥ ३५ ॥

समः सर्वेषु भूतेषु ब्रह्माणमभिवर्तते ।

पृष्ठ 1564

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जिसने ममता और अहंकारका त्याग कर दिया है, जो शीत, उष्ण आदि द्वन्द्वोंको समानभावसे सहता है, जिसके संशय दूर हो गये हैं, जो कभी क्रोध और द्वेष नहीं करता, झूठ नहीं बोलता, किसीकी गाली सुनकर और मार खाकर भी उसका अहित नहीं सोचता, सबपर मित्रभाव ही रखता है, जो मन, वाणी और कर्मसे किसी जीवको कष्ट नहीं पहुँचाता और समस्त प्राणियोंपर समानभाव रखता है, वही योगी ब्रह्मभावको प्राप्त होता है ॥ ३४-३५३ ॥ नैवेच्छति न चानिच्छो यात्रामात्रव्यवस्थितः ॥ ३६ ॥

अलोलुपोऽव्यथो दान्तो न कृती न निराकृतिः ।

नास्येन्द्रियमनेकाग्रं न विक्षिप्तमनोरथः ॥ ३७ ॥

सर्वभूतसदृङ्मैत्रः समलोष्टाश्मकाञ्चनः ।

तुल्यप्रियाप्रियो धीरस्तुल्यनिन्दात्मसंस्तुतिः ॥ ३८ ॥

अस्पृहः सर्वकामेभ्यो ब्रह्मचर्यदृढव्रतः ।

अहिंस्रः सर्वभूतानामीदृक् सांख्यो विमुच्यते ॥ ३ ९ ॥

जो किसी वस्तुकी न तो इच्छा करता है, न अनिच्छा ही करता है, जीवन-निर्वाहमात्रके लिये जो कुछ मिल जाता है, उसीपर संतोष करता है, जो निर्लोभ, व्यथारहित और जितेन्द्रिय है, जिसको न तो कुछ करनेसे प्रयोजन है और न कुछ न करनेसे ही, जिसकी इन्द्रियाँ और मन कभी चंचल नहीं होते, जिसका मनोरथ पूर्ण हो गया है, जो समस्त प्राणियोंपर समान दृष्टि और मैत्रीभाव रखता है, मिट्टीके ढेले, पत्थर और स्वर्णको एक- सा समझता है, जिसकी दृष्टिमें प्रिय और अप्रियका भेद नहीं है, जो धीर है और अपनी निन्दा तथा स्तुतिमें सम रहता है, जो सम्पूर्ण भोगोंमें स्पृहारहित है, जो दृढ़तापूर्वक ब्रह्मचर्य व्रतमें स्थित है तथा जो सब प्राणियोंमें हिंसाभावसे रहित है, ऐसा सांख्ययोगी (ज्ञानी ) संसार- बन्धनसे मुक्त हो जाता है ॥ ३६–३९ ॥

यथा योगाद् विमुच्यन्ते कारणैर्यैर्निबोध तत् ।

योगैश्वर्यमतिक्रान्तो यो निष्क्रामति मुच्यते ॥ ४० ॥

योगी जिस प्रकार और जिन कारणोंसे योगके फल - स्वरूप मोक्ष लाभ करते हैं, अब उन्हें बताता हूँ सुनो । जो परवैराग्यके बलसे योगजनित ऐश्वर्यको लाँघकर उसकी सीमासे बाहर निकल जाता है, वही मुक्त होता है ॥ ४० ॥

इत्येषा भावजा बुद्धिः कथिता ते न संशयः ।

एवं भवति निर्द्वन्द्वो ब्रह्माणं चाधिगच्छति ॥ ४१ ॥

बेटा! यह तुम्हारे निकट मैंने भावशुद्धिसे प्राप्त होनेवाली बुद्धिका वर्णन किया है । जो उपर्युक्तरूपसे साधना करके द्वन्द्वोंसे रहित हो जाता है, वही ब्रह्मभावको प्राप्त होता है, इसमें कोई संशय नहीं है ॥ ४१ ॥

