श्रीगणेशाय नमः।
महाभारत — खण्ड ५ — पृष्ठ 2151–2160
महाभारत — खण्ड ५ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 2151–2160
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सूर्याग्निना रात्रिदिवेन्धनेन । स्वकर्मनिष्ठाफलसाक्षिकेण भूतानि कालः पचति प्रसह्य ॥ ९ २ ॥ यह कालरूपी रसोइया बलपूर्वक सब जीवोंको पका रहा है । मास और ऋतु नामक करछुलसे वह जीवोंको उलटता- पलटता रहता है । सूर्य उसके लिये आगका काम देते हैं और कर्मफलके साक्षी रात और दिन उसके लिये ईंधन बने हुए हैं ॥ ९ २ ॥ धनेन किं यन्न ददाति नाश्नुते बलेन किं येन रिपुं न बाधते । श्रुतेन किं येन न धर्ममाचरेत् किमात्मना यो न जितेन्द्रियो वशी ॥ ९ ३ ॥ उस धनसे क्या लाभ, जिसे मनुष्य न तो किसीको दे सकता और न अपने उपभोगमें ही ला सकता है? उस बलसे क्या लाभ, जिससे शत्रुओंको बाधित न किया जा सके? उस शास्त्रज्ञानसे क्या लाभ, जिसके द्वारा मनुष्य धर्माचरण न कर सके? और उस जीवात्मासे क्या लाभ, जो न तो जितेन्द्रिय है और न मनको ही वशमें रख सकता है? ॥ भीष्म उवाच
इदं द्वैपायनवचो हितमुक्तं निशम्य तु ।
शुको गतः परित्यज्य पितरं मोक्षदैशिकम् ॥ ९ ४ ॥
भीष्मजी कहते हैं - राजन्! व्यासजीके कहे हुए ये हितकर वचन सुनकर शुकदेवजी अपने पिताको छोड़कर मोक्षतत्त्वके उपदेशक गुरुके पास चले गये ॥ ९ ४ ॥ इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि पावकाध्ययनं नामैकविंशत्यधिकत्रिशततमोऽध्यायः ॥ ३२१ ॥
इसप्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें पावकाध्ययन नामक तीन सौ इक्कीसवाँअध्याय पूरा हुआ ॥ ३२१ ॥
* मनुजीने धर्मके दस भेद ये बताये हैं— धृतिः क्षमा दमोऽस्तेयं शौचमिन्द्रियनिग्रहः । धीर्विद्या सत्यमक्रोधो दशकं धर्मलक्षणम् ॥ ' धृति, क्षमा, मनोनिग्रह, पवित्रता, इन्द्रियसंयम, बुद्धि, विद्या, सत्य और अक्रोध — ये धर्मके दस लक्षण हैं ।
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द्वाविंशत्यधिकत्रिशततमोऽध्यायः शुभाशुभ कर्मोंका परिणाम कर्ताको अवश्य भोगना पड़ता है, इसका प्रतिपादन युधिष्ठिर उवाच
यद्यस्ति दत्तमिष्टं वा तपस्तप्तं तथैव च ।
गुरूणां वापि शुश्रूषा तन्मे ब्रूहि पितामह ॥ १ ॥
युधिष्ठिरने कहा — पितामह! यदि दान, यज्ञ, तप अथवा गुरु- शुश्रूषा करनेसे कोई फल मिलता है तो वह मुझे बताइये ॥ १ ॥
भीष्मउवाच
आत्मनानर्थयुक्तेन पापे निविशते मनः ।
स कर्म कलुषं कृत्वा क्लेशे महति धीयते ॥ २ ॥
भीष्मजीने कहा- राजन्! जब बुद्धि काम-क्रोध आदि अनर्थोंसे युक्त हो जाती है, तब उससे प्रेरित हुए मनुष्यका मन पापमें प्रवृत्त होने लगता है। फिर वह मनुष्य दोषयुक्त कर्म करके महान् क्लेशमें पड़ जाता है ॥ २ ॥
दुर्भिक्षादेव दुर्भिक्षं क्लेशात् क्लेशं भयाद् भयम् ।
मृतेभ्यः प्रमृता यान्ति दरिद्राः पापकर्मिणः ॥ ३ ॥
