श्रीगणेशाय नमः।
महाभारत — खण्ड ५ — पृष्ठ 671–680
महाभारत — खण्ड ५ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 671–680
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जो लोग डरपोक हों, वे यहींसे लौट जायँ और जो लोग भयानक संग्राम करते हुए शत्रुपक्षके प्रधान वीरका वध कर सकें, वे ही यहाँ ठहरें ॥ ३३ ॥
न संनिपाते प्रदरं वधं वा कुर्युरीदृशाः ।
आत्मानं च स्वपक्षं च पालयन् हन्ति संयुगे ॥ ३४ ॥
क्योंकि ऐसे डरपोक मनुष्य घमासान युद्धमें शत्रुओंको न तो तितर- बितर करके भगा सकते हैं और न उनका वध ही कर सकते हैं । शूरवीर पुरुष ही युद्धमें अपनी और अपने पक्षके सैनिकोंकी रक्षा करता हुआ शत्रुओंका संहार कर सकता है ॥ ३४ ॥
अर्थनाशो वधोऽकीर्तिरयशश्च पलायने ।
अमनोज्ञासुखा वाचः पुरुषस्य पलायने ॥ ३५ ॥
सैनिकोंको यह भी समझा देना चाहिये कि युद्धके मैदानसे भागने में कई प्रकारके दोष हैं, एक तो अपने प्रयोजन और धनका नाश होता है । दूसरे भागते समय शत्रुके हाथसे मारे जानेका भय रहता है, तीसरे भागनेवालेकी निन्दा होती है और सब ओर उसका अपयश फैल जाता है । इसके सिवा युद्धसे भागनेपर लोगोंके मुखसे मनुष्यको तरह- तरहकी अप्रिय और दुःखदायिनी बातें भी सुननी पड़ती हैं ॥ ३५ ॥
प्रतिध्वस्तोष्ठदन्तस्य न्यस्तसर्वायुधस्य च ।
अमित्रैरवरुद्धस्य द्विषतामस्तु नः सदा ॥ ३६ ॥
जिसके ओठ और दाँत टूट गये हों, जिसने सारे अस्त्र- शस्त्रोंको नीचे डाल दिया हो तथा जिसे शत्रुगण सब ओरसे घेरकर खड़े हों, ऐसा योद्धा सदा हमारे शत्रुओंकी सेनामें ही रहे ॥ ३६ ॥
मनुष्यापसदा ह्येते ये भवन्ति पराङ्मुखाः ।
राशिवर्धनमात्रास्ते नैव ते प्रेत्य नो इह ॥ ३७ ॥
जो लोग युद्धमें पीठ दिखाते हैं, वे मनुष्योंमें अधम हैं; केवल योद्धाओंकी संख्या बढ़ानेवाले हैं । उन्हें इहलोक या परलोकमें कहीं भी सुख नहीं मिलता ॥ ३७ ॥
अमित्रा हृष्टमनसः प्रत्युद्यान्ति पलायिनम् ।
जयिनस्तु नरास्तात चन्दनैर्मण्डनेन च ॥ ३८ ॥
शत्रु प्रसन्नचित्त होकर भागनेवाले योद्धाका पीछा करते हैं तथा तात! विजयी मनुष्य चन्दन और आभूषणोंद्वारा पूजित होते हैं ॥ ३८ ॥
यस्य स्म संग्रामगता यशो वै घ्नन्ति शत्रवः ।
तदसह्यतरं दुःखमहं मन्ये वधादपि ॥ ३ ९ ॥
संग्रामभूमिमें आये हुए शत्रु जिसके यशका नाश कर देते हैं। उसके लिये उस दुःखको मैं मरणसे भी बढ़कर असह्य मानता हूँ ॥ ३ ९ ॥
जयं जानीत धर्मस्य मूलं सर्वसुखस्य च ।
या भीरूणां परा ग्लानिः शूरस्तामधिगच्छति ॥ ४० ॥
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वीरो! तुम लोग युद्धमें विजयको ही धर्म एवं सम्पूर्ण सुखोंका मूल समझो। कायरों या डरपोक मनुष्योंको जिससे भारी ग्लानि होती है, वीर पुरुष उसी प्रहार और मृत्युको सहर्ष स्वीकार करता है ॥ ४० ॥
