श्रीगणेशाय नमः।
महाभारत — खण्ड ५ — पृष्ठ 801–810
महाभारत — खण्ड ५ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 801–810
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है ॥ ४० ॥
ईश्वरः पुरुषः प्राणः सत्त्वं चित्तं प्रजापतिः ।
भूतात्मा जीव इत्येवं नामभिः प्रोच्यतेऽष्टभिः ॥ ४१ ॥
ईश्वर, पुरुष, प्राण, सत्त्व, चित्त, प्रजापति, भूतात्मा तथा जीव - इन आठ नामोंसे दण्डका ही प्रतिपादन किया जाता है ॥ ४१ ॥
अददद् दण्डमेवास्मै धृतमैश्वर्यमेव च ।
बलेन यश्च संयुक्तः सदा पञ्चविधात्मकः ॥ ४२ ॥
जो सर्वदा सैनिक - बलसे सम्पन्न है तथा जो धर्म, व्यवहार, दण्ड, ईश्वर और जीवरूपसे पाँच* प्रकारके स्वरूप धारण करता है, उस राजाको ईश्वरने ही दण्डनीति तथा अपना ऐश्वर्य प्रदान किया है ॥ ४२ ॥
कुलं बहुधनामात्याः प्रज्ञा प्रोक्ता बलानि तु 1 आहार्यमष्टकैर्द्रव्यैर्बलमन्यद् युधिष्ठिर ॥ ४३ ॥
युधिष्ठिर! राजाका बल दो तरह का होता है -एक प्राकृत और दूसरा आहार्य । उनमेंसे कुल, प्रचुर धन, मन्त्री तथा बुद्धि - ये चार प्राकृतिक बल कहे गये हैं, आहार्य बल उससे भिन्न है । वह निम्नांकित आठ वस्तुओंके द्वारा आठ प्रकारका माना गया है ॥ ४३ ॥
हस्तिनोऽश्वा रथाः पत्तिर्नावो विष्टिस्तथैव च ।
दैशिकाश्चाविकाश्चैव तदष्टाङ्गं बलं स्मृतम् ॥ ४४ ॥
हाथी, घोड़े, रथ, पैदल, नौका, बेगार, देशकी प्रजा तथा भेड़ आदि पशु — ये आठ अंगोंवाला बल आहार्य माना गया है ॥ ४४ ॥
अथवाङ्गस्य युक्तस्य रथिनो हस्तियायिनः ।
अश्वारोहाः पदाताश्च मन्त्रिणो रसदाश्च ये ॥ ४५ ॥
भिक्षुकाः प्राड्विवाकाश्च मौहूर्ता दैवचिन्तकाः ।
कोशो मित्राणि धान्यं च सर्वोपकरणानि च ॥ ४६ ॥
सप्तप्रकृति चाष्टाङ्गं शरीरमिह यद् विदुः ।
राज्यस्य दण्डमेवाङ्गं दण्डः प्रभव एव च ॥ ४७ ॥
अथवा संयुक्त अंगके रथी, हाथीसवार, घुड़सवार, पैदल, मन्त्री, वैद्य, भिक्षुक, वकील, ज्योतिषी, दैवज्ञ, कोश, मित्र, धान्य तथा अन्य सब सामग्री, राज्यकी सात प्रकृतियाँ ( स्वामी, अमात्य, सुहृद्, कोश, राष्ट्र, दुर्ग और सेना) और उपर्युक्त आठ अंगोंसे युक्त बल-= इन सबको राज्यका शरीर माना गया है । इन सबमें दण्ड ही प्रधान अंग है, क्योंकि दण्ड ही सबकी उत्पत्तिका कारण है ॥ ४५–४७ ॥
ईश्वरेण प्रयत्नेन कारणात् क्षत्रियस्य च ।
दण्डो दत्तः समानात्मा दण्डो हीदं सनातनम् ॥ ४८ ॥
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ईश्वरने यत्नपूर्वक धर्मरक्षाके लिये क्षत्रियके हाथमें उसके समान जातिवाला दण्ड समर्पित किया है; इसलिये दण्ड ही इस सनातन व्यवहारका कारण है ॥