पापकर्म करनेवाले दरिद्र मानव दुर्भिक्षसे दुर्भिक्षको, क्लेशसे क्लेशको तथा भयसे भयको पाते हुए मरे हुओंसे भी अधिक मृतकतुल्य हो जाते हैं ॥ ३ ॥
उत्सवादुत्सवं यान्ति स्वर्गात् स्वर्गं सुखात् सुखम् ।
श्रद्दधानाश्च दान्ताश्च धनस्थाः शुभकारिणः ॥ ४ ॥
जो श्रद्धालु, जितेन्द्रिय, धनसम्पन्न तथा शुभकर्म- परायण होते हैं, वे उत्सवसे अधिक उत्सवको, स्वर्गसे अधिक स्वर्गको तथा सुखसे अधिक सुखको पाते हैं ॥
व्यालकुञ्जरदुर्गेषु सर्पचौरभयेषु च ।
हस्तावापेन गच्छन्ति नास्तिकाः किमतः परम् ॥ ५ ॥
नास्तिक मनुष्योंके हाथमें हथकड़ी डालकर राजा उन्हें राज्यसे दूर निकाल देता है और वे उन जंगलोंमें चले जाते हैं, जो मतवाले हाथियोंके कारण दुर्गम तथा सर्प और चोर
आदिके भयसे भरे हुए होते हैं । इससे बढ़कर उन्हें और क्या दण्ड मिल सकता है? ॥ ५ ॥
प्रियदेवातिथेयाश्च वदान्याः प्रियसाधवः ।
क्षेम्यमात्मवतां मार्गमास्थिता हस्तदक्षिणम् ॥ ६ ॥
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जिन्हें देवपूजा और अतिथि सत्कार प्रिय है, जो उदार तथा श्रेष्ठ पुरुष जिन्हें अच्छे लगते हैं, वे पुण्यात्मा मनुष्य अपने दाहिने हाथके समान मंगलकारी एवं मनको वशमें रखनेवाले योगियोंको ही प्राप्त होने योग्य मार्गपर आरूढ़ होते हैं ॥ ६ ॥
पुलाका इव धान्येषु पुत्यण्डा इव पक्षिषु ।
तद्विधास्ते मनुष्येषु येषां धर्मो न कारणम् ॥ ७ ॥
जिनका उद्देश्य धर्मपालन नहीं है, ऐसे मनुष्य मानव समाजके भीतर वैसे ही समझे जाते हैं, जैसे धानोंमें थोथा धान और पक्षियोंमें सड़ा हुआ अंडा ॥ ७ ॥
सुशीघ्रमपि धावन्तं विधानमनुधावति ।
शेते सह शयानेन येन येन यथा कृतम् ॥ ८ ॥
उपतिष्ठति तिष्ठन्तं गच्छन्तमनुगच्छति ।
करोति कुर्वतः कर्म च्छायेवानुविधीयते ॥ ९ ॥
जिस-जिस मनुष्यने जैसा कर्म किया है, वह उसके पीछे लगा रहता है । यदि कर्ता पुरुष शीघ्रतापूर्वक दौड़ता है तो वह भी उतनी ही तेजीके साथ उसके पीछे जाता है । जब वह सोता है, तब उसका कर्मफल भी उसीके साथ सो जाता है । जब वह खड़ा होता है, तब वह भी उसके पास ही खड़ा रहता है और जब मनुष्य चलता है, तब वह भी उसके पीछे-पीछे चलने लगता है । इतना ही नहीं, कोई कार्य करते समय भी कर्म - संस्कार उसका साथ नहीं छोड़ता । सदा छायाके समान पीछे लगा रहता है ॥ ८ - ९ ॥
येन येन यथा यद् यत्पुरा कर्म सुनिश्चितम् ।
तत् तदेकतरो भुङ्क्ते नित्यं विहितमात्मना ॥ १० ॥
जिस -जिस मनुष्यने अपने - अपने पूर्वजन्मोंमें जैसे - जैसे कर्म किये हैं, वह अपने ही किये हुए उन कर्मोंका फल सदा अकेला ही भोगता है ॥ १० ॥
स्वकर्मफलनिक्षेपं विधानपरिरक्षितम् ।
भूतग्राममिमं कालः समन्तादपकर्षति ॥ ११ ॥
अपने - अपने कर्मका फल एक धरोहरके समान है, वह शास्त्रविधानके अनुसार सुरक्षित रहता है । उपयुक्त अवसर आनेपर यह काल इस प्राणिसमुदायको कर्मानुसार खींच ले जाता है ॥ ११ ॥