पृष्ठ 1565

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इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि शुकानुप्रश्ने षट्त्रिंशदधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २३६ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें शुकदेवका अनुप्रश्नविषयक दो सौ छत्तीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २३६ ॥

* ध्यानयोगके साधकको ऐसे स्थानपर आसन लगाना चाहिये, जो समतल और पवित्र हो । निर्जन वन, गुफा या ऐसा ही कोई एकान्त स्थान ही ध्यानके लिये उपयोगी होता है । ऐसे स्थानपर आसन लगानेको देशयोग कहते हैं । आहार- विहार, चेष्टा, सोना और जागना – ये सब परिमित और नियमानुकूल होने चाहिये । यही कर्मनामक योग है । परमात्मा एवं उसकी प्राप्तिके साधनोंमें तीव्र अनुराग रखना अनुरागयोग कहलाता है । केवल आवश्यक सामग्रीको ही रखना अर्थयोग है । ध्यानोपयोगी आसनसे बैठना उपाययोग है । संसारके विषयों और सगे -सम्बन्धियोंसे आसक्ति तथा ममता हटा लेनेको अपाययोग कहते हैं । गुरु और वेदशास्त्रके वचनोंपर विश्वास रखनेका नाम निश्चययोग है । चक्षुको नासिकाके अग्रभागपर स्थिर करना चक्षुर्योग है । शुद्ध और सात्त्विक भोजनका नाम है आहारयोग । विषयोंकी ओर होनेवाली मन-इन्द्रियोंकी स्वाभाविक प्रवृत्तिको रोकना संहारयोग कहलाता है । मनको संकल्प - विकल्पसे रहित करके एकाग्र करना मनोयोग है । जन्म, मृत्यु, जरा और रोग आदि होनेके समय महान् दुःख और दोषोंका वैराग्यपूर्वक दर्शन करना दर्शनयोग है । जिसे योगके द्वारा सिद्धि प्राप्त करनी हो, उसे इन बारह योगोंका अवश्य अवलम्बन करना चाहिये । * पातञ्जलयोगदर्शनमें ' देशबन्धश्चित्तस्य धारणा' अर्थात् एकदेशमें चित्तको एकाग्र करना धारणा बतलाया गया है । साधक सर्वप्रथम पृथ्वीतत्त्वमें चित्तको लगावे । इस धारणासे उसका पृथ्वीतत्त्वपर अधिकार हो जाता है । फिर पृथ्वीतत्त्वको जलतत्त्वमें विलीन करके जलतत्त्वकी धारणा करे । इससे साधक जलतत्त्वका ऐश्वर्य प्राप्त कर लेता है । फिर जलतत्त्वको अग्नितत्त्वमें विलीन करके अग्नितत्त्वकी धारणा करे । इससे अग्नितत्त्वपर अधिकार हो जाता है । तदनन्तर अग्निको वायुमें विलीन करके चित्तको वायुतत्त्वमें एकाग्र करे । इससे साधक वायुतत्त्वपर प्रभुत्व प्राप्त कर लेता है । इसी प्रकार क्रमशः वायुको आकाशमें और आकाशको मनमें तथा मनको बुद्धिमें लय करके उस उस तत्त्वकी धारणा करे । इस प्रकार धारणाके ये सात स्तर हैं । अन्तमें बुद्धिको अव्यक्त ब्रह्ममें विलीन कर देना चाहिये । * सांख्य- कारिकामें बतलाया है- मूलप्रकृतिरविकृतिर्महदाद्याः प्रकृतिविकृतयः सप्त । षोडशकस्तु विकारो न प्रकृतिर्न विकृतिः पुरुषः ॥ ( सां० का ० ३ ) मूल प्रकृति - अव्याकृत माया, महत्तत्त्व आदि प्रकृतिके सात विकार- महत्तत्त्व, अहंकार और पञ्चतन्मात्राएँ ( शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध ), सोलह विकार — पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ ( श्रोत्र, त्वचा, नेत्र, रसना और घ्राण ), पाँच कर्मेन्द्रियाँ ( वाक्, हाथ, पैर, गुदा और शिश्न) तथा मन और पञ्चमहाभूत ( आकाश, वायु, तेज, जल और पृथ्वी) एवं पुरुष, जो न प्रकृति है और न प्रकृतिका विकार ही- इस प्रकार सांख्यके अनुसार ये पचीस तत्त्व हैं । पातञ्जलयोगदर्शनमें इनका इस प्रकार उल्लेख मिलता है— विशेषाविशेषलिंगमात्रालिंगानि गुणपर्वाणि । ( योग० साधनपाद १ ९ ) ‘ विशेष— पञ्चमहाभूत, पाँच ज्ञानेन्द्रिय, पाँच कर्मेन्द्रिय और मन, अविशेष— पञ्चतन्मात्रा और अहंकार, लिंगमात्र- महत्तत्त्व, अलिंग – मूलप्रकृति; इस प्रकार ये चौबीस तत्त्व एवं पचीसवाँ द्रष्टा ( पुरुष ) है ।

