श्रीगणेशाय नमः।

महाभारत — खण्ड ५ — पृष्ठ 951–960

महाभारत — खण्ड ५ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 951–960

पृष्ठ 951

महाभारत — खण्ड ५, पृष्ठ 951 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

विश्वामित्र बोले- भूखे हुए महर्षि अगस्त्येने वातापि नामक असुरको खा लिया था । मैं तो क्षुधाके कारण भारी आपत्तिमें पड़ गया हूँ; अतः यह कुत्तेकी जाँघ अवश्य खाऊँगा ॥ ७१ ॥

श्वपचउवाच

भिक्षामन्यामाहरेति न च कर्तुमिहार्हसि ।

न नूनं कार्यमेतद् वै हर कामं श्वजाघनीम् ॥ ७२ ॥

चाण्डालने कहा – मुने! आप दूसरी भिक्षा ले आइये । इसे ग्रहण करना आपके लिये उचित नहीं है । आपकी इच्छा हो तो यह कुत्तेकी जाँघ ले जाइये; परंतु मैं निश्चितरूपसे कहता हूँ कि आपको इसका भक्षण नहीं करना चाहिये ॥ ७२ ॥

विश्वामित्र उवाच

शिष्टा वै कारणं धर्मे तद्वृत्तमनुवर्तये ।

परां मेध्याशनामेनां भक्ष्यां मन्ये श्वजाघनीम् ॥ ७३ ॥

विश्वामित्र बोले- शिष्टपुरुष ही धर्मकी प्रवृत्तिके कारण हैं । मैं उन्हींके आचारका अनुसरण करता हूँ; अतः इस कुत्तेकी जाँघको मैं पवित्र भोजनके समान ही भक्षणीय मानता हूँ ॥ ७३ ॥

श्वपचउवाच

असता यत् समाचीर्णं न च धर्मः सनातनः ।

नाकार्यमिह कार्यं वै मा छलेनाशुभं कृथाः ॥ ७४ ॥

चाण्डालने कहा- किसी असाधु पुरुषने यदि कोई अनुचित कार्य किया हो तो वह सनातन धर्म नहीं माना जायगा; अतः आप यहाँ न करनेयोग्य कर्म न कीजिये । कोई बहाना लेकर पाप करनेपर उतारू न हो जाइये ॥ विश्वामित्र उवाच

न पातकं नावमतमृषिः सन् कर्तुमर्हति ।

समौ च श्वमृगौ मन्ये तस्माद् भोक्ष्ये श्वजाघनीम् ॥ ७५ ॥

विश्वामित्र बोले— कोई श्रेष्ठ ऋषि ऐसा कर्म नहीं कर सकता, जो पातक हो अथवा जिसकी निन्दा की गयी हो । कुत्ते और मृग दोनों ही पशु होनेके कारण मेरे मतमें समान हैं, अतः मैं यह कुत्तेकी जाँघ अवश्य खाऊँगा ॥ ७५ ॥

श्वपच उवाच यद् ब्राह्मणार्थे कृतमर्थितेन तेनर्षिणा तदवस्थाधिकारे ।

पृष्ठ 952

महाभारत — खण्ड ५, पृष्ठ 952 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

सवै धर्मो यत्र न पापमस्ति सर्वैरुपायैर्गुरवो हि रक्ष्याः ॥ ७६ ॥

चाण्डालने कहा — महर्षि अगस्त्यने ब्राह्मणोंकी रक्षाके लिये प्रार्थना की जानेपर वैसी अवस्थामें वातापिका भक्षणरूप कार्य किया था ( उनके वैसा करनेसे बहुतसे ब्राह्मणोंकी रक्षा हो गयी; अन्यथा वह राक्षस उन सबको खा जाता; अतः महर्षिका वह कार्य धर्म ही था ) । धर्म वही है, जिसमें लेशमात्र भी पाप न हो । ब्राह्मण गुरुजन हैं; अतः सभी उपायोंसे उनकी एवं उनके धर्मकी रक्षा करनी चाहिये ॥ ७६ ॥

विश्वामित्र उवाच मित्रं च मे'ब्राह्मणस्यायमात्मा प्रियश्च मे पूज्यतमश्च लोके । तं धर्तुकामोऽहमिमां जिहीर्षे नृशंसानामीदृशानां न बिभ्ये ॥ ७७ ॥

