श्रीगणेशाय नमः।
महाभारत — खण्ड ५ — पृष्ठ 1581–1590
महाभारत — खण्ड ५ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1581–1590
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चत्वारिंशदधिकद्विशततमोऽध्यायः योगसे परमात्माकी प्राप्तिका वर्णन व्यास उवाच
पृच्छतस्तव सत्पुत्र यथावदिह तत्त्वतः ।
सांख्यज्ञानेन संयुक्तं यदेतत् कीर्तितं मया ॥ १ ॥
व्यासजी कहते हैं— सत्पुत्र शुक! तुम्हारे प्रश्नके अनुसार मैंने जो यहाँ ज्ञानके विषयका यथार्थ रूपसे तात्त्विक वर्णन किया है, ये सब सांख्यज्ञानसे सम्बन्ध रखनेवाली बातें हैं ॥ १ ॥
योगकृत्यं तु ते कृत्स्नं वर्तयिष्यामि तच्छृणु ।
एकत्वं बुद्धिमनसोरिन्द्रियाणां च सर्वशः ॥ २ ॥
आत्मनो व्यापिनस्तात ज्ञानमेतदनुत्तमम् । अब योगसम्बन्धी सम्पूर्ण कृत्योंका वर्णन आरम्भ करता हूँ, सुनो । तात! इन्द्रिय, मन और बुद्धिकी वृत्तियोंको सब ओरसे रोककर सर्वव्यापी आत्माके साथ उनकी एकता स्थापित करना ही योगशास्त्रियोंके मतमें सर्वोत्तम ज्ञान है ॥ २३ ॥
तदेतदुपशान्तेन दान्तेनाध्यात्मशीलिना ॥ ३ ॥
आत्मारामेण बुद्धेन बोद्धव्यं शुचिकर्मणा । इसे प्राप्त करनेके लिये साधक सब ओरसे मनको हटाकर शाम, दम, आदि साधनोंसे सम्पन्न हो आत्मतत्त्वका चिन्तन करे, एकमात्र परमात्मामें ही रमण करे, ज्ञानवान् पुरुषसे ज्ञान ग्रहण करे एवं शास्त्रविहित पवित्र कर्तव्यकर्मोंका निष्कामभावसे अनुष्ठान करके ज्ञातव्य तत्त्वको जाने ॥ ३३ ॥
योगदोषान् समुच्छिद्य पञ्च यान् कवयो विदुः ॥ ४ ॥
कामं क्रोधं च लोभं च भयं स्वप्नं च पञ्चमम् ।
क्रोधं शमेन जयति कामं संकल्पवर्जनात् ॥ ५ ॥
सत्त्वसंसेवनाद् धीरो निद्रामुच्छेत्तुमर्हति । विद्वानोंने योगके जो काम, क्रोध, लोभ, भय और पाँचवाँ स्वप्न – ये पाँच दोष बताये हैं उनका पूर्णतया उच्छेद करे । इनमेंसे क्रोधको शम ( मनोनिग्रह ) के द्वारा जीते, कामको संकल्पके त्यागद्वारा पराजित करे तथा धीर पुरुष सत्वगुणका सेवन करनेसे निद्राका उच्छेद कर सकता है ॥ ४-५३ ॥ धृत्या शिश्नोदरं रक्षेत् पाणिपादं च चक्षुषा ॥ ६ ॥
चक्षुःश्रोत्रे च मनसा मनोवाचं च कर्मणा ।
अप्रमादाद् भयं जह्याद् दम्भं प्राज्ञोपसेवनात् ॥ ७ ॥
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मनुष्य धैर्यका सहारा लेकर शिश्न और उदरकी रक्षा करे अर्थात् विषयभोग और भोजनकी चिन्ता दूर कर दे । नेत्रोंकी सहायतासे हाथ और पैरोंकी, मनके द्वारा नेत्र और
कानोंकी तथा कर्मके द्वारा मन और वाणीकी रक्षा करे अर्थात् इनको शुद्ध बनावे ।
