श्रीगणेशाय नमः।
महाभारत — खण्ड ५ — पृष्ठ 961–970
महाभारत — खण्ड ५ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 961–970
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हैं ॥ ११ ॥
आजिजीविषवो विद्यां यशःकामौ समन्ततः ।
ते सर्वे नृप पापिष्ठा धर्मस्य परिपन्थिनः ॥ १२ ॥
नरेश्वर! जो जीविकाकी इच्छासे विद्याका उपार्जन करते हैं, सम्पूर्ण दिशाओंमें उसी विद्याके बलसे यश पानेकी इच्छा और मनोवांछित पदार्थोंको प्राप्त करनेकी अभिलाषा रखते हैं, वे सभी पापात्मा और धर्मद्रोही हैं ॥ १२ ॥
अपक्वमतयो मन्दा न जानन्ति यथातथम् ।
यथा ह्यशास्त्रकुशलाः सर्वत्रायुक्तिनिष्ठिता ॥ १३ ॥
जिनकी बुद्धि परिपक्व नहीं हुई है, वे मन्दमति मानव यथार्थ तत्त्वको नहीं जानते हैं । शास्त्रज्ञानमें निपुण न होकर सर्वत्र असंगत युक्तिपर ही अवलम्बित रहते हैं ॥ १३ ॥
परिमुष्णन्ति शास्त्राणि शास्त्रदोषानुदर्शिनः ।
विज्ञानमर्थविद्यानां न सम्यगिति वर्तते ॥ १४ ॥
निरन्तर शास्त्रके दोष देखनेवाले लोग शास्त्रोंकी मर्यादा लूटते हैं और यह कहा करते हैं कि अर्थशास्त्रका ज्ञान समीचीन नहीं है ॥ १४ ॥
निन्दया परविद्यानां स्वविद्यां ख्यापयन्ति च ।
वागस्त्रा वाक्छरीभूता द्रुग्धविद्याफला इव ॥ १५ ॥
वाणी ही जिनका अस्त्र है तथा जिनकी बोली ही बाण के समान लगती है, वे मानो विद्याके फल तत्त्वज्ञानसे ही विद्रोह करते हैं । ऐसे लोग दूसरोंकी विद्याकी निन्दा करके अपनी विद्याकी अच्छाईका मिथ्या प्रचार करते हैं ॥ १५ ॥
तान् विद्यावणिजो विद्धि राक्षसानिव भारत ।
व्याजेन सद्भिर्विहितो धर्मस्ते परिहास्यति ॥ १६ ॥
भरतनन्दन! ऐसे लोगोंको तुम विद्याका व्यापार करनेवाले तथा राक्षसोंके समान परद्रोही समझो । उनकी बहानेबाजीसे तुम्हारा सत्पुरुषोंद्वारा प्रतिपादित एवं आचरित धर्म नष्ट हो जायगा ॥ १६ ॥
न धर्मवचनं वाचा नैव बुद्धयेति नः श्रुतम् ।
इति बार्हस्पतं ज्ञानं प्रोवाच मघवा स्वयम् ॥ १७ ॥
हमने सुना है कि केवल वचनद्वारा अथवा केवल बुद्धि ( तर्क ) के द्वारा ही धर्मका निश्चय नहीं होता है, अपितु शास्त्रवचन और तर्क दोनोंके समुच्चयद्वारा उसका निर्णय होता है - यही बृहस्पतिका मत है, जिसे स्वयं इन्द्रने बताया है ॥ १७ ॥
न त्वेव वचनं किंचिदनिमित्तादिहोच्यते ।
सुविनीतेन शास्त्रेण न व्यवस्यन्त्यथापरे ॥ १८ ॥
विद्वान् पुरुष अकारण कोई बात नहीं कहते हैं और दूसरे बहुत - से मनुष्य भलीभाँति सीखे हुए शास्त्रके अनुसार कार्य करनेकी चेष्टा नहीं करते हैं ॥ १८ ॥
