श्रीगणेशाय नमः।
महाभारत — खण्ड ५ — पृष्ठ 661–670
महाभारत — खण्ड ५ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 661–670
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नवनवतितमोऽध्यायः शूरवीरोंको स्वर्ग और कायरोंको नरककी प्राप्तिके विषयमें मिथिलेश्वर जनकका इतिहास भीष्म उवाच
अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् ।
प्रतर्दनो मैथिलश्च संग्रामं यत्र चक्रतुः ॥ १ ॥
भीष्मजी कहते हैं- राजन्! इसी विषयमें विज्ञ पुरुष उस प्राचीन इतिहासका उदाहरण दिया करते हैं, जिससे यह पता चलता है कि किसी समय राजा प्रतर्दन तथा मिथिलेश्वर जनकने परस्पर संग्राम किया था ॥ १ ॥
यज्ञोपवीती संग्रामे जनको मैथिलो यथा ।
योधानुद्धर्षयामास तन्निबोध युधिष्ठिर ॥ २ ॥
युधिष्ठिर! यज्ञोपवीतधारी मिथिलापति जनकने रणभूमिमें अपने योद्धाओंको जिस प्रकार उत्साहित किया था, वह सुनो ॥ २ ॥
जनको मैथिलो राजा महात्मा सर्वतत्त्ववित् ।
योधान् स्वान् दर्शयामास स्वर्गं नरकमेव च ॥ ३ ॥
मिथिलाके राजा जनक बड़े महात्मा और सम्पूर्ण तत्त्वोंके ज्ञाता थे । उन्होंने अपने योद्धाओंको योगबलसे स्वर्ग और नरकका प्रत्यक्ष दर्शन कराया और इस प्रकार कहा ॥ ३ ॥
अभीरूणामिमे लोका भास्वन्तो हन्त पश्यत ।
पूर्णा गन्धर्वकन्याभिः सर्वकामदुहोऽक्षयाः ॥ ४ ॥
‘ वीरो! देखो, ये जो तेजस्वी लोक दृष्टिगोचर हो रहे हैं, ये निर्भय होकर युद्ध करनेवाले वीरोंको प्राप्त होते हैं । ये अविनाशी लोक असंख्य गन्धर्वकन्याओं ( अप्सराओं ) से भरे हुए हैं और सम्पूर्ण कामनाओंकी पूर्ति करनेवाले हैं ॥ ४ ॥
इमे पलायमानानां नरकाः प्रत्युपस्थिताः ।
अकीर्तिः शाश्वती चैव यतितव्यमनन्तरम् ॥ ५ ॥
' और देखो, ये जो तुम्हारे सामने नरक उपस्थित हुए हैं, युद्धमें पीठ दिखाकर भागनेवालोंको मिलते हैं । साथ ही इस जगत्में उनकी सदा रहनेवाली अपकीर्ति फैल जाती है; अतः अब तुम लोगोंको विजयके लिये प्रयत्न करना चाहिये ॥ ५ ॥
तान् दृष्ट्वारीन् विजयत भूत्वा संत्यागबुद्धयः ।
नरकस्याप्रतिष्ठस्य मा भूत वशवर्तिनः ॥ ६ ॥
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‘ उन स्वर्ग और नरक दोनों प्रकारके लोकोंका दर्शन करके तुम लोग युद्धमें प्राण-विसर्जनके लिये दृढ़ निश्चयके साथ डट जाओ और शत्रुओंपर विजय प्राप्त करो । जिसकी कहीं भी प्रतिष्ठा नहीं है, उस नरकके अधीन न होओ ॥ ६ ॥
त्यागमूलं हि शूराणां स्वर्गद्वारमनुत्तमम् ।
इत्युक्तास्ते नृपतिना योधाः परपुरंजय ॥ ७ ॥
