श्रीगणेशाय नमः।
महाभारत — खण्ड ५ — पृष्ठ 1551–1560
महाभारत — खण्ड ५ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1551–1560
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राजा मित्रसहने महात्मा वसिष्ठको अपनी प्यारी रानी मदयन्ती देकर उसके साथ ही स्वर्गलोकमें पदार्पण किया था ॥ ३० ॥
सहस्रजिच्च राजर्षिः प्राणानिष्टान् महायशाः ।
ब्राह्मणार्थं परित्यज्य गतो लोकाननुत्तमान् ॥ ३१ ॥
महायशस्वी राजर्षि सहस्रजित् ब्राह्मणके लिये अपने प्यारे प्राणोंका परित्याग करके परम उत्तम लोकोंमें गये ॥ ३१ ॥
सर्वकामैश्च सम्पूर्णं दत्त्वा वेश्म हिरण्मयम् ।
मुद्गलाय गतः स्वर्गं शतद्युम्नो महीपतिः ॥ ३२ ॥
महाराज शतद्युम्न मुद्गल ब्राह्मणको समस्त भोगोंसे सम्पन्न सुवर्णमय भवन देकर स्वर्गलोकमें गये थे ॥ ३२ ॥
नाम्ना च द्युतिमान् नाम शाल्वराजः प्रतापवान् ।
दत्त्वा राज्यमृचीकाय गतो लोकाननुत्तमान् ॥ ३३ ॥
प्रतापी शाल्वराज द्युतिमान्ने ऋचीकको राज्य देकर परम उत्तम लोक प्राप्त किये थे ॥ ३३ ॥
लोमपादश्च राजर्षिः शान्तां दत्त्वा सुतां प्रभुः ।
ऋष्यशृङ्गाय विपुलैः सर्वकामैरयुज्यत ॥ ३४ ॥
शक्तिशाली राजर्षि लोमपाद अपनी पुत्री शान्ताका ऋष्यशृङ्ग मुनिको दान करके सब प्रकारके प्रचुर भोगोंसे सम्पन्न हो गये ॥ ३४ ॥
मदिराश्वश्च राजर्षिर्दत्त्वा कन्यां सुमध्यमाम् ।
हिरण्यहस्ताय गतो लोकान् देवैरभिष्टुतान् ॥ ३५ ॥
राजर्षि मदिराश्व हिरण्यहस्तको अपनी सुन्दरी कन्या देकर देववन्दित लोकोंमें गये थे ॥ ३५ ॥
दत्त्वा शतसहस्रं तु गवां राजा प्रसेनजित् ।
सवत्सानां महातेजा गतो लोकाननुत्तमान् ॥ ३६ ॥
महातेजस्वी राजा प्रसेनजित्ने एक लाख सवत्सा गौओंका दान करके उत्तम लोक प्राप्त किये थे ॥ ३६ ॥
एते चान्ये च बहवो दानेन तपसैव च ।
महात्मानो गताः स्वर्गं शिष्टात्मानो जितेन्द्रियाः ॥ ३७ ॥
ये तथा और भी बहुत- से शिष्ट स्वभाववाले जितेन्द्रिय महात्मा दान और तपस्यासे स्वर्गलोकमें चले गये ॥ ३७ ॥
तेषां प्रतिष्ठिता कीर्तिर्यावत् स्थास्यति मेदिनी ।
दानयज्ञप्रजासर्गेरते हि दिवमाप्नुवन् ॥ ३८ ॥
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जबतक यह पृथ्वी रहेगी, तबतक उनकी कीर्ति संसारमें स्थिर रहेगी । उन सबने दान, यज्ञ और प्रजा--सृष्टिके द्वारा स्वर्गलोक प्राप्त किया था ॥ ३८ ॥
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि शुकानुप्रश्ने चतुस्त्रिंशदधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २३४ ॥