पृष्ठ 1566

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सप्तत्रिंशदधिकद्विशततमोऽध्यायः सृष्टिके समस्त कार्योंमें बुद्धिकी प्रधानता और प्राणियोंकी श्रेष्ठताके तारतम्यका वर्णन व्यास उवाच

अथ ज्ञानप्लवं धीरो गृहीत्वा शान्तिमात्मनः ।

उन्मज्जंश्च निमज्जंश्च ज्ञानमेवाभिसंश्रयेत् ॥ १ ॥

व्यासजी कहते हैं - वत्स! धीर पुरुषको चाहिये कि वह विवेकरूप नौकाका अवलम्बन लेकर भव- सागरमें डूबता-उतराता हुआ अर्थात् प्रत्येक परिस्थितिमें अपनी परम शान्तिके लिये वास्तविक ज्ञानके आश्रित हो जाय ॥ १ ॥

शुक उवाच

किं तज्ज्ञानमथो विद्या यथा निस्तरते द्वयम् ।

प्रवृत्तिलक्षणो धर्मो निवृत्तिरिति वा वद ॥ २ ॥

शुकदेवजीने पूछा- पिताजी! जिसके द्वारा मनुष्य जन्म और मृत्यु दोनोंके बन्धनसे छुटकारा पा जाता है, वह ज्ञान अथवा विद्या क्या है? वह प्रवृत्तिरूप धर्म है या निवृत्तिरूप? यह मुझे बताइये ॥ २ ॥

व्यास उवाच

यस्तु पश्यन् स्वभावेन विनाभावमचेतनः ।

पुष्यते च पुनः सर्वान् प्रज्ञया मुक्तहेतुकान् ॥ ३ ॥

व्यासजीने कहा — जो यह समझता है कि यह जगत् स्वभावसे ही उत्पन्न है, इसका कोई चेतन मूल कारण नहीं है, वह अज्ञानी मनुष्य व्यर्थ तर्कयुक्त बुद्धिद्वारा हेतुरहित वचनोंका बारंबार पोषण करता रहता है ॥ ३ ॥

येषां चैकान्तभावेन स्वभावात् कारणं मतम् ।

पूत्वा तृणमिषीकां वा ते लभन्ते न किंचन ॥ ४ ॥

जिनकी यह मान्यता है कि निश्चित रूपसे वस्तुगत स्वभाव ही जगत्का कारण है-स्वभावसे भिन्न अन्य कोई कारण नहीं है, ( किंतु इन्द्रियोंद्वारा उपलब्ध न होनेमात्र हेतुसे उनका यह मानना कि ईश्वर- जैसा कोई जगत्का कारण है ही नहीं, युक्तिसंगत नहीं है; क्योंकि ) मूँजके भीतर स्थित दिखायी न देनेवाली सींक क्या मूँजको चीर डालनेपर उन्हें उपलब्ध नहीं होती? अपितु अवश्य होती है ( उसी प्रकार समस्त जगत्में व्याप्त परमात्मा

