श्रीगणेशाय नमः।

महाभारत — खण्ड ५ — पृष्ठ 1951–1960

महाभारत — खण्ड ५ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1951–1960

पृष्ठ 1951

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जो लोग देहको पाकर हठपूर्वक उसका परित्याग कर देते हैं, उनको पूर्ववत् ही यातनामय शरीरकी प्राप्ति होती है। ऐसे लोग ( मोक्षके साधनरूप मनुष्यशरीरको पाकर भी आत्महत्याके कारण उस लाभसे वंचित हो) एक घरसे दूसरे घरमें जानेवाले मनुष्यके समान एक शरीरसे दूसरे शरीरको प्राप्त होते हैं ॥ १२ ॥

द्वितीयं कारणं तत्र नान्यत् किंचन विद्यते ।

तद् देहं देहिनां युक्तं पञ्चभूतेषु वर्तते ॥ १३ ॥

इनकी उस अवस्थाके प्राप्त होनेमें आत्महत्यारूप पापके सिवा दूसरा कोई कारण नहीं है । उन प्राणियोंको उस शरीरका मिलना उचित ही है, जो कि पंचभूतमय है ॥ १३ ॥

शिरास्नाय्वस्थिसंघातं बीभत्सामेध्यसंकुलम् ।

भूतानामिन्द्रियाणां च गुणानां च समागमम् ॥ १४ ॥

यह शरीर नस, नाड़ी और हड्डियोंका समूह है । घृणित और अपवित्र मल- मूत्र आदिसे भरा हुआ है । पंचमहाभूतों, श्रोत्र आदि इन्द्रियों तथा गुणों ( वासनामय विषयों) का समुदाय है ॥ १४ ॥

त्वगन्तं देहमित्याहुर्विद्वांसोऽध्यात्मचिन्तकाः ।

गुणैरपि परिक्षीणं शरीरं मर्त्यतां गतम् ॥ १५ ॥

अध्यात्मतत्त्वका चिन्तन करनेवाले ज्ञानी पुरुष कहते हैं कि इस शरीरके अन्तमें अर्थात् बाह्यभागमें त्वचा ( चमड़ा ) मात्र है । यह सौन्दर्य आदि गुणोंसे भी रहित है । इसकी मृत्यु अनिवार्य है ॥ १५ ॥

शरीरिणा परित्यक्तं निश्चेष्टं गतचेतनम् ।

भूतैः प्रकृतिमापन्नैस्ततो भूमौ निमज्जति ॥ १६ ॥

जब जीवात्मा इस देहका परित्याग कर देता है, तब यह देह निश्चेष्ट और चेतनाशून्य हो जाती है एवं इसके पाँच भूत अपनी- अपनी प्रकृतिके साथ मिल जाते हैं । फिर तो यह पृथ्वीमें निमग्न हो जाती है ॥ १६ ॥

भावितं कर्मयोगेन जायते तत्र तत्र ह ।

इदं शरीरं वैदेह म्रियते यत्र यत्र ह ।

तत्स्वभावोऽपरो दृष्टो विसर्गः कर्मणस्तथा ॥ १७ ॥

विदेहराज! यह शरीर जिस किसी स्थानमें मृत्युको प्राप्त हो जाता है; फिर प्रारब्धकर्मके योगसे भावित होकर जहाँ- कहीं भी जन्म ले लेता है । कर्मोंका फलस्वरूप यह स्वभावसिद्ध पुनर्जन्म देखा गया है ॥ १७ ॥

न जायते तु नृपते कंचित् कालमयं पुनः ।

परिभ्रमति भूतात्मा द्यामिवाम्बुधरो महान् ॥ १८ ॥

नरेश्वर! जैसे विशाल मेघ आकाशमें सब ओर भ्रमण करता है, उसी प्रकार जीवात्मा प्रारब्ध - कर्मके फलसे कुछ कालतक घूमता रहता है, जन्म नहीं लेता है ॥

पृष्ठ 1952

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स पुनर्जायते राजन् प्राप्येहायतनं नृप ।

मनसः परमो ह्यात्मा इन्द्रियेभ्यः परं मनः ॥ १९ ॥

राजन्! वही यहाँ फिर कोई आधार पाकर पुनः जन्म लेता है । मनसे आत्मा श्रेष्ठ है और इन्द्रियोंसे मन श्रेष्ठ है ॥ १ ९ ॥