अजयन्त रणे शत्रून् हर्षयन्तो नरेश्वरम् ।
तस्मादात्मवता नित्यं स्थातव्यं रणमूर्धनि ॥ ८ ॥
' शूरवीरोंको जो सर्वोत्तम स्वर्गलोकका द्वार प्राप्त होता है, उसमें उनका त्याग ही मूल कारण है ' । शत्रुनगरीपर विजय पानेवाले युधिष्ठिर! राजा जनकके ऐसा कहनेपर उन योद्धाओंने रणभूमिमें अपने महाराजका हर्ष बढ़ाते हुए उनके शत्रुओंपर विजय प्राप्त कर ली; अतः मनस्वी वीरको सदा युद्धके मुहानेपर डटे रहना चाहिये ॥ ७-८ ॥
गजानां रथिनो मध्ये रथानामनु सादिनः ।
सादिनामन्तरे स्थाप्यं पादातमपि दंशितम् ॥ ९ ॥
गजारोहियोंके बीचमें रथियोंको खड़ा करे । रथियोंके पीछे घुड़सवारोंकी सेना रखे और उनके बीचमें कवच एवं अस्त्र - शस्त्रोंसे सुसज्जित पैदलोंकी सेना खड़ी करे ॥ ९ ॥
य एवं व्यूहते राजा स नित्यं जयति द्विषः ।
तस्मादेवं विधातव्यं नित्यमेव युधिष्ठिर ॥ १० ॥
जो राजा अपनी सेनाका इस प्रकार व्यूह बनाता है, वह सदा शत्रुओंपर विजय पाता है; अतः युधिष्ठिर! तुम्हें भी सदा इसी प्रकार व्यूहरचना करनी चाहिये ॥ १० ॥
सर्वे स्वर्गतिमिच्छन्ति सुयुद्धेनातिमन्यवः ।
क्षोभयेयुरनीकानि सागरं मकरा यथा ॥ ११ ॥
सभी क्षत्रिय उत्तम युद्धके द्वारा स्वर्गलोक प्राप्त करनेकी इच्छा करते हैं; अतः जैसे मकर समुद्रमें क्षोभ उत्पन्न कर देते हैं, उसी प्रकार वे अत्यन्त कुपित हो शत्रुओंकी सेनाओंमें हलचल मचा देते हैं ॥ ११ ॥
हर्षयेयुर्विषण्णांश्च व्यवस्थाप्य परस्परम् ।
जितां च भूमिं रक्षेत भग्नान् नात्यनुसारयेत् ॥ १२ ॥
यदि अपने सैनिक विषादग्रस्त या शिथिल हो रहे हों तो उनका पूर्ववत् व्यूह बनाकर उन्हें परस्पर स्थापित करे और उन समस्त योद्धाओंका हर्ष एवं उत्साह बढ़ावे । जो भूमि जीत ली गयी हो, उसकी रक्षा करे; परंतु शत्रुओंके जो सैनिक पराजित होकर भाग रहे हों, उनका बहुत दूरतक पीछा नहीं करना चाहिये ॥ १२ ॥
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नरक राजर्षि जनक अपने सैनिकोंको स्वर्ग और नरककी बात कह रहे हैं
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पुनरावर्तमानानां निराशानां च जीविते ।
वेगः सुदुःसहो राजंस्तस्मान्नात्यनुसारयेत् ॥ १३ ॥
राजन्! जो जीवनसे निराश होकर पुनः युद्धके लिये लौट पड़ते हैं, उनका वेग अत्यन्त दुःसह होता है; अतः भागते हुओंके पीछे अधिक नहीं पड़ना चाहिये ॥
न हि प्रहर्तुमिच्छन्ति शूराः प्रद्रवतो भृशम् ।
तस्मात् पलायमानानां कुर्यान्नात्यनुसारणम् ॥ १४ ॥