पृष्ठ 1567

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यद्यपि इन्द्रियोंद्वारा दिखायी नहीं देता तो भी उसकी उपलब्धि दिव्य - ज्ञानके द्वारा अवश्य होती है ) ॥ ४ ॥

ये चैनं पक्षमाश्रित्य निवर्तन्त्यल्पमेधसः ।

स्वभावं कारणं ज्ञात्वा न श्रेयः प्राप्नुवन्ति ते ॥ ५ ॥

जो मन्दबुद्धि मानव इस नास्तिक मतका अवलम्बन करके स्वभावहीको कारण जानकर परमेश्वरकी उपासनासे निवृत्त हो जाते हैं, वे कल्याणके भागी नहीं होते ॥ ५ ॥

स्वभावो हि विनाशाय मोहकर्म मनोभवः ।

निरुक्तमेतयोरेतत् स्वभावपरिभावयोः ॥ ६ ॥

नास्तिक लोग जो स्वभाववादका आश्रय लेकर ईश्वर और अदृष्टकी सत्ताको स्वीकार नहीं करते हैं, यह उनका मोहजनित कार्य है, स्वभाववाद मूढ़ोंकी कल्पना मात्र है । यह

मानवोंको परमार्थसे वंचित करके उनका विनाश करनेके लिये ही उपस्थित किया गया है ।

स्वभाव और परिभावके तत्त्वका यह आगे बताया जानेवाला विवेचन सुनो ॥ ६ ॥

कृष्णादीनीह कर्माणि सस्यसंहरणानि च ।

प्रज्ञावद्भिः प्रक्लृप्तानि यानासनगृहाणि च ॥ ७ ॥

देखा जाता है कि जगत् में बुद्धिसम्पन्न चेतन प्राणियोंद्वारा ही भूमिको जोतने आदिके कार्य, अनाजके बीजोंका संग्रह तथा सवारी, आसन और गृहनिर्माण – ये सब कार्य सदासे किये जाते हैं । यदि स्वभावसे ये कार्य हो जाते तो कोई इनमें प्रवृत्त ही न होता ॥ ७ ॥

आक्रीडानां गृहाणां च गदानामगदस्य च ।

प्रज्ञावन्तः प्रयोक्तारो ज्ञानवद्भिरनुष्ठिताः ॥ ८ ॥

बेटा! चेतन प्राणी क्रीडाके लिये स्थान और रहनेके लिये घर बनाते हैं । वे ही रोगोंको पहचानकर उनपर ठीक- ठीक दवाका प्रयोग करते हैं । बुद्धिमान् पुरुषोंद्वारा ही इन सब कार्योंका यथावत् अनुष्ठान होता है ( स्वभावसे — अपने - आप नहीं) ॥ ८ ॥

प्रज्ञा संयोजयत्यर्थेः प्रज्ञा श्रेयोऽधिगच्छति ।

राजानो भुञ्जते राज्यं प्रज्ञया तुल्यलक्षणाः ॥ ९ ॥

बुद्धि ही धनकी प्राप्ति कराती है । बुद्धिसे ही मनुष्य कल्याणको प्राप्त होता है । एक- से लक्षणोंवाले राजाओंमें भी जो बुद्धिमें बढ़े -चढ़े होते हैं, वे ही राज्यका उपभोग और दूसरोंपर शासन करते हैं ॥ ९ ॥

परावरं तु भूतानां ज्ञानेनैवोपलभ्यते ।

विद्यया तात सृष्टानां विद्यैवेह परा गतिः ॥ १० ॥

तात! प्राणियोंके स्थूल सूक्ष्म या छोटे- बड़ेका भेद बुद्धिसे ही जाना जाता है। इस जगत्में सब प्राणियोंकी सृष्टि विद्यासे हुई है और उनकी परम गति विद्या ही है ॥ १० ॥