विश्वामित्र बोले— ( यदि अगस्त्यने ब्राह्मणोंकी रक्षाके लिये वह कार्य किया था तो मैं भी मित्रकी रक्षाके लिये उसे करूँगा ) यह ब्राह्मणका शरीर मेरा मित्र ही है । यही जगत्में मेरे लिये परम प्रिय और आदरणीय है । इसीको जीवित रखनेके लिये मैं यह कुत्तेकी जाँघ ले जाना चाहता हूँ, अतः ऐसे नृशंस कर्मोंसे मुझे तनिक भी भय नहीं होता है ॥ ७७ ॥

श्वपचउवाच कामं नरा जीवितं संत्यजन्ति न चाभक्ष्ये क्वचित् कुर्वन्ति बुद्धिम् । सर्वान् कामान् प्राप्नुवन्तीह विद्वन् प्रियस्व कामं सहितः क्षुधैव ॥ ७८ ॥

चाण्डालने कहा — विद्वन्! अच्छे पुरुष अपने प्राणोंका परित्याग भले ही कर दें, परंतु वे कभी अभक्ष्य - भक्षणका विचार नहीं करते हैं । इसीसे वे अपनी सम्पूर्ण कामनाओंको प्राप्त कर लेते हैं; अतः आप भी भूखके साथ ही- उपवासद्वारा ही अपनी मन: कामनाकी पूर्ति कीजिये ॥ ७८ ॥

विश्वामित्र उवाच स्थाने भवेत् संशयः प्रेत्यभावे निःसंशयः कर्मणां वै विनाशः । अहं पुनर्व्रतनित्यः शमात्मा मूलं रक्ष्यं भक्षयिष्याम्यभक्ष्यम् ॥ ७ ९ ॥

पृष्ठ 953

महाभारत — खण्ड ५, पृष्ठ 953 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

विश्वामित्र बोले- यदि उपवास करके प्राण दे दिया जाय तो मरनेके बाद क्या होगा? यह संशययुक्त बात है; परंतु ऐसा करनेसे पुण्यकर्मोंका विनाश होगा, इसमें संशय नहीं है, ( क्योंकि शरीर ही धर्माचरणका मूल है ) अतः मैं जीवनरक्षाके पश्चात् फिर प्रतिदिन व्रत एवं शम, दम आदिमें तत्पर रहकर पापकर्मोंका प्रायश्चित्त कर लूँगा। इस समय तो धर्मके मूलभूत शरीरकी ही रक्षा करना आवश्यक है; अतः मैं इस अभक्ष्य पदार्थका भक्षण करूँगा ॥ ७९ ॥

बुद्धयात्मके व्यक्तमस्तीति पुण्यं मोहात्मके यत्र यथा श्वभक्ष्ये । यद्यप्येतत् संशयात्मा चरामि नाहं भविष्यामि यथा त्वमेव ॥ ८० ॥

यह कुत्तेका मांस - भक्षण दो प्रकारसे हो सकता है - एक बुद्धि और विचारपूर्वक तथा दूसरा अज्ञान एवं आसक्तिपूर्वक । बुद्धि एवं विचारद्वारा सोचकर धर्मके मूल तथा ज्ञानप्राप्तिके साधनभूत शरीरकी रक्षामें पुण्य है, यह बात स्वतः स्पष्ट हो जाती है । इसी तरह मोह एवं आसक्तिपूर्वक उस कार्यमें प्रवृत्त होनेसे दोषका होना भी स्पष्ट ही है । यद्यपि मैं मनमें संशय लेकर यह कार्य करने जा रहा हूँ तथापि मेरा विश्वास है कि मैं इस मांसको खाकर तुम्हारे- जैसा चाण्डाल नहीं बन जाऊँगा । ( तपस्याद्वारा इसके दोषका मार्जन कर लूँगा) ॥ ८० ॥

श्वपचउवाच

गोपनीयमिदं दुःखमिति मे निश्चिता मतिः ।

दुष्कृतोऽब्राह्मणः सत्रं यस्त्वामहमुपालभे ॥ ८१ ॥

चाण्डालने कहा — यह कुत्तेका मांस खाना आपके लिये अत्यन्त दुःखदायक पाप है । इससे आपको बचना चाहिये । यह मेरा निश्चित विचार है, इसीलिये मैं महान् पापी और ब्राह्मणेतर होनेपर भी आपको बारंबार उलाहना दे रहा हूँ । अवश्य ही यह धर्मका उपदेश करना मेरे लिये धूर्ततापूर्ण चेष्टा ही है ॥ ८१ ॥