विविधानां च भूतानां जङ्गमाः परमा नृप ।

जङ्गमानामपि तथा द्विपदाः परमा मताः ॥ २० ॥

महाराज! संसारके विविध प्राणियोंमें चलने -फिरनेवाले जीव श्रेष्ठ माने गये हैं । इन जंगम प्राणियोंमें भी दो पैरवाले जीव ( मनुष्य ) श्रेष्ठ कहे गये हैं ॥ २० ॥

द्विपदानामपि तथा द्विजा वै परमाः स्मृताः ।

द्विजानामपि राजेन्द्र प्रज्ञावन्तः परा मताः ।

प्राज्ञानामात्मसम्बुद्धाः सम्बुद्धानाममानिनः ॥ २१ ॥

मनुष्योंमें भी द्विज श्रेष्ठ कहे गये हैं । राजेन्द्र! द्विजोंमें बुद्धिमान् और बुद्धिमानोंमें भी आत्मज्ञानी श्रेष्ठ समझे जाते हैं । उनमें भी जो अहंकाररहित हैं, उन्हें सर्वश्रेष्ठ माना गया है ॥ २१ ॥

जातमन्वेति मरणं नृणामिति विनिश्चयः ।

अन्तवन्ति हि कर्माणि सेवन्ते गुणतः प्रजाः ॥ २२ ॥

जन्मके साथ ही मृत्यु मनुष्योंके पीछे लगी रहती है । यह विद्वानोंका निश्चय है । समस्त प्रजा सत्त्व आदि गुणोंसे प्रेरित होकर विनाशशील कर्मोंका आचरण करती है ॥ २२ ॥

आपन्ने तूत्तरां काष्ठां सूर्ये यो निधनं व्रजेत् ।

नक्षत्रे च मुहुर्ते च पुण्ये राजन् स पुण्यकृत् ॥ २३ ॥

राजन्! जो सूर्यके उत्तरायण होनेपर उत्तम नक्षत्र और पवित्र मुहूर्तमें मृत्युको प्राप्त होता है, वह पुण्यात्मा है ॥ २३ ॥

अयोजयित्वा क्लेशेन जनं प्लाव्य च दुष्कृतम् ।

मृत्युनाऽऽत्मकृते नेह कर्म कृत्वाऽऽत्मशक्तिभिः ॥ २४ ॥

वह किसीको भी कष्ट न देकर प्रायश्चित्तके द्वारा अपने पापको नष्ट कर डालता है और अपनी शक्तिके अनुसार शुभकर्म करके स्वेच्छासे मृत्युको अंगीकार करता है ॥ २४ ॥

विषमुद्बन्धनं दाहो दस्युहस्तात् तथा वधः ।

दंष्ट्रिभ्यश्च पशुभ्यश्च प्राकृतो वध उच्यते ॥ २५ ॥

किंतु विष खा लेनेसे, गलेमें फाँसी लगानेसे, आगमें जलनेसे, लुटेरोंके हाथसे तथा दाढ़वाले पशुओंके आघातसे जो वध होता है, वह अधम श्रेणीका माना जाता है ॥ २५ ॥

न चैभिः पुण्यकर्माणो युज्यन्ते चाभिसंधिजैः ।

एवंविधैश्च बहुभिरपरैः प्राकृतैरपि ॥ २६ ॥

पृष्ठ 1953

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पुण्यकर्म करनेवाले मनुष्य इस तरहके उपायोंसे प्राण नहीं देते तथा ऐसे - ऐसे दूसरे अधम उपायोंसे भी उनकी मृत्यु नहीं होती ॥ २६ ॥

ऊर्ध्वं भित्त्वा प्रतिष्ठन्ते प्राणाः पुण्यवतां नृप ।

मध्यतो मध्यपुण्यानामधो दुष्कृतकर्मणाम् ॥ २७ ॥

राजन्! पुण्यात्मा पुरुषोंके प्राण ब्रह्मरन्ध्रको भेदकर निकलते हैं । जिनके पुण्यकर्म मध्यम श्रेणीके हैं, उनके प्राण मध्यद्वार ( मुख, नेत्र आदि) - से बाहर होते हैं तथा जिन्होंने केवल पाप ही किया है, उनके प्राण नीचेके छिद्र ( गुदा या शिश्नद्वार ) से निकलते हैं ॥ २७ ॥