सावधानीके द्वारा भयका और विद्वान् पुरुषोंके सेवनसे दम्भका त्याग करे ॥ ६-७ ॥
एवमेतान् योगदोषान् जयेन्नित्यमतन्द्रितः ।
अग्नींश्च ब्राह्मणांश्चार्चेद् देवताः प्रणमेत च ॥ ८ ॥
इस प्रकार सदैव सावधानीपूर्वक आलस्य छोड़कर इन योगसम्बन्धी दोषोंको जीतनेका प्रयत्न करना चाहिये । एवं अग्नि और ब्राह्मणोंकी पूजा करनी चाहिये तथा देवताओंको प्रणाम करना चाहिये ॥ ८ ॥
वर्जयेदुशतीं वाचं हिंसायुक्तां मनोनुदाम् ।
ब्रह्म तेजोमयं शुक्रं यस्य सर्वमिदं रसः ॥ ९ ॥
एतस्य भूतं भव्यस्य दृष्टं स्थावरजङ्गमम् । साधकको चाहिये कि मनको पीड़ा देनेवाली हिंसायुक्त वाणीका प्रयोग न करे । तेजोमय निर्मल ब्रह्म सबका बीज ( कारण ) है । यह जो कुछ दिखायी दे रहा है, सब उसीका रस ( कार्य) है । सम्पूर्ण चराचर जगत् उस ब्रह्मके ही ईक्षण ( संकल्प) का परिणाम है ॥ ९ ३ || ध्यानमध्ययनं दानं सत्यं ह्रीरार्जवं क्षमा ॥ १० ॥
शौचमाचार संशुद्धिरिन्द्रियाणां च निग्रहः ।
एतैर्विवर्धते तेजः पाप्मानं चापकर्षति ॥ ११ ॥
ध्यान, वेदाध्ययन, दान, सत्य, लज्जा, सरलता, क्षमा, शौच, आचारशुद्धि एवं इन्द्रियोंका निग्रह–इनके द्वारा तेजकी वृद्धि होती है और पापोंका नाश हो जाता है ॥ १०-११ ॥
सिध्यन्ति चास्य सर्वार्था विज्ञानं च प्रवर्तते ।
समः सर्वेषु भूतेषु लब्धालब्धेन वर्तयन् ॥ १२ ॥
धूतपाप्मा तु तेजस्वी लघ्वाहारो जितेन्द्रियः ।
कामक्रोधौ वशे कृत्वा निनीषेद् ब्रह्मणः पदम् ॥ १३ ॥
इतना ही नहीं, इनसे साधक के सभी मनोरथ सिद्ध होते हैं तथा उसे विज्ञानकी भी प्राप्ति होती है । योगीको चाहिये कि वह सम्पूर्ण प्राणियोंमें समान भाव रक्खे । जो कुछ भी मिले या न मिले, उसीसे संतोषपूर्वक निर्वाह करे । पापोंको धो डाले तथा तेजस्वी, मिताहारी और जितेन्द्रिय होकर काम और क्रोधको वशमें करके ब्रह्मपदको पानेकी इच्छा करे ॥ १२-१३ ॥
मनसश्चेन्द्रियाणां च कृत्वैकाग्र्यं समाहितः ।
पूर्वरात्रापरार्धं च धारयेन्मन आत्मनि ॥ १४ ॥
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योगी मन और इन्द्रियोंको एकाग्र करके रातके पहले और पिछले पहरमें ध्यानस्थ होकर मनको आत्मामें लगावे ॥
जन्तोः पञ्चेन्द्रियस्यास्य यदेकं छिद्रमिन्द्रियम् ।
ततोऽस्य स्रवते प्रज्ञा दृतेः पादादिवोदकम् ॥ १५ ॥
जैसे मशकमें एक जगह भी छेद हो जाय तो वहाँसे पानी बह जाता है, उसी प्रकार पाँच इन्द्रियोंसे युक्त जीवात्माकी एक इन्द्रिय भी यदि छिद्रयुक्त हुई- विषयोंकी ओर प्रवृत्ति हुई तो उसीसे उसकी बुद्धि क्षीण हो जाती है ॥ १५ ॥