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लोकयात्रामिहैके तु धर्मं प्राहुर्मनीषिणः ।
समुद्दिष्टं सतां धर्मं स्वयमूहेत पण्डितः ॥ १ ९ ॥
इस जगत्में कोई- कोई मनीषी पुरुष शिष्ट पुरुषोंद्वारा परिचालित लोकाचारको ही धर्म कहते हैं, परंतु विद्वान् पुरुष स्वयं ही ऊहापोह करके सत्पुरुषोंके शास्त्रविहित धर्मका निश्चय कर ले ॥ १ ९ ॥
अमर्षाच्छास्त्रसम्मोहादविज्ञानाच्च भारत ।
शास्त्रं प्राज्ञस्य वदतः समूहे यात्यदर्शनम् ॥ २० ॥
भरतनन्दन! जो बद्धिमान् होकर शास्त्रको ठीक- ठीक न समझते हुए मोहमें आबद्ध होकर बड़े जोशके साथ शास्त्रका प्रवचन करता है, उसके उस कथनका लोकसमाजमें कोई प्रभाव नहीं पड़ता है ॥ २० ॥
आगतागमया बुद्धया वचनेन प्रशस्यते ।
अज्ञानाज्ज्ञानहेतुत्वाद् वचनं साधु मन्यते ॥ २१ ॥
वेद- शास्त्रोंके द्वारा अनुमोदित, तर्कयुक्त बुद्धिके द्वारा जो बात कही जाती है, उसीसे शास्त्रकी प्रशंसा होती है अर्थात् शास्त्रकी वही बात लोगोंके मनमें बैठती है । दूसरे लोग अज्ञातविषयका ज्ञान करानेके लिये केवल तर्कको ही श्रेष्ठ मानते हैं, परंतु यह उनकी नासमझी ही है ॥ २१ ॥
अनया हतमेवेदमिति शास्त्रमपार्थकम् ।
दैतेयानुशना प्राह संशयच्छेदनं पुरा ॥ २२ ॥
वे लोग केवल तर्कको प्रधानता देकर अमुक युक्तिसे शास्त्रकी यह बात कट जाती है; इसलिये यह व्यर्थ है, ऐसा कहते हैं; किंतु यह कथन भी अज्ञानके ही कारण है ( अतः तर्कसे शास्त्रका और शास्त्रसे तर्कका बोध न करके दोनोंके सहयोगसे जो कर्तव्य निश्चित हो, उसीका पालन करना चाहिये ) । पूर्वकालमें यह संशय- नाशक बात स्वयं शुक्राचार्यने दैत्योंसे कही थी ॥ २२ ॥
ज्ञानमप्यपदिश्यं हि यथा नास्ति तथैव तत् ।
तं तथा छिन्नमूलेन सन्नोदयितुमर्हसि ॥ २३ ॥
जो संशयात्मक ज्ञान है, उसका होना और न होना बराबर है; अतः तुम उस संशयका मूलोच्छेद करके उसे दूर हटा दो ( संशयरहित ज्ञानका आश्रय लो ) ॥ २३ ॥
अनव्यवहितं यो वा नेदं वाक्यमुपाश्नुते ।
उग्रायैव हि सृष्टोऽसि कर्मणे न त्वमीक्षसे ॥ २४ ॥
यदि तुम मेरे इस नीतियुक्त कथनको नहीं स्वीकार करते हो तो तुम्हारा यह व्यवहार उचित नहीं है; क्योंकि तुम ( क्षत्रिय होनेके कारण) उग्र ( हिंसापूर्ण) कर्मके लिये ही
विधाताद्वारा रचे गये हो । इस बातकी ओर तुम्हारी दृष्टि नहीं जा रही है ॥ २४ ॥
अङ्ग मामन्ववेक्षस्व राजन्याय बुभूषते ।
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यथा प्रमुच्यते त्वन्यो यदर्थं न प्रमोदते ॥ २५ ॥