एकः शत्रुर्न द्वितीयोऽस्ति शत्रु- रज्ञानतुल्यः पुरुषस्य राजन् । येनावृतः कुरुते सम्प्रयुक्तो घोराणि कर्माणि सुदारुणानि ॥ २८ ॥

राजन्! पुरुषका एक ही शत्रु है, उसके समान दूसरा कोई शत्रु नहीं है । वह है अज्ञान, जिससे आवृत और प्रेरित होकर मनुष्य अत्यन्त घोर और क्रूरतापूर्ण कर्म करने लगता है ॥ २८ ॥

प्रबाधनार्थं श्रुतिधर्मयुक्तान् वृद्धानुपास्य प्रभवेत यस्य । प्रयत्नसाध्यो हि स राजपुत्र प्रज्ञाशरेणोन्मथितः परैति ॥ २ ९ ॥ राजकुमार! उस शत्रुको पराजित करनेमें वही समर्थ हो सकता है, जो वेदोक्त धर्मसम्पन्न वृद्ध पुरुषोंकी सेवा करके प्रज्ञा ( स्थिरबुद्धि ) को प्राप्त कर लेता है, क्योंकि अज्ञानमय शत्रुको जीतना महान् प्रयत्नसाध्य कर्म है । वह प्रज्ञारूपी बाणकी चोट खाकर ही नष्ट होता है ॥ २ ९ ॥ अधीत्य वेदं तपसा ब्रह्मचारी यज्ञान् शक्त्या संनिगृह्येह पञ्च । वनं गच्छेत् पुरुषो धर्मकामः श्रेयः स्थित्वा स्थापयित्वा स्ववंशम् ॥ ३० ॥

द्विजको पहले ब्रह्मचर्य- आश्रममें रहकर तपस्या - पूर्वक वेदोंका अध्ययन करना चाहिये; फिर गृहस्थाश्रममें प्रवेश करके अपनी शक्तिके अनुसार इन्द्रियसंयमपूर्वक पंच महायज्ञोंका अनुष्ठान करना चाहिये। तत्पश्चात् अपने पुत्रको घर- बारकी रक्षामें नियुक्त करके कल्याणमार्गमें स्थित हो केवल धर्मपालनकी इच्छा रखकर उसे वनको प्रस्थान करना चाहिये ॥ ३० ॥

उपभोगैरपि त्यक्तं नात्मानं सादयेन्नरः ।

पृष्ठ 1954

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चण्डालत्वेऽपि मानुष्यं सर्वथा तात शोभनम् ॥ ३१ ॥

तात! उपभोगके साधनोंसे वंचित होनेपर भी मनुष्य अपने - आपको हीन न समझे । चाण्डालकी योनिमें भी यदि मनुष्य-जन्म प्राप्त हो तो वह मानवेतर प्राणियोंकी अपेक्षा सर्वथा उत्तम है ॥ ३१ ॥

इयं हि योनिः प्रथमा यां प्राप्य जगतीपते ।

आत्मा वै शक्यते त्रातुं कर्मभिः शुभलक्षणैः ॥ ३२ ॥

क्योंकि पृथ्वीनाथ! मनुष्यकी योनि ही वह अद्वितीय योनि है, जिसे पाकर शुभकर्मोंके अनुष्ठानसे आत्माका उद्धार किया जा सकता है ॥ ३२ ॥

कथं न विप्रणश्येम योनितोऽस्या इति प्रभो ।

कुर्वन्ति धर्मं मनुजाः श्रुतिप्रामाण्यदर्शनात् ॥ ३३ ॥

' प्रभो! हम कौन ऐसा उपाय करें, जिससे हमें इस मनुष्य योनिसे नीचे न गिरना पड़े ' यह सोचकर और वैदिक प्रमाणोंपर विचार करके मनुष्य धर्मका अनुष्ठान करते हैं ॥ ३३ ॥

