श्रीगणेशाय नमः।
महाभारत — खण्ड ५ — पृष्ठ 1651–1660
महाभारत — खण्ड ५ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1651–1660
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षट्पञ्चाशदधिकद्विशततमोऽध्यायः युधिष्ठिरका मृत्युविषयक प्रश्न, नारदजीका राजा अकम्पनसे मृत्युकी उत्पत्तिका प्रसंग सुनाते हुए ब्रह्माजीकी रोषाग्निसे प्रजाके दग्ध होनेका वर्णन युधिष्ठिरउवाच
य इमे पृथिवीपालाः शेरते पृथिवीतले ।
पृतनामध्य एते हि गतसंज्ञा महाबलाः ॥ १ ॥
युधिष्ठिरने पूछा- पितामह! ये जो असंख्य भूपाल ( प्राणशून्य होकर ) इस भूतलपर सेनाके बीचमें सो रहे हैं इनकी ओर दृष्टिपात कीजिये । ये महान् बलवान् थे तो भी संज्ञाहीन होकर पड़े हैं ॥ १ ॥
एकैकशो भीमबला नागायुतबलास्तथा ।
एते हि निहताः संख्ये तुल्यतेजोबलैर्नरैः ॥ २ ॥
इनमेंसे एक- एक नरेश भयानक बलसे सम्पन्न था । दस - दस हजार हाथियोंकी शक्ति रखता था । वे सब - के - सब इस युद्धस्थलमें अपने समान ही तेजस्वी और बलवान् मनुष्योंद्वारा मारे गये हैं ॥ २ ॥
नैषां पश्यामि हन्तारं प्राणिनां संयुगे परम् ।
विक्रमेणोपसम्पन्नास्तेजोबलसमन्विताः ॥ ३ ॥
इन प्राणशक्ति- सम्पन्न नरेशोंको कोई दूसरा वीर संग्रामभूमिमें मार सके – ऐसा मुझे नहीं दिखायी देता था; क्योंकि वे सब - के - सब बल- पराक्रमसे सम्पन्न और तेजस्वी थे ॥ ३ ॥
अथ चेमे महाप्राज्ञाः शेरते हि गतासवः ।
मृता इति च शब्दोऽयं वर्तत्येषु गतासुषु ॥। ४ ॥
किंतु इस समय ये महाबुद्धिमान् भूपाल निष्प्राण होकर पड़े हैं । इनके प्राण निकल जानेपर इनके लिये मृत शब्दका व्यवहार होता है; अर्थात् ' ये मर गये ' ऐसा कहा जाता है ॥ ४ ॥
इमे मृता नृपतयः प्रायशो भीमविक्रमाः ।
तत्र मे संशयो जातः कुतः संज्ञा मृता इति ॥ ५ ॥
कस्य मृत्युः कुतो मृत्युः केन मृत्युरिह प्रजाः ।
हरत्यमरसंकाश तन्मे ब्रूहि पितामह ॥ ६ ॥
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ये जो नरेश मृत्युको प्राप्त हो गये हैं, इनमें बहुत - से भयानक पराक्रमसे सम्पन्न हैं । यहाँ मेरे मनमें यह संदेह होता है कि इन्हें मृत नाम कैसे दिया गया? किसकी मृत्यु होती है? किससे मृत्यु होती है? और किस कारणसे मृत्यु यहाँ समस्त प्राणियोंका अपहरण करती है? देवतुल्य पितामह! मुझे यह सब बतानेकी कृपा करें ॥ ५-६ ॥ भीष्म उवाच
पुरा कृतयुगे तात राजा ह्यासीदकम्पनः ।
स शत्रुवशमापन्नः संग्रामे क्षीणवाहनः ॥ ७ ॥
भीष्मजीने कहा – तात! प्राचीन सत्ययुगकी बात है, अकम्पन नामके एक राजा थे ।
एक समय संग्राममें उनका रथ नष्ट हो गया और वे शत्रुके वशमें पड़ गये ॥ ७ ॥
