श्रीगणेशाय नमः।

महाभारत — खण्ड ५ — पृष्ठ 2161–2170

महाभारत — खण्ड ५ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 2161–2170

पृष्ठ 2161

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चतुर्विंशत्यधिकत्रिशततमोऽध्यायः शुकदेवजीकी उत्पत्ति और उनके यज्ञोपवीत, वेदाध्ययन एवं समावर्तन - संस्कारका वृत्तान्त भीष्म उवाच

स लब्ध्वा परमं देवाद् वरं सत्यवतीसुतः ।

अरणी सहिते गृह्य ममन्थाग्निचिकीर्षया ॥ १ ॥

भीष्मजी कहते हैं - राजन्! महादेवजीसे उत्तम वर पाकर एक दिन सत्यवतीनन्दन व्यासजी अग्नि प्रकट करनेकी इच्छासे दो अरणी काष्ठ लेकर उनका मन्थन करने लगे ॥ १ ॥

अथ रूपं परं राजन् बिभ्रतीं स्वेन तेजसा ।

घृताचीं नामाप्सरसमपश्यद् भगवानृषिः ॥ २ ॥

नरेश्वर! इसी समय उन भगवान् महर्षि व्यासने वहाँ आयी हुई घृताची नामक अप्सराको देखा, जो अपने तेजसे परम मनोहर रूप धारण किये हुए थी ॥ २ ॥

ऋषिरप्सरसं दृष्ट्वा सहसा काममोहितः ।

अभवद् भगवान् व्यासो वने तस्मिन् युधिष्ठिर ॥ ३ ॥

सा च दष्ट्वा तदा व्यासं कामसंविग्नमानसम् ।

शुकी भूत्वा महाराज घृताची समुपागमत् ॥ ४ ॥

युधिष्ठिर! उस वनमें उस अप्सराको देखकर ऋषि भगवान् व्यास सहसा कामसे मोहित हो गये । महाराज! उस समय व्यासजीका हृदय कामसे व्याकुल हुआ देख घृताची अप्सरा शुकी होकर उनके पास आयी ॥ ३-४ ॥

स तामप्सरसं दृष्ट्वा रूपेणान्येन संवृताम् ।

शरीरजेनानुगदः सर्वगात्रातिगेन ह ॥ ५ ॥

उस अप्सराको दूसरे रूपसे छिपी हुई देख उनके सम्पूर्ण शरीरमें कामवेदना व्याप्त हो गयी ॥ ५ ॥

धैर्येण महता निगृह्णन् हृच्छयं मुनिः ।

न शशाक नियन्तुं तद् व्यासः प्रविसृतं मनः ॥ ६ ॥

मुनिवर व्यास महान् धैर्यके साथ अपने कामवेगको रोकने लगे; परंतु अप्सराकी ओर गये हुए मनको रोकनेमें वे किसी तरह समर्थ न हो सके ॥ ६ ॥

भावित्वाच्चैव भावस्य घृताच्या वपुषा हृतः ।

पृष्ठ 2162

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यत्नान्नियच्छतस्तस्य मुनेरग्निचिकीर्षया ॥ ७ ॥

अरण्यामेव सहसा तस्य शुक्रमवापतत् । होनहार होकर ही रहती है; इसलिये व्यासजी घृताचीके रूपसे आकृष्ट हो गये । अग्नि प्रकट करनेकी इच्छासे अपने कामवेगको यत्नपूर्वक रोकते हुए महर्षि व्यासका वीर्य सहसा उस अरणीकाष्ठपर ही गिर पड़ा ॥ सोऽविशंकेन मनसा तथैव द्विजसत्तमः ॥ ८ ॥

अरणी ममन्थ ब्रह्मर्षिस्तस्यां जज्ञे शुको नृप । नरेश्वर! उस समय भी द्विजश्रेष्ठ ब्रह्मर्षि व्यास निःशंक मनसे दोनों अरणियोंके मन्थनमें ही लगे रहे । उसी समय अरणीसे शुकदेवजी प्रकट हो गये ॥ ८३ ॥

शुक्रे निर्मथ्यामाने स शुको जज्ञे महातपाः ॥ ९ ॥

परमर्षिर्महायोगी अरणीगर्भसम्भवः । अरणीके साथ- साथ शुक्रका भी मन्थन होनेसे महातपस्वी तथा महायोगी परम ऋषि

