श्रीगणेशाय नमः।

महाभारत — खण्ड ५ — पृष्ठ 1661–1670

महाभारत — खण्ड ५ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1661–1670

पृष्ठ 1661

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लोकनाथ ब्रह्माजी स्वयं ही अपने मनमें बड़े प्रसन्न हुए और मुसकराते हुए समस्त लोकोंकी ओर देखने लगे ॥

निवृत्तरोषे तस्मिंस्तु भगवत्यपराजिते ।

सा कन्याथ जगामास्य समीपादिति नः श्रुतम् ॥ १४ ॥

उन अपराजित भगवान् ब्रह्माका रोष निवृत्त हो जानेपर वह कन्या भी उनके निकटसे चली गयी, ऐसा हमने सुना है ॥ १४ ॥

अपसृत्याप्रतिश्रुत्य प्रजासंहरणं तदा ।

त्वरमाणेव राजेन्द्र मृत्युर्धेनुकमभ्यगात् ॥ १५ ॥

राजेन्द्र! उस समय प्रजाका संहार करनेके विषयमें कोई प्रतिज्ञा न करके मृत्यु वहाँसे हट गयी और बड़ी उतावलीके साथ धेनुकाश्रममें जा पहुँची ॥ १५ ॥

सा तत्र परमं देवी तपोऽचरद् दुश्चरम् ।

समा ह्येकपदे तस्थौ दश पद्मानि पञ्च च ॥ १६ ॥

वहाँ मृत्युदेवीने अत्यन्त दुष्कर और उत्तम तपस्या की । वह पंद्रह पद्म वर्षोंतक एक पैरपर खड़ी रही ॥

तां तथा कुर्वतीं तत्र तपः परमदुश्चरम् ।

पुनरेव महातेजा ब्रह्मा वचनमब्रवीत् ॥ १७ ॥

इस प्रकार वहाँ अत्यन्त दुष्कर तपस्या करती हुई मृत्युसे महातेजस्वी ब्रह्माजीने पुनः जाकर इस प्रकार कहा- ॥

कुरुष्व मे वचो मृ॒त्यो तदनादृत्य सत्वरा ।

तथैवैकपदे तात पुनरन्यानि सप्त सा ॥ १८ ॥

तस्थौ पद्मानि षट् चैव पञ्च द्वे चैव मानद । 'मृत्यो! तुम मेरी आज्ञाका पालन करो । ' दूसरोंको मान देनेवाले तात! उनके इस कथनका आदर न करके मृत्युने तुरंत ही दूसरे बीस पद्म वर्षोंतक पुनः एक पैरपर खड़ी हो तपस्या आरम्भ कर दी ॥ १८३ ॥

भूयः पद्मायुतं तात मृगैः सह चचार सा ॥ १ ९ ॥ द्वे चायुते नरश्रेष्ठ वाय्वाहारा महामते ।

तात! महामते! नरश्रेष्ठ! फिर वह दस हजार पद्म वर्षोंतक मृगोंके साथ विचरती रही ।

इसके बाद बीस हजार वर्षोंतक उसने केवल वायुका आहार किया ॥ १ ९ ३ ॥

पुनरेव ततो राजन् मौनमातिष्ठदुत्तमम् ॥ २० ॥

अप्सु वर्षसहस्राणि सप्त चैकं च पार्थिव । राजन्! तदनन्तर उसने उत्तम मौन व्रत धारण कर लिया । पृथ्वीपते! फिर उसने जलमें आठ हजार वर्षोंतक रहकर तपस्या की ॥ २०६३ ॥

ततो जगाम सा कन्या कौशिकीं नृपसत्तम ॥ २१ ॥

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तत्र वायुजलाहारा चचार नियमं पुनः । नृपश्रेष्ठ! तदनन्तर वह कन्या कौशिकी नदीके तटपर गयी । वहाँ वायु और जलका आहार करके उसने पुनः कठोर नियमोंका पालन किया ॥ २१३ ॥