राज्ञां पूज्यतमो नान्यो यथा धर्मः प्रदर्शितः ।
ब्रह्मणा लोकरक्षार्थं स्वधर्मस्थापनाय च ॥ ४ ९ ॥
ब्रह्माजीने लोकरक्षा तथा स्वधर्मकी स्थापनाके निमित्त जिस धर्मका प्रदर्शन ( उपदेश) किया था, वह दण्ड ही है । राजाओंके लिये उससे बढ़कर परम पूजनीय दूसरा धर्म नहीं है ॥ ४ ९ ॥
भर्तृप्रत्यय उत्पन्नो व्यवहारस्तथापरः ।
तस्माद् यः स हितो दृष्टो भर्तृप्रत्ययलक्षणः ॥ ५० ॥
स्वामी अथवा विचारकके विश्वासके अनुसार जो व्यवहार उत्पन्न होता है, वह ( वादी -प्रतिवादीद्वारा उठाये हुए विवादसे उत्पन्न व्यवहारकी अपेक्षा) भिन्न है । उससे जो दण्ड दिया जाता है, उसका नाम है ' भर्तृप्रत्ययलक्षण' वह सम्पूर्ण जगत्के लिये हितकर देखा गया है ( यह पहला भेद है ) ॥ ५० ॥
व्यवहारस्तु वेदात्मा वेदप्रत्यय उच्यते ।
मौलश्च नरशार्दूल शास्त्रोक्तश्च तथा परः ॥ ५१ ॥
नरश्रेष्ठ! वेदप्रतिपादित दोषोंका आचरण करने वाले अपराधीके लिये जो व्यवहार या विचार होता है, वह वेदप्रत्यय कहलाता है ( यह दूसरा भेद है ) और कुलाचार भंग करनेके अपराधपर किये जानेवाले विचार या व्यवहारको मौल कहते हैं ( यह तीसरा भेद है ) । इसमें भी शास्त्रोक्त दण्डका ही विधान किया जाता है ॥
उक्तो यश्चापि दण्डोऽसौ भर्तृप्रत्ययलक्षणः ।
ज्ञेयो नः स नरेन्द्रस्थो दण्डः प्रत्यय एव च ॥ ५२ ॥
पहले जो भर्तृप्रत्ययलक्षण दण्ड बताया गया है, वह हमें राजामें ही स्थित जानना चाहिये; क्योंकि वह विश्वास और दण्ड राजापर ही अवलम्बित है ॥ ५२ ॥
दण्डः प्रत्ययदृष्टोऽपि व्यवहारात्मकः स्मृतः ।
व्यवहारः स्मृतो यश्च स वेदविषयात्मकः ॥ ५३ ॥
यद्यपि स्वामीके विश्वासके आधारपर ही वह दण्ड देखा गया है; तथापि उसे भी व्यवहारस्वरूप ही माना गया है । जिसे व्यवहार माना गया है, वह भी वेदोक्त विषयसे भिन्न नहीं है ॥ ५३ ॥
यश्च वेदप्रसूतात्मा स धर्मो गुणदर्शनः ।
धर्मप्रत्यय उद्दिष्टो यथाधर्मं कृतात्मभिः ॥ ५४ ॥
जिसका स्वरूप वेदसे प्रकट हुआ है, वह धर्म ही है । जो धर्म है, वह अपना गुण (लाभ) दिखाता ही है । पुण्यात्मा पुरुषोंने धर्मके अनुसार ही धर्मविश्वास मूलक दण्डका प्रतिपादन किया है ॥ ५४ ॥
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व्यवहारः प्रजागोप्ता ब्रह्मदिष्टो युधिष्ठिर ।
त्रीन् धारयति लोकान् वै सत्यात्मा भूतिवर्धनः ॥ ५५ ॥
युधिष्ठिर! ब्रह्माजीका बताया हुआ जो प्रजा- रक्षक व्यवहार है, वह सत्यस्वरूप होनेके साथ ही ऐश्वर्यकी वृद्धि करनेवाला है, वही तीनों लोकोंको धारण करता है ॥ ५५ ॥