भूतानां जन्म सर्वेषां विविधानां चतुर्विधम् ।

जरायुजाण्डजोद्भिज्जस्वेदजं चोपलक्षयेत् ॥ ११ ॥

पृष्ठ 1568

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संसारमें जो नाना प्रकारके जरायुज, अण्डज, स्वदेज और उद्भिज्ज– ये चतुर्विध प्राणी हैं, उन सबके जन्मकी ओर भी लक्ष्य करना चाहिये ॥ ११ ॥

स्थावरेभ्यो विशिष्टानि जङ्गमान्युपधारयेत् ।

उपपन्नं हि यच्चेष्टा विशिष्येत विशेष्यया ॥ १२ ॥

स्थावर प्राणियोंसे जंगम प्राणियोंको श्रेष्ठ समझना चाहिये । यह बात युक्तिसंगत भी है, क्योंकि उनमें विशेषरूपसे चेष्टा देखी जाती है, इस विशेषताके कारण जंगम प्राणियोंकी विशिष्टता स्वतः सिद्ध है ॥ १२ ॥

आहुर्वै बहुपादानि जङ्गमानि द्वयानि तु ।

बहुपाद्भयो विशिष्टानि द्विपदानि बहून्यपि ॥ १३ ॥

जंगम जीवोंमें भी बहुत पैरवाले और दो पैरवाले — ये दो तरहके प्राणी होते हैं । इनमें बहुत पैरवालोंकी अपेक्षा दो पैरवाले अनेक प्राणी श्रेष्ठ बताये गये हैं ॥

द्विपदानि द्वयान्याहुः पार्थिवानीतराणि च ।

पार्थिवानि विशिष्टानि तानि ह्यन्नानि भुञ्जते ॥ १४ ॥

दो पैरवाले जंगम प्राणी भी दो प्रकारके कहे गये हैं- पार्थिव ( मुनष्य ) और अपार्थिव ( पक्षी) । अपार्थिवोंसे पार्थिव श्रेष्ठ हैं, क्योंकि वे अन्न भोजन करते हैं ॥ १४ ॥

पार्थिवानि द्वयान्याहुर्मध्यमान्यधमानि तु ।

मध्यमानि विशिष्टानि जातिधर्मोपधारणात् ॥ १५ ॥

पार्थिव ( मनुष्य ) भी दो प्रकारके बताये गये हैं- मध्यम और अधम । उनमें मध्यम मनुष्य अधमकी अपेक्षा श्रेष्ठ हैं; क्योंकि वे जाति- धर्मको धारण करते हैं ॥ १५ ॥

मध्यमानि द्वयान्याहुर्धर्मज्ञानीतराणि च ।

धर्मज्ञानि विशिष्टानि कार्याकार्योपधारणात् ॥ १६ ॥

मध्यम मनुष्य दो प्रकारके कहे गये हैं- धर्मज्ञ और धर्मसे अनभिज्ञ । इनमें धर्मज्ञ ही श्रेष्ठ हैं; क्योंकि वे कर्तव्य और अकर्त्तव्यका विवेक रखते और कर्त्तव्यका पालन करते हैं ॥ १६ ॥

धर्मज्ञानि द्वयान्याहुर्वेदज्ञानीतराणि च ।

वेदज्ञानि विशिष्टानि वेदो ह्येषु प्रतिष्ठितः ॥ १७ ॥

धर्मज्ञोंके भी दो भेद कहे गये हैं- वेदज्ञ और अवेदज्ञ । इनमें वेदज्ञ श्रेष्ठ हैं; क्योंकि उन्हींमें वेद प्रतिष्ठित है ॥ १७ ॥

वेदज्ञानि द्वयान्याहुः प्रवक्तृणीतराणि च ।

प्रवक्तॄणि विशिष्टानि सर्वधर्मोपधारणात् ॥ १८ ॥

वेदज्ञ भी दो प्रकारके बताये गये हैं- प्रवक्ता और अप्रवक्ता । इनमें प्रवक्ता (प्रवचन करनेवाले ) श्रेष्ठ हैं; क्योंकि वे वेदमें बताये हुए सम्पूर्ण धर्मोंको धारण करनेवाले होते हैं ॥ १८ ॥