तस्य पुत्रो हरिर्नाम नारायणसमो बले ।
स शत्रुभिर्हतः संख्ये सबलः सपदानुगः ॥ ८ ॥
उनके एक पुत्र था, जिसका नाम था हरि । वह बलमें भगवान् नारायणके ही समान जान पड़ता था, परंतु उस समराङ्गणमें शत्रुओंने सेना और सेवकोंसहित उस राजकुमारको मार गिराया ॥ ८ ॥
स राजा शत्रुवशगः पुत्रशोकसमन्वितः ।
यदृच्छया शान्तिपरो ददर्श भुवि नारदम् ॥ ९ ॥
राजा अकम्पन स्वतन्त्र भूपाल न रहकर शत्रुके अधीन हो गये तथा पुत्रके शोकमें डूबे रहने लगे । वे शान्तिका उपाय ढूँढ़ रहे थे । इतनेहीमें दैवेच्छासे भूतलपर विचरते हुए देवर्षि नारदका उन्हें दर्शन हुआ ॥ ९ ॥
तस्मै स सर्वमाचष्ट यथावृत्तं जनेश्वरः ।
शत्रुभिर्ग्रहणं संख्ये पुत्रस्य मरणं तथा ॥ १० ॥
राजाने युद्धस्थलमें शत्रुओंद्वारा अपने पकड़े जाने एवं पुत्रकी मृत्यु होनेका सारा समाचार यथावत् रूपसे नारदजीके सामने कह सुनाया ॥ १० ॥
तस्य तद् वचनं श्रुत्वा नारदोऽथ तपोधनः ।
आख्यानमिदमाचष्ट पुत्रशोकापहं तदा ॥ ११ ॥
राजाका वह कथन सुनकर तपस्याके धनी नारदजीने उस समय उनसे यह प्राचीन इतिहास कहना आरम्भ किया, जो उनके पुत्रशोकको मिटानेवाला था ॥ ११ ॥
नारद उवाच
राजन् शृणु समाख्यानमद्येदं बहुविस्तरम् ।
यथावृत्तं श्रुतं चैव मयेदं वसुधाधिप ॥ १२ ॥
- नारदजी बोले – राजन्! आज यह अत्यन्त विस्तृत आख्यान सुनो । पृथ्वीनाथ! मैंने इसे जैसा सुना है, वह यथावत् वृत्तान्त तुम्हें सुना रहा हूँ ॥ १२ ॥
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प्रजाः सृष्ट्वा महातेजाः प्रजासर्गे पितामहः ।
अतीव वृद्धा बहुला नामृष्यत पुनः प्रजाः ॥ १३ ॥
प्रजाकी सृष्टि करते समय महातेजस्वी पितामह ब्रह्माने जब बहुत - से प्राणियोंकी सृष्टि कर डाली, तब उनकी संख्या बहुत अधिक हो गयी। इतनी अधिक प्रजाओंका होना ब्रह्माजीसे सहन न हो सका ॥ १३ ॥
न ह्यन्तरमभूत् किञ्चित् क्वचिज्जन्तुभिरच्युत ।
निरुच्छ्वासमिवोन्नद्धं त्रैलोक्यमभवन्नृप ॥ १४ ॥
अपने धर्मसे कभी च्युत न होनेवाले नरेश! उस समय कहीं कोई थोड़ा -सा भी ऐसा
स्थान नहीं रह गया, जो जीव- जन्तुओंसे भरा न हो । सारी त्रिलोकी अवरुद्ध हो गयी ।
लोगोंका कहीं साँस लेना भी असम्भव- सा हो गया - सबका दम घुटने लगा ॥ १४ ॥
तस्य चिन्ता समुत्पन्ना संहारं प्रति भूपते ।
चिन्तयन् नाध्यगच्छच्च संहारे हेतुकारणम् ॥ १५ ॥
भूपाल! अब ब्रह्माजीके मनमें प्रजाके संहारकी— उनकी संख्या घटानेकी चिन्ता उत्पन्न हुई । वे बहुत देरतक सोचते-विचारते रहे, परंतु प्रजाके संहारका कोई युक्तियुक्त कारण ध्यानमें नहीं आया ॥ १५ ॥
तस्य रोषान्महाराज खेभ्योऽग्निरुदतिष्ठत ।