यश्च दण्डः स दृष्टो नो व्यवहारः सनातनः ।
व्यवहारश्च दृष्टो यः स वेद इति निश्चितम् ॥ ५६ ॥
जो दण्ड है, वही हमारी दृष्टिमें सनातन व्यवहार है । जो व्यवहार देखा गया है, वही वेद है, यह निश्चितरूपसे कहा जा सकता है ॥ ५६ ॥
यश्च वेदः स वै धर्मो यश्च धर्मः स सत्पथः ।
ब्रह्मा पितामहः पूर्वं बभूवाथ प्रजापतिः ॥ ५७ ॥
जो वेद है, वही धर्म है और जो धर्म है, वही सत्पुरुषोंका सन्मार्ग है । सत्पुरुष हैं लोकपितामह प्रजापति ब्रह्माजी, जो सबसे पहले प्रकट हुए थे ॥ ५७ ॥
लोकानां स हि सर्वेषां ससुरासुररक्षसाम् ।
समनुष्योरगवतां कर्ता चैव स भूतकृत् ॥ ५८ ॥
वे ही देवता, मनुष्य, नाग, असुर तथा राक्षसोंसहित सम्पूर्ण लोकोंके कर्ता तथा समस्त प्राणियोंके स्रष्टा हैं ॥
ततोऽन्यो व्यवहारोऽयं भर्तृप्रत्ययलक्षणः ।
तस्मादिदमथोवाच व्यवहारनिदर्शनम् ॥ ५ ९ ॥
उन्हींसे भर्तृप्रत्यय नामक इस अन्य प्रकारके दण्डकी प्रवृति हुई; फिर उन्होंने ही इस व्यवहारके लिये यह आदर्श वाक्य कहा- ॥ ५ ९ ॥
माता पिता च भ्राता च भार्या चैव पुरोहितः ।
नादण्ड्यो विद्यते राज्ञो यः स्वधर्मे न तिष्ठति ॥ ६० ॥
'माता, पिता, भाई, स्त्री तथा पुरोहित कोई भी क्यों न हो, जो अपने धर्ममें स्थिर नहीं रहता, उसे राजा अवश्य दण्ड दे, राजाके लिये कोई भी अदण्डनीय नहीं है ' ॥ इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि राजधर्मानुशासनपर्वणि दण्डस्वरूपाधिकथने एकविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १२१ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत राजधर्मानुशासनपर्वमें दण्डके स्वरूपका वर्णनविषयक एक सौ इक्कीसवाँ अध्याय पूराहुआ ॥ १२१ ॥
3 - ‘ विगतः अवहारः धर्मस्य येन सः व्यवहारः ' । दूर हो गया है धर्मका अवहार ( लोप ) जिसके द्वारा, वह व्यवहार है । इस व्युत्पत्तिके अनुसार धर्मको लुप्त होनेसे बचाना ही व्यवहारका व्यवहारत्व है ।
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२ - यहाँ पद्रहवें और सोलहवें श्लोकमें आये हुए पदोंकी नीलकण्ठने व्यावहारिक दण्डके विशेषणरूपसे भी संगति लगायी है । इन विशेषणोंको रूपक मानकर अर्थ किया है । * किन्हीं- किन्हींके मतमें प्रजाके जीवन, धन, मान, स्वास्थ्य और न्यायकी रक्षा करनेके कारण राजाका स्वरूप पाँच प्रकारका बताया गया है ।