इसप्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें शुकानुप्रश्नविषयक दो सौ चौंतीसवाँ अध्याय पूराहुआ ॥ २३४ ॥
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पञ्चत्रिंशदधिकद्विशततमोऽध्यायः ब्राह्मणके कर्तव्यका प्रतिपादन करते हुए कालरूप नदको पार करनेका उपाय बतलाना व्यास उवाच
त्रयीं विद्यामवेक्षेत वेदेषूक्तामथाङ्गतः ।
ऋक्सामवर्णाक्षरतो यजुषोऽथर्वणस्तथा ॥ १ ॥
तिष्ठत्ये तेषु भगवान् षट्सु कर्मसु संस्थितः । व्यासजी कहते हैं— बेटा! ब्राह्मणको चाहिये कि वेदोंमें बतायी गयी त्रयी विद्या — ' अ उ म्' इन तीन अक्षरोंसे सम्बन्ध रखनेवाली प्रणवविद्याका चिन्तन एवं विचार करे । वेदके छहों अंगोंसहित ऋक्, साम, यजुष् एवं अथर्वके मन्त्रोंका स्वर- व्यंजनके सहित अध्ययन करे; क्योंकि यजन- याजन, अध्ययन- अध्यापन, दान और प्रतिग्रह–इन छः कर्मोंमें विराजमान भगवान् धर्म ही इन वेदोंमें प्रतिष्ठित हैं ॥ १३ ॥
वेदवादेषु कुशला ह्यध्यात्मकुशलाश्च ये ॥ २ ॥
सत्त्ववन्तो महाभागाः पश्यन्ति प्रभवाप्ययौ ।
एवं धर्मेण वर्तेत क्रियां शिष्टवदाचरेत् ॥ ३ ॥
जो लोग वेदोंके प्रवचनमें निपुण, अध्यात्मज्ञानमें कुशल, सत्त्वगुणसम्पन्न और महान् भाग्यशाली हैं, वे जगत्की सृष्टि और प्रलयको ठीक- ठीक जानते हैं; अतः ब्राह्मणको इस प्रकार धर्मानुकूल बर्ताव करते हुए शिष्ट पुरुषोंकी भाँति सदाचारका पालन करना चाहिये ॥ २-३ ॥
असंरोधेन भूतानां वृत्तिं लिप्सेत वै द्विजः ।
सद्भ्य आगतविज्ञानः शिष्टः शास्त्रविचक्षणः ॥ ४ ॥
ब्राह्मण किसी भी जीवको कष्ट न देकर– उसकी जीविकाका हनन न करके अपनी जीविका चलानेकी इच्छा करे । संतोंकी सेवामें रहकर तत्त्वज्ञान प्राप्त करे, सत्पुरुष बने और शास्त्रकी व्याख्या करनेमें कुशल हो ॥ ४ ॥
स्वधर्मेण क्रिया लोके कुर्वाणः सत्यसंगरः ।
तिष्ठते तेषु गृहवान् षट्सु कर्मसु स द्विजः ॥ ५ ॥
जगत्में अपने धर्मके अनुकूल कर्म करे, सत्यप्रतिज्ञ बने । गृहस्थ ब्राह्मणको पूर्वोक्त छः कर्मोंमें ही स्थित रहना चाहिये ॥ ५ ॥
पञ्चभिः सततं यज्ञैः श्रद्दधानो यजेत च ।
धृतिमानप्रमत्तश्च दान्तो धर्मविदात्मवान् ॥ ६ ॥
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सदा श्रद्धापूर्वक पञ्च- महायज्ञोंद्वारा परमात्माका पूजन करे, सर्वदा धैर्य धारण करे । प्रमाद ( अकर्तव्य कर्मको करने और कर्तव्य कर्मकी अवहेलना करने ) से बचे, इन्द्रियोंको संयममें रखे, धर्मका ज्ञाता बने और मनको भी अपने अधीन रखे ॥ ६ ॥
वीतहर्षमदक्रोधो ब्राह्मणो नावसीदति ।