विश्वामित्र उवाच

पिबन्त्येवोदकं गावो मण्डूकेषु रुवत्स्वपि ।

न तेऽधिकारो धर्मेऽस्ति मा भूरात्मप्रशंसकः ॥ ८२ ॥

विश्वामित्र बोले – मेढकोंके टर्र- टर्र करते रहनेपर भी गौएँ जलाशयोंमें जल पीती ही हैं । ( वैसे ही तुम्हारे मना करनेपर भी मैं तो यह अभक्ष्य भक्षण करूँगा ही) । तुम्हें धर्मोपदेश देनेका कोई अधिकार नहीं है; अतः तुम अपनी प्रशंसा करनेवाले न बनो ॥ ८२ ॥

श्वपचउवाच

पृष्ठ 954

महाभारत — खण्ड ५, पृष्ठ 954 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

सुहृद् भूत्वानुशासे त्वां कृपा हि त्वयि मे द्विज ।

यदिदं श्रेय आधत्स्व मा लोभात् पातकं कृथाः ॥ ८३ ॥

चाण्डालने कहा — ब्रह्मन्! मैं तो आपका हितैषी सुहृद् बनकर ही यह धर्माचरणकी सलाह दे रहा हूँ; क्योंकि आपपर मुझे दया आ रही है । यह जो कल्याणकी बात बता रहा

हूँ, इसे आप ग्रहण करें । लोभवश पाप न करें ॥

विश्वामित्र उवाच

सुहृन्मे त्वं सुखेप्सुश्चेदापदो मां समुद्धर ।

जानेऽहं धर्मतोऽऽत्मानं शौनीमुत्सृज जाघनीम् ॥ ८४ ॥

विश्वामित्र बोले — भैया! यदि तुम मेरे हितैषी सृहृद् हो और मुझे सुख देना चाहते हो तो इस विपत्तिसे मेरा उद्धार करो । मैं अपने धर्मको जानता हूँ। तुम तो यह कुत्तेकी जाँघ मुझे दे दो ॥ ८४ ॥

श्वपचउवाच नैवोत्सहे भवतो दातुमेतां नोपेक्षितुं ह्रियमाणं स्वमन्नम् । उभौ स्यावः पापलोकावलिप्तौ दाता चाहं ब्राह्मणस्त्वं प्रतीच्छन् ॥ ८५ ॥

चाण्डालने कहा —ब्रह्मन्! मैं यह अभक्ष्य वस्तु आपको नहीं दे सकता और मेरे इस अन्नका आपके द्वारा अपहरण हो, इसकी उपेक्षा भी नहीं कर सकता । इसे देनेवाला मैं और लेनेवाले आप ब्राह्मण दोनों ही पापलिप्त होकर नरकमें पड़ेंगे ॥ ८५ ॥

विश्वामित्र उवाच अद्याहमेतद् वृजिनं कर्म कृत्वा जीवंश्चरिष्यामि महापवित्रम् । स पूतात्मा धर्ममेवाभिपत्स्ये यदेतयोर्गुरु तद् वै ब्रवीहि ॥ ८६ ॥

विश्वामित्र बोले — आज यह पापकर्म करके भी यदि मैं जीवित रहा तो परम पवित्र धर्मका अनुष्ठान करूँगा । इससे मेरे तन, मन पवित्र हो जायँगे और मैं धर्मका ही फल प्राप्त करूँगा । जीवित रहकर धर्माचरण करना और उपवास करके प्राण देना– इन दोनोंमें कौन बड़ा है, यह मुझे बताओ ॥ ८६ ॥

श्वपचउवाच आत्मैव साक्षी कुलधर्मकृत्ये त्वमेव जानासि यदत्र दुष्कृतम्1

पृष्ठ 955

महाभारत — खण्ड ५, पृष्ठ 955 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

यो ह्याद्रियाद् भक्ष्यमिति श्वमांसं मन्ये न तस्यास्ति विवर्जनीयम् ॥ ८७ ॥

चाण्डालने कहा — किस कुलके लिये कौन- सा कार्य धर्म है, इस विषयमें यह आत्मा ही साक्षी है । इस अभक्ष्य भक्षणमें जो पाप है, उसे आप भी जानते हैं । मेरी समझमें जो कुत्तेके मांसको भक्षणीय बताकर उसका आदर करे, उसके लिये इस संसारमें कुछ भी त्याज्य नहीं है ॥ ८७ ॥