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द्वाविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः दण्डकी उत्पत्ति तथा उसके क्षत्रियोंके हाथमें आनेकी परम्पराका वर्णन भीष्म उवाच
अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् ।
अङ्गेषु राजा द्युतिमान् वसुहोम इति श्रुतः ॥ १ ॥
भीष्मजी कहते हैं - युधिष्ठिर! इस दण्डकी उत्पत्तिके विषयमें जानकार लोग एक प्राचीन इतिहासका उदाहरण दिया करते हैं । उसे भी तुम सुन लो । अंगदेशमें वसुहोम नामसे प्रसिद्ध एक तेजस्वी राजा राज्य करते थे ॥ १ ॥
स राजा धर्मविन्नित्यं सह पत्न्या महातपाः ।
मुञ्जपृष्ठं जगामाथ पितृदेवर्षिपूजितम् ॥ २ ॥
'एक समयकी बात है, वे महातपस्वी धर्मज्ञ नरेश अपनी पत्नीके साथ देवताओं, ऋषियों तथा पितरोंसे पूजित मुंजपृष्ठ नामक तीर्थस्थानमें आये ॥ २ ॥
तत्र शृङ्गे हिमवतो मेरौ कनकपर्वते ।
यत्र मुञ्जावटे रामो जटाहरणमादिशत् ॥ ३ ॥
तदाप्रभृति राजेन्द्र ऋषिभिः संशितव्रतैः ।
मुञ्जपृष्ठ इति प्रोक्तः स देशो रुद्रसेवितः ॥ ४ ॥
राजेन्द्र! वह स्थान सुवर्णमय पर्वत सुमेरुके समीपवर्ती हिमालयके शिखरपर है, जहाँ मुंजावटमें परशुरामजीने अपनी जटाएँ बाँधनेका आदेश दिया था। तभीसे कठोर व्रतका पालन करनेवाले ऋषियोंने उस रुद्रसेवित प्रदेशको मुंजपृष्ठ नाम दे दिया ॥ ३-४ ॥
स तत्र बहुभिर्युक्तस्तदा श्रुतिमयैर्गुणैः ।
ब्राह्मणानामनुमतो देवर्षिसदृशोऽभवत् ॥ ५ ॥
वे वहाँ बहुतेरे वेदोक्त गुणोंसे सम्पन्न हो तपस्या करने लगे । उस तपके प्रभावसे वे
देवर्षियोंके तुल्य हो गये । ब्राह्मणोंमें उनका बड़ा सम्मान होने लगा ॥ ५ ॥
तं कदाचिददीनात्मा सखा शक्रस्य मानितः ।
अभ्यगच्छन्महीपालो मान्धाता शत्रुकर्शनः ॥ ६ ॥
एक दिन इन्द्रके सम्मानित सखा उदारचेता शत्रुसूदन राजा मान्धाता उनके दर्शनके लिये आये ॥
सोपसृत्य तु मान्धाता वसुहोमं नराधिपम् ।
दृष्ट्वा प्रकृष्टतपसं विनतोऽग्रेऽभ्यतिष्ठत ॥ ७ ॥
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राजा मान्धाता उत्तम तपस्वी अंगनरेश वसुहोमके पास पहुँचकर दर्शन करके उनके सामने विनीतभावसे खड़े हो गये ॥ ७ ॥
वसुहोमोऽपि राज्ञो वै पाद्यमर्घ्यं न्यवेदयत् ।
सप्ताङ्गस्य तु राजस्य पप्रच्छ कुशलाव्यये ॥ ८ ॥
वसुहोमने भी राजाको पाद्य और अर्घ्य निवेदन किया तथा सातों अंगोंसे युक्त उनके राज्यका कुशल - समाचार पूछा ॥ ८ ॥
सद्भिराचरितं पूर्वं यथावदनुयायिनम् ।
अपृच्छद् वसुहोमस्तं राजन् किं करवाणि ते ॥ ९ ॥
पूर्वकालमें साधु पुरुषोंने जिस पथका अनुसरण किया था, उसीपर यथावत् रूपसे निरन्तर चलनेवाले मान्धातासे वसुहोमने पूछा- राजन्! मैं आपकी क्या सेवा करूँ? ' ॥ ९ ॥