मनस्तु पूर्वमादद्यात् कुमीनमिव मत्स्यहा ।
ततः श्रोत्रं ततश्चक्षुर्जिह्वां घ्राणं च योगवित् ॥ १६ ॥
जैसे मछलीमार जाल काटनेवाली दुष्ट मछलीको पहले पकड़ता है, उसी तरह योगवेत्ता साधक पहले अपने मनको वशमें करे । उसके बाद कानका, फिर नेत्रका, तदनन्तर जिह्वा और घ्राण आदिका निग्रह करे ॥
तत एतानि संयम्य मनसि स्थापयेद् यतिः ।
तथैवापोह्य संकल्पान्मनो ह्यात्मनि धारयेत् ॥ १७ ॥
यत्नशील साधक इन पाँचों इन्द्रियोंको वशमें करके मनमें स्थापित करे । इसी प्रकार संकल्पोंका परित्याग करके मनको बुद्धिमें लीन करे ॥ १७ ॥
पञ्चेन्द्रियाणि संधाय मनसि स्थापयेद् यतिः ।
यदैतान्यवतिष्ठन्ति मनःषष्ठान्यथात्मनि ॥ १८ ॥
प्रसीदन्ति च संस्थाय तदा ब्रह्म प्रकाशते । योगी पाँचों इन्द्रियोंको वशमें करके उन्हें दृढ़तापूर्वक मनमें स्थापित करे । जब छठे मनसहित ये इन्द्रियाँ बुद्धिमें स्थिर होकर प्रसन्न (स्वच्छ ) हो जाती हैं, तब उस योगीको ब्रह्मका साक्षात्कार हो जाता है ॥ १८३ ॥
विधूम इव दीप्तार्चिरादित्य इव दीप्तिमान् ॥ १९ ॥
वैद्युतोऽग्निरिवाकाशे दृश्यतेऽऽत्मा तथाऽऽत्मनि । वह योगी अपने अन्तःकरणमें धूमरहित प्रज्वलित अग्नि, दीप्तिमान् सूर्य तथा आकाशमें चमकती हुई बिजलीकी ज्योतिके समान प्रकाशस्वरूप आत्माका दर्शन करता है ॥ १ ९ ३ ॥ सर्वस्तत्र स सर्वत्र व्यापकत्वाच्च दृश्यते ॥ २० ॥
तं पश्यन्ति महात्मानो ब्राह्मणा ये मनीषिणः ।
धृतिमन्तो महाप्राज्ञाः सर्वभूतहिते रताः ॥ २१ ॥
सब उस आत्मामें दृष्टिगोचर होते हैं और व्यापक होनेके कारण वह आत्मा सबमें दिखायी देता है । जो महात्मा ब्राह्मण मनीषी, महाज्ञानी, धैर्यवान् और सम्पूर्ण प्राणियोंके हितमें तत्पर रहनेवाले हैं, वे ही उस परमात्माका दर्शन कर पाते हैं ॥ २०-२१ ॥
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एवं परिमितं कालमाचरन् संशितव्रतः ।
आसीनो हि रहस्येको गच्छेदक्षरसात्मताम् ॥ २२ ॥
जो योगी प्रतिदिन नियत समयतक अकेला एकान्त स्थानमें बैठकर भलीभाँति नियमोंके पालनपूर्वक इस प्रकार योगाभ्यास करता है, वह अक्षर ब्रह्मकी समताको प्राप्त हो जाता है ॥ २२ ॥
प्रमोहो भ्रम आवर्ती घ्राणं श्रवणदर्शने ।
अद्भुतानि रसस्पर्शे शीतोष्णे मारुताकृतिः ॥ २३ ॥
योगसाधनामें अग्रसर होनेपर मोह, भ्रम और आवर्त आदि विघ्न प्राप्त होते हैं । फिर दिव्य सुगन्ध आती है और दिव्य शब्दोंके श्रवण एवं दिव्य रूपोंके दर्शन होते हैं । नाना प्रकारके अद्भुत रस और स्पर्शका अनुभव होता है । इच्छानुकूल सर्दी और गर्मी प्राप्त होती है तथा वायुरूप होकर आकाशमें चलने - फिरनेकी शक्ति आ जाती है ॥