विश्वामित्र उवाच उपादाने खादने चास्ति दोषः

कार्यात्यये नित्यमत्रापवादः ।

यस्मिन् हिंसा नानृतं वाच्यलेशो- ऽभक्ष्यक्रिया यत्र न तद्गरीयः ॥ ८८ ॥

विश्वामित्र बोले — चाण्डाल! मैं इसे मानता हूँ कि तुमसे दान लेने और इस अभक्ष्य वस्तुको खानेमें दोष है फिर भी जहाँ न खानेसे प्राण जानेकी सम्भावना हो, वहाँके लिये शास्त्रोंमें सदा ही अपवाद वचन मिलते हैं । जिसमें हिंसा और असत्यका तो दोष है ही नहीं, लेशमात्र निन्दारूप दोष है । प्राण जानेके अवसरोंपर भी जो अभक्ष्य भक्षणका निषेध ही करनेवाले वचन हैं, वे गुरुतर अथवा आदरणीय नहीं हैं ॥ ८८ ॥

श्वपचउवाच यद्येष हेतुस्तव खादने स्या- न ते वेदः कारणं नार्यधर्मः । तस्माद् भक्ष्येऽभक्षणे वा द्विजेन्द्र दोषं न पश्यामि यथेदमत्र ॥ ८ ९ ॥ चाण्डालने कहा — द्विजेन्द्र! यदि इस अभक्ष्य वस्तु को खानेमें आपके लिये यह प्राणरक्षारूपी हेतु ही प्रधान है तब तो आपके मतमें न वेद प्रमाण है और न श्रेष्ठ पुरुषोंका आचार- धर्म ही । अतः मैं आपके लिये भक्ष्य वस्तुके अभक्षणमें अथवा अभक्ष्य वस्तुके भक्षणमें कोई दोष नहीं देख रहा हूँ, जैसा कि यहाँ आपका इस मांसके लिये यह महान् आग्रह देखा जाता है ॥ ८ ९ ॥ विश्वामित्र उवाच नैवातिपापं भक्ष्यमाणस्य दृष्टं सुरां तु पीत्वा पततीति शब्दः । अन्योन्यकार्याणि यथा तथैव न पापमात्रेण कृतं हिनस्ति ॥ ९ ० ॥

पृष्ठ 956

महाभारत — खण्ड ५, पृष्ठ 956 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

विश्वामित्र बोले — अखाद्य वस्तु खानेवालेको ब्रह्महत्या आदिके समान महान् पातक लगता हो, ऐसा कोई शास्त्रीय वचन देखनेमें नहीं आता । हाँ, शराब पीकर ब्राह्मण पतित हो जाता है, ऐसा शास्त्रवाक्य स्पष्टरूपसे उपलब्ध होता है; अतः वह सुरापान अवश्य त्याज्य है । जैसे दूसरे - दूसरे कर्म निषिद्ध हैं, वैसा ही अभक्ष्य भक्षण भी है । आपत्तिके समय एक बार किये हुए किसी सामान्य पापसे किसीके आजीवन किये हुए पुण्यकर्मका नाश नहीं होता ॥ ९ ० ॥ श्वपचउवाच अस्थानतो हीनतः कुत्सिताद् वा तद् विद्वांसं बाधते साधुवृत्तम् । श्वानं पुनर्यो लभतेऽभिषङ्गात् तेनापि दण्डः सहितव्य एव ॥ ९ १ ॥ चाण्डालने कहा — जो अयोग्य स्थानसे, अनुचित कर्मसे तथा निन्दित पुरुषसे कोई निषिद्ध वस्तु लेना चाहता है, उस विद्वान्‌को उसका सदाचार ही वैसा करनेसे रोकता है ( अतः आपको तो ज्ञानी और धर्मात्मा होनेके कारण स्वयं ही ऐसे निन्द्य कर्मसे दूर रहना चाहिये ); परंतु जो बारंबार अत्यन्त आग्रह करके कुत्तेका मांस ग्रहण कर रहा है, उसीको इसका दण्ड भी सहन करना चाहिये ( मेरा इसमें कोई दोष नहीं है ) ॥ ९ १ ॥ भीष्म उवाच