ततो ययौ महाभागा गङ्गां मेरुं च केवलम् ॥ २२ ॥

तस्थौ दार्विव निश्चेष्टा प्रजानां हितकाम्यया । तत्पश्चात् वह महाभागा ब्रह्मकन्या गंगाजीके किनारे और केवल मेरुपर्वतपर गयी । वहाँ प्रजावर्गके हितकी इच्छासे वह काठकी भाँति निश्चेष्ट खड़ी रही ॥ २२ ॥

ततो हिमवतो मूर्ध्नि यत्र देवाः समीजिरे ॥ २३ ॥

तत्राङ्गुष्ठेन राजेन्द्र निखर्वमपरं ततः ।

तस्थौ पितामहं चैव तोषयामास यत्नतः ॥ २४ ॥

राजेन्द्र! तदनन्तर हिमालय पर्वतके शिखरपर जहाँ पहले देवताओंने यज्ञ किया था,

उस स्थानपर वह परम शुभलक्षणा कन्या एक निखर्व वर्षोंतक अँगूठेके बलपर खड़ी रही ।

इस प्रकार यत्न करके उसने पितामह ब्रह्माजीको संतुष्ट कर लिया ॥ २३-२४ ॥

ततस्तामब्रवीत् तत्र लोकानां प्रभवाप्ययः ।

किमिदं वर्तते पुत्रि क्रियतां मम तद् वचः ॥ २५ ॥

तब सम्पूर्ण लोकोंकी उत्पत्ति और प्रलयके कारणभूत ब्रह्माजी वहाँ उस कन्यासे बोले -' बेटी! तुम यह क्या करती हो? मेरी आज्ञाका पालन करो ' ॥ २५ ॥

ततोऽब्रवीत् पुनर्मृत्युर्भगवन्तं पितामहम् ।

न हरेयं प्रजा देव पुनश्चाहं प्रसादये ॥ २६ ॥

तब मृत्युने पुनः भगवान् पितामहसे कहा – ' देव! मैं प्रजाका नाश नहीं कर सकती ।

इसके लिये पुनः आपका कृपाप्रसाद चाहती हूँ' ॥ २६ ॥

तामधर्मभयाद् भीतां पुनरेव प्रयाचतीम् ।

तदाब्रवीद् देवदेवो निगृह्येदं वचस्ततः ॥ २७ ॥

अधर्मके भयसे डरकर पुनः कृपाकी भीख माँगती हुई मृत्युको रोककर देवाधिदेव ब्रह्माने उससे यह बात कही— ॥ २७ ॥

अधर्मो नास्ति ते मृत्यो संयच्छेमाः प्रजाः शुभे ।

मया ह्युक्तं मृषा भद्रे भविता नेह किंचन ॥ २८ ॥

' मृत्यो! तुम इन प्रजाओंका संहार करो । शुभे! इससे तुम्हें पाप नहीं लगेगा । भद्रे! मेरी कही हुई कोई भी बात यहाँ झूठी नहीं हो सकती ॥ २८ ॥

धर्मः सनातनश्च त्वामिहैवानुप्रवेक्ष्यति ।

अहं च विबुधाश्चैव त्वद्धिते निरताः सदा ॥ २ ९ ॥

' सनातन धर्म यहीं तुम्हारे भीतर प्रवेश करेगा । मैं तथा ये सम्पूर्ण देवता सदा तुम्हारे हितमें लगे रहेंगे ॥ २ ९ ॥

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इममन्यं च ते कामं ददानि मनसेप्सितम् ।