यो दुर्लभतरं प्राप्य मानुष्यं द्विषते नरः ।

धर्मावमन्ता कामात्मा भवेत्स खलु वञ्च्यते ॥ ३४ ॥

जो मानव अत्यन्त दुर्लभ मनुष्य- शरीरको पाकर भी दूसरोंसे द्वेष करता है और धर्मका अनादर करता है तथा मनसे कामनाओंमें आसक्त हो जाता है, वह महान् लाभसे वंचित होता है ॥ ३४ ॥

यस्तु प्रीतिपुरोगेन चक्षुषा तात पश्यति ।

दीपोपमानि भूतानि यावदर्थान्न पश्यति ॥ ३५ ॥

तात! जो समस्त प्राणियोंको दीपकके समान स्नेहसे संवर्धन करनेयोग्य मानता है और उन्हें स्नेहभरी दृष्टिसे देखता है एवं जो समस्त विषयोंकी ओर कभी दृष्टिपात नहीं करता, वह परलोकमें सम्मानित होता है ॥

सान्त्वेनान्नप्रदानेन प्रियवादेन चाप्युत ।

समदुःखसुखो भूत्वा स परत्र महीयते ॥ ३६ ॥

जो सब लोगोंको सान्त्वना प्रदान करता, भूखोंको भोजन देता और प्रिय वचन बोलकर सबका सत्कार करता है, वह सुख- दुःखमें सम रहकर ( इहलोक और) परलोकमें प्रतिष्ठित होता है ॥ ३६ ॥

दानं त्यागः शोभना मूर्तिरद्भ्यो भूतप्लाव्यं तपसा वै शरीरम् । सरस्वतीनैमिषपुष्करेषु ये चाप्यन्ये पुण्यदेशाः पृथिव्याम् ॥ ३७ ॥

राजन्! सरस्वती नदी, नैमिषारण्यक्षेत्र, पुष्करक्षेत्र तथा और भी जो पृथ्वीके पावन तीर्थ हैं, उनमें जाकर दान देना, भोगोंका त्याग करना, शान्तभावसे रहना तथा तपस्या और

पृष्ठ 1955

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तीर्थके जलसे तन - मनको पवित्र करना चाहिये ॥ ३७ ॥

गृहेषु येषामसवः पतन्ति तेषामथो निर्हरणं प्रशस्तम् । यानेन वै प्रापणं च श्मशाने शौचेन नूनं विधिना चैव दाहः ॥ ३८ ॥

घरोंमें जिनके प्राण निकल रहे हों, उन्हें शीघ्र ही घरसे बाहर ले जाना उत्तम है । मृत्युके पश्चात् उन्हें विमानपर सुलाकर श्मशानमें पहुँचाना तथा पवित्रतापूर्वक शास्त्रोक्तविधिसे उनका दाह- संस्कार करना आवश्यक कर्तव्य है ॥ ३८ ॥

इष्टिः पुष्टिर्यजनं याजनं च दानं पुण्यानां कर्मणां च प्रयोगः । शक्त्या पित्र्यं यच्च किंचित् प्रशस्तं सर्वाण्यात्मार्थे मानवोऽयं करोति ॥ ३ ९ ॥ मनुष्य अपनी शक्तिके अनुसार इष्टि- पुष्टि ( शान्तिकर्म ), यजन, याजन, दान, पुण्यकर्मोंका अनुष्ठान तथा श्राद्ध आदि जो भी कुछ उत्तम कार्य करता है, वह सब अपने ही लिये करता है ॥ ३ ९ ॥

धर्मशास्त्राणि वेदाश्च षडङ्गानि नराधिप ।

श्रेयसोऽर्थे विधीयन्ते नरस्याक्लिष्टकर्मणः ॥ ४० ॥

नरेश्वर! धर्मशास्त्र और छहों अंगोंसहित वेद पुण्यकर्म करनेवाले पुरुषके कल्याणके लिये ही कर्तव्यका विधान करते हैं ॥ ४० ॥

भीष्म उवाच

एतद् वै सर्वमाख्यातं मुनिना सुमहात्मना ।

विदेहराजाय पुरा श्रेयसोऽर्थे नराधिप ॥ ४१ ॥

भीष्मजी कहते हैं - युधिष्ठिर! प्राचीनकालमें महात्मा पराशर मुनिने विदेहराज जनकके कल्याणके लिये यह सब उपदेश दिया था ॥ ४१ ॥

इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि पराशरगीतायां सप्तनवत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २ ९ ७ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें पराशरगीताविषयक दो सौ सत्तानबेवाँअध्याय पूरा हुआ ॥ २९७ ॥

Fard

पृष्ठ 1956

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अष्टनवत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः पराशरगीताका उपसंहार - राजा जनकके विविध प्रश्नोंका उत्तर भीष्म उवाच

पुनरेव तु पप्रच्छ जनको मिथिलाधिपः ।

पराशरं महात्मानं धर्मे परमनिश्चयम् ॥ १ ॥

भीष्मजी कहते हैं - युधिष्ठिर! तदनन्तर मिथिलानरेश जनकने उन धर्मके विषयमें उत्तम निश्चय रखनेवाले महात्मा पराशर मुनिसे इस प्रकार पूछा ॥ १ ॥

जनक उवाच

किं श्रेयः का गतिर्ब्रह्मन् किं कृतं न विनश्यति ।

क्व गतो न निवर्तेत तन्मे ब्रूहि महामते ॥ २ ॥

जनक बोले- ब्रह्मन्! श्रेयका साधन क्या है? उत्तम गति कौन-सी है? कौन -सा कर्म नष्ट नहीं होता तथा कहाँ गया हुआ जीव फिर इस संसारमें नहीं लौटता है? महामते! मेरे इन प्रश्नोंका समाधान कीजिये ॥ २ ॥

पराशर उवाच

असङ्गः श्रेयसो मूलं ज्ञानं चैव परा गतिः ।

चीर्णं तपो न प्रणश्येद्वापः क्षेत्रे न नश्यति ॥ ३ ॥

पराशरजीने कहा— राजन्! आसक्तिका अभाव ही श्रेयका मूल कारण है । ज्ञान ही सबसे उत्तम गति है । स्वयं किया हुआ तप तथा सुपात्रको दिया हुआ दान — ये कभी नष्ट नहीं होते ॥ ३ ॥

छित्त्वाऽधर्ममयं पाशं यदा धर्मेऽभिरज्यते ।

दत्त्वाऽभयकृतं दानं तदा सिद्धिमवाप्नुते ॥ ४ ॥

जो मनुष्य जब अधर्ममय बन्धनका उच्छेद करके धर्ममें अनुरक्त हो जाता और सम्पूर्ण प्राणियोंको अभयदान कर देता है, उसे उसी समय उत्तम सिद्धि प्राप्त होती है ॥ ४ ॥

यो ददाति सहस्राणि गवामश्वशतानि च ।

अभयं सर्वभूतेभ्यः सदा तमभिवर्तते ॥ ५ ॥

जो एक हजार गौ तथा एक सौ घोड़े दान करता है तथा दूसरा जो सम्पूर्ण भूतोंको अभयदान देता है, वह सदा गौ और अश्वदान करनेवालेसे बढ़ा- चढ़ा रहता है ॥

पृष्ठ 1957

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वसन् विषयमध्येऽपि न वसत्येव बुद्धिमान् ।

संवसत्येव दुर्बुद्धिरसत्सु विषयेष्वपि ॥ ६ ॥

बुद्धिमान् पुरुष विषयोंके बीचमें रहता हुआ भी ( असंग होनेके कारण ) उनमें नहीं रहनेके बराबर ही है; किंतु जिसकी बुद्धि दूषित होती है, वह विषयोंके निकट न होनेपर भी सदा उन्हींमें रहता है ॥ ६ ॥

नाधर्मः श्लिष्यते प्राज्ञं पयः पुष्करपर्णवत् ।

अप्राज्ञमधिकं पापं श्लिष्यते जतुकाष्ठवत् ॥ ७ ॥

जैसे पानी कमलके पत्तेको लिपायमान नहीं कर सकता, उसी प्रकार ज्ञानी पुरुषोंको अधर्म लिप्त नहीं कर सकता; परंतु जैसे लाह काठमें चिपक जाती है, उसी प्रकार पाप अज्ञानी मनुष्यमें अधिक लिप्त हो जाता है ॥ ७ ॥

नाधर्मः कारणापेक्षी कर्तारमभिमुञ्चति ।

कर्ता खलु यथाकालं ततः समभिपद्यते ॥ ८ ॥

अधर्म फल प्रदानके अवसरकी प्रतीक्षा करनेवाला है, अतः वह कर्ताका पीछा नहीं छोड़ता । समय आनेपर उस कर्ताको उस पापका फल अवश्य भोगना पड़ता है ॥ ८ ॥