ते वयं स्वर्गमिच्छन्तः संग्रामे त्यक्तजीविताः ।
जयन्तो वध्यमाना वा प्राप्नुयाम च सद्गतिम् ॥ ४१ ॥
अतः तुम लोग यह निश्चय कर लो कि हम स्वर्गकी इच्छा रखकर संग्राममें अपने प्राणोंका मोह छोड़कर लड़ेंगे । या तो विजय प्राप्त करेंगे या युद्धमें मारे जाकर सद्गति पायेंगे ॥ ४१ ॥
एवं संशप्तशपथाः समभित्यक्तजीविताः ।
अमित्रवाहिनीं वीराः प्रतिगाहन्त्यभीरवः ॥ ४२ ॥
जो इस प्रकार शपथ लेकर जीवनका मोह छोड़ देते हैं, वे वीर पुरुष निर्भय होकर शत्रुओंकी सेनामें घुस जाते हैं ॥ ४२ ॥
अग्रतः पुरुषानीकमसिचर्मवतां भवेत् ।
पृष्ठतः शकटानीकं कलत्रं मध्यतस्तथा ॥ ४३ ॥
सेनाके कूच करते समय सबसे आगे ढाल- तलवार धारण करनेवाले पुरुषोंकी टुकड़ी रखे । पीछेकी ओर रथियोंकी सेना खड़ी करे और बीचमें राज- स्त्रियोंको रखे ॥ ४३ ॥
परेषां प्रतिघातार्थं पदातीनां च बृंहणम् ।
अपि तस्मिन् पुरे वृद्धा भवेयुर्ये पुरोगमाः ॥ ४४ ॥
उस नगरमें जो वृद्ध पुरुष अगुआ हों, वे शत्रुओंका सामना और विनाश करनेके लिये पैदल सैनिकोंको प्रोत्साहन एवं बढ़ावा दें ॥ ४४ ॥
ये पुरस्तादभिमताः सत्त्ववन्तो मनस्विनः ।
ते पूर्वमभिवर्तेरंश्चैतानेवेतरे जनाः ॥ ४५ ॥
जो पहलेसे ही अपने शौर्यके लिये सम्मानित, धैर्यवान् और मनस्वी हैं, वे आगे रहें और दूसरे लोग उन्हींके पीछे - पीछे चलें ॥ ४५ ॥
अपि चोद्धर्षणं कार्यं भीरूणामपि यत्नतः ।
स्कन्धदर्शनमात्रात्तु तिष्ठेयुर्वा समीपतः ॥ ४६ ॥
जो डरनेवाले सैनिक हों, उनका भी प्रयत्नपूर्वक उत्साह बढ़ाना चाहिये अथवा वे सेनाका विशेष समुदाय दिखानेके लिये ही आस- पास खड़े रहें ॥ ४६ ॥
संहतान् योधयेदल्पान् कामं विस्तारयेद् बहुन् ।
सूचीमुखमनीकं स्यादल्पानां बहुभिः सह ॥ ४७ ॥
यदि अपने पास थोड़े - से सैनिक हों तो उन्हें एक साथ संघबद्ध रखकर युद्ध करनेका आदेश देना चाहिये और यदि बहुत - से योद्धा हों तो उन्हें बहुत दूरतक इच्छानुसार फैलाकर
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रखना चाहिये । थोड़े - से सैनिकोंको बहुतोंके साथ युद्ध करना हो तो उनके लिये सूचीमुख नामक व्यूह उपयोगी होता है ॥ ४७ ॥
सम्प्रयुक्ते निकृष्टे वा सत्यं वा यदि वानृतम् ।
प्रगृह्य बाहुन् क्रोशेत भग्ना भग्नाः परे इति ॥ ४८ ॥
आगतं मे मित्रबलं प्रहरध्वमभीतवत् । अपनी सेना उत्कृष्ट अवस्थामें हो या निकृष्ट अवस्थामें, बात सच्ची हो या झूठी, हाथ ऊपर उठाकर हल्ला मचाते हुए कहे, ' वह देखो, शत्रु भाग रहे हैं, भाग रहे हैं, हमारी
मित्रसेना आ गयी । अब निर्भय होकर प्रहार करो ' ॥ ४८३ ॥
सत्त्ववन्तोऽभिधावेयुः कुर्वन्तो भैरवान् रवान् ॥ ४ ९ ॥