वत्स युधिष्ठिर! मेरी ओर तो देखो, मैंने क्या किया है । भूमण्डलका राज्य पानेकी इच्छावाले क्षत्रिय राजाओंके साथ मैंने वही बर्ताव किया है, जिससे वे संसारबन्धनसे मुक्त हो जायँ ( अर्थात् उन सबको मैंने युद्धमें मारकर स्वर्गलोक भेज दिया । ) यद्यपि मेरे इस कार्यका दूसरे लोग अनुमोदन नहीं करते थे- मुझे क्रूर और हिंसक कहकर मेरी निन्दा करते थे ( तो भी मैंने किसीकी परवा न करके अपने कर्तव्यका पालन किया, इसी प्रकार तुम अपने कर्तव्यपथपर दृढ़तापूर्वक डटे रहो ) ॥ २५ ॥
अजोऽश्वः क्षत्रमित्येतत् सदृशं ब्रह्मणा कृतम् ।
तस्मादभीक्ष्णं भूतानां यात्रा काचित् प्रसिद्धयति ॥ २६ ॥
बकरा, घोड़ा और क्षत्रिय- इन तीनोंको ब्रह्माजीने एकसा बनाया है । इनके द्वारा समस्त प्राणियोंकी बारंबार कोई - न - कोई जीवनयात्रा सिद्ध होती रहती है ॥ २६ ॥
यस्त्ववध्यवधे दोषः स वध्यस्यावधे स्मृतः ।
सा चैव खलु मर्यादा यामयं परिवर्जयेत् ॥ २७ ॥
अवध्य मनुष्यका वध करनेमें जो दोष माना गया है, वही वध्यका वध न करनेमें भी है । वह दोष ही अकर्तव्यकी वह मर्यादा ( सीमा ) है, जिसका क्षत्रिय राजाको परित्याग करना चाहिये ॥ २७ ॥
तस्मात् तीक्ष्णः प्रजा राजा स्वधर्मे स्थापयेत् ततः ।
अन्योन्यं भक्षयन्तो हि प्रचरेयुर्वृका इव ॥ २८ ॥
अतः तीक्ष्ण स्वभाववाला राजा ही प्रजाको अपने - अपने धर्ममें स्थापित कर सकता है; अन्यथा प्रजावर्गके सब लोग भेड़ियोंके समान एक दूसरेको लूट-खसोटकर खाते हुए स्वच्छन्द विचरने लगें ॥ २८ ॥
यस्य दस्युगणा राष्ट्रे ध्वांक्षा मत्स्यान् जलादिव ।
विहरन्ति परस्वानि स वै क्षत्रियपांसनः ॥ २ ९ ॥
जिसके राज्यमें डाकुओंके दल जलसे मछलियोंको पकड़नेवाले बगुलेके समान पराये धनका अपहरण करते हैं, वह राजा निश्चय ही क्षत्रियकुलका कलंक है ॥ २ ९ ॥
कुलीनान् सचिवान् कृत्वा वेदविद्यासमन्वितान् ।
प्रशाधि पृथिवीं राजन् प्रजा धर्मेण पालयन् ॥ ३० ॥
राजन्! उत्तम कुलमें उत्पन्न तथा वेदविद्यासे सम्पन्न पुरुषोंको मन्त्री बनाकर प्रजाका धर्मपूर्वक पालन करते हुए तुम इस पृथ्वीका शासन करो ॥ ३० ॥
विहीनं कर्मणान्यायं यः प्रगृह्णाति भूमिपः ।
उपायस्याविशेषज्ञं तद् वै क्षत्रं नपुंसकम् ॥ ३१ ॥
जो राजा सत्कर्मसे रहित, न्यायशून्य तथा कार्यसाधनके उपायोंसे अनभिज्ञ पुरुषको सचिवके रूपमें अपनाता है, वह नपुंसक क्षत्रिय है ॥ ३१ ॥
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नैवोग्रं नैव चानुग्रं धर्मेणेह प्रशस्यते ।
उभयं न व्यतिक्रामेदुग्रो भूत्वा मृदुर्भव ॥ ३२ ॥