सोऽब्रवीत्परमप्रीतो मान्धाता राजसत्तमम् ।
वसुहोमं महाप्राज्ञमासीनं कुरुनन्दन ॥ १० ॥
कुरुनन्दन! तब परम प्रसन्न हुए मान्धाताने वहाँ बैठे हुए महाज्ञानी नृपश्रेष्ठ वसुहोमसे पूछा ॥ १० ॥
मान्धातोवाच
बृहस्पतेर्मतं राजन्नधीतं सकलं त्वया ।
तथैवौशनसं शास्त्रं विज्ञातं ते नरोत्तम ॥ ११ ॥
मान्धाता बोले- राजन्! नरश्रेष्ठ! आपने बृहस्पतिके सम्पूर्ण मतका अध्ययन किया है । साथ ही शुक्राचार्यके नीतिशास्त्रका भी आपको पूर्ण ज्ञान है ॥ ११ ॥
तदहं ज्ञातुमिच्छामि दण्ड उत्पद्यते कथम् ।
किं चास्य पूर्वं जागर्ति किं वा परममुच्यते ॥ १२ ॥
अतः मैं आपसे यह जानना चाहता हूँ कि दण्डकी उत्पत्ति कैसे हुई? इसके पहले कौन - सी वस्तु जागरूक थी? तथा इस दण्डको सबसे उत्कृष्ट क्यों कहा जाता है? ॥
कथं क्षत्रियसंस्थश्च दण्डः सम्प्रत्यवस्थितः ।
ब्रूहि मे सुमहाप्राज्ञ ददाम्याचार्यवेतनम् ॥ १३ ॥
इस समय यह दण्ड क्षत्रियोंके हाथमें कैसे आया है? महामते! यह सब मुझे बताइये । मैं आपको गुरुदक्षिणा प्रदान करूँगा ॥ १३ ॥
वसुहोमउवाच
शृणु राजन् यथा दण्डः सम्भूतो लोकसंग्रहः ।
प्रजाविनयरक्षार्थं धर्मस्यात्मा सनातनः ॥ १४ ॥
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वसुहोम बोले- राजन्! दण्ड सम्पूर्ण जगत्के नियमके अंदर रखनेवाला है । यह धर्मका सनातन स्वरूप है । इसका उद्देश्य है प्रजाको उद्दण्डतासे बचाना । इसकी उत्पत्ति जिस तरहसे हुई है, सो बता रहा हूँ; सुनो ॥
ब्रह्मा यियक्षुर्भगवान् सर्वलोकपितामहः ।
ऋत्विजं नात्मनस्तुल्यं ददर्शेति हि नः श्रुतम् ॥ १५ ॥
हमारे सुननेमें आया है कि सर्वलोकपितामह भगवान् ब्रह्मा किसी समय यज्ञ करना चाहते थे; किंतु उन्हें अपने योग्य कोई ऋत्विज नहीं दिखायी दिया ॥ १५ ॥
सगर्भं शिरसा देवो बहुवर्षाण्यधारयत् ।
पूर्णे वर्षसहस्रे तु स गर्भः क्षुवतोऽपतत् ॥ १६ ॥
तब उन्होंने बहुत वर्षोंतक अपने मस्तकपर एक गर्भ धारण किया । जब एक हजार वर्ष बीत गये, तब ब्रह्माजीको छींक आयी और वह गर्भ नीचे गिर पड़ा ॥
सक्षुपो नाम सम्भूतः प्रजापतिररिंदम ।
ऋत्विगासीन्महाराज यज्ञे तस्य महात्मनः ॥ १७ ॥
शत्रुदमन नरेश! उससे जो बालक प्रकट हुआ, उसका नाम ' क्षुप ' रखा गया । महाराज! महात्मा ब्रह्माजीके उस यज्ञमें प्रजापति क्षुप ही ऋत्विज हुए ॥ १७ ॥
तस्मिन् प्रवृत्ते सत्रे तु ब्रह्मणः पार्थिवर्षभ ।
दृष्टरूपप्रधानत्वाद् दण्डः सोऽन्तर्हितोऽभवत् ॥ १८ ॥
