पराशरगीता : परम कल्याण प्राप्त करने के लिए मनुष्य को कौन-सा शुभ कर्म करना चाहिए?
धर्म का अनुष्ठान और पुण्य
महाभारतके सन्दर्भ सहित वास्तविक आख्यान — मूल श्लोक और पृष्ठ-सङ्केतके साथ।
महाभारत — खण्ड ५ · शान्तिपर्व → मोक्षधर्मपर्व · अध्याय 290–297 · पृष्ठ 1913–1955
5,267 शब्द · 27 मिनटका पाठ · 40 श्लोक
भीष्म ने युधिष्ठिर से कहा
राजा जनक के कल्याण हेतु पराशर मुनि द्वारा दिए गए उपदेशों को सुनाना
युधिष्ठिर ने भीष्म पितामह की ओर देखते हुए अत्यन्त विनयपूर्वक कहा— "महाबाहु पितामह! अब इसके बाद जो भी कल्याण-प्राप्तिका उपाय हो, वह मुझे बताइये। जैसे अमृत पीनेसे मन नहीं भरता, उसी तरह आपके वचन सुननेसे मुझे तृप्ति नहीं होती है। पुरुषप्रवर! इसीलिये मैं पूछता हूँ कि पुरुष कौन-सा शुभ कर्म करे तो इसे इस लोक और परलोकमें भी परम कल्याणकी प्राप्ति हो सकती है, यह मुझे बतानेकी कृपा करें।"
किं कर्म पुरुषः कृत्वा शुभं पुरुषसत्तम ।
श्रेयः परमवाप्नोति प्रेत्य चेह च तद् वद ॥
पुरुषप्रवर! इसीलिये मैं पूछता हूँ कि पुरुष कौन-सा शुभ कर्म करे तो इसे इस लोक और परलोकमें भी परम कल्याणकी प्राप्ति हो सकती है, यह मुझे बतानेकी कृपा करें ।
भीष्मजी ने युधिष्ठिर को सम्बोधित करते हुए कहा— "युधिष्ठिर! इस विषयमें भी मैं तुम्हें पूर्ववत् एक प्राचीन प्रसङ्ग सुनाऊँगा। एक समय महा-यशस्वी राजा जनकने महात्मा पराशर मुनिसे पूछा— 'मुने! कौन - सी ऐसी वस्तु है जो समस्त प्राणियोंके लिये इहलोक और परलोकमें भी कल्याणकारी एवं जानने योग्य है? उसे आप मुझे बताइये'।"
ततः स तपसा युक्तः सर्वधर्मविधानवित् ।
नृपायानुग्रहमना मुनिर्वाक्यमथाब्रवीत् ॥
तब सम्पूर्ण धर्मोंके विधानको जाननेवाले वे तपस्वी मुनि राजा जनकपर अनुग्रह करनेकी इच्छासे इस प्रकार बोले ।
तब सम्पूर्ण धर्मोंके विधानको जाननेवाले वे तपस्वी मुनि राजा जनकपर अनुग्रह करनेकी इच्छासे इस प्रकार बोले— "राजन्! जैसा कि मनीषी पुरुषोंका कथन है, धर्मका ही विधिपूर्वक अनुष्ठान किया जाय तो वह इहलोक और परलोकमें भी कल्याणकारी होता है। उससे बढ़कर दूसरा कोई श्रेयका उत्तम साधन नहीं है। धर्मको जानकर उसका आश्रय लेनेवाला मनुष्य स्वर्गलोकमें सम्मानित होता है। वेदोंमें जो ‘सत्यं वद, धर्मं चर, यजेत, जुहुयात्' इत्यादि वाक्योंद्वारा मनुष्योंका कर्तव्य विधान किया गया है, वही धर्मका लक्षण है। सभी आश्रमोंके लोग उस धर्ममें ही स्थित रहकर इस जगत् में अपने - अपने कर्मोंका अनुष्ठान करते हैं।"
अतः परं महाबाहो यच्छ्रेयस्तद् वदस्व मे ।
न तृप्याम्यमृतस्येव वचसस्ते पितामह ॥
युधिष्ठिरने कहा – महाबाहु पितामह! अब इसके बाद जो भी कल्याण-प्राप्तिका उपाय हो, वह मुझे बताइये । जैसे अमृत पीनेसे मन नहीं भरता, उसी तरह आपके वचन सुननेसे मुझे तृप्ति नहीं होती है ।
पराशरजी ने आगे विस्तार से समझाते हुए कहा— "तात! इस लोकमें चार प्रकारकी जीविकाका विधान है। मनुष्य इन्हीं चार प्रकारकी जीविकाओंका आश्रय लेकर रहते हैं। वह जीविका दैवेच्छासे चलती है। जो प्राणी नाना प्रकारके क्रमसे पुण्य और पापकर्मका सेवन करके पञ्चत्वको प्राप्त हो गये हैं, अर्थात् स्थूल शरीरका त्याग कर देते हैं, उनको मिलनेवाली गति नाना प्रकारकी बतायी गयी है। जैसे ताँबे आदिके बर्तनोंपर जब सोने और चाँदीकी कलई चढ़ा दी जाती है तब वे वैसे ही दिखायी देने लगते हैं। उसी प्रकार पूर्व कर्मोंके वशीभूत प्राणी पूर्वकृत कर्मसे लिप्त रहता है; पुण्यकर्मसे लिप्त होनेके कारण वह सुखी होता है और पापसे लिप्त होनेके कारण उसे दुःख उठाना पड़ता है। जैसे बिना बीजके कोई अङ्कुर पैदा नहीं होता, उसी प्रकार पुण्यकर्म किये बिना कोई सुखी या समृद्धिशाली नहीं हो सकता; अतः मनुष्य देहत्यागके पश्चात् पुण्यकर्मके फलसे ही सुख पाता है।"
नाबीजाज्जायते किंचिन्नाकृत्वा सुखमेधते ।
सुकृतैर्विन्दते सौख्यं प्राप्य देहक्षयं नरः ॥
जैसे बिना बीजके कोई अंकुर पैदा नहीं होता, उसी प्रकार पुण्यकर्म किये बिना कोई सुखी या समृद्धिशाली नहीं हो सकता; अतः मनुष्य देहत्यागके पश्चात् पुण्यकर्मोंके फलसे ही सुख पाता है ।
मुनि ने आगे कहा— "तात! इस विषयमें नास्तिक कहते हैं कि 'मैं प्रारब्धको प्रत्यक्ष नहीं देख पाता तथा प्रारब्धके अस्तित्वका सूचक अनुमानप्रमाण भी नहीं है। किन्तु देवता, गन्धर्व और दानव आदि योनियाँ तो स्वभावसे ही प्राप्त होती हैं।' किन्तु इसके उत्तरमें यह कहा जा सकता है कि मरकर गये हुए प्राणी पूर्वजन्ममें किये हुए कर्मको सदैव याद नहीं रख सकते। किन्तु जब किसी पूर्वकृत कर्मका फल प्राप्त होता है तब वे ही लोग सदा— मन, वाणी, नेत्र और क्रियाद्वारा किए हुए— चार प्रकारके कर्मका स्मरण करते हैं; अर्थात् वे कहते हैं कि मैंने पूर्व जन्ममें कोई ऐसा कर्म किया होगा जिसका फल इस रूपमें प्राप्त हुआ है। नास्तिक लोग यह कहते हैं कि लोकयात्राके निर्वाह और मनकी शान्तिके लिये वेदोक्त शब्दोंको प्रमाण माना गया है; अर्थात् वेदोंमें जो कर्म करनेका विधान है, वह तो असमर्थ पुरुषोंके जीविकानिर्वाहके लिये है और जो पूर्वजन्मके किये हुए कर्मकी चर्चा आयी है वह दुखी मनुष्योंके मनको धीरज बँधानेके लिये है। परन्तु यह मत ठीक नहीं है; क्योंकि पतञ्जलि आदि ज्ञानवृद्ध पुरुषोंने ऐसा उपदेश नहीं किया है। उन्होंने 'तद्विपाको जात्यायुर्भोगाः' इस सूत्रके द्वारा स्पष्ट बताया है कि जाति (जन्म), आयु और सुख-दुःख रूप भोग, ये सब पूर्वकृत कर्मका फल हैं। मनुष्य नेत्र, मन, वाणी और क्रियाके द्वारा चार प्रकारके कर्म करता है और जैसा कर्म करता है वैसा ही उसका फल पाता है।"