अचोद्यमानानि यथा पुष्पाणि च फलानि च ।
स्वं कालं नातिवर्तन्ते तथा कर्म पुरा कृतम् ॥ १२ ॥
जैसे फूल और फल किसीकी प्रेरणाके बिना ही अपने समयपर वृक्षोंमें लग जाते हैं, उसी प्रकार पहलेके किये हुए कर्म भी अपने फलभोगके समयका उल्लंघन नहीं करते हैं ॥ १२ ॥
सम्मानश्चावमानश्च लाभालाभौ क्षयोदयौ ।
प्रवृत्ता विनिवर्तन्ते विधानान्ते पदे पदे ॥ १३ ॥
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सम्मान- अपमान, लाभ-हानि तथा उन्नति- अवनति – ये पूर्वजन्मके कर्मोंके अनुसार पग- पगपर प्राप्त होते हैं और प्रारब्धभोगके पश्चात् पुनः निवृत्त हो जाते हैं ॥ १३ ॥
आत्मना विहितं दुःखमात्मना विहितं सुखम् ।
गर्भशय्यामुपादाय भुज्यते पौर्वदेहिकम् ॥ १४ ॥
दुःख अपने ही किये हुए कर्मोंका फल है और सुख भी अपने ही पूर्वकृत कर्मोंका परिणाम है । जीव माताकी गर्भशय्यामें आते ही पूर्व शरीरद्वारा उपार्जित सुख -दुःखका उपभोग करने लगता है ॥ १४ ॥
बालो युवा वा वृद्धश्च यत् करोति शुभाशुभम् 1 तस्यां तस्यामवस्थायां भुङ्क्ते जन्मनि जन्मनि ॥ १५ ॥
कोई बालक हो, तरुण हो या बूढ़ा हो, वह जो भी शुभाशुभ कर्म करता है, जन्म-जन्मान्तरमें उसी अवस्थामें उस - उस कर्मका फल भोगता है ॥ १५ ॥
यथा धेनुसहस्रेषु वत्सो विन्दति मातरम् ।
तथा पूर्वकृतं कर्म कर्तारमनुगच्छति ॥ १६ ॥
जैसे बछड़ा हजारों गौओंमेंसे अपनी माँको पहचानकर उसे पा लेता है, वैसे ही पहलेका किया हुआ कर्म भी अपने कर्ताके पास पहुँच जाता है ॥ १६ ॥
मलिनं हि यथा वस्त्रं पश्चाच्छुद्धयति वारिणा ।
उपवासैः प्रतप्तानां दीर्घं सुखमनन्तकम् ॥ १७ ॥
जैसे मलिन हुआ वस्त्र पीछे जलसे धोनेपर शुद्ध हो जाता है, उसी प्रकार जो उपवासपूर्वक तपस्या करते हैं, ( उनका अन्तःकरण शुद्ध होकर) उन्हें कभी समाप्त न होनेवाला महान् सुख मिलता है ॥ १७ ॥
दीर्घकालेन तपसा सेवितेन महामते ।
धर्मनिर्धूतपापानां संसिध्यन्ते मनोरथाः ॥ १८ ॥
महामते! दीर्घकालतक की हुई तपस्यासे तथा धर्माचरणद्वारा जिनके सारे पाप धुल गये हैं, उनके सम्पूर्ण मनोरथ सिद्ध हो जाते हैं ॥ १८ ॥
शकुनानामिवाकाशे मत्स्यानामिव चोदके ।
पदं यथा न दृश्येत तथा पुण्यकृतां गतिः ॥ १ ९ ॥
जैसे आकाशमें पक्षियोंके और जलमें मछलियोंके चरण - चिह्न दिखायी नहीं देते, उसी प्रकार पुण्यात्मा ज्ञानियोंकी भी गतिका पता नहीं चलता ॥ १ ९ ॥
अलमन्यैरुपालब्धैः कीर्तितैश्च व्यतिक्रमैः ।
पेशलं चानुरूपं च कर्तव्यं हितमात्मनः ॥ २० ॥
दूसरोंको उलाहना देने तथा लोगोंके अन्यान्य अपराधोंकी चर्चा करनेसे कोई प्रयोजन नहीं है । जो सुन्दर, अनुकूल और अपने लिये हितकर जान पड़े, वही कर्म करना चाहिये ॥ २० ॥
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इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि धर्ममूलिको नाम द्वाविंशत्यधिकत्रिशततमोऽध्यायः ॥ ३२२ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें धर्ममूलिकनामक तीनसौ बाईसवाँअध्याय पूरा हुआ ॥ ३२२ ॥