न त्वां दोषेण यास्यन्ति व्याधिसम्पीडिताः प्रजाः ॥ ३० ॥

पुरुषेषु स्वरूपेण पुरुषस्त्वं भविष्यसि ।

स्त्रीषु स्त्रीरूपिणी चैव तृतीयेषु नपुंसकम् ॥ ३१ ॥

' मैं तुम्हें यह दूसरा भी मनोवाञ्छित वर दे रहा हूँ कि रोगोंसे पीड़ित हुई प्रजा तुम्हारे प्रति दोष - दृष्टि नहीं करेगी । तुम पुरुषोंमें पुरुषरूपसे रहोगी, स्त्रियोंमें स्त्रीरूप धारण कर लोगी और नपुंसकोमें नपुंसक हो जाओगी ' ॥ ३०-३१ ॥

सैवमुक्ता महाराज कृताञ्जलिरुवाच ह ।

पुनरेव महात्मानं नेति देवेशमव्ययम् ॥ ३२ ॥

महाराज! ब्रह्माजीके ऐसा कहनेपर मृत्यु हाथ जोड़कर उन अविनाशी महात्मा देवेश्वर ब्रह्मासे पुनः इस प्रकार बोली- ' प्रभो! मैं प्राणियोंका संहार नहीं करूंगी ' ॥ ३२ ॥

तामब्रवीत् तदा देवी मृत्यो संहर मानवान् ।

अधर्मस्ते न भविता तथा ध्यास्याम्यहं शुभे ॥ ३३ ॥

तब ब्रह्माजीने उससे कहा- ' मृत्यो! तुम मनुष्योंका संहार करो, तुम्हें पाप नहीं लगेगा । शुभे! मैं तुम्हारे लिये शुभ चिन्तन करता रहूँगा ॥ ३३ ॥

यानश्रुबिन्दून् पतितानपश्यं ये पाणिभ्यां धारितास्ते पुरस्तात् । ते व्याधयो मानवान् घोररूपाः प्राप्ते काले कालयिष्यन्ति मृत्यो ॥ ३४ ॥

' मृत्यो! मैंने पहले तुम्हारे जिन अश्रुबिन्दुओंको गिरते देखा और जिन्हें अपने हाथोंमें धारण कर लिया था, वे ही समय आनेपर भयंकर रोग बनकर मनुष्योंको कालके गालमें डाल देंगे ॥ ३४ ॥

सर्वेषां त्वं प्राणिनामन्तकाले कामक्रोधौ सहितौ योजयेथाः । एवं धर्मस्त्वामुपैष्यत्यमेयो न चाधर्मं लप्स्यसे तुल्यवृत्तिः ॥ ३५ ॥

‘ सभी प्राणियोंके अन्तकालमें तुम काम और क्रोधको एक साथ नियुक्त कर देना । इस प्रकार तुम्हें अप्रमेय धर्मकी प्राप्ति होगी और तुम्हें पाप नहीं लगेगा; क्योंकि तुम्हारी चित्तवृत्ति सम ( राग- द्वेषसे शून्य) है ॥ ३५ ॥

एवं धर्मं पालयिष्यस्यथो त्वं न चात्मानं मज्जयिष्यस्यधर्मे । तस्मात् कामं रोचयाभ्यागतं त्वं संयोज्याथो संहरस्वेह जन्तून् ॥ ३६ ॥

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‘ इस प्रकार तुम धर्मका पालन करोगी और अपने - आपको पापमें नहीं डुबाओगी; अतः अपनेको प्राप्त होनेवाले इस अधिकारको प्रसन्नतापूर्वक ग्रहण करो और कामको इस कार्यमें लगाकर इस जगत्के प्राणियोंका संहार करो ' ॥ ३६ ॥

सा वै तदा मृत्युसंज्ञापदेशा भीता शापाद् बाढमित्यब्रवीत् तम् । अथो प्राणान् प्राणिनामन्तकाले कामक्रोधौ प्राप्य निर्मोह्य हन्ति ॥ ३७ ॥