युधिष्ठिर! राजधर्मके अनुसार केवल उग्रभाव अथवा केवल मृदुभावकी प्रशंसा नहीं की जाती है । उन दोनोंमेंसे किसीका भी परित्याग नहीं करना चाहिये । इसलिये तुम पहले उग्र होकर फिर मृदु होओ ॥ ३२ ॥
कष्टः क्षत्रियधर्मोऽयं सौहृदं त्वयि मे स्थितम् ।
उग्रकर्मणि सृष्टोऽसि तस्माद् राज्यं प्रशाधि वै ॥ ३३ ॥
वत्स! यह क्षत्रियधर्म कष्टसाध्य है । तुम्हारे ऊपर मेरा स्नेह है, इसलिये कहता हूँ । विधाताने तुम्हें उग्र कर्मके लिये ही उत्पन्न किया है; इसलिये तुम अपने धर्ममें स्थित होकर राज्यका शासन करो ॥ ३३ ॥
अशिष्टनिग्रहो नित्यं शिष्टस्य परिपालनम् ।
एवं शुक्रोऽब्रवीद्धीमानापत्सु भरतर्षभ ॥ ३४ ॥
भरतश्रेष्ठ! आपत्तिकालमें भी सदा दुष्टोंका दमन और शिष्ट पुरुषोंका पालन करना चाहिये, ऐसा बुद्धिमान् शुक्राचार्यका कथन है ॥ ३४ ॥
युधिष्ठिर उवाच
अस्ति चेदिह मर्यादा यामन्यो नाभिलङ्घयेत् ।
पृच्छामि त्वां सतां श्रेष्ठ तन्मे ब्रूहि पितामह ॥ ३५ ॥
युधिष्ठिरने पूछा- सत्पुरुषोंमें श्रेष्ठ पितामह! इस जगत्में यदि कोई ऐसी मर्यादा है, जिसका दूसरा कोई उल्लंघन नहीं कर सकता तो मैं उसके विषयमें आपसे पूछता हूँ । आप वही मुझे बताइये ॥ ३५ ॥
भीष्म उवाच
ब्राह्मणानेव सेवेत विद्यावृद्धांस्तपस्विनः ।
श्रुतचारित्रवृत्ताढ्यान् पवित्रं ह्येतदुत्तमम् ॥ ३६ ॥
भीष्मजीने कहा- राजन्! विद्यामें बढ़े - चढ़े तपस्वी तथा शास्त्रज्ञान, उत्तम चरित्र एवं सदाचारसे सम्पन्न ब्राह्मणोंका ही सेवन करे, यह परम उत्तम एवं पवित्र कार्य है ॥ ३६ ॥
या देवतासु वृत्तिस्ते सास्तु विप्रेषु नित्यदा ।
क्रुद्धैर्हि विप्रैः कर्माणि कृतानि बहुधा नृप ॥ ३७ ॥
नरेश्वर! देवताओंके प्रति जो तुम्हारा बर्ताव है, वही भाव और बर्ताव ब्राह्मणोंके प्रति भी सदैव होना चाहिये; क्योंकि क्रोधमें भरे हुए ब्राह्मणोंने अनेक प्रकारके अद्भुत कर्म कर डाले हैं ॥ ३७ ॥
प्रीत्या यशो भवेन्मुख्यमप्रीत्या परमं भयम् ।
प्रीत्या ह्यमृतवद् विप्राः क्रुद्धाश्चैव विषं यथा ॥ ३८ ॥
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ब्राह्मणोंकी प्रसन्नतासे श्रेष्ठ यशका विस्तार होता है । उनकी अप्रसन्नतासे महान् भयकी प्राप्ति होती है । प्रसन्न होनेपर ब्राह्मण अमृतके समान जीवनदायक होते हैं और कुपित होनेपर विषके तुल्य भयंकर हो उठते हैं ॥ ३८ ॥
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि आपद्धर्मपर्वणि द्विचत्वारिंशदधिकशततमोऽध्यायः ॥ १४२ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत आपद्धर्मपर्वमें एक सौ बयालीसवाँ अध्याय पूराहुआ ॥ १४२ ॥