दानमध्ययनं यज्ञस्तपो ह्रीरार्जवं दमः ॥ ७ ॥
एतैर्वर्धयते तेजः पाप्मानं चापकर्षति । जो ब्राह्मण हर्ष, मद और क्रोधसे रहित है, उसे कभी दुःख नहीं उठाना पड़ता है । दान, वेदाध्ययन, यज्ञ, तप, लज्जा, सरलता और इन्द्रियसंयम-इन सद्गुणोंसे ब्राह्मण अपने तेजकी वृद्धि और पापका नाश करता है ॥ ७३ ॥
धूतपाप्मा च मेधावी लघ्वाहारो जितेन्द्रियः ॥ ८ ॥
कामक्रोधौ वशे कृत्वा निनीषेद् ब्रह्मणः पदम् । इस प्रकार पाप धुल जानेपर बुद्धिमान् ब्राह्मण स्वल्पाहार करते हुए इन्द्रियोंको जीते और काम तथा क्रोधको अधीन करके ब्रह्मपदको प्राप्त करनेकी इच्छा करे ॥ ८३ ॥
अग्नींश्च ब्राह्मणांश्चार्चेद् देवताः प्रणमेत च ॥ ९ ॥
वर्जयेदुशतीं वाचं हिंसां चाधर्मसंहिताम् ।
एषा पूर्वगता वृत्तिर्ब्राह्मणस्य विधीयते ॥ १० ॥
अग्नि, ब्राह्मण और देवताओंको प्रणाम एवं उनका पूजन करे। कड़वी बात मुँहसे न निकाले और हिंसा न करे; क्योंकि वह अधर्मसे युक्त है । यह ब्राह्मणके लिये परम्परागत वृत्ति ( कर्तव्य ) का विधान किया गया है ॥ ९ -१० ॥
ज्ञानागमेन कर्माणि कुर्वन् कर्मसु सिध्यति ।
पञ्चेन्द्रियजलां घोरां लोभकूलां सुदुस्तराम् ॥ ११ ॥
मन्युपङ्कामनाधृष्यां नदीं तरति बुद्धिमान् ।
कालमभ्युद्यतं पश्येन्नित्यमत्यन्तमोहनम् ॥ १२ ॥
कर्मोंके तत्त्वको जानकर उनका अनुष्ठान करनेसे अवश्य सिद्धि प्राप्त होती है । संसारका जीवन एक भयंकर नदीके समान है । पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ इस नदीका जल हैं । लोभ किनारा है । क्रोध इसके भीतर कीचड़ है । इसे पार करना अत्यन्त कठिन है और इसके वेगको दबाना अत्यन्त असम्भव है, तथापि बुद्धिमान् पुरुष इसे पार कर जाता है । प्राणियोंको अत्यन्त मोहमें डालनेवाला काल सदा आक्रमण करनेके लिये उद्यत है, इस बातकी ओर सदा ही दृष्टि रखे ॥ ११-१२ ॥
महता विधिदृष्टेन बलेनाप्रतिघातिना ।
स्वभावस्रोतसा वृत्तमुह्यते सततं जगत् ॥ १३ ॥
जो महान् है, जो विधाताकी ही दृष्टिमें आ सकता है तथा जिसका बल कहीं प्रतिहत नहीं होता, उस स्वभावरूप धारा-प्रवाहमें यह सारा जगत् निरन्तर बहता जा रहा
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है ॥ १३ ॥
कालोदकेन महता वर्षावर्तेन संततम् ।
मासोर्मिणर्तुवेगेन पक्षोलपतृणेन च ॥ १४ ॥
निमेषोन्मेषफेनेन अहोरात्रजलेन च ।
कामग्राहेण घोरेण वेदयज्ञप्लवेन च ॥ १५ ॥
धर्मद्वीपेन भूतानां चार्थकामजलेन च ।
ऋतवाङ्मोक्षतीरेण विहिंसातरुवाहिना ॥ १६ ॥
युगहृदौघमध्येन ब्रह्मप्रायभवेन च ।