नृपश्रेष्ठ! ब्रह्माजीका वह यज्ञ आरम्भ होते ही वहाँ प्रत्यक्ष दीखनेवाले यज्ञकी प्रधानता होनेसे ब्रह्माका वह दण्ड अन्तर्धान हो गया ॥ १८ ॥
तस्मिन्नन्तर्हिते चापि प्रजानां संकरोऽभवत् ।
नैव कार्यं न वाकार्यं भोज्याभोज्यं न विद्यते ॥ १ ९ ॥
दण्ड लुप्त होते ही प्रजामें वर्णसंकरता फैलने लगी । कर्तव्याकर्तव्य तथा भक्ष्याभक्ष्यका विचार सर्वथा उठ गया ॥ १ ९ ॥
पेयापेये कुतः सिद्धिर्हिंसन्ति च परस्परम् ।
गम्यागम्यं तदा नासीत् स्वं परस्वं च वै समम् ॥ २० ॥
फिर पेयापेयका ही विचार कैसे रह सकता था? सब लोग एक दूसरेकी हिंसा करने लगे । उस समय गम्यागम्यका विचार भी नहीं रह गया था । अपना और पराया धन एक- सा समझा जाने लगा ॥ २० ॥
परस्परं विलुम्पन्ति सारमेया यथामिषम् ।
अबलान् बलिनो घ्नन्ति निर्मर्यादमवर्तत ॥ २१ ॥
जैसे कुत्ते मांसके टुकड़ेके लिये आपसमें छीना - झपटी और नोच-खसोट करते हैं, उसी
तरह मनुष्य भी परस्पर लूट-पाट करने लगे । बलवान् पुरुष दुर्बलोंकी हत्या करने लगे ।
सर्वत्र उच्छृंखलता फैल गयी ॥ २१ ॥
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ततः पितामहो विष्णुं भगवन्तं सनातनम् ।
सम्पूज्य वरदं देवं महादेवमथाब्रवीत् ॥ २२ ॥
अत्र त्वमनुकम्पां वै कर्तुमर्हसि शंकर ।
संकरो न भवेदत्र यथा तद् वै विधीयताम् ॥ २३ ॥
ऐसी अवस्था हो जानेपर पितामह ब्रह्माने सनातन भगवान् विष्णुका पूजन करके
वरदायक देवता महादेवजीसे कहा- ' शंकर! इस परिस्थितिमें आपको कृपा करनी चाहिये ।
जिस प्रकार संसारमें वर्णसंकरता न फैले, वह उपाय आप करें ॥ २२-२३ ॥
ततः स भगवान् ध्यात्वा चिरं शूलवरायुधः ।
आत्मानमात्मना दण्डं ससृजे देवसत्तमः ॥ २४ ॥
तब शूल नामक श्रेष्ठ शस्त्र धारण करनेवाले सुरश्रेष्ठ महादेवजीने देरतक विचार करके स्वयं अपने आपको ही दण्डके रूपमें प्रकट किया ॥ २४ ॥
तस्माच्च धर्मचरणान्नीतिर्देवी सरस्वती ।
ससृजे दण्डनीतिं सा त्रिषु लोकेषु विश्रुता ॥ २५ ॥
उससे धर्माचरण होता देख नीतिस्वरूपा देवी सरस्वतीने दण्डनीतिकी रचना की जो तीनों लोकोंमें विख्यात है ॥ २५ ॥
भूयः स भगवान् ध्यात्वा चिरं शूलवरायुधः ।
तस्य तस्य निकायस्य चकारैकैकमीश्वरम् ॥ २६ ॥
भगवान् शूलपाणिने पुनः चिरकालतक चिन्तन करके भिन्न -भिन्न समूहका एक-एक राजा बनाया ॥ २६ ॥
देवानामीश्वरं चक्रे देवं दशशतेक्षणम् ।
यमं वैवस्वतं चापि पितॄणामकरोत् प्रभुम् ॥ २७ ॥
उन्होंने सहस्रनेत्रधारी इन्द्रदेवको देवेश्वरके पदपर प्रतिष्ठित किया और सूर्यपुत्र यमको पितरोंका राजा बनाया ॥ २७ ॥