तब वह मृत्यु नामवाली नारी शापसे डरकर ब्रह्माजीसे बोली - ' बहुत अच्छा, आपकी आज्ञा स्वीकार है । ' वही मृत्यु प्राणियोंका अन्तकाल आनेपर काम और क्रोधको प्रेरित करके उनके द्वारा उन्हें मोहमें डालकर मार डालती है ॥ ३७ ॥

मृत्योर्ये ते व्याधयश्चाश्रुपाता मनुष्याणां रुज्यते यैः शरीरम् । सर्वेषां वै प्राणिनां प्राणनान्ते तस्माच्छोकं मा कृथा बुद्धय बुद्धया ॥ ३८ ॥

पहले मृत्युके जो अश्रुबिन्दु गिरे थे, वे ही ज्वर आदि रोग हो गये; जिनके द्वारा मनुष्योंका शरीर रुग्ण हो जाता है । वह मृत्यु सभी प्राणियोंकी आयु समाप्त होनेपर उनके पास आती है । अतः राजन्! तुम अपने पुत्रके लिये शोक न करो । इस विषयको बुद्धिके द्वारा समझो ॥ ३८ ॥

सर्वे देवाः प्राणिनां प्राणनान्ते गत्वा वृत्ताः संनिवृत्तास्तथैव । एवं सर्वे मानवाः प्राणनान्ते गत्वा वृत्ता देववद् राजसिंह ॥ ३ ९ ॥ राजसिंह! जैसे इन्द्रियाँ जाग्रत्- अवस्थाके अन्तमें सुषुप्तिके समय निष्क्रिय होकर विलीन हो जाती हैं और जाग्रत् अवस्था आनेपर पुनः लौट आती हैं, उसी प्रकार सारे प्राणी ही जीवनके अन्तमें परलोकमें जाकर कर्मोंके अनुसार देवताओंके तुल्य अथवा नरकगामी होते हैं और कर्मोंके क्षीण होनेपर इस जगत् में लौटकर पुनः मनुष्य आदि योनियोंमें जन्म ग्रहण करते हैं ॥ ३ ९ ॥ वायुर्भीमो भीमनादो महौजाः स सर्वेषां प्राणिनां प्राणभूतः । नानावृत्तिर्देहिनां देहभेदे तस्माद् वायुर्देवदेवो विशिष्टः ॥ ४० ॥

भयंकर शब्द करनेवाला महान् बलशाली भयानक प्राणवायु ही समस्त प्राणियोंका प्राणस्वरूप है । वही देहधारियोंके देहका नाश होनेपर नाना प्रकारके रूपों या शरीरोंको

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प्राप्त होता है । अतः इस शरीर के भीतर देवाधिदेव वायु (प्राण) ही सबसे श्रेष्ठ है ॥ ४० ॥

सर्वे देवा मर्त्यसंज्ञाविशिष्टाः सर्वे मर्त्या देवसंज्ञाविशिष्टाः । तस्मात् पुत्रं मा शुचो राजसिंह पुत्रः स्वर्गं प्राप्य ते मोदते ह ॥ ४१ ॥

सभी देवता पुण्य क्षय होनेपर इस लोकमें आकर मरणधर्मा नामसे विभूषित होते हैं और सभी मरणधर्मा मनुष्य पुण्यके प्रभावसे मृत्युके पश्चात् देवसंज्ञासे संयुक्त होते हैं । अतः राजसिंह! तुम अपने पुत्रके लिये शोक न करो । तुम्हारा पुत्र स्वर्गलोकमें जाकर आनन्द भोग रहा है ॥ एवं मृत्युर्देवसृष्टा प्रजानां प्राप्ते काले संहरन्ती यथावत् । तस्याश्चैव व्याधयस्तेऽश्रुपाताः प्राप्ते काले संहरन्तीह जन्तून् ॥ ४२ ॥