तेन सर्वा दिशो राजन् ददाह स पितामहः ॥ १६ ॥
महाराज! उस समय रोषवश ब्रह्माजीके नेत्र आदि इन्द्रियगोलकोंसे अग्नि प्रकट हो गयी । राजन्! उस अग्निसे पितामहने सम्पूर्ण दिशाओंको दग्ध करना आरम्भ किया ॥ १६ ॥
ततो दिवं भुवं खं च जगच्च सचराचरम् ।
ददाह पावको राजन् भगवत्कोपसम्भवः ॥ १७ ॥
राजन्! तब भगवान् ब्रह्माके क्रोधसे प्रकट हुई वह आग स्वर्ग, पृथ्वी, अन्तरिक्ष तथा चराचर प्राणियोंसहित सम्पूर्ण जगत्को जलाने लगी ॥ १७ ॥
तत्रादह्यन्त भूतानि जङ्गमानि ध्रुवाणि च ।
महता क्रोधवेगेन कुपिते प्रपितामहे ॥ १८ ॥
प्रपितामह ब्रह्माके कुपित होनेपर उनके क्रोधके महान् वेगसे सभी स्थावर- जङ्गम प्राणी दन्ध होने लगे ॥
ततोऽध्वरजट: स्थाणुर्वेदाध्वरपतिः शिवः ।
जगाम शरणं देवो ब्रह्माणं परवीरहा ॥ १ ९ ॥
तब यज्ञ ही जिनकी जटाएँ हैं तथा जो वेदों और यज्ञोंके प्रतिपालक हैं, वे शत्रुवीरोंका संहार करनेवाले कल्याणकारी भगवान् शिव ब्रह्माजीकी शरणमें गये ॥ १ ९ ॥ तस्मिन्नभिगते स्थाणौ प्रजानां हितकाम्यया ।
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अब्रवीत् परमो देवो ज्वलन्निव तदा शिवम् ॥ २० ॥
प्रजावर्गके हितकी इच्छासे महादेवजीके अपने सामने आनेपर तेजसे जलते हुए- से परमदेव ब्रह्माजी उनसे इस प्रकार बोले- ॥ २० ॥
करवाण्यद्य कं कामं वरार्होऽसि मतो मम ।
कर्ता ह्यस्मि प्रियं शम्भो तव यद् हृदि वर्तते ॥ २१ ॥
‘ शम्भो! मैं तुम्हें वर पानेके योग्य समझता हूँ, बोलो, आज तुम्हारी कौन - सी इच्छा पूर्ण करूँ? तुम्हारे हृदयमें जो भी प्रिय मनोरथ हो, उसे मैं पूर्ण करूँगा' ॥ २१ ॥
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि मृत्युप्रजापतिसंवादोपक्रमे षट्पञ्चाशदधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २५६ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें मृत्यु और प्रजापतिके संवादका उपक्रमविषयक दो सौ छप्पनवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २५६ ॥
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सप्तपञ्चाशदधिकद्विशततमोऽध्यायः महादेवजीकी प्रार्थनासे ब्रह्माजीके द्वारा अपनी रोषाग्निका उपसंहार तथा मृत्युकी उत्पत्ति स्थाणुरुवाच
प्रजासर्गनिमित्तं मे कार्यवत्तामिमां प्रभो ।
विद्धि सृष्टास्त्वया हीमा मा कुप्यासां पितामह ॥ १ ॥
महादेवजीने कहा – प्रभो! पितामह! मेरा मनोरथ या प्रयोजन आपसे प्रजासर्गकी रक्षाके लिये प्रार्थना करना है । आप इस बातको जान लें । आपहीने इन प्रजाओंकी सृष्टि की है; अतः आप इनपर क्रोध न कीजिये ॥ १ ॥