शूरवीर जोर- जोरसे भागते हुए योद्धाओंपर प्रहार करना नहीं चाहते हैं; अतः पलायन करनेवाले सैनिकोंका अधिक दूरतक पीछा नहीं करना चाहिये ॥ १४ ॥
चराणामचरा ह्यन्नमदंष्ट्रा दंष्ट्रिणामपि ।
आपः पिपासतामन्नमन्नं शूरस्य कातराः ॥ १५ ॥
चलनेवाले प्राणियोंके अन्न हैं स्थावर, दाँतवाले जीवोंके अन्न हैं बिना दाँतके प्राणी, प्यासोंका अन्न है पानी और शूरवीरोंके अन्न हैं कायर ॥ १५ ॥
समानपृष्ठोदरपाणिपादाः पराभवं भीरवो वै व्रजन्ति । अतो भयार्ताः प्रणिपत्य भूयः कृत्वाञ्जलीनुपतिष्ठन्ति शूरान् ॥ १६ ॥
वीरों और कायरोंके पेट, पीठ, हाथ और पैर समान ही होते हैं; तो भी कायर पुरुष जगत्में अपमानको प्राप्त होते हैं । अतः भयसे आतुर हुए वे मनुष्य हाथ जोड़कर बारंबार प्रणाम करते हुए सदा शूरवीरोंकी शरणमें आते हैं ॥ १६ ॥
शूरबाहुषु लोकोऽयं लम्बते पुत्रवत् सदा ।
तस्मात् सर्वास्ववस्थासु शूरः सम्मानमर्हति ॥ १७ ॥
जैसे पुत्र सदा पितापर अवलम्बित होता है, उसी प्रकार यह सारा जगत् शूरवीरकी भुजाओंपर ही टिका हुआ है; इसलिये सभी अवस्थाओंमें वीर पुरुष सम्मान पानेके योग्य है ॥ १७ ॥
न हि शौर्यात् परं किंचित् त्रिषु लोकेषु विद्यते ।
शूरः सर्वं पालयति सर्वं शूरे प्रतिष्ठितम् ॥ १८ ॥
तीनों लोकोंमें शूरवीरतासे बढ़कर दूसरी कोई वस्तु नहीं है । शूरवीर सबका पालन करता है और सारा जगत् उसीके आधारपर टिका हुआ है ॥ १८ ॥
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि राजधर्मानुशासनपर्वणि विजिगीषमाणवृत्ते नवनवतितमोऽध्यायः ॥ ९९ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत राजधर्मानुशासनपर्वमें विजयाभिलाषी राजाका बर्तावविषयक निन्यानबेवाँ अध्याय पूराहुआ ॥ ९९ ॥
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शततमोऽध्यायः सैन्यसंचालनकी रीति-नीतिका वर्णन युधिष्ठिर उवाच
यथा जयार्थिनः सेनां नयन्ति भरतर्षभ ।
ईषद् धर्मं प्रपीड्यापि तन्मे ब्रूहि पितामह ॥ १ ॥
युधिष्ठिरने पूछा— भरतश्रेष्ठ पितामह! विजया-भिलाषी राजालोग जिस प्रकार धर्मका थोड़ा - सा उल्लंघन करके भी अपनी सेनाको आगे ले जाते हैं, वह मुझे बताइये ॥ १ ॥
भीष्म उवाच
सत्येन हि स्थितो धर्म उपपत्त्या तथा परे ।
साध्वाचारतया केचित् तथैवौपयिकादपि ॥ २ ॥
भीष्मजीने कहा- राजन्! किन्हींका मत है कि धर्म सत्यसे ही स्थिर रहता है । दूसरे लोग युक्तिवादसे ही धर्मकी प्रतिष्ठा मानते हैं । किसी -किसीके मतमें श्रेष्ठ आचरणसे ही धर्मकी स्थिति है और कितने ही लोग यथासम्भव साम-दान आदि उपायोंके अवलम्बनसे भी धर्मकी प्रतिष्ठा स्वीकार करते हैं ॥ २ ॥