इतनी बात सुनते ही धैर्यवान् और शक्तिशाली वीर भयंकर सिंहनाद करते हुए शत्रुओंपर टूट पड़ें ॥ ४ ९ ॥
क्ष्वेडाः किलकिलाशब्दाः क्रकचा गोविषाणिकाः ।
भेरीमृदङ्गपणवान् नादयेयुः पुराश्चरान् ॥ ५० ॥
जो लोग सेनाके आगे हों, उन्हें गर्जन- तर्जन करते और किलकारियाँ भरते हुए क्रकच, नरसिंहे, भेरी, मृदंग और ढोल आदि बाजे बजाने चाहिये ॥ ५० ॥
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि राजधर्मानुशासनपर्वणि सेनानीतिकथने शततमोऽध्यायः ॥ १०० ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत राजधर्मानुशासनपर्वमें सेनानीतिका वर्णनविषयक सौवाँ अध्याय पूरा हआ ॥ १०० ॥
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एकाधिकशततमोऽध्यायः भिन्न - भिन्न देशके योद्धाओंके स्वभाव, रूप, बल, आचरण और लक्षणोंका वर्णन युधिष्ठिर उवाच
किंशीलाः किंसमाचाराः कथंरूपाश्च भारत ।
किंसन्नाहाः कथंशस्त्रा जनाः स्युः संगरे क्षमाः ॥ १ ॥
युधिष्ठिरने पूछा — ‘ भरतनन्दन! युद्धस्थलमें कैसे स्वभाव, किस तरहके आचरण और कैसे रूपवाले योद्धा ठीक समझे जाते हैं? उनके कवच और अस्त्र - शस्त्र भी कैसे होने चाहिये? ॥ १ ॥
भीष्मउवाच
यथाऽऽचरितमेवात्र शस्त्रं पत्रं विधीयते ।
आचाराद् वीरपुरुषस्तथा कर्मसु वर्तते ॥ २ ॥
भीष्मजी बोले – ' राजन्! अस्त्र- शस्त्र और वाहन तो योद्धाओंके देश और कुलके आचारके अनुरूप ही होने चाहिये । वीर पुरुष अपने परम्परागत आचारके अनुसार ही सभी कार्योंमें प्रवृत्त होता है ॥ २ ॥
गान्धाराः सिन्धुसौवीरा नखरप्रासयोधिनः ।
अभीरवः सुबलिनस्तद्बलं सर्वपारगम् ॥ ३ ॥
गान्धार, सिन्धु और सौवीर देशके योद्धा नखर ( बघनखे ) और प्राससे युद्ध करनेवाले हैं । वे बड़े बलवान् और निडर होते हैं। उनकी सेना सबको लाँघ जानेवाली होती है ॥ ३ ॥
सर्वशस्त्रेषु कुशलाः सत्त्ववन्तो ह्युशीनराः ।
प्राच्या मातङ्गयुद्धेषु कुशलाः कूटयोधिनः ॥ ४ ॥
उशीनरदेशके वीर सब प्रकारके अस्त्र- शस्त्रोंमें कुशल और बड़े बलशाली होते हैं । पूर्वदेशके योद्धा हाथीपर सवार होकर युद्ध करनेकी कलामें कुशल हैं । वे कपटयुद्धके भी ज्ञाता हैं ॥ ४ ॥
तथा यवनकाम्बोजा मथुरामभितश्च ये ।
एते नियुद्धकुशला दाक्षिणात्यासिपाणयः ॥ ५ ॥
यवन, काम्बोज और मथुराके आस - पासके रहनेवाले योद्धा मल्लयुद्धमें निपुण होते हैं । तथा दक्षिण देशोंके निवासी हाथोंमें तलवार लिये रहते हैं । ( वे तलवार चलाना अच्छा जानते हैं ) ॥ ५ ॥
सर्वत्र शूरा जायन्ते महासत्त्वा महाबलाः ।
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प्राय एव समुद्दिष्टा लक्षणानि तु मे शृणु ॥ ६ ॥
प्रायः सभी देशोंमें महान् धैर्यशाली, महाबली एवं शूरवीर पैदा होते हैं । उन सबका