तव तेजोऽग्निना देव प्रजा दह्यन्ति सर्वशः ।
ता दृष्ट्वा मम कारुण्यं मा कुप्यासां जगत्प्रभो ॥ २ ॥
देव! जगदीश्वर! आज आपकी क्रोधाग्निसे सारी प्रजाएँ दग्ध हो रही हैं । उन्हें उस अवस्थामें देखकर मुझे दया आती है, आप उनपर क्रोध न करें ॥ २ ॥
प्रजापतिरुवाच
कुप्येन च मे कामो न भवेयुः प्रजा इति ।
लाघवार्थं धरण्यास्तु ततः संहार इष्यते ॥ ३ ॥
प्रजापति ब्रह्माजी बोले- शिव! मैं प्रजापर कुपित नहीं हूँ और न मेरी यही इच्छा है कि प्रजाओंका विनाश हो जाय । पृथ्वीका भार हल्का करनेके लिये ही प्रजाके संहारकी आवश्यकता प्रतीत हुई है ॥ ३ ॥
इयं हि मां सदा देवी भारार्ता समचोदयत् ।
संहारार्थं महादेव भारेणाप्सु निमज्जति ॥ ४ ॥
महादेव! यह पृथ्वीदेवी भारी भारसे पीड़ित हो सदा मुझे प्रजाके संहारके लिये प्रेरित करती रही है; क्योंकि यह जगत्के भारसे समुद्रमें डुबी जा रही है ॥
यदाहं नाधिगच्छामि बुद्धया बहु विचारयन् ।
संहारमासां वृद्धानां ततो मां क्रोध आविशत् ॥ ५ ॥
जब बहुत विचार करनेपर भी मुझे इन बढ़ी हुई प्रजाओंके संहारका कोई उपाय न सूझा, तब मुझे क्रोध आ गया ॥ ५ ॥
स्थाणुरुवाच
संहारार्थं प्रसीदस्व मा क्रुधो विबुधेश्वर ।
मा प्रजाः स्थावरं चैव जङ्गमं च व्यनीनशत् ॥ ६ ॥
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महादेवजीने कहा— देवेश्वर! संहारके लिये आप क्रोध न करें । प्रजापर प्रसन्न हों ।
कहीं ऐसा न हो कि समस्त चराचर प्राणियोंका विनाश हो जाय ॥ ६ ॥
पल्वलानि च सर्वाणि सर्वं चैव तृणोपलम् ।
स्थावरं जङ्गमं चैव भूतग्रामं चतुर्विधम् ॥ ७ ॥
तदेतद् भस्मसाद्भूतं जगत् सर्वमुपप्लुतम् ।
प्रसीद भगवन् साधो वर एष वृतो मया ॥ ८ ॥
ये सारे जलाशय, सब - के - सब घास और लता - बेलें तथा चार प्रकारके प्राणिसमुदाय ( स्वेदज, अण्डज, उद्भिज्ज, जरायुज) भस्मीभूत हो रहे हैं । सारे जगत्का प्रलय उपस्थित
हो गया है । भगवन्! प्रसन्न होइये । साधो! मैं आपसे यही वर माँगता हूँ ॥ ७-८ ॥
नष्टा न पुनरेष्यन्ति प्रजा ह्येताः कथंचन ।
तस्मान्निवर्ततामेतत् तेन स्वेनैव तेजसा ॥ ९ ॥
यदि इन प्रजाओंका नाश हो गया तो ये किसी तरह फिर यहाँ उपस्थित न हो सकेंगी ।
इसलिये आप अपने ही प्रभावसे इस क्रोधाग्निको निवृत्त कीजिये ॥ ९ ॥
उपायमन्यं सम्पश्य भूतानां हितकाम्यया ।
यथामी जन्तवः सर्वे न दह्येरन् पितामह ॥ १० ॥
पितामह! आप सम्पूर्ण प्राणियोंके हितके लिये संहारका कोई दूसरा ही उपाय सोचिये, जिससे ये सारे जीव - जन्तु एक साथ ही दन्ध न हो जायँ ॥ १० ॥
अभावं हि न गच्छेयुरुच्छिन्नप्रजनाः प्रजाः ।
अधिदैवे नियुक्तोऽस्मि त्वया लोकेश्वरेश्वर ॥ ११ ॥