शुकदेवजीका जन्म हो गया । वे अरणीके ही गर्भसे प्रकट हुए ॥ ९ ३ ॥

यथाध्वरे समिद्धोऽग्निर्भाति हव्यमुदावहम् ॥ १० ॥

तथारूपः शुको जज्ञे प्रज्वलन्निव तेजसा । जैसे यज्ञमें हविष्यका वहन करनेवाली प्रज्वलित अग्नि प्रकाशित होती है, वैसे ही

रूपसे शुकदेवजी प्रकट हुए थे । वे अपने तेजसे मानो जाज्वल्यमान हो रहे थे ॥ १० ॥

बिभ्रत् पितुश्च कौरव्य रूपवर्णमनुत्तमम् ॥ ११ ॥

बभौ तदा भावितात्मा विधूम इव पावकः । कुरुनन्दन! अपने पिताके समान ही परम उत्तम रूप और कान्ति धारण किये पवित्रात्मा शुकदेव धूमरहित अग्निके समान देदीप्यमान हो रहे थे ॥ ११३ ॥

तं गङ्गा सरितां श्रेष्ठा मेरुपृष्ठे जनेश्वर ॥ १२ ॥

स्वरूपिणी तदाभ्येत्य तर्पयामास वारिणा । जनेश्वर! उसी समय सरिताओंमें श्रेष्ठ श्रीगंगाजी मूर्तिमती होकर मेरुपर्वतपर आयीं और उन्होंने अपने जलसे शुकदेवजीको तृप्त किया ॥ १२३ ॥

अन्तरिक्षाच्च कौरव्य दण्डः कृष्णाजिनं च ह ॥ १३ ॥

पपात भूमिं राजेन्द्र शुकस्यार्थे महात्मनः । कुरुनन्दन! राजेन्द्र! आकाशसे महात्मा शुकदेवके लिये दण्ड और काला मृगचर्म — ये दोनों वस्तुएँ पृथ्वीपर गिरीं ॥ १३३ ॥

जेगीयन्ते स्म गन्धर्वा ननृतुश्चाप्सरोगणाः ॥ १४ ॥

देवदुन्दुभयश्चैव प्रावाद्यन्त महास्वनाः ।

विश्वावसुश्च गन्धर्वस्तथा तुम्बुरुनारदौ ॥ १५ ॥

पृष्ठ 2163

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हाहा हूहूश्च गन्धर्वौ तुष्टुवुः शुकसम्भवम् । गन्धर्व गाने और अप्सराएँ नृत्य करने लगीं । देवताओंकी दुंदुभियाँ बड़े जोर- जोरसे बज उठीं । विश्वावसु, तुम्बुरु, नारद, हाहा और हूहू आदि गन्धर्व शुकदेवजीके जन्मकी बधाई गाने लगे ॥ १४-१५३ ॥ तत्र शक्रपुरोगाश्च लोकपालाः समागताः ॥ १६ ॥

देवा देवर्षयश्चैव तथा ब्रह्मर्षयोऽपि च ।

इन्द्र आदि सम्पूर्ण लोकपाल, देवता, देवर्षि और ब्रह्मर्षि भी वहाँ आये ॥ १६३ ॥

दिव्यानि सर्वपुष्पाणि प्रववर्ष च मारुतः ॥ १७ ॥

जङ्गमाजङ्गमं चैव प्रहृष्टमभवज्जगत् । वायुने सब प्रकारके दिव्य पुष्पोंकी वर्षा की । चर और अचर सारा संसार हर्षसे खिल उठा ॥ १७३ ॥

तं महात्मा स्वयं प्रीत्या देव्या सह महाद्युतिः ॥ १८ ॥

जातमात्रं मुनेः पुत्रं विधिनोपानयत् तदा । तब महातेजस्वी महात्मा भगवान् शंकरने देवी पार्वतीके साथ स्वयं प्रसन्नतापूर्वक पधारकर महर्षि व्यासके उस नवजात पुत्रका विधिपूर्वक उपनयन संस्कार किया ॥ १८३ || तस्य देवेश्वरः शक्रो दिव्यमद्भुतदर्शनम् ॥ १ ९ ॥ ददौ कमण्डलुं प्रीत्या देववासांसि वा विभो । प्रभो! उस समय देवेश्वर इन्द्रने उन्हें प्रेमपूर्वक दिव्य एवं अद्भुत कमण्डलु तथा देवोचित वस्त्र प्रदान किये ॥ १ ९ ३ ॥ हंसाश्च शतपत्राश्च सारसाश्च सहस्रशः ॥ २० ॥