धात्रा सृष्टानि भूतानि कृष्यन्ते यमसादनम् ॥ १७ ॥
कालरूपी महान् नद बह रहा है । इसमें वर्षरूपी भँवरें सदा उठ रही हैं । महीने इसकी उत्ताल तरंगें हैं । ऋतु वेग हैं । पक्ष लता और तृण हैं । निमेष और उन्मेष फेन हैं । दिन और रात जल- प्रवाह हैं । कामदेव भयंकर ग्राह है । वेद और यज्ञ नौका हैं । धर्म प्राणियोंका आश्रयभूत द्वीप है । अर्थ और काम जल हैं । सत्यभाषण और मोक्ष दोनों किनारे हैं । हिंसारूपी वृक्ष उस कालरूपी प्रवाहमें बह रहे हैं । युग ह्रद है तथा ब्रह्म ही उस कालनदको उत्पन्न करनेवाला पर्वत है । उसी प्रवाहमें पड़कर विधाताके रचे हुए समस्त प्राणी यमलोककी ओर खिंचे चले जा रहे हैं ॥ १४–१७ ॥
एतत् प्रज्ञामयैर्धीरा निस्तरन्ति मनीषिणः ।
प्लवैरप्लववन्तो हि किं करिष्यन्त्यचेतसः ॥ १८ ॥
बुद्धिमान् और धीर मनुष्य प्रज्ञारूप नौकाओंद्वारा उस कालनदके पार हो जाते हैं । जो वैसी नौकाओंसे रहित हैं, वे अविवेकी मनुष्य क्या करेंगे? ॥ १८ ॥
उपपन्नं हि यत् प्राज्ञो निस्तरेन्नेतरो जनः ।
दूरतो गुणदोषौ हि प्राज्ञः सर्वत्र पश्यति ॥ १ ९ ॥
विद्वान् पुरुष जो कालनदसे पार हो जाता है और अज्ञानी मनुष्य नहीं पार होता है, यह युक्तिसंगत ही है; क्योंकि ज्ञानवान् पुरुष सर्वत्र गुण और दोषोंको दूरसे ही देख लेता है ॥ १ ९ ॥
संशयं स तु कामात्मा चलचित्तोऽल्पचेतनः ।
अप्राज्ञो न तरत्येनं यो ह्यास्ते न स गच्छति ॥ २० ॥
कामनाओंमें आसक्त, चंचलचित्त, मन्दबुद्धि एवं अज्ञानी पुरुष संदेहमें पड़ जानेके कारण कालनदको पार नहीं कर पाता तथा जो निश्चेष्ट होकर बैठ जाता है, वह भी उसके पार नहीं जा सकता ॥ २० ॥
अप्लवो हि महादोषं मुह्यमानो नियच्छति ।
कामग्राहगृहीतस्य ज्ञानमप्यस्य न प्लवः ॥ २१ ॥
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जिसके पास ज्ञानमयी नौका नहीं है, वह मोहितचित्त मूढ़ मानव महान् दोषको प्राप्त होता है । कामरूपी ग्राहसे पीड़ित होनेके कारण ज्ञान भी उसके लिये नौका नहीं बन पाता ॥ २१ ॥
तस्मादुन्मज्जनस्यार्थे प्रयतेत विचक्षणः ।
एतदुन्मज्जनं तस्य यदयं ब्राह्मणो भवेत् ॥ २२ ॥
इसलिये बुद्धिमान् पुरुषको कालनद या भवसागरसे पार होनेका अवश्य प्रयत्न करना चाहिये । उसका पार होना यही है कि वह वास्तवमें ब्राह्मण बन जाय अर्थात् ब्रह्मज्ञान प्राप्त करे ॥ २२ ॥
अवदातेषु संजातस्त्रिसंदेहस्त्रिकर्मकृत् ।
तस्मादुन्मज्जने तिष्ठेत् प्रज्ञया निस्तरेद् यथा ॥ २३ ॥