प्रतिभामुपसर्गांश्चाप्युपसंगृह्य योगतः ।
तांस्तत्त्वविदनादृत्य आत्मन्येव निवर्तयेत् ॥ २४ ॥
प्रतिभा बढ़ जाती है । दिव्य भोग अपने आप उपस्थित हो जाते हैं । इन सब सिद्धियोंको योगबलसे प्राप्त करके भी तत्त्ववेत्ता योगी उनका आदर न करे; क्योंकि ये सब योगके विघ्न हैं । अतः मनको उनकी ओरसे लौटाकर आत्मामें ही एकाग्र करे ॥ २४ ॥
कुर्यात् परिचयं योगे त्रैकाल्ये नियतो मुनिः ।
गिरिशृङ्गे तथा चैत्ये वृक्षाग्रेषु च योजयेत् ॥ २५ ॥
नित्य - नियमसे रहकर योगी मुनि किसी पर्वतके शिखरपर किसी देववृक्षके समीप या एकान्त मन्दिरमें अथवा वृक्षोंके सम्मुख बैठकर तीन समय ( सबेरे तथा रातके पहले और पिछले पहरोंमें ) योगका अभ्यास करे ॥
संनियम्येन्द्रियग्रामं कोष्ठे भाण्डमना इव ।
एकाग्रं चिन्तयेन्नित्यं योगान्नोद्वेजयेन्मनः ॥ २६ ॥
द्रव्य चाहनेवाले मनुष्य जैसे सदा द्रव्यसमुदायको कोठेमें बाँध करके रखता है, उसी तरह योगका साधक भी इन्द्रिय- समुदायको संयममें रखकर हृदयकमलमें स्थित नित्य
आत्माका एकाग्रभावसे चिन्तन करे । मनको योगसे उद्विग्न न होने दे ॥ २६ ॥
येनोपायेन शक्येत संनियन्तुं चलं मनः ।
तं च युक्तो निषेवेत न चैव विचलेत् ततः ॥ २७ ॥
जिस उपायसे चंचल मनको रोका जा सके, योगका साधक उसका सेवन करे और उस साधनसे वह कभी विचलित न हो ॥ २७ ॥
शून्या गिरिगुहाश्चैव देवतायतनानि च ।
शून्यागाराणि चैकाग्रो निवासार्थमुपक्रमेत् ॥ २८ ॥
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एकाग्रचित्त योगी पर्वतकी सूनी गुफा, देवमन्दिर तथा एकान्तस्थ शून्य गृहको ही अपने निवासके लिये चुने ॥ नाभिष्वजेत् परं वाचा कर्मणा मनसापि वा उपेक्षको यताहारो लब्धालब्धे समो भवेत् ॥ २ ९ ॥ योगका साधक मन, वाणी या क्रियाद्वारा भी किसी दूसरेमें आसक्त न हो । सबकी ओरसे उपेक्षाका भाव रक्खे । नियमित भोजन करे और लाभ-हानिमें भी समान भाव रक्खे ॥ २ ९ ॥
यश्चेनमभिनन्देत यश्चैनमपवादयेत् ।
समस्तयोश्चाप्युभयोर्नाभिध्यायेच्छुभाशुभम् ॥ ३० ॥
जो उसकी प्रशंसा करे और जो उसकी निन्दा करे, उन दोनोंमें वह समान भाव रक्खे, एककी भलाई या दूसरेकी बुराई न सोचे ॥ ३० ॥
न प्रहृष्येत लाभेषु नालाभेषु च चिन्तयेत् ।
समः सर्वेषु भूतेषु सधर्मा मातरिश्वनः ॥ ३१ ॥
कुछ लाभ होनेपर हर्षसे फूल न उठे और न होनेपर चिन्ता न करे । समस्त प्राणियोंके प्रति समान दृष्टि रखे । वायुके समान सर्वत्र विचरता हुआ भी असंग और अनिकेत रहे ॥ ३१ ॥
एवं स्वस्थात्मनः साधोः सर्वत्र समदर्शिनः ।