प्रदक्षिणमवर्तन्त शुकाश्चाषाश्च भारत । भारत! सहस्रों हंस, शतपत्र, सारस, शुक और नीलकण्ठ आदि पक्षी उनकी प्रदक्षिणा करने लगे ॥ २० ॥

आरणेयस्ततो दिव्यं प्राप्य जन्म महाद्युतिः ॥ २१ ॥

तत्रैवोवास मेधावी व्रतचारी समाहितः । तदनन्तर महातेजस्वी अरणिसम्भूत शुक वह दिव्य जन्म पाकर ब्रह्मचर्यकी दीक्षा ले वहीं रहने लगे । वे बड़े बुद्धिमान्, व्रतपालक तथा चित्तको एकाग्र रखनेवाले थे ॥ २१ ॥

उत्पन्नमात्रं तं वेदाः सरहस्याः ससंग्रहाः ॥ २२ ॥

उपतस्थुर्महाराज यथास्य पितरं तथा ।

पृष्ठ 2164

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महाराज! शुकदेवजीके जन्म लेते ही रहस्य और संग्रहसहित सम्पूर्ण वेद उसी प्रकार उनकी सेवामें उपस्थित हो गये, जैसे वे उनके पिता वेदव्यासकी सेवामें उपस्थित हुए थे ॥ २२ ॥

बृहस्पतिं च वव्रे स वेदवेदाङ्गभाष्यवित् ॥ २३ ॥

उपाध्यायं महाराज धर्ममेवानुचिन्तयन् । महाराज! वेद- वेदांगोंकी विस्तृत व्याख्याके ज्ञाता शुकदेवजीने धर्मका विचार करके बृहस्पतिको अपना गुरु बनाया ॥ २३३ ॥

सोऽधीत्य निखिलान् वेदान् सरहस्यान् ससंग्रहान् ॥ २४ ॥

इतिहासं च कार्त्स्न्येन राजशास्त्राणि वा विभो ।

गुरवे दक्षिणां दत्त्वा समावृत्तो महामुनिः ॥ २५ ॥

प्रभो! महामुनि शुकदेवने उनसे रहस्य और संग्रहसहित सम्पूर्ण वेदोंका, समूचे इतिहासका तथा राजशास्त्रका भी अध्ययन करके गुरुको दक्षिणा दे समावर्तन - संस्कारके पश्चात् घरको प्रस्थान किया ॥ उग्रं तपः समारेभे ब्रह्मचारी समाहितः ।

देवतानामृषीणां च बाल्येऽपि स महातपाः ।

सम्मन्त्रणीयो मान्यश्च ज्ञानेन तपसा तथा ॥ २६ ॥

उन्होंने एकाग्रचित्त हो ब्रह्मचर्यका पालन करते हुए उग्र तपस्या प्रारम्भ की । महातपस्वी शुकदेव ज्ञान और तपस्याके द्वारा बाल्यकालमें भी देवताओं तथा ऋषियोंके आदरणीय और उन्हें सलाह देने योग्य हो गये थे ॥ २६ ॥

न त्वस्य रमते बुद्धिराश्रमेषु नराधिप ।

त्रिषु गार्हस्थ्यमूलेषु मोक्षधर्मानुदर्शिनः ॥ २७ ॥

नरेश्वर! वे मोक्षधर्मपर ही दृष्टि रखते थे; अतः उनकी बुद्धि गार्हस्थ्य आश्रमपर अवलम्बित रहनेवाले तीनों आश्रमोंमें प्रसन्नताका अनुभव नहीं करती थी ॥ २७ ॥

इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि शुकोत्पत्ती चतुर्विंशत्यधिकत्रिशततमोऽध्यायः ॥ ३२४ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें शुकदेवकी उत्पत्तिविषयक तीन सौचौबीसवाँअध्याय पूरा हुआ ॥ ३२४ ॥