"राजन्! मनुष्य कर्मके फलरूपसे कभी केवल सुख, कभी सुख-दुःख दोनोंको एक साथ प्राप्त करता है। पुण्य या पाप कोई भी कर्म क्यों न हो, फल भोगे बिना उसका नाश नहीं होता। संसार- सागरमें डूबते हुए मनुष्यका पुण्यकर्म कभी - कभी तबतक स्थिर- जैसा रहता है जबतक कि दुःखसे उसका छुटकारा नहीं हो जाता। तदनन्तर दुःखका भोग समाप्त कर लेनेपर जीव अपने पुण्य कर्मके फलका उपभोग आरम्भ करता है। जब पुण्यका भी क्षय हो जाता है तब फिर वह पापका फल भोगता है। नरेश्वर! इस बातको तुम अच्छी तरह समझ लो।"
निरन्तरं च मिश्रं च लभते कर्म पार्थिव ।
कल्याणं यदि वा पापं न तु नाशोऽस्य विद्यते ॥
राजन्! मनुष्य कर्मके फलरूपसे कभी केवल सुख, कभी सुख-दुःख दोनोंको एक साथ प्राप्त करता है । पुण्य या पाप कोई भी कर्म क्यों न हो, फल भोगे बिना उसका नाश नहीं होता ।
पराशरजी ने धर्म के लक्षणों का वर्णन करते हुए कहा— "दमः, क्षमा, धृति, तेजः, सन्तोषः, सत्यवादिता, ह्रीः, अहिंसा, अस्वयनिता और दाक्ष्यं— ये सभी सुखावहा हैं। विद्वान् पुरुषको जीवनपर्यन्त पाप या पुण्यमें भी आसक्त न होकर अपने मनको परमात्माके ध्यानमें लगानेका प्रयत्न करना चाहिये। जीव दूसरेके किये हुए शुभ अथवा अशुभ कर्मको नहीं भोगता, वह स्वयं जैसा कर्म करता है वैसा ही फल पाता है। विवेकी पुरुष सुख और दुःखको अपने भीतर विलीन करके अन्य मार्गसे अर्थात् मोक्षप्राप्तिके मार्गद्वारा चलता है। जो स्त्री, पुत्र और धन आदिमें आसक्त हैं, वे सब संसारी जीव उससे भिन्न दूसरे ही मार्गपर चलते हैं; अतः जन्मते और मरते रहते हैं।"
"मनुष्य दूसरेके जिस कर्मकी निन्दा करे, उसको स्वयं भी न करे। जो दूसरेकी निन्दा करता है; किन्तु स्वयं उसी निन्द्य कर्ममें लगा रहता है, वह उपहासका पात्र है। राजन्यो! डरपोक क्षत्रिय, ब्राह्मण जो भक्ष्याभक्ष्यका विचार न करके सब कुछ खानेवाला हो, वैश्य जो धनोपार्जनकी चेष्टासे रहित या अकर्मण्य हो, शूद्र जो आलसी हो, विद्वान् जो उत्तम गुणोंसे रहित हो, कुलीन पुरुष जो सदाचारका पालन न करनेवाला हो, धार्मिक पुरुष जो सत्यसे भ्रष्ट हुआ हो, स्त्री जो दुष्टा हो, योगी जो विषयासक्त हो, मनुष्य जो केवल अपने लिये भोजन बनानेवाला हो, वक्ता जो मूर्ख हो, राजा जो प्रजासे रहित हो और राजा जो अजितेन्द्रिय होकर प्रजाके प्रति स्नेह न रखनेवाला हो— ये सब शोकके योग्य हैं।"
एते सर्वे शोच्यतां यान्ति राजन् यश्चायुक्तः स्नेहहीनः प्रजासु ॥
राजन्! डरपोक क्षत्रिय, ( भक्ष्याभक्ष्यका विचार न करके ) सब कुछ खानेवाला ब्राह्मण, धनोपार्जनकी चेष्टासे रहित या अकर्मण्य वैश्य, आलसी शूद्र, उत्तम गुणोंसे रहित विद्वान्, सदाचारका पालन न करनेवाला कुलीन पुरुष, सत्यसे भ्रष्ट हुआ धार्मिक पुरुष, दुराचारिणी स्त्री, विषयासक्त योगी, केवल अपने लिये भोजन बनानेवाला मनुष्य, मूर्ख वक्ता, राजासे रहित राष्ट्र तथा अजितेन्द्रिय होकर प्रजाके प्रति स्नेह न रखनेवाला राजा - ये सब- के -सबर शोकके योग्य हैं, अर्थात् निन्दनीय हैं ।
भीष्म बोले— हे युधिष्ठिर! जिस प्रकार एक जलयुक्त पक्के घड़े में यदि दूसरा जल डाला जाए, तो पात्र में रखा हुआ पहले का जल और नया डाला गया जल, दोनों मिलकर बढ़ जाते हैं और वह घड़ा अधिक जल से सम्पन्न हो जाता है; ठीक उसी प्रकार मनुष्य द्वारा विवेकपूर्वक किए गए सञ्चित पुण्य कर्मों के समान जब नए पुण्य कर्म किए जाते हैं, तो वे दोनों मिलकर उसे महान् पुण्यात्मा बना देते हैं।
नवे कपाले सलिलं संन्यस्तं हीयते यथा ।
नवेतरे तथाभावं प्राप्नोति सुखभावितम् ॥
जैसे नये बने हुए कच्चे घड़ेमें रखा हुआ जल नष्ट हो जाता है, परंतु पके - पकाये घड़ेमें रखा हुआ ज्यों- का - त्यों बना रहता है, उसी प्रकार परिपक्व विशुद्ध अन्तःकरणमें सम्पादित सुखदायक शुभकर्म निश्चल रहते हैं ।
हे नरेश! एक राजा का धर्म है कि वह बढ़े हुए शत्रुओं को जीते और अपनी प्रजा का न्यायपूर्वक पालन करे। नाना प्रकार के यज्ञों द्वारा अग्निदेव को तृप्त करता रहे और यदि वैराग्य उत्पन्न हो जाए, तो मध्यम अथवा अन्तिम अवस्था में वन जाकर निवास करे। हे राजन्! प्रत्येक पुरुष को इन्द्रियसंयमी और धर्मात्मा होकर समस्त प्राणियों को अपने ही समान समझना चाहिए। जो विद्या, तप और अवस्था में अपने से बड़े हों या गुरु-कोटि के लोग हों, उन सबकी यथाशक्ति पूजा करनी चाहिए; क्योंकि सत्यभाषण और अच्छे आचार-विचार से ही सुख प्राप्त होता है।
दमान्वितः पुरुषो धर्मशीलो भूतानि चात्मानमिवानुपश्येत् ।
गरीयसः पूजयेदात्मशक्त्या सत्येन शीलेन सुखं नरेन्द्र ॥
राजन्! प्रत्येक पुरुषको इन्द्रियसंयमी और धर्मात्मा होकर समस्त प्राणियोंको अपने ही समान समझना चाहिये । जो विद्या, तप और अवस्थामें अपनेसे बड़े हों अथवा गुरु - कोटिके लोग हों, उन सबकी यथाशक्ति पूजा करनी चाहिये। सत्यभाषण और अच्छे आचार-विचारसे ही सुख मिलता है ।
पराशर मुनि आगे कहते हैं— हे राजन्! कौन किसका उपकार करता है और कौन किसको देता है? वास्तव में यह प्राणी सारा कार्य स्वयं अपने ही लिये करता है। यदि अपना सगा भाई भी श्रेष्ठ स्वभाव और स्नेह का त्याग कर दे, तो लोग उसे त्याग देते हैं; फिर दूसरे किसी साधारण मनुष्य की तो बात ही क्या है! शास्त्र कहते हैं कि श्रेष्ठ पुरुष को दिया गया दान और श्रेष्ठ पुरुष से प्राप्त हुआ प्रतिग्रह—इन दोनों का महत्त्व बराबर है, किन्तु ब्राह्मण के लिये प्रतिग्रह स्वीकार करने की अपेक्षा दान देना अधिक पुण्यमय माना गया है। हे राजन्! जो धन न्याय से प्राप्त किया गया हो और जिसे न्याय से ही बढ़ाया गया हो, उसे यत्नपूर्वक धर्म के उद्देश्य से बचाकर रखना चाहिए; यही धर्मशास्त्र का निश्चय है।
कः कस्य चोपकुरुते कश्च कस्मै प्रयच्छति ।
प्राणी करोत्ययं कर्म सर्वमात्मार्थमात्मना ॥
पराशरजी कहते हैं— राजन्! कौन किसका उपकार करता है और कौन किसको देता है? यह प्राणी सारा कार्य स्वयं अपने ही लिये करता है ।