उल्लेख अधिकतर किया जा चुका है । अब तुम मुझसे उनके लक्षण सुनो ॥
सिंहशार्दूलवाङ्नेत्राः सिंहशार्दूलगामिनः ।
पारावतकुलिङ्गाक्षाः सर्वे शूराः प्रमाथिनः ॥ ७ ॥
जिनकी वाणी, नेत्र तथा चाल- ढाल सिंहों या बाघोंके समान होती है और जिनकी आँखें कबूतर या गौरैयेके समान होती हैं, वे सभी शूरवीर एवं शत्रुसेनाको मथ डालनेवाले होते हैं ॥ ७ ॥
मृगस्वरा द्वीपिनेत्रा ऋषभाक्षास्तरस्विनः ।
प्रमादिनश्च मन्दाश्च क्रोधनाः किङ्किणीस्वनाः ॥ ८ ॥
जिनका कण्ठस्वर मृगोंके समान और नेत्र बाघ एवं बैलोंके तुल्य होते हैं, वे वीर वेगशाली, असावधान और मूर्ख हुआ करते हैं । जिनका कण्ठनाद किंकिणीके समान मधुर हो, वे स्वभावके बड़े क्रोधी होते हैं ॥ ८ ॥
मेघस्वनाः क्रोधमुखाः केचित् करभसंनिभाः ।
जिह्मनासाग्रजिह्वाश्च दूरगा दूरपातिनः ॥ ९ ॥
जिनकी गर्जना मेघके समान, मुख क्रोधयुक्त, शरीर ऊँटकी तरह तथा नाक और जीभ टेढ़ी हो, वे बहुत दूरतक दौड़नेवाले तथा सुदूरवर्ती लक्ष्यको भी मार गिरानेवाले होते हैं ॥ ९ ॥
बिडालकुब्जतनवस्तनुकेशास्तनुत्वचः ।
शीघ्राश्चपलवृत्ताश्च ते भवन्ति दुरासदाः ॥ १० ॥
जिनका शरीर बिलावके समान कुबड़ा तथा सिरके बाल और देहकी खाल पतले होते हैं, वे शीघ्रतापूर्वक अस्त्र चलानेवाले चंचल और दुर्जय होते हैं ॥ १० ॥
गोधानिमीलिताः केचिन्मृदुप्रकृतयस्तथा ।
तरङ्गगतिनिर्घोषास्ते नराः पारयिष्णवः ॥ ११ ॥
जो गोहटीके समान आँखें बन्द किये रहते हैं, जिनका स्वभाव कोमल होता है तथा जिनके चलनेपर घोड़ेकी टाप पड़ने जैसी आवाज होती है, वे मनुष्य युद्धके पार पहुँच जाते हैं ॥ ११ ॥
सुसंहताः सुतनवो व्यूढोरस्काः सुसंस्थिताः ।
प्रवादितेषु कुप्यन्ति हृष्यन्ति कलहेषु च ॥ १२ ॥
जिनके शरीर गठीले, छाती चौड़ी और अंग- प्रत्यंग सुडौल होते हैं, जो युद्धमें डटकर खड़े होनेवाले हैं, वे वीर पुरुष युद्धका धौसा सुनते ही कुपित हो उठते हैं । उन्हें लड़ने-भिड़नेमें ही आनन्द आता है ॥ १२ ॥
गम्भीराक्षा निःसृताक्षाः पिङ्गाक्षा भ्रुकुटीमुखाः ।
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नकुलाक्षास्तथा चैव सर्वे शूरास्तनुत्यजः ॥ १३ ॥
जिनकी आँखें गहरी हैं अथवा बड़ी होनेके कारण निकली हुई- सी प्रतीत होती हैं या जिनके नेत्र पिंगलवर्णके हैं अथवा जिनकी आँखें नेवलेके समान भूरी- भूरी हैं और जिनके मुखपर भौंहें तनी रहती हैं, ऐसे लक्षणोंवाले सभी मनुष्य शूरवीर तथा रणभूमिमें शरीरका त्याग करनेवाले होते हैं ॥ १३ ॥
जिह्माक्षाः प्रललाटाश्च निर्मांसहनवोऽपि च ।
वज्रबाह्वंगुलीचक्राः कृशा धमनिसंतताः ॥ १४ ॥
प्रविशन्ति च वेगेन साम्पराये ह्युपस्थिते ।
वारणा इव सम्मत्तास्ते भवन्ति दुरासदाः ॥ १५ ॥
जिनकी आँखें तिरछी, ललाट ऊँचे और ठोड़ी मांसहीन एवं दुबली - पतली है, जिनकी भुजाओंपर वज्रका और अंगुलियोंपर चक्रका चिह्न होता है तथा जिनके शरीरकी नस-नाड़ियाँ दिखायी देती हैं, वे युद्ध उपस्थित होते ही बड़े वेगसे शत्रुओंकी सेनामें घुस जाते हैं और मतवाले हाथियोंके समान शत्रुओंके लिये दुर्जय होते हैं ॥ १४-१५ ॥
दीप्तस्फुटितकेशान्ताः स्थूलपार्श्वहनूमुखाः ।
उन्नतांसाः पृथुग्रीवा विकटाः स्थूलपिण्डिकाः ॥ १६ ॥
उद्धता इव सुग्रीवा विनताविहगा इव ।
पिण्डशीर्षातिवक्त्राश्च वृषदंशमुखास्तथा ॥ १७ ॥
उग्रस्वरा मन्युमन्तो युद्धेष्वारावसारिणः ।
अधर्मज्ञावलिप्ताश्च घोरा रौद्रप्रदर्शनाः ॥ १८ ॥
जिनके केशोंके अग्रभाग पीले और छितराये हुए हैं, पसलियाँ, ठोड़ी और मुँह लंबे एवं मोटे हैं, कंधे ऊँचे, गर्दन मोटी और पिण्डली भारी हैं, जो देखनेमें विकट जान पड़ते हैं, सुग्रीव जातिवाले अश्वोंके समान तथा गरुड़ पक्षीकी भाँति उद्धत स्वभावके हैं, जिनके सिर गोल और मुख विशाल हैं, जो बिलाव- जैसा मुख धारण करते हैं तथा जिनके स्वरमें कठोरता है, वे बड़े क्रोधी होते हैं और युद्धमें गर्जना करते हुए विचरते हैं । उन्हें धर्मका ज्ञान नहीं होता । वे घमंडमें भरे हुए घोर आकृतिवाले दिखायी देते हैं । उनका दर्शन ही बड़ा भयंकर है ॥ १६–१८ ॥
त्यक्तात्मानः सर्व एते अन्त्यजा ह्यनिवर्तिनः ।
पुरस्कार्याः सदा सैन्ये हन्यन्ते घ्नन्ति चापि ये ॥ १ ९ ॥
ये सब - के - सब अन्त्यज ( कोल- भील आदि) हैं, जो युद्धसे कभी पीछे नहीं हटते और शरीरका मोह छोड़कर लड़ते हैं । सेनामें ऐसे लोगोंको सदा पुरस्कार देना चाहिये और इन्हें सदा आगे - आगे रखना चाहिये । ये धैर्यपूर्वक शत्रुओंकी मार सहते और उन्हें भी मारते हैं ॥
अधार्मिका भिन्नवृत्ताः सान्त्वेनैषां पराभवः ।
एवमेव प्रकुप्यन्ति राज्ञोऽप्येते ह्यभीक्ष्णशः ॥ २० ॥
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ये अधर्मी होते हैं, धर्मकी मर्यादा भंग कर देते हैं । इसी तरह ये बारंबार राजापर भी कुपित हो उठते हैं; अतः इन्हें मीठी- मीठी बातोंसे समझा-बुझाकर ही काबूमें करना चाहिये ॥ २० ॥
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि राजधर्मानुशासनपर्वणि विजिगीषमाणवृत्ते एकाधिकशततमोऽध्यायः ॥ १०१ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत राजधर्मानुशासनपर्वमें विजयाभिलाषी राजाका बर्तावविषयक एक सौ एकवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १०१ ॥
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द्वयधिकशततमोऽध्यायः विजयसूचक शुभाशुभ लक्षणोंका तथा उत्साही और बलवान् सैनिकोंका वर्णन एवं राजाको युद्धसम्बन्धी नीतिका निर्देश युधिष्ठिर उवाच
जयित्र्याः कानि रूपाणि भवन्ति भरतर्षभ ।
पृतनायाः प्रशस्तानि तानि चेच्छामि वेदितुम् ॥ १ ॥
युधिष्ठिरने पूछा — ‘ भरतश्रेष्ठ! विजय पानेवाली सेनाके कौन - कौन- से शुभ लक्षण होते हैं? यह मैं जानना चाहता हूँ ॥ १ ॥
भीष्म उवाच
जयत्र्या यानि रूपाणि भवन्ति भरतर्षभ ।
पृतनायाः प्रशस्तानि तानि वक्ष्यामि सर्वशः ॥ २ ॥
भीष्मजीने कहा - भरतभूषण! विजय पानेवाली सेनाके समक्ष जो -जो शुभ लक्षण प्रकट होते हैं, उन सबका वर्णन करता हूँ, सुनो ॥ २ ॥
दैवे पूर्वं प्रकुपिते मानुषे कालचोदिते ।
तद्विद्वांसोऽनुपश्यन्ति ज्ञानदिव्येन चक्षुषा ॥ ३ ॥
प्रायश्चित्तविधिं चात्र जपहोमांश्च तद्विदः ।
मङ्गलानि च कुर्वन्ति शमयन्त्यहितानि च ॥ ४ ॥
कालसे प्रेरित हुए मनुष्यपर पहले दैवका प्रकोप होता है । उसे विद्वान् पुरुष जब ज्ञानमयी दिव्यदृष्टिसे देख लेते हैं, तब उसके प्रतीकारको जाननेवाले वे पुरुष उसके प्रायश्चित्तका विधान— जप, होम आदि मांगलिक कृत्य करते हैं और उस अहितकारक दैवी उपद्रवको शान्त कर देते हैं ॥ ३-४ ॥
उदीर्णमनसो योधा वाहनानि च भारत ।
यस्यां भवन्ति सेनायां ध्रुवं तस्यां परो जयः ॥ ५ ॥
भरतनन्दन! जिस सेनाके योद्धा और वाहन मनमें प्रसन्न एवं उत्साहयुक्त होते हैं, उसकी उत्तम विजय अवश्य होती है ॥ ५ ॥
अन्वेतान् वायवो यान्ति तथैवेन्द्रधनूंषि च ।
अनुप्लवन्तो मेघाश्च तथाऽऽदित्यस्य रश्मयः ॥ ६ ॥
गोमायवश्चानुकूला बलगृध्राश्च सर्वशः ।
अर्हयेयुर्यदा सेनां तदा सिद्धिरनुत्तमा ॥ ७ ॥
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यदि सेनाकी रणयात्राके समय सैनिकोंके पीछेसे मन्द मन्द वायु प्रवाहित हो, सामने इन्द्रधनुषका उदय हो, बार-बार बादलोंकी छाया होती रहे और सूर्यकी किरणोंका भी प्रकाश फैलता रहे तथा गीदड़, गीध और कौए भी अनुकूल दिशामें आ जायँ तो निश्चय ही उस सेनाको परम उत्तम सिद्धि प्राप्त होती है ॥ ६-७ ॥ प्रसन्नभाः पावकश्चोर्ध्वरश्मिः प्रदक्षिणावर्तशिखो विधूमः । पुण्या गन्धाश्चाहुतीनां भवन्ति जयस्यैतद् भाविनो रूपमाहुः ॥ ८ ॥
यदि बिना धुएँकी आग प्रज्वलित हो, उसकी ज्वाला निर्मल हो और लपटें ऊपरकी ओर उठ रही हों अथवा उस अग्निकी शिखाएँ दाहिनी ओर जाती दिखायी देती हों तथा आहुतियोंकी पवित्र गन्ध प्रकट हो रही हो तो इन सबको भावी विजयका शुभ चिह्न बताया गया है ॥ ८ ॥
गम्भीरशब्दाश्च महास्वनाश्च शङ्खाश्च भेर्यश्च नदन्ति यत्र । युयुत्सवश्चाप्रतीपा भवन्ति जयस्यैतद् भाविनो रूपमाहुः ॥ ९ ॥
जहाँ शंखोंकी गम्भीर ध्वनि और रणभेरीकी ऊँची आवाज फैल रही हो, युद्धकी इच्छा रखनेवाले सैनिक सर्वथा अनुकूल हों तो वहाँके लिये इसे भी भावी विजयका सूचक शुभ लक्षण कहा गया है ॥ ९ ॥
इष्टा मृगाः पृष्ठतो वामतश्च
सम्प्रस्थितानां च गमिष्यतां च ।
जिघांसतां दक्षिणाः सिद्धिमाहु- ये त्वग्रतस्ते प्रतिषेधयन्ति ॥ १० ॥
सेनाके प्रस्थान करते समय अथवा जानेके लिये तैयारी करते समय यदि इष्ट मृग पीछे और बायें आ जायँ तो इच्छित फल प्रदान करते हैं । तथा युद्ध करते समय दाहिने हो जायँ तो वे सिद्धिकी सूचना देते हैं; किंतु यदि सामने आ जायँ तो उस युद्धकी यात्राका निषेध करते हैं ॥ १० ॥
माङ्गल्यशब्दान् शकुना वदन्ति हंसाः क्रौञ्चाः शतपत्राश्च चाषाः । हृष्टा योधाः सत्त्ववन्तो भवन्ति जयस्यैतद् भाविनो रूपमाहुः ॥ ११ ॥
जब हंस, क्रौंच, शतपत्र और नीलकण्ठ आदि पक्षी मंगलसूचक शब्द करते हों और सैनिक हर्ष तथा उत्साहसे सम्पन्न दिखायी देते हों तो यह भी भावी विजयका शुभ लक्षण
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बताया गया है ॥ ११ ॥
शस्त्रैर्यन्त्रैः कवचैः केतुभिश्च सुभानुभिर्मुखवर्णैश्च यूनाम् । भ्राजिष्मती दुष्प्रतिवीक्षणीया येषां चमूस्तेऽभिभवन्ति शत्रून् ॥ १२ ॥
जिनकी सेना भाँति - भाँतिके शस्त्र, कवच, यन्त्र तथा ध्वजाओंसे सुशोभित हो, जिनके नौजवान सैनिकोंके मुखकी सुन्दर प्रभामयी कान्तिसे प्रकाशित होती हुई सेनाकी ओर शत्रुओंको देखनेका भी साहस न होता हो, वे निश्चय ही शत्रुदलको परास्त कर सकते हैं ॥ १२ ॥
शुश्रूषवश्चानभिमानिनश्च परस्परं सौहृदमास्थिताश्च । येषां योधाः शौचमनुष्ठिताश्च जयस्यैतद् भाविनो रूपमाहुः ॥ १३ ॥
जिनके योद्धा स्वामीकी सेवामें उत्साह रखनेवाले, अहंकाररहित, आपसमें एक-दूसरेका हित चाहनेवाले तथा शौचाचारका पालन करनेवाले हों, उनकी होनेवाली विजयका यही शुभ लक्षण बताया गया है ॥ १३ ॥
शब्दाः स्पर्शास्तथा गन्धा विचरन्ति मनःप्रियाः ।
धैर्यं चाविशते योधान् विजयस्य मुखं च तत् ॥ १४ ॥
जब योद्धाओंके मनको प्रिय लगनेवाले शब्द, स्पर्श और गन्ध सब ओर फैल रहे हों तथा उनके भीतर धैर्यका संचार हो रहा हो तो वह विजयका द्वार माना जाता है ॥ १४ ॥
इष्टो वामः प्रविष्टस्य दक्षिणः प्रविविक्षतः ।
पश्चात्संसाधयत्यर्थं पुरस्ताच्च निषेधति ॥ १५ ॥
यदि कौआ युद्धमें प्रवेश करते समय दाहिने भागमें और प्रविष्ट हो जानेके बाद बायें भागमें आ जाय तो शुभ है। पीछेकी ओर होनेसे भी वह कार्यकी सिद्धि करता है; परंतु सामने होनेपर विजयमें बाधा डालता है ॥ १५ ॥
सम्भृत्य महतीं सेनां चतुरङ्गां युधिष्ठिर ।
साम्नैव वर्तयेः पूर्वं प्रयतेथास्ततो युधि ॥ १६ ॥
युधिष्ठिर! विशाल चतुरंगिणी सेना एकत्र कर लेनेके बाद भी तुम्हें पहले सामनीतिके द्वारा शत्रुसे सन्धि करनेका ही प्रयास करना चाहिये । यदि वह सफल न हो तो युद्धके लिये प्रयत्न करना उचित है ॥
जघन्य एष विजयो यद् युद्धं नाम भारत ।
यादृच्छिको युधि जयो देवो वेति विचारणम् ॥ १७ ॥