पृष्ठ 2165

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पञ्चविंशत्यधिकत्रिशततमोऽध्यायः पिताकी आज्ञासे शुकदेवजीका मिथिलामें जाना और वहाँ उनका द्वारपाल, मन्त्री और युवती स्त्रियोंके द्वारा सत्कृत होनेके उपरान्त ध्यानमें स्थित हो जाना भीष्म उवाच

स मोक्षमनुचिन्त्यैव शुकः पितरमभ्यगात् ।

प्राहाभिवाद्य च गुरुं श्रेयोऽर्थी विनयान्वितः ॥ १ ॥

भीष्मजी कहते हैं - युधिष्ठिर! शुकदेवजी मोक्षका विचार करते हुए ही अपने पिता एवं गुरु व्यासजीके पास गये और विनीतभावसे उनके चरणोंमें प्रणाम करके कल्याण-प्राप्तिकी इच्छा रखकर उनसे इस प्रकार बोले – ॥ १ ॥

मोक्षधर्मेषु कुशलो भगवान् प्रब्रवीतु मे ।

यथा मे मनसः शान्तिः परमा सम्भवेत् प्रभो ॥ २ ॥

‘ प्रभो! आप मोक्षधर्ममें कुशल हैं; अतः मुझे ऐसा उपदेश कीजिये, जिससे मेरे चित्तको परम शान्ति मिले ' ॥

श्रुत्वा पुत्रस्य तु वचः परमर्षिरुवाच तम् ।

अधीष्व पुत्र मोक्षं वै धर्मांश्च विविधानपि ॥ ३ ॥

पुत्रकी वह बात सुनकर महर्षि व्यासने कहा, ' बेटा! तुम मोक्ष तथा अन्यान्य विविध धर्मोंका अध्ययन करो ' ॥ ३ ॥

पितुर्नियोगाज्जग्राह शुको धर्मभृतां वरः ।

योगशास्त्रं च निखिलं कापिलं चैव भारत ॥ ४ ॥

भारत! पिताकी आज्ञासे धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ शुकने सम्पूर्ण योगशास्त्र तथा समस्त सांख्यका अध्ययन किया ॥ ४ ॥

सतं ब्राह्मया श्रिया युक्तं ब्रह्मतुल्यपराक्रमम् ।

मेने पुत्रं यदा व्यासो मोक्षधर्मविशारदम् ॥ ५ ॥

उवाच गच्छेति तदा जनकं मिथिलेश्वरम् ।

स ते वक्ष्यति मोक्षार्थं निखिलं मिथिलेश्वरः ॥ ६ ॥

जब व्यासजीने यह समझ लिया कि मेरा पुत्र ब्रह्मतेजसे सम्पन्न और मोक्षधर्ममें कुशल हो गया है तथा समस्त शास्त्रोंमें इसकी ब्रह्माके समान गति हो गयी है, तब उन्होंने कहा - ' बेटा! अब तुम मिथिलाके राजा जनकके पास जाओ । वे मिथिलानरेश तुम्हें सम्पूर्ण मोक्षशास्त्रका सार सिद्धान्त बता देंगे ' ॥ ५-६ ॥

पृष्ठ 2166

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पितुर्नियोगमादाय जगाम मिथिलां नृप प्रष्टुं धर्मस्य निष्ठां वै मोक्षस्य च परायणम् ॥ ७ ॥

नरेश्वर! पिताकी आज्ञा पाकर शुकदेवजी धर्मकी निष्ठा और मोक्षका परम आश्रय पूछनेके लिये मिथिलाकी ओर चल दिये ॥ ७ ॥

उक्तश्च मानुषेण त्वं पथा गच्छेत्यविस्मितः ।

न प्रभावेण गन्तव्यमन्तरिक्षचरेण वै ॥ ८ ॥

जाते समय व्यासजीने फिर बिना किसी विस्मयके कहा- ' बेटा! जिस मार्गसे साधारण मनुष्य चलते हों, उसीसे तुम भी जाना । अपनी योगशक्तिका आश्रय लेकर आकाशमार्गसे कदापि यात्रा न करना ॥ ८ ॥

आर्जवेणैव गन्तव्यं न सुखान्वेषिणा तथा ।

नान्वेष्टव्या विशेषास्तु विशेषा हि प्रसङ्गिनः ॥ ९ ॥

‘ सरलभावसे ही यात्रा करनी चाहिये । रास्तेमें सुख और सुविधाकी खोज नहीं करनी चाहिये । विशेष - विशेष व्यक्तियों अथवा स्थानोंका अनुसंधान न करना; क्योंकि इससे उनके प्रति आसक्ति हो जाती है ॥ ९ ॥