इस प्रकार ब्रह्माजीने ही प्राणियोंकी मृत्यु रची है । वह मृत्यु ठीक समय आनेपर यथावत् रूपसे जीवोंका संहार करती है । उसके जो अश्रुपात हैं, वे ही मृत्युकाल प्राप्त होनेपर रोग बनकर इस जगत्के प्राणियोंका संहार करते हैं ॥ ४२ ॥

इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि मृत्युप्रजापतिसंवादे अष्टपञ्चाशदधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २५८ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें मृत्यु और प्रजापतिका संवादविषयक दो सौ अट्ठावनवाँअध्याय पूरा हुआ ॥ २५८ ॥

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एकोनषष्ट्यधिकद्विशततमोऽध्यायः धर्माधर्मके स्वरूपका निर्णय युधिष्ठिर उवाच

इमे वै मानवाः सर्वे धर्मं प्रति विशङ्किताः ।

कोऽयं धर्मः कुतो धर्मस्तन्मे ब्रूहि पितामह ॥ १ ॥

युधिष्ठिरने पूछा- पितामह! ये सभी मनुष्य प्रायः धर्मके विषयमें संशयशील हैं; अतः मैं जानना चाहता हूँ कि धर्म क्या है? और उसकी उत्पत्ति कहाँसे हुई है? यह मुझे बताइये ॥ १ ॥

धर्मस्त्वयमिहार्थः किममुत्रार्थोऽपि वा भवेत् ।

उभयार्थो हि वा धर्मस्तन्मे ब्रूहि पितामह ॥ २ ॥

पितामह! इस लोकमें सुख पानेके लिये जो कर्म किया जाता है, वही धर्म है या परलोकमें कल्याणके लिये जो कुछ किया जाता है, उसे धर्म कहते हैं? अथवा लोक-परलोक दोनोंके सुधारके लिये कुछ किया जानेवाला कर्म ही धर्म कहलाता है? यह मुझे बताइये ॥ २ ॥

भीष्म उवाच

सदाचारः स्मृतिर्वेदास्त्रिविधं धर्मलक्षणम् ।

चतुर्थमर्थमित्याहुः कवयो धर्मलक्षणम् ॥ ३ ॥

भीष्मजी कहते हैं - युधिष्ठिर! वेद, स्मृति और सदाचार– ये तीन धर्मके स्वरूपको लक्षित करानेवाले हैं । कुछ विद्वान् अर्थको भी धर्मका चौथा लक्षण बताते हैं ॥ ३ ॥

अपि ह्युक्तानि धर्म्याणि व्यवस्यन्त्युत्तरावरे ।

लोकयात्रार्थमेवेह धर्मस्य नियमः कृतः ॥ ४ ॥

शास्त्रोंमें जो धर्मानुकूल कार्य बताये गये हैं, उन्हें ही प्रधान एवं अप्रधान सभी लोग निश्चित रूपसे धर्म मानते हैं । लोकयात्राका निर्वाह करनेके लिये ही महर्षियोंने यहाँ धर्मकी मर्यादा स्थापित की है ॥ ४ ॥

उभयत्र सुखोदर्क इह चैव परत्र च ।

अलब्ध्वा निपुणं धर्मं पापः पापेन युज्यते ॥ ५ ॥

धर्मका पालन करनेसे आगे चलकर इस लोक और परलोकमें भी सुख मिलता है । पापी मनुष्य विचारपूर्वक धर्मका आश्रय न लेनेसे पापमें प्रवृत्त हो उसके दुःखरूप फलका भागी होता है ॥ ५ ॥

न च पापकृतः पापान्मुच्यन्ते केचिदापदि ।

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अपापवादी भवति यथा भवति धर्मकृत् ।