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त्रयोविंशत्यधिकत्रिशततमोऽध्यायः व्यासजीकी पुत्रप्राप्तिके लिये तपस्या और भगवान् शंकरसे वरप्राप्ति युधिष्ठिर उवाच
कथं व्यासस्य धर्मात्मा शुको जज्ञे महातपाः ।
सिद्धिं च परमां प्राप्तस्तन्मे ब्रूहि पितामह ॥ १ ॥
युधिष्ठिरने कहा - पितामह! व्यासजीके यहाँ महातपस्वी और धर्मात्मा शुकदेवजीका जन्म कैसे हुआ? तथा उन्होंने परम सिद्धि कैसे प्राप्त की? यह मुझे बताइये ॥ १ ॥
कस्यां चोत्पादयामास शुकं व्यासस्तपोधनः ।
न ह्यस्य जननीं विद्म जन्म चाग्र्यं महात्मनः ॥ २ ॥
तपस्याके धनी व्यासजीने किस स्त्रीके गर्भसे शुकदेवजीको उत्पन्न किया? हमें उन महात्मा शुकदेवजीकी माताका नाम नहीं मालूम है और हम उनके श्रेष्ठ जन्मका वृत्तान्त भी नहीं जानते हैं ॥ २ ॥
कथं च बालस्य सतः सूक्ष्मज्ञाने गता मतिः ।
यथा नान्यस्य लोकेऽस्मिन् द्वितीयस्येह कस्यचित् ॥ ३ ॥
शुकदेवजी अभी बालक थे तो भी सूक्ष्मज्ञानमें उनकी बुद्धि कैसे लगी? इस संसारमें उनके सिवा दूसरे किसीकी ऐसी बुद्धि नहीं देखी गयी ॥ ३ ॥
एतदिच्छाम्यहं श्रोतुं विस्तरेण महामते ।
न हि मे तृप्तिरस्तीह शृण्वतोऽमृतमुत्तमम् ॥ ४ ॥
महामते! मैं इस प्रसंगको विस्तारपूर्वक सुनना चाहता हूँ । आपका यह अमृतके समान उत्तम एवं मधुर प्रवचन सुनते हुए मुझे तृप्ति नहीं हो रही है ॥ ४ ॥
माहात्म्यमात्मयोगं च विज्ञानं च शुकस्य ह ।
यथावदानुपूर्व्येण तन्मे ब्रूहि पितामह ॥ ५ ॥
पितामह! आप मुझे शुकदेवजीका माहात्म्य, आत्मयोग और विज्ञान यथार्थ रीतिसे क्रमशः बताइये ॥ भीष्म उवाच
न हायनैर्न पलितैर्न वित्तैर्न च बन्धुभिः ।
ऋषयश्चक्रिरे धर्मं योऽनूचानः स नो महान् ॥ ६ ॥
भीष्मजीने कहा- राजन्! कोई अधिक वर्षोंकी अवस्था हो जानेसे, बाल पक जानेसे, अधिक धन होनेसे तथा भाई- बन्धुओंकी संख्या बढ़ जानेसे भी बड़ा नहीं होता ।
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ऋषियोंने यह नियम बनाया है कि हमलोगोंमेंसे जो वेदोंका प्रवचन कर सकेगा, वही महान् माना जायगा || ६ ||
तपोमूलमिदं सर्वं यन्मां पृच्छसि पाण्डव ।
तदिन्द्रियाणि संयम्य तपो भवति नान्यथा ॥ ७ ॥
पाण्डुनन्दन! तुम मुझसे जिसके विषयमें पूछ रहे हो, उस सबकी जड़ तपस्या है ।
इन्द्रियोंका संयम करनेसे ही तपस्याकी सिद्धि होती है, अन्यथा नहीं ॥ ७ ॥
इन्द्रियाणां प्रसङ्गेन दोषमृच्छत्यसंशयम् ।
संनियम्य तु तान्येव सिद्धिमाप्नोति मानवः ॥ ८ ॥
इसमें संदेह नहीं कि मनुष्य इन्द्रियोंकी विषयासक्तिके कारण ही दोषको प्राप्त होता है और उन्हीं इन्द्रियोंको काबू में कर लेनेपर वह सिद्धिका भागी होता है ॥ ८ ॥
अश्वमेधसहस्रस्य वाजपेयशतस्य च ।
योगस्य कलया तात न तुल्यं विद्यते फलम् ॥ ९ ॥