उत्तम कुलमें उत्पन्न हुआ ब्राह्मण अध्यापन, याजन और प्रतिग्रह –इन तीन कर्मोंको संदेहकी दृष्टिसे देखे ( कि कहीं इनमें आसक्त न हो जाऊँ) और अध्ययन, यजन तथा दान -इन तीन कर्मोंका अवश्य पालन करे । वह जैसे भी हो प्रज्ञाद्वारा अपने उद्धारका प्रयत्न करे, उस कालनदसे पार हो जाय ॥ २३ ॥
संस्कृतस्य हि दान्तस्य नियतस्य यतात्मनः ।
प्राज्ञस्यानन्तरा सिद्धिरिहलोके परत्र च ॥ २४ ॥
जिसके वैदिक संस्कार विधिवत् सम्पन्न हुए हैं, जो नियमपूर्वक रहकर मन और इन्द्रियोंपर विजय पा चुका है, उस विज्ञ पुरुषको इहलोक और परलोकमें कहीं भी सिद्धि प्राप्त होते देर नहीं लगती ॥ २४ ॥
वर्तेत तेषु गृहवानक्रुद्धयन्ननसूयकः ।
पञ्चभिः सततं यज्ञैर्विघसाशी यजेत च ॥ २५ ॥
गृहस्थ ब्राह्मण क्रोध और दोष -दृष्टिका त्याग करके पूर्वोक्त नियमोंके पालनमें संलग्न रहे । नित्य पञ्चमहायज्ञोंका अनुष्ठान करे और यज्ञशिष्ट अन्नका ही भोजन करे ॥ २५ ॥
सतां धर्मेण वर्तेत क्रियां शिष्टवदाचरेत् ।
असंरोधेन लोकस्य वृत्तिं लिप्सेदगर्हिताम् ॥ २६ ॥
श्रेष्ठ पुरुषोंके धर्मके अनुसार चले और शिष्टाचारका पालन करे तथा ऐसी आजीविका प्राप्त करनेकी इच्छा करे, जिससे दूसरे लोगोंकी जीविकाका हनन न हो और जिसकी लोकमें निन्दा न होती हो ॥ २६ ॥
श्रुतिविज्ञानतत्त्वज्ञः शिष्टाचारो विचक्षणः स्वधर्मेण क्रियावांश्च कर्मणा सोऽप्यसंकरः ॥ २७ ॥
ब्राह्मणको वेदका विद्वान्, तत्त्वज्ञानी, सदाचारी और चतुर होना चाहिये । वह अपने धर्मके अनुसार कार्य करे, परंतु कर्मद्वारा संकरता न फैलावे अर्थात् स्वधर्म और परधर्मका सम्मिश्रण न करे ॥ २७ ॥
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क्रियावान् श्रद्दधानो हि दान्तः प्राज्ञोऽनसूयकः ।
धर्माधर्मविशेषज्ञः सर्वं तरति दुस्तरम् ॥ २८ ॥
जो अपने धर्मके अनुसार कार्य करनेवाला, श्रद्धालु, मन और इन्द्रियोंको संयममें रखनेवाला, विद्वान्, किसीके दोष न देखनेवाला तथा धर्म और अधर्मका विशेषज्ञ है, वह सम्पूर्ण दुःखोंसे पार हो जाता है ॥ २८ ॥
धृतिमानप्रमत्तश्च दान्तो धर्मविदात्मवान् ।
वीतहर्षमदक्रोधो ब्राह्मणो नावसीदति ॥ २ ९ ॥
जो धैर्यवान्, प्रमादशून्य, जितेन्द्रिय, धर्मज्ञ, मनस्वी तथा हर्ष, मद और क्रोधसे रहित है, वह ब्राह्मण कभी विषादको नहीं प्राप्त होता है ॥ २ ९ ॥
एषा पुरातनी वृत्तिर्ब्राह्मणस्य विधीयते ।
ज्ञानवत्त्वेन कर्माणि कुर्वन् सर्वत्र सिध्यति ॥ ३० ॥
यह ब्राह्मणकी प्राचीनकालसे चली आनेवाली वृत्तिका विधान किया गया है । ज्ञानपूर्वक कर्म करनेवाले ब्राह्मणको सर्वत्र सिद्धि प्राप्त होती है ॥ ३० ॥