उपायधर्मान् वक्ष्यामि सिद्धार्थानर्थधर्मयोः ।
निर्मर्यादा दस्यवस्तु भवन्ति परिपन्थिनः ॥ ३ ॥
तेषां प्रतिविघातार्थं प्रवक्ष्याम्यथ नैगमम् ।
कार्याणां सर्वसिद्धयर्थं तानुपायान् निबोध मे ॥ ४ ॥
युधिष्ठिर! अब मैं अर्थसिद्धिके साधनभूत धर्मोंका वर्णन करूँगा । यदि डाकू और लुटेरे अर्थ और धर्मकी मर्यादा तोड़ने लगें, तब उनके विनाशके लिये वेदोंमें जो साधन बताया गया है, उसका वर्णन आरम्भ करता हूँ । तुम समस्त कार्योंकी सिद्धिके लिये उन उपायोंको मुझसे सुनो ॥ ३-४ ॥
उभे प्रज्ञे वेदितव्ये ऋज्वी वक्रा च भारत ।
जानन् वक्रां न सेवेत प्रतिबाधेत चागताम् ॥ ५ ॥
भरतनन्दन! बुद्धि दो प्रकारकी होती है । एक सरल, दूसरी कुटिल । राजाको उन दोनोंका ही ज्ञान प्राप्त करना चाहिये । जहाँतक सम्भव हो, जान-बूझकर कुटिल बुद्धिका सेवन न करे । यदि वैसी बुद्धि स्वतः आ जाय तो भी उसे हटानेका ही प्रयत्न करे ॥ ५ ॥
अमित्रा एव राजानं भेदेनोपचरन्त्युत ।
तां राजा निकृतिं जानन् यथामित्रान् प्रबाधते ॥ ६ ॥
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जो वास्तवमें मित्र नहीं हैं, वे ही भीतरसे राजाके अन्तरंग व्यक्तियोंमें फूट• डालनेका प्रयत्न करते हुए ऊपरसे उसकी सेवामें लगे रहते हैं । राजा उनकी इस शठताको समझे और शत्रुओंकी भाँति उनको भी मिटानेका प्रयत्न करे ॥ ६ ॥
गजानां पार्थ वर्माणि गोवृषाजगराणि च ।
शल्यकण्टकलोहानि तनुत्रचमराणि च ॥ ७ ॥
सितपीतानि शस्त्राणि संनाहाः पीतलोहिताः ।
नानारञ्जनरक्ताः स्युः पताकाः केतवश्च ह ॥ ८ ॥
ऋष्टयस्तोमराः खड्गा निशिताश्च परश्वधाः ।
फलकान्यथ चर्माणि प्रतिकल्प्यान्यनेकशः ॥ ९ ॥
कुन्तीनन्दन! राजाको चाहिये कि वह गाय, बैल तथा अजगरके चमड़ोंसे हाथियोंकी रक्षाके लिये कवच बनवावे । इसके सिवा लोहेकी कीलें, लोहे, कवच, चँवर, चमकीले और पानीदार शस्त्र, पीले और लाल रंगके कवच, बहुरंगी ध्वजा- पताकाएँ, ऋष्टि, तोमर, खड्ग, तीखे फरसे, फलक और ढाल- इन्हें भारी संख्यामें तैयार कराकर सदा अपने पास रखे ॥ ७– ९ ॥
अभिनीतानि शस्त्राणि योधाश्च कृतनिश्चयाः ।
चैत्र्यां वा मार्गशीर्ष्या वा सेनायोगः प्रशस्यते ॥ १० ॥
यदि शस्त्र तैयार हों और योद्धा भी शत्रुओंसे भिड़नेका दृढ़ निश्चय कर चुके हों, तो चैत्र या मार्गशीर्ष मासकी पूर्णिमाको सेनाका युद्धके लिये उद्यत होकर प्रस्थान करना उत्तम माना गया है ॥ १० ॥