षण्मासान्नित्ययुक्तस्य शब्दब्रह्मातिवर्तते ॥ ३२ ॥
इस प्रकार स्वस्थचित्त और सर्वत्र समदर्शी रहकर कर्मफलका उल्लंघन करके छः महीनेतक नित्य योगाभ्यास करनेवाला श्रेष्ठ योगी वेदोक्त परब्रह्म परमात्माका साक्षात्कार कर लेता है ॥ ३२ ॥
वेदनार्ताः प्रजा दृष्ट्वा समलोष्टाश्मकाञ्चनः ।
एतस्मिन् विरतो मार्गे विरमेन्न च मोहितः ॥ ३३ ॥
प्रजाको धनकी प्राप्तिके लिये वेदनासे पीड़ित देख धनकी ओरसे विरक्त हो जाय— मिट्टीके ढेले, पत्थर तथा स्वर्णको समान समझे। विरक्त पुरुष इस योगमार्गसे न तो विरत हो और न मोहमें ही पड़े ॥ ३३ ॥
अपि वर्णावकृष्टस्तु नारी वा धर्मकाङ्क्षिणी ।
तावप्येतेन मार्गेण गच्छेतां परमां गतिम् ॥ ३४ ॥
कोई नीच वर्णका पुरुष और स्त्री ही क्यों न हो, यदि उनके मनमें धर्मसम्पादनकी अभिलाषा है तो इस योगमार्गका सेवन करनेसे उन्हें भी परमगतिकी प्राप्ति हो सकती ॥ ३४ ॥
अजं पुराणमजरं सनातनं यदिन्द्रियैरुपलभेत निश्चलैः ।
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अणोरणीयो महतो महत्तरं तदात्मना पश्यति मुक्तमात्मवान् ॥ ३५ ॥
जिसने अपने मनको वशमें कर लिया है, वही योगी निश्चल मन, बुद्धि और इन्द्रियोंद्वारा जिसकी उपलब्धि होती है, उस अजन्मा, पुरातन, अजर, सनातन, नित्यमुक्त, अणुसे भी अणु और महान्से भी महान् परमात्माका आत्मासे अनुभव करता है ॥ ३५ ॥
इदं महर्षेर्वचनं महात्मनो यथावदुक्तं मनसानुदृश्य च । अवेक्ष्य चेमां परमेष्ठिसाम्यतां प्रयान्ति चाभूतगतिं मनीषिणः ॥ ३६ ॥
महर्षि महात्मा व्यासके यथावद्रूपसे कहे गये इस उपदेशवाक्यपर मन- ही- मन विचार करके एवं इसको भली- भाँति समझकर जो इसके अनुसार आचरण करते हैं, वे मनीषी पुरुष ब्रह्माजीकी समानताको प्राप्त होते हैं और प्रलयकालपर्यन्त ब्रह्मलोकमें ब्रह्माजीके साथ रहकर अन्तमें उन्हींके साथ मुक्त हो जाते हैं ॥ ३६ ॥
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि शुकानुप्रश्ने चत्वारिंशदधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २४० ॥
इसप्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें शुकदेवका अनुप्रश्नविषयक दो सौचालीसवाँअध्याय पूरा हुआ ॥ २४० ॥
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एकचत्वारिंशदधिकद्विशततमोऽध्यायः कर्म और ज्ञानका अन्तर तथा ब्रह्मप्राप्तिके उपायका वर्णन शुक उवाच
यदिदं वेदवचनं कुरु कर्म त्यजेति च ।
कां दिशं विद्यया यान्ति कां च गच्छन्ति कर्मणा ॥ १ ॥