धर्मस्य निष्ठा त्वाचारस्तमेवाश्रित्य भोत्स्यसे ॥ ६

पापाचारी मनुष्य आपत्तिकालमें कष्ट भोगकर भी उस पापसे मुक्त नहीं होते और धर्मका आचरण करनेवाले लोग आपत्तिकालमें भी पापका समर्थन नहीं करते हैं । आचार ( शौचाचार- सदाचार) ही धर्मका आधार है; अतः युधिष्ठिर! तुम उस आचारका आश्रय लेकर ही धर्मके यथार्थ स्वरूपको जान सकोगे ॥ ६ ॥

यथा धर्मसमाविष्टो धनं गृह्णाति तस्करः ।

रमते निर्हरन् स्तेनः परवित्तमराजके ॥ ७ ॥

जैसे चोर धर्मकार्यमें प्रवृत्त होकर भी दूसरोंके धनका अपहरण कर ही लेता है और अराजक - अवस्थामें पराये धनका अपहरण करनेवाला लुटेरा सुखका अनुभव करता है ॥ ७ ॥

यदास्य तद्धरन्त्यन्ये तदा राजानमिच्छति ।

तदा तेषां स्पृहयते ये वै तुष्टाः स्वकैर्धनैः ॥ ८ ॥

परंतु जब दूसरे लोग उस चोरका भी धन हर लेते हैं, तब वह चोर भी प्रजाकी रक्षा करने और चोरोंको दण्ड देनेवाले राजाको चाहता है— उसकी आवश्यकताका अनुभव करता है । उस अवस्थामें वह उन पुरुषोंके समान बननेकी इच्छा करता है, जो अपने ही धनसे संतुष्ट रहते हैं — दूसरोंके धनपर हाथ लगाना पाप समझते हैं ॥ ८ ॥

अभीतः शुचिरभ्येति राजद्वारमशङ्कितः ।

न हि दुश्चरितं किंचिदन्तरात्मनि पश्यति ॥ ९ ॥

जो पवित्र है — जिसमें चोरी आदिके दोष नहीं हैं, वह मनुष्य निर्भय और निःशंक होकर राजाके द्वारपर चला जाता है; क्योंकि वह अपनी अन्तरात्मामें कोई दुराचार नहीं देखता है ॥ ९ ॥

सत्यस्य वचनं साधु न सत्याद् विद्यते परम् ।

सत्येन विधृतं सर्वं सर्वं सत्ये प्रतिष्ठितम् ॥ १० ॥

सत्य बोलना शुभ कर्म है । सत्यसे बढ़कर दूसरा कोई कार्य नहीं है । सत्यने ही सबको धारण कर रखा है और सत्यमें ही सब कुछ प्रतिष्ठित है ॥ १० ॥

अपि पापकृतो रौद्राः सत्यं कृत्वा पृथक् पृथक् ।

अद्रोहमविसंवादं प्रवर्तन्ते तदाश्रयाः ॥ ११ ॥

क्रूर स्वभाववाले पापी भी पृथक् - पृथक् सत्यकी शपथ खाकर ही आपसमें द्रोह या विवादसे बचे रहते हैं । इतना ही नहीं, वे सत्यका आश्रय लेकर सत्यकी ही दुहाई देकर अपने - अपने कर्मोंमें प्रवृत्त होते हैं ॥ ११ ॥

ते चेन्मिथोऽधृतिं कुर्युर्विनश्येयुरसंशयम् ।

न हर्तव्यं परधनमिति धर्मः सनातनः ॥ १२ ॥

पृष्ठ 1668

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वे यदि आपसकी शपथको भंग कर दें तो निस्संदेह परस्पर लड़ - भिड़कर नष्ट हो जायँ।

दूसरोंके धनका अपहरण नहीं करना चाहिये - यही सनातन धर्म है ॥

मन्यन्ते बलवन्तस्तं दुर्बलैः सम्प्रवर्तितम् ।

यदा नियतिदौर्बल्यमथैषामेव रोचते ॥ १३ ॥

कुछ बलवान् लोग ( बलके घमंडमें नास्तिकभावका आश्रय लेकर ) धर्मको दुर्बलोंका चलाया हुआ मानते हैं; किंतु जब भाग्यवश वे भी दुर्बल हो जाते हैं, तब अपनी रक्षाके लिये उन्हें भी धर्मका ही सहारा लेना अच्छा जान पड़ता है ॥ १३ ॥