पक्वसस्या हि पृथिवी भवत्यम्बुमती तदा ।
नैवातिशीतो नात्युष्णः कालो भवति भारत ॥ ११ ॥
क्योंकि उस समय खेती पक जाती है और भूतलपर जलकी प्रचुरता रहती है । भरतनन्दन! उस समय मौसम भी न तो अधिक ठंडा रहता है और न अधिक गरम ॥ ११ ॥
तस्मात् तदा योजयेत परेषां व्यसनेऽथवा ।
एते हि योगाः सेनायाः प्रशस्ताः परबाधने ॥ १२ ॥
इसलिये उसी समय चढ़ाई करे अथवा जिस समय शत्रु संकटमें हो, उसी अवसरपर उसपर आक्रमण कर दे । शत्रुओंको सेनाद्वारा बाधा पहुँचानेके लिये ये ही अवसर अच्छे माने गये हैं ॥ १२ ॥
जलवांस्तृणवान् मार्गः समो गम्यः प्रशस्यते ।
चारैः सुविदिताभ्यासः कुशलैर्वनगोचरैः ॥ १३ ॥
युद्धके लिये यात्रा करते समय मार्ग समतल और सुगम हो तथा वहाँ जल और घास आदि सुलभ हों तो अच्छा समझा जाता है । वनमें विचरनेवाले कुशल गुप्तचरोंको मार्गके
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विषयमें विशेष जानकारी रहा करती है ॥ १३ ॥
न ह्यरण्येन शक्येत गन्तुं मृगगणैरिव ।
तस्मात् सेनासु तानेव योजयन्ति जयार्थिनः ॥ १४ ॥
वन्य पशुओंकी भाँति मनुष्य जंगलमें आसानीसे नहीं चल सकते; इसलिये विजयाभिलाषी राजा सेनाओंमें मार्गदर्शन करानेके लिये उन्हीं गुप्तचरोंको नियुक्त करते ॥ १४ ॥
अग्रतः पुरुषानीकं शक्तं चापि कुलोद्भवम् ।
आवासस्तोयवान् दुर्गः पर्याकाशः प्रशस्यते ॥ १५ ॥
सेनामें सबसे आगे कुलीन एवं शक्तिशाली पैदल सिपाहियोंको रखना चाहिये । शत्रुसे बचावके लिये सैनिकोंके रहनेका स्थान या किला ऐसा होना चाहिये, जहाँ पहुँचना कठिन हो, जिसके चारों ओर जलसे भरी हुई खाईं और ऊँचा परकोटा हो । साथ ही उसके चारों ओर खुला आकाश होना चाहिये ॥ १५ ॥
परेषामुपसर्पाणं प्रतिषेधस्तथा भवेत् ।
आकाशात् तु वनाभ्याशं मन्यन्ते गुणवत्तरम् ॥ १६ ॥
बहुभिर्गुणजातैश्च ये युद्धकुशला जनाः ।
उपन्यासो भवेत् तत्र बलानां नातिदूरतः ॥ १७ ॥
उस स्थानपर शत्रुओंके आक्रमणको रोकनेके लिये सुविधा होनी चाहिये । युद्धकुशल पुरुष सेनाकी छावनी डालनेके लिये खुले मैदानकी अपेक्षा अनेक गुणोंके कारण जंगलके निकटवर्ती स्थानको अधिक लाभदायक मानते हैं । उस वनके समीप ही सेनाका पड़ाव डालना चाहिये ॥ १६-१७ ॥
उपन्यासावतरणं पदातीनां च गूहनम् ।
अथ शत्रुप्रतीघातमापदर्थं परायणम् ॥ १८ ॥
वहाँ व्यूह निर्माण करनेके लिये रथ और वाहनोंसे उतरना तथा पैदल सैनिकोंको छिपाकर रखना सम्भव है । वहाँ रहकर शत्रुओंके प्रहारका जवाब दिया जा सकता है और आपत्तिके समय छिप जानेका भी सुभीता रहता है ॥