एवमुक्त्वा निववृते मातङ्गः कौशिकं तदा ।

विश्वामित्रो जहारैव कृतबुद्धिः श्वजाघनीम् ॥ ९ २ ॥

भीष्मजी कहते हैं - युधिष्ठिर! ऐसा कहकर चाण्डाल मुनिको मना करनेके कार्यसे निवृत्त हो गया । विश्वामित्र तो उसे लेनेका निश्चय कर चुके थे; अतः कुत्तेकी जाँघ ले ही गये ॥ ९ २ ॥

ततो जग्राह स श्वाङ्गं जीवितार्थी महामुनिः ।

सदारस्तामुपाहृत्य वने भोक्तुमियेष सः ॥ ९ ३ ॥

जीवित रहनेकी इच्छावाले उन महामुनिने कुत्तेके शरीरके उस एक भागको ग्रहण कर लिया और उसे वनमें ले जाकर पत्नीसहित खानेका विचार किया ॥ ९ ३ ॥

अथास्य बुद्धिरभवद् विधिनाहं श्वजाघनीम् ।

भक्षयामि यथाकामं पूर्वं संतर्प्य देवताः ॥ ९ ४ ॥

इतनेहीमें उनके मनमें यह विचार उठा कि मैं कुत्तेकी जाँघके इस मांसको विधिपूर्वक पहले देवताओंको अर्पण करूँगा और उन्हें संतुष्ट करके फिर अपनी इच्छानुसार उसे खाऊँगा ॥ ९ ४ ॥ ततोऽग्निमुपसंहृत्य ब्राह्मेण विधिना मुनिः ।

पृष्ठ 957

महाभारत — खण्ड ५, पृष्ठ 957 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

ऐन्द्राग्नेयेन विधिना चरुं श्रपयत स्वयम् ॥ ९ ५ ॥ ऐसा सोचकर मुनिने वेदोक्त विधिसे अग्निकी स्थापना करके इन्द्र और अग्निदेवताके उद्देश्यसे स्वयं ही चरु पकाकर तैयार किया ॥ ९ ५ ॥

ततः समारभत् कर्म दैवं पित्र्यं च भारत ।

आहूय देवानिन्द्रादीन् भागं भागं विधिक्रमात् ॥ ९ ६ ॥

भरतनन्दन! फिर उन्होंने देवकर्म और पितृकर्म आरम्भ किया । इन्द्र आदि देवताओंका आवाहन करके उनके लिये क्रमशः विधिपूर्वक पृथक् - पृथक् भाग अर्पित किया ॥ ९ ६ ॥

एतस्मिन्नेव काले तु प्रववर्ष स वासवः ।

संजीवयन् प्रजाः सर्वा जनयामास चौषधीः ॥ ९ ७ ॥

इसी समय इन्द्रने समस्त प्रजाको जीवनदान देते हुए बड़ी भारी वर्षा की और अन्न आदि ओषधियोंको उत्पन्न किया ॥ ९ ७ ॥

विश्वामित्रोऽपि भगवांस्तपसा दग्धकिल्बिषः ।

कालेन महता सिद्धिमवाप परमाद्भुताम् ॥ ९ ८ ॥

भगवान् विश्वामित्र भी दीर्घकालतक निराहार व्रत एवं तपस्या करके अपने सारे पाप दग्ध कर चुके थे; अतः उन्हें अत्यन्त अद्भुत सिद्धि प्राप्त हुई ॥ ९ ८ ॥

स संहृत्य च तत् कर्म अनास्वाद्य च तद्धविः ।

तोषयामास देवांश्च पितॄंश्च द्विजसत्तमः ॥ ९९ ॥

उन द्विजश्रेष्ठ मुनिने वह कर्म समाप्त करके उस हविष्यका आस्वादन किये बिना ही देवताओं और पितरोंको संतुष्ट कर दिया और उन्हींकी कृपासे पवित्र भोजन प्राप्त करके उसके द्वारा जीवनकी रक्षा की ॥ ९९ ॥

एवं विद्वानदीनात्मा व्यसनस्थो जिजीविषुः ।

सर्वोपायैरुपायज्ञो दीनमात्मानमुद्धरेत् ॥ १०० ॥

राजन्! इस प्रकार संकटमें पड़कर जीवनकी रक्षा चाहनेवाले विद्वान् पुरुषको दीनचित्त न होकर कोई उपाय ढूँढ़ निकालना चाहिये और सभी उपायोंसे अपने आपका आपत्कालमें परिस्थितिसे उद्धार करना चाहिये ॥ १०० ॥