शुकदेवने पूछा- पिताजी! वेदमें ' कर्म करो' और ' कर्म छोड़ो' – ये जो दो प्रकारके वचन मिलते हैं, उनके सम्बन्धमें मैं यह जानना चाहता हूँ कि विद्या ( ज्ञान ) के द्वारा कर्मको त्याग देनेपर मनुष्य किस दिशामें जाते हैं? और कर्म करनेसे उन्हें किस गतिकी प्राप्ति होती है? ॥ १ ॥
एतद् वै श्रोतुमिच्छामि तद् भवान् प्रब्रवीतु मे ।
एतच्चान्योन्यवैरूप्ये वर्तेते प्रतिकूलतः ॥ २ ॥
मैं इस विषयको सुनना चाहता हूँ, आप कृपापूर्वक मुझे यह बतावें । ये दोनों वचन एक दूसरेके विपरीत हैं, अतः प्रतिकूल परिणाम ही उत्पन्न कर सकते हैं ॥ भीष्म उवाच
इत्युक्तः प्रत्युवाचेदं पराशरसुतः सुतम् ।
कर्मविद्यामयावेतौ व्याख्यास्यामि क्षराक्षरौ ॥ ३ ॥
भीष्मजी कहते हैं— राजन्! शुकदेवजीके इस प्रकार पूछनेपर पराशरनन्दन भगवान् व्यासने यों उत्तर दिया- ' बेटा! ये कर्ममय और ज्ञानमय मार्ग क्रमशः विनाशशील और अविनाशी हैं, मैं इनकी व्याख्या आरम्भ करता हूँ ॥ ३ ॥
यां दिशं विद्यया यान्ति यां च गच्छन्ति कर्मणा ।
शृणुष्वैकमना वत्स गह्वरं ह्येतदन्तरम् ॥ ४ ॥
‘ वत्स! ज्ञानसे मनुष्य जिस दिशाको जाते हैं और कर्मद्वारा उन्हें जिस गतिकी प्राप्ति होती है, वह सब बताता हूँ, एकचित्त होकर सुनो । इन दोनोंका अन्तर अत्यन्त गहन है ॥ ४ ॥
अस्ति धर्म इति प्रोक्तं नास्तीत्यत्रैव यो वदेत् ।
तस्य पक्षस्य सदृशमिदं मम भवेद् व्यथा ॥ ५ ॥
‘ धर्म है, ऐसा शास्त्रका उपदेश है, इसके विपरीत यदि कोई कहे कि धर्म नहीं है तो उसे सुनकर एक आस्तिकको जितना कष्ट होता है, उसके पक्षके ही समान यह कर्म और विद्याका तारतम्यविषयक प्रश्न मेरे लिये क्लेशदायक है ॥ ५ ॥
द्वाविमावथ पन्थानौ यत्र वेदाः प्रतिष्ठिताः ।
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प्रवृत्तिलक्षणो धर्मो निवृत्तौ च सुभाषितः ॥ ६ ॥
'प्रवृत्तिलक्षण धर्म और निवृत्तिके उद्देश्यसे प्रतिपादित धर्म, ये दो मार्ग हैं जहाँ वेद प्रतिष्ठित हैं ॥ ६ ॥
कर्मणा बध्यते जन्तुर्विद्यया तु प्रमुच्यते ।
तस्मात् कर्म न कुर्वन्ति यतयः पारदर्शिनः ॥ ७ ॥
‘ सकामकर्मसे मनुष्य बन्धनमें पड़ता है और ज्ञानसे मुक्त हो जाता है, अतः दूरदर्शी यति कर्म नहीं करते हैं ॥ ७ ॥
कर्मणा जायते प्रेत्य मूर्तिमान् षोडशात्मकः ।
विद्यया जायते नित्यमव्यक्तं ह्यव्ययात्मकम् ॥ ८ ॥
‘ कर्म करनेसे मनुष्य मृत्युके पश्चात् सोलह* तत्त्वोंके बने हुए मूर्तिमान् शरीरको धारण करके जन्म लेता है; किन्तु ज्ञानके प्रभावसे जीव नित्य, अव्यक्त, अविनाशी परमात्माको प्राप्त होता है ॥ ८ ॥
कर्म त्वेके प्रशंसन्ति स्वल्पबुद्धिरता नराः ।