सप्तर्षीन् पृष्ठतः कृत्वा युध्येयुरचला इव ।
अनेन विधिना शत्रून् जिगीषेतापि दुर्जयान् ॥ १ ९ ॥
योद्धाओंको चाहिये कि वे सप्तर्षियोंको पीछे रखकर पर्वतकी तरह अविचलभावसे युद्ध करें। इस विधिसे आक्रमण करनेवाला राजा दुर्जय शत्रुओंको भी जीतनेकी आशा कर सकता है ॥ १ ९ ॥
यतो वायुर्यतः सूर्यो यतः शुक्रस्ततो जयः ।
पूर्वं पूर्वं ज्याय एषां संनिपाते युधिष्ठिर ॥ २० ॥
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जिस ओर वायु, जिस ओर सूर्य और जिस ओर शुक्र हों, उसी ओर पृष्ठभाग रखकर युद्ध करनेसे विजय प्राप्त होती है । युधिष्ठिर! यदि ये तीनों भिन्न - भिन्न दिशाओंमें हों तो इनमें पहला - पहला श्रेष्ठ है अर्थात् वायुको पीछे रखकर शेष दोको सामने रखते हुए भी युद्ध किया जा सकता है ॥ २० ॥
अकर्दमामनुदकाममर्यादामलोष्टकाम् ।
अश्वभूमिं प्रशंसन्ति ये युद्धकुशला जनाः ॥ २१ ॥
घुड़सवार सेनाके लिये युद्धकुशल पुरुष उसी भूमिकी प्रशंसा करते हैं, जिसमें कीचड़, पानी, बाँध और ढेले न हों ॥ २१ ॥
अपङ्का गर्तरहिता रथभूमिः प्रशस्यते ।
नीचद्रुमा महाकक्षा सोदका हस्तियोधिनाम् ॥ २२ ॥
रथसेनाके लिये वह भूमि अच्छी मानी गयी है, जहाँ कीचड़ और गड्ढे न हों । जिस भूमिमें नाटे वृक्ष, बहुत- से घास- फूस और जलाशय हों, वह गजारोही योद्धाओंके लिये अच्छी मानी गयी है ॥ २२ ॥
बहुदुर्गा महाकक्षा वेणुवेत्रसमाकुला ।
पदातीनां क्षमा भूमिः पर्वतोपवनानि च ॥ २३ ॥
जो भूमि अत्यन्त दुर्गम, अधिक घास- फूसवाली, बाँस और बेंतोंसे भरी हुई तथा पर्वत एवं उपवनोंसे युक्त हो, वह पैदल सेनाओंके योग्य होती है ॥ २३ ॥
पदातिबहुला सेना दृढा भवति भारत ।
रथाश्वबहुला सेना सुदिनेषु प्रशस्यते ॥ २४ ॥
भरतनन्दन! जिस सेनामें पैदलोंकी संख्या बहुत अधिक हो, वह मजबूत होती है । जिसमें रथों और घोड़ोंकी संख्या बढ़ी हुई हो, वह सेना अच्छे दिनोंमें ( जबकि वर्षा न होती हो) अच्छी मानी जाती है ॥ २४ ॥
पदातिनागबहुला प्रावृट्काले प्रशस्यते ।
गुणानेतान् प्रसंख्याय देशकालौ प्रयोजयेत् ॥ २५ ॥
बरसातमें वही सेना श्रेष्ठ समझी जाती है, जिसमें पैदलों और हाथीसवारोंकी संख्या अधिक हो । इन गुणोंका विचार करके देश और कालको दृष्टिमें रखते हुए सेनाका संचालन करना चाहिये ॥ २५ ॥
एवं संचिन्त्य यो याति तिथिनक्षत्रपूजितः ।
विजयं लभते नित्यं सेनां सम्यक् प्रयोजयन् ।
प्रसुप्तांस्तृषितान् श्रान्तान् प्रकीर्णान् नाभिघातयेत् ॥ २६ ॥