अधर्मं धर्मकामो हि करोति ह्यविचक्षणः ।
धर्मं वाधर्मसंकाशं शोचन्निव करोति सः ॥ ३१ ॥
धर्मं करोमीति करोत्यधर्म- मधर्मकामश्च करोति धर्मम् । उभे बालः कर्मणी न प्रजानन् स जायते म्रियते चापि देही ॥ ३२ ॥
जो मूढ़ है, वह धर्मकी इच्छा रखकर भी अधर्म करता है अथवा शोकमग्न - सा होकर अधर्मतुल्य धर्मका सम्पादन करता है । मूर्ख या अविवेकी मनुष्य न जाननेके कारण ‘ मैं धर्म कर रहा हूँ ' ऐसा समझकर अधर्म करता है और अधर्मकी इच्छा रखकर धर्म करता है, इस प्रकार अज्ञानपूर्वक दोनों तरहके कर्म करनेवाला देहधारी मनुष्य बारंबार जन्म लेता और मरता है ॥ ३१-३२ ॥ इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि शुकानुप्रश्ने पञ्चत्रिंशदधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २३५ ॥
इसप्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें शुकदेवका अनुप्रश्नविषयक दो सौ पैंतीसवाँ अध्याय पूराहुआ ॥ २३५ ॥
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पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
षट्त्रिंशदधिकद्विशततमोऽध्यायः ध्यानके सहायक योग, उनके फल और सात प्रकारकी धारणाओंका वर्णन तथा सांख्य एवं योगके अनुसार ज्ञानद्वारा मोक्षकी प्राप्ति व्यास उवाच
अथ चेद् रोचयेदेतदुह्येत स्रोतसा यथा ।
उन्मज्जंश्च निमज्जंश्च ज्ञानवान् प्लववान् भवेत् ॥ १ ॥
व्यासजी कहते हैं — वत्स! मनुष्य जिस प्रकार डूबता- उतराता हुआ जलके प्रवाहमें बहता रहता है और यदि संयोगवश कोई नौका मिल गयी तो उसकी सहायतासे पार लग जाता है, उसी प्रकार संसार - सागरमें डूबता- उतराता हुआ मानव यदि इस संकटसे मुक्त होना चाहे तो उसे ज्ञानरूपी नौकाका आश्रय लेना चाहिये ॥ १ ॥
प्रज्ञया निश्चिता धीरास्तारयन्त्यबुधान् प्लवैः ।
नाबुधास्तारयन्त्यन्यानात्मानं वा कथंचन ॥ २ ॥
जिन्हें बुद्धिद्वारा तत्त्वका पूर्ण निश्चय हो गया है, वे धीर पुरुष अपनी ज्ञाननौकाद्वारा दूसरे अज्ञानियोंको भी भवसागरसे पार कर देते हैं, परंतु जो अज्ञानी हैं वे न तो दूसरोंको तार सकते हैं और न अपना ही किसी प्रकार उद्धार कर पाते हैं ॥ २ ॥
छिन्नदोषो मुनिर्योगान् युक्तो युञ्जीत द्वादश ।
देशकर्मानुरागार्थानुपायापायनिश्चयैः ॥ ३ ॥
चक्षुराहारसंहारैर्मनसा दर्शनेन च । समाहितचित्त मुनिको चाहिये कि वह हृदयके राग आदि दोषोंको नष्ट करके योगमें सहायता पहुँचानेवाले देश, कर्म, अनुराग, अर्थ, उपाय, अपाय, निश्चय, चक्षुष्, आहार, संहार, मन और दर्शन–इन बारह योगोंका आश्रय ले ध्यानयोगका अभ्यास करें* ॥ ३३ ॥