एतां बुद्धिं समास्थाय जीवितव्यं सदा भवेत् ।

जीवन् पुण्यमवाप्नोति पुरुषो भद्रमनुते ॥ १०१ ॥

इस बुद्धिका सहारा लेकर सदा जीवित रहनेका प्रयत्न करना चाहिये; क्योंकि जीवित रहनेवाला पुरुष पुण्य करनेका अवसर पाता और कल्याणका भागी होता है ॥ १०१ ॥

तस्मात् कौन्तेय विदुषा धर्माधर्मविनिश्चये ।

बुद्धिमास्थाय लोकेऽस्मिन् वर्तितव्यं कृतात्मना ॥ १०२ ॥

अतः कुन्तीनन्दन! अपने मनको वशमें रखनेवाले विद्वान् पुरुषको चाहिये कि वह इस जगत्में धर्म और अधर्मका निर्णय करनेके लिये अपनी ही विशुद्ध बुद्धिका आश्रय लेकर

पृष्ठ 958

महाभारत — खण्ड ५, पृष्ठ 958 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

यथायोग्य बर्ताव करे ॥ १०२ ॥

इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि आपद्धर्मपर्वणि विश्वामित्रश्वपचसंवादे एकचत्वारिंशदधिकशततमोऽध्यायः ॥ १४१ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत आपद्धर्मपर्वमें विश्वामित्र और चाण्डालका संवादविषयक एकसौ इकतालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १४१ ॥

पृष्ठ 959

महाभारत — खण्ड ५, पृष्ठ 959 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

द्विचत्वारिंशदधिकशततमोऽध्यायः आपत्कालमें राजाके धर्मका निश्चय तथा उत्तम ब्राह्मणोंके सेवनका आदेश युधिष्ठिरउवाच

यदि घोरं समुद्दिष्टमश्रद्धेयमिवानृतम् ।

अस्ति स्विद् दस्युमर्यादा यामहं परिवर्जये ॥ १ ॥

युधिष्ठिरने पूछा-यदि महापुरुषोंके लिये भी ऐसा भयंकर कर्म ( संकटकालमें ) कर्तव्यरूपसे बता दिया गया तो दुराचारी डाकुओं और लुटेरोंके दुष्कर्मोंकी कौन - सी ऐसी सीमा रह गयी है, जिसका मुझे सदा ही परित्याग करना चाहिये? ( इससे अधिक घोर कर्म तो दस्यु भी नहीं कर सकते ) ॥ १ ॥

सम्मुह्यामि विषीदामि धर्मो मे शिथिलीकृतः ।

उद्यमं नाधिगच्छामि कदाचित् परिसान्त्वयन् ॥ २ ॥

आपके मुँहसे यह उपाख्यान सुनकर मैं मोहित एवं विषादग्रस्त हो रहा हूँ। आपने मेरा धर्मविषयक उत्साह शिथिल कर दिया । मैं अपने मनको बारंबार समझा रहा हूँ तो भी अब कदापि इसमें धर्मविषयक उद्यमके लिये उत्साह नहीं पाता हूँ ॥ २ ॥

भीष्म उवाच

नैतच्छ्रुत्वाऽऽगमादेव तव धर्मानुशासनम् ।

प्रज्ञासमवहारोऽयं कविभिः सम्भृतं मधु ॥ ३ ॥

भीष्मजीने कहा – वत्स! मैंने केवल शास्त्रसे ही सुनकर तुम्हारे लिये यह धर्मोपदेश नहीं किया है । जैसे अनेक स्थानसे अनेक प्रकारके फूलोंका रस लाकर मक्खियाँ मधुका संचय करती हैं, उसी प्रकार विद्वानोंने यह नाना प्रकारकी बुद्धियों ( विचारों) का संकलन किया है ( ऐसी बुद्धियोंका कदाचित् संकटकालमें उपयोग किया जा सकता है । ये सदा काममें लेनेके लिये नहीं कही गयी हैं; अतः तुम्हारे मनमें मोह या विषाद नहीं होना चाहिये ) ॥ ३ ॥