धनानां राक्षसानां च कुबेरमपि चेश्वरम् ।
पर्वतानां पतिं मेरुं सरितां च महोदधिम् ॥ २८ ॥
कुबेरको धन और राक्षसोंका, सुमेरुको पर्वतोंका और महासागरको सरिताओंका स्वामी बना दिया ॥ २८ ॥
अपां राज्येऽसुराणां च विदधे वरुणं प्रभुम् ।
मृत्युं प्राणेश्वरमथो तेजसां च हुताशनम् ॥ २ ९ ॥
शक्तिशाली भगवान् वरुणको जल और असुरोंके राज्यपर प्रतिष्ठित किया । मृत्युको प्राणोंका तथा अग्नि-देवको तेजका आधिपत्य प्रदान किया ॥ २ ९ ॥
रुद्राणामपि चेशानं गोप्तारं विदधे प्रभुम् ।
महात्मानं महादेवं विशालाक्षं सनातनम् ॥ ३० ॥
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विशाल नेत्रोंवाले सनातन महात्मा महादेवजीने अपने आपको रुद्रोंका अधीश्वर तथा शक्तिशाली संरक्षक बनाया ॥ ३० ॥
वसिष्ठमीशं विप्राणां वसूनां जातवेदसम् ।
तेजसां भास्करं चक्रे नक्षत्राणां निशाकरम् ॥ ३१ ॥
वसिष्ठको ब्राह्मणोंका, जातवेदा अग्निको वसुओंका, सूर्यको तेजस्वी ग्रहोंका और चन्द्रमाको नक्षत्रोंका अधिपति बनाया ॥ ३१ ॥
वीरुधामंशुमन्तं च भूतानां च प्रभुं वरम् ।
कुमारं द्वादशभुजं स्कन्दं राजानमादिशत् ॥ ३२ ॥
अंशुमान्को लताओंका तथा बारह भुजाओंसे विभूषित शक्तिशाली कुमार स्कन्दको भूतोंका श्रेष्ठ राजा नियुक्त किया ॥ ३२ ॥
कालं सर्वेशमकरोत् संहारविनयात्मकम् ।
मृत्योश्चतुर्विभागस्य दुःखस्य च सुखस्य च ॥ ३३ ॥
संहार और विनय ( उत्पादन) जिसका स्वरूप है, उस सर्वेश्वर कालको चार प्रकारकी मृत्युका, सुखका और दुःखका भी स्वामी बनाया ॥ ३३ ॥
ईश्वरः सर्वदेवस्तु राजराजो नराधिपः ।
सर्वेषामेव रुद्राणां शूलपाणिरिति श्रुतिः ॥ ३४ ॥
सबके देवता, राजाओंके राजा और मनुष्योंके अधिपति शूलपाणि भगवान् शिव स्वयं
समस्त रुद्रोंके अधीश्वर हुए । ऐसा सुना जाता है ॥ ३४ ॥
तमेनं ब्रह्मणः पुत्रमनुजातं क्षुपं ददौ ।
प्रजानामधिपं श्रेष्ठं सर्वधर्मभृतामपि ॥ ३५ ॥
ब्रह्माजीके छोटे पुत्र क्षुपको उन्होंने समस्त प्रजाओं तथा सम्पूर्ण धर्मधारियोंका श्रेष्ठ अधिपति बना दिया ॥ ३५ ॥
महादेवस्ततस्तस्मिन् वृत्ते यज्ञे यथाविधि ।
दण्डं धर्मस्य गोप्तारं विष्णवे सत्कृतं ददौ ॥ ३६ ॥
तदनन्तर ब्रह्माजीका वह यज्ञ जब विधिपूर्वक सम्पन्न हो गया, तब महादेवजीने धर्मरक्षक भगवान् विष्णुका सत्कार करके उन्हें वह दण्ड समर्पित किया ॥ ३६ ॥
विष्णुरङ्गिरसे प्रादादङ्गिरा मुनिसत्तमः ।
प्रादादिन्द्रमरीचिभ्यां मरीचिर्भृगवे ददौ ॥ ३७ ॥