तात! सहस्रों अश्वमेध और सैकड़ों वाजपेय यज्ञोंका जो फल है, वह योगकी सोलहवीं कलाके फलकी भी समानता नहीं कर सकता ॥ ९ ॥
अत्र ते वर्तयिष्यामि जन्मयोगफलं तथा ।
शुकस्याग्र्यां गतिं चैव दुर्विदामकृतात्मभिः ॥ १० ॥
राजन्! मैं तुम्हें शुकदेवजीका जन्म- वृत्तान्त, योगफल तथा अजितात्मा पुरुषोंकी समझमें न आनेवाली उनकी उत्कृष्ट गति बता रहा हूँ ॥ १० ॥
मेरुशृङ्गे किल पुरा कर्णिकारवनायुते ।
विजहार महादेवो भीमैर्भूतगणैर्वृतः ॥ ११ ॥
कहते हैं, पूर्वकालमें कनेरके वनोंसे सुशोभित मेरुपर्वतके शिखरपर भगवान् शंकर भयानक भूतगणोंको साथ ले विहार करते थे ॥ ११ ॥
शैलराजसुता चैव देवी तत्राभवत् पुरा ।
तत्र दिव्यं तपस्तेपे कृष्णद्वैपायनस्तदा ॥ १२ ॥
वहीं गिरिराजकुमारी उमादेवी भी उनके साथ ही निवास करती थीं । उन्हीं दिनों श्रीकृष्णद्वैपायन व्यास उस पर्वतपर दिव्य तपस्या कर रहे थे ॥ १२ ॥
योगेनात्मानमाविश्य योगधर्मपरायणः ।
धारयन् स तपस्तेपे पुत्रार्थं कुरुसत्तम ॥ १३ ॥
कुरुश्रेष्ठ! योगधर्मपरायण व्यास योगके द्वारा अपने मनको परमात्मामें लगाकर
धारणापूर्वक तपका अनुष्ठान करते थे। उनके तपका उद्देश्य था पुत्रकी प्राप्ति ॥ १३ ॥
अग्नेर्भूमेरपां वायोरन्तरिक्षस्य वा विभो ।
धैर्येण सम्मितः पुत्रो मम भूयादिति स्म ह ॥ १४ ॥
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उन्होंने यह संकल्प लेकर कि मुझे अग्नि, भूमि, जल, वायु अथवा आकाशके समान धैर्यशाली पुत्र प्राप्त हो, तपस्या आरम्भ की थी ॥ १४ ॥
संकल्पेनाथ योगेन दुष्प्रापमकृतात्मभिः ।
वरयामास देवेशमास्थितस्तप उत्तमम् ॥ १५ ॥
उक्त संकल्प लेकर योगके द्वारा उत्तम तपस्यामें लगे हुए वेदव्यासजीने अजितात्मा पुरुषोंके लिये दुर्लभ देवेश्वर महादेवजीसे वर प्रार्थना की ॥ १५ ॥
अतिष्ठन्मारुताहारः शतं किल समाः प्रभुः ।
आराधयन्महादेवं बहुरूपमुमापतिम् ॥ १६ ॥
शक्तिशाली व्यासजी सौ वर्षोंतक केवल वायुभक्षण करते हुए अनेक रूपधारी उमापति महादेवजीकी आराधनामें लगे रहे ॥ १६ ॥
तत्र ब्रह्मर्षयश्चैव सर्वे राजर्षयस्तथा ।
लोकपालाश्च लोकेशं साध्याश्च बहुभिः सह ॥ १७ ॥
आदित्याश्चैव रुद्राश्च दिवाकरनिशाकरौ ।
वसवो मरुतश्चैव सागराः सरितस्तथा ॥ १८ ॥
अश्विनौ देवगन्धर्वास्तथा नारदपर्वतौ ।
विश्वावसुश्च गन्धर्वः सिद्धाश्चाप्सरसस्तथा ॥ १ ९ ॥
वहाँ सम्पूर्ण ब्रह्मर्षि, सभी राजर्षि, लोकपाल, बहुत -से अनुचरोंके सहित साध्य, आदित्य, रुद्र, सूर्य, चन्द्रमा, वसुगण, मरुद्गण, समुद्र, सरिताएँ, दोनों अश्विनीकुमार, देवता, गन्धर्व, नारद, पर्वत, गन्धर्वराज विश्वावसु, सिद्ध तथा अप्सराएँ भी लोकेश्वर महादेवजीकी आराधना करती थीं ॥ १७–१९ ॥
तत्र रुद्रो महादेवः कर्णिकारमयीं शुभाम् ।
धारयाणः स्रजं भाति ज्योत्स्नामिव निशाकरः ॥ २० ॥
तस्मिन् दिव्ये वने रम्ये देवदेवर्षिसंकुले ।