न भिद्यन्ते कृतात्मान आत्मप्रत्ययदर्शिनः ।

बुद्धिकर्मेन्द्रियाणां हि प्रमत्तो यो न बुद्धयते ।

शुभाशुभे प्रसक्तात्मा प्राप्नोति सुमहद् भयम् ॥ ९ ॥

पवित्र अन्तःकरणवाले आत्मज्ञानी पुरुष कर्मोंके शुभाशुभ फलोंसे कभी विचलित नहीं होते हैं । जो प्रमादवश ज्ञानेन्द्रियों और कर्मेन्द्रियोंद्वारा होनेवाले पापोंपर विचार नहीं करता तथा शुभ एवं अशुभमें आसक्त रहता है, उसे महान् भयकी प्राप्ति होती है ॥ ९ ॥

वीतरागो जितक्रोधः सम्यग् भवति यः सदा ।

विषये वर्तमानोऽपि न स पापेन युज्यते ॥ १० ॥

परंतु जो वीतराग होकर क्रोधको जीत लेता और नित्य सदाचारका पालन करता है, वह विषयोंमें वर्तमान रहकर भी पापकर्मसे सम्बन्ध नहीं जोड़ता है ॥ १० ॥

मर्यादायां धर्मसेतुर्निबद्धो नैव सीदति ।

पुष्टस्रोत इवासक्तः स्फीतो भवति संचयः ॥ ११ ॥

जैसे नदीमें बँधा हुआ मजबूत बाँध टूटता नहीं है और उसके कारण वहाँ जलका स्रोत बढ़ता रहता है, उसी प्रकार प्राचीन मर्यादापर बँधा हुआ धर्मरूपी बाँध नष्ट नहीं होता है तथा उससे आसक्तिरहित संचित तपकी वृद्धि होने लगती है ॥ ११ ॥

यथा भानुगतं तेजो मणिः शुद्धः समाधिना ।

आदत्ते राजशार्दूल तथा योगः प्रवर्तते ॥ १२ ॥

नृपश्रेष्ठ! जिस प्रकार शुद्ध सूर्यकान्तमणि सूर्यके तेजको ग्रहण कर लेती है, उसी प्रकार योगका साधक समाधिके द्वारा ब्रह्मके स्वरूपको ग्रहण करता है ॥ १२ ॥

पृष्ठ 1958

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यथा तिलानामिह पुष्पसंश्रयात् पृथक्पृथग्याति गुणोऽतिसौम्यताम् । तथा नराणां भुवि भावितात्मनां यथाऽऽश्रयं सत्त्वगुणः प्रवर्तते ॥ १३ ॥

जैसे तिलका तेल भिन्न -भिन्न प्रकारके सुगन्धित पुष्पोंसे वासित होकर अत्यन्त मनोरम गन्ध ग्रहण करता है, वैसे ही पृथ्वीपर शुद्धचित्त पुरुषोंका स्वभाव सत्पुरुषोंके संगके अनुसार सत्त्वगुणसम्पन्न हो जाता है ॥ १३ ॥

जहाति दारांश्च जहाति सम्पदः

पदं च यानं विविधाश्च याः क्रियाः ।

त्रिविष्टपे जातमतिर्यदा नर- स्तदास्य बुद्धिर्विषयेषु भिद्यते ॥ १४ ॥

जिस समय मनुष्य सर्वोत्तम पद पानेके लिये उत्सुक हो जाता है, उस समय उसकी बुद्धि विषयोंसे विलग हो जाती है तथा वह स्त्री, सम्पत्ति, पद, वाहन और नाना प्रकारकी जो क्रियाएँ हैं, उनका भी परित्याग कर देता है ॥ १४ ॥

प्रसक्तबुद्धिर्विषयेषु यो नरो न बुध्यते ह्यात्महितं कथंचन । स सर्वभावानुगतेन चेतसा नृपामिषेणेव झषो विकृष्यते ॥ १५ ॥