भगवान् विष्णुने उसे अंगिराको दे दिया । मुनिवर अंगिराने इन्द्र और मरीचिको दिया और मरीचिने भृगुको सौंप दिया ॥ ३७ ॥
भृगुर्ददावृषिभ्यस्तु दण्डं धर्मसमाहितम् ।
ऋषयो लोकपालेभ्यो लोकपालाः क्षुपाय च ॥ ३८ ॥
क्षुपस्तु मनवे प्रादादादित्यतनयाय च ।
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पुत्रेभ्यः श्राद्धदेवस्तु सूक्ष्मधर्मार्थकारणात् ॥ ३ ९ ॥ भृगुने वह धर्मसमाहित दण्ड ऋषियोंको दिया । ऋषियोंने लोकपालोंको, लोकपालोंने क्षुपको, क्षुपने सूर्यपुत्र मनु ( श्राद्धदेव) को और श्राद्धदेवने सूक्ष्म धर्म तथा अर्थकी रक्षाके लिये उसे अपने पुत्रोंको सौंप दिया ॥ ३८-३९ ॥
विभज्य दण्डः कर्तव्यो धर्मेण न यदृच्छया ।
दुष्टानां निग्रहो दण्डो हिरण्यं बाह्यतः क्रिया ॥ ४० ॥
अतः धर्मके अनुसार न्याय- अन्यायका विचार करके ही दण्डका विधान करना चाहिये, मनमानी नहीं करनी चाहिये । दुष्टोंका दमन करना ही दण्डका मुख्य उद्देश्य है, स्वर्णमुद्राएँ लेकर खजाना भरना नहीं । दण्डके तौरपर सुवर्ण ( धन ) लेना तो बाह्यंग – गौण कर्म है ॥ ४० ॥
व्यङ्गत्वं व शरीरस्य वधो नाल्पस्य कारणात् ।
शरीरपीडास्तास्ताश्च देहत्यागो विवासनम् ॥ ४१ ॥
किसी छोटे -से अपराधपर प्रजाका अंग- भंग करना, उसे मार डालना, उसे तरह-तरहकी यातनाएँ देना तथा उसको देहत्यागके लिये विवश करना अथवा देशसे निकाल देना कदापि उचित नहीं है ॥ ४१ ॥
तं ददौ सूर्यपुत्रस्तु मनुर्वै रक्षणार्थकम् ।
आनुपूर्व्याच्च दण्डोऽयं प्रजा जागर्ति पालयन् ॥ ४२ ॥
सूर्यपुत्र मनुने प्रजाकी रक्षाके लिये ही अपने पुत्रोंके हाथोंमें दण्ड सौंपा था, वही क्रमशः उत्तरोत्तर अधिकारियोंके हाथमें आकर प्रजाका पालन करता हुआ जागता रहता है ॥ ४२ ॥
इन्द्रो जागर्ति भगवानिन्द्रादग्निर्विभावसुः ।
अग्नेर्जागर्ति वरुणो वरुणाच्च प्रजापतिः ॥ ४३ ॥
भगवान् इन्द्र दण्ड- विधान करनेमें सदा जागरूक रहते हैं । इन्द्रसे प्रकाशमान अग्नि, अग्निसे वरुण और वरुणसे प्रजापति उस दण्डको प्राप्त करके उसके यथोचित प्रयोगके लिये सदा जाग्रत् रहते हैं ॥ ४३ ॥
प्रजापतेस्ततो धर्मो जागर्ति विनयात्मकः ।
धर्माच्च ब्रह्मणः पुत्रो व्यवसायः सनातनः ॥ ४४ ॥
जो सम्पूर्ण जगत्को शिक्षा देनेवाले हैं, वे धर्म प्रजापतिसे दण्डको ग्रहण करके प्रजाकी रक्षाके लिये सदा जागरूक रहते हैं । ब्रह्मपुत्र सनातन व्यवसाय वह दण्ड धर्मसे लेकर लोकरक्षाके लिये जागते रहते हैं ॥
व्यवसायात् ततस्तेजो जागर्ति परिपालयत् ।
ओषध्यस्तेजसस्तस्मादोषधीभ्यश्च पर्वताः ॥ ४५ ॥
पर्वतेभ्यश्च जागर्ति रसो रसगुणात् तथा ।