आस्थितः परमं योगमृषिः पुत्रार्थमच्युतः ॥ २१ ॥
वहाँ महान् रुद्रदेव कनेर पुष्पोंकी मनोहर माला धारण किये चाँदनीसहित चन्द्रमाके समान शोभा पाते थे । देवताओं तथा देवर्षियोंसे भरे हुए उस दिव्य रमणीय वनमें पुत्र-प्राप्तिके लिये परम योगका आश्रय ले मुनिवर व्यास तपस्यामें प्रवृत्त थे और उससे विचलित नहीं होते थे ॥ २०-२१ ॥
न चास्य हीयते प्राणो न ग्लानिरुपजायते ।
त्रयाणामपि लोकानां तदद्भुतमिवाभवत् ॥ २२ ॥
ऐसा कठोर तप करनेपर भी न तो उनके प्राण नष्ट हुए और न उन्हें थकान ही हुई । यह तीनों लोकोंके लिये अद्भुत-सी बात हुई ॥ २२ ॥
जटाश्च तेजसा तस्य वैश्वानरशिखोपमाः ।
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प्रज्वलन्त्यः स्म दृश्यन्ते युक्तस्यामिततेजसः ॥ २३ ॥
योगयुक्त हुए अमित तेजस्वी व्यासजीकी जटाएँ उनके तेजसे आगकी लपटोंके समान प्रज्वलित दिखायी देती थीं ॥ २३ ॥
मार्कण्डेयो हि भगवानेतदाख्यातवान् मम ।
स देवचरितानीह कथयामास मे सदा ॥ २४ ॥
मुझे तो यह वृत्तान्त भगवान् मार्कण्डेयजीने सुनाया था । वे मुझे सदा ही देवताओंके चरित्र सुनाया करते थे ॥
एता अद्यापि कृष्णस्य तपसा तेन दीपिताः ।
अग्निवर्णा जटास्तात प्रकाशन्ते महात्मनः ॥ २५ ॥
तात! उसी तपस्यासे उद्दीप्त हुई महात्मा व्यासजीकी ये जटाएँ आज भी अग्निके समान प्रकाशित हो रही हैं ॥
एवंविधेन तपसा तस्य भक्त्या च भारत ।
महेश्वरः प्रसन्नात्मा चकार मनसा मतिम् ॥ २६ ॥
भारत! उनकी ऐसी तपस्या और भक्ति देखकर महादेवजी बड़े प्रसन्न हुए और उन्होंने मन- ही - मन उन्हें अभीष्ट वर देनेका विचार किया ॥ २६ ॥
उवाच चैवं भगवांस्त्र्यम्बकः प्रहसन्निव ।
एवंविधस्ते तनयो द्वैपायन भविष्यति ॥ २७ ॥
भगवान् शिव व्यासजीके सामने आये और हँसते हुए- से बोले – ' द्वैपायन! तुम जैसा चाहते हो, वैसा ही पुत्र तुम्हें प्राप्त होगा ॥ २७ ॥
यथा ह्यग्निर्यथा वायुर्यथा भूमिर्यथा जलम् ।
यथा च खं तथा शुद्धो भविता ते सुतो महान् ॥ २८ ॥
‘ जैसे अग्नि, जैसे वायु, जैसे पृथ्वी, जैसे जल और जैसे आकाश शुद्ध है, तुम्हारा पुत्र भी वैसा ही शुद्ध एवं महान् होगा ॥ २८ ॥
तद्भावभावी तद्बुद्धिस्तदात्मा तदपाश्रयः ।
तेजसाऽऽवृत्य लोकांस्त्रीन् यशः प्राप्स्यति ते सुतः ॥ २ ९ ॥
‘ वह भगवद्भावमें रँगा होगा, भगवान्में ही उसकी बुद्धि होगी, भगवान्में ही उसका मन लगा रहेगा और एकमात्र भगवान्को ही वह अपना आश्रय समझेगा । उसके तेजसे तीनों लोक व्याप्त हो जायँगे और तुम्हारा वह पुत्र महान् यश प्राप्त करेगा' ॥ २ ९ ॥ इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि शुकोत्पत्तौ त्रयोविंशत्यधिकत्रिशततमोऽध्यायः ॥ ३२३ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें शुकदेवकी उत्पत्तिविषयक तीनसौ तेईसवाँअध्याय पूरा हुआ ॥ ३२३ ॥
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