न ह्यत्यन्तं बलवन्तो भवन्ति सुखिनोऽपि वा ।

तस्मादनार्जवे बुद्धिर्न कार्या ते कदाचन ॥ १४ ॥

संसारमें कोई भी न तो अत्यन्त बलवान् होते हैं और न बहुत सुखी ही । इसलिये तुम्हें अपनी बुद्धिमें कभी कुटिलताका विचार नहीं लाना चाहिये ॥ १४ ॥

असाधुभ्योऽस्य न भयं न चौरेभ्यो न राजतः ।

अकिंचित् कस्यचित् कुर्वन् निर्भयः शुचिरावसेत् ॥ १५ ॥

जो किसीका कुछ बिगाड़ता नहीं है, उसे दुष्टों, चोरों अथवा राजासे भय नहीं होता ।

शुद्ध आचार- विचारवाला पुरुष सदा निर्भय रहता है ॥ १५ ॥

सर्वतः शङ्कते स्तेनो मृगो ग्राममिवेयिवान् ।

बहुधाऽऽचरितं पापमन्यत्रैवानुपश्यति ॥ १६ ॥

गाँवोंमें आये हुए हिरणकी भाँति चोर सबसे डरता रहता है । वह अनेकों बार दूसरोंके साथ जैसा पापाचार कर चुका है, दूसरोंको भी वैसा ही पापाचारी समझता है ॥ १६ ॥

मुदितः शुचिरभ्येति सर्वतो निर्भयः सदा ।

न हि दुश्चरितं किंचिदात्मनोऽन्येषु पश्यति ॥ १७ ॥

जिसका आचार- विचार शुद्ध है, उसे कहींसे कोई खटका नहीं होता । वह सदा प्रसन्न एवं सब ओरसे निर्भय बना रहता है तथा वह अपना कोई दुष्कर्म दूसरोंमें नहीं देखता है ॥ १७ ॥

दातव्यमित्ययं धर्म उक्तो भूतहिते रतैः ।

तं मन्यन्ते धनयुताः कृपणैः सम्प्रवर्तितम् ॥ १८ ॥

समस्त प्राणियोंके हितमें तत्पर रहनेवाले महात्माओंने ' दान करना चाहिये ' ऐसा कहकर इसे धर्म बताया है; परंतु बहुत- से धनवान् उसे दरिद्रोंका चलाया हुआ धर्म समझते हैं ॥ १८ ॥

यदा नियतिकार्पण्यमथैषामेव रोचते ।

न ह्यत्यन्तं धनवन्तो भवन्ति सुखिनोऽपि वा ॥ १ ९ ॥

परंतु यदि भाग्यवश वे भी निर्धन या दर- दरके भिखारी हो जाते हैं, उस समय उनको भी यह धर्म उत्तम जान पड़ता है; क्योंकि कोई भी न तो अत्यन्त धनवान् होते हैं और न

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अतिशय सुखी ही हुआ करते हैं ( अतः धनका अभिमान नहीं करना चाहिये ) ॥ १ ९ ॥

यदन्यैर्विहितं नेच्छेदात्मनः कर्म पूरुषः ।

न तत् परेषु कुर्वीत जानन्नप्रियमात्मनः ॥ २० ॥

मनुष्य दूसरोंद्वारा किये हुए जिस व्यवहारको अपने लिये वांछनीय नहीं मानता, दूसरोंके प्रति भी वह वैसा बर्ताव न करे । उसे यह जानना चाहिये कि जो बर्ताव अपने लिये अप्रिय है, वह दूसरोंके लिये भी प्रिय नहीं हो सकता ॥ २० ॥