अहंकारो न कर्तव्यो याज्ये तस्मिन् नराधिपे ।

स्थातव्यं च वशे तस्य स ते छेत्स्यति संशयम् ॥ १० ॥

' राजा जनक मेरे यजमान हैं, ऐसा समझकर उनके प्रति अहंकार न प्रकट करना तथा सब प्रकारसे उनकी आज्ञाके अधीन रहना । वे तुम्हारी सब शंकाओंका समाधान कर देंगे ॥ १० ॥

स धर्मकुशलो राजा मोक्षशास्त्रविशारदः ।

याज्यो मम स यद् ब्रूयात् तत् कार्यमविशङ्कया ॥ ११ ॥

‘ मेरे यजमान राजा जनक धर्मनिपुण तथा मोक्ष- शास्त्रमें प्रवीण हैं । वे तुम्हें जो आज्ञा दें, उसीका निःशंक होकर पालन करना ' ॥ ११ ॥

एवमुक्तः स धर्मात्मा जगाम मिथिलां मुनिः ।

पद्भयां शक्तोऽन्तरिक्षेण क्रान्तुं पृथ्वीं ससागराम् ॥ १२ ॥

पिताके ऐसा कहनेपर धर्मात्मा मुनि शुकदेवजी मिथिलाकी ओर चल दिये । यद्यपि वे आकाशमार्गसे सारी पृथ्वीको लाँघ जानेमें समर्थ थे, तो भी पैदल ही चले ॥ १२ ॥

स गिरींश्चाप्यतिक्रम्य नदीतीर्थसरांसि च ।

बहुव्यालमृगाकीर्णा ह्यटवीश्च वनानि च ॥ १३ ॥

मेरोर्हरेश्च द्वे वर्षे वर्षं हैमवतं ततः ।

क्रमेणैवं व्यतिक्रम्य भारतं वर्षमासदत् ॥ १४ ॥

मार्गमें उन्हें अनेक पर्वत, नदी, तीर्थ और सरोवर पार करने पड़े । बहुत- से सर्पों और वन्य पशुओंसे भरे हुए कितने ही जंगलोंमें होकर जाना पड़ा । उन सबको लाँघकर क्रमशः

पृष्ठ 2167

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मेरु ( इलावृत ) वर्ष, हरिवर्ष और हैमवत ( किम्पुरुष ) वर्षको पार करते हुए वे भारतवर्षमें आये ॥ १३-१४ ॥

स देशान् विविधान् पश्यंश्चीनहूणनिषेवितान् ।

आर्यावर्तमिमं देशमाजगाम महामुनिः ॥ १५ ॥

चीन और हूण जातिके लोगोंसे सेवित नाना प्रकारके देशोंका दर्शन करते हुए महामुनि शुकदेवजी इस आर्यावर्त देशमें आ पहुँचे ॥ १५ ॥

पितुर्वचनमाज्ञाय तमेवार्थं विचिन्तयन् ।

अध्यानं सोऽतिचक्राम खेचरः खे चरन्निव ॥ १६ ॥

पिताकी आज्ञा मानकर उसी ज्ञातव्य विषयका चिन्तन करते हुए उन्होंने सारा मार्ग पैदल ही तै किया । जैसे आकाशचारी पक्षी आकाशमें विचरता है, उसी प्रकार वे भूतलपर विचरण करते थे ॥ १६ ॥

पत्तनानि च रम्याणि स्फीतानि नगराणि च ।

रत्नानि च विचित्राणि पश्यन्नपि न पश्यति ॥ १७ ॥

रास्तेमें बड़े सुन्दर- सुन्दर शहर और कस्बे तथा समृद्धिशाली नगर दिखायी पड़े । भाँति-भाँतिके विचित्र रत्न दृष्टिगोचर हुए; किंतु शुकदेवजी उनकी ओर देखते हुए भी नहीं देखते थे ॥ १७ ॥