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त्रिचत्वारिंशदधिकशततमोऽध्यायः शरणागतकी रक्षा करनेके विषयमें एक बहेलिये और कपोत- कपोतीका प्रसंग, सर्दीसे पीड़ित हुए बहेलियेका एक वृक्षके नीचे जाकर सोना युधिष्ठिर उवाच
पितामह महाप्राज्ञ सर्वशास्त्रविशारद ।
शरणं पालयानस्य यो धर्मस्तं वदस्व मे ॥ १ ॥
युधिष्ठिरने पूछा- परमबुद्धिमान् पितामह! आप सम्पूर्ण शास्त्रोंके विशेषज्ञ हैं; अतः मुझे यह बताइये कि शरणागतकी रक्षा करनेवाले प्राणीको किस धर्मकी प्राप्ति होती है? ॥ १ ॥
भीष्म उवाच
महान् धर्मो महाराज शरणागतपालने ।
अर्हः प्रष्टुं भवांश्चैव प्रश्नं भरतसत्तम ॥ २ ॥
भीष्मजीने कहा – महाराज! शरणागतकी रक्षा करनेमें महान् धर्म है । भरतश्रेष्ठ! तुम्हीं ऐसा प्रश्न पूछनेके अधिकारी हो ॥ २ ॥
शिबिप्रभृतयो राजन् राजानः शरणागतान् ।
परिपाल्य महात्मानः संसिद्धिं परमां गताः ॥ ३ ॥
राजन्! शिबि आदि महात्मा राजाओंने तो शरणागतोंकी रक्षा करके ही परम सिद्धि प्राप्त कर ली थी ॥
श्रूयते च कपोतेन शत्रुः शरणमागतः ।
पूजितश्च यथान्यायं स्वैश्च मांसैर्निमन्त्रितः ॥ ४ ॥
यह भी सुना जाता है कि एक कबूतरने शरणमें आये हुए शत्रुका यथायोग्य सत्कार किया था और अपना मांस खानेके लिये उसको निमन्त्रित किया था ॥ युधिष्ठिर उवाच
कथं कपोतेन पुरा शत्रुः शरणमागतः ।
स्वमांसं भोजितः कां च गतिं लेभे स भारत ॥ ५ ॥
युधिष्ठिरने पूछा — भरतनन्दन! प्राचीनकालमें कबूतरने शरणागत शत्रुको किस प्रकार अपना मांस खिलाया और ऐसा करनेसे उसे कौन- सी सद्गति प्राप्त हुई ॥ ५ ॥
भीष्मउवाच
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शृणु राजन् कथां दिव्यां सर्वपापप्रणाशिनीम् ।
नृपतेर्मुचुकुन्दस्य कथितां भार्गवेण वै ॥ ६ ॥
भीष्मजीने कहा — राजन्! वह दिव्य कथा सुनो, जो सब पापोंका नाश करनेवाली है ।
परशुरामजीने राजा मुचुकुन्दको यह कथा सुनायी थी ॥ ६ ॥
इममर्थं पुरा पार्थ मुचुकुन्दो नराधिपः ।
भार्गवं परिपप्रच्छ प्रणतः पुरुषर्षभ ॥ ७ ॥
पुरुषप्रवर कुन्तीनन्दन! पहलेकी बात है, राजा मुचुकुन्दने परशुरामजीको प्रणाम करके उनसे यही प्रश्न किया था ॥ ७ ॥
तस्मै शुश्रूषमाणाय भार्गवोऽकथयत् कथाम् ।
इमां यथा कपोतेन सिद्धिः प्राप्ता नराधिप ॥ ८ ॥
नरेश्वर! तब परशुरामजीने सुननेके लिये उत्सुक हुए मुचुकुन्दको कबूतरने जिस प्रकार सिद्धि प्राप्ति की थी, वह कथा कह सुनायी ॥ ८ ॥
मुनिरुवाच
धर्मनिश्चयसंयुक्तां कामार्थसहितां कथाम् ।