योऽन्यस्य स्यादुपपतिः स कं किं वक्तुमर्हति ।

यदन्यस्य ततः कुर्यान्न मृष्येदिति मे मतिः ॥ २१ ॥

जो स्वयं दूसरेके घरमें उपपति ( जार ) बनकर जाता है- परायी स्त्रीके साथ व्यभिचार करता है, वह दूसरेको वैसा ही कर्म करते देख किससे क्या कह सकता है? यदि दूसरेकी उसी प्रवृत्तिके कारण वह निन्दा करे तो वह पुरुष उसकी निन्दाको नहीं सह सकता – ऐसा मेरा विश्वास है ॥ २१ ॥

जीवितुं यः स्वयं चेच्छेत् कथं सोऽन्यं प्रघातयेत् ।

यद् यदात्मनि चेच्छेत तत् परस्यापि चिन्तयेत् ॥ २२ ॥

जो स्वयं जीवित रहना चाहता हो, वह दूसरोंके प्राण कैसे ले सकता है? मनुष्य अपने लिये जो -जो सुख - सुविधा चाहे, वही दूसरेके लिये भी सुलभ करानेकी बात सोचे ॥ २२ ॥

अतिरिक्तैः संविभजेद् भोगैरन्यानकिंचनान् ।

एतस्मात् कारणाद् धात्रा कुसीदं सम्प्रवर्तितम् ॥ २३ ॥

जो अपनी आवश्यकतासे अधिक हो, उन भोगपदार्थोंको दूसरे दीन - दुखियोंके लिये बाँट दे । इसीलिये विधाताने सूदपर धन देनेकी वृत्ति चलायी है ॥

यस्मिंस्तु देवाः समये संतिष्ठेरंस्तथा भवेत् ।

अथवा लाभसमये स्थितिर्धर्मेऽपि शोभना ॥ २४ ॥

जिस सन्मार्ग या मर्यादापर देवता स्थित होते हैं, उसीपर मनुष्यको भी स्थिर रहना चाहिये अथवा धन - लाभके समय धर्ममें स्थित रहना भी अच्छा है ॥ २४ ॥

सर्वं प्रियाभ्युपगतं धर्ममाहुर्मनीषिणः ।

पश्यैतं लक्षणोद्देशं धर्माधर्मे युधिष्ठिर ॥ २५ ॥

युधिष्ठिर! सबके साथ प्रेमपूर्ण बर्ताव करनेसे जो कुछ प्राप्त होता है, वह सब धर्म है, ऐसा मनीषी पुरुषोंका कथन है तथा जो इसके विपरीत है, वह अधर्म है । तुम धर्म और अधर्मका संक्षेपसे यही लक्षण समझो ॥ २५ ॥

लोकसंग्रहसंयुक्तं विधात्रा विहितं पुरा ।

सूक्ष्मधर्मार्थनियतं सतां चरितमुत्तमम् ॥ २६ ॥

विधाताने पूर्वकालमें सत्पुरुषोंके जिस उत्तम आचरणका विधान किया है, वह विश्वके कल्याणकी भावनासे युक्त है और उससे धर्म एवं अर्थके सूक्ष्म स्वरूपका ज्ञान होता

पृष्ठ 1670

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है ॥ २६ ॥

धर्मलक्षणमाख्यातमेतत् ते कुरुसत्तम ।

तस्मादनार्जवे बुद्धिर्न ते कार्या कथंचन ॥ २७ ॥

कुरुश्रेष्ठ! यह मैंने तुमसे धर्मका लक्षण बताया है; अतः तुम्हें किसी तरह कुटिल मार्गमें अपनी बुद्धिको नहीं ले जाना चाहिये ॥ २७ ॥

इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि धर्मलक्षणे एकोनषष्ट्यधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २५ ९ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें धर्मका लक्षणविषयक दो सौ उनसठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २५ ९ ॥