लोकेश्वरेश्वर! आपने मुझे देवताओंके आधिपत्य- पदपर नियुक्त किया है, अतः मैं आपसे प्रार्थना करता हूँ, यदि प्रजाकी संततिका उच्छेद होगा तो समस्त प्रजाओंका सर्वथा अभाव ही हो जायगा; अतः आप इस विनाशको बंद कीजिये ॥ ११ ॥
त्वद्भवं हि जगन्नाथ एतत् स्थावरजङ्गमम् ।
प्रसाद्य त्वां महादेव याचाम्यावृत्तिजाः प्रजाः ॥ १२ ॥
जगन्नाथ! महादेव! यह समस्त चराचर जगत् आपसे ही उत्पन्न हुआ है; अतः मैं आपको प्रसन्न करके यह याचना करता हूँ कि ये सारी प्रजा पुनरावर्तनशील हो— मरकर पुनः जन्म धारण करे ॥ १२ ॥
नारद उवाच
श्रुत्वा तु वचनं देवः स्थाणोर्नियतवाङ्मनाः ।
तेजस्तत् संनिजग्राह पुनरेवान्तरात्मनि ॥ १३ ॥
नारदजी कहते हैं — राजन्! महादेवजीकी वह बात सुनकर भगवान् ब्रह्माने मन और वाणीका संयम किया तथा उस अग्निको पुनः अपनी अन्तरात्मामें ही लीन कर
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लिया ॥ १३ ॥
ततोऽग्निमुपसंगृह्य भगवाँल्लोकपूजितः ।
प्रवृत्तिं च निवृत्तिं च कल्पयामास वै प्रभुः ॥ १४ ॥
तब लोकपूजित भगवान् ब्रह्माने उस अग्निका उपसंहार करके प्रजाके लिये जन्म और मृत्युकी व्यवस्था की ॥ १४ ॥
उपसंहरतस्तस्य तमग्निं रोषजं तदा ।
प्रादुर्बभूव विश्वेभ्यः खेभ्यो नारी महात्मनः ॥ १५ ॥
उस क्रोधाग्निका उपसंहार करते समय महात्मा ब्रह्माजीकी सम्पूर्ण इन्द्रियोंसे एक मूर्ति नारी प्रकट हुई ॥ १५ ॥
कृष्णरक्ताम्बरधरा कृष्णनेत्रतलान्तरा ।
दिव्यकुण्डलसम्पन्ना दिव्याभरणभूषिता ॥ १६ ॥
उसके वस्त्र काले और लाल थे । आँखोंके निम्न और आभ्यन्तर प्रदेश भी काले रंगके ही थे । वह दिव्य कुण्डलोंसे कान्तिमती तथा अलौकिक आभूषणोंसे विभूषित थी ॥ १६ ॥
सा विनिःसृत्य वै खेभ्यो दक्षिणामाश्रिता दिशम् ।
ददृशाते च तां कन्यां देवौ विश्वेश्वरावुभौ ॥ १७ ॥
वह ब्रह्माजीके इन्द्रियछिद्रोंसे निकलकर दक्षिण दिशाकी ओर चल दी । उस समय उन दोनों जगदीश्वरों ( ब्रह्मा और शिव ) ने उस कन्याको देखा ॥ १७ ॥
तामाहूय तदा देवो लोकानामादिरीश्वरः ।
मृत्यो इति महीपाल जहि चेमाः प्रजा इति ॥ १८ ॥
भूपाल! तब लोकोंके आदिकारण भगवान् ब्रह्माने उसे ' मृत्यु ' कहकर पुकारा और निकट बुलाकर कहा — ' तुम इन प्रजाओंका समय- समयपर विनाश करती रहो ॥ १८ ॥
त्वं हि संहारबुद्धया मे चिन्तिता रुषितेन च ।
तस्मात् संहर सर्वांस्त्वं प्रजाः सजडपण्डिताः ॥ १ ९ ॥
' मैंने प्रजाके संहारकी भावनासे रोषमें भरकर तुम्हारा चिन्तन किया था; इसलिये तुम मूढ़ और विद्वानोंसहित सम्पूर्ण प्रजाओंका संहार करो ॥ १ ९ ॥
अविशेषेण चैव त्वं प्रजाः संहर कामिनि ।