पृष्ठ 1569

महाभारत — खण्ड ५, पृष्ठ 1569 का मूल पृष्ठ
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विज्ञायन्ते हि यैर्वेदाः सधर्माः सक्रियाफलाः ।

सधर्मा निखिला वेदाः प्रवक्तृभ्यो विनिःसृताः ॥ १ ९ ॥

एवं उन्हींके द्वारा धर्म, कर्म और फलोंसहित वेदोंका ज्ञान दूसरोंको होता है । धर्मसहित सम्पूर्ण वेद प्रवक्ताओंके ही मुखसे प्रकट होते हैं ॥ १ ९ ॥

प्रवक्तृणि द्वयान्याहुरात्मज्ञानीतराणि च ।

आत्मज्ञानि विशिष्टानि जन्माजन्मोपधारणात् ॥ २० ॥

प्रवक्ता भी दो प्रकारके कहे गये हैं— आत्मज्ञ और अनात्मज्ञ । इनमें आत्मज्ञ पुरुष ही श्रेष्ठ हैं; क्योंकि वे जन्म और मृत्युके तत्त्वको समझते हैं ॥ २० ॥

धर्मद्वयं हि यो वेद स सर्वज्ञः स सर्ववित् ।

स त्यागी सत्यसंकल्पः सत्यः शुचिरथेश्वरः ॥ २१ ॥

जो प्रवृत्ति और निवृत्तिरूप दो प्रकारके धर्मको जानता है, वही सर्वज्ञ, सर्ववेत्ता, त्यागी, सत्यसंकल्प, सत्यवादी, पवित्र और समर्थ होता है ॥ २१ ॥

ब्रह्मज्ञानप्रतिष्ठं हि तं देवा ब्राह्मणं विदुः ।

शब्दब्रह्मणि निष्णातं परे च कृतनिश्चयम् ॥ २२ ॥

जो शब्दब्रह्म ( वेद ) में पारंगत होकर परब्रह्मके तत्त्वका निश्चय कर चुका है और सदा ब्रह्मज्ञानमें ही स्थित रहता है, उसे ही देवतालोग ब्राह्मण मानते हैं ॥

अन्तःस्थं च बहिष्ठं च साधियज्ञाधिदैवतम् ।

ज्ञानान्विता हि पश्यन्ति ते देवास्तात ते द्विजाः ॥ २३ ॥

बेटा! जो लोग ज्ञानवान् होकर बाहर और भीतर व्याप्त अधियज्ञ ( परमात्मा ) और अधिदैव ( पुरुष ) का साक्षात्कार कर लेते हैं, वे ही देवता और वे ही द्विज हैं ॥

तेषु विश्वमिदं भूतं सर्वं च जगदाहितम् ।

तेषां माहात्म्यभावस्य सदृशं नास्ति किंचन ॥ २४ ॥

उन्हींमें यह सारा विश्व, सम्पूर्ण जगत् प्रतिष्ठित है । उनके माहात्म्यकी कहीं कोई तुलना नहीं है ॥ २४ ॥

आद्यन्ते निधनं चैव कर्म चातीत्य सर्वशः ।

चतुर्विधस्य भूतस्य सर्वस्येशाः स्वयम्भुवः ॥ २५ ॥

वे जन्म, मृत्यु और कर्मकी सीमाको भलीभाँति लाँघकर समस्त चतुर्विध प्राणियोंके अधीश्वर एवं स्वयम्भू होते हैं ॥ २५ ॥

इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि शुकानुप्रश्ने सप्तत्रिंशदधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २३७ ॥

इसप्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें शुकदेवका अनुप्रश्नविषयक दो सौ सैंतीसवाँअध्याय पूरा हुआ ॥ २३७ ॥

पृष्ठ 1570

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