जो इन सब बातोंपर विचार करके शुभ तिथि और श्रेष्ठ नक्षत्रसे युक्त होकर शत्रुपर चढ़ाई करता है, वह सेनाका ठीक ढंगसे संचालन करके सदा ही विजयलाभ करता है । जो
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लोग सो रहे हों, प्यासे हों, थक गये हों अथवा इधर- उधर भाग रहे हों, उनपर अघात न करे ॥ २६ ॥
मोक्षे प्रयाणे चलने पानभोजनकालयोः ।
अतिक्षिप्तान् व्यतिक्षिप्तान् निहतान् प्रतनूकृतान् ॥ २७ ॥
सुविश्रब्धान् कृतारम्भानुपन्यासान् प्रतापितान् ।
बहिश्चरानुपन्यासान् कृतवेश्मानुसारिणः ॥ २८ ॥
शस्त्र और कवच उतार देनेके बाद, युद्धस्थलसे प्रस्थान करते समय, घूमते - फिरते समय और खाने - पीनेके अवसरपर किसीको न मारे । इसी प्रकार जो बहुत घबराये हुए हों, पागल हो गये हों, घायल हों, दुर्बल हो गये हों, निश्चिन्त होकर बैठे हों, दूसरे किसी काममें लगे हों, लेखनका कार्य करते हों, पीड़ासे संतप्त हों, बाहर घूम रहे हों, दूरसे सामान लाकर लोगोंके निकट पहुँचानेका काम करते हों अथवा छावनीकी ओर भागे जा रहे हों, उनपर भी प्रहार न करे ॥ २७-२८ ॥
पारम्पर्यागते द्वारे ये केचिदनुवर्तिनः ।
परिचर्यावतो द्वारे ये च केचन वर्गिणः ॥ २ ९ ॥
जो परम्परासे प्राप्त हुए राजद्वारपर रक्षा आदि सेवाका कार्य करते हों अथवा जो राजसेवक मन्त्री आदिके द्वारपर पहरा देते हों तथा किसी यूथके अधिपति हों, उनको भी नहीं मारना चाहिये ॥ २ ९ ॥
अनीकं ये विभिन्दन्ति भिन्नं संस्थापयन्ति च ।
समानाशनपानास्ते कार्याः द्विगुणवेतनाः ॥ ३० ॥
जो शत्रुकी सेनाको छिन्न- भिन्न कर डालते हैं और अपनी तितर- बितर हुई सेनाको संगठित करके दृढ़तापूर्वक स्थापित करनेकी शक्ति रखते हैं, ऐसे लोगोंको राजा अपने समान ही भोजन - पानकी सुविधा देकर सम्मानित करे और उन्हें दुगुना वेतन दे ॥ ३० ॥
दशाधिपतयः कार्याः शताधिपतयस्तथा ।
ततः सहस्राधिपतिं कुर्याच्छूरमतन्द्रितम् ॥ ३१ ॥
सेनामें कुछ लोगोंको दस - दस सैनिकोंका नायक बनावे, कुछको सौका तथा किसी प्रमुख और आलस्यरहित वीरको एक हजार योद्धाओंका अध्यक्ष नियुक्त करे ॥ ३१ ॥
यथामुख्यान् संनिपात्य वक्तव्याः संशपामहे ।
विजयार्थं हि संग्रामे न त्यक्ष्यामः परस्परम् ॥ ३२ ॥
तत्पश्चात् मुख्य- मुख्य वीरोंको एकत्र करके यह प्रतिज्ञा करावे कि हम संग्राममें विजय प्राप्त करनेके लिये प्राण रहते एक- दूसरेका साथ नहीं छोड़ेंगे ॥ ३२ ॥
इहैव ते निवर्तन्तां ये च केचन भीरवः ।
ये घातयेयुः प्रवरं कुर्वाणास्तुमुलं प्रति ॥ ३३ ॥