उद्यानानि च रम्याणि तथैवायतनानि च ।

पुण्यानि चैव रत्नानि सोऽत्यक्रामदथाध्वगः ॥ १८ ॥

पथिक शुकदेवजीने बहुत- से मनोहर उद्यान तथा घर और मन्दिर देखकर उनकी उपेक्षा कर दी । कितने ही पवित्र रत्न उनके सामने पड़े, परंतु वे सबको लाँघकर आगे बढ़ गये ॥ १८ ॥

सोऽचिरेणैव कालेन विदेहानाससाद ह ।

रक्षितान् धर्मराजेन जनकेन महात्मना ॥ १ ९ ॥

इस प्रकार यात्रा करते हुए वे थोड़े ही समयमें धर्मराज महात्मा जनकद्वारा पालित विदेहप्रान्तमें जा पहुँचे ॥ १ ९ ॥

तत्र ग्रामान् बहून् पश्चन् बह्वन्नरसभोजनान् ।

पल्लीघोषान् समृद्धांश्च बहुगोकुलसंकुलान् ॥ २० ॥

वहाँ बहुत - से गाँव उनकी दृष्टिमें आये, जहाँ अन्न, पानी तथा नाना प्रकारकी खाद्य सामग्री प्रचुर मात्रामें मौजूद थी । छोटी-छोटी टोलियाँ तथा गोष्ठ ( गौओंके रहनेके स्थान ) भी दृष्टिगोचर हुए, जो बड़े समृद्धिशाली और बहुसंख्यक गोसमुदायोंसे भरे हुए थे ॥ २० ॥

स्फीतांश्च शालियवसैर्हससारससेवितान् ।

पद्मिनीभिश्च शतशः श्रीमतीभिरलङ्कृतान् ॥ २१ ॥

पृष्ठ 2168

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सारे विदेहप्रान्तमें सब ओर अगहनी धानकी खेती लहलहा रही थी । वहाँके निवासी धन- धान्यसे सम्पन्न थे । उस देशमें चारों ओर हंस और सारस निवास करते थे । कमलोंसे अलंकृत सैकड़ों सुन्दर सरोवर विदेह - राज्यकी शोभा बढ़ा रहे थे ॥ २१ ॥

स विदेहानतिक्रम्य समृद्धजनसेवितान् ।

मिथिलोपवनं रम्यमाससाद समृद्धिमत् ॥ २२ ॥

इस प्रकार समृद्धिशाली मनुष्योंद्वारा सेवित विदेह- देशको लाँघकर वे मिथिलाके समृद्धिसम्पन्न रमणीय उपवनके पास जा पहुँचे ॥ २२ ॥

हस्त्यश्वरथसंकीर्णं नरनारीसमाकुलम् ।

पश्यन्नपश्यन्निव तत् समतिक्रामदच्युतः ॥ २३ ॥

वह स्थान हाथी, घोड़े और रथोंसे भरा था । असंख्य नर- नारी वहाँ आते -जाते दिखायी देते थे । अपनी मर्यादासे कभी च्युत न होनेवाले शुकदेवजी वह सब देखकर भी नहीं देखते हुए-से वहाँसे आगे बढ़ गये ॥ २३ ॥

मनसा तं वहन् भारं तमेवार्थं विचिन्तयन् ।

आत्मारामः प्रसन्नात्मा मिथिलामाससाद ह ॥ २४ ॥

मनसे जिज्ञासाका भार वहन करते और उस ज्ञेय वस्तुका ही चिन्तन करते हुए आत्माराम प्रसन्नचित्त शुकदेवने मिथिलामें प्रवेश किया ॥ २४ ॥

तस्या द्वारं समासाद्य निःशङ्कः प्रविवेश ह ।

तत्रापि द्वारपालास्तमुग्रवाचा न्यषेधयन् ॥ २५ ॥

नगरद्वारपर पहुँचकर वे निःशंकभावसे उसके भीतर प्रवेश करने लगे । तब वहाँ द्वारपालोंने कठोर वाणीद्वारा उन्हें डाँटकर भीतर जानेसे रोक दिया ॥ २५ ॥

तथैव च शुकस्तत्र निर्मन्युः समतिष्ठत ।

न चातपाध्वसंतप्तः क्षुत्पिपासाश्रमान्वितः ॥ २६ ॥

शुकदेवजी वहीं खड़े हो गये; किंतु उनके मनमें किसी प्रकारका खेद या क्रोध नहीं हुआ । रास्तेकी थकावट और सूर्यकी धूपसे उन्हें संताप नहीं पहुँचा था । भूख और प्यास उन्हें कष्ट नहीं दे सकी थी ॥ २६ ॥