तेन ते देहजालानि रमयन्त उपासते ॥ ९ ॥
' अधूरे ज्ञानमें आसक्त अर्थात् इन्द्रियज्ञानको ही ज्ञान माननेवाले कुछ मनुष्य सकामकर्मकी प्रशंसा करते हैं, इसलिये वे भोगासक्त होकर बारंबार विभिन्न शरीरोंमें आनन्द मानकर उनका सेवन करते हैं ॥ ९ ॥
ये स्म बुद्धिं परां प्राप्ता धर्मनैपुण्यदर्शिनः ।
न ते कर्म प्रशंसन्ति कूपं नद्यां पिबन्निव ॥ १० ॥
‘ परंतु जो धर्मके तत्त्वको भलीभाँति समझकर सर्वोत्तम ज्ञान प्राप्त कर चुके हैं, वे कर्मकी उसी तरह प्रशंसा नहीं करते हैं, जैसे प्रतिदिन नदीका पानी पीनेवाले मनुष्य कुएँका आदर नहीं करते हैं ॥ १० ॥
कर्मणः फलमाप्नोति सुखदुःखे भवाभवौ ।
विद्यया तदवाप्नोति यत्र गत्वा न शोचति ॥ ११ ॥
‘ कर्मके फल हैं सुख- दुःख और जन्म- मृत्यु | कर्मद्वारा मनुष्य इन्हींको पाते हैं, परंतु ज्ञानके द्वारा उन्हें उस परमपदकी प्राप्ति होती है, जहाँ जानेसे सदाके लिये शोकसे मुक्त हो जाता है ॥ ११ ॥
यत्र गत्वा न म्रियते यत्र गत्वा न जायते ।
न पुनर्जायते यत्र यत्र गत्वा न वर्तते ॥ १२ ॥
‘ जहाँ जाकर फिर मृत्युका कष्ट नहीं उठाना पड़ता, जहाँ जानेसे फिर जन्म नहीं होता, जहाँ पुनर्जन्मका भय नहीं रहता तथा जहाँ जाकर मनुष्य फिर इस संसारमें नहीं लौटता ॥ १२ ॥
यत्र तद् ब्रह्म परममव्यक्तमचलं ध्रुवम् ।
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अव्याकृतमनायासमव्यक्तं चावियोगि च ॥ १३ ॥
' जहाँ बिना क्लेशके प्राप्त होनेवाले और मिलकर कभी विलग न होनेवाले, अव्यक्त, अचल, नित्य, अनिर्वचनीय तथा विकारशून्य उस परब्रह्म परमात्माका साक्षात्कार हो जाता ॥ १३ ॥
द्वन्द्वैर्न यत्र बाध्यन्ते मानसेन च कर्मणा ।
समाः सर्वत्र मैत्राश्च सर्वभूतहिते रताः ॥ १४ ॥
‘ उस स्थितिको प्राप्त हुए मनुष्योंको सुख- दुःखादि द्वन्द्व, मानसिक संकल्प और कर्म-संस्कार बाधा नहीं पहुँचाते । वहाँ पहुँचे हुए मानव सर्वत्र समानभाव रखते हैं, सबको मित्र मानते हैं और समस्त प्राणियोंके हितमें तत्पर रहते हैं ॥ १४ ॥
विद्यामयोऽन्यः पुरुषस्तात कर्ममयोऽपरः ।
विद्धि चन्द्रमसं दर्शे सूक्ष्मया कलया स्थितम् ॥ १५ ॥
' तात! ज्ञानी मनुष्य कुछ और ही होता है, कर्मासक्त मनुष्य उससे सर्वथा भिन्न है । जैसे चन्द्रमा घटते-घटते अमावास्याको एक सूक्ष्म कलाके रूपमें ही शेष रह जाता है, यही अवस्था तुम कर्मासक्त मनुष्योंकी भी समझो- उसे क्षय और वृद्धिके ही चक्करमें पड़े रहना पड़ता है ॥ १५ ॥
तदेतदृषिणा प्रोक्तं विस्तरेणानुमीयते ।
नवजं शशिनं दृष्ट्वा वक्रतन्तुमिवाम्बरे ॥ १६ ॥