बह्वयः प्रतिविधातव्याः प्रज्ञा राज्ञा ततस्ततः ।

नैकशाखेन धर्मेण यत्रैषा सम्प्रवर्तते ॥ ४ ॥

युधिष्ठिर! राजाको इधर- उधरसे नाना प्रकारके मनुष्योंके निकटसे भिन्न - भिन्न प्रकारकी बुद्धियाँ सीखनी चाहिये । उसे एक ही शाखावाले धर्मको लेकर नहीं बैठे रहना चाहिये । जिस राजामें संकटके समय यह बुद्धि स्फुरित होती है, वह आत्मरक्षाका कोई उपाय निकाल लेता है ॥ ४ ॥

पृष्ठ 960

महाभारत — खण्ड ५, पृष्ठ 960 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

बुद्धिसंजननो धर्म आचारश्च सतां सदा ।

ज्ञेयो भवति कौरव्य सदा तद् विद्धि मे वचः ॥ ५ ॥

कुरुनन्दन! धर्म और सत्पुरुषोंका आचार – ये बुद्धिसे ही प्रकट होते हैं और सदा

उसीके द्वारा जाने जाते हैं । तुम मेरी इस बातको अच्छी तरह समझ लो ॥

बुद्धिश्रेष्ठा हि राजानश्चरन्ति विजयैषिणः ।

धर्मः प्रतिविधातव्यो बुद्धया राज्ञा ततस्ततः ॥ ६ ॥

विजयकी अभिलाषा रखनेवाले एवं बुद्धिमें श्रेष्ठ सभी राजा धर्मका आचरण करते हैं । अतः राजाको इधर- उधरसे बुद्धिके द्वारा शिक्षा लेकर धर्मका भलीभाँति आचरण करना चाहिये ॥ ६ ॥

नैकशाखेन धर्मेण राज्ञो धर्मो विधीयते ।

दुर्बलस्य कुतः प्रज्ञा पुरस्तादनुपाहृता ॥ ७ ॥

एक शाखावाले (एकदेशीय ) धर्मसे राजाका धर्म-निर्वाह नहीं होता । जिसने पहले अध्ययनकालमें एकदेशीय धर्मविषयक बुद्धिकी शिक्षा ली, उस दुर्बल राजाको पूर्ण प्रज्ञा कहाँसे प्राप्त हो सकती है? ॥ ७ ॥

अद्वैधज्ञः पथि द्वैधे संशयं प्राप्तुमर्हति ।

बुद्धिद्वैधं वेदितव्यं पुरस्तादेव भारत ॥ ८ ॥

एक ही धर्म या कर्म किसी समय धर्म माना जाता है और किसी समय अधर्म । उसकी जो यह दो प्रकारकी स्थिति है, उसीका नाम द्वैध है । जो इस द्विविधतत्त्वको नहीं जानता, वह द्वैधमार्गपर पहुँचकर संशयमें पड़ जाता है । भरतनन्दन! बुद्धिके द्वैधको पहले ही अच्छी तरह समझ लेना चाहिये ॥ ८ ॥

पार्श्वतः करणं प्राज्ञो विष्टम्भित्वा प्रकारयेत् ।

जनस्तच्चरितं धर्मं विजानात्यन्यथान्यथा ॥ ९ ॥

बुद्धिमान् पुरुष विचार करते समय पहले अपने प्रत्येक कार्यको गुप्त रखकर उसे प्रारम्भ करे; फिर उसे सर्वत्र प्रकाशित करे; अन्यथा उसके द्वारा आचरणमें लाये हुए धर्मको लोग किसी और ही रूपमें समझने लगते हैं ॥ ९ ॥

अमिथ्याज्ञानिनः केचिन्मिथ्याविज्ञानिनः परे ।

तद्वै यथायथं बुद्ध्वा ज्ञानमाददते सताम् ॥ १० ॥

कुछ लोग यथार्थ ज्ञानी होते हैं और कुछ लोग मिथ्या ज्ञानी, इस बातको ठीक- ठीक समझकर राजा सत्यज्ञानसम्पन्न सत्पुरुषोंके ही ज्ञानको ग्रहण करते हैं ॥ १० ॥

परिमुष्णन्ति शास्त्राणि धर्मस्य परिपन्थिनः ।

वैषम्यमर्थविद्यानां निरर्थाः ख्यापयन्ति ते ॥ ११ ॥

धर्मद्रोही मनुष्य शास्त्रोंकी प्रामाणिकतापर डाका डालते हैं, उन्हें अग्राह्य और अमान्य बताते हैं। वे अर्थज्ञानसे शून्य मनुष्य अर्थशास्त्रकी विषमताका मिथ्या प्रचार करते