शृणुष्वावहितो राजन् गदतो मे महाभुज ॥ ९ ॥
मुनि बोले- महाबाहो! यह कथा धर्मके निर्णयसे युक्त तथा अर्थ और कामसे सम्पन्न है । राजन्! तुम सावधान होकर मेरे मुखसे इस कथाको सुनो ॥ ९ ॥
कश्चित् क्षुद्रसमाचारः पृथिव्यां कालसम्मितः ।
विचचार महारण्ये घोरः शकुनिलुब्धकः ॥ १० ॥
एक समयकी बात है किसी महान् वनमें कोई भयंकर बहेलिया चारों ओर विचर रहा था । वह बड़े खोटे आचार- विचारका था । पृथ्वीपर वह कालके समान जान पड़ता था ॥ १० ॥
काकोल इव कृष्णाङ्गो रक्ताक्षः कालसम्मितः ।
दीर्घजङ्घो ह्रस्वपादो महावक्त्रो महाहनुः ॥ ११ ॥
उसका सारा शरीर ' काकोल' जातिके कौओंके समान काला था । आँखें लाल - लाल थीं । वह देखनेपर काल-सा प्रतीत होता था । बड़ी-बड़ी पिंडलियाँ, छोटे - छोटे पैर, विशाल मुख और लंबी - सी ठोढ़ी - यही उसकी हुलिया थी ॥ ११ ॥
नैव तस्य सुहृत् कश्चिन्न सम्बन्धी न बान्धवाः ।
स हि तैः सम्परित्यक्तस्तेन रौद्रेण कर्मणा ॥ १२ ॥
उसके न कोई सुहृद्, न सम्बन्धी और न भाई-बन्धु ही थे । उसके भयानक क्रूर- कर्मके कारण सबने उसे त्याग दिया था ॥ १२ ॥
नरः पापसमाचारस्त्यक्तव्यो दूरतो बुधैः ।
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आत्मानं योऽभिसंधत्ते सोऽन्यस्य स्यात् कथं हितः ॥ १३ ॥
वास्तवमें जो पापाचारी हो, उसे विज्ञ पुरुषोंको दूरसे ही त्याग देना चाहिये । जो अपने आपको धोखा देता है, वह दूसरेका हितैषी कैसे हो सकता है? ॥ १३ ॥
ये नृशंसा दुरात्मानः प्राणिप्राणहरा नराः ।
उद्वेजनीया भूतानां व्याला इव भवन्ति ते ॥ १४ ॥
जो मनुष्य क्रूर, दुरात्मा तथा दूसरे प्राणियोंके प्राणोंका अपहरण करनेवाले होते हैं, उन्हें सर्पोंके समान सभी जीवोंकी ओरसे उद्वेग प्राप्त होता है ॥ १४ ॥
स वै क्षारकमादाय द्विजान् हत्वा वने सदा ।
चकार विक्रयं तेषां पतङ्गानां जनाधिप ॥ १५ ॥
नरेश्वर! वह प्रतिदिन जाल लेकर वनमें जाता और बहुत-से पक्षियोंको मारकर उन्हें बाजारमें बेंच दिया करता था ॥ १५ ॥
एवं तु वर्तमानस्य तस्य वृत्तिं दुरात्मनः ।
अगमत् सुमहान् कालो न चाधर्ममबुध्यत ॥ १६ ॥
यही उसका नित्यका काम था । इसी वृत्तिसे रहते हुए उस दुरात्माको वहाँ दीर्घ काल व्यतीत हो गया, किंतु उसे अपने इस अधर्मका बोध नहीं हुआ ॥ १६ ॥
तस्य भार्यासहायस्य रममाणस्य शाश्वतम् ।
दैवयोगविमूढस्य नान्या वृत्तिररोचत ॥ १७ ॥
सदा अपनी स्त्रीके साथ विहार करता हुआ वह बहेलिया दैवयोगसे ऐसा मूढ़ हो गया था कि उसे दूसरी कोई वृत्ति अच्छी ही नहीं लगती थी ॥ १७ ॥
ततः कदाचित् तस्याथ वनस्थस्य समन्ततः ।