परंतु जिसकी बुद्धि विषयोंमें आसक्त हो जाती है, वह मनुष्य किसी तरह अपने हितकी बात नहीं समझता । राजन्! जैसे मछली काँटेमें गुँथे हुए मांसपर आकृष्ट होती है और दुःख पाती है, उसी तरह वह सब प्रकारकी वासनाओंसे वासित चित्तके द्वारा विषयोंकी ओर आकृष्ट होता है और दुःख भोगता है ॥ १५ ॥

संघातवन्मर्त्यलोकः परस्परमपाश्रितः ।

कदलीगर्भनिःसारो नौरिवाप्सु निमज्जति ॥ १६ ॥

जैसे शरीरके अंग- प्रत्यंग एक- दूसरेके आश्रित हैं, उसी प्रकार यह मर्त्यलोक — स्त्री- पुत्र और पशु आदिका समुदाय आपसमें एक- दूसरेपर अवलम्बित है । यह संसार केलेके भीतरी भागके समान निस्सार है । जैसे नौका पानीमें डूब जाती है, उसी प्रकार यह सब कुछ कालके प्रवाहमें निमग्न हो जाता है ॥ १६ ॥

न धर्मकालः पुरुषस्य निश्चितो न चापि मृत्युः पुरुषं प्रतीक्षते । सदा हि धर्मस्य क्रियैव शोभना यदा नरो मृत्युमुखेऽभिवर्तते ॥ १७ ॥

पृष्ठ 1959

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पुरुषके लिये धर्म करनेका कोई विशेष समय निश्चित नहीं है; क्योंकि मृत्यु किसीकी बाट नहीं जोहती । जब मनुष्य सदा मौतके मुखमें ही है, तब नित्य निरन्तर धर्मका आचरण करते रहना ही उसके लिये शोभाकी बात है ॥ १७ ॥

यथान्धः स्वगृहे युक्तो ह्यभ्यासादेव गच्छति ।

तथा युक्तेन मनसा प्राज्ञो गच्छति तां गतिम् ॥ १८ ॥

जैसे अन्धा प्रतिदिनके अभ्याससे ही सावधानीके साथ बाहरसे अपने घरमें आ जाता है, उसी प्रकार विवेकी मनुष्य योगयुक्त चित्तके द्वारा उस परम गतिको प्राप्त कर लेता है ॥ १८ ॥

मरणं जन्मनि प्रोक्तं जन्म वै मरणाश्रितम् ।

अविद्वान् मोक्षधर्मेषु बद्धो भ्रमति चक्रवत् ।

बुद्धिमार्गप्रयातस्य सुखं त्विह परत्र च ॥ १ ९ ॥

जन्ममें मृत्युकी स्थिति बतायी गयी है और मृत्युमें जन्म निहित है । जो मोक्ष - धर्मको नहीं जानता, वह अज्ञानी मनुष्य संसारमें आबद्ध होकर जन्म- मृत्युके चक्रमें घूमता रहता है; किंतु ज्ञानमार्गसे चलनेवालेको इहलोक और परलोकमें भी सुख मिलता है ॥ १ ९ ॥

विस्तराः क्लेशसंयुक्ताः संक्षेपास्तु सुखावहाः ।

परार्थं विस्तराः सर्वे त्यागमात्महितं विदुः ॥ २० ॥

कर्मोंका विस्तार क्लेशयुक्त होता है और संक्षेप सुखदायक है । सभी कर्म- विस्तार परार्थ हैं अर्थात् मन और इन्द्रियोंकी तृप्तिके लिये हैं; परंतु त्याग अपने लिये हितकर माना गया है ॥ २० ॥

यथा मृणालानुगतमाशु मुञ्चति कर्दमम् ।

तथाऽऽत्मा पुरुषस्येह मनसा परिमुच्यते ॥ २१ ॥

जैसे ( पानीसे निकालते समय) कमलकी नालमें लगी हुई कीचड़ पानीसे तुरंत धुल जाती है, उसी प्रकार त्यागी पुरुषका आत्मा मनके द्वारा संसारबन्धनसे मुक्त हो जाता है ॥ २१ ॥

मनः प्रणयतेऽऽत्मानं स एनमभियुञ्जति ।

युक्तो यदा स भवति तदा तं पश्यते परम् ॥ २२ ॥

मन आत्माको योगकी ओर ले जाता है । योगी इस मनको योगयुक्त ( आत्मामें लीन ) करता है । इस प्रकार जब वह योगमें सिद्धि प्राप्त कर लेता है, तब वह उस परमात्माका साक्षात्कार कर लेता है ॥ २२ ॥