प्रताम्यति ग्लायति वा नापैति च तथाऽऽतपात् ।

तेषां तु द्वारपालानामेकः शोकसमन्वितः ॥ २७ ॥

वे उस धूपसे न तो संतप्त होते थे, न ग्लानिका अनुभव करते थे और न धूपसे हटकर छायामें ही जाते थे । उस समय उन द्वारपालोंमेंसे एकको अपने व्यवहारपर बड़ा दुःख हुआ ॥ २७ ॥

मध्यं गतमिवादित्यं दृष्ट्वा शुकमवस्थितम् ।

पूजयित्वा यथान्यायमभिवाद्य कृताञ्जलिः ॥ २८ ॥

प्रावेशयत् ततः कक्ष्यां द्वितीयां राजवेश्मनः ।

पृष्ठ 2169

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उसने मध्याह्नकालीन तेजस्वी सूर्यकी भाँति शुकदेवजीको चुपचाप खड़ा देख हाथ जोड़कर प्रणाम किया और शास्त्रीय विधिके अनुसार उनकी यथोचित पूजा करके उन्हें राजभवनकी दूसरी कक्षामें पहुँचा दिया ॥ तत्रासीनः शुकस्तात मोक्षमेवान्वचिन्तयत् ॥ २ ९ ॥ छायायामातपे चैव समदर्शी महाद्युतिः ।

तात! वहाँ एक जगह बैठकर महातेजस्वी शुकदेवजी मोक्षका ही चिन्तन करने लगे ।

धूप हो या छाया, दोनोंमें उनकी समान दृष्टि थी ॥ २ ९ ३ ॥

तं मुहूर्तादिवागम्य राज्ञो मन्त्री कृताञ्जलिः ॥ ३० ॥

प्रावेशयत् ततः कक्ष्यां तृतीयां राजवेश्मनः । थोड़ी ही देरमें राजमन्त्री हाथ जोड़े हुए वहाँ पधारे और उन्हें अपने साथ महलकी तीसरी ड्योढ़ीमें ले गये ॥ तत्रान्तःपुरसम्बद्धं महच्चैत्ररथोपमम् ॥ ३१ ॥

सुविभक्तजलाक्रीडं रम्यं पुष्पितपादपम् ।

शुकं प्रावेशयन्मन्त्री प्रमदावनमुत्तमम् ॥ ३२ ॥

वहाँ अन्तःपुरसे सटा हुआ एक बहुत सुन्दर विशाल बगीचा था, जो चैत्ररथ वनके समान मनोहर जान पड़ता था । उसमें पृथक् - पृथक् जल- क्रीड़ाके लिये अनेक सुन्दर जलाशय बने हुए थे । वह रमणीय उपवन खिले हुए वृक्षोंसे सुशोभित होता था । उस उत्तम