मम त्वं हि नियोगेन श्रेयः परमवाप्स्यसि ॥ २० ॥
कामिनि! तुम मेरे आदेशसे सामान्यतः सारी प्रजाका संहार करो । इससे तुम्हें परम कल्याणकी प्राप्ति होगी ' ॥ २० ॥
एवमुक्ता तु सा देवी मृत्युः कमलमालिनी ।
प्रदध्यौ दुःखिता बाला साश्रुपातमतीव च ॥ २१ ॥
ब्रह्माजीके ऐसा कहनेपर कमलोंकी मालासे अलंकृत नवयौवना मृत्यु देवी नेत्रोंसे आँसू बहाती हुई दुखी हो बड़ी चिन्तामें पड़ गयी ॥ २१ ॥
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पाणिभ्यां चैव जग्राह तान्यश्रूणि जनेश्वरः ।
मानवानां हितार्थाय ययाचे पुनरेव ह ॥ २२ ॥
तब जनेश्वर ब्रह्माजीने मानवोंके हितके लिये अपने दोनों हाथोंमें मृत्युके आँसू ले लिये । र मृत्युने उनसे इस प्रकार प्रार्थना की ॥ २२ ॥
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि मृत्युप्रजापतिसंवादे सप्तपञ्चाशदधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २५७ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें मृत्यु और प्रजापतिका संवादविषयक दो सौ सत्तावनवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २५७ ॥
Face
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अष्टपञ्चाशदधिकद्विशततमोऽध्यायः मृत्युकी घोर तपस्या और प्रजापतिकी आज्ञासे उसका प्राणियोंके संहारका कार्य स्वीकार करना नारद उवाच
विनीय दुःखमबला साऽऽत्मनैवायतेक्षणा ।
उवाच प्राञ्जलिर्भूत्वा लतेवावर्जिता तदा ॥ १ ॥
नारदजी कहते हैं— राजन्! तदनन्तर वह विशाल नेत्रोंवाली अबला स्वयं ही उस दुःखको दूर हटाकर झुकायी हुई लताके समान विनम्र हो हाथ जोड़कर ब्रह्माजीसे बोली - - ॥ १ ॥
त्वया सृष्टा कथं नारी मादृशी वदतां वर ।
रौद्रकर्माभिजायेत सर्वप्राणिभयङ्करी ॥ २ ॥
‘ वक्ताओंमें श्रेष्ठ प्रजापते! ( यदि मुझसे क्रूर कर्म ही कराना था तो ) आपने मुझ - जैसी कोमलहृदया नारीको क्यों उत्पन्न किया? क्या मुझ जैसी स्त्री समस्त प्राणियोंके लिये भयंकर तथा क्रूरतापूर्ण कर्म करनेवाली हो सकती है? ॥ २ ॥
बिभेम्यहमधर्मस्य धर्म्यमादिश कर्म मे ।
त्वं मां भीतामवेक्षस्व शिवेनेक्षस्व चक्षुषा ॥ ३ ॥
‘ भगवन्! मैं अधर्मसे बहुत डरती हूँ। आप मुझे धर्मानुकूल कार्य करनेकी आज्ञा दें ।
मुझ भयभीत अबलापर दृष्टिपात करें और कल्याणमयी दृष्टिसे मेरी ओर देखें ॥ ३ ॥
बालान् वृद्धान् वयस्थांश्च न हरेयमनागसः ।
प्राणिनः प्राणिनामीश नमस्तेऽस्तु प्रसीद मे ॥ ४ ॥
‘ समस्त प्राणियोंके अधीश्वर! मैं निरपराध बाल, वृद्ध और तरुण प्राणियोंके प्राण नहीं लूँगी । आपको नमस्कार है, आप मुझपर प्रसन्न हों ॥ ४ ॥