परार्थे वर्तमानस्तु स्वं कार्यं योऽभिमन्यते ।

इन्द्रियार्थेषु संयुक्तः स्वकार्यात् परिमुच्यते ॥ २३ ॥

जो परके लिये अर्थात् इन बाह्य इन्द्रियोंकी तृप्तिके लिये विषयभोगोंमें प्रवृत्त होकर इसे अपना मुख्य कार्य समझता है, वह अपने वास्तविक कर्तव्यसे च्युत हो जाता

पृष्ठ 1960

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है ॥ २३ ॥

अधस्तिर्यग्गतिं चैव स्वर्गे चैव परां गतिम् ।

प्राप्नोति स्वकृतैरात्मा प्राज्ञस्येहेतरस्य च ॥ २४ ॥

अनुसार, नरकको इहलोकमें, पशु- पक्षीबुद्धिमान्आदि योनियोंकोहो या मूढ़, स्वर्गकोउसका आत्माऔर परमअपनेगतिकोकियेप्राप्तहुए होताकर्मों है ॥ २४ ॥ ही

मृण्मये भाजने पक्वे यथा वै न श्यति द्रवः ।

तथा शरीरं तपसा तप्तं विषयमश्नुते ॥ २५ ॥

जैसे पके हुए मिट्टीके बर्तनमें रक्खा हुआ जल आदि तरल पदार्थ न तो चूता है और न नष्ट ही होता है, उसी प्रकार तपस्यासे तपा हुआ सूक्ष्म शरीर ब्रह्मलोकतकके विषयोंका अनुभव करता है ॥ २५ ॥

विषयानश्नुते यस्तु न स भोक्ष्यत्यसंशयम् ।

यस्तु भोगांस्त्यजेदात्मा स वै भोक्तुं व्यवस्यति ॥ २६ ॥

जो मनुष्य शब्द, स्पर्श आदि विषयोंका उपभोग करता है, वह निश्चय ही ब्रह्मानन्दके अनुभवसे वंचित रह जायगा, परंतु जो विषयोंका परित्याग करता है, वह अवश्य ही ब्रह्मानन्दके अनुभवमें समर्थ हो सकता है ॥ २६ ॥

नीहारेण हि संवीतः शिश्नोदरपरायणः ।

जात्यन्ध इव पन्थानमावृतात्मा न बुद्धयते ॥ २७ ॥

जैसे जन्मका अंधा रास्तेको नहीं देख पाता, वैसे ही शिश्नोदरपरायण एवं अज्ञानसे आवृत जीव मायारूप कुहासासे आच्छन्न होनेके कारण मोक्षमार्गको नहीं समझ पाता है ॥ २७ ॥

वणिग् यथा समुद्राद् वै यथार्थं लभते धनम् ।

तथा मर्त्यार्णवे जन्तोः कर्मविज्ञानतो गतिः ॥ २८ ॥

जैसे वैश्य समुद्रमार्गसे व्यापार करने जाकर अपने मूलधनके अनुसार द्रव्य कमाकर लाता है, उसी प्रकार संसारसागरमें व्यापार करनेवाला जीव अपने कर्म एवं विज्ञानके अनुरूप गति पाता है ॥ २८ ॥

अहोरात्रमये लोके जरारूपेण संसरन् ।

मृत्युर्ग्रसति भूतानि पवनं पन्नगो यथा ॥ २ ९ ॥

दिन और रात्रिमय संसारमें बुढ़ापाका रूप धारण करके घूमती हुई मृत्यु समस्त प्राणियोंको उसी प्रकार खाती रहती है, जैसे सर्प हवा पीया करता है ॥ २ ९ ॥

स्वयंकृतानि कर्माणि जातो जन्तुः प्रपद्यते ।

नाकृत्वा लभते कश्चित् किंचिदत्र प्रियाप्रियम् ॥ ३० ॥

जीव जगत्में जन्म लेकर अपने पूर्वकृत कर्मोंका ही फल भोगता है; पूर्वजन्ममें कुछ किये बिना यहाँ कोई भी किसी इष्ट या अनिष्ट फलको नहीं पाता है ॥ ३० ॥