पातयन्निव वृक्षांस्तान् सुमहान् वातसम्भ्रमः ॥ १८ ॥
तदनन्तर एक दिन वह वनमें ही घूम रहा था कि चारों ओरसे बड़े जोरकी आँधी उठी ।
वायुका प्रचण्ड वेग वहाँके समस्त वृक्षोंको धराशायी करता हुआ - सा जान पड़ा ॥ १८ ॥
मेघसंकुलमाकाशं विद्युन्मण्डलमण्डितम् ।
संछन्नस्तु मुहूर्तेन नौसार्थैरिव सागरः ॥ १ ९ ॥
वारिधारासमूहेन सम्प्रविष्टः शतक्रतुः ।
क्षणेन पूरयामास सलिलेन वसुन्धराम् ॥ २० ॥
आकाशमें मेघोंकी घटाएँ घिर आयीं, विद्युन्मण्डलसे उसकी अपूर्व शोभा होने लगी । जैसे समुद्र नौकारोहियोंके समुदायसे ढक जाता है, उसी प्रकार दो ही घड़ीमें जल-धाराओंके समूहसे आच्छादित हुए इन्द्रदेवने व्योममण्डलमें प्रवेश किया और क्षणभरमें इस पृथ्वीको जलराशिसे भर दिया ॥ १ ९ -२० ॥
ततो धाराकुले काले सम्भ्रमन् नष्टचेतनः ।
शीतार्तस्तद् वनं सर्वमाकुलेनान्तरात्मना ॥ २१ ॥
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उस समय मूसलाधार पानी बरस रहा था । बहेलिया शीतसे पीड़ित हो अचेत सा हो गया और व्याकुल हृदयसे सारे वनमें भटकने लगा ॥ २१ ॥
नैव निम्नं स्थलं वापि सोऽविन्दत विहङ्गहा ।
पूरितो हि जलौघेन तस्य मार्गो वनस्य च ॥ २२ ॥
वनका मार्ग जिसपर वह चलता था, जलके प्रवाहमें डूब गया था । उस बहेलियेको नीची - ऊँची भूमिका कुछ पता नहीं चलता था ॥ २२ ॥
पक्षिणो वर्षवेगेन हता लीनास्तदाभवन् ।
मृगसिंहवराहाश्च स्थलमाश्रित्य शेरते ॥ २३ ॥
वर्षाके वेगसे बहुतेरे पक्षी मरकर धरतीपर लोट गये थे । कितने ही अपने घोंसलोंमें छिपे बैठे थे । मृग, सिंह और सूअर स्थल- भूमिका आश्रय लेकर सो रहे थे ॥
महता वातवर्षेण त्रासितास्ते वनौकसः ।
भयार्ताश्च क्षुधार्ताश्च बभ्रमुः सहिता वने ॥ २४ ॥
भारी आँधी और वर्षासे आंतकित हुए वनवासी जीव-जन्तु भय और भूखसे पीड़ित हो झुंड - के - झुंड एक साथ घूम रहे थे ॥ २४ ॥
स तु शीतहतैर्गात्रैर्न जगाम न तस्थिवान् ।
ददर्श पतितां भूमौ कपोतीं शीतविह्वलाम् ॥ २५ ॥
बहेलियेके सारे अंग सर्दीसे ठिठुर गये थे । इसलिये न तो वह चल पाता था और न खड़ा ही हो पाता था । इसी अवस्थामें उसने धरतीपर गिरी हुई एक कबूतरी देखी, जो सर्दीके कष्टसे व्याकुल हो रही थी ॥ २५ ॥
दृष्ट्वाऽऽर्तोऽपि हि पापात्मा स तां पञ्जरकेऽक्षिपत् ।
स्वयं दुःखाभिभूतोऽपि दुःखमेवाकरोत् परे ॥ २६ ॥
पापात्मा पापकारित्वात् पापमेव चकार सः । वह पापात्मा व्याध यद्यपि स्वयं भी बड़े कष्टमें था तो भी उसने उस कबूतरीको उठाकर पिंजड़ेमें डाल लिया । स्वयं दुःखसे पीड़ित होनेपर भी उसने दूसरे प्राणीको दुःख ही पहुँचाया । सदा पापमें ही प्रवृत्त रहनेके कारण उस पापात्माने उस समय भी पाप ही किया ॥ २६३ ॥