जो व्यक्ति मौसम का विचार करके अपनी शक्ति के अनुसार प्यासे और भूखे अतिथियों को ठण्डा या गरम जल और अन्न पवित्र भाव से अर्पण करता है, वह उत्तम फल पाता है। महात्मा राजा रन्तिदेव ने फल, मूल और पत्तों से ऋषि-मुनियों का पूजन किया था, जिससे उन्हें वह सिद्धि प्राप्त हुई जिसकी सब अभिलाषा रखते हैं। इसी प्रकार पृथ्वीपालक महाराज शैब्य ने भी उन फल और पत्रों से माठर मुनियों को सन्तुष्ट किया, जिससे उन्हें उत्तम लोक की प्राप्ति हुई।
हे वत्स! प्रत्येक मनुष्य देवता, अतिथि, भरण-पोषण के योग्य कुटुम्बीजन, पितर तथा अपने-पराये, इन सबका ऋणी होकर जन्म लेता है; अतः उसे उस ऋण से मुक्त होने का यत्न करना चाहिए। वेद-शास्त्रों का स्वाध्याय करके ऋषियों के, यज्ञ-कर्म द्वारा देवताओं के, श्राद्ध और दान से पितरों के तथा स्वागत-सत्कार एवं सेवा से अतिथियों के ऋण से छुटकारा मिलता है। इसी प्रकार वेद-वाणी के पठन, श्रवण एवं मनन से, यज्ञशेष अन्न के भोजन से और जीवों की रक्षा करने से मनुष्य अपने ऋणों से मुक्त होता है। अपने परिवार के भरण-पोषण का प्रबन्ध करना आरम्भ कर देना चाहिए, जिससे कुटुम्बीजनों के ऋण से भी मुक्ति मिल जाती है।
देवतातिथिभृत्येभ्यः पितृभ्यश्चात्मनस्तथा ।
ऋणवान् जायते मर्त्यस्तस्मादनृणतां व्रजेत् ॥
प्रत्येक मनुष्य देवता, अतिथि, भरण- पोषणके योग्य कुटुम्बीजन, पितर तथा अपने-आपका भी ऋणी होकर जन्म लेता है; अतः उसे उस ऋणसे मुक्त होनेका यत्न करना चाहिये ।
स्मरण रहे कि ऋषि-मुनियों के पास धन नहीं था, फिर भी वे अपने प्रयत्न से सिद्ध हुए क्योंकि उन्होंने विधिपूर्वक अग्निहोत्र किया था। महाबाहो! ऋचीक के पुत्र यज्ञ में भाग लेने वाले देवताओं की वेदमन्त्रों द्वारा स्तुति करके विश्वामित्र के पुत्र हो गए। वहीं महर्षि उशना ने देवाधिदेव महादेव को प्रसन्न करके उनका 'शुक्र'त्व प्राप्त किया और उसी नाम से प्रसिद्ध हुए; उन्होंने पार्वती देवी की स्तुति की और आज वे यशस्वी मुनि आकाश में ग्रहरूप से स्थित होकर आनन्द भोग रहे हैं। असित, देवल, नारद, पर्वत, कक्षीवान्, जामदग्न्य, राम, ताण्ड्य और आत्मवान—ये सब ऋषि कहलाए।
जो पूजा के योग्य नहीं थे, वे भी भगवान विष्णु की स्तुति करके पूजनीय सन्त बने और उन्हीं को प्राप्त हुए। इस लोक में निन्दनीय आचरण करके कोई भी अपने अभ्युदय की आशा नहीं रख सकता। धर्म का पालन करते हुए ही जो धन प्राप्त होता है, वही सच्चा धन है; अधर्म से प्राप्त धन तो धिक्कार देने योग्य है। संसार में धन की इच्छा के लिए कभी शाश्वत धर्म का त्याग नहीं करना चाहिए।
येऽर्था धर्मेण ते सत्या येऽधर्मेण धिगस्तु तान् ।
धर्मं वै शाश्वतं लोके न जह्याद् धनकाङ्क्षया ॥
धर्मका पालन करते हुए ही जो धन प्राप्त होता है, वही सच्चा धन है । जो अधर्मसे प्राप्त होता है, वह धन तो धिक्कार देने योग्य है। संसारमें धनकी इच्छासे शाश्वत धर्मका त्याग कभी नहीं करना चाहिये ।
हे राजेन्द्र! जो प्रतिदिन अग्निहोत्र करता है, वही वास्तव में धर्मात्मा और पुण्यकर्म करने वालों में श्रेष्ठ है। सम्पूर्ण वेद दक्षिण, आहवनीय तथा गार्हपत्य—इन तीन अग्नियों में ही स्थित हैं। जिसका सदाचार एवं सत्कर्म कभी लुप्त नहीं होता, वही ब्राह्मण है। यदि सदाचार का ठीक-ठीक पालन हो, तो अग्निहोत्र न हो सके तो भी अच्छा है; किन्तु केवल अग्निहोत्र करने के लिए सदाचार का त्याग करना कदापि कल्याणकारी नहीं है। क्योंकि अग्नि ही आत्मा है, माता है, पिता है और गुरु भी है।
आहिताग्निर्हि धर्मात्मा यः स पुण्यकृदुत्तमः ।
वेदा हि सर्वे राजेन्द्र स्थितास्त्रिष्वग्निषु प्रभो ॥
राजेन्द्र! जो प्रतिदिन अग्निहोत्र करता है, वही धर्मात्मा है और वही पुण्यकर्म करनेवालोंमें श्रेष्ठ है । प्रभो सम्पूर्ण वेद दक्षिण, आहवनीय तथा गार्हपत्य–इन तीन अग्नियोंमें ही स्थित हैं ।
जो अभिमान का त्याग कर वृद्ध पुरुषों की सेवा करता है, विद्वानों का आदर करता है, काम-भोग में अनासक्त रहकर सबको प्रेमभाव से देखता है, मन में चतुराई न रखकर धर्म में संलग्न रहता है और दूसरों का दमन या हिंसा नहीं करता, वह इस लोक में श्रेष्ठ है और सत्पुरुष भी उसका आदर करते हैं।
पराशर मुनि कहते हैं— हे राजन्! शूद्र के लिये तीनों वर्णों की सेवा से जीवन-निर्वाह करना ही सबसे उत्तम है। यदि वे इस सेवावृत्ति का प्रेमपूर्वक पालन करें, तो यह उन्हें सदा धर्मिष्ठ बनाती है। यदि उनके पास पूर्वजों से प्राप्त जीविका का कोई निश्चित साधन न हो, तो वे दूसरी कोई वृत्ति न खोजें, बल्कि तीनों वर्णों की सेवा को ही अपनी जीविका बना लें।
वृत्तिश्चेन्नास्ति शूद्रस्य पितृपैतामही ध्रुवा ।
न वृत्तिं परतो मार्गेच्छुश्रूषां तु प्रयोजयेत् ॥
यदि शूद्रके पास बाप - दादोंका दिया हुआ जीविकाका कोई निश्चित साधन नहीं है तो वह दूसरी किसी वृत्तिका अनुसंधान न करे । तीनों वर्णोंकी सेवाको ही जीविकाके उपयोगमें लाये ।
धर्म पर दृष्टि रखने वाले सत्पुरुषों के सङ्गत में रहना सदैव श्रेष्ठ है; परन्तु किसी भी दशा में दुष्ट पुरुषों का सङ्गत अच्छा नहीं है—यह मेरा दृढ़ निश्चय है। जैसे सूर्य के सामीप्य से उदयाचल पर्वत की प्रत्येक वस्तु चमक उठती है, वैसे ही साधु पुरुषों के निकट रहने से नीच वर्ण का मनुष्य भी सद्गुणों से सुशोभित होने लगता है। जिस प्रकार श्वेत वस्त्र को किसी रङ्ग में रँगा जाता है, वह वैसा ही रूप धारण कर लेता है; ठीक उसी प्रकार जैसा सङ्गत किया जाता है, वैसा ही रङ्ग स्वयं पर चढ़ता है। इसलिए तुम गुणों में ही अनुराग रखो, दोषों में कभी नहीं; क्योंकि यहाँ मनुष्यों का जीवन अनित्य और चञ्चल है।