प्रियान् पुत्रान् वयस्यांश्च भ्रातॄन् मातृः पितॄनपि ।
अपध्यास्यन्ति यद्येवं मृतास्तेषां बिभेम्यहम् ॥ ५ ॥
‘ जब मैं लोगोंके प्यारे पुत्रों, मित्रों, भाइयों, माताओं तथा पिताओंको मारने लगूँगी, तब उनके सम्बन्धी उनके इस प्रकार मारे जानेके कारण मेरा अनिष्ट - चिन्तन करेंगे; अतः मैं उन लोगोंसे बहुत डरती हूँ ॥ ५ ॥
कृपणाश्रुपरिक्लेदो दहेन्मां शाश्वतीः समाः ।
तेभ्योऽहं बलवद् भीता शरणं त्वामुपागता ॥ ६ ॥
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'उन दीन- दुखियोंके नेत्रोंसे जो आँसू बहकर उनके कपोलों और वक्षःस्थलको भिगो देगा, वह मुझे सदा अनन्त वर्षोंतक जलाता रहेगा । मैं उनसे बहुत डरी हुई हूँ, इसलिये आपकी शरणमें आयी हूँ ॥ ६ ॥
यमस्य भवने देव पात्यन्ते पापकर्मिणः ।
प्रसादये त्वां वरद प्रसादं कुरु मे प्रभो ॥ ७ ॥
‘ वरदायक प्रभो! देव! सुना है कि पापाचारी प्राणी यमराजके लोकमें गिराये जाते हैं, अतः आपसे प्रसन्न होनेके लिये प्रार्थना करती हूँ, आप मुझपर कृपा कीजिये ॥
एतदिच्छाम्यहं कामं त्वत्तो लोकपितामह ।
इच्छेयं त्वत्प्रसादार्थं तपस्तप्तुं महेश्वर ॥ ८ ॥
' लोकपितामह! महेश्वर! मैं आपसे अपनी एक अभिलाषाकी पूर्ति चाहती हूँ । मेरी इच्छा है कि मैं आपकी प्रसन्नताके लिये कहीं जाकर तप करूँ' ॥ ८ ॥
पितामह उवाच
मृत्यो संकल्पिता मे त्वं प्रजासंहारहेतुना ।
गच्छ संहर सर्वास्त्वं प्रजा मा च विचारय ॥ ९ ॥
ब्रह्माजीने कहा — मृत्यो! प्रजाके संहारके लिये ही मैंने संकल्पपूर्वक तुम्हारी सृष्टि की
है । जाओ, सारी प्रजाका संहार करो । इसके लिये मनमें कोई विचार न करो ॥ ९ ॥
एतदेवमवश्यं हि भविता नैतदन्यथा ।
क्रियतामनवद्याङ्गि यथोक्तं मद्वचोऽनघे ॥ १० ॥
यह बात अवश्य ही इसी प्रकार होनेवाली है । इसमें कोई परिवर्तन नहीं हो सकता । निर्दोष अंगोंवाली देवि! मैंने जो बात कही है, उसका पालन करो । इससे तुम्हें पाप नहीं लगेगा ॥ १० ॥
एवमुक्ता महाबाहो मृत्युः परपुरंजय ।
न व्याजहार तस्थौ च प्रह्वा भगवदुन्मुखी ॥ ११ ॥
महाबाहो! शत्रुनगरीपर विजय पानेवाले नरेश! ब्रह्माजीके ऐसा कहनेपर मृत्यु उन्हींकी ओर मुँह करके हाथ जोड़े खड़ी रह गयी- कुछ बोल न सकी ॥ ११ ॥
पुनः पुनरथोक्ता सा गतसत्त्वेव भामिनी ।
तूष्णीमासीत् ततो देवो देवानामीश्वरेश्वरः ॥ १२ ॥
प्रससाद किल ब्रह्मा स्वयमेवात्मनाऽऽत्मनि ।
स्मयमानश्च लोकेशो लोकान् सर्वानवैक्षत ॥ १३ ॥
उनके बारंबार कहनेपर वह मानिनी नारी निष्प्राण -सी होकर मौन रह गयी । ' हाँ' या 'ना' कुछ भी न बोल सकी । तदनन्तर देवताओंके भी देवता और ईश्वरोंके भी ईश्वर