सोऽपश्यत् तरुखण्डेषु मेघनीलवनस्पतिम् ॥ २७ ॥
सेव्यमानं विहङ्गौघैश्छायावासफलार्थिभिः ।
धात्रा परोपकाराय स साधुरिव निर्मितः ॥ २८ ॥
इतनेमें ही उसे वृक्षोंके समूहमें मेघके समान सघन एवं नील एक विशाल वृक्ष दिखायी दिया, जिसपर बहुतसे विहंग छाया, निवास और फलकी इच्छासे बसेरे लेते थे, मानो विधाताने परोपकारके लिये ही उस साधुतुल्य महान् वृक्षका निर्माण किया था ॥ २७-२८ ॥
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अथाभवत् क्षणेनैव वियद् विमलतारकम् ।
महत्सर इवोत्फुल्लं कुमुदच्छुरितोदकम् ॥ २ ९ ॥
तदनन्तर एक ही क्षणमें आकाशके बादल फट गये, निर्मल तारे चमक उठे, मानो खिले हुए कुमुद -पुष्पोंसे सुशोभित जलवाला कोई विशाल सरोवर प्रकाशित हो रहा हो ॥ २ ९ ॥
ताराढ्यं कुमुदाकारमाकाशं निर्मलं बहु ।
घनैर्मुक्तं नभो दृष्ट्वा लुब्धकः शीतविह्वलः ॥ ३० ॥
दिशो विलोकयामास विगाढां प्रेक्ष्य शर्वरीम् ।
दूरतो मे निवेशश्च अस्माद् देशादिति प्रभो ॥ ३१ ॥
प्रभो! ताराओंसे भरा हुआ अत्यन्त निर्मल आकाश विकसित कुमुद- कुसुमोंसे सुशोभित सरोवर- सा प्रतीत होता था । आकाशको मेघोंसे मुक्त हुआ देख सर्दीसे काँपते हुए उस व्याधने सम्पूर्ण दिशाओंकी ओर दृष्टिपात किया और गाढ़े अन्धकारसे भरी हुई रात्रि देखकर मन - ही - मन विचार किया कि मेरा निवासस्थान तो यहाँसे बहुत दूर है ॥ ३०-३१ ॥
कृतबुद्धिर्द्रुमे तस्मिन् वस्तुं तां रजनीं ततः ।
साञ्जलिः प्रणतिं कृत्वा वाक्यमाह वनस्पतिम् ॥ ३२ ॥
शरणं यामि यान्यस्मिन् दैवतानि वनस्पतौ । इसके बाद उसने उस वृक्षके नीचे ही रातभर रहनेका निश्चय किया । फिर हाथ जोड़ प्रणाम करके उस वनस्पतिसे कहा –' इस वृक्षपर जो- जो देवता हों, उन सबकी मैं शरण लेता हूँ ॥ ३२ ॥ '
स शिलायां शिरः कृत्वा पर्णान्यास्तीर्य भूतले ।
दुःखेन महताऽऽविष्टस्ततः सुष्वाप पक्षिहा ॥ ३३ ॥
ऐसा कहकर उसने पृथ्वीपर पत्ते बिछा दिये और एक शिलापर सिर रखकर महान् दुःखसे घिरा हुआ वह बहेलिया वहाँ सो गया ॥ ३३ ॥
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि आपद्धर्मपर्वणि कपोतलुब्धकसंवादोपक्रमे त्रिचत्वारिंशदधिकशततमोऽध्यायः ॥ १४३ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत आपद्धर्मपर्वमें कपोत और व्याधके संवादका उपक्रमविषयक एक सौ तैंतालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १४३ ॥