जो विद्वान् सुख अथवा दुःख में रहकर भी सदा शुभकर्म का ही अनुष्ठान करता है, वही वास्तव में शास्त्रों को समझ पाता है। यदि धर्म के विपरीत कोई कर्म लौकिक दृष्टि से लाभदायक भी लगे, तो बुद्धिमान पुरुष को उसका सेवन नहीं करना चाहिए; क्योंकि उसे इस जगत् में हितकर नहीं माना गया है। जो कार्य धर्म के अनुकूल हो, चाहे वह अल्प लाभदायक ही क्यों न हो, उसे निःशङ्क होकर कर लेना चाहिए; क्योंकि वह अन्त में अत्यन्त सुख देने वाला होता है। जो राजा दूसरों की हजारों गौएँ छीनकर दान करता है और अपनी प्रजा की रक्षा नहीं करता, वह नाममात्र का दानी और राजा है; वास्तव में तो वह चोर और डाकू है।
धर्मादपेतं यत् कर्म यद्यपि स्यान्महाफलम् ।
न तत् सेवेत मेधावी न तद्धितमिहोच्यते ॥
धर्मके विपरीत कर्म यदि लौकिक दृष्टिसे बहुत लाभदायक हो तो भी बुद्धिमान् पुरुषको उसका सेवन नहीं करना चाहिये; क्योंकि उसे इस जगत् में हितकर नहीं बताया जाता है ।
ईश्वर ने सबसे पहले लोक-पूजित ब्रह्मा को उत्पन्न किया। ब्रह्मा ने 'पर्जन्य' नामक एक पुत्र को जन्म दिया, जो सम्पूर्ण लोकों को धारण करने में तत्पर है। वैश्य को चाहिए कि वह उसकी पूजा करके खेती और पशुपालन द्वारा स्वयं को समृद्ध बनाए; राजा को उसकी रक्षा करनी चाहिए और ब्राह्मणों को कुटिलता, शठता तथा क्रोध त्यागकर, हव्य-कव्य का प्रयोग करते हुए उस अन्न-धन का यज्ञ (लोकहित के कार्य) में सदुपयोग करना चाहिए। शूद्रों को यज्ञभूमि और त्रैवर्णिकों के घरों को साफ रखना चाहिए; ऐसा करने से धर्म का नाश नहीं होता, बल्कि उसका पालन होता है।
तमर्चयित्वा वैश्यस्तु कुर्यादत्यर्थमृद्धिमत् ।
रक्षितव्यं तु राजन्यैरुपयोज्यं द्विजातिभिः ॥
अजिह्मैरशठक्रोधैर्हव्यकव्यप्रयोक्तृभिः ।
शूद्रैर्निर्मार्जनं कार्यमेवं धर्मो न नश्यति ॥
उसीकी पूजा करके वैश्यको चाहिये कि खेती और पशुपालन आदिके द्वारा उसे अत्यन्त समृद्धिशाली बनाये । राजाको उसकी रक्षा करनी चाहिये और ब्राह्मणोंको चाहिये कि वे कुटिलता, शठता एवं क्रोधको त्यागकर हव्य- कव्यका प्रयोग करते हुए उस अन्न-धनका यज्ञ ( लोकहितके कार्य ) में सदुपयोग करें। शूद्रोंको यज्ञभूमि तथा त्रैवर्णिकोंके घरोंको झाड़-बुहारकर साफ रखना चाहिये। ऐसा करनेसे धर्मका नाश नहीं होता ।
हे राजेन्द्र! जब प्रजा सुखी होती है, तब स्वर्ग में देवता भी प्रसन्न रहते हैं। जो राजा धर्मपूर्वक प्रजा की रक्षा करता है, वह लोक में पूजित होता है। इसी प्रकार जो ब्राह्मण धर्मपूर्वक स्वाध्याय करता है, जो वैश्य धर्म के अनुसार धनोपार्जन में तत्पर रहता है तथा जो शूद्र जितेन्द्रिय भाव से रहकर सर्वदा द्विजातियों की सेवा करता है—ये सभी अपने धर्माचरण के कारण सम्मानित होते हैं; इसके विपरीत आचरण करने से सब अपने धर्म से गिर जाते हैं।
अप्रणष्टे ततो धर्मे भवन्ति सुखिताः प्रजाः ।
सुखेन तासां राजेन्द्र मोदन्ते दिवि देवताः ॥
धर्मका नाश न होकर उसका पालन होता रहे तो सारी प्रजा सुखी होती है । राजेन्द्र! प्रजाओंके सुखी होनेपर स्वर्गमें देवता भी प्रसन्न रहते हैं ।
हे राजन्! प्राणों को कष्ट देकर भी यदि न्याय से कमाई हुई थोड़ी-सी कौड़ियों का दान किया जाए, तो वह महान् फल देने वाला होता है; फिर जो वस्तुएँ हजारों की सङ्ख्या में दी जाती हैं, उनकी क्या बात करें! जो राजा ब्राह्मणों का सत्कार करके उन्हें जैसा दान देता है, वैसा ही उत्तम फल वह सदा भोगता है। स्वयं ब्राह्मण के पास जाकर उसे सन्तुष्ट करते हुए जो दान दिया जाता है, वह प्रशंसनीय और उत्तम है; याचना करने पर जो प्राप्त हो, वह मध्यम श्रेणी का दान है; और जो उपेक्षा अथवा अश्रद्धा से दिया जाए, उसे सत्यवादी मुनि अधम श्रेणी का दान कहते हैं।
सत्कृत्य हि द्विजातिभ्यो यो ददाति नराधिपः ।
यादृशं तादृशं नित्यमश्नाति फलमूर्जितम् ॥
जो राजा ब्राह्मणोंका सत्कार करके उन्हें जैसा दान देता है, वैसा ही उत्तम फलका वह सदा ही उपभोग करता है ।
जैसे डूबता हुआ मनुष्य नाना प्रकार के उपायों द्वारा समुद्र से पार हो जाता है, वैसे ही तुम भी संसार-समुद्र से छुटकारा पाने का प्रयत्न करो।
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्व के अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्व में पराशरगीता का दो सौ तिरानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ।
भीष्म कहते हैं— हे युधिष्ठिर! राजा जनक के कल्याण हेतु पराशर मुनि ने धर्म के सूक्ष्म भेदों का वर्णन किया। मुनि ने कहा, "राजन्! धन का अर्जन करते समय उसके स्रोतों का ज्ञान होना आवश्यक है। ब्राह्मण के यहाँ से प्राप्त हुआ, क्षत्रिय द्वारा युद्ध में जीतकर लाया गया, वैश्य द्वारा न्यायपूर्वक कृषि आदि से कमाया गया और शूद्र की सेवा से प्राप्त हुआ— यदि इतना थोड़ा-सा भी धन हो, तो उसकी बड़ी प्रशंसा की जाती है; क्योंकि यदि उसका उपयोग धर्म के कार्यों में हो, तो वह महान फल देने वाला होता है।"
न संकरेण द्रविणं प्रचिन्वीयाद् विचक्षणः ।
धर्मार्थं न्यायमुत्सृज्य न तत् कल्याणमुच्यते ॥
बुद्धिमान् पुरुषको चाहिये कि वह धर्म करनेके लिये न्यायको त्यागकर पापमिश्रित मार्गसे धनका संग्रह न करे; क्योंकि उसे कल्याणकारी नहीं बताया जाता है ।
मुनि ने आगे वर्णों के धर्म का विवेचन करते हुए कहा, "शूद्र को तीनों वर्णों का नित्य सेवक माना गया है। यदि कोई ब्राह्मण जीविका के अभाव में क्षत्रिय या वैश्य के धर्म से अपना जीवन निर्वाह करे, तो वह पतित नहीं होता; किन्तु जब वह शूद्र के धर्म को अपना लेता है, तब वह तत्काल पतित हो जाता है। यदि शूद्र सेवावृत्ति से अपनी जीविका न चला सके, तो उसके लिए व्यापार, पशुपालन तथा शिल्पकला आदि का मार्ग भी खुला है।"