उद्यानका नाम था प्रमदावन । मन्त्रीने शुकदेवजीको उसके भीतर पहुँचा दिया ॥ ३१-३२ ॥

स तस्यासनमादिश्य निश्चक्राम ततः पुनः ।

तं चारुवेषाः सुश्रोण्यस्तरुण्यः प्रियदर्शनाः ॥ ३३ ॥

सूक्ष्मरक्ताम्बरधरास्तप्तकाञ्चनभूषणाः ।

संलापोल्लापकुशला नृत्यगीतविशारदाः ॥ ३४ ॥

स्मितपूर्वाभिभाषिण्यो रूपेणाप्सरसां समाः ।

कामोपचारकुशला भावज्ञाः सर्वकोविदाः ॥ ३५ ॥

परं पञ्चाशतं नार्यो वारमुख्याः समाद्रवन् । वहाँ उनके लिये सुन्दर आसन बताकर राजमन्त्री पुनः प्रमदावनसे बाहर निकल आये । मन्त्रीके जाते ही पचास प्रमुख वारांगनाएँ शुकदेवजीके पास दौड़ी आयीं । उनकी वेश- भूषा ब- की - सब देखनेमें परम सुन्दरी -बड़ी मनोहारिणी थी । वे सब और नवयुवती थीं । वे सुरम्यकटिप्रदेशसे सुशोभित थीं । उनके सुन्दर अंगोंपर लाल रंगकी महीन साड़ियाँ शोभा पा रही थीं । तपाये हुए सुवर्णके आभूषण उनका सौन्दर्य बढ़ा रहे थे । वे बातचीत करनेमें कुशल और नाचने - गानेकी कलामें बड़ी प्रवीण थीं । उनका रूप अप्सराओंके समान था, वे मन्द मुसकानके साथ बातें करतीं और दूसरोंके मनका भाव समझ लेती थीं । कामचर्यामें कुशल और सम्पूर्ण कलाओंका विशेष ज्ञान रखनेवाली थीं ॥ ३३ – ३५३ ॥

पृष्ठ 2170

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पाद्यादीनि प्रतिग्राह्य पूजया परयार्चयन् ॥ ३६ ॥

कालोपपन्नेन तदा स्वाद्वन्नेनाभ्यतर्पयन् । उन्होंने पाद्य, अर्घ्य आदि निवेदन करके उत्तम विधिसे शुकदेवजीका पूजन किया और उन्हें समयानुकूल स्वादिष्ठ अन्न भोजन कराकर पूर्णतः तृप्त किया ॥ ३६३ ॥

तस्य भुक्तवतस्तात तदन्तः पुरकाननम् ॥ ३७ ॥

सुरम्यं दर्शयामासुरेकैकश्येन भारत । तात! भरतनन्दन! जब वे भोजन कर चुके, तब वे वारांगनाएँ उन्हें साथ लेकर अन्तःपुरके उस सुरम्य कानन- प्रमदावनकी सैर कराने और वहाँकी एक- एक वस्तुको दिखाने लगीं ॥ ३७३ ॥

क्रीडन्त्यश्च हसन्त्यश्च गायन्त्यश्चापिताः शुभम् ॥ ३८ ॥

उदारसत्त्वं सत्त्वज्ञाः स्त्रियः पर्यचरंस्तथा । उस समय वे हँसती, गाती तथा नाना प्रकारकी सुन्दर क्रीड़ाएँ करती थीं । मनके भावको समझनेवाली वे सुन्दरियाँ उन उदारचित्त शुकदेवजीकी सब प्रकारसे सेवा करने लगीं ॥ ३८ ॥

आरणेयस्तु शुद्धात्मा निःसंदेहः स्वकर्मकृत् ॥ ३ ९ ॥ वश्येन्द्रियो जितक्रोधो न हृष्यति न कुप्यति । परंतु अरणिसम्भव शुकदेवजीका अन्तःकरण पूर्णतः शुद्ध था । वे इन्द्रियों और क्रोधपर विजय पा चुके थे । उन्हें न तो किसी बातपर हर्ष होता था और न वे किसीपर क्रोध ही करते थे । उनके मनमें किसी प्रकारका संदेह नहीं था और वे सदा अपने कर्तव्यका पालन किया करते थे ॥ ३ ९ ३ ॥ तस्मै शय्यासनं दिव्यं देवर्हं रत्नभूषितम् ॥ ४० ॥

स्पर्ध्यास्तरणसंकीर्णं ददुस्ताः परमस्त्रियः । उन सुन्दरी रमणियोंने देवताओंके बैठने योग्य एक दिव्य पलंग, जिसमें रत्न जड़े हुए थे और जिसपर बहुमूल्य बिछौने बिछे थे, शुकदेवजीको सोनेके लिये दिया ॥ ४०३३ ॥

पादशौचं तु कृत्वैव शुकः संध्यामुपास्य च ॥ ४१ ॥

निषसादासने पुण्ये तमेवार्थं विचिन्तयन् ।

पूर्वरात्रे तु तत्रासौ भूत्वा ध्यानपरायणः ॥ ४२ ॥

मध्यरात्रे यथान्यायं निद्रामाहारयत् प्रभुः । परंतु शुकदेवजीने पहले हाथ - पैर धोकर संध्योपासना की । उसके बाद पवित्र आसनपर बैठकर वे मोक्षतत्त्वका ही विचार करने लगे । रातके पहले पहरमें वे ध्यानस्थ होकर बैठे रहे । फिर रात्रिके मध्यभाग ( दूसरे और तीसरे पहर ) में प्रभावशाली शुकने यथोचित निद्राको स्वीकार किया ॥ ४१-४२३ ॥