यच्छेद् वाङ्मनसी बुद्धया य इच्छेज्ज्ञानमुत्तमम् ॥ ४ ॥
ज्ञानेन यच्छेदात्मानं य इच्छेच्छान्तिमात्मनः । जो उत्तम ज्ञान प्राप्त करना चाहता हो, उसे बुद्धिके द्वारा मन और वाणीको जीतना चाहिये तथा जो अपने लिये शान्ति चाहे, उसे ज्ञानद्वारा बुद्धिको परमात्मामें नियन्त्रित करना चाहिये ॥ ४३ ॥
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एतेषां चेदनुद्रष्टा पुरुषोऽपि सुदारुणः ॥ ५ ॥
यदि वा सर्ववेदज्ञो यदि वाप्यनृचो द्विजः ।
यदि वा धार्मिको यज्वा यदि वा पापकृत्तमः ॥ ६ ॥
यदि वा पुरुषव्याघ्रो यदि वा क्लेशधारितः ।
तरत्येवं महादुर्गं जरामरणसागरम् ॥ ७ ॥
मनुष्य अत्यन्त दारुण हो या सम्पूर्ण वेदोंका ज्ञाता हो अथवा ब्राह्मण होकर भी वैदिक ज्ञानसे शून्य हो अथवा धर्मपरायण एवं यज्ञशील हो या घोर पापाचारी हो अथवा पुरुषोंमें सिंहके समान शूरवीर हो या बड़े कष्टसे जीवन धारण करता हो, वह यदि इन बारह योगोंका भलीभाँति साक्षात्कार अर्थात् ज्ञान कर ले तो जरा - मृत्युके परम दुर्गम समुद्रसे पार हो जाता है ॥ ५–७ ॥
एवं ह्येतेन योगेन युञ्जानो ह्येवमन्ततः ।
अपि जिज्ञासमानोऽपि शब्दब्रह्मातिवर्तते ॥ ८ ॥
इस प्रकार सिद्धिपर्यन्त इस योगका अभ्यास करनेवाला पुरुष यदि ब्रह्मका जिज्ञासु हो तो वेदोक्त सकाम कर्मोंकी सीमाको लाँघ जाता है ॥ ८ ॥
धर्मोपस्थो ह्रीवरूथ उपायापायकूबरः ।
अपानाक्षः प्राणयुगः प्रज्ञायुर्जीवबन्धनः ॥ ९ ॥
चेतनाबन्धुरश्चारुश्चाचारग्रहनेमिमान् ।
दर्शनस्पर्शनवहो घ्राणश्रवणवाहनः ॥ १० ॥
प्रज्ञानाभिः सर्वतन्त्रप्रतोदो ज्ञानसारथिः ।
क्षेत्रज्ञाधिष्ठितो धीरः श्रद्धादमपुरःसरः ॥ ११ ॥
त्यागसूक्ष्मानुगः क्षेम्यः शौचगो ध्यानगोचरः ।
जीवयुक्तो रथो दिव्यो ब्रह्मलोके विराजते ॥ १२ ॥
यह योग एक सुन्दर रथ है । धर्म ही इसका पिछला भाग या बैठक है । लज्जा आवरण है । पूर्वोक्त उपाय और अपाय इसका कूबर है । अपानवायु धुरा है । प्राणवायु जूआ हैं । बुद्धि आयु है। जीवन बन्धन है । चैतन्य बन्धुर है । सदाचार- ग्रहण इस रथकी नेमि हैं । नेत्र, त्वचा, घ्राण और श्रवण इसके वाहन हैं । प्रज्ञा नाभि है । सम्पूर्ण शास्त्र चाबुक है । ज्ञान सारथि है। क्षेत्रज्ञ ( जीवात्मा) इसपर रथी बनकर बैठा हुआ है । यह रथ धीरे - धीरे चलनेवाला है । श्रद्धा और इन्द्रियदमन इस रथके आगे- आगे चलनेवाले रक्षक हैं । त्यागरूपी सूक्ष्म गुण इसके अनुगामी ( पृष्ठ -रक्षक ) हैं । यह मंगलमय रथ ध्यानके पवित्र मार्गपर चलता है । इस प्रकार यह जीवयुक्त दिव्य रथ ब्रह्मलोकमें विराजमान होता है । अर्थात् इसके द्वारा जीवात्मा परब्रह्म परमात्माको प्राप्त कर लेता है ॥ ९ –१२ ॥ अथ संत्वरमाणस्य रथमेवं युयुक्षतः ।
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अक्षरं गन्तुमनसो विधिं वक्ष्यामि शीघ्रगम् ॥ १३ ॥
इस प्रकार योगरथपर आरूढ़ हो साधनकी इच्छा रखनेवाले तथा अविनाशी परब्रह्म परमात्माको तत्काल प्राप्त करनेकी कामनावाले साधकको जिस उपायसे शीघ्र सफलता मिलती है, वह उपाय मैं बता रहा हूँ ॥
सप्त या धारणाः कृत्स्ना वाग्यतः प्रतिपद्यते ।
पृष्ठतः पार्श्वतश्चान्यास्तावत्यस्ताः प्रधारणाः ॥ १४ ॥
साधक वाणीका संयम करके पृथ्वी, जल, तेज, वायु, आकाश, बुद्धि और अहंकार- सम्बन्धी सात धारणाओंको सिद्ध करता है । इनके विषयों ( गन्ध, रस, रूप, स्पर्श, शब्द, अहंवृत्ति और निश्चय) से सम्बन्धित सात प्रधारणाएँ इनकी पार्श्ववर्तिनी एवं पृष्ठवर्तिनी हैं ॥ क्रमशः पार्थिवं यच्च वायव्यं खं तथा पयः ।
ज्योतिषो यत तदैश्वर्यमहङ्कारस्य बुद्धितः ।
अव्यक्तस्य तथैश्वर्यं क्रमशः प्रतिपद्यते ॥ १५ ॥
साधक क्रमशः पृथ्वी, जल, तेज, वायु, आकाश, अहंकार और बुद्धिके ऐश्वर्यपर अधिकार कर लेता है । इसके बाद वह क्रमपूर्वक अव्यक्त ब्रह्मका ऐश्वर्य भी प्राप्त कर लेता है * ॥ १५ ॥
विक्रमाश्चापि यस्यैते तथा युक्तेषु योगतः ।
तथा योगस्य युक्तस्य सिद्धिमात्मनि पश्यतः ॥ १६ ॥
अब योगाभ्यासमें प्रवृत्त हुए योगियोंमेंसे जिस योगीको ये आगे बताये जानेवाले पृथ्वीजय आदि ऐश्वर्य जिस प्रकार प्राप्त होते हैं; वह बताता हूँ तथा धारणापूर्वक ध्यान करते समय ब्रह्म-प्राप्तिका अनुभव करनेवाले योगीको जो सिद्धि प्राप्त होती है, उसका भी वर्णन करता हूँ ॥ १६ ॥
निर्मुच्यमानः सूक्ष्मत्वाद् रूपाणीमानि पश्यतः ।
शैशिरस्तु यथा धूमः सूक्ष्मः संश्रयते नभः ॥ १७ ॥
साधक जब स्थूल देहके अभिमानसे मुक्त होकर ध्यानमें स्थित होता है, उस समय सूक्ष्मदृष्टिसे युक्त होनेके कारण उसे कुछ इस तरहके रूप ( चिह्न ) दिखायी पड़ते हैं । प्रारम्भमें पृथ्वीकी धारणा करते समय मालूम होता है कि शिशिरकालीन कुहरेके समान कोई सूक्ष्म वस्तु सम्पूर्ण आकाशको आच्छादित कर रही है ॥ १७ ॥
तथा देहाद् विमुक्तस्य पूर्वं रूपं भवत्युत ।
अथ धूमस्य विरमे द्वितीयं रूपदर्शनम् ॥ १८ ॥
इस प्रकार देहाभिमानसे मुक्त हुए योगीके अनुभवका यह पहला रूप है ।
जब कुहरा निवृत्त हो जाता है, तब दूसरे रूपका दर्शन होता है ॥ १८ ॥