'इस बातको एक मन्त्रद्रष्टा ऋषिने विस्तारके साथ बताया है । अमावास्याके बाद आकाशमें एक टेढ़े और पतले सूतके समान प्रतीत होनेवाले नवोदित चन्द्रमाको देखकर ऐसा ही अनुमान किया जाता है ॥ १६ ॥
एकादशविकारात्मा कलासम्भारसम्भृतः ।
मूर्तिमानिति तं विद्धि तात कर्मगुणात्मकम् ॥ १७ ॥
‘ कर्मजन्य कलाओंके भारको धारण करनेवाला कर्मासक्त मनुष्य मन और इन्द्रियरूप ग्यारह विकारोंसे युक्त होकर जन्म धारण किया करता है । इस प्रकार वह मूर्तिमान् ( देहधारी ) व्यक्ति होता है। तुम उसे कर्मफलसम्भूत त्रिगुणात्मक शरीरसे युक्त तथा चन्द्रमाके समान वृद्धि और ह्रासका भागी होनेवाला समझो ॥ १७ ॥
देवो यः संश्रितस्तस्मिन्नब्बिन्दुरिव पुष्करे ।
क्षेत्रज्ञं तं विजानीयान्नित्यं योगजितात्मकम् ॥ १८ ॥
‘ प्राणियोंके अन्तःकरण ( हृदयाकाश ) में जो स्वयम्प्रकाश चिन्मय देवता कमलके पत्तेपर पड़ी हुई पानीकी बूँदके समान निर्लेपभावसे विराजमान है तथा जिसने योगके द्वारा चित्तको वशमें किया है, उस आत्मतत्त्वको तुम सदैव क्षेत्रज्ञ समझो ॥ १८ ॥
तमो रजश्च सत्वं च विद्धि जीवगुणात्मकम् ।
जीवमात्मगुणं विद्यादात्मानं परमात्मनः ॥ १९ ॥
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'तमोगुण, रजोगुण और सत्वगुण- इन तीनोंको बुद्धिका गुण समझो, इनके सम्बन्धसे जीव गुणस्वरूप और गुण जीवस्वरूप प्रतीत होने लगते हैं । अतः वास्तवमें जीवात्मा परमात्माका ही अंश है, ऐसा समझो ॥ १ ९ ॥ सचेतनं जीवगुणं वदन्ति स चेष्टते जीवयते च सर्वम् । ततः परं क्षेत्रविदो वदन्ति प्राकल्पयद् यो भुवनानि सप्त ॥ २० ॥
‘ शरीर स्वयं तो अचेतन ( जड ) है, परंतु चेतनसे युक्त होनेसे उसे जीवात्माके गुण चैतन्यसे युक्त कहा जाता है । जीवात्मा ही शरीरके द्वारा चेष्टा करता है और वही समस्त शरीरको जीवन ( चेतना ) प्रदान करता है, परंतु जिस परमात्माने सातों भुवनोंकी सृष्टि की है, उसे क्षेत्रवेत्ता विद्वान् उस जीवात्मासे भी श्रेष्ठ बताते हैं ॥ २० ॥
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि शुकानुप्रश्ने एकचत्वारिंशदधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २४१ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें शुकदेवका अनुप्रश्नविषयक दो सौइकतालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २४१ ॥
* पाँच इन्द्रियाँ, पाँच इन्द्रियोंके विषय, स्वभाव ( शीतोष्णादि धर्म), चेतना (ज्ञानशक्ति), मन, प्राण, अपान और जीव— ये सोलह तत्त्व पूर्वमें २३ ९ वें अध्यायके १३ वें श्लोकमें बतला चुके हैं ।