मुनि ने समाज में प्रचलित कुछ कार्यों के प्रति सचेत करते हुए कहा, "रङ्गमञ्च पर स्त्री के वेष में नाचकर खेल दिखाना, बहुरूपिया बनना, मदिरा और मांस का व्यापार करना अथवा लोहे और चमड़े की बिक्री करना— ये सभी कार्य लोक में निन्दित माने गए हैं। जिसके घर में पूर्व परम्परा से ये काम न होते आए हों, उसे स्वयं इनका आरम्भ नहीं करना चाहिए; और यदि किसी के यहाँ पहले से इन्हें करने की प्रथा हो, तो वह भी यदि इन्हें छोड़ दे, तो वह महान धर्म है— ऐसा शास्त्र का निर्णय है।"
मुनि ने चेतावनी देते हुए कहा, "यदि कोई जगत् में प्रसिद्ध हुआ पुरुष घमण्ड या लोभ के कारण पापाचरण करने लगे, तो उसका कार्य अनुकरण योग्य नहीं होता। पुराणों में सुना जाता है कि पूर्वकाल में अधिकांश मनुष्य संयमी, धार्मिक और न्यायोचित आचार का पालन करने वाले थे; उस समय अपराधियों को केवल धिक्कारमात्र का ही दण्ड दिया जाता था। राजन्! इस जगत् में सदा मनुष्यों के धर्म की ही प्रशंसा होती आई है और धर्मपरायण लोग केवल सद्गुणों का ही सेवन करते हैं।"
धर्म एव सदा नॄणामिह राजन् प्रशस्यते ।
धर्मवृद्धा गुणानेव सेवन्ते हि नरा भुवि ॥
राजन्! इस जगत्में सदा मनुष्योंके धर्मकी ही प्रशंसा होती आयी है । धर्ममें बढ़े - चढ़े लोग इस भूतलपर केवल सद्गुणोंका ही सेवन करते हैं ।
परन्तु मुनि ने एक भयावह कालखण्ड का वर्णन किया, "तात! जनेश्वर! उस धर्म को असुर सह नहीं सके। वे क्रमशः बढ़ते हुए प्रजा के शरीर में समा गए। तब प्रजाओं में धर्म को नष्ट करने वाला दर्प (अहङ्कार) प्रकट हुआ और उसके पश्चात क्रोध का प्रादुर्भाव हुआ। जब मनुष्य क्रोध से आक्रान्त हुए, तो उनके लज्जायुक्त सदाचार और सङ्कोच का लोप हो गया; इसके बाद उनमें मोह उत्पन्न हुआ। मोह के कारण उनकी विवेकपूर्ण दृष्टि समाप्त हो गई और वे एक-दूसरे का विनाश करके अपने सुख बढ़ाने की चेष्टा करने लगे।"
तासां दर्पः समभवत् प्रजानां धर्मनाशनः ।
दर्पात्मनां ततः पश्चात् क्रोधस्तासामजायत ॥
तब प्रजाओंमें धर्मको नष्ट करनेवाला दर्प प्रकट हुआ । फिर जब प्रजाओंके मनमें दर्प आ गया, तब क्रोधका भी प्रादुर्भाव हो गया ।
मुनि ने आगे कहा, "जब मनुष्य बिगड़ गए, तब उन्हें राह पर लाने में धिक्कार का दण्ड भी सफल न हुआ। सभी मनुष्य देवता और ब्राह्मणों का अपमान कर मनमाने ढङ्ग से विषय-भोगों का सेवन करने लगे। तब भगवान शिव ने देवताओं द्वारा बढ़ाए गए तेज से युक्त एक ही शक्तिशाली बाण के द्वारा, तीन नगरों सहित आकाश में विचरने वाले उन समस्त असुरों को मारकर पृथ्वी पर गिरा दिया। उन असुरों का स्वामी अत्यन्त भयङ्कर और पराक्रमी था, जो देवताओं को सदा भयभीत रखता था; किन्तु भगवान शूलपाणि ने उसे भी मार डाला। उस असुर के मारे जाने के पश्चात मनुष्य पुनः प्रकृतिस्थ हो गए और उन्हें वेद तथा शास्त्रों का ज्ञान प्राप्त हुआ।"
तेषामधिपतिस्त्वासीद् भीमो भीमपराक्रमः ।
देवतानां भयकरः स हतः शूलपाणिना ॥
उन असुरोंका स्वामी भयंकर आकारवाला तथा भीषण पराक्रमी था । देवताओंको वह सदा भयभीत किये रहता था; किंतु भगवान् शूलपाणिने उसे भी मार डाला ।
इसके उपरान्त सप्तर्षियों ने इन्द्र को स्वर्ग में अभिषिक्त किया और स्वयं मनुष्य के शासन-कार्य में लग गए। उसके बाद विपृथु नामक राजा भू-मण्डल का स्वामी हुआ और अनेक क्षत्रिय विभिन्न मण्डलों के राजा बने। मुनि ने कहा, "उस समय जो उच्च कुलों में उत्पन्न हुए थे, उनके हृदय से भी आसुरभाव पूर्णतः नहीं निकला था; अतः वे भयङ्कर पराक्रमी होकर भी असुरों जैसे कर्म करने लगे। आज के मूर्ख मनुष्य भी उन्हीं आसुर भावों को अपनाते हैं। इसलिए राजन्! मैं शास्त्रानुसार कहता हूँ कि मनुष्य को उन्नत होने का प्रयत्न तो करना चाहिए, किन्तु हिंसात्मक कर्म का त्याग कर देना चाहिए। बुद्धिमान पुरुष को चाहिए कि वह धन सङ्ग्रह के लिए न्याय त्यागकर पापमिश्रित मार्ग न अपनाए।"
मुनि ने उपदेश समाप्त करते हुए कहा, "नरेश्वर! तुम भी एक जितेंद्रिय क्षत्रिय बनकर अपने बन्धु-बान्धवों के बीच रहकर प्रजा, भृत्य और पुत्रों का उनके स्वधर्म के अनुसार पालन करो। जीवन में इष्ट-अनिष्ट, वैर और सौहार्द का अनुभव करते हुए सहस्रों जन्म बीत जाते हैं; इसलिए केवल सद्गुणों में ही अनुराग रखो। गुणहीन मनुष्य भी अपने गुणों के अभिमान में सन्तुष्ट रहता है, पर यहाँ मनुष्यों में धर्म और अधर्म का विशेष निवास है।"
स त्वमेवंविधो दान्तः क्षत्रियः प्रियबान्धवः ।
प्रजा भृत्यांश्च पुत्रांश्च स्वधर्मेणानुपालय ॥
नरेश्वर! तुम भी इसी प्रकार जितेन्द्रिय क्षत्रिय होकर बन्धु बान्धवोंसे प्रेम रखते हुए प्रजा, भृत्य और पुत्रोंका स्वधर्मके अनुसार पालन करो ।
मुनि ने आगे गृहस्थ जीवन की जटिलता समझाते हुए कहा, "अब मैं तुम्हें तप की विधि बताता हूँ। हे नरश्रेष्ठ! गृहस्थ को राजस और तामस भावों के कारण वस्तुओं और व्यक्तियों में ममता हो जाती है। घर बसाते ही मनुष्य का सम्बन्ध गौ, खेती-बारी, धन, स्त्री और पुत्र जैसे कुटुम्बियों से जुड़ जाता है। वह इनकी अनित्यता को देखे बिना ही इनसे राग और द्वेष करने लगता है। जब मनुष्य द्रव्य में आसक्त होता है, तब मोह की कन्या 'रति' उसके पास आ जाती है। रतिकी उपासना में लगे लोग भोग को ही परम लाभ समझते हैं।"
"तदनन्तर लोभ के कारण वे अपने परिजनों की सङ्ख्या बढ़ाते हैं और उनके पालन हेतु धन सङ्ग्रह करते हैं। मनुष्य पाप जानते हुए भी धन के लिए उसका सेवन करता है और बाल-बच्चों के स्नेह में डूबा रहता है; जब उनमें से कोई मर जाता है, तो वह अत्यन्त दुखी होता है। धन से सम्मान मिलने पर वह सदा अपमान से बचने का प्रयत्न करता है और इसी सङ्घर्ष में एक दिन नष्ट हो जाता है। वास्तव में, जो लोग शुभ कर्म करते हैं परन्तु सुख की इच्छा त्याग देते हैं, वही ब्रह्मवादी पुरुष सनातन पद को प्राप्त करते हैं।"
तथा हि बुद्धियुक्तानां शाश्वतं ब्रह्मवादिनाम् ।
अन्विच्छतां शुभं कर्म नराणां त्यजतां सुखम् ॥
वास्तवमें जो शुभ कर्मोंका अनुष्ठान तो करते हैं, परन्तु उनसे सुख पानेकी इच्छाको त्याग देते हैं, उन समत्व- बुद्धिसे युक्त ब्रह्मवादी पुरुषोंको ही सनातन पदकी प्राप्ति होती है ।
मुनि ने कहा, "पृथ्वीनाथ! संसारी जीवों को तो तब वैराग्य होता है जब उनके प्रियजनों का नाश हो जाए, धन चला जाए और रोग-चिन्ता से वे कष्ट उठाएं। वैराग्य होने पर ही मनुष्य में आत्म-तत्व की जिज्ञासा जागती है, जिससे उसका मन शास्त्रों के स्वाध्याय और तप में लगता है। संसार में ऐसा विवेकी मनुष्य दुर्लभ है जो प्रियजनों के अभाव में तप को ही कल्याण का साधन समझे। किन्तु हे तात! तपस्या में सबका अधिकार है; जितेन्द्रिय और मनोनिग्रही निम्न वर्ण के व्यक्ति के लिए भी तप का विधान है, क्योंकि तप स्वर्ग की राह दिखाता है।"
"प्रजापति ने तपस्या से ही संसार की रचना की थी। आदित्य, वसु, रुद्र, अग्नि, अश्विनीकुमार, वायु, विश्वेदेव, साध्य, पितर, मरुद्गण, यक्ष, राक्षस और गन्धर्व— ये सभी देवता तपस्या से ही सिद्धि प्राप्त करते हैं। ब्रह्माजी द्वारा उत्पन्न मरीचि आदि ब्राह्मण भी तप के प्रभाव से पृथ्वी और आकाश को पवित्र करते हैं। मर्त्यलोक में जो राजा और महान कुल के गृहस्थ दिखाई देते हैं, वह सब उनकी तपस्या का फल है। सुन्दर वस्त्र, आभूषण, वाहन, आसन, महलों का निवास और मन के अनुकूल रूपवती स्त्रियाँ— यह सब तप का ही फल है।"
मर्त्यलोके च राजानो ये चान्ये गृहमेधिनः ।
महाकुलेषु दृश्यन्ते तत् सर्वं तपसः फलम् ॥
मर्त्यलोकमें भी जो राजे - महाराजे तथा अन्यान्य गृहस्थ महान् कुलोंमें उत्पन्न देखे जाते हैं, वह सब उनकी तपस्याका ही फल है ।
अन्त में मुनि ने गम्भीर स्वर में कहा, "परन्तप! त्रिलोकी में ऐसी कोई वस्तु नहीं जो तप से प्राप्त न हो सके; किन्तु जिन्होंने काम्य या निषिद्ध कर्म नहीं किए हैं, उनकी तपस्या का फल सुखभोजों का त्याग ही होता है। असन्तोष ही दुःख का कारण है और लोभ से बुद्धि नष्ट हो जाती है। जब बुद्धि नष्ट होती है, तब मनुष्य न्याय (कर्तव्य-अकर्तव्य) को नहीं देख पाता। इसलिए सुख के क्षय होने पर प्रत्येक पुरुष को घोर तपस्या करनी चाहिए। जो अपने को प्रिय लगता है वह सुख है और जो प्रतिकूल है वह दुःख; तप करने से सुख होता है और न करने से दुःख। जो मनुष्य पापरहित तप करते हैं, वे सदा अपना कल्याण देखते हैं और संसार में उनकी ख्याति होती है।"
नाप्राप्यं तपसः किंचित् त्रैलोक्येऽपि परंतप ।
उपभोगपरित्यागः फलान्यकृतकर्मणाम् ॥
परंतप! त्रिलोकीमें कोई ऐसी वस्तु नहीं है, जो तपस्यासे प्राप्त न हो सके; किंतु जिन्होंने काम्य अथवा निषिद्ध कर्म नहीं किये हैं, उनकी तपस्याका फल सुखभोगोंका परित्याग ही है ।
भीष्म पितामह ने युधिष्ठिर को सुनाया कि कैसे धर्म, तपस्या और दान के विषय में संशय करने वाला मनुष्य अन्ततः पापकर्मों के कारण नरक की ओर अग्रसर होता है। उन्होंने कहा—"हे राजनेश्वर! जो मनुष्य सुख या दुःख, किसी भी परिस्थिति में सदाचार से विचलित नहीं होता, वही वास्तव में शास्त्र का ज्ञाता है।"
धर्मे तपसि दाने च विचिकित्सास्य जायते ।
स कुत्वा पापकान्येव निरयं प्रतिपद्यते ॥
जिसे धर्म, तपस्या और दानमें संशय उत्पन्न हो जाता है, वह पापकर्म करके नरकमें पड़ता है ।
ऋषियों ने समझाया कि विषयों का सुख अत्यन्त क्षणिक है। जैसे धनुष से छूटा हुआ बाण पृथ्वी पर गिरने में जितना समय लेता है, ठीक उतना ही समय इन्द्रियों द्वारा विषयों के भोग में लगता है; और जैसे ही वह सुख नष्ट होता है, मन में तीव्र वेदना उत्पन्न होती है। ऐसे में अज्ञानी पुरुष मोक्ष की प्रशंसा नहीं करते, किन्तु एक विवेकी पुरुष के मन में श्रेष्ठ मोक्षफल की प्राप्ति के लिए शम और दम जैसे गुणों का जन्म होता है। गृहस्थ को चाहिए कि वह बिना प्रयत्न के प्राप्त हुए विषयों का सेवन करे, परन्तु अपने धर्म का पालन करने के लिए सदैव प्रयत्नशील रहे। क्योंकि जब उत्तम कुल में जन्मे और शास्त्रज्ञ पुरुषों के लौकिक कर्म भी नष्ट हो जाते हैं, तब केवल तप ही एकमात्र सत्कर्म शेष रह जाता है। जिस प्रकार नदियाँ समुद्र में मिलकर एक हो जाती हैं, उसी प्रकार समस्त आश्रमों का आधार गृहस्थ ही होता है।
यथा नदीनदाः सर्वे सागरे यान्ति संस्थितिम् ।
एवमाश्रमिणः सर्वे गृहस्थे यान्ति संस्थितिम् ॥
जैसे सम्पूर्ण नदियाँ और नद समुद्रमें जाकर मिलते हैं, उसी प्रकार समस्त आश्रम गृहस्थका ही सहारा लेते हैं ।
इस ज्ञान के उपरान्त राजा जनक ने जिज्ञासा प्रकट की और पूछा—"हे वक्ताओं में श्रेष्ठ महर्षि! मैं यह जानना चाहता हूँ कि ब्राह्मण आदि विशेष वर्णों की उत्पत्ति कैसे हुई? कृपया इस विषय को स्पष्ट करें।"
पराशर मुनि ने उत्तर दिया—"महाराज! यह सत्य है कि जिससे जन्म होता है, उसका स्वरूप वैसा ही होता है; किन्तु तपस्या की कमी के कारण लोग निकृष्ट जातियों को प्राप्त हो गए हैं। उत्तम क्षेत्र और उत्तम बीज से उत्पन्न सन्तान पवित्र होती है, पर यदि इनमें से एक भी निम्न हो, तो सन्तान भी निम्न होती है।"
मुनि ने आगे वर्णों का विभाजन करते हुए कहा—"प्रजापति ब्रह्माजी ने जब सृष्टि की रचना की, तब उनके अङ्गों से मनुष्यों का प्रादुर्भाव हुआ। जो मुख से उत्पन्न हुए, वे ब्राह्मण कहलाये; दोनों भुजाओं से उत्पन्न होने वाले क्षत्रिय माने गये; ऊरु यानी जाँघों से उत्पन्न होने वाले वैश्य कहे गये और जो चरणों से उत्पन्न हुए, वे शूद्र कहलाये। इन चार वर्णों के मिश्रण से उत्पन्न अन्य मनुष्य 'वर्णसङ्कर' कहलाते हैं।"
राजा जनक ने पुनः प्रश्न किया—"मुनिश्रेष्ठ! जब सबको एकमात्र ब्रह्माजी ने ही जन्म दिया है, तब मनुष्यों के इतने भिन्न-भिन्न गोत्र कैसे हुए? ऋषि-मुनि जहाँ-तहाँ जन्म लेकर ब्राह्मणत्व कैसे प्राप्त कर लेते हैं?"
पराशर जी बोले—"राजन्! तपस्या से जिनके अन्तःकरण शुद्ध हो गए, वे महात्मा कहीं भी जन्म लें, उन्हें उत्कृष्ट ही मानना चाहिए। मुनियों ने अपने तपोबल से अनेक पुत्रों को ऋषि बना दिया। मेरे पितामह वसिष्ठ, काश्यप गोत्रीय ऋष्यशृङ्ग, वेद, ताण्ड्य, कृप, कक्षीवान्, कमठ, यवक्रीत और वक्ताओं में श्रेष्ठ द्रोण, आयु, मतङ्ग, दत्त, द्रुपद तथा मत्स्य—इन सबने तपस्या का आश्रय लेकर ही अपनी प्रकृतियों को प्राप्त किया। ये सभी इन्द्रियसंयम और तप से वेदों के विद्वान और समाज में प्रतिष्ठित हुए।"
उत्पाद्य पुत्रान् मुनयो नृपते यत्र तत्र ह ।
स्वेनैव तपसा तेषामृषित्वं विदधुः पुनः ॥
नरेश्वर! मुनियोंने जहाँ -तहाँ कितने ही पुत्र उत्पन्न करके उन सबको अपने ही तपोबलसे ऋषि बना दिया ।
मुनि ने आगे बताया कि अङ्गिरा, कश्यप, वसिष्ठ और भृगु—ये चार मूल गोत्र थे, अन्य सभी तो कर्म के अनुसार पीछे उत्पन्न हुए हैं।
कर्मतोऽन्यानि गोत्राणि समुत्पन्नानि पार्थिव ।
नामधेयानि तपसा तानि च ग्रहणं सताम् ॥
पृथ्वीनाथ! पहले अंगिरा, कश्यप, वसिष्ठ और भृगु — ये ही चार मूल गोत्र प्रकट हुए थे । अन्य गोत्र कर्मके अनुसार पीछे उत्पन्न हुए हैं । वे गोत्र और उनके नाम उन गोत्र-प्रवर्तक महर्षियोंकी तपस्यासे ही साधु - समाजमें सुविख्यात एवं सम्मानित हुए हैं ।
जनक ने फिर पूछा—"भगवन्! आप मुझे इन वर्णों के विशेष धर्म बताइये और फिर सामान्य धर्मों का भी वर्णन कीजिये।"
विशेषधर्मान् वर्णानां प्रब्रूहि भगवन् मम ।
ततः सामान्यधर्मांश्च सर्वत्र कुशलो ह्यसि ॥
जनकने पूछा — भगवन्! आप मुझे सब वर्णोंके विशेष धर्म बताइये, फिर सामान्य धर्मोंका भी वर्णन कीजिये; क्योंकि आप सब विषयोंका प्रतिपादन करनेमें कुशल हैं ।
पराशर मुनि ने कहा—"राजन्! दान लेना, यज्ञ कराना और विद्या पढ़ाना ब्राह्मणों के विशेष धर्म हैं। प्रजा की रक्षा करना क्षत्रिय का श्रेष्ठ धर्म है; कृषि, पशुपालन और व्यापार वैश्यों के कर्म हैं तथा द्विजातियों की सेवा शूद्र का धर्म है। अब इनके साधारण धर्म सुनो—दया, अहिंसा, सावधानी (अप्रमाद), देवताओं और पितरों को भाग देना, श्राद्ध, अतिथि सत्कार, सत्य, अक्रोध, पत्नी में सन्तुष्ट रहना, पवित्रता, दोषों का त्याग, आत्मज्ञान और सहनशीलता—ये सभी सामान्य धर्म हैं। ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य 'द्विजाति' कहलाते हैं और इन्हीं धर्मों पर उनका अधिकार है।"
विशेषधर्मा नृपते वर्णानां परिकीर्तिताः ।
धर्मान् साधारणांस्तात विस्तरेण शृणुष्व मे ॥
महाराज! ये वर्णोंके विशेष धर्म बताये गये हैं । तात! अब उनके साधारण धर्मोंका विस्तारपूर्वक वर्णन मुझसे सुनो ।
मुनि ने चेतावनी दी—"जो इन तीन वर्णों के लोग विपरीत कर्मों में लग जाते हैं, वे पतित हो जाते हैं। परन्तु सत्पुरुषों का आश्रय लेकर अपने कर्म करने से उन्नति होती है। शूद्र के लिए उपनयन या वैदिक अग्निहोत्र का अधिकार तो नहीं है, किन्तु उसके लिए सामान्य धर्मों का निषेध भी नहीं किया गया है।"
उन्होंने आगे कहा—"विदेहनरेश! वेद-शास्त्रों के ज्ञान से सम्पन्न द्विज शूद्र को प्रजापति के तुल्य मानते हैं क्योंकि वह सेवा द्वारा समाज का पालन करता है; परन्तु मैं तो उसे भगवान विष्णु के रूप में देखता हूँ, क्योंकि पालन करना स्वयं विष्णु का कार्य है। यदि शूद्र अपना उद्धार करना चाहें, तो सदाचार का पालन कर आत्मा को उन्नत बनाने वाली क्रियाएँ करें, पर वैदिक मन्त्रों का उच्चारण न करें; इससे वे दोष के भागी नहीं होंगे।"
वैदेह कं शूद्रमुदाहरन्ति द्विजा महाराज श्रुतोपपन्नाः ।
अहं हि पश्यामि नरेन्द्र देवं विश्वस्य विष्णुं जगतः प्रधानम् ॥
महाराज विदेहनरेश! वेद - शास्त्रोंके ज्ञानसे सम्पन्न द्विज शूद्रको प्रजापतिके तुल्य बताते हैं ( क्योंकि वह परिचर्याद्वारा समस्त प्रजाका पालन करता है ); परंतु नरेन्द्र! मैं तो उसे सम्पूर्ण जगत्के प्रधान रक्षक भगवान् विष्णुके रूपमें देखता हूँ ( क्योंकि पालन कर्म विष्णुका ही है और वह अपने उस कर्मद्वारा पालनकर्ता श्रीहरिकी आराधना करके उन्हींको प्राप्त होता है )
जनक ने एक गहरा सन्देह व्यक्त करते हुए पूछा—"महामुने! मनुष्य को उसके कर्म दूषित करते हैं या उसकी जाति? कृपया इसका विवेचन करें।"
किं कर्म दूषयत्येनमथो जातिर्महामुने ।
संदेहो मे समुत्पन्नस्तन्मे व्याख्यातुमर्हसि ॥
जनकने पूछा —महामुने! मनुष्यको उसके कर्म दूषित करते हैं या जाति? मेरे मनमें यह संदेह उत्पन्न हुआ है, आप इसका विवेचन कीजिये ।
पराशर मुनि ने कहा—"महाराज! इसमें सन्देह नहीं कि कर्म और जाति दोनों ही दोषकारक हो सकते हैं। जो व्यक्ति जाति से दूषित होकर भी पापकर्म का सेवन नहीं करता, वही सच्चा पुरुष है। जो लोग अग्निहोत्र त्यागकर सन्न्यास लेते हैं, जो चिन्ताओं से रहित होकर नम्रता, विनय और इन्द्रियसंयम के पथ पर चलते हैं, वे अविनाशी पद को प्राप्त कर लेते हैं। राजन्! सभी वर्णों के लोग अपने-अपने धर्म का पालन करते हुए, सत्य बोलकर और भयानक पापों का त्याग करके स्वर्ग लोक जाते हैं; इस विषय में कोई अन्य विचार न करें।"
सर्वे वर्णा धर्मकार्याणि सम्यक् कृत्वा राजन् सत्यवाक्यानि चोक्त्वा ।
त्यक्त्वाधर्मं दारुणं जीवलोके यान्ति स्वर्गं नात्र कार्यो विचारः ॥
राजन्! सभी वर्णोंके लोग इस जीव जगत्में अपने - अपने धर्मानुसार कर्मका भलीभाँति अनुष्ठान करके, सदा सत्य बोलकर तथा भयानक पापकर्मका सर्वथा परित्याग करके स्वर्गलोकमें जाते हैं । इस विषयमें कोई अन्यथा विचार नहीं करना चाहिये ।
भीष्म बोले— "हे युधिष्ठिर! प्राचीन काल में महात्मा पराशर मुनि ने विदेहराज जनक के कल्याण हेतु ये गूढ़ उपदेश दिए थे। सुनो, वे क्या कहते हैं।"
"राजन्! इस संसार में केवल वही व्यक्ति वास्तव में तुम्हारा होता है जो प्रभु का अनन्य भक्त, प्रियवादी, हितैषी और अपनी इन्द्रियों पर विजय प्राप्त कर चुका हो; गुणहीन मनुष्य के लिए तो पिता, सखा, गुरुजन और स्त्रियाँ भी उसके अपने नहीं होते। एक श्रेष्ठ पुरुष के लिए ज्ञान का लाभ ही परम लाभ है। जिसने अपनी श्रोत्र आदि इन्द्रियों और शब्द जैसे विषयों पर विजय पा ली है, वही वास्तव में परम पद को प्राप्त करता है।"
पिता परं दैवतं मानवानां मातुर्विशिष्टं पितरं वदन्ति ।
ज्ञानस्य लाभं परमं वदन्ति जितेन्द्रियार्थाः परमाप्नुवन्ति ॥
पिता मनुष्योंके लिये सर्वश्रेष्ठ देवता है । कोई- कोई पिताको मातासे भी बढ़कर बताते हैं । श्रेष्ठ पुरुष ज्ञानके लाभको ही परम लाभ कहते हैं । जिन्होंने श्रोत्र आदि इन्द्रियों और शब्द आदि विषयोंपर विजय पा ली है, वे परमपदको प्राप्त होते हैं ।
"युद्ध के विषय में शास्त्र क्या कहते हैं, यह जान लो। यदि कोई क्षत्रिय पुत्र समराङ्गण में घायल होकर, बाणों की चिता पर दग्ध होने वाली अवस्था में पहुँच जाए, तो वह सुखद और दुर्लभ स्वर्गीय लोकों में आनन्दपूर्वक भोग करता है। किन्तु ध्यान रहे! जो युद्ध में थका हुआ हो, भयभीत हो, जिसके शस्त्र गिर गए हों, जो रो रहा हो या पीठ दिखाकर भाग रहा हो; जिसके पास अब युद्ध का कोई साधन न बचा हो— ऐसे रोगी और असहाय शत्रु की हिंसा नहीं करनी चाहिए, चाहे वह बालक हो या वृद्ध। राजा को केवल उसी क्षत्रिय कुमार को जीतने का प्रयत्न करना चाहिए जो युद्ध के लिए पूरी तरह तैयार हो और अपने समान वीर हो। शास्त्र कहते हैं कि अपने समान या अपने से बड़े वीर के हाथ मरना श्रेष्ठ है; किन्तु अपने से हीन, कायर और दीन पुरुष के हाथ होने वाला वध निन्दित है। पापी और हीन मनुष्य के हाथों हुआ वध नरक में गिराने वाला होता है।"
पापात् पापसमाचारान्निहीनाच्च नराधिप ।
पाप एव वधः प्रोक्तो नरकायेति निश्चयः ॥
नरेश्वर! पापी, पापाचारी और हीन मनुष्यके हाथसे जो वध होता है, वह पापरूप ही बताया गया है तथा वह नरकमें गिरानेवाला है, यही शास्त्रका निश्चय है ।
"हे राजन्! मृत्यु अटल है। जिसकी आयु शेष है उसे कोई मार नहीं सकता और जो मृत्यु के वश में है उसे कोई बचा नहीं सकता। यदि तुम्हारे प्रियजन हिंसात्मक कर्म करें, तो उन्हें रोक दो; दूसरों के प्राण लेकर अपनी आयु बढ़ाने की इच्छा कभी मत करना। जो गृहस्थ मृत्यु के समय गङ्गा आदि पवित्र नदियों के तट पर रहकर शुभ अनुष्ठान करते हैं, वही उत्तम है। जब आयु समाप्त होती है, तभी जीव इस देह का त्याग करता है— यह बिना कारण भी हो सकता है और विभिन्न कारणों से भी।"
न कश्चित् त्राति वै राजन् दिष्टान्तवशमागतम् ।
सावशेषायुषं चापि कश्चिन्नैवापकर्षति ॥
राजन्! मृत्युके वशमें पड़े हुए प्राणीको कोई बचा नहीं सकता और जिसकी आयु शेष है, उसे कोई मार भी नहीं सकता ।
"यह शरीर केवल नस, नाड़ी और हड्डियों का समूह है, जो मल-मूत्र से भरा हुआ है। ज्ञानी पुरुष कहते हैं कि इस शरीर के अन्त में केवल त्वचा ही शेष रह जाती है; इसकी मृत्यु अनिवार्य है। जब जीवात्मा इस देह को छोड़ देती है, तो यह निश्चेष्ट होकर पृथ्वी में मिल जाती है। जीवात्मा अपने प्रारब्ध कर्मों के फल से आकाश में मेघों की तरह भटकती रहती है और फिर कहीं न कहीं नया आधार पाकर पुनः जन्म लेती है। मन इन्द्रियों से श्रेष्ठ है और आत्मा मन से भी परे है।"
"संसार के समस्त प्राणियों में मनुष्य योनि श्रेष्ठ है, और मनुष्यों में 'द्विज' श्रेष्ठ हैं। द्विजों में बुद्धिमान और बुद्धिमानों में आत्मज्ञानी श्रेष्ठ है, परन्तु सबसे श्रेष्ठ वे हैं जो अहङ्कार से रहित हैं। जन्म के साथ ही मृत्यु जुड़ी हुई है। जो पुण्यात्मा सूर्य के उत्तरायण होने पर, उत्तम नक्षत्र और पवित्र मुहूर्त में देह त्यागते हैं, वे अपने पाप प्रायश्चित से नष्ट कर देते हैं। वे स्वेच्छा से शुभकर्म करते हुए मृत्यु को गले लगाते हैं। इसके विपरीत, विष खाकर, फाँसी लगाकर, आग में जलकर या पशुओं के द्वारा मारा जाना अधम श्रेणी का माना जाता है। पुण्यात्माओं के प्राण ब्रह्मरन्ध्र से निकलते हैं, मध्यम श्रेणी वालों के मुख से और पापियों के प्राण नीचे के छिद्रों से निकलते हैं।"
आपन्ने तूत्तरां काष्ठां सूर्ये यो निधनं व्रजेत् ।
नक्षत्रे च मुहुर्ते च पुण्ये राजन् स पुण्यकृत् ॥
राजन्! जो सूर्यके उत्तरायण होनेपर उत्तम नक्षत्र और पवित्र मुहूर्तमें मृत्युको प्राप्त होता है, वह पुण्यात्मा है ।
"राजन्! मनुष्य का सबसे बड़ा शत्रु अज्ञान है। जो इस अज्ञान से घिरा है, वह क्रूर कर्म करता है। इस शत्रु को केवल वही जीत सकता है जो वेदों के ज्ञाता वृद्ध पुरुषों की सेवा करके स्थिर बुद्धि प्राप्त कर ले। एक द्विज को पहले ब्रह्मचर्य में तपस्या और वेदों का अध्ययन करना चाहिए, फिर गृहस्थाश्रम में आकर पाञ्च महायज्ञ करने चाहिए और अन्त में धर्मपालन की इच्छा रखकर वन को प्रस्थान करना चाहिए। यदि तुम्हारे पास उपभोग के साधन न हों, तो स्वयं को हीन मत समझना; क्योंकि मनुष्य योनि पाकर ही आत्मा का उद्धार किया जा सकता है। जो इस दुर्लभ शरीर को पाकर दूसरों से द्वेष करता है या कामनाओं में आसक्त हो जाता है, वह महान लाभ से वञ्चित रह जाता है।"
एकः शत्रुर्न द्वितीयोऽस्ति शत्रु- रज्ञानतुल्यः पुरुषस्य राजन् ।
येनावृतः कुरुते सम्प्रयुक्तो घोराणि कर्माणि सुदारुणानि ॥
राजन्! पुरुषका एक ही शत्रु है, उसके समान दूसरा कोई शत्रु नहीं है । वह है अज्ञान, जिससे आवृत और प्रेरित होकर मनुष्य अत्यन्त घोर और क्रूरतापूर्ण कर्म करने लगता है ।
"जो समस्त प्राणियों को दीपक के समान स्नेह से संवारता है, भूखों को भोजन देता है और प्रिय वचन बोलकर सबका सत्कार करता है, वह सुख-दुःख में सम रहकर परलोक में प्रतिष्ठित होता है। तीर्थों जैसे सरस्वती नदी, नैमिषारण्य और पुष्कर में जाकर दान करना, त्याग करना और तपस्या करना श्रेष्ठ है। जब किसी के प्राण निकल रहे हों, तो उसे शीघ्र घर से बाहर ले जाना चाहिए और श्मशान में शास्त्रोक्त विधि से दाह-संस्कार करना आवश्यक है। मनुष्य द्वारा किए गए यज्ञ, दान और श्राद्ध उसके स्वयं के कल्याण के लिए होते हैं। धर्मशास्त्र और वेद केवल पुण्यकर्म करने वालों के कल्याण के लिए ही बनाए गए हैं।"
भीष्म बोले— "हे युधिष्ठिर! प्राचीन काल में महात्मा पराशर मुनि ने विदेहराज जनक के कल्याण हेतु ये उपदेश दिए थे।"
एतद् वै सर्वमाख्यातं मुनिना सुमहात्मना ।
विदेहराजाय पुरा श्रेयसोऽर्थे नराधिप ॥
भीष्मजी कहते हैं - युधिष्ठिर! प्राचीनकालमें महात्मा पराशर मुनिने विदेहराज जनकके कल्याणके लिये यह सब उपदेश दिया था ।
In English
Bhishma's teachings on Dharma and Karma
Bhishma tells Yudhishthira about the importance of following dharma to achieve well-being in this life and the next. He recounts a story told by Sage Parashara to King Janaka regarding how past actions determine a person's current happiness or suffering.
This page answers
- What is dharma according to sage parashara?
- How do karma and punya affect human life?
- What are the qualities of a righteous person?
- How can one repay debts to gods and ancestors?
- Why is dharma more important than wealth?
Also written: Parasharagita, Parashara, Yudhishthira, Bhishma, Bhrigupatni, Ushana, Brahma, Indra, Vishnu, Saptarshi, Janaka, पराशरगीता