श्रीगणेशाय नमः।
महाभारत — खण्ड ५ — पृष्ठ 791–800
महाभारत — खण्ड ५ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 791–800
पृष्ठ 791
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
धारणाशक्ति, चतुरता, संयम, बुद्धि, शरीर, धैर्य, शौर्य तथा देश- कालकी परिस्थितिसे असावधान न रहना —ये आठ गुण थोड़े या अधिक धनको बढ़ानेके मुख्य साधन हैं अर्थात् धनरूपी अग्निको प्रज्वलित करनेके लिये ईंधन हैं ॥ ३७ ॥
अग्निः स्तोको वर्धतेऽप्याज्यसिक्तो बीजं चैकं रोहसहस्रमेति । आयव्ययौ विपुलौ संनिशाम्य तस्मादल्पं नावमन्येत वित्तम् ॥ ३८ ॥
थोड़ी - सी भी आग यदि घीसे सिंच जाय तो बढ़कर बहुत बड़ी हो जाती है । एक ही छोटे - से बीजको बो देनेपर उससे सहस्रों बीज पैदा हो जाते हैं । इसी प्रकार महान् आय-व्ययके विषयमें विचार करके थोड़े - से भी धनका अनादर न करे ॥ ३८ ॥
बालोऽप्यबालः स्थविरो रिपुर्यः सदा प्रमत्तं पुरुषं निहन्यात् । कालेनान्यस्तस्य मूलं हरेत कालज्ञाता पार्थिवानां वरिष्ठः ॥ ३ ९ ॥ शत्रु बालक, जवान अथवा बूढ़ा ही क्यों न हो, सदा सावधान न रहनेवाले मनुष्यका नाश कर डालता है । दूसरा कोई धनसम्पन्न शत्रु अनुकूल समयका सहयोग पाकर राजाकी जड़ उखाड़ सकता है । इसलिये जो समयको जानता है, वही समस्त राजाओंमें श्रेष्ठ है ॥ ३ ९ ॥ हरेत कीर्तिं धर्ममस्योपरुन्ध्या- दर्थे दीर्घ वीर्यमस्योपहन्यात् । रिपुर्देष्टा दुर्बलो वा बली वा तस्माच्छत्रोर्नैव हीयेद् यतात्मा ॥ ४० ॥
द्वेष रखनेवाला शत्रु दुर्बल हो या बलवान्, राजाकी कीर्ति नष्ट कर देता है, उसके धर्ममें बाधा पहुँचाता है तथा अर्थोपार्जनमें उसकी बढ़ी हुई शक्तिका विनाश कर डालता है; इसलिये मनको वशमें रखनेवाला राजा शत्रुकी ओरसे लापरवाह न रहे ॥ ४० ॥
क्षयं वृद्धिं पालनं संचयं वा बुद्ध्वाप्युभौ संहतौ सर्वकामौ । ततश्चान्यन्मतिमान् संदधीत तस्माद् राजा बुद्धिमत्तां श्रयेत ॥ ४१ ॥
हानि, लाभ, रक्षा और संग्रहको जानकर तथा सदा परस्पर सम्बन्धित ऐश्वर्य और भोगको भी भलीभाँति समझकर बुद्धिमान् राजाको शत्रुके साथ संधि या विग्रह करना चाहिये; इस विषयपर विचार करनेके लिये बुद्धिमानोंका सहारा लेना चाहिये ॥ ४१ ॥
बुद्धिर्दीप्ता बलवन्तं हिनस्ति
पृष्ठ 792
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
बलं बुद्धया पाल्यते वर्धमानम् । शत्रुर्बुद्धया सीदते वर्धमानो बुद्धेः पश्चात् कर्म यत्तत् प्रशस्तम् ॥ ४२ ॥
प्रतिभाशालिनी बुद्धि बलवान्को भी पछाड़ देती है। बुद्धिके द्वारा नष्ट होते हुए बलकी भी रक्षा होती है । बढ़ता हुआ शत्रु भी बुद्धिके द्वारा परास्त होकर कष्ट उठाने लगता है । बुद्धिसे सोचकर पीछे जो कर्म किया जाता है, वह सर्वोत्तम होता है ॥ ४२ ॥
सर्वान् कामान् कामयानो हि धीरः सत्त्वेनाल्पेनाप्नुते हीनदोषः । यश्चात्मानं प्रार्थयतेऽर्थ्यमानैः श्रेयःपात्रं पूरयते च नाल्पम् ॥ ४३ ॥
जिसने सब प्रकारके दोषोंका त्याग कर दिया है, वह धीर राजा यदि किसी वस्तुकी कामना करे तो वह थोड़ा- सा बल लगानेपर भी अपनी सम्पूर्ण कामनाओंको प्राप्त कर लेता है । जो आवश्यक वस्तुओंसे सम्पन्न होनेपर भी अपने लिये कुछ चाहता है अर्थात् दूसरोंसे अपनी इच्छा पूरी करानेकी आश रखता है, वह लोभी और अहंकारी नरेश अपने श्रेयका छोटा -सा पात्र भी नहीं भर सकता ॥ तस्माद् राजा प्रगृहीतः प्रजासु मूलं लक्ष्म्याः सर्वशो ह्याददीत । दीर्घं कालं ह्यपि सम्पीड्यमानो विद्युत्सम्पातमपि वा नोर्जितः स्यात् ॥ ४४ ॥
इसलिये राजाको चाहिये कि वह सारी प्रजापर अनुग्रह करते हुए ही उससे कर ( धन ) वसूल करे । वह दीर्घकालतक प्रजाको सताकर उसपर बिजलीके समान गिरकर अपना प्रभाव न दिखाये ॥ ४४ ॥
विद्या तपो वा विपुलं धनं वा सर्वं ह्येतद् व्यवसायेन शक्यम् । बुद्धयायत्तं तन्निवसेद् देहवत्सु तस्माद् विद्याद् व्यवसायं प्रभूतम् ॥ ४५ ॥
विद्या, तप तथा प्रचुर धन - ये सब उद्योगसे प्राप्त हो सकते हैं । वह उद्योग प्राणियोंमें बुद्धिके अधीन होकर रहता है; अतः उद्योगको ही समस्त कार्योंकी सिद्धिका पर्याप्त साधन समझे ॥ ४५ ॥
यत्रासते मतिमन्तो मनस्विनः शक्रो विष्णुर्यत्र सरस्वती च । वसन्ति भूतानि च यत्र नित्यं तस्माद् विद्वान् नावमन्येत देहम् ॥ ४६ ॥
पृष्ठ 793
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
अतः जहाँ ज्ञानेन्द्रियोंमें बुद्धिमान् एवं मनस्वी महर्षि निवास करते हैं, * जिसमें इन्द्रियोंके अधिष्ठातृदेवताके रूपमें इन्द्र, विष्णु एवं सरस्वतीका निवास है तथा जिसके भीतर सदा सम्पूर्ण प्राणी वास करते हैं, अर्थात् जो शरीर समस्त प्राणियोंके जीवन-निर्वाहका आधार है, विद्वान् पुरुषको चाहिये कि उस मानव- देहकी अवहेलना न करे ॥ लुब्धं हन्यात् सम्प्रदानेन नित्यं लुब्धस्तृप्तिं परवित्तस्य नैति । सर्वो लुब्धः कर्मगुणोपभोगे योऽर्थैर्हीनो धर्मकामौ जहाति ॥ ४७ ॥
राजा लोभी मनुष्यको सदा ही कुछ देकर दबाये रखे; क्योंकि लोभी पुरुष दूसरेके धनसे कभी तृप्त नहीं होता । सत्कर्मोंके फलस्वरूप सुखका उपभोग करनेके लिये तो सभी लालायित रहते हैं; परंतु जो लोभी धनहीन है, वह धर्म और काम दोनोंको त्याग देता है ॥ ४७ ॥
धनं भोगं पुत्रदारं समृद्धिं सर्वं लुब्धः प्रार्थयते परेषाम् । लुब्धे दोषाः सम्भवन्तीह सर्वे तस्माद् राजा न प्रगृह्णीत लुब्धम् ॥ ४८ ॥
लोभी मनुष्य दूसरोंके धन, भोग-सामग्री, स्त्री- पुत्र और समृद्धि सबको प्राप्त करना चाहता है । लोभीमें सब प्रकारके दोष प्रकट होते हैं; अतः राजा उसे अपने यहाँ किसी पदपर स्थान न दे ॥ ४८ ॥
संदर्शनेन पुरुषं जघन्यमपि चोदयेत् ।
आरम्भान् द्विषतां प्राज्ञः सर्वार्थांश्च प्रसूदयेत् ॥ ४ ९ ॥
बुद्धिमान् राजा नीच मनुष्यको देखते ही अपने यहाँसे दूर हटा दे और यदि उसका वश चले तो वह शत्रुओंके सारे उद्योगों तथा कार्योंका विध्वंस कर डाले ॥ ४ ९ ॥
धर्मान्वितेषु विज्ञाता मन्त्री गुप्तश्च पाण्डव ।
आप्तो राजा कुलीनश्च पर्याप्तो राजसंग्रहे ॥ ५० ॥
पाण्डुनन्दन! धर्मात्मा पुरुषोंमें जो विशेषरूपसे सम्पूर्ण विषयोंका ज्ञाता हो, उसीको मन्त्री बनावे और उसकी सुरक्षाका विशेष प्रबन्ध करे । प्रजाका विश्वास -पात्र और कुलीन राजा नरेशोंको वशमें करनेमें समर्थ होता है ॥ विधिप्रयुक्तान् नरदेवधर्मा- नुक्तान् समासेन निबोध बुद्ध्या । इमान् विदध्याद् व्यतिसृत्य यो वै राजा महीं पालयितुं स शक्तः ॥ ५१ ॥
पृष्ठ 794
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
राजाके जो शास्त्रोक्त धर्म हैं, उन्हें संक्षेपसे मैंने यहाँ बताया है । तुम अपनी बुद्धिसे विचार करके उन्हें हृदयमें धारण करो । जो उन्हें गुरुसे सीखकर हृदयमें धारण करता और आचरणमें लाता है, वही राजा अपने राज्यकी रक्षा करनेमें समर्थ होता है ॥ ५१ ॥
अनीतिजं यस्य विधानजं सुखं
हठप्रणीतं विधिवत्प्रदृश्यते ।
न विद्यते तस्य गतिर्महीपते- र्न विद्यते राज्यसुखं ह्यनुत्तमम् ॥ ५२ ॥
जिन्हें अन्यायसे उपार्जित, हठसे प्राप्त तथा दैवके विधानके अनुसार उपलब्ध हुआ सुख विधिके अनुरूप प्राप्त हुआ-सा दिखायी देता है, राजधर्मको न जाननेवाले उस राजाकी कहीं गति नहीं है तथा उसका परम उत्तम राज्यसुख चिरस्थायी नहीं होता ॥ ५२ ॥
धनैर्विशिष्टान् मतिशीलपूजितान् गुणोपपन्नान् युधि दृष्टविक्रमान् । गुणेषु दृष्ट्वा न चिरादिवात्मवान् यतोऽभिसंधाय निहन्ति शात्रवान् ॥ ५३ ॥
उक्त राजधर्मके अनुसार संधि- विग्रह आदि गुणोंके प्रयोगमें सतत सावधान रहनेवाला नरेश धनसम्पन्न, बुद्धि और शीलके द्वारा सम्मानित, गुणवान् तथा युद्धमें जिनका पराक्रम देखा गया है, उन वीर शत्रुओंको भी कूटकौशलपूर्वक नष्ट कर सकता है ॥ ५३ ॥
पश्येदुपायान् विविधैः क्रियापथै- र्न चानुपायेन मतिं निवेशयेत् । श्रियं विशिष्टां विपुलं यशो धनं न दोषदर्शी पुरुषः समश्नुते ॥ ५४ ॥
राजा नाना प्रकारकी कार्यपद्धतियोंद्वारा शत्रु -विजयके बहुत से उपाय ढूँढ़ निकाले । अयोग्य उपायसे काम लेनेका विचार न करे, जो निर्दोष व्यक्तियोंके भी दोष देखता है, वह मनुष्य विशिष्ट सम्पत्ति, महान् यश और प्रचुर धन नहीं पा सकता ॥ ५४ ॥
प्रीतिप्रवृत्तौ विनिवर्तितौ यथा सुहृत्सु विज्ञाय निवृत्य चोभयोः । यदेव मित्रं गुरुभारमावहेत् तदेव सुस्निग्धमुदाहरेद् बुधः ॥ ५५ ॥
सुहृदोंमेंसे जो दो मित्र प्रेमपूर्वक साथ - साथ एक कार्यमें प्रवृत्त होते हों और साथ - ही-साथ उससे निवृत्त होते हों, उन्हें अच्छी तरह जानकर उन दोनोंमेंसे जो मित्र लौटकर मित्रका गुरुतर भार वहन कर सके, उसीको विद्वान् पुरुष अत्यन्त स्नेही मित्र मानकर दूसरोंके सामने उसका उदाहरण दें ॥ ५५ ॥
पृष्ठ 795
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
एतान् मयोक्ताश्चर राजधर्मान् नृणां च गुप्तौ मतिमादधत्स्व । अवाप्स्यसे पुण्यफलं सुखेन सर्वो हि लोको नृप धर्ममूलः ॥ ५६ ॥
नरेश्वर! मेरे बताये हुए इन राजधर्मोंका आचरण करो और प्रजाके पालनमें मन लगाओ । इससे तुम सुखपूर्वक पुण्यफल प्राप्त करोगे; क्योंकि सम्पूर्ण जगत्का मूल धर्म ही है ॥ ५६ ॥
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि राजधर्मानुशासनपर्वणि राजधर्मकथने विंशत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १२० ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत राजधर्मानुशासनपर्वमें राजधर्मका वर्णनविषयक एक सौ बीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १२० ॥
* ‘ इमावेव गौतमभरद्वाजौ ' इत्यादि श्रुतिके अनुसार सम्पूर्ण ज्ञानेन्द्रियोंका गौतम, भरद्वाज, वसिष्ठ और विश्वामित्र आदि महर्षियोंसे सम्बन्ध सूचित होता है ।
पृष्ठ 796
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
एकविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः दण्डके स्वरूप, नाम, लक्षण, प्रभाव और प्रयोगका वर्णन युधिष्ठिर उवाच
अयं पितामहेनोक्तो राजधर्मः सनातनः ।
ईश्वरश्च महादण्डो दण्डे सर्वं प्रतिष्ठितम् ॥ १ ॥
युधिष्ठिरने पूछा- पितामह! आपने यह सनातन राजधर्मका वर्णन किया है । इसके अनुसार महान् दण्ड ही सबका ईश्वर है, दण्डके ही आधारपर सब कुछ टिका हुआ है ॥ १ ॥
देवतानामृषीणां च पितॄणां च महात्मनाम् ।
यक्षरक्षःपिशाचानां साध्यानां च विशेषतः ॥ २ ॥
सर्वेषां प्राणिनां लोके तिर्यग्योनिनिवासिनाम् ।
सर्वव्यापी महातेजा दण्डः श्रेयानिति प्रभो ॥ ३ ॥
प्रभो! देवता, ऋषि, पितर, महात्मा, यक्ष, राक्षस, पिशाच तथा साध्यगण एवं पशु-पक्षियोंकी योनिमें निवास करनेवाले जगत् के समस्त प्राणियोंके लिये भी सर्वव्यापी महातेजस्वी दण्ड ही कल्याणका साधन है ॥ इत्येवमुक्तं भवता दण्डे वै सचराचरम् ।
पश्यता लोकमासक्तं ससुरासुरमानुषम् ।
एतदिच्छाम्यहं ज्ञातुं तत्त्वेन भरतर्षभ ॥ ४ ॥
देवता, असुर और मनुष्योंसहित इस सम्पूर्ण विश्वको अपने समीप देखते हुए आपने कहा है कि दण्डपर ही चराचर जगत् प्रतिष्ठित है । भरतश्रेष्ठ! मैं यथार्थ रूपसे यह सब जानना चाहता हूँ ॥ ४ ॥
को दण्डः कीदृशो दण्डः किंरूपः किंपरायणः ।
किमात्मकः कथंभूतः कथंमूर्तिः कथं प्रभो ॥ ५ ॥
दण्ड क्या है? कैसा है? उसका स्वरूप किस तरहका है? और किसके आधारपर उसकी स्थिति है? प्रभो! उसका उपादान क्या है? उसकी उत्पत्ति कैसे हुई है? उसका आकार कैसा है? ॥ ५ ॥
जागर्ति च कथं दण्डः प्रजास्ववहितात्मकः ।
कश्च पूर्वापरमिदं जागर्ति प्रतिपालयन् ॥ ६ ॥
वह किस प्रकार सावधान रहकर सम्पूर्ण प्राणियोंपर शासन करनेके लिये जागता रहता है? कौन इस पूर्वापर जगत्का प्रतिपालन करता हुआ जागता है? ॥ ६ ॥
कश्च विज्ञायते पूर्वं को वरो दण्डसंज्ञितः ।
पृष्ठ 797
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
किंसंस्थश्च भवेद् दण्डः का वास्य गतिरुच्यते ॥ ७ ॥
पहले इसे किस नामसे जाना जाता था? कौन दण्ड प्रसिद्ध है? दण्डका आधार क्या है? तथा उसकी गति क्या बतायी गयी है? ॥ ७ ॥
भीष्म उवाच
शृणु कौरव्य यो दण्डो व्यवहारो यथा च सः ।
यस्मिन् हि सर्वमायत्तं स दण्ड इह केवलः ॥ ८ ॥
भीष्मजीने कहा – कुरुनन्दन! दण्डका जो स्वरूप है तथा जिस प्रकार उसको ‘ व्यवहार' कहा जाता है, वह सब तुम्हें बताता हूँ; सुनो । इस संसारमें सब कुछ जिसके अधीन है, वही अद्वितीय पदार्थ यहाँ ' दण्ड ' कहलाता है ॥ ८ ॥
धर्मस्याख्या महाराज व्यवहार इतीष्यते ।
तस्य लोपः कथं न स्याल्लोकेष्ववहितात्मनः ॥ ९ ॥
इत्येवं व्यवहारस्य व्यवहारत्वमिष्यते । महाराज! धर्मका ही दूसरा नाम व्यवहार है । लोकमें सतत सावधान रहनेवाले पुरुषके धर्मका किसी तरह लोप न हो, इसीलिये दण्डकी आवश्यकता है और यही उस व्यवहारका व्यवहारत्व” है ॥ ९ ३ ॥ अपि चैतत् पुरा राजन् मनुना प्रोक्तमादितः ॥ १० ॥
सुप्रणीतेन दण्डेन प्रियाप्रियसमात्मना ।
प्रजा रक्षति यः सम्यग्धर्म एव स केवलः ॥ ११ ॥
राजन्! पूर्वकालमें मनुने यह उपदेश दिया है कि जो राजा प्रिय और अप्रियके प्रति समान भाव रखकर - किसीके प्रति पक्षपात न करके दण्डका ठीक-ठीक उपयोग करते हुए प्रजाकी भलीभाँति रक्षा करता है, उसका वह कार्य केवल धर्म है ॥ १०-११ ॥
यथोक्तमेतद् वचनं प्रागेव मनुना पुरा ।
यन्मयोक्तं मनुष्येन्द्र ब्रह्मणो वचनं महत् ॥ १२ ॥
प्राणिदं वचनं प्रोक्तमतः प्राग्वचनं विदुः ।
व्यवहारस्य चाख्यानाद् व्यवहार इहोच्यते ॥ १३ ॥
नरेन्द्र! उपर्युक्त सारी बातें मनुजीने पहले ही कह दी हैं और मैंने जो बात कही है, वह ब्रह्माजीका महान् वचन है । यही वचन मनुजीके द्वारा पहले कहा गया है; इसलिये इसको ‘ प्राग्वचन’ के नामसे भी जानते हैं । इसमें व्यवहारका प्रतिपादन होनेसे यहाँ व्यवहार नाम दिया गया है ॥ १२-१३ ॥
दण्डे त्रिवर्गः सततं सुप्रणीते प्रवर्तते ।
दैवं हि परमो दण्डो रूपतोऽग्निरिवोत्थितः ॥ १४ ॥
पृष्ठ 798
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
दण्डका ठीक- ठीक उपयोग होनेपर राजाके धर्म, अर्थ और कामकी सिद्धि सदा होती रहती है । इसलिये दण्ड महान् देवता है, यह अग्निके समान तेजस्वी रूपसे प्रकट हुआ है ॥ १४ ॥
नीलोत्पलदलश्यामश्चतुर्दंष्ट्रश्चतुर्भुजः ।
अष्टपान्नैकनयनः शंकुकर्णोर्ध्वरोमवान् ॥ १५ ॥
इसके शरीरकी कान्ति नील कमलदलके समान श्याम है, इसके चार दाढ़ें और चार भुजाएँ हैं । आठ पैर और अनेक नेत्र हैं । इसके कान खूंटेके समान हैं और रोएँ ऊपरकी ओर उठे हुए हैं ॥ १५ ॥
जटी द्विजिह्वस्ताम्रास्यो मृगराजतनुच्छदः ।
एतद् रूपं बिभर्युग्रं दण्डो नित्यं दुराधरः ॥ १६ ॥
इसके सिरपर जटा है, मुखमें दो जिह्वाएँ हैं, मुखका रंग ताँबेके समान है, शरीरको ढकनेके लिये उसने व्याघ्रचर्म धारण कर रखा है, इस प्रकार दुर्धर्ष दण्ड सदा यह भयंकर रूप धारण किये रहता है ॥
असिर्धनुर्गदा शक्तिस्त्रिशूलं मुद्गरः शरः ।
मुसलं परशुश्चक्रं पाशो दण्डर्ष्टितोमराः ॥ १७ ॥
सर्वप्रहरणीयानि सन्ति यानीह कानिचित् ।
दण्ड एव स सर्वात्मा लोके चरति मूर्तिमान् ॥ १८ ॥
खड्ग, धनुष, गदा, शक्ति, त्रिशूल, मुद्गर, बाण, मुसल, फरसा, चक्र, पाश, दण्ड, ऋष्टि, तोमर तथा दूसरे- दूसरे जो कोई प्रहार करनेयोग्य अस्त्र- शस्त्र हैं, उन सबके रूपमें सर्वात्मा दण्ड ही मूर्तिमान् होकर जगत्में विचरता है ॥ १७-१८ ॥
भिन्दंश्छिन्दन् रुजन् कृन्तन् दारयन् पाटयंस्तथा ।
घातयन्नभिधावंश्च दण्ड एव चरत्युत ॥ १ ९ ॥
वही अपराधियोंको भेदता, छेदता, पीड़ा देता, काटता, चीरता, फाड़ता तथा मरवाता है । इस प्रकार दण्ड ही सब ओर दौड़ता - फिरता है ॥ १ ९ ॥
असिर्विशसनो धर्मस्तीक्ष्णवर्मा दुराधरः ।
श्रीगर्भो विजयः शास्ता व्यवहारः सनातनः ॥ २० ॥
शास्त्रं ब्राह्मणमन्त्राश्च शास्ता प्राग्वदतां वरः ।
धर्मपालोऽक्षरो देवः सत्यगो नित्यगोऽग्रजः ॥ २१ ॥
असंगो रुद्रतनयो मनुर्ज्येष्ठः शिवंकरः ।
नामान्येतानि दण्डस्य कीर्तितानि युधिष्ठिर ॥ २२ ॥
युधिष्ठिर! असि, विशसन, धर्म, तीक्ष्णवर्मा, दुराधर, श्रीगर्भ, विजय, शास्ता, व्यवहार, सनातन, शास्त्र, ब्राह्मण, मन्त्र, शास्ता, प्राग्वदतांवर, धर्मपाल, अक्षर, देव, सत्यग, नित्यग,
पृष्ठ 799
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
अग्रज, असंग, रुद्रतनय, मनु, ज्येष्ठ और शिवंकर- ये दण्डके नाम कहे गये हैं ॥ २०– २२ ॥
दण्डो हि भगवान् विष्णुर्दण्डो नारायणः प्रभुः ।
शश्वद् रूपं महद् बिभ्रन्महान् पुरुष उच्यते ॥ २३ ॥
दण्ड सर्वत्र व्यापक होनेके कारण भगवान् विष्णु है और नरों ( मनुष्यों ) का अयन ( आश्रय) होनेसे नारायण कहलाता है । वह प्रभावशाली होनेसे प्रभु और सदा महत् रूप धारण करता है, इसलिये महान् पुरुष कहलाता है ॥
तथोक्ता ब्रह्मकन्येति लक्ष्मीर्वृत्तिः सरस्वती ।
दण्डनीतिर्जगद्धात्री दण्डो हि बहुविग्रहः ॥ २४ ॥
इसी प्रकार दण्डनीति भी ब्रह्माजीकी कन्या कही गयी है । लक्ष्मी, वृत्ति, सरस्वती तथा
जगद्धात्री भी उसीके नाम हैं । इस प्रकार दण्डके बहुत - से रूप हैं ॥
अर्थानर्थी सुखं दुःखं धर्माधर्मौ बलाबले ।
दौर्भाग्यं भागधेयं च पुण्यापुण्ये गुणागुणौ ॥ २५ ॥
कामाकामावृतुर्मासः शर्वरी दिवसः क्षणः ।
अप्रमादः प्रमादश्च हर्षक्रोधौ शमो दमः ॥ २६ ॥
दैवं पुरुषकारश्च मोक्षामोक्षौ भयाभये ।
हिंसाहिंसे तपो यज्ञः संयमोऽथ विषाविषम् ॥ २७ ॥
अन्तश्चादिश्च मध्यं च कृत्यानां च प्रपञ्चनम् ।
मदः प्रमादो दर्पश्च दम्भो धैर्यं नयानयौ ॥ २८ ॥
अशक्तिः शक्तिरित्येवं मानस्तम्भौ व्ययाव्ययौ ।
विनयश्च विसर्गश्च कालाकालौ च भारत ॥ २ ९ ॥
अनृतं ज्ञानिता सत्यं श्रद्धाश्रद्धे तथैव च ।
क्लीबता व्यवसायश्च लाभालाभौ जयाजयौ ॥ ३० ॥
तीक्ष्णता मृदुता मृत्युरागमानागमौ तथा ।
विरोधश्चाविरोधश्च कार्याकार्ये बलाबले ॥ ३१ ॥
असूया चानसूया च धर्माधर्मौ तथैव च ।
अपत्रपानपत्रपे ह्रीश्च सम्पद्विपत्पदम् ॥ ३२ ॥
तेजः कर्माणि पाण्डित्यं वाक्शक्तिस्तत्त्वबुद्धिता ।
एवं दण्डस्य कौरव्य लोकेऽस्मिन् बहुरूपता ॥ ३३ ॥
अर्थ- अनर्थ, सुख-दुःख, धर्म- अधर्म, बल- अबल, दौर्भाग्य- सौभाग्य, पुण्य - पाप, गुण-अवगुण, काम- अकाम, ऋतु-मास, दिन - रात, क्षण, प्रमाद- अप्रमाद, हर्ष-क्रोध, शम-दम, दैव- पुरुषार्थ, बन्ध - मोक्ष, भय- अभय, हिंसा - अहिंसा, तप-यज्ञ, संयम, विष - अविष, आदि, अन्त, मध्य, कार्यविस्तार, मद, असावधानता, दर्प, दम्भ, धैर्य, नीति- अनीति, शक्ति-
पृष्ठ 800
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
अशक्ति, मान, स्तब्धता, व्यय- अव्यय, विनय, दान, काल अकाल, सत्य - असत्य, ज्ञान, श्रद्धा - अश्रद्धा, अकर्मण्यता, उद्योग, लाभ-हानि, जय-पराजय, तीक्ष्णता - मृदुता, मृत्यु, आना- जाना, विरोध - अविरोध, कर्तव्य- अकर्तव्य, सबलता - निर्बलता, असूया - अनसूया, धर्म- अधर्म, लज्जा - अलज्जा, सम्पत्ति - विपत्ति, स्थान, तेज, कर्म, पाण्डित्य, वाक्शक्ति तथा तत्त्वबोध — ये सब दण्डके ही अनेक नाम और रूप हैं । कुरुनन्दन! इस प्रकार इस जगत्में दण्डके बहुत - से रूप हैं ॥ २५–३३ ॥
न स्याद् यदीह दण्डो वै प्रमथेयुः परस्परम् ।
भयाद् दण्डस्य नान्योन्यं घ्नन्ति चैव युधिष्ठिर ॥ ३४ ॥
युधिष्ठिर! यदि संसारमें दण्डकी व्यवस्था न होती तो सब लोग एक- दूसरेको नष्ट कर डालते । दण्डके ही भयसे मनुष्य आपसमें मार- काट नहीं मचाते हैं ॥ ३४ ॥
दण्डेन रक्ष्यमाणा हि राजन्नहरहः प्रजाः ।
राजानं वर्धयन्तीह तस्माद् दण्डः परायणम् ॥ ३५ ॥
राजन्! दण्डसे सुरक्षित रहती हुई प्रजा ही इस जगत् में अपने राजाको प्रतिदिन धन- धान्यसे सम्पन्न करती रहती है । इसलिये दण्ड ही सबको आश्रय देनेवाला है ॥ ३५ ॥
व्यवस्थापयति क्षिप्रमिमं लोकं नरेश्वर ।
सत्ये व्यवस्थितो धर्मो ब्राह्मणेष्ववतिष्ठते ॥ ३६ ॥
नरेश्वर! दण्ड ही इस लोकको शीघ्र ही सत्यमें स्थापित करता है । सत्यमें ही धर्मकी स्थिति है और धर्म ब्राह्मणोंमें स्थित है ॥ ३६ ॥
धर्मयुक्ता द्विजश्रेष्ठा वेदयुक्ता भवन्ति च ।
बभूव यज्ञो वेदेभ्यो यज्ञः प्रीणाति देवताः ॥ ३७ ॥
प्रीताश्च देवता नित्यमिन्द्रे परिवदन्त्यपि ।
अन्नं ददाति शक्रश्चाप्यनुगृह्णन्निमाः प्रजाः ॥ ३८ ॥
प्राणाश्च सर्वभूतानां नित्यमन्ने प्रतिष्ठिताः ।
तस्मात् प्रजाः प्रतिष्ठन्ते दण्डो जागर्ति तासु च ॥ ३ ९ ॥
धर्मयुक्त श्रेष्ठ ब्राह्मण वेदोंका स्वाध्याय करते हैं । वेदोंसे ही यज्ञ प्रकट हुआ है । यज्ञ देवताओंको तृप्त करता है । तृप्त हुए देवता इन्द्रसे प्रजाके लिये प्रतिदिन प्रार्थना करते हैं, इससे इन्द्र प्रजाजनोंपर अनुग्रह करके ( समयपर वर्षाके द्वारा खेती उपजाकर) उन्हें अन्न देता है, समस्त प्राणियोंके प्राण सदा अन्नपर ही टिके हुए हैं; इसलिये दण्डसे ही प्रजाओंकी स्थिति बनी हुई है । वही उनकी रक्षाके लिये सदा जाग्रत् रहता है ॥ ३७–३९ ॥
एवंप्रयोजनश्चैव दण्डः क्षत्रियतां गतः ।
रक्षन् प्रजाः स जागर्ति नित्यं स्ववहितोऽक्षरः ॥ ४० ॥
इस प्रकार रक्षारूपी प्रयोजन सिद्ध करनेवाला दण्ड क्षत्रियभावको प्राप्त हुआ है । वह अविनाशी होनेके कारण सदा सावधान होकर प्रजाकी रक